चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 121–130

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०३ जायें । स्नेहन और स्वेदन के पीछे वमन कार्य और विरेचन कराना चाहिये । इनके पीछे बस्ति कर्म और अन्त में नस्य कर्म अर्थात् शिरोविरेचन देना चाहिये | स्निग्ध और स्विन्न शरीर वाले पुरुषों के लिये वमन कफ नाशक होने से चैत्र में, अनुवासन, बस्तिकर्म वात हर होने से श्रावण मास में एवं पित्त- नाशक होने से विरेचन मार्गशीर्ष मास में लेना चाहिये । अथवा चैत्र मास में वमन के पीछे विरेचन, मार्गशीर्ष में विरेचन से पूर्व वमन और फिर चैत्र और मार्गशीर्ष दोनों में बस्तिकर्म एवं नस्य कर्म करना चाहिये । चैत्र में यदि बम- नादि कार्य कर लिए हों तो श्रावण मास में अनुवासन और आस्थापन करना चाहिये । और यदि चैत्र में वमनादि न किये हों तो वमन विरेचन करके फिर स्तिकर्म और नस्य कर्म करना चाहिये । स्नेह के पीछे स्वेद, स्वेद के पीछे वमन, वमन के पीछे विरेचन, विरेचन के पीछे बस्तिकर्म और बस्तिकर्म के पीछे नस्य देना चाहिये । प्रथम स्वेदन, वमन, विरेचन, बस्ति और नस्य कर्म ये क्रमशः तथा जिस पुरुष के लिये जो २ कर्म योग्य हों उन्हें करने के पीछे जरा और रोग को दूर करने वाली औषध का उपयोग करना चाहिये । रसायन सेवन के पीछे सिद्ध एवं वृष्य पौष्टिक प्रयोगों का सेवन समय को जानने वाला वैद्य करावे । रस रक्तादि धातुओं के प्रकृतिस्थ होने से शरीर में दोषजन्य रोग नहीं होते । वृष्य आदि क्रिया करने से रस रक्तादि बढ़ते हैं और बुढ़ापे का अन्त हो जाता है, बुढ़ापा नहीं आता । यह उपरोक्त विधि शरीर दोषजन्य रोगों को अनुत्पत्ति के लिये कहा है । आगन्तुक रोगों के लिये भिन्न विधि कहते हैं ।

ये भूत-विष -वाय्वग्नि -संप्रहारादि-संभवाः ।

नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति ॥ ५१ ॥

ईर्ष्याशोक- - भय-क्रोध- मान-द्वेषादयश्च ये ।

मनो- विकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥ ५२ ॥।

जो कि ( भूत ) नाना सूक्ष्म प्राणी ग्रह आदि, ( विष ) स्थावर या जंगम विष, ( वायु ) संज्ञावात, ( अग्नि ) ज्वालामुखी, दावानल आदि ( संप्रहार ) चोट आदि से मनुष्यों के 'आगन्तुज' अर्थात् बाहर से होने वाले रोग होते हैं, Fac उन में बुद्धि का अपराध मिथ्या या अन्यथा रूप में प्रयोग हुआ होता है । मत्सर ), शोक, भय, क्रोध, अभिमान, द्वेष आदि मन के विकार अर्थात् वात आदि दोषजन्य नहीं प्रत्युत ये सब बुद्धि के दोत्र से ही उत्पन्न १-५२ ॥

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१०४ चरकसंहिता [ अ०७

आगन्तुज रोगों के प्रतीकार- त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः ।

