चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 141–150
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 141–150
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अ०: १० ] सूत्रस्थानम् १२३ आदि सब गुण होते हैं, वही सच्चे अर्थों में 'वेद्य' कहला सकता है । वहीं प्राणियों के लिये सुख देने वाला होता है ॥ २१-२३ ॥
शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिरात्मनः ।
ताभ्यां भिषक्सुयुक्ताभ्यां चिकित्सन्नापराध्यति ॥ २४ ॥
चिकित्सिते त्रयः पादा यस्माद्वैद्यव्यपाश्रयाः ।
तस्मात्प्रयत्नमातिष्ठेद्भिषक स्वगुणसंपदि ॥ २५ ॥
मैत्री कारुण्यमा, शक्य प्रीतिरुपेक्षणम् ।
प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधेति ॥ २६ ॥
आयुर्वेद शास्त्र तो प्रकाश करने के लिये ज्योति हैं और अपनी बुद्धि आंख है । इन दोनों को मिलाकर ठीक तरह से प्रयोग करके चिकित्सक भूल नहीं करता | चिकित्सा के तीन चरण रोगों, परिचारक और द्रव्य वैद्य पर ही आश्रित हैं । इसलिये अपने गुणों को विशेष रूप से प्राप्त करने में वैद्य को प्रयत्नवान् रहना चाहिये । वैद्य का व्यवहार चार प्रकार का है । रोग से पीडित पुरुष में मित्रता और उन पर दया का भाव; साध्य रोगी में स्नेहभाव, मरणासन्न रोगी में उपेक्षा बुद्धि रखना ॥ २४-२६ ॥
तत्र श्लोकौ- भिषग्जितं चतुष्पाद पादः पादश्चतुर्गुणः ।
भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वेद्यस्तु यद्गुणः ॥ २७ ॥
ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्म च भिषजां या चतुर्विधा ।
सर्वमेतचतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितम् ॥ २८ ॥
चिकित्सा के चार चरण प्रत्येक चरण के चार-चार गुण, सत्र चरणों में प्रधान 'भिषेक' है, क्यों प्रधान है? वैद्य के गुण, वैद्यों की चार प्रकार को बुद्धि और ब्राह्मी बुद्धि यह सत्र 'खुड्डाक चतुष्पाद' अध्याय में कह दिया है । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के खुड्डाकचतुष्पादो नाम नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः ।
ये तो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
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१२४ चरकसंहिता [अ० १० इस के अनन्तर 'महाचतुष्पाद' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते यदुक्तं पूर्वा- ध्याये षोडशगुणमिति, तद्वेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायेति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः ॥ ३ ॥
चार चरण और सोलह कलायुक्त चिकित्सा होती है ऐसा वैद्य कहते हैं । पूर्व के ( खुड्डाक- चतुष्पाद ) अध्याय में जो सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा का उपदेश किया है उसी चिकित्सा को युक्ति पूर्वक प्रयोग करने से आरोग्यता मिलती है ऐसा पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥
नेति मैत्रेयः । किं कारणम्, दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च परिचारकसंपन्नाश्चाऽऽत्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठ- मानास्तथायुक्ताश्चापरे म्रियमाणास्तस्माद्वेषजमकिंचित्करं भवति । तद्यथा श्वभ्रे सरसि च प्रसिक्तमल्पमुदकं नद्यां वा स्यन्दमानायां पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति । तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चा-परिचार काश्चानात्मवन्तञ्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ता त्रियमाणाश्चापरे । यतश्च प्रतिकुर्वन सिद्धयति प्रतिकुर्वन् म्रियते, अप्रतिकुर्वन् सिध्यत्यप्रतिकुर्वन् म्रियते; ततश्चिन्त्यते भेषज- मभेषजेनाविशिष्टमिति ॥ ४ ॥
