चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 151–160
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 151–160
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अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३३
सर्वश्वत्संचरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् ।
निरन्तरं नावयवः कश्चित्सूक्ष्मस्य चाऽऽत्मनः ॥ ११ ॥
जो लोग कहते हैं कि माता पिता की आत्मा पुत्र रूप में उत्पन्न होती है; इस अवस्था में आत्मा की गति दो प्रकार से हो सकती है । एक, आत्मा सम्पूर्ण पुत्र रूप में आये; दूसरी अवस्था में आत्मा का कोई अवयत्र पुत्र रूप में आये । यदि सम्पूर्ण आत्मा पुत्र रूप में आता है तो माता या पिता किसी एक की मृत्यु हो जानी चाहिये, और दूसरी अवस्था में सूक्ष्म आत्मा का कोई अवयव हो ही नहीं सकता । परमाणुओं के संयोग से बनी वस्तु का भाग हो सकता है, परमाणु का नहीं ॥ १०-११ ॥
बुद्धिर्मनश्च निर्णति यथैवात्मा तथैव ते ।
येषां चैपा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुविधा ॥ १२ ॥
विद्यात्स्वाभाविकं पण्णां धातूनां यत्स्वलक्षणम् ।
संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ १३ ॥
जिस प्रकार माता पिता की आत्मा उत्पत्ति का कारण नहीं बन सकती उसी प्रकार ये बुद्धि और मन भी उत्पत्ति का हेतु नहीं बन सकते, क्योंकि मन और बुद्धि दोनों सूक्ष्म हैं, इसलिये इनका भी विभाग नहीं बन सकता । और यदि सम्पूर्ण अवतरण मानो तो माता पिता में से एक मन और बुद्धि से रहित अर्थात् ज्ञान, चिन्तन, बोध से शून्य होना चाहिये । इसलिये यह भी ठीक नहीं । एक ओर भी दोष है । उनके मतमें योनि चार प्रकार की ( स्वेदज, अण्डज, उद्भिज और जरायुज ) नहीं होती । ( क्योंकि उद्भिज यांनि वनस्पति आदि में माता और पिता नहीं है ) । प्राणियों की उत्पत्ति मेंछः धातु ( पंच महाभूत, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश एवं छटी चेतना आत्मा ) अपने लक्षणों से स्वभाव से ही कारण बनते हैं । इनके संयोग और वियोग में कर्म ही कारण है ॥ १२-१३ ॥
अनादेश्चेतनाधातोर्नेध्यते परनिर्मितिः ।
पर आत्मा स चेद्धेतुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः ॥ १४ ॥
ईश्वर का ही बनाया जगत् मानकर जो लोग आत्मा का अस्तित्व नहीं मानते उनका कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि अनादि ( जिसका आदि नहीं ) धातु ( आत्मा ) का दूसरे से बनाया जाना भी सम्भव नहीं । यदि पूर्व आत्मा नहीं है तो दूसरा पुरुष भी किस उपादान को ले कर दूसरे को क्योंकि अचेतन वस्तु चेतन को उत्पन्न नहीं कर सकता । यदि
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१३४ चरकसंहिता [ अ ० ११ परमात्मा के केवल शरीर का बनाने वाला मानते हो तो तुम्हारे और हमार सिद्धान्त में कोई भेद नहीं । इसलिये आत्मा नित्य है, वह समय २ पर स्थूल शरीर को छोड़कर परलोक में कमों का भोग करके भांग की समाप्ति पर और भोग्य कर्म फलों के भोग के लिये पुनः उत्पन्न होता है ॥ १४॥
न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च ।
न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ १५ ॥
नास्तिकस्यास्ति नैवात्मा यदृच्छोपहृतात्मनः ।
पातकेभ्यः परं चैतत्पातकं नास्तिकग्रहः ॥ १६ ॥
यहच्छा भी जन्म का कारण नहीं है, क्योंकि यदृच्छावादी के मत में न कोई परीक्षा ( प्रमाण ) है, और न कोई परीक्ष्य अर्थात् प्रमेय वस्तु है । इसलिये माता, पिता, कन्या, बहिन, पत्नी, गुरु, वृद्ध, तपस्वी इत्यादि परीक्षणीय वस्तु के अभाव में मनमाना आचार होना सम्भव है और कर्म भी नहीं है, जिसका कि अच्छा या बुरा फल मिलेगा, इसलिये कर्म फल भी नहीं है । न कर्म का कोई कर्त्ता है, जो कर्म करे । यह सब यदृच्छा से ही, बिना कारण होता है, कारण के न होने से भनचाहा आचरण करने में कोई दोष नहीं होगा, इससे गुरु, सिद्ध पुरुषों में पूज्या पूज्य भाव भी नहीं रहेगा । वह माता, कन्या आदि में दारवत् बुद्धि कर सकेगा, इसलिये जिसका आत्मा यदृच्छावाद से नष्ट हो जाता है ऐसे नास्तिक का आत्मा नहीं रहता । अतः नास्तिक होना सब पातकों से बड़ा पातक है!! १५-१६ ॥ तस्मान्मतिं विमुच्यैताममार्गप्रसृतां बुधः! सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम् ॥ १७ ॥ इति ।
इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि उल्टे मार्ग में जाने वाली इस विपरीत बुद्धि को छोड़ दे और सज्जन पुरुषों की बुद्धि रूप दीपक से सब वस्तुओं को ठीक २ रूप में देखे ॥ १७ ॥
- द्विविधमेव खलु सर्व – सच्चासच्च तस्य चतुर्विधा परीक्षा आप्तो-पदेशः प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिश्चेति ॥ १८ ॥
संसार में जो कुछ दीख पड़ता है, वह सब दो प्रकार का है, एक सत् और दूसरा असत् । इस की परीक्षा चार प्रकार से होती है, १. आतोपदेश २. प्रत्यक्ष ३. अनुमान और ४. युक्ति ।
आप्तास्तावत्- रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपो -ज्ञान-बलेन ये ।
येषां कालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ॥ १६ ॥
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अ० ११ ] सूत्रस्थानम १३५
आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् ।
सत्यं वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ २० ॥
जो पुरुष तप और ज्ञान के पल से रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हो चुके हैं, केवल सत्व गुण ही जिन में रह गया है, उनका ज्ञान भूत, भविष्य और वर्त्तमान तीनों कालों में विशुद्ध और कभी भी बाधित नहीं होता । ऐसे पुरुष 'आत ', 'शिष्ट' और 'विबुद्ध' होते हैं, इन के वाक्य विना सन्देह के होते । ये पुरुष सदा सत्य ही कहेंगे, जो पुरुष रजस् और तमस् से रहित हैं वे असत्य कैसे बोल सकते हैं ॥ १६-२० ॥
प्रत्यक्ष का लक्षण--- आत्मेन्द्रिय मनोऽर्थानां संनिकर्षात्प्रवर्तते ।
व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ २१ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( पदार्थ ) इन चारों का एक साथ संयोग होने से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं ॥ २१ ॥
अनुमान - प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते ।
गूढ धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २२ ॥
एवं व्यवस्यन्त्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् ।
बीजात्फलं जातमिव सदृशं बुधाः ॥ २३ ॥
प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण से देखकर तीन प्रकार से कार्य -लिंगानुमान, कारण- लिंगानुमान और कार्य-कारण लिंगानुमान होता है, भूत, भविष्यत् और वत्तेमान इन तीनों समय में परोक्ष का अनुमान किया जाता है । जैसे कि छिपी अग्नि को धुंआ देखकर जानते हैं और गर्भ को देखकर मैथुन कर्म का ज्ञान कर लेते है । इसी प्रकार से अतीत काल का ज्ञान अनुमान से कर लेते हैं और जिस प्रकार बीज को देखकर अनागत फल का अनुमान हो जाता है, जैसा बीज होता है, वैसा ही फल लगता है । इसी प्रकार भविष्य काल का भी अनुमान से ज्ञान करते हैं ॥ २२-२३ ॥
युक्ति- जल-कर्षण- पीजर्तु- संयोगात्सस्य- संभवः ।
युक्तिः षड्धातु -संयोगाद् गर्भाणां संभवस्तथा ॥ २४ ॥
मध्य- मन्थन मन्थान- संयोगादग्निसंभवः ।
युक्तियुक्ता चतुष्पाद संपव्याधि-निबर्हणी ॥ २५ ॥
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१३६ चरकसंहिता [अ० ११ पानी, कर्षण ( हल चलाया हुआ खेत ), बीज और ऋतु इन चारों के संयोग से अन्न उत्पन्न होता है । उत्तम क्षेत्र में समय पर उत्तम बीज पानी से सींचकर बोने से अनाज होता है । इसलिये पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश एवं चेतना इन छः के संयोग से गर्भ का होना सम्भव है; यह युक्ति है । इसी प्रकार ' मथ्य' अरणी का अधः का? (नीचे की लकड़ी), मन्थन ( मथने का डण्डा ) और ( मन्थान ) मथनी चलाने वाला कत्ता, इन तीनों के संयोग से अग्नि उत्पन्न होना सम्भव है । इसी प्रकार चतुष्पाद ( चिकित्सा के चारों अड्ड की ) युक्ति से युक्त सम्पत् रोग को नाश करने वाली है । यदि चिकित्सा के चारों अंग टीक तरह से प्रयुक्त किये जायें, तो रोग मिटना सम्भव है ॥ २४-२५ ॥
