चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 131–140

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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अ० ८] ८ सूत्रस्थानम् ११३ ऊंचे नीचे प्रदेशों में या चोटियों पर न घूमे फिरे, वृक्ष पर न चढ़े, पानी के तेज प्रवाह में स्नान न करे । नदी के किनारे खड़े वृक्ष की छाया में नहीं बैठे, अग्नि की लपट के चारों ओर न फिरे । ऊंचे से ( जोर से ) न हंसे । शब्द के साथ अधोवायु, ( अपान वायु ) न छोड़े, मुख को बिना ढांपे जम्भाई, छक अथवा हास्य- हंसी न करे, नाक को न कुरेदे, दांतों को न किटकिटाये । नखों को न रगड़े, अस्थियों को न बजाये, भूमि को न कुरेदे, भूमि पर न लिखे, तिनके न तांड़े, मिट्टी के ढेले की न फोडे, अंगों को व्यर्थ में टेढ़ा मेढ़ा न करे, न हिलाये | ज्योति ( तैजस पदार्थ ) सूर्य, अग्नि, तीव्राग्नि, अपवित्र चिता आदि निन्दित वस्तुओं को न देखे । शव को देखकर हुंकार न छोड़े, चेत्य ( गांव के देवता ) ध्वजा, पताका, गुरु माता पिता, आचार्य, पूज्य आदरणीय, प्रशस्त कल्याणकारी वस्तुओं की छाया को न लांघे, रात्रि में देवालय, मन्दिर, चैस्य ( ग्राम्य देवता ) गृह, आगन, चौराहा, बाग़, श्मशान, ( वध स्थान ) में न रहे । अकेला एकान्त गृह में, शून्य घर में या जंगल में प्रवेश न करे । पाप- वृत्ति वाले स्त्री, मित्र अथवा नौकर का साथ न दे, अपने से श्रेष्ठों के साथ विरोध न करे, अपने से नीच हीन की सेवा न करे । कुटिल की चाहना न करे, अनार्य दुष्ट का आश्रय न ले, किसी के लिये भय उत्पन्न न करे, अतिसाहस अति खांना, बहुत जागना, बहुत स्नान, बहुत पीना, बहुत खाना नहीं करे । घुटने उठा कर देर तक न बैठे । सांप, दाढ़ वाले सिंह आदि, सींग वाले भैंस बैल आदि जन्तुओं के पास न जाये । सामने की वायु, धूप, ओस, तेज वायु को छोड़ दे । झगड़ा आरम्भ न करें । विना सावधानी के अग्नि की उपासना पूजा न करे, जूठे भांजन को पुनः आग पर गरम न करे ( जूठा भोजन आग मैं नहीं डालना चाहिये ) । थकान मिटे विना, मुख और सिर को जल से गीला किये बिना, वा नंगा होकर स्नान न करे । नहाने की धोती ( कटि वस्त्र से ) से शिर का स्पर्श न करे, बालों के अग्रभागों को ताइन न करे; स्नान करके जिन कपड़ों से स्नान किया है, उन्हीं को निचोड़कर फिरधारण नहीं करे । रत्न, मणि आदि, पूज्य भगवान् आदि का नाम, मंगल कल्याणकारी वस्तुएं फूल आदि को बिना स्पर्श किये घर से बाहर न निकले । पूज्य एवं मंगलकारी वस्तुओं के वाम पार्श्व से न जाये, अपूज्य, अमंगल वस्तुओं के दक्षिण पार्श्व से न जाये ॥ २१ ॥

पाणिर्नास्नातो नोपहतवासा नाजपित्वा नाहुत्वा देवताभ्यो पितृभ्यो नादत्वा गुरुभ्यो नातिथिभ्यो नोपाश्रितेभ्यो नापुण्य-

पृष्ठ 132

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१९४ चरकसंहिता [अ० गन्धो नामालीनाक्षालितपाणिपादवदनो नाशुद्धमुखो नोदङ्मुखो न विमना नाभक्ताशिष्टाशुचि क्षुधित - परिचरो नापात्रीवमेध्यासु नादेशे नाकाले नाकीर्णे नादत्वाऽग्रमग्नये नाप्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैर्न मन्त्रैरन- भिमन्त्रितं न कुत्सयन् न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत, न पर्युषितमन्यत्र मांस-हरित शुष्क- शाक-फल- भक्ष्येभ्यः । नाशेषभुक्स्याद. न्यत्र दधि-मधु लवण-सक्तु सर्पिभ्यः । न नक्तं दधि भुञ्जीत न सक्ने-कानश्रीयात्, न निशि न भुक्त्वा न बहून् न द्विर्नोदकान्तरितान्न छिवा द्विजैर्भक्षयेत् ॥ २२ ॥

