चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 21–30

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् ३

विश्वामित्राश्वरथ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित् ।

गार्ग्यः शाण्डिल्य कौण्डिन्यो वार्मिर्देवलगालवों ॥ १० ॥

सांकृत्यो वैजवापिश्च कुशिका बादरायणः ।

बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ ॥ ११ ॥

काङ्कायनः कैकशेयो धौम्यो मारीचिकाश्यपौ ।

शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च ॥ १२ ॥

शौनकः शाकुनेयश्च मैत्रेयो ममतायनिः ।

वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षयः ॥ १३ ॥

ब्रह्मज्ञानस्य निधयो यमस्य नियमस्य च ।

तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः ॥ १४ ॥

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम् । अंगिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यर, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलस्त्य नारद, असित, अगस्त्य, वामदेव. मार्कण्डेय, आश्वलायन, पारीक्षि, भिक्षु, आत्रेय, भरद्वाज, कपिञ्जल, विश्वामित्र, आश्वरध्य, भार्गव, व्यवन, अभिजित्, गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, वाक्षि, देवल, गालव, साङ्कृत्य, वैजवापि, कुशिक, बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, काङ्कायन, कैकशेय, धौम्य, मारीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष, पैङ्गि, शौनक, शाकुनेय, मैत्रेय, मैमतायनि, वैखानस, वालखिल्य और अन्य ब्रह्मज्ञान, यम, नियम और तप के तेज से चमकते हुए, आहुति से उज्वल अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि लोग वहां सुख से बिराज कर, इस पुण्यशाली कथा को इस प्रकार कहने लगे || ८-१५ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥ १५ ॥

रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ।

प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् ॥ १६ ॥

कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः ।

अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ध्यानचक्षुषा ॥ १७ ॥

स वक्ष्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का मूल कारण आरोग्य १. यम- अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्य्यपरिग्रहा यमाः ॥ यो० सू० ॥ नियम - शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ यां० सू० ॥

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४ चरकसंहिता [ अ० १ ही है । " रोग इस आरोग्य, अभ्युदय तथा जीवन ( आयु ) को नाश करने वाले हैं । मनुष्यों के लिए ये रोग बड़े विघ्नरूप हो गये हैं । इसलिए इन रोगों की शान्ति का उपाय क्या होना चाहिए! ऐसा कहकर वे सब ऋषि ध्यान मग्न हो गये । उन्होंने अन्तश्चक्षु से इन्द्र को अपनेको शरण देने वाले के रूप से देखा और जान लिया कि देवों का राजा इन्द्र ही शान्ति का उपाय कहेगा ॥ १६-१७ ॥ कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत्प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥

अहमर्थे नियुज्येयमत्रान प्रथमं वचः ।

भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १६ ॥

प्रश्न उपस्थित हुआ कि शचापति इन्द्र से पूछने के लिये इन्द्र के भवन तक कौन जाय? ऋषि भरद्वाज ने सबसे प्रथम कहा कि इस कार्य में मुझको

नियुक्त किया जाये । इसलिए अंगरा आदि ऋषियों ने भरद्वाज ऋषि की है।

इस कार्य में नियुक्त कर दिया ॥ १८-१६ ॥

स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् ।

ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥

इन्द्र के भवन में जाकर, उन्होंने देवर्षियों के मध्य में प्रदीप्त अग्नि के समान तेजस्वी, बल नाम असुर को मारने वाले इन्द्र का देवः ॥ ६० ॥

सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् ।

प्रावाच भगवान्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम ॥ २४ ॥

बुद्धिमान भरद्वाज ने इन्द्र के सन्मुख जाकर जयसूचक आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके2 ऋषियों का उत्तम वचन प्रस्तुत कि ॥ २१ ॥

व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयंकराः ।

तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥ २२ ॥

हे अमरप्रभो! सब प्राणियों का भय देने वाली व्याधियां उत्पन्न हो गई है इसलिये आप इनकी शान्ति का उपाय उपदेश करें ॥ २२ ॥

तस्मै प्रोवाच भगवानायुर्वेदं शतक्रतुः ।

पदैरल्पैर्मति बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥

१ कहा भी है- "आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम्! श्रेयः परं किमन्यत् शरीर मजरामरं विहायैकम् ॥ ” रसहृदयतंत्र ॥ २ योग्य शिष्य ही विनयपूर्वक गुरु से शास्त्रों को सुनने का अधिकारी है ।