देश -कालात्म विज्ञानं सद्वृत्तम्यानुवर्त्तनम् ॥ ५३ ॥

आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गों निदर्शितः ।

प्राज्ञः प्रागेव तत्कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥ १४ ॥

आप्रोपदेश-प्रज्ञानं प्रतिपत्तिच कारणम् ।

विकाराणामनुत्पत्तावृत्पन्नानाञ्च शान्तये ॥ ५ ॥

आगन्तुज एवं मानसिक रोग वृद्धि के दोष से उत्पन्न होते हैं, इस लिये इस प्रज्ञापराध को छोड़ना चाहिये । इन्द्रियों की विषयों से रोकना बुद्धि, स्मृति, भगवान् का स्मरण, देश काल और आत्मा का चिन्तन, ( सद्वृत्त ) सच्चे, कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करना, यह विधि आगन्तुज रोगों की उत्पत्ति से बचने का मार्ग है । इस प्रकार बरतने से आगन्तुज रोग उत्पन्न नहीं होते । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने लिये जो हितकारी काम हों उनको रोगो-त्पत्ति से पूर्व ही करे । ( आतोपदेश ) रजस् और तमस से मुक्त निर्भ्रान्त विद्वानों के उपदेश और ( प्रशन ) बुद्धि से सिद्ध प्रमाण द्वारा सिद्ध किये, बुद्धि से स्वीकार किये ये दोनों मानसिक विकारों की अनुत्पत्ति में तथा उत्पन्न विकारों की शान्ति में कारण है ॥ ५३-५५ ॥

वर्जने योग्य मनुष्य- पाप -वृत्त वच: सत्त्वाः सूचकाः कलहप्रियाः ।

मर्मोपहासिनो लुब्धाः पर वृद्धि द्विपः शठाः ॥ ५६ ॥

परापवाद- रतयश्चपला रिपु-सेविनः ।

निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥

जिनकी वाणी और मन पापमय हों, चुगलखोर, झगड़ालू, कमजोरी या छिद्र को ढूँढ़कर उस पर हंसनेवाले, लालची, जो दूसरी की उन्नति में द्वेष भाव रखते हैं, दूसरों की निन्दा ही करना जिनका काम है, चंचल प्रकृति, अस्थिर मन, दुश्मन से मिले हुए, या काम क्रोधादि के वशीभूत, दयारहित, निर्दयी, धर्म से न डरने वाले, ऐसे नीच पुरुषों को छोड़ देना चाहिये ॥५६-५७॥

सेवन करने योग्य मनुष्य- बुद्धि- विद्या वयः- शील- धैर्य-स्मृति -समाधिभिः ।

वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गत-व्यथाः ॥५ ॥

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अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५

सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः शंसितन्त्रताः ।

सेव्याः सन्मार्ग-वक्तारः पुण्य-श्रवण- दर्शनाः ॥५६॥

जो बुद्धि, विद्या, आयु, शील, स्वभाव, धैर्य साहस, स्मरण शक्ति, (समाधि) मन का संयम आदि में अपने से बड़े हों, जो वृद्धों की सेवा करते हों, स्वभाव को जानने वाले, अनुभवी, जिनकीकि किसी प्रकार की चिन्ता नहीं, मुमुख- सब प्राणियों के लिये प्रसन्नमुख ( प्रान्त ) इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त, ब्रह्मचारी, सच्चे मार्ग का उपदेश करने वाले पुण्य शब्दों को सुनाने वाले एवं पुण्य दर्शनशील, जिनका शब्द और दर्शन पवित्र करता है, इस प्रकार के आम पुरुषों का सेवन करना चाहिये, उनको गुरु मानना चाहिये, ये ज्ञान, विज्ञान धैर्य मृति आदि की शिक्षा देकर मानस रागों को नष्ट कर सकते हैं ।

आहाराचा सुवार्थीप्रेत्य चेह च ।

परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान् हितसेवने ॥ ६० ॥

न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यनृत-शर्करम् ।

नामुद्गसूपं नाक्षी नोष्णं नाऽऽमलकविना ॥। ६१ ॥

( अलक्ष्मीदोपयुक्तत्वानकं तु दधि वर्जितम् ।

श्लेष्मलं स्यात्ससर्पिष्कं दधि मारुत- सूदनम् ॥ ६२ ॥

न च सन्धुनयेत्पित्तमाहारं च विपाचयेत् ।

शर्करा संयुतं दद्यात्तष्णा-दाह- निवारणम् ॥ ६३ ॥

मुद्गसूपेन संयुक्तं दद्याद्रक्तानिलापहम् ।

सुरसं चाल्पदोषं च क्षौद्रयुक्त भवेद्दधि ।

उष्णं पित्तास्रकृद्दोपान् धात्रीयुक्तं तु निर्हरेत् ॥ ६४ ॥।

ज्वरासृपित्त-वीसर्प कुष्ठ-पाण्ड्वामय-भ्रमान् ।

प्राप्नुयात्कामलां चोप्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ) ॥ ६५ ॥

