चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 91–100
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 91–100
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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७३ nA
न रक्ती न विषेणार्तो न शोचन्न च गर्भिणी ।
न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे ॥ ४० ॥
न मूर्च्छाभ्रमतृष्णासु न क्षीणे नापि चक्षते ।
न मद्यदुवे पीत्वा च न स्नेहं न च माक्षिकम् ॥ ४१ ॥
धूमं न भुक्त्वा दध्ना च न रूक्षः क्रुद्ध एव च ।
न तशोषे तिमिरे शिरस्यभिहते न च ॥ ४५ ॥
न शङ्ख न रोहिण्यां न मेहे न मदात्यये ।
एषु धूममकालेषु मोहात्पिबति यो नरः ॥ ४३ ॥
रोगास्तस्य प्रवर्धन्ते दारुणा धूमविभ्रमात् । इसके अगे कहेंगे कि किन २ पुरुषों के लिये धूम्रपान निन्दित है । 'विरिक्त ' विरेचन जिसने लिया हो, वस्ति कर्म (रूक्ष या स्नेहन वस्ति जिसने लो हो ), रक्ती ( रक्त दोष वाला ), विषार्च ( विप से पीड़ित ), शोचन् (शोकातुर मनुष्य ), गर्भिणी ( गर्भवती ), श्रम ( थकान चढ़ा होने पर ), मद ( नशा किया हुआ होनेसे पर ) आम ( अजीणावस्था में ), प्रजागर ( रात्रि में जागने पर ), मूर्च्छा (बेहोशी ), भ्रम ( चक्कर आना ), तृष्णा ( प्यास लगी होने पर ), क्षीण ( धातु क्षय होने पर ), क्षत ( उरः क्षत रांग में ), मद्य ( शराब पीकर ), दुग्ध ( दूध पीकर ), स्नेह ( घी तैल आदि पीकर ), माक्षिक ( शहद खाकर ), दही के साथ चावल आदि खाकर रूक्ष ( रूक्ष शरीर में रूखापन होने पर स्नैहिक धूम के अतिरिक्त धूम ), क्रुद्ध ( कोप की अवस्था में ), तालु शोष ( गला सूख जाने पर ), तिमिर ( तिमिर नामक अक्षि रोग में ), शिर पर चोट लगने पर शंखक ( शंखक नामक शिरो रोग में ), रोहणी रोग डिप्थीरिया, गलरोग में, मेह ( प्रमेह रोग में ), मदात्यय ( मद्यपान करने पर शराब का नशा चढ़ा होने पर ) इन अवस्थाओं में धूम्रपान नहीं करना चाहिये । इन कुसमयों में जो मनुष्य अज्ञान से धूम्रपान करता है, उसके धूमपान से कुपित वातादि दोप और रोग बढ़ाते हैं । जो ऊपर गिनाये जिन २ रोगों में मनुष्य धूम पीता है, उसके वे वे रोग बढ़ जाते हैं और नीरोगी व्यक्ति के अकाल में पीने से कठिन रोग हो जाते हैं ॥ ३६-४३ ॥ धूम किस प्रकार पीना चाहिये- धूमयोग्यः पिबेहोषे शिरो घ्राणाक्षि -संश्रये ॥ ४४ ॥
घ्राणेनाssस्येन कण्ठस्थे, मुखेन प्राणपो वमेत् ।
आस्येन धूमकवान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत् ॥ ४५ ॥
प्रतिलोमं गतो झाशु धूमो हिंस्याद्धि चक्षुषी ॥