'मैत्र ' के विचार में यह ठीक नहीं, क्योंकि कुछ रोगी जिन को सब प्रकार के साधन प्राप्त हैं, जिनके सेवक भी हैं, जो संयमी, जितेन्द्रिय भी हैं, और चतुर वैद्य उनकी चिकित्सा करते हैं, वे अच्छे ( स्वस्थ ) होते देखे जाते हैं । इस के सिवाय उपरोक्त सब कुछ होते हुए भी कुछ रोगा मरते हुए भी देखे जाते हैं । इसलिये कहते हैं कि सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा कुछ फलदायक नहीं । जिस प्रकार एक बड़े भारी गढ़े या तालाब में थोड़ा सा पानी डालने पर कुछ लाभ नहीं होता और जिस प्रकार बहती हुई नदी में फेंकी हुई धूि की मुही निरर्थक होती है, वह पानी में बह जाती है और जिस प्रकार रेत के बहुत बड़े ढ़ेर में डाली हुई रेत की एक मुट्ठी का कुछ लाभ नहीं, इसी प्रकार शुभ कर्मवाले रोगी में चिकित्सा का कोई लाभ नहीं । कुछ रोगी साधनों के बिना ही, सेवकों से रहित, अजितेन्द्रिय, अपथ्यसेवी, और मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा कराने पर भी स्वस्थ होते हुये जाते हैं, एवं कुछ ( इस उपरोक्त अवस्था में ) मरते हुए भी देखे जा (सोलह गुणों से युक्त) चिकित्सा करने पर आरोग्ययुक्त स्वस्थ हो जाते है
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अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२५ बहुत से चिकित्सा करने पर भी मर जाते हैं, बहुत चिकित्सा न करने पर भी स्वस्थ हो जाते हैं, और न करने पर भी मर जाते हैं, अतः सन्देह होता है कि चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥
मैत्रेय! मिथ्याचिन्त्यत इत्यात्रेयः । कि कारणम्? ये ह्यातुराः षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना म्रियन्त इत्युक्तं तदनुपप- न्नम्, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजमकारणं भवति । ये पुनरा तुराः केवलाद्वेषजादृते समुत्तिष्टन्ते न तेषां संपूर्णभेप जोपपादनाय समुत्थानविशेषो नास्ति । यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्था- पयन पुरुषो बलमस्योपादव्यात्, स प्रतरमपरिक्लिष्ट एवातिष्ठेत्तद्व- त्संपूर्णभेषजोपलम्भादातुराः! ये चाऽऽतुराः केवलाद्भषजादपि म्रियन्ते, न च सर्व एव ते भेषजापपन्नाः समुत्तिष्ठेरन् न हि सर्व व्याधयो भवन्त्युपायसाध्याः, न चापायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरहित, न चासाध्यानां व्याधीनां भेपजसमुदायोऽयमस्ति । न ह्यलं ज्ञानवान् भिषग्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुम् । परीक्ष्यकारिणां हि कुशला भवन्ति । यथा हि योगाभ्यास नित्य इष्वासो धनुरादायेपुमपास्यन्नातिविप्रकृष्टे महति काये नापराधवान् भवति सम्पादयति चेटकार्यम्, तथा भिषक् म्वगुणसंपन्न उपकरणवान् वीक्ष्य कर्माऽऽरभमाणः साध्यरोगमनपराधः संपादयत्येवाऽऽतुरमारोग्येण,तस्मान्न भवजमभेषजेनाविशिष्टं भवति॥५॥