इहलोक और परलोक में सुख चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि हितकारी आहार, खान पान, आचार वर्त्तन और चेष्टा-क्रियाओं इन में विशेष रूप से यत्नवान् रहे । रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये, और रात के सिवाय अन्य समय में जब खाना हो तब परा किये बिना भी, घीअथवाया शक्करआंबलेकेकेबिनाबिना, मूंगनहींकी खानादाल चाहियेके बिना।, शहदजब खानाके बिनाहो शहद, आंवला इन के साथ या गरम करके खाना चाहिये । रात भी प्रकार से नहीं खाना चाहिये । रात्रि में दही खाने से शरीर की

पृष्ठ 124

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१०६ चरकसंहिता [अ० ७ Py श्लेष्मा और स्वास्थ्य नष्ट हो जाते हैं और शरीर के दोष कुपित होते हैं । दद्दी में घी मिलाने से दही कफकारक हो जाता है, परन्तु वायु का नाश करता है । शर्करा युक्त दही ' पित्त' ( जठराग्नि या पित्त को ) नहीं बढ़ाता, परन्तु आहार भोजन को पचा देता है । इस लिये तृष्णा, प्यास और कलेजे की जलन को मिटाता है । मूंग के साथ मिलाकर दही खाने से ' बातरक्त ' रोग में लाभ होता है । शहद के मिलाने से दही सुस्वाद और थोड़ा दोष वाला हो जाता है । दही को गरम करके खाने से रक्तपित्त जन्य विकार नष्ट होते हैं, आंवले के साथ खाने से भी रक्त पित्त रोग शान्त होता है । बहुत दही खाने वाला मनुष्य जो इस उपरोक्त विधि को छोड़ कर दही खाता है, उसको ज्वर, रक्तपित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डुरोग, भ्रम, और तीव्र कामला रोग हो जाते हैं ॥ ६०-६५ ॥ तत्र श्लोकाः-

वेग वेगसमुत्थाच रोगास्तेषां च भेषजम् ।

Start विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥ ६६ ॥

sed चाहिते व सेव्ये धानुचिते क्रमः ।

यथाप्रकृति चाऽऽहारो मलायनगदौषवम् ॥ ६७ ॥

भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् ।

वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्म -सुखार्थिना ॥ ६८ ॥

विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः ।

नवेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवावदन्मुनिः ॥ ६६ ॥

मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले रोग, इन रोगों की औषध, जिन उपस्थित वेगों को धारण करना चाहिये, जिस के लिये जो लाभकारी है, उचित एवं अहितकारी, छोड़ने योग्य और सेवनीय क्रम प्रकृत के अनुसार आहार, मलस्थान मल की वृद्धि, क्षय, औषध, भविष्य में न होने वाले रोगों की औषध, सुख चाहने वाले बुद्धिमान् मनुष्य को जिन पुरुषों को छोड़ना या जिनका सेवन करना उचित है, और दही को सेवन करने की विधि यह सब आत्रेय मुनि ने ' न वेगान्धारणीय' नामक अध्याय में सम्पूर्ण रूप से उपदेश किया है ॥ ६६-६६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के 'न वेगान्धारणीयो ' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ १औरआ

पृष्ठ 125

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अ०८ सूत्रस्थानम् १००

अष्टमोऽध्यायः ।

अथात इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

आहार एवं 'स्वस्थ चतुष्क' कहने के अनन्तर 'इन्द्रियोपक्रमणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ इह खलु पचेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि पचेन्द्रियार्थाः पचेन्द्रियबुद्धयो भवन्तीत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे ॥ ३ ॥