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७४ चरकसंहिता [अ० ५ www विरक्तादि से भिन्न, बारह वर्ष से ऊपर, स्नानादि काल में धूम पीनेके योग्य मनुष्य दोष के नासिका, आँख में आश्रित होने पर नाक से धूमपान करे और कण्ठ ( गले या छाती में ) दोष स्थित होने पर मुख से धूमपान करना चाहिये । जो धूम नासिका से पिया है, उसको मुख मार्ग से निकालना चाहिये । अर्थात् धूम्र नासिका से पीकर मुख से निकालना चाहिये, नासिका से नहीं । परन्तु मुख से धूम्रपान करते हुए नासिका से धुँआ नहीं निकालना चाहिये, बल्कि मुख से पीकर मुख से ही बाहर करना चाहिये, क्योंकि धुँआ विपरीत मार्ग से निकाल कर जल्दी ही आँखों को हानि पहुँचाता है ॥४४-४५॥ धूम्रपान के आसन- ऋज्वङ्गचक्षुस्तच्चेताः सूपविष्टस्त्रपर्ययम् ॥ ४६ ॥
पिबेच्छिद्रं पिधायकं नासया धूममात्मवान् । अकुटिल, शरीर, चक्षु, हाथ, पांव, शिर, पीठ, ग्रीवा को सोधे रख कर धूम्रपान में मनोयोग करके, अच्छी प्रकार शान्ति से बैठे हुए तीन-तीन दम एक साथ, कुल नौ बार पीना चाहिये और पीते समय नासिका का एक छेद बन्द कर लेना चाहिये । इसी प्रकार क्रम से दोनों नासिकाओं से पीना चाहिये ॥ चतुर्विंशतिकं नेत्रं स्वाङ्गुलीभिर्विरेचने ॥ ४७ ॥
द्वात्रिंशदङ्गुलं स्नेहे प्रयागेऽध्यर्धमिष्यते ।
ऋजुत्रिकापाफलितं कोलास्थ्यप्रप्रमाणितम् ॥ ४८ ॥
बस्तिनेत्रसमद्रव्यं घूमनेत्रं प्रशस्यते । वैरेचनिक धूम्र में पीने वाले की अपनी अंगुलियों से २४ अंगुल नेत्र नलिका होनी चाहिये, स्नैहिक धूम्र प्रयोग में बत्तीस अंगुल परिमित हो । प्रायोगिक धूम प्रयोग में ३६ छत्तीस अंगुल होनी चाहिये । नालिका की बनावट ---पर्व गांट गिरह सीधे तीन सीधी गिरह वाली गिरहों पर ठीक प्रकार से मिली हुई, एवं आगे से मुख पर बेर के समान नलिका होनी चाहिये । नलिका को बनाने के द्रव्य पदार्थ बस्ति की नलिका के समान होने चाहिये ॥ दूराद्विनिर्गतः पर्वच्छिन्नो नाडीतनूकृतः ॥ ४६ ॥
नेन्द्रियं बाधते धूमो मात्राकालनिषेवितः ।
यदा चोरश्व कण्ठश्च शिरश्च लघुतां व्रजेत् ॥ ५० ॥
कफश्च तनुतां प्राप्तः सुपीतं धूममादिशेत् । चौबीस या छतीस अंगुली लम्बी नलिका में दूर से आने के कारण तीन गर गांठों के होने से तीक्ष्णता का घट जाना, बेर के समान छेद होने से
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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७५ एक दम जोर से नहीं आ सकना, और मात्रा तथा उचित समय में सेवन किया हुआ धूम इन्द्रियों को पीड़ा नहीं पहुंचाता । उत्तम प्रकार से किये हुए धूम्रपान के लक्षण- जब उरः ( वशःस्थल ), कण्ठ ( गला ), शिर का हल्के होना और कफ पतला हो जाये या घट जाये तब धूम अच्छी प्रकार से पीया हुआ समझना चाहिये । अयोग्य रूप में पिये हुए धूम के लक्षण- अविशुद्धः स्वरो यस्य कण्ठश्च सकको भवेत् ॥ ५१ ॥