यथाः - तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तस्वदर्शिनः ॥ गीता ॥

पृष्ठ 23

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अ० १] सूत्रस्थानम् भगवान् इन्द्र ने महर्षि भरद्वाज को महामति जान कर थोड़े ही शब्दों में संक्षेप से आयुर्वेद का उपदेश किया ॥ २३ ॥

हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् ।

त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥

सोऽनन्तारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः ।

यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ २५ ॥

diss युरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् ।

ऋषिभ्योऽनधिकं तच शशंसानवशेषयन् ॥ २६॥

ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् ।

दीर्घमायुचिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥

हेतु ( रोगों का कारण ), लिंग ( रोगों के चिन्ह ), औषध, (संशोधन और संशमन रूप चिकित्सा ), स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए परम गति और जिस का पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रथम ज्ञान किया था, उस तीन सूत्र ' वाले पुण्य, श्रेष्ठ और नित्य, सनातन आयुर्वेद का इन्द्र ने उपदेश किया । महामति भर-द्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त होकर इस अनन्त और अशर और तीन स्कन्धों वाले आयुर्वेद को यथावत् शीघ्र ही सम्पूर्ण जान लिया । भरद्वाज मुनि ने इस १ त्रिः सूत्र -हेतु, दोष और द्रव्य संग्रह रूपः

हेतुसंग्रह —कालबुद्धीन्द्रियाथानां योगो मिथ्या न चाति च ।

द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधा हेतुसंग्रहः ॥

दोषसंग्रह --वातः पित्तं कफश्वोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः ।

मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥

द्रव्यसंग्रह - किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद् धातु-प्रदूषणम् ।

स्वस्थवृत्ती मतं किंचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥

अथवा 'त्रिसूत्र' शब्द से वात, पित्त और कफ का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि मम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्र इन्हीं में ओत-प्रोत है । जैसा कि सुश्रुत में— “वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्य पन्नैरधो मध्योदुर्ध्वसन्निविष्टैः शरीरामदं धार्यंत आगारमिव स्थूणाभिः । अतः त्रिस्थूणाभिरित्येके । ” २ - साऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश् ते, अनादित्वात् । चरक ॥ ३- नास्ति आयुर्वेदस्य पारम् तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत्। ॥ चरक ||

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६ चरकसंहिता [अ० १ आयुर्वेद के द्वारा ही सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त की । और उसने ऋषियों कोन अधिक और न कुछ कम, ज्यों का त्यों ही सम्पूर्ण शास्त्र का उपदेश किया । दीर्घ आयु करने की इच्छा वाले ऋषियों ने भी लोक की हितकामना से इस आयुवर्धक आयुर्वेद को भरद्वाज से ग्रहण किया ॥ २४-२७ ॥

महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचक्षुषा ।

सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च ॥ २८ ॥

समवायं च तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः ।

लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनश्वरम् ॥। २६ ॥

ज्ञान की चक्षु से ऋषियों ने सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कर्म, समवाय का यथावत् पूर्णरूप से दर्शन किया । इन को यथावत् जानकर आयुवद विधि से हितकारक पदार्थों का सेवन और अहितकारी पदार्थों का त्याग कर परम सुख, आरोग्य और दीर्घ जीवन प्राप्त किया ॥ २८-२६ ॥

अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः ।

शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥ ३० ॥

अग्निवेशश्च भेंडच जतूकर्णः पराशरः ।

हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् सब प्राणियों में मैत्री बुद्धि रखने वाले पुनर्वसु आत्रेय ने सब प्राणियों पर दया का अनुभव करके इस पवित्र आयुर्वेद का छः शिष्यो को उपदेश किया । अग्निवेश, भेड, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि इन छः शिष्यों ने मुनि के उस उपदेशवचन को ग्रहण किया ॥। ३०-३१ ॥

बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः ।

तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ३२ ॥

अथ भेडादयश्चक्रः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ।

श्रावयामासुरात्रेयं सर्षिसंघं सुमेधसः ॥ ३३ ॥

श्रुत्वा सूत्रणमर्थानामृषयः पुण्यकर्मणाम् ।

यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे ॥ ३४ ॥

सर्व वास्तुवस्ताँश्च सर्वभूतहितैषिणः ।

साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युश्चेरब्रुवन् समम् ॥ ३५ ॥

तं पुण्यं शुश्रुवः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः ।

सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम् ॥ ३६ ॥

१ – धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्था साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्स्वज्ञानान्निःश्रेयसम् । वैशेषिक०