आत्रेय भगवान् इसका उत्तर देते हैं कि हे मैत्रेय! तुम्हारा ऐसा विचार करना ठीक नहीं है । क्योंकि, रांगो सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा करने पर भी स्वस्थ नहीं होते, मर जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि चिकित्सा से अच्छे होने वाले रोगों में चिकित्सा निष्फल नहीं छाती, और जो रांगी औषध-चिकित्सा के विना भी स्वस्थ हो जाते हैं, उनमें चिकित्सा के पूर्ण कारणों के होने की आवश्यकता भी नहीं होती । जैसे गिरे हुए मनुष्य को जो कि अपने आप उठने में समर्थ है, उठाने के लिये दूसरा पुरुष सहायता देता है, तब वह जल्दी, विना कष्ट के ही खड़ा हो जाता है । इस प्रकार सम्पूर्ण ( सोलह गुणों से युक्त ) चिकित्सा प्राप्त होने से रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । जो रोगी सम्पूर्ण चिकित्सा के मिलने पर भीमर जाते हैं वे सब रोगी भी सोलह गुण युक्त चिकित्सा से स्वस्थ नहीं हो सकते, क्योंकि सब रोग उपाय से साध्य नहीं हैं न से रोग असाध्य भी हैं ) और जो रोग उपाय से अच्छे होने वाले हैं वे * राय के अच्छे भी नहीं होते । इसी प्रकार जो रोगी असाध्य हैं उन को
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१२६ चरकसंहिता [अ० १० सारा औषध-समुदाय भी ठीक नहीं कर सकता । ज्ञानवान् वैद्य भी मरणासन्न रोगी को स्वस्थ करने में समर्थ नहीं होता । जो वैद्य साध्य असाध्य का विचार करके चिकित्सा का प्रारम्भ करते हैं वे कुशल चिकित्साकार्य में सफल, यशस्वी होते हैं । जिस प्रकार कि प्रयोग विधि को जानने वाला अभ्यासी धनुर्धारी धनुष को लेकर बहुत दूर के नहीं, प्रत्युत समीपवर्ती स्थूल लक्ष्य पर बाण फेंकता हुआ नहीं चूकता लक्ष्य वेध कर ही लेता है, इसी प्रकार वैद्य अपने गुणोंसे युक्त, उपकरणवान्. साधनवान्, साध्य- असाध्य का विचार करके काम आरम्भ करके, रोगी के साध्य रोग को स्वस्थ कर देता है, इसमें भूल नहीं करता, इस लिये कहते हैं कि चिकित्सा करना और न करना दोनों समान नहीं हैं ॥ ५ ॥
इदं चेदं च नः प्रत्यक्षं यदनातुरेण भेषजेनाऽऽतुरं चिकित्सामः,क्षाम- मक्षामेण, कुशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्बिनमपतर्पयामः, शीतेोष्णाभिभूतमुपचरामः शीताभिभूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून पूर- यामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः,व्याधीन् मूलविपर्ययेणोपचरन्तः सम्यक प्रकृतौ स्थापयामः, तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्तम भवति ॥ ६ ॥
और यह हमारा प्रत्यक्ष भी है कि रोगी की हम रोगों की प्रकृति से विपरीत गुण वाली औषध से चिकित्सा करते हैं, क्षीणधातु वाले व्यक्ति की पौष्टिक औषधियों से चिकित्सा करते हैं, ( कृश ) पतले-दुबले को मोटा बनाते हैं, स्थूल चर्बी वाले पुरुष को पतला ( कृश ) करते हैं, गरमी से पीड़ित व्यक्ति की शीतल चिकित्सा करते हैं. शीत से पीड़ित व्यक्ति की उष्ण पदार्थों से चिकित्सा करते हैं, कम हुए धातुओं को पूर्ण करते हैं, परिमाण से अधिक बढ़े हुए धातुओं को कम करते हैं, रोगों की कारण के विपरीत विरुद्ध चिकित्सा करते हुए दोषों को प्रकृति में भली प्रकार से स्थित करते हैं । रोगी पुरुषों के लिये ऐसा करते हुए ये भैषज्य समुदाय अर्थात् सोलह गुणयुक्त चिकित्सा व्याधिनाटक और सुखकारी. होती है ॥ ६ ॥
भवन्ति चात्र- साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्व चिकित्सकः ।
काले चाss रभते कर्म यत्तत् साधयति ध्रुवम् ॥ ७ ॥
अर्थ-विद्या-यशो-हानिमुपक्रोशम संग्रहम् ।
प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ८ ॥
इसमें कोक है- रोग के साध्य और असाध्य रूप को एवं साध्य अलभ्य के ि
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अ० [१० ] सूत्रस्थानम १२७ जानकर विचारपूर्वक समय पर जो चिकित्सक कार्य का आरम्भ करता है वह उस कर्म को अवश्य पूर्ण करता है और जो चिकित्सक असाध्य व्याधि की चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि उठाता है । उस को निन्दा होती है और लोग उस से चिकित्सा नहीं करवाते, उसका धन्धा नहीं चलता ॥ ७-८ ॥
सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च ।
द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ॥ ६
साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमात्कृष्टतां प्रति ।
विकल्पात्साध्यानां नियतानां विकल्पना ॥ १० ॥
माध्य व्याधियां दो प्रकार की हैं. एक ( सुखसाध्य ) सरलता से अच्छी होने वाली और दूसरी ( कृच्छ्रसाध्य कठिनाई से अच्छी होने वाली । असाध्य व्याधियां भी दो प्रकार को हैं, एक ( साध्य ) जो कि चिकित्सा से कुछ समय के लिये शान्त की जा सकती हैं और चिकित्सा के छोड़ने पर फिर खड़ी हो जाती हैं । दूसरी ( अनुपक्रम ) सर्वथा असाध्य जो कभी अच्छी नहीं होती । साध्य व्याधियों के पुनः तीन भेद हैं, ( १ ) अल्पवाध्य, ( २ ) मध्यमसाध्य, और ( ३ ) उत्कृष्टसाध्य और जो निश्चित रूप से ' असाध्य' हैं, उनका कोई नियत मेद नहीं है, याप्य, असाध्य रोगों के तीन भेद हैं । यथा अल्पयाप्य, मध्यम याप्य और उत्कृष्ट याप्प ॥ ॥ ६-१० ॥
सुखसाध्य व्याधि के लक्षण- हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च ।
न च तुल्यगुणो दूष्यो, न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥ ११ ॥
न च कालगुणस्तुल्यो, न देशो दुरुपक्रमः ।
गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च ॥ १२ ॥
दोषश्चैकः समुत्पत्तौ देहः सर्वौषधक्षमः ।
चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥
रोगोत्पत्ति के कारण थोड़े हों, बहुत अधिक या तीव्र कारण न हो, ( पूर्वरूप) अर्थात् रोग के प्राथमिक लक्षण भी हल्के हों, और 'रूप' अर्थात् स्पष्ट लक्षण रोग के थोड़े और हल्के हों । ( दूष्य रक्त, मांसादि धातु) दोष वातादि कारण के समान न हों, पित्त के कारण से रक्त कुपित न हो, रोगोत्पादक दोष बात आदि पृश्लोगी की प्रकृति न हो, बातजन्य व्याधि में रोगी की प्रकृति 'कात' न हो । समय "सुन न हो, हेमन्त में कफ संचय होता है, इस समय कफ का रोग न शरीर का अवयव या अनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश अत
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१२८ चरकसंहिता [ अ० १० कष्टसाध्य स्थान पर रोग न हुआ हो, अथवा जहां पर कठिनता से चिकित्सा की जाय ऐसे स्थान पर रोग न हुआ हो, दोष को गति एक मार्ग में हो, दो मार्ग में न हो, रोग नवीन हो, रोग के साथ कोई उपद्रव ( पीछे उत्पन्न हुई व्याधि या उपसर्ग ( Complication ) न हो, और चिकित्सा के चारों चरण प्राप्त हों, रोगोत्पत्ति में कारण एक दोष हो तथा शरीर सम्पूर्ण प्रकार की औषध का सहन कर सके तो ये मुखसाध्य अर्थात्सुगमता से अच्छे होने वाले रोग के लक्षण हैं ॥ १२-१३॥
कृच्छ्रसाध्य रोग के लक्षण- निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बड़े ।
कालप्रकृतिदूष्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च ॥ १४ ॥
गर्भिणी- वृद्ध बालानां नात्युपद्रवपीडितम् ।
शस्त्र-क्षारग्नि-कृत्यानामनवं कृच्छ्रदेशजम् ॥ १५ ॥
विद्यादेकपथ रोगं नातिपूर्णचतुष्पदम् ।
द्विपथं नातिकालं वा कृच्छ्रसाध्यं द्विदोषजम् ॥ १ ९ ॥