इस आयुर्वेद के प्रकरण में पाँच इन्द्रियाँ हैं । पाँच ही इन्द्रियों के ग्राह्य द्रव्य हैं । पांच ही इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं । पांच ही इन्द्रियों के अर्थ, पाँच प्रकार की इन्द्रियों का ज्ञान है ऐसा पूर्वाचार्यों ने इन्द्रियों के विषय में कहा है ॥ अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्वसञ्ज्ञकं चेत इत्याहुरेके, तदर्थात्मसंपत्त- दायत्तचेष्टं चेष्टाप्रत्ययभूतमिन्द्रियाणाम् ॥ ४ ॥

'मन ' अतीन्द्रिय अथात् इन्द्रियों में सूक्ष्मतम है वह इसी मन को ' सत्त्व' कहते हैं । इसी मन को कितने 'चित्त' इस नाम से कहते हैं । वह मन अपने विषय और अत्मा इन की श्रेष्ठता के अधीन व्यापार वाला है और इन्द्रियों की चेष्टाओं का कारण है । एवं इन्द्रियों की चेष्टाओं, व्यापार वा प्रतीति का कारण मन ही है ॥ ४ ॥

स्वार्थेन्द्रियार्थ संकल्प -व्यभिचरणाश्चानेकमेकस्मिन् पुरुषे सत्त्वम्, रजस्तमः सत्त्व - गुण -योगाच्च न चानेकत्वम्, नोकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते" तस्मान्नैक काला सर्वेन्द्रिय प्रवृत्तिः ॥ ५ ॥

वास्तव में 'मन' एक ही है, परन्तु इन्द्रियों के अपने २ द्रव्य में विषय के संकल्पों के बदलते रहने से एक पुरुष में अनेक मन एवं मन के सत्त्व गुण होने पर, सत्व, रजस्, तमस् इन गुणों के न्यूनाधिक होने से अनेक मन एकही मनुष्य में प्रतीत होते हैं । वास्तव में मन एक ही है अनेक नहीं है । क्योंकि एक ही समय में एक मन अनेक इन्द्रियों में प्रवृत्त नहीं हो सकता इसलिये एक ही समय में सब इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ चेटा नहीं होती ॥ ५ ॥

द्गुणं चाभीक्ष्णं पुरुषमनुवर्तते सस्वम्, तत्सत्वमेवोपदिशन्ति -हुल्यानुशयात् ॥ ६ ॥

जिस गुणा ( सत्व, रजस् या तमस् ) वाला मन बार बार अनु-

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१०८ चरकसंहिता [ अ०८ सरण करता है, मन को उसी ही गुण वाला मुनि लोग कहते हैं । क्योंकि जिम गुण 'की अधिकता होगी उसी गुण वाला मन होगा ॥ ६ ॥

मनः पुरःसराणीन्द्रियाण्यर्थ-ग्रहण समर्थानि भवन्ति ॥ ७ ॥

इन्द्रियां मन को साथ में लेकर ही विषय के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं ।

बिना मन के इन्द्रियां विपक्ष को ग्रहण नहींकर सकतीं ॥ ७ ॥

तत्र चशुः श्रोत्रं प्राणं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥ पचेन्द्रियाणि वायुज्योतिरापो भूरिति ॥ ६ ॥ पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि अक्षिणीकर्णौ नासिके जिह्वा त्वक् चेति । १०!