पृष्ठ 25

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अ० १ ] सूत्रस्थानम्

अहो साध्विति घोष लोकाँस्त्रीनन्वनादयत् ।

are स्निग्धगम्भीरो हर्षाद् भूतैरुदीरितः ॥ ३७ ॥

शिवो वायुर्वौ सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः ।

निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥ ३८ ॥

अथाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः ।

बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः क्षमा दया ॥ ३६ ॥

तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः ।

भवाय भूतसंघानां प्रतिष्ठां भुवि लेभेरे ॥ ४० ॥

अग्निवेश की बुद्धि विशेष थी, मुनि आत्रेय के उपदेशमें कोई अन्तर नहीं था | अग्निवेश ही सब से प्रथम आयुर्वेद-तंत्र का कत्ता हुवा | इसके पीछे भेड आदि बुद्धिमान् शिष्यों ने भी अपने अपने तंत्र बना कर बहुत से ऋषियों के साथ विराजमान आत्रेय मुनि को सुनाये । पुण्यकर्मा अग्निवेश आदि ऋषियों द्वारा भली प्रकार से सूत्र रूप से गुंथे हुए आयुर्वेद शास्त्र को सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका प्रसन्नता से अनुमोदन भी किया कि ठीक प्रकार से प्रथित ( गूंथा हुआ है । सब प्राणियों पर दयालु उन ऋषियों की सब ने ही प्रशंसा की । सब ने एक साथ उच्चस्वर से कहा कि आपने प्राणियों पर बहुत उत्तम रूप से दया की है । स्वर्ग में स्थित देवों के सहित नारद आदि देव ऋषियों ने भी उन परम ऋषियों के पुण्य शब्द को सुना । इस को सुनकर वे भी बहुत प्रसन्न हुए । समस्त प्राणियों ने हर्ष से अति स्नेह युक्त एवं गम्भीर शब्द से साधुवाद दिया । इस साधुवाद की ध्वनि आकाश में फैल कर तीनों लोकों को गुंजा दिया । सुखदायक वायु बहने लगा, सब दिशायें प्रकाश से चमकने लगीं, जल से भी दिव्य कुसुम बरसने लगे । ( बुद्धि ) उपलब्धि, ( सिद्धि ) साध्य साधन, ( स्मृति ) पूर्व अनुभूत अर्थ का स्मरण, ( मेधा ) धारण करने की शक्ति, ( धृति ) मन की संतुष्टि, ( कीर्त्ति ) यश, ( क्षमा ) अपकारी के प्रति अनपकार की इच्छा, ( दया ) प्राणियों के दुःख हटाने की इच्छा, ये ज्ञानमय देवता अग्निवेश आदि ऋषियों में प्रविष्ट हुए अर्थात् ये शुभ गुण इन में आये । महर्षियों द्वारा अनुमोदित उक्त ऋषियों के शास्त्र लोगों के परम कल्याण के लिये पृथिवी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए ॥ ३२-४० ॥

आयुर्वेद का लक्षण - हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।

मानं च तच यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ ४१ ॥

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८ चरकसंहिता [ अ० १ हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की ' आयु' है । इस आयु का हित -अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान परिमाण यह सब जिस

शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे ' आयुर्वेद " कहते हैं ।

हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु,चार प्रकारकी आयु है ॥ ४१॥

आयु का लक्षण- शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् ।

नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥

( शरीर ) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, ( इन्द्रिय ) भौतिक इन्द्रियां, ( सव ) मन, ( आत्मा ) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके संयोग का नाम ' आयु' है । आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु ' कहाता है [ एति गच्छतीति आयुः । ] आयु अर्थात् जीवन के पय्यायवाची शब्द-( धारि ) शरीर को धारण करता है, ( जीवित प्राणों की धारण करता है, ( नित्यग ) निरन्तर चलता है, ( अनुबन्ध ) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति ' इन पर्यायों से बतलाया जाता है ॥ ४२ ॥

तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः ।

वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥

यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार-लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है ॥ ४३ ॥

सामान्य और विशेष— सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्! हासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥

सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ।

तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥

सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'--समान [ गुण आदि ] धर्म ही वृद्धिका कारण होता है, और ' विशेष' - अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही ह्रास का कारण होता है । दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सच पदार्थों की १ - “ आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः । " सुश्रुत ॥ २- तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकांऽर्थः ॥ सु ० ॥ ३ -– अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत ० ॥