इन अवस्थाओं में भोजन न करे -रत्न को हाथ में लिये बिना, स्नान किये बिना, बस्त्र पहिने बिना, गायत्री जप किये बिना, हवन किये बिना, देव-ताओं के लिये दिये बिना, पिता माता को खिलाये बिना, आचार्य एवं बड़े पुरुषों को, अतिथियों को, आश्रितों को खिलाये बिना, अशुभ गन्धवाला, पुष्पमाला धारण किये बिना हाथ पांव मुख धोये बिना, मछिन मुख से, उत्तर दिशा की ओर मुख करके, अन्य मन से, विना भक्ति के दिया, ठीक प्रकार से या पवित्रता से न दिया, भूखे के हाथ से परसा, बिना पात्रों के मैले पात्रों में, अदेश में, ( मैले वा अनुचित स्थान पर ) कुसमय में, संकुचित स्थान में, अग्नि को दिये बिना ( वैश्वदेव यज्ञ किये बिना ), प्रोक्षणोदक से विधिपूर्वक प्रोक्षित किये बिना, ( वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित किये बिना ) निन्दा करते हुए, निन्दित और प्रतिकूल अन्न को अपने मन के विरुद्ध मनुष्यों के पास में भोजन नहीं करना चाहिये । पर्युषित जिसे एक रात बीत गई है ऐसे बासी भोजन की नहीं खाना चाहिये । मांस, हरड़, सूखे हुए शाक, फल इनको बासी अर्थात् एक रात बीतने पर भी खा सकते हैं । सम्पूर्ण न खावे, पात्र में थोड़ा छोड़ देना चाहिये । परन्तु दही, शहद, लवण, सत्तू और घी इनको सम्पूर्ण खा लेना चाहिये, पवित्र होने से इन को झूठा न छोड़े । रात में दही नहीं खाये, अकेले सत्तुओं को न खाये अर्थात् केवल सत्तून खाये । रात में सत्तू न खाये, भोजन खाकर सत्तून खाये, बहुत अधिक मात्रा में सत्तू न खाये, एक दिन में दो बार सत्तून खाये, पानी में भीगे हुए सत्तू या जौ का सतू बनाकर नहीं खाना चाहिये । दाँतों से काटकर न खाये ॥ २२ ॥

नानृजुः क्षुयान्नाद्यान्न शयीत । न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात् । न वाय्व-ग्नि-सलिल सोमार्क- द्विज-गुरु-प्रतिमुखं निष्ठीविका वात -वर्चो सृजेत् न पन्थानमवमूत्रयेत्, न जनवति नान्नकाले । जप- fe-to- क्रियासु ष्मसिङ्घाणकं मुचेत् ॥ २३ ॥ ·

पृष्ठ 133

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foc सूत्रस्थानम १९५ विना के छींक न ले, न खाये, न सोये । मल-मूत्र आदि के वेग उपस्थित होने पर दूसरा काम न करे, पहला वेग का निराकरण करे । वायु, अग्नि, अल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, पिता, माता, इनकी अंर मुख करके न थूके, न अपान वायु और मल, मूत्र का त्याग करे । रास्ते में, मनुष्यों के बैठने के स्थान में, भोजन के समय मूत्र त्याग न करे । जप, हवन, पठन, बलि, पवित्र क्रियाओं के स्थान पर नाक का मल ( सिंघाणक ) नहीं फेंके ॥ २३ ॥