पञ्चेन्द्रियार्थाः-शब्द स्पी-रूप-रस गन्धाः॥ ११ ॥

आंख, श्रोत्र, नासिका, जिला और त्वचा ये पांच इन्द्रियां हैं । पांच इन्द्रियों के पांच ग्रा पदार्थ हैं, प्रथा आकाश, वायु, अग्नि, जल आर पृथिवी । इन्द्रियों के पांच अधिष्ठान हैं, तथा चतु गोलक दी. दोनों बाह्य कान, जीभ, दोनो नासिकायें और त्वचा इन्द्रियों के पांच विषय है-शब्द, स्पर्श, रूप, रसगन्धऔरज्ञानगन्ध, रस ।ज्ञानइन्द्रियऔरज्ञान भीज्ञानपांच|| प्रकार८-११ का॥ है चक्षुशांन, श्रोत्र ज्ञान, पञ्चेन्द्रियबुद्धयश्चक्षुर्बुद्धपादिकाः" ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्त्वा-त्मसंनिकर्षजाः क्षणिका निश्चयात्मिकाच इत्येतपञ्चकम् ॥१२॥

ये पांचों इन्द्रियों के विषय मन और आत्मा इनका एक साथ संयोग होने से उत्पन्न होते हैं । यह और ही क्षणिक निश्चयात्मक ( स्थायी ज्ञान ) है । इस प्रकार से ये पांच-पांच पदार्थों के समूह होते हैं ॥ १२ ॥

मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्म द्रव्य -गुण-संग्रहःशुभाशुभ- प्रवृ न्तिनिवृत्ति हेतुश्च द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यतं क्रियेति ॥ १३ ॥

मन, मन के अर्थ ( विषय ), बुद्धि और आत्मा यह अध्यात्म द्रव्यों का और गुणों का संग्रह है । तथा जो कर्म द्रव्य में आश्रित है उसे क्रिया कहते हैं । ' शुभ' दोनों लोकों में कल्याणकारी, अशुभ ( लोकों में निन्दित ), प्रवृत्ति, निवृत्ति ये कारण हैं ॥ १३ ॥

तत्रानुमानगम्यानां पञ्च महाभूत विकार समुदायात्मकानामपि स- तामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रात्रे, घ्राणं क्षितिः, आपो रसने, स्पर्शनेऽ-निलो विशेषेणोपदिश्यते ॥ १४ ॥

अनुमान द्वारा जानने योग्य इन्द्रियां पंचमहाभूतों के विकार के समक उत्पन्न हुई हैं तो भी, तेज आंखों में, आकाश श्रोत्रों में, पृथिवी और जल रखना में और वायु त्वचा में विशेष रूप से रहते हैं ॥ १४

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125794 अ० ८ ] सूत्रस्थानम् २०६ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमे वार्थमनुधावति, तत्स्वभावाद्विभुत्वाश्च ॥ १५ ॥

इनमें जो जो इन्द्रियों जिस जिस एत से बनी हैं वे विशेष रूप से उसी उसी ( भूत ) से बने अर्थ ( विषय ) को ग्रहण करती हैं । ये अपने समान स्वभाव वाली होने से समान जाता की अण करने में समर्थ होने में प्रधानवह तेजभूतात्मककी आरविषयदांतकीहै.ही कथाओजन्य इव तैजसशब्दहै, कीइसलियेओर दौड़ते हैं । स की ओर आप है इसलिये रत कोऔर और पार्थिव होने काअंत है ॥ १५ ॥ यदर्थातियांगायगव्यमनस्तमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं

यथास्वं बुद्धथुपघाताय संपते समयोगात्पुनः प्रकृतिमापद्यमानं यथास्वंइनमेंबुद्धिमाप्याययतिमन के साथ इन्द्रिया॥ २६ ॥ में अतियोग, अयोग, या मिथ्यायोग

होने से ' विकृति' अथात् रोग उत्पन्न होकर अपने अपने ज्ञान के नाश के लिये उद्यत हो जाता है । राजयोग से इन्द्रिया मेंरहकर अपने अपने ज्ञान की वृद्धि करती हैं । समान अर्थात् उचित योग से वृद्धिहोती है ॥ १६ ॥

मनसस्तु चिन्त्यमर्थः एव समताविहीन- मिथ्यायोगाः प्रकृति-विक्षत भन्ति ॥ १७ ॥

मन का विषय चिन्तन करना है( मुख, दुःख प्रयत्न आदि चिन्तनीय होने से मन के विषय हैं ) । इसलिये मन और बुद्धि का समान योग स्वस्थता कारण है और मन एवं सांजका अतियोग या हीनयांग अथवा मिथ्यायोग विकृति अर्थात् 'विकार' या रंग का कारण है ॥ १७ ॥