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् 4 P वृद्धि और हास का कारण है । सब कालों में शरीर के अन्दर दोनों ही धर्म रह सकते हैं । इसलिये शरीर में वृद्धि और क्षय शरीरका बनना ( Metabolism ) और शरीर का टूटना ( Ketabolism ) दोनों क्रियायें हर समय होती रहती हैं । एकत्व बतलाने वाला धर्म 'सामान्य' है 1 और 'पृथग्भाव' बतलाने वाला धर्म ' विशेष' है । ' क्योंकि समान धर्म का होना यह सामान्य है, और इससे विपरीत होना विशेष है ॥ ४४-४५ ॥

सन्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् ।

लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ ४६ ॥

स पुमांश्चेतनं तच तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।

वेदस्यास्य तदर्थ' हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ ४७ ॥

( सत्त्व ) मन, ( आत्मा ) चेतना और 'शरीर' इन तीनों से बने हुए को "लोक " " कहते हैं । यह तीनों मिलकर तिकटी, या तिपाई की तरह 'लोक’ को धारण किये हुए हैं । इस संयोग से बने हुए पुरुष में जन्म-मरण आदि १ समान गुण वाले - इसका अर्थ यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म, इनमें सम्पूर्ण रूप में समान गुण वाले पदार्थ ही ग्रहण करने चाहिये । जिस प्रकार खट्टा आंवला भी खट्टे पित्त को नहीं बढ़ाता, अपितु शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करता है, क्योंकि पित्त उष्ण है । द्रव्यमान से विपरीत प्रभाव --तैजस क्षार से श्लेष्मा का क्षय गुण ", " 33, --द्रव कांजी से श्लेष्मा का लघु-रूच गुण के कारण क्षय, कर्म " "- -नींद से वायु का नाश, भागने से कफ का क्षय होना, सामान्य और विशेष का स्वरूप -तुल्यार्थता अर्थात् समानार्थक होने का

नाम सामान और विपर्यय का अर्थ 'विशेष' है ।

"सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम् ” । वैशेषिक द ० ॥

कहा भी है- सर्वेषां सर्वदा वृद्धिः तुल्यद्रव्यगुणक्रियैः ।

भावैर्भवति भावानां विपरीतैर्विपर्ययः ॥

२. "घडधातुसमुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते । ” -- तिकम्टी में एक बल्ली या स्तम्भ के निकाल लेने से वह खड़ी नहीं रह सकती, इसी प्रकार इन तीनोंमें से एकके न होनेसे 'पुरुष' स्थिर नहीं रह सकता ।

पृष्ठ 28

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१० चरकसंहिता [अ० १ सब स्थित हैं । यह सत्त्वादि समुदाय पुरुष कहलाता है, और वह चेतन द्रव्य है, यही आयुर्वेद का अधिकरण है और इसी के लिये यह आयुर्वेद प्रकाशित किया गया है ॥ ४६-४७ ॥

खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः ।

सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ॥ ४८ ॥ ।

आकश आदि ( आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी - ये पांच महाभूत ), आत्मा, मन, काल, और दिशा ये द्रव्यों का संग्रह है । इन्द्रियों सहित द्रव्य चेतन हैं और इन्द्रियों से रहित द्रव्य अचेतन हैं ' ॥ ४८ ॥

अत्र कर्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।

अत्र मोदः सुखं दुःखं जीवितं मरणं स्वता ॥

पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः 'पुरुष' उच्यते । तस्मिन् क्रियाः । सोऽधिष्ठानम् । १. “पृथ्व्यापस्तेजोव युराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि । ” वैशे ०

शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।

पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते । चरक ॥

“तत्र आकाशं शब्दगुणम्, शब्दस्पर्शगुणो वायुः शब्दस्पर्शरूपगुणोऽग्निः । शब्दस्पर्शरूपरसगुणा आपः, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी ।

तेषामेकगुणः पूर्वे, गुणवृद्धिः परे परे ।

पूर्वपूर्वी गुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥

आत्मा का रूप-

प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।

इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥

देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।

दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।

बुद्धि: स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥

मन का लक्षण- आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावो मनसो लिङ्गमिति कणादः लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च ।