स्तिमितो मस्तकश्चैवमपीतं धूममादिशेत् । जिस पुरुष का स्वर, अविशुद्ध सष्ट साफ न हुआ हो कफयुक्त हो एवं जिसका गला कफयुक्त हो, और मस्तिष्क स्तिमित अर्थात्जकड़ा हुआ भारी प्रतीत होता है उसने ठीक प्रकार से धूम नहीं पिया ऐसा समझना चाहिये ॥ ५१ । अतियोगतालु के रूपचमेंकण्ठश्चधूम्रपानशुष्यतेके लक्षण-परितप्यते ॥ ५२ ॥
तृप्यते मुह्यते जन्तू रक्तं च स्रवतेऽधिकम् ।
शिर भ्रमतेऽत्यर्थ मूर्च्छा चास्योपजायते ॥ ५३ ॥
इन्द्रियाण्युपतप्यन्ते धूमेऽत्यर्थं निषेविते । तालु मूर्द्धा ( शिर ) और कण्ठ (गला) खुश्क होजाते हैं और जलते हैं, इनमें जलन होती है । जन्तु ( पुरुष) को प्यास लगती है, मूर्छा आ जाती है, विशेष रूप से रक्तस्राव होता है, शिर घूमता है, मूर्छा बेहोशी आ जाती है, और इन्द्रियों में दाह, जलन होती है, ये अति धूम्रपान के लक्षण हैं ॥५२-५३॥ नस्य प्रयोग- वर्षे वर्षेऽणुतैलं च कालेषु त्रिषु नाऽऽचरेत् ॥ ५४ ॥
प्रावृशरद्व सन्तेषु गतमेघे नभस्तले ।
नस्यकर्म यथाकालं यो यथोक्तं निषेवते ॥ ५५ ॥
न तस्य चक्षुर्न प्राणे न श्रोत्रमुपहन्यते ।
न स्युः श्वेता न कपिलाः केशाः श्मश्रूणि वा पुनः ॥ ५६ ॥
न च केशाः प्रलुप्यन्ते वर्धन्ते च विशेषतः मन्यास्तम्भः शिरःशूलमदितं हनुसंग्रहः ॥ ५७ ॥
पीनसार्धावभेदौ च शिरःकम्पश्च शाम्यति ।
शिराः शिरःकपालानां सन्धयः स्नायुकण्डराः ॥ ५८ ॥
नावनप्रीणिताचास्य लभन्तेऽभ्यधिकं बलम् ।
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७६ चरकसंहिता [अ०५ मुखं प्रसन्नोपचितं स्वरःस्निग्धः स्थिरो महान् ॥ ५६ ॥
सर्वेन्द्रियाणां वैमल्यं बलं भवति चाधिकम् ।
न चास्य रोगाः सहसा प्रभवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ६० ॥
जीर्यतश्चोत्तमाङ्गे च जरा न लभते बलम् । आंख अथवा ग्रीवा से ऊपर के अंग कान, नाक, आंख, शिर के खावण र्थात् धोने के लिये और अणु स्रोतस् इनके लिए हितकारी अणु तैल को पुरुष वर्षा ऋतु ( श्रावण भाद्रपद ), अथवा वर्षा का पूर्व भाग ( आषाढ श्रावण ), शरद् ( आश्विन और कार्तिक) वसन्त ( माघ फाल्गुन), इन तीनों कालों में जब आकाश बादलों से रहित एक दम निर्मल हो उस समय नस्य कर्म करे । जो पुरुष नस्य कर्मको ठीक प्रकारसे उचित समय पर करता है उसके न तो आंख, न कान और न नासिका पीड़ित होती हैं । उसके शिर के बाल न तो श्वेत होते हैं । न भूरे ( धूसर रंग के ) होते हैं और न दाढ़ी मूंछ ही श्वेत होती हैं । बाल भा गिरते झडते नहीं; अपितु विशेष रूपसे बढ़ते हैं । नस्य लेने से ( मन्यास्तम्भ ) ग्रीवा का अकड़ना, ( शिरःशूलम् ) शिरांवेदना ( अर्दित ) मुख का लकवा, ( हनुसंग्रह ) जवाड़ों का जकड़ जाना, ( पीनस ) नासा रोग, ( अद्धावभेदक ) आधा सीसी और ( शिरःकम ) शिर का हिलना ये रोग शान्त हो जाते हैं । धमनियां, रक्तवाहिनी नाड़ियां और शिर की अस्थियां, शिर की सन्धियां ( स्नायु ) सूक्ष्म शिरायें, अथवा बन्धन-कण्डरा दृढ़ बन्धन रज्जु रूप शिर के बन्धन, नस्य प्रयोग से अधिक