न स्त्रियमवजानीत, नातिविश्रम्भयेन्न गुह्यमनुश्रावयेन्नाधिकुर्यात् । न रजस्वला नाऽऽतुरा नामेध्यां नाशस्तां नानिष्टरूपाचारोपचारां नादलां नादक्षिणां नाकामा नान्यकामां नान्यस्त्रियं नान्ययोनिं नायोनौ न चेत्य- चत्वर- चतुष्पथोपवन- श्मशान धान्न सलिलौपधि-द्विज- गुरु- सुरालयेषु न सन्ध्ययोर्नातिथिषु नाशुचिनजग्वभेषजो नाप्रणीत संकल्पो नानुपस्थित- प्रहर्षो नाभुक्तवान् नात्यशितो न विषमस्थो न मूत्रोच्चारपीडितो न श्रम -व्यायामोपवास- क्लमाभिहतो नारहसि व्यवायें गच्छेत् ॥ २४ ॥

स्त्री का तिरस्कार न करे । स्त्री का अधिक विश्वास न करे । स्त्री को गुप्त बात न कहे । स्त्री को अधिकारी न करे, अधिकार न देवे । रजस्वला, रोगिणी, अपवित्र, चण्डाल आदि, कुष्ठ आदि निन्दित रोग से पीड़ित, इच्छित रूप आचार- उपचार से रहित, अचतुर, जो स्वयं नहीं चाहती हो, दूसरे पुरुष को चाहने वाली, परस्त्री, असमानजातीय, कामनारहित इन स्त्रियों के साथ, वा योनि को छोड़कर अन्यत्र गुदा या मुख में, मैथुन नहीं करना चाहिये । चैत्य ( देवता का मन्दिर ), चौराहा, आंगन, उपवन, बाग, श्मशान, वध्य - भूमि में, पानी, ओषधि, ब्राह्मण, गुरु, माता- पिता और मन्दिर के पास, प्रातः सायं दोनों सन्ध्याकालों में, अति अधिक मात्रा में, निषिद्ध तिथियों में ( पूर्णिमा, अष्टमी, चतुर्दशी, संक्रान्ति बाद दिनों में, अमावस्या में प्रतिपदा में ), अपवित्रित अवस्था में, बाजीकरण औषध खाये बिना, मन में मैथुनेच्छा किये बिना, शिश्न में उत्तेजना हुए बिना, खाये बिना, खाली पेट, अधिक खाये, पेट भर के और विषम स्थान पर स्थित होकर, मूत्र वेग से पीड़ित, खुले अनावृत स्थान में स्त्री के साथ मैथुन न करे ॥ २४ ॥

नसतो न गुरून् परिवदेत्, नाशुचिरभिचार - कर्म- चैत्य- पूक्ष्म- पूजा-ध्ययनममिनिर्वर्तयेत् ॥ २५ ॥

नया गुरुजनों की निन्दा न करे । अपवित्र अवस्था में अभिचार येहिंसा का प्रयोग, श्येनादि उपचार ) कर्म, बैत्य पूजा" एवं देवता, ज्ञा, अध्ययन, पठन आदि नहीं करे ॥ २५ ॥

पृष्ठ 134

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११६ चरकसंहिता [ अ० ८ न विद्युत्स्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महामहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि- तपदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिक्लीबं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै- रध्ययनमभ्यसेत् || २६ ॥ निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये ऋतु के बिना बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में विजयादशमी, दीपमालिका होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े अक्षर का छोड़ते हुए, खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, म्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल ( बलहीन ), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥

नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत । न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन स्त्रीस्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध-मूर्ख- क्लिष्ट-क्लीचैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य द्यूत-वंश्या-प्रसङ्ग-रुचिः स्यात् न गुह्यं विवृणुयात्। न कश्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादो नादक्षिणां नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्,

न वृद्धान् न गुरून् न गणान्न नृपान्वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् ।

न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात्॥ २७ ॥

समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन, नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुछ रोगी, नपुंसक अनु त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे । अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यो में मूद न रहे । गुणों में दोषों को न देखे । निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, 'और आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की

पृष्ठ 135

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सूत्रस्थानम् ११७ BTO =] भाई बन्धु आदि, अनुरक्त, स्नेही, मित्र आदि, आपत्ति में सहायक इनको कभी बाहर न निकाले, कष्ट न दे ॥ २७ ॥

नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात् । नाभृतभृत्यो, नाविश्रब्धस्वजनो, नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारो, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की, न सर्वकालविचारी । न कार्यकालमनिपातयेत् । नापरीक्षितमभिनिवि- शेत्। नेन्द्रियवशग: स्यात् । न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् । न बुद्धीन्द्रि- याणामतिभारमादध्यात् । न चातिदीर्घसूत्री स्यात्। न क्रोधहर्षावनु- विदध्यात् । न शोकमनुवसेत् । न सिद्धावौत्सुक्यं गच्छेन्नासिद्धौ दैन्यम् । प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् । हेतुप्रभावनिश्चितः स्यात् हेत्वारम्भनित्यश्च । न

कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्यं जह्यात् । नापवादमनुस्मरेत् ॥ २८ ॥

बहुत अधीर, उतावला जल्दबाज़ न हो, बहुत उच्छृङ्खल उद्धत न बने । नौकरों का पोषण अवश्य करे । अपने मनुष्यों में, घर के आदमियों में अवि- श्वास न करे । अकेला मुख का अनुभव न करे । अकेला मधुर पदार्थ न खाये शील ( स्वाभाविक व्यवहार ), आचार, ( शास्त्रानुकूल व्यवहार ), उपचार, ( वस्त्र धारण करने और रहन सहन ) में दुःखी व्यक्तियों की भाँति ( गरीबों को तरह ) न रहे; सभ्य बनकर रहे । सब जगह सब का विश्वास न करे । सब स्थानों पर सब का अविश्वास भी न करे. सन्देह भी न करें । सब समय शोचता विचारता भी न रहे । काम के समय का उल्लंघन न करे । अपरीक्षित (अज्ञात ) स्थान आदि पर न बैठे न जाये । इन्द्रियों के वश में न हो । चंचल मन की इधर उधर न घुमावे | बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियों का अतियोग न करे, उन पर अधिक बोझ न डाले, अधिक विषय सेवन न करे । दीर्घ -सूत्री अर्थात् विलम्ब से काम करने वाला न बने । जितना कांध आये उतना उम्र कर्म न करे और जितनी खुशी हो उतनी अधिक खुशी न मनाये । शोक चिन्ता के वश में न हो । कार्य में सफलता मिलने पर बहुत प्रसन्न न हो और कार्य में असफलता मिलने पर दीन, ( उदास चेहरा ) न बनाये मुंह न लटकाये । बार बार प्रकृति अर्थात्जन्म मरण के स्वभाव को ध्यान में रखे । शुभ कारण से कार्य का आरम्भ करे । इतना कर लिया बस है, यह समझकर बैठ न जाये । वीर्य (परा- का त्याग न करे । निन्दा का स्मरण न करे ॥ २८ ॥ का

माज्यात विल -कुश-सर्षपैरग्निं जुहुयादात्मानमाशीर्भिरा- ओकेन नापगच्छेच्छरीराद्, वायुर्मे प्राणानादधातु, विष्णुर्मे द्रो मे वीर्य शिवा मां प्रविशन्त्वाप आपोहिष्ठेत्यपः

पृष्ठ 136

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११८ चरकसंहिता [ अ० ८ स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युदय मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदद्भि- रात्मानं हृदयं शिरश्च, ब्रह्मचर्य -ज्ञान- दान- मैत्री कारुण्य -हर्षोपेक्षा प्रशम-पर स्यादिति ॥ २६ ॥

अपवित्र अवस्था में उत्तम गौ का घी, अक्षत, तिल, कुशा और सरसों द्वारा अग्नि में वेदमन्त्रों से हवन न करे और प्रार्थना करे कि अग्नि मेरे शरीर से बाहर न जाये । वायु मेरे अन्दर प्राणों को धारण करें । विष्णु मेरे अन्दर बल का संचार करें । इन्द्र मुझ में बल बढ़ावे । कल्याणकारी जल मुझ में प्रविष्ट हों, 'आपोहिष्टा मयां भुवस्ता न ऊर्जे दधातन ' इस मन्त्र से जल का स्पर्श स्नान आचमन करना चाहिये । दोनों समय भोजन करने के उपरान्त ओष्ठ और पांव को धोकर शुष्क कर लेना चाहिये शिर और आंख, कान, नाक इन्द्रियों को जल से स्पर्श करें । फिर अपने हृदय, शिर का जल से स्पर्श करे । ब्रह्मचर्य ( काय और मन वाणि ने मैथुन कोछोड़ना ब्रह्मचय्यांश्रम में गृहस्था-श्रम में भी अपनी पत्नी में ऋतुकाल को छोड़कर ) तथा अन्यों को ज्ञान -दान, 'मैत्री' सब प्राणियों में आत्मवत् प्रवृत्ति, सब प्राणियों में दयाभाव, हर्प, प्रसन्नता सब प्राणियों में, उपेक्षा अर्थात् अप्रतिग्रह बुद्धि, प्रथम अर्थात् शान्त इन्द्रिय एवं चित्तवाला बने ॥ २६ ॥

तत्र श्लोकाः-.

पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् ।

इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥

स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति ।

समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥ ३१ ॥

नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः ।

धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥

परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते ।

तस्माद् वृत्तमनुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥

यच्चान्यदपि किंचित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् ।

वृत्तं तदपि चाऽऽत्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥ ३४ ॥

पंचेन्द्रिय और इनके पांच प्रकार, मन एवं चार कारण ( समयोग, मिथ्या-योग, हीनयोग, और अतियोग ) और सम्पूर्ण सद्वृत्त को 'इन्द्रियो अध्याय में कह दिया है । जो मनुष्य कहे हुए स्वस्थवृत्त का" रूप से पालन करता है वह सौ वर्षों तक नीरोग रहता और

पृष्ठ 137

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अ० [ ] सूत्रस्थानम् ११६ आयु का भंग नहीं होता, वह सी वर्षतक जीता है । साधुओं से पूजित होकर मनुष्यलोक को अपने यश से भर देता है, यशस्वी बनता है । धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है । सब प्राणियों के प्रति बन्धुभाव उत्पन्न कर लेता है । पुण्य कर्मों वाला मनुष्य अति उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करता है । इसलिये सब पुरुषों को चाहिये कि सदा इस 'सद्वृत्त ' का पालन करे । इस 'सद्वृक्ष' के अतिरिक्त और जो कुछ उत्तम कर्म हों जो कि यहां पर नहीं भी कहे हैं, उनको भी स्वीकार करके पालन करना चाहिये ऐसा भगवान् आत्रेय का अभिप्राय है ॥ ३०-३४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के इन्द्रियोपक्रमणीयो नामाऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति स्वस्थचतुष्कः ॥

नवमोऽध्यायः ।

अथातः खुड्डाकचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माss भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ -- अत्र ' खुड्डाक चतुष्पाद' ( चिकित्सा के क्षुद्र चार चरण ) नामक अध्याय

का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

भिष द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् ।

गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकाख्युपशान्तये ॥ ३ ॥

वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये चार पाद अर्थात् चिकित्सा के चार अंग हैं । ये चारों ही विकार अर्थात् रोगों की शान्ति में गुणवान् कारण हैं ॥३॥

विकारो धातुवैषम्यं, साम्यं प्रकृतिरुच्यते ।

सुखसंज्ञकमारोग्यं, विकारो दुःखमेव च ॥ ४ ॥

शरीर के धातु वात, पिथ और कफ की विषमता का नाम ही 'विकार' अर्थात् रोग है और धातुओं का 'साम्य' अर्थात् अनुकूलता रहने का नाम 'प्रकृति' है । आरोग्यता ही सुख है, रोग का होना दुःख है । वैखक शास्त्र में सुख- आरोग्यता है, और दुःख रोग है ॥ ४॥

चिकित्सा का लक्षण - चतुर्णा भिषगादीनां शस्तानां धातुबैकृते ।

प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ५ ॥

ओं के विषम होने पर भिषक्, रोगी, औषध और परिचारक ये चारों ये वाले मिलकर धातुओं को साम्प अर्थात् अनुकूल करने के लिये उसी को चिकित्सा कहते हैं ॥ ५ ॥

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१२० चरकसंहिता [अ० ह

वैद्य के गुण- श्रते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता ।

दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ६ ॥

सद् गुरु के उपदेश मे पूर्ण रूप से शास्त्र का ठीक २ शान, चिकित्सा- कर्म्म का बहुत बार दर्शन, चिकित्सा कार्य में कुशलता, चिकित्सा कर्म की सिद्ध- हस्तता, पवित्रता, स्वच्छता ये वैद्य के गुण हैं ॥ ६ ॥