तत्रेन्द्रियाणां समनस्यानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रय तितव्यमेमिहेतुभिः । तद्यथा -साम्येन्द्रियार्थसंयोगेन, बुद्धया सम्यग- वेक्ष्यावेक्ष्य कर्मणां सम्यक्प्रतिपादनेन, देशकालात्मगुणावे परीतोपसेव- नेन चेति । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय सद्वृत्तमनुष्ठेयम् । तद्धनुष्ठितं युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रि यविजयं चेति ॥ १८ ॥

इसलिये अपनी प्रकृति में स्थित मन सहित इन्द्रियों को स्वस्थ तथा अपने रखने के लिये, विकृति से बचाने के लिये निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न । उचित अनुकूल रूप से इन्द्रिय और विषय के संयोग न अति,

पृष्ठ 128

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११० चरकसंहिता [ अ०८ न हीन और न मिथ्यासंयोग से, एवं बुद्धि द्वारा भली प्रकार देखकर कर्मों को उचित रूप में करने से और देश, काल, आत्मा के गुण के अविपरीत, हितकारी वस्तुओं के सेवन करने से इन्द्रियां उपतप्त न होकर प्रकृति अवस्था में रहती हैं । इसलिये अपना या अपने शरीर का और आत्मा का कल्याण चाहने वाले सब पुरुषों को सदा स्मरण रखकर सद्वृत्त का ( पांचों इन्द्रियों को मन के साथ संयुक्त करके ) मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिये । इस सद्वृत्त के पालन करने से आरोग्यता एवं 'इन्द्रियविजय' दोनों कार्य एक साथ ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥

तत्सद्वृत्तमखिलेनोपदेक्ष्यामः । तद्यथा-- देव- गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध- सिद्धाचार्यार्चयेत्, अग्निमुपाचरेत्, ओषधीः प्रशस्ता धारयेत्, द्वौ कालावुपस्पृशेत्, मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात् त्रिः पक्षस्य केश श्मश्र-लोम- नखान् संहारयेत्, नित्यमनुपहतवासाः सुमनाः सुगन्धिः स्यात् ॥ १६ ॥

इस सद्वृत्त को सम्पूर्ण रूप में कहते हैं - देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु (माता पिता अभ्यागत अतिथि ) वृद्ध (विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्ध, शौर्यवृद्ध, ) सिद्ध ( तापस, भिक्षुक ), आचार्य ( उपनयन संस्कार करने वा गुरु ), इनकी पूजा सेवा करनी चाहिये । अग्निहोत्र प्रातःसायं दोनों समय करना चाहिये, अनिन्दित, ( दोषों करने वाली ओषधियां ) वनस्पतियां, धारण करनी चाहियें । दोनों समय प्रातःसायं स्नान करना चाहिये । मल के स्थानों को बार बार एवं पांव को सदा पवित्र रक्खे । बाल, दाढ़ी, मूंछ नाखून, कक्ष के एवं गुह्य स्थानों के बालों को पन्द्रह दिन में तीन बार, पांच पांच दिन के पीछे कटवाना चाहिये । नित्य प्रति शुद्ध वस्त्र धारण करे, प्रसन्न मन रहे, सुगन्ध धारण करे ॥ १६ ॥