बलवान् हो जाते हैं । मुख प्रसन्न और तेजस्वी हो जाता है, स्वर ( आवाज़ ) स्निग्ध, स्थिर, महान् गम्भीर मीठी हो जाती है । और सब इंद्रियां ( आंख, कान, नाक आदि ) निर्मल स्वच्छ एवं अधिक बल-वान् बन जाती हैं । नस्य कर्म करने वाले मनुष्य को गले से ऊपर के रोग अचा-नक उत्पन्न नहीं होते । क्षीण होते हुए उत्तमांग में नाक, आंख, शिर, गले के ऊपर के अंगों में बुढ़ापे की झुर्रियां आदि नहीं होते ॥ ५४-६० ॥ अणुतैल की विधि- चन्दनागुरुणी पत्रं दार्वीत्वङ-मधुकं बलाम् ॥ ६१ ॥
प्रपौण्डरीकं सूक्ष्मैलां विडङ्गं बिल्वमुत्पलम् ।
ह्रीवेरमभयं वन्यं त्वङ्मुस्तं सारिवां स्थिराम् ॥ ६२ ॥
सुराहं पृश्निपर्णी च जीवन्तीं च शतावरीम् ।
हरेणुं बृहतीं व्याघ्रीं सुरभीं पद्मकेशरम् ॥ ६३ ॥
विपाचयेच्छतगुणे माहेन्द्रे विमलेऽम्भसि ।
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अ०५ ] सूत्रस्थानम II तैलाद्दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत् ॥ ६४ ॥
तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत् ।
अथास्य दशमे पार्क समांशं लागलं पयः ॥ ६५ ॥
दद्यादेषोऽणतलस्य नावनीयस्य संविधिः । चन्दन, अगर, तेजपत्र, वायविडंग, बेल वृक्ष की जड़, नील कमल पुण्डरीक, श्वेत कमल, छोटी इलायची, दारूहल्दी की छाल, मुलेहटी, बला खरैटी, नेत्रवाला, जंगी, हरड़, वन्य (कैवत्तंमुस्ता या मुद्गपर्णी), त्वक् ( दाल चीनी ), नागर मोथा, अनन्तमूल,शालपर्णी, जीवन्ती,पीठवन, देवदारु, शतावर, रेणुकावीज, बड़ी कंटेरो, छोटी कॅटरी, सल्लकी, पद्म केशर, ( कमल का केशर ), इनकी निर्मल, आकाश में बरने माँ गुने वृष्टि के जल में पकाना चाहिये और तेल से दस गुना ( दशांश भाग ) रहने पर कपाय को उतार कर छान ले । इस कपाय के दस भाग करके प्रत्येक में उस तैल की पकाये, अर्थात् प्रथम एक भाग के साथ तेल सिद्ध करे, फिर उसी तेल का दूसरे भाग के साथ, इसी प्रकार दसों भागों के साथ तल सिद्ध कर लेने पर दसवें भाग में समांश तैल के बराबर बकरी का दूध कपाय में मिला दे । यह नस्य कर्म के योग्य अणु तेल बनाने की विधि है " ॥ ६१-६५ ॥ अस्य मात्रां प्रयुञ्जांत तैलस्यार्धपलोन्मिताम् ॥ ६६ ॥
स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य पिचुना नावनैस्त्रिभिः ।
त्र्यहाल्यहाच्च सप्ताहमेतत्कर्म समाचरेत् ॥ ६५ ॥
निवातोष्णसमाचारी हिताशी नियतेन्द्रियः ।
तैलमेतत्त्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ ६८ ॥