रोग का कारण, रोग का पूर्वरूप और रांग का रूप, स्पष्ट चिन्ह, माध्यम बल, संख्या में मध्यम हो अर्थात् जिस रोग को उत्पन्न करने वाले दोप-प्रकोप के कारण न तो कम और न अधिक हों, काल प्रकृति और दृष्य इनमें से कोई एक रोगोत्पादक दोष के समान साधारण हो, अधिक उपद्रवों से पीड़ित न हो, तो वह रोग कृच्छ्रसाध्य है । गर्भवती, वृद्ध और बालक, इनकी तब व्याधियां कष्टमाध्य हैं । शस्त्र, क्षार और अग्नि इनसे चिकित्सा करते समय जो व्याधि उत्पन्न हो जाय, नवीन न हो, जो रोग पुराना हो, मर्म स्थान, सन्धिस्थान आदि में जो रोग हो, एक मार्गगामी हो, चिकित्सा के चारों अंग पूर्ण न हीं दोष दो मार्गानुसारी हो, बहुत समय का न हो, और दो दोनों से उत्पन्न हुआ हो वह रोग भी कष्टसाध्य है || १४-१६||
याप्य व्याधि का लक्षण --- शेषत्वादायुषो याप्यमसाध्यं पथ्यसेवया ।
लब्ध्वाऽल्पसुखमल्पेन हेतुनाऽऽशुप्रवर्तकम् ॥ १७ ॥
असाध्य व्याधि, पथ्य, आहार विहार के पालन करने से आयु के शेष होने के कारण 'याप्य' होती है । कुछ काल तक आराम मिलता है, परन्तु थोड़े से भी कारण से पुनः शीघ्र उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार की व्याधि कहते हैं ॥ १७ ॥
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सूत्रस्थानम् १२६अ० १० ] है
असाध्य व्याधि का लक्षण - गम्भीरं बहुधातुम्थं मर्म सन्धिसमाश्रितम् ।
नित्यानुशायिनं रागं दीर्घकालमवस्थितम् ॥ १८ ॥
विद्याद् द्विदोषजं तद्वत्प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् ।
क्रियापतितं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥। ११ ॥
औत्सुक्यारतिसंमोहकर निन्द्रियनाशनम् ।
दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥ २० ॥
मेद आदि गम्भीर धातु में स्थित, रस रक्तादि बहुत धातुओं में स्थित, मर्म सन्धि में आश्रित हो, लगातार रात दिन रहता हो २४ घन्टे चारह महीने बना रहे, देर तक दो चार साल का हो गया हो, दो दोषों से उत्पन्न हो ऐसे रोग को यप्य, और इस प्रकार के ( गम्भीर बहु धातुस्थ आदि ) तीनों दोषों से उत्पन्न रोग 'असाव्य' समझने चाहियें । जो रोग चिकित्सा से बाहर चला गया हो, बहुत बढ़ गया हो, सब मार्ग ( ऊर्ध्व, अधः और तिर्यग्) तीनों मार्गों में पहुंच गया हो, अत्यन्त प्रसन्नता, अति बेचैनी, एवं मूर्च्छा ( गम्भीर निद्रा ) को उत्पन्न करे, जिस रोग से इन्द्रिय, आंख का देखना, या कान का सुनना आदि नष्ट हो जाये, निर्बल पुरुष में जो रोग बहुत बढ़ा हुआ हो, जिस रोग के लक्षण निश्चित मृत्यु को बताने वाले स्पष्ट हों वह रोग 'असाध्य' हैं, ऐसा रोगी भी असाध्य है ॥१८-२० ॥
भिषजा प्राकृ परीक्ष्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम् ।
पञ्चात्कार्यसमारम्भः कार्यः साध्येपु धीमता ॥ २१ ॥
साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक् प्रतिपत्तिमान् ।
न स मंत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥
वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करने से पूर्व रांगों की उनके लक्षणों से परीक्षा, जांच कर ले कि यह साध्य है या असाध्य है । पीछे साध्य रोगों में कार्य आरम्भ करना चाहिये असाध्यों में हाथ न लगाये । जो वैद्य साध्य और असाध्य के भेदों को भली प्रकार जानता है, वह ज्ञानो बुद्धिमान् वैद्य, मैत्रेय के समान लोगों की मिथ्या बुद्धि को नहीं बढ़ाता ॥ २१-२२॥
तत्र श्लोकौ - इद्दौषधं पादगुणाः प्रभावो भेषजाश्रयः ।
23." आत्रेय मैत्रेय-मती मति द्वैविध्य निश्चयः ॥ २३ ॥
•ध्ये येतुर्विधविकल्पाश्च व्याघयः स्वस्वलक्षणाः ।
महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ इति ॥