साधुवेशः प्रसाधितकेशो मूर्ध- श्रोत्र घ्राण-पाद -तैल-नित्यो धूमपः, पूर्वाभिभाषी, सुमुखः, दुर्गेष्वभ्युपपत्ता, होता, यष्टा, दाता, चतुष्प-थाना नमस्कर्त्ता, बलीनामुपहर्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः,काले हित- मित मधुरार्थवादी, वश्यात्ना, धर्मात्मा, हेतावीर्षुः फले नेषुः, नि-चिन्तः,निर्भीक, धीमान्, हीमान्, महात्साही,दक्षः,क्षमावान्, धार्मिकः आस्तिकोः,विनय बुद्धि-विद्याऽभिजन वयोवृद्ध-सिद्धाचार्याणामुपासिता, छत्री कुचेलास्थि, दण्डी- कण्टकामेध्य, मौली, सोपानत्कः- केश-तुषोत्कर, युगमात्रदृग्विचरेत्- भस्म-कपाल -स्नानमङ्गलाचारशी-बलि..। औरपरिहर्त्ता प्राक श्रमाद व्यायामवर्जी च स्यात सर्वप्राणिष में

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अ० ८ सूत्रस्थानम् १११ स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वासयिता, दीनानामभ्युपपत्ता, सत्यसन्धः, सामप्रधानः, पर- पुरुष- वचन-सहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशम- गुणदर्शी, राग -द्वेष हेतूनां हन्ता च ॥ २० ॥

उत्तमवेश धारण करे, शिर के बाल संवार कर कंघी कर रक्खे, शिर, कान त्वचा पर तेल का मर्दन करे, नित्य प्रति प्रायोगिक धूमपान करे, घर आये हुए का या मिलने पर पहिले कुशल क्षेम पूछे, सुमुख, सुन्दर, प्रसन्न चेहरे वाला कठिन अवसरों पर भी सोचकर काम करने वाला, होम करने वाला, यज्ञ-- देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और नृयज्ञ करने वाला, दान देनेवाला, चौराहों को नमस्कार करने वाला, देवता के लिये उपहार भेंट देने बाला, अभ्यागतों को पूजा करने वाला, पिता पितामह आदि को श्रद्धापूर्वक अन्न वस्त्र देने वाला हो, समय पर हित परिमित और मधुर अर्थ से युक्त वाणी बोले । जितेन्द्रिय संयमी, धर्मात्मा हो, दूसरे की उन्नति को देखकर उन्नति करने में ईर्षा भाव रखे कि मैं भी ऐसा करूँ जिस से मेरी भी उन्नति हो, परन्तु फल में ईर्षा न करे । चिन्ता रहित न डरने वाला, साहसी आहार और व्यवहार को छोड़कर अन्यत्र लज्जाशील, महत्त्वाकांक्षी, उत्साही, कामों में निपुण, प्राणियों पर क्षमा करनेवाला, अपकारी को भी क्षमा देने वाला धर्म में चित्त रखने वाला, आस्तिक ( वेदादि सत् शास्त्रों को मानने वाला ), विनय बुद्धि, विद्या, अभिजन (पवित्र कुलोलति से ), और आयु में जो बड़े हों, सिद्ध, तप जो बड़े हों ऐसे तपस्वी, और आचार्य ( सावित्री का उपदेश देने वाले गुरु ) इनकी सेवा करे । छत्र और दण्ड धारण करे, व्यर्थ या अकाल में न बोले, जूता पहिने, अपने चारों ओर कुछ दूर ( चार हाथ ) तक देखता हुआ चले । मंगलजनक क्रियाशील रहे, कुचेंले ( मैले वस्त्र ), हाड़ -मांस, कांटे युक्त, अमेध्य अपवित्र ( श्मशान आदि ) बाल, धान्यों के तुष, रोहे -कंकड़ आदि, राख, घड़े आदि के ठीकरे, नहाने के स्थान, पूजा स्थान, इन स्थानों को छोड़ने वाला हो । श्रम से पूर्व ही आधी ( शक्ति से ) व्यायाम को छोड़ दे, सब प्राणियों में बन्धुभाव भ्रातृ भाव रखने वाला, क्रोधी पुरुषों को मनालेने वाला, डरे हुए पुरुषों के लिये आश्वासन ( सांत्वना ), देने वाला, दीनों ग़रीबों के लिये उपकार करने वाला, सत्य प्रतिज्ञा वाला, शान्ति को मुख्य गिनने वाला, कठोर बचनों को सहन करने वाला, अक्रोधी, क्रोधियों को शान्त शान्तिमान् " लड़ाई झगड़े के कारणों को नष्ट करने वाला हो ॥२०॥