प्रयुञ्जानो यथाकालं यथोक्तानश्नुते गुगान् । इस तेल की अर्धपल अर्थात् ( दो ताला ) मात्रा को ले शिर के तैल लगा कर चिकना कर के एवं पसीना लेकर तब रुई के फांये से तीन बार नस्य देना चाहिये १. "अकल्कोडाप। भवेत्स्नेहा यः साध्यः कंवले द्रवे " इस परिभाषा के अनुसार चन्दन आदि पदार्थों को ऊखल में कूट कर ५० तोले परिमित लेकर ४०० ताले पानी में क्वाथ करना चाहिये । ४० ताले रहने पर छान कर दस भाग कर लेने चाहिये और एक भाग के बराबर अथात् ४ तोले तिल तेल मिला कर पाक पूर्व विधि से करना चाहिये । इस प्रकार बार करके दसवीं बार बकरी का दूध ४ तोले मिला कर तेल पाक कर लेना चाहिये । यह अणु तैल बिधि है । अणु तैल का नस्य सप्ताह में लगभग दो बार लेना चाहिये ।
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७८ चरकसंहिता [अ० ५ यह ( दो तोला तैल ) तीन तीन दिन के पीछे नस्य करे । अर्थात् यदि आज नस्य लिया है, तो तीन दिन छोड़कर पांचवें दिन नस्य ले । इस प्रकार से प्रत्येक ऋतु में कुल सात दिन तक लेना चाहिये । सप्ताह में लगभग दो वार नस्य ले । इस तैल का नस्य लेने वाला व्यक्ति वायु के झोंके में, खुली वायु में न रहे, शरीर को गरम बनाये रक्खे, पथ्याशी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, संयमी रहे । यह तैल वात, पित्त कफ तीनों दोपों का नाश करने वाला और आंख, कान, नाक आदि इन्द्रियों को बल देने वाला है । जो व्यक्ति इस अणु तैल को समय ३ पर विधिपूर्वक प्रयोग करता है उसे ऊपर लिखे हुए गुण मिलते हैं ॥ ६६-६८ ॥ दन्तधावन की विधि- आपोथिता द्वौ कालौ कषायकटुतिक्तकम् ॥ ६६ ॥
भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन् । कसैले, कटु ( कडुवे ) नीम आदि, तिक्त ( तीखे ) तेजबल, जीयापोता आदि, रसयुक्त दातुन को आगे से चबाकर कूट कर अर्थात् नरम बनाकर, मसूड़ों को नुक्सान न पहुँचाते हुए, प्रातःकाल बिस्तर से उठकर और सायंकाल सोने के समय दांत साफ़ करे ॥ ६६ ॥
दातुन करने से लाभ- निहन्ति गन्धवैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम् ॥ ७० ॥
निष्कृष्य रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम् । दातुन दुर्गन्ध को, बुरे स्वाद को, जीभ दांत और मुख के मल, और मुख के दुर्गन्ध को नष्ट करती है । दांतों को साफ करने से मुख में रुचि प्रसन्नता अथवा भोजन में रुचि उत्पन्न होती है ॥ ७० ॥
जीभ को साफ करने की विधि- सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च ॥ ७१ ॥
जिह्वा-निर्लेखनानि स्युरतीक्ष्णान्यनृजूनि च ।
जिह्वा -मूल -गतं यच मलमुच्छ्वासरोधि च ॥ ७२ ॥
दौर्गन्ध्यं भजते तेन तस्माज्जिह्वां विनिर्लिखेत् । जीभ को निर्लेखन अर्थात् खुरेच करके साफ करनेके लिए सोना, चाँदी, ताम्बा, राँगा, जस्ता, पीतल और लोह इनकी बनी जीभी अतीक्ष्ण, जो तेज धारवाली न हो, टेढ़ी मुड़ी हुई होनी चाहिये । जो मल जिह्वा के पिछले भाग में लगा हुआ हो और जो मल श्वास को रोकता हो या दूषित करता हो उसको इससे खुरेचकर निकाल देना चाहिये ॥ ७१-७२ ॥
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STOK } सूत्रस्थानम् दातुन के लिये उत्तम वृक्ष- करञ्ज-करवीरार्क -मालती ककुभासनाः । ७३ ॥