द्रव्य के गुण- बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधकल्पना ।

संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥ ७ ॥

( बहुता ) द्रव्य की प्रचुरता ( योग्यता ) रोगियों के दिये जाने वाले द्रव्य में रोग को दूर करने का सामर्थ्य और जिसके अनेक प्रकार के कल्प, ( स्वरस कल्क, चूर्ण, कषाय आदि ) बनाये जा सकें, ' सँपत्' अर्थात् रस, वीर्य, प्रभाव, गुणसम्पूर्ण हों, ठीक २ ऋतु में एकत्र की गई हो, ये चार गुण औषध में होने चाहिये || ७ ||

परिचारक के गुण- उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागश्च भतीरे ।

शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ८ ॥

सेवा कर्म को जानने वाला, कर्मकुशल, रोगी में प्रांति रखने वाला शौच, अर्थात् शुद्धि, स्वच्छता ये चार गुण परिचारक के हैं ॥ ८ ॥

रोगी के गुण- स्मृति-निर्देश-कारित्वमभीरुत्वमथापि च ।

ज्ञापकत्वं च रोगाणामातरस्य गुणाः स्मृताः ॥ ६ ॥

( स्मृति ) स्मरण शक्ति, वैद्य के आदेश के अनुसार करने वाला, डरपोक न हो, रोग या चिकित्सा कर्म से न घबराने वाला, अपनी शिकायतों को भली प्रकार बता सके, ये चार गुण रोगी के हैं ॥ ६ ॥

कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम् ।

विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु ॥ १० ॥

पत्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः ।

विजेतुर्विजये भूमिश्चमः प्रहरणानि च ॥ ११ ॥

आतुराधास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः । वैद्यस्यातचिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक् ॥ १२४८.५

पृष्ठ 139

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अ० [ ] सूत्रस्थानम् १२१ सोलह गुण युक्त चारों पाद मिलकर ही चिकित्सा में कारण हैं । इन सब में प्रधान कारण 'भिषेक' अर्थात् वैथ ही है । क्योंकि वही विशेष रूप से जानने वाळा, परिचारक आदि को आदेश देने वाला, दवाइयों का प्रयोग करने वाला होता है । तीनों पाद वैद्य के अधीन हैं और वैद्य स्वतन्त्र है, इसलिये प्रधान है । खाना पकाने में जिस प्रकार पाचक कारण है, और पात्र, ईंधन और आग ये उसके अधीन रहते हैं और जिस प्रकार विजेता की विजय में भूमि, स्थान, सेना, प्रहरण, शस्त्र आदि कारण निमित्त बनते हैं, उसी प्रकार सिद्धि अर्थात् चिकित्सा की सफलता में रोगी, औषध और परिचारक ये तीन कारण निमित्त होते हैं । चिकित्सा में मुख्य कारण वे ही होता है ॥ १०-१२ ॥

मृदण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा ।

न वहन्ति गुणं वैद्य। हते पादत्रयं तथा ॥ १३ ॥

गन्धर्व पुरवन्नाशं यद्विकाराः सुदारुणाः ।

यान्ति यच्चेतरे वृद्धिमाशपायप्रोक्षिणः ॥ १४ ॥

सति पादत्रये ज्ञाज्ञी भिषजावत्र कारणम् । जिस प्रकार कुम्हार के बिना मिट्टी, दण्ड, चक्र ( चाक ) सूत्र आदि मिल-कर भी घड़े को नहीं बना सकते उसी प्रकार वैद्य के बिना रोगी, द्रव्य और परिचारक मिलकर भी चिकित्सा कार्य में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते । रोगी परिचारक औरद्रव्य इन तीनों के होनेपर भी अतिशय भयानक जो रोग गन्धर्व पुर की भांति नष्ट हो जाते हैं और दूसरे साधारण राग भी जो थोड़ी चिकित्सा से भी अच्छे हो सकते हैं - वे जो बढ़ते हैं- इन दानों में ज्ञानवान् और अज्ञानी वैद्य हो कारण होता है । गन्धर्व पुर जादूगर का बनाया मकान अथवा आकाश का महल ॥ १३-१४ ॥ वरमात्मा इतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता ॥ १५ ॥