स्यात्, नान्यस्वमादद्यात्, नान्य स्त्रियमभिलषेनान्यश्रियम्,

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४१२ चरकसंहिता { = न वैरं रोचयेत् न कुर्यात्पापम्, न पापेऽपि पापी स्यात्, नान्यदोषान ब्रूयात, नान्यरहस्यमागमयेत् नाधार्मिकर्न नरेन्द्रद्विष्टः सहाssसीत, नोन्मत्तैर्न पतितं भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुद्रेने दुष्प्रैः, न दुष्टयानान्यारोहेत्, न जानुसमं कठिनमासनमध्यासीत्, नानास्तीर्ण मनुपहितम विशालमसमं वा शयनं प्रपद्यत न गिरि-रिपन-मस्तकेष्वनुचरेत् " न द्रुममारो-हेतू, न जलप्रवेगमवगाहेत, कूलच्छायां नोपासीद, नाग्न्युत्पानमभि तश्चरेत् " नाथै सेत् न शब्दवन्तं मारुतं मुचेत् नासंवृतमुखो जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत् न कि कुष्णीयात्, न दन्तान् विघट्टयेत् न नखान् वाचेत्, नात्यान्यभिहन्यात् ने भूमिं विलिखेत्ज्योतींष्यग्निममेध्यम, न छिन्द्यात्तृणम्शस्तच", नाभिर्वाक्षितन लाई मृद्गीयात्, न हुइर्याच्छवम्, न त्रिगुणन, न चेत्य-, ध्वज -गुरु- पूज्याशस्त-च्छायामाक्रामेत् न क्षपास्वनर सदन चैत्य चत्वर-चतुष्पथोपवन -श्मशानाघानान्यासेवेत नैकः सत्यगृहं न चाटवीननु-रानुपासीतप्रविशेत्, न, नपापवृत्तान्जिरोचयेतस्त्री-मित्र3 -नानार्थमाश्रयेत्भृत्यान् भजेत, नात्तमंविरुध्येतभयमुत्पादयेत्, नाव-, न साहसातिवप्न-प्रजागर-स्वान-पानाशनान्याजानुश्चिरं तिष्टेत्यातिप्रवतान्, नव्यानुपसर्पन्नजात्, कटिनाइडरमेटष्ट्र नाग्निमुपासीतपुरीबतास्या नोच्छिष्टो नाथः नालुविद्ना न नग्न उपस्पृशेत् न स्नान कृत्वा प्रतापयेत्, नाविकजन्मात्राण्यनिहन्यात् नोपस्पृश्य त एव वासी विभृयात्, नाखा च पूज्य-साल-सुम सोऽभिनिष्कामेत्,न पूज्य-मङ्गान्यपसव्यंगच्छत्राण्यनुदक्षिणम्॥ झूठ न बोले, दूसरे के धन को न लेवें, दूसरे की स्त्री को न चाहे, दूसरे की सम्पत्ति की चाहना न करे, वैर न करें, पाप न करें, पाप में मन न लगाये अथवा पापी पुरुष पर भी पाप न करें, दूसरों के दोषों को न कहें, दूसरों की गुप्त बातों को न जाने अधार्मिक एवं राजा ने द्वेष करने वाले ( राजशत्रुओं) के साथ न बैठे, पागल, पतित, नीच कर्म करने वाले, चाण्डाल आदि, भ्रूण- घाती ( गर्भपात करने वाले ) क्षुद्र, ( छोटे पुरुष ) दुष्ट ( चोर डाकू आदि ) करके साथ( उत्कट न बैठेआसन। दुष्टयानसे ) भी( अनभ्यस्तदेर तक न घोड़ेबैठे, आदिबिना ) नीचेपर नबिछायेबैठे, घुटने और इाने रक्खे बिना, संकुचित स्थान पर, ऊंची नीची जगह पर न सोरे...