शस्यन्ते दन्तपवने ये चाप्येवंविधा द्रुमाः ।
धार्याण्यास्येन वैशद्य -रुचि सौगन्ध्यमिच्छता ॥ ७४ ॥
जाती-कटु -पूगानां वङ्गस्य फलानि च ।
कङ्कोलकफलं पत्रं ताम्बूलस्य शुभं तथा ॥ ७५ ॥
तथा कर्पूर-निर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च करञ्ज ( नाटा करज ), करवीर (कनेर), अर्क ( आक ), मालती ( जुही), ककुभ ( अर्जुन ), असन ( आसन ), ये वृक्ष अथवा इनके समान: इस गुण वाले वृक्ष दातुन के लिये उत्तम है । मुख की निर्मलता, भोजन में रुचि एवं मुख की सुगन्धि चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि जातिफल ( जायफल ), कटुकफल ( लता कस्तूरी ), पूग ( सुपारी ), लवङ्ग (लाङ्ग ), कङ्काल (शीतल चीनी), उत्तम पान, कपूर ( कपूर वृक्ष का गोंद ) और छोटी इलायची इन वस्तुओं को मुख में धारण करे ॥ ७५ ॥
स्नेह-गण्डूष के गुण- इन्वोर्थलं स्वरवलं वदनापचयः परः ॥ ७६ ॥
स्यात्परं च रसज्ञानमन्ने च रुचिरुत्तमा ।
न चाssस्य-कण्ठ-शोपः स्यान्नौष्ठयोः स्फुटनाद्भयम् ॥ ७७ ॥
न च दन्ताः क्षयं यान्ति दृढमूला भवन्ति च ।
न शूल्यन्ते न चाम्लेन हृष्यन्ते भक्षयन्ति च ॥ ७८ ॥
परानपि खरान् भक्ष्यान् तैल-गण्डूष सेवनात् । जबाड़ों को बल मिलता है, वाणी, स्वर, आवाज को बल प्राप्त होता है, मुख, गाल आदि की वृद्धि, उन्नति, रसों का ज्ञान भली प्रकार से होता है और अन्न में भली प्रकार से भोजन के लिये रुचि होती है । स्नेह-गण्डूष अर्थात् तैल के गरारे करने वाले को गले में खुश्की, रूक्षता नहीं होती और न ओटों के फटने की आशङ्का होती है । दाँत जल्दी गिरते भी नहीं, अपितु और भी अधिक जड़ें मजबूत बन जाती हैं और न दाँतों में दर्द होती है, और न खटाई से खट्टे होते हैं, कठोर खाने की वस्तु को भी खा
सकते हैं । ७६-७८ ॥
शिर पर तेल लगाने से लाभ- नित्यं स्नेहार्द्रशिरसः शिरःशूलं न जायते ॥ ७६ ॥
न खालित्यं न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च ।
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८० चरकसंहिता [अ०५ बलं शिरः कपालानां विशेषेणाभिवर्धते ॥ ८० ॥।
दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च ।
इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वग्भवति चामला ॥ ८१ ॥
निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूर्ध्नि तैल- निषेवणात् । नित्य प्रति शिर पर तेल की मालिश करने से शिरःशूल (शिर का दुखना ) नहीं होता, न बाल उड़ते हैं न गंजापन आता, न पालित्य अर्थात् बाल जल्दी श्वेत नहीं होते और बाल नहीं गिरते । शेर की अस्थियों का बल विशेष रूप बढ़ताहै और बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, बाल लम्बे और काले हो जाते हैं । आँख कान आदि इन्द्रियाँ स्वच्छ, प्रसन्न हो जाती हैं, त्वचा स्वच्छ, निर्मल हो जाती है और सुख पूर्वक नींद आती है । शिर पर तेल लगाने से ये लाभ हैं ॥ ७६-८१ ॥ कान में तेल डालने से लाभ- न कर्णरांगा वातोत्था न मन्या-धनु- संग्रहः ॥ ८२ ॥