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१३० चरकसंहिता [ अ० १२ इसमें दो श्लोक हैं— इस महाचतुष्पाद नामक अध्याय में औरध, चतुष्पाद, गुण, भेषज आश्रित प्रभाव, आत्रेय एवं मैत्रेय की दो प्रकार की बुद्धि, चार प्रकार के भेट से रोग एवं उनके लक्षण कह दिये हैं, और उन कारणों का भी वर्णन कर दिया हैजिनसे वैद्य यशस्वी होता है ॥२३-२४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतं सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के महाचतुष्पादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः ।
-० * ०- अथातस्तिस्प्रेषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'तितैषणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था || २|| इह खलु पुरुषेणानुपहत सत्त्व -बुद्धि -पौरुष पराक्रमेण हितमिह चामु-मिच लोके समनुपश्यता तिस्र एषणाः पर्योष्टव्या भवन्ति, तद्यथा प्राण-षणा, घनैषणा, परलोक पणेति ॥ २ ॥
इस जगत् में जिस पुरुष का मन, ज्ञान, पौरुष, और पराक्रम मानसिक बल नष्ट नहीं हुआ, जो इह लोक में और परलोक में हित चाहता है उस को तीन षणायें ( इच्छायें ) रखनी चाहियें, ( १ ) प्राणैषणा ( प्राण या जीवन की इच्छा ), ( २ ) घनैषणा ( धन की इच्छा ), ( ३ ) परलोकैषणा ॥३ ॥
आसां तु खल्वेषणानां प्राणैषणां तावत्पूर्वतरमापद्येत । कस्मात्? प्राणपरित्यागे हि सर्वत्यागः । तभ्यानुपालनं -स्वस्थस्य स्वस्थवृत्तिरातु- रस्य विकारप्रशमनेऽप्रमादः, तदुभयमेतदुक्तं वक्ष्यते च; तद्यथोक्तमनु- वर्त्तमानः प्राणानुपालनाद्दीर्घमायुरवाप्नोतीति प्रथमेषणा व्याख्याता भवति ॥ ४ ॥
इन तीनों एषणाओं में से 'प्राणेषणा' को सब से प्रथम करे, क्योंकि प्राणों छूट जाने पर सब कुछ छूट जाता के है । प्राणेषणा के लिये स्वस्थ चाहिये कि स्वस्थवृत्त का पालन करे, जिससे कि वह रोगी न हो अं शान्त करने में प्रमादी न हो । स्वस्थवृत्त और रोगशान्ति के
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अ०७ ] सूत्रस्थानम् १३१ ww बातें पूर्व कह दी गई हैं आगे विस्तार से भी कहेंगे । उनका ठीक २ कार से पालन करने से मनुष्य प्राणों की रक्षा कर के दोर्घायु प्राप्त कर्ता है । इस प्रकार से प्रथमपणा का उपदेश कर दिया ॥ 5 ॥
अथ द्वितीयां धनैषणापर्यंत, प्राणेभ्यो ह्यनन्तरं धनमेव पर्योष्टव्यं भवति, न ह्यतः पापात्पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादु-पकरणानि पर्योष्टुं यतेत । तत्रोपकरणोपायाननुत्र्याख्यास्यामः, तद्यथा कृषि -पाशुपाल्य वाणिज्य -राजी पसेवादीनि यानि चान्यान्यपि सतामवि- गर्हितानि कर्माणि वृत्ति-पुष्टि कराणि विद्यात्तान्यरभेत कर्तुम्, तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवतीति द्वितीया धनैषणा व्याख्याता भवति ॥ ५ ॥
अब दूसरी 'धनैपणा' को भी करे प्राणों से उतर कर धन ही आवश्यक होता है । क्योंकि इससे बढ़कर और कोई पाप संसार में नहीं है बिना साधनों के दीर्घ जीवन व्यतीत करना, इसलिये उपकरणों अर्थात् धन कमाने के साधनों को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिये । धन कमाने के साधनों का भी उपदेश करते हैं, जैसे खेती, पशुओं का पालन, वाणिज्य व्यापार, राजा की सेवा आदि । इनके सिवाय अन्य और भी जो २ कार्य सज्जन पुरुषों से अनिन्दित, जीविका को देने वाले हों, उन को करे इस प्रकार करने से दीर्घायु प्राप्त करता है और तिरस्काररहित जीवन व्यतीत करता है । इस प्रकार से दूसरी 'धनैषणा' की भी व्याख्या करदी ॥ ५ ॥