पाणिचाराद्यथाऽचक्षुरज्ञानाद्भीतभीतवत् ।

atoraशेवाज्ञो भिषक्चरति कर्मसु ॥ १६ ॥

यदृच्छया समापन्नमुत्तार्य नियतायुषम् ।

भिषङमानी निहन्त्याश शतान्यनियतायुषाम् ॥ १७ ॥

तस्माच्छास्त्रेऽर्थविज्ञाने प्रवृत्तौ कर्मदर्शने ।

. भिषक् चतुष्टये युक्तः प्राणाभिसर उच्यते ॥ १८ ॥

येसू वैद्यइलाज करे, इससे अच्छा अपनी हत्या कर लेना है । अन्धा करके डरता हुआ जिस प्रकार हाथ से टटोल कर चलता है, वायु

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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१२२ चरकसंहिता [अ० ह . के वश में पड़ी हुई नाव जिस प्रकार कहीं की कहीं बह जाती है, उसी प्रकार मूढ़वैद्य भी चिकित्सा- कर्म में प्रवृत होता है । नियत आयु वाले रोगियों के स्वतः अच्छा हो जाने से अपने को वैद्य मानने वाला मनुष्य जिनको आयु अभी शेष है, ऐसे सैकड़ों रोगियों की अपनी चिकित्सा से बिना समय के हो शीघ्र मार देता है । इसलिये शास्त्र में तत्त्वार्थ के ज्ञान में',, क्रिया में, कर्म और कुशलता में इन चार गुणों से युक्त वैध ही प्राणानि अर्थात् रोगी के जात प्राणों को भी लौटा लाने वाला कहलाता है ॥ १५-१८ ॥

तौलिङ्गे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे ।

ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजा निषक्तमः ॥ १६ ॥

जिस वैद्य को रोगोत्पत्ति के कारण,लक्षण,प्रशमन, रोगों की शान्ति और पुनः आक्रमण न होना इन चार बातों का ज्ञान है, वहीं 'राजवैद्य ' होने योग्य है ॥

श शास्त्राणि सलिलं गुणदोपप्रवृत्तये ।

पात्रापेक्षीण्यतः प्रज्ञां चिकित्सार्थं विशोधयेत् ॥ २० ॥

शस्त्र, शास्त्र और पानी ये तीनों गुण और दोष का उत्पन्न करने में पात्र की अपेक्षा करते हैं । जैसे निर्मल पानी मैले पात्र में रखने से मैला हो जाता है । और स्वच्छ पात्र में साफ दीखता है, तलवार से जो दुष्ट और आदि का वध हो सकता है, वहाँ सज्जन का भी गला काटा जा सकता है, शास्त्र द्वारा जहाँ रोगी को बचाया जा सकता है, वहाँ मूढ़ वैद्य मार भी सकता है । इसलिये चिकित्सा के लिये वैद्य को अपनी बुद्धि को सदा स्वच्छ रखना चाहिये ॥ २०॥

विद्या वितक विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया ।

यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमतिवर्तते ॥ २१ ॥

विद्यामतिः कर्मदृष्टिरभ्यासः सिद्धिराश्रयः ।

वैद्यशब्दाभिनिष्पत्तावलमेकैकमध्यदः ॥ २२ ॥

यस्य त्वेते गुणाः सर्वे सन्ति विद्यादयः शुभाः ।

स वैद्यशब्दं सद्भूतमर्द्दन् प्राणिसुखप्रदः ॥ २३ ॥

( विद्या ) आयुर्वेद विद्या, ( वितर्कः ) शास्त्रार्थ मूळक ऊहापोह, (विज्ञान ) बहुत शास्त्र के ज्ञान से विशत्व, ( तत्परता ) लग्न ( क्रिया ) चिकित्साकुशलता जिस वैद्य में ये उपरोक्त छः गुण हैं उसके लिये कोई भी व्याधि असाध्य नहीं है । आयुर्वेद विद्या, विशुद्ध बुद्धि, दृष्ट चिकित्सा, चिकित्सा कार्य में शुर अनेक रोगियों को आरोग्य युक्त करने में सफलता, सद्गुरु का आश्रय एक एक भी गुण वैद्य पद प्राप्त कराने में समर्थ है । परन्तु जिस पुरुष