नोः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णतर्पणात् । नित्य प्रति कान में तेल डालने से वात जन्य कान के रोग, एवं 'मन्याग्रह' ( ग्रीवा का जकड़ना ) और 'हनुग्रह ( जवाड़ों का भिचना ), उचैः श्रुति ( ऊँचा सुनना ), बाधिर्य ( बधिरता, बहरापन ) नहीं होता ॥ ८२ ॥
शरीर पर तेल लगाने की विधि- स्नेहाभ्यङ्गाद्यथा कुम्भश्चमें स्नेह विमर्दनात् ॥ ८३ ॥
भवत्युपाङ्गादक्षश्च दृढ़ः क्लेशसहो यथा ।
तथा शरीरमभ्यङ्गाद् दृढं सुत्वक्प्रजायते ॥ ८४ ॥
प्रशान्त मारुताबाधं क्लेश-व्यायाम-संसहम् ।
स्पर्शने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम् ॥ ८५ ॥
त्वच्यश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः ।
न चाभिघाताभिहतं गात्रमभ्यङ्गसेविनः ॥ ८६ ॥
विकारं भजतेऽत्यर्थं बलकर्मण वा कचित् ।
सुस्पर्शोपचिताङ्गश्च बलवान् प्रियदर्शनः ॥ ८७ ॥
भवत्यभ्यङ्ग-नित्यत्वान्नरोऽल्पजर एव च । जिस प्रकार स्नेह, चिकनाई की मालिश से घड़ा और जिस प्रकार स्नेह के मर्दन से चमड़ा, और जिस प्रकार स्नेह के चुपड़ने से गाड़ी का धुरा, दृढ़ ( मजबूत ) और क्लेशसह अर्थात् ( दुःख कष्ट सहने योग्य हो जाता है ) उसी प्रकार शरीर पर तेल मलने से शरीर भी दृढ़, मजबूत हो जाता है, स्वक
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अ० ५ ] ६ सूत्रस्थानम् ८१ (त्वचा, चमड़ी ) अच्छी कोमल हो जाती है । वायु के रोग शान्त हो जाते हैं, और शरीर क्लेश कष्ट दुःख आदि, व्यायामपरिश्रम सहन करने योग्य बन जाता है । अन्य श्रोत्रादि इन्द्रियों की अपेक्षा स्वचा में वायु का आधिक्य रहता है और स्पर्श ज्ञान भी त्वचा में ही आश्रित है, इसलिये अभ्यंग ( तैल का मलना ) त्वचा के लिये अति उपकारी है । इस लिये मनुष्य को चाहिए कि उसे करता रहे । तैल मर्दन करने वाले व्यक्ति के शरीर पर अभिघात ( चोट ) लगने पर भी विशेष कोई हानि नहीं आती; क्योंकि वायु शान्त हुई होती है, आघात जो कि वायु को कुपित करने वाला है वह भी वायु को कुवित नहीं कर सकता । इसी प्रकार कभी अचानक श्रम या मेहनत का काम करने से भी शरीर में विकार उत्पन्न नहीं होता । नित्य प्रति अभ्यंग ( शरीर पर तैल मर्दन करने से ) मनुष्य की त्वचा कोमल, उत्तम स्पर्शज्ञान वाली, तथा पुरुष भरे हुए सुघटित अंगों वाला बलवान् एवं सुन्दर शरीर वाला हो जाता है । ऐसे मनुष्य को बुढ़ापा भी जल्दी नहीं आता ॥ ८३-८७ ॥ पाँव में तैलमर्दन के गुण- खरत्वं शुष्कता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः ॥ ८८ ॥!