अथ तृतीयां परलोकैषणामापद्येत । संशयश्चात्र - कथं? भवि- ध्याम इतयुता न वेति । कुतः संशयः पुनः इति? उच्यते-सन्ति ह्येके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्यमाश्रिताः । सन्ति चापरे ये त्वागमप्रत्ययादेव पुनर्भवमिच्छन्ति । श्रतिभेदाच्च ।- 'मातरं पितरं चैकं मन्यन्ते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदृच्छां चापरे जनाः ॥ इत्यतः संशयः -किं नु खल्वस्ति पुनर्भवो न वेति ॥ ६ ॥
अब तीसरी 'परलोकैपणा' को भी प्राप्त करे । इस 'परलोकैषणा' के विषय में सन्देह है कि यहां से मरने के पीछे फिर जन्म होगा वा नहीं । संशय क्यों है कहते हैं कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो कि प्रत्यक्ष से जानने योग्य वस्तु को नते हैं और परोक्ष को नहीं मानते । परोक्ष आंख से दिखाई नहीं देता, ये ये नास्तिक मत को स्वीकार करते हैं, पुनर्जन्म को नहीं मानते । वेोपदेश को प्रमाण मानकर ही पुनर्जन्म को मानते हैं । श्रुति की
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१३२ चरकसंहिता [ अ० ११ भिन्नता के कारण पुनर्जन्म में सन्देह है । कुछ मनुष्य जन्म का कारण माता -पिता को मानते हैं, और कोई स्वभाव को ही जन्म का कारण मानते हैं । तीसरे दूसरे को समस्त जगत् का कारण मानते हैं । चीथे लोग 'यदृच्छा' को ही जन्म का कारण मानते हैं, अर्थात् अपने आप बिना कारण के ही जन्म हो गया है । इसलिये सन्देह होता है कि पुनर्जन्म है, वा नहीं ॥ ६ ॥
तत्र बुद्धिमान्नास्तिक्यबुद्धिं जह्याद्विचिकित्सां च । कस्मात्? प्रत्यक्षं ह्यल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति यदागमानुमान-युक्तिभिरुपलभ्यते । येरेव तावदिन्द्रियैः प्रत्यक्ष नुपलभ्यते, तान्येव सन्ति चाप्र त्यक्षाणि ॥ ७ ॥
इस अवस्था में बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि 'नास्तिक्य बुद्धि ' अर्थात् परलोक नहीं है इस विचार को और संशय को छोड़ दे । क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत थोड़ा है और अप्रत्यक्ष ज्ञान बहुत है जिसको आगम शास्त्र, अनुमान और युक्ति से जाना जाता है । जिन ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष ज्ञान किया जाता है वे इन्द्रियां स्वयं अप्रत्यक्ष हैं, आंख आंख को नहीं देख सकती, नाक नाक को नहीं सूंघ सकती, कान कान को नहीं सुन सकते ॥ ७॥
सतां च रूपाणामतिसंनिकर्षादतिविप्रकर्षादावरणात्करणदौर्बल्या-न्मनोऽनवस्थानात्समानाभिहारादभिभवादतिसौक्ष्म्याश्च प्रत्यक्षानुपल- ब्धिस्तस्मादपरीक्षितमेतदुच्यते - प्रत्यक्षमेवास्ति नान्यदस्तीति ॥ ८ ॥
काजलऔर), रूपअति आदिविप्रकर्षके अर्थात्बहुत समीपबहुत दूरहोनेहोनेसेसे( (जैसे बहुतपलकों दूरमें उड़तालगा हुआहुआ पक्षी ), बीच में व्यवधान आने से ( जैसे दीवार के पीछे रक्खी वस्तु ), इन्द्रिय के निर्बल होने से, मन स्थिर न होने से, एक साथ दो या अधिक भिन्न विषयों में इच्छा करने से, तिरस्कृत होने से यथा -मध्यान्ह में सूर्य की किरणों द्वारा तिरस्कृत नक्षत्रादि, अतिसूक्ष्म होने से, जैसे कृमि या द्वयणुकादि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता । इसलिये जो चार्वाक आदि नास्तिक का यह कहना कि 'प्रत्यक्ष' इन्द्रियों से जिसका ज्ञान होता है वही है, उसके अतिरिक्त और नहीं है वह अपरीक्षित अर्थात् विना सोचे विचारे कहा गया है ॥ ८॥
श्रुतता न कारणं युक्तिविरोधात् ॥ ६ ॥
नाना वादिजनों के वचन भी परलोक के न होने में प्रमाण नहीं हैं क्योंकि वे युक्ति ( तर्क ) से विरुद्ध हैं ॥६॥ युक्ति- आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् ।
द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ १० ॥