सति झात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षेण वर्त्तते ।

वैधृत्यान्मनसा शनं सानिध्याच्च वर्त्तते ॥ चरक ॥

पृष्ठ 29

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११ गुण- साथ गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः । गुणाः प्रोक्ताः, अर्थ ( इन्द्रिय और मन के ग्राह्य विषय ), गुरु आदि, बुद्धि, इच्छा से लेकर प्रयत्न तक और पर आदि अभ्यास पर्यन्त गुण हैं । इन्द्रियों के अर्थ -शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध -मन के अर्थ चिन्तन, विचार, द्रुहना, ध्यान, संकल्प, गुरुत्व, लघुत्व, शीत, उष्ण, स्निग्ध रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म, सान्द्र, द्रव, ये बीस, तथा इच्छा, द्वेष, सुख दुःख और प्रयत्न, पर, अपर युक्ति, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये गुण हैं । "रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परापरत्वे बुद्धयः मुखदुखे इच्छा द्वेषौ प्रयत्नाश्व गुणाः || " वै० द० कर्म- प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४६ ॥

प्रयत्न जन्य चेष्टा शरीर का व्यापार कर्म कहाता है । उत्क्षेपणमपक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ वैशे ०

भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च ।

तिर्य्यग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥

प्रयत्नपूर्वक अर्थात् चेष्टापूर्वक क्रिया का नाम 'कर्म' है ।

"आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म" ॥ । वै ० ॥ ४६ ॥

समवाय का लक्षण- समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः ।

स नित्यो,यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥ ५० ॥

पृथिवी आदि द्रव्यों का ( आत्रेय भद्रकाप्यीय २६ वें अध्याय में कहे हुए) काल का लक्षण-– सूक्ष्मामपि कलां न लीयते, संकलयति वा भूतानि इति कालः । वैशे० दिशा का लक्षण - अस्मादिदं पूर्वेण अस्मादिदं पश्चिमेन इत्यादयः प्रत्यया यतो भवन्ति सा दिक् । इत इदमिति यतस्तद्दिशां लिङ्गम् । वैशे ० जिससे यह व्यवहार किया जाय कि यह इससे पूर्व या पश्चिम में है, उसका नाम 'दिशा' है ।

पृष्ठ 30

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१२ चरकसंहिता [ अ० १ अपने गुणों से पृथक् न होना 'समवाय" " है । अर्थात् द्रव्य गुणों के बिना नहीं रह सकते और गुण विना द्रव्य के नहीं रह सकते । यह समवाय सम्बन्ध नित्य है, ( संयोग की तरह अनित्य नहीं ) क्योंकि जहां पर द्रव्य है, वहां पर गुण नहीं रहता ऐसा नहीं, अपितु निश्चित ही है । जहां द्रव्य है वहां गुण भी है । इस लिये द्रव्य और गुण का नियत सम्बन्ध होने से इनका सम्बन्ध भी नियत ही है ॥ ५० ॥

द्रव्य का लक्षण - यत्रा ss भिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् । तद्द्रव्यं,

जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं,और जो समवायि कारण है,वह 'द्रव्य' है ।

गुण का लक्षण: - समावायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः ॥ ५१ ॥

द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध वाला, निश्चेष्ट ( निष्क्रिय ) एवं कारणवान गुण है । गुण-निर्गुण होते हैं, गुण में गुण नहीं होता, जैसा कि लिखा है- "गुणा गुणाश्रया नोक्ताः” ॥ ५१ ॥

कर्म का लक्षण --- संयोगे च वियोगे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् ।

कर्त्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते ॥ ५२ ॥

जो कि द्रव्य का आश्रय लेकर रहता है, तथा संयोग और विभाग में कारण है, उसका नाम ' कर्म' है । कर्म किसी अन्य कर्म की अपेक्षा नहीं करता [द्रव्य औरगुण परस्पर एक दूसरे के समवाय की अपेक्षा करके कारण बनते हैं । तथा - कर्त्तव्य कार्य का अनुष्ठान रूप कर्म है । "एकं द्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षं कारणमिति कम्मलक्षणम्” वैशे ० किये हुवे सद्वृत्त, शान्ति, मंगल - पाठ आदि अनुष्ठान भी कम हैं, रं अध्यात्म कर्म हैं ॥ ५२ ॥

इत्युक्तं कारणं कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते ।

धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ॥ ५३ ॥

१ समवाय का लक्षण - अयुतसिद्धानां [ जो कभी भी पृथक् नहीं होते ] आधायधारभूतान हेति प्रत्ययहेतुः सम्बन्धः स समवायः । वैशे० जैसे तन्तु और वस्त्र का या मिट्टी और घड़े का समवाय सम्बन्ध है ।