सद्य एवापशाम्यन्ति पादाभ्यङ्ग-निषेवणात् ।
जायते सोकुमार्यं च बलं स्थेयं च पादयोः ॥ ८६ ॥
दृष्टिः प्रसादं लभते मारुतश्चापशाम्यति ।
न च स्युर्गृध्रसी-वाताः पादयोः स्फुटनं न च ॥ ६० ॥
नशिरा स्नायु -संकाचः पादाभ्यङ्गेन पादयोः । पाँव में ( खासकर पाँव के तन्तुओं पर तैल लगाने से खरत्व ( खुखुरा पन ), शुष्कता ( सूखापन, फटना ), रोक्य ( रूक्षता, रुखाई ), श्रम ( थकान ) और पांव की सुप्ति ( सो जाना, स्तब्ध, जड़ सा हो जाना ), शीघ्र ही अच्छे हो जाते हैं । पाँव में तेल मर्दन करने से पांव में कोमलता, सुकुमारता आ जाती है, पांव बलवान्, स्थिर ( न कांपने वाले ) हो जाते हैं । इसके सिवाय आंख स्वच्छ, निर्मल हो जाती है, और वायु भी पांव की शान्त हो जाती है । पांव में तेल मालिश करने वाले व्यक्ति को न तो गृध्रसी रोग न पत्र का फटना ( पाददारी, विवाई आदि रोग ), और न शिरा या स्नायुओं का संकुचित होना ( पाँव के शान तन्तुओं या मांस पेशियों का संकुचित होना ) होते हैं ।
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चरकसंहिता [ अ०५ उबटन लगाना- दौर्गन्ध्यं गौरवं तन्द्रां कण्डूं मलमरोचकम् ॥ ६१ ॥
स्वेदं बीभत्सतां हन्ति शरीर-परिमार्जनम् । शरीर पर उबटन ( बेसन आदि ) मलने से शरीर की दुर्गन्ध, भारीपन, तन्द्रा ( काम में आलस्य ), खाज, मल, अरुचि ( भोजन में अनिच्छा ), स्वेद, बीभत्सता ( पसीने की बदबू ) नष्ट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥
स्नान का फल– पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रम -स्वेद- मलापहम् ॥ ६२ ॥
शरीर - बल-संधानं स्नानमोजस्करं परम् । नित्य प्रति स्नान करने से मनुष्य को पवित्रता, वृष्य ( पुरुषत्व), दीघांयु मिलती है । स्नान में थकावट, पसीना और मल्ट कीदुन्धि दूर हो जाती है । स्नान करने से शरीर का बल और ओज ( तेज, कान्ति, दीति ) विशेष रूप में बढ़ता है ॥ ६२ ॥
, ' ' वही ' ओज'पर( Internalजो(' ओजसूक्ष्मतम' आठवींscenetainभाग बनतातु है)हैका। 'मजा' के सूक्ष्म भाग का शुक्राशि से पाक होने नाम आज है है, जिसके कमकाहोनेअन्तःसारसे मनुष्
का तेज कम हो जाता है और जिसके नाश होने पर मनुष्य भी मर जाता है ।
स्वच्छ वस्त्र पहनने के गुण- काम्यं यशस्यमायुष्यम लक्ष्मीघ्नं प्रहर्पणम् ॥ ६३ ॥
श्रीमत्पारिषदं शस्तं निर्मलाम्बर-धारणम् । निर्मल, स्वच्छ साफ वस्त्र पहनने से मनुष्य को कमनीयता, सुन्दरता, यश, कीर्त्ति, दीर्घायु मिलती है । स्वच्छ वस्त्र अलक्ष्मीघ्न अर्थात् दरिद्रता को दूर करता है और प्रहर्पण अर्थात् ( चित्त को खुश करता है ) । स्वच्छ वस्त्र राजाओं की सभा में भी प्रशंसित होता है ॥ ६३ ॥
गन्धमाला आदि के धारण करने के गुण- वृष्यं सौगन्ध्यमायुष्यं काम्यं पुष्टिबलप्रदम् ॥ ६४ ॥
सौमनस्यमलक्ष्मीनं गन्धमाल्य-निषेवणम् । सुगन्धित पदार्थ, इत्र आदि और पुष्प माला आदि को धारण करने से मनुष्य को पुरुषत्व, सुगन्धि, दीर्घायु मिलती है । इनके धारण करने से शरीर मैं कमनीयता, पुष्टि और बल आता है । माला के धारण करने से मन प्रसन्न रहता है और दरिद्रता का नाश होता है ॥ ६४ ॥