बुद्धिः पश्यति या भावान् बहु-कारण -योगजान् ।
युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ २६ ॥
एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्व परीक्ष्यते ।
परीक्ष्यं सदसचैव तया चास्ति पुनर्भवः ॥ २७ ॥
जो बुद्धि बहुत प्रकार के कारणों से उत्पन्न पदार्थोंको ज्ञान के लिए देखती है उस बुद्धि को 'युक्ति' कहते हैं । यह वृद्धि तीनों फालो के विषय को देखती है, इस युक्ति से त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं । यह चार प्रकार की ( आतोपदेश, प्रत्यक्ष अनुमान और युक्ति ) परीक्षा है, इसमे भिन्न और परीक्षा नहीं है । इस चार प्रकार की परीक्षा से
सब कुछ सत् असत् भाव, अभाव जो कुछ क्षेत्र है, नह सब जाना जाता है ।
सत् असत् की परीक्षा करके ही जाना गया है कि पुनर्जन्म होता है । २६-२७ ॥
तत्राss तागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदार्थादविपरीतः परी- क्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रह-प्रवृत्तः शास्त्र-वादः स चाऽऽप्तागमः । आप्तागमादुपलभ्यते --दान-तपोयज्ञ-सत्याहिंसा ब्रह्मचर्याण्यभ्युदय -नि:-श्रेयस-कराणीति । न चानतिवृत्त सरव दोषाणामदोपेर पुनर्भवो धर्मद्वारेषु. पदिश्यते । धर्मद्वारावद्दितेश्च व्यपगत- भय -राग -द्वेष -लोभ -मोह -मानैर्ब्रह्म-परैरामैः कर्मविद्भिरनुपहत सत्त्व-बुद्धि-प्रचारेः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्य-चक्षुभिर्होपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ॥ २८ ॥
आप्त पुरुषों का आगम वेद ( ऋग्, यजुः साम और अथर्व ) हैं । वेदों के सिवाय और भी कोई अन्य जो कि वेद के अर्थ के अनुकूल, परीक्ष से बनाया हुआ शिष्ट पुरुषों से अनुमत, जनसमाज के कल्याण के लिये प्र
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अर्थ ११ ] सूत्रस्थानम् १३७ जो अन्य ज्योतिष, व्याकरण, आयुर्वेद स्मृति आदि हैं, वे भी आसागम अर्थात् शब्द प्रमाण हैं । आप्तागम से भी जाना जाता है कि ज्ञान, तप ( द्वन्द्व-सहि- ष्णुता ), यश ( अग्निहोत्रादि ), सत्य अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि कर्म अभ्युदय ( इस लोक में कल्याण ) और निःश्रेप ( परलोक में मङ्गल ) करने वाले हैं । मनोदोष, रज और तम जिन के शान्त नहीं हो गये उन रजोगुणी या तमो- गुणी पुरुषों की अपुनर्भव नहीं कहा गया, अर्थात् रजोगुणी या तमोगुणी पुरुषों का पुनर्जन्म होता है । ऐसा धर्म शास्त्रों में उपदेश किया गया है । धर्मशास्त्रों में सावधान, राग, मोह, द्वेष, भय, लोभ, मोह, मान से रहित, ब्रह्मचारी, आत विद्वान्, कर्म योग को जानने वाले, जिन के मन, बुद्धि एवं प्रचार ( व्यवहार) ठीक बने हुए हैं, ऐसे अति प्राचीन महर्पियों ने दिव्य चक्षुओं से देखकर निश्चयपूर्वक पुनर्जन्म का उपदेश किया है, इसलिये उनका निश्चय सत्य करके जाने ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते-मातापित्रोर्विसदृशान्यपत्यानि तुल्यसंभ- वानां वर्ण-स्वराकृति स्व. बुद्धि-भाग्यविशेषाः प्रवरावर-कुल-जन्म, दास्यैश्वर्यम, सुखासुखमायुः, आयुषी वैपम्यम्, इहा कृतस्यावाप्तिः, अशि क्षितानां च रुदित-स्तन- पान-हास-प्रासादीनां च प्रवृत्तिः, लक्षणोलत्तिः, कर्मसामान्ये फलविशेषः, मेधा क्वचित्कचित्कर्मभ्यमेधा, जातिस्मरणम्, इहाऽऽगमनमितश्च्युतानां च भूतानां समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ॥२६॥
प्रत्यक्ष से भी जाना जाता है कि पुनर्जन्म है, माता पिता से विभिन्न प्रकृति के पुत्र ( रूरवान् माता पिता का काला पुत्र ) होते हैं । एक ही माता पिता के दो पुत्रों में युगे भाइयों ने रंग, स्वर, आकृति, चेहरा, मन, ज्ञान और भाग्य, प्रारब्ध भिन्न होते हैं. श्रेष्ठ और नीच कुल में जन्म होते हैं । किसी की दासता और किसी की ऐश्वर्य सम्पत्ति होती है, कोई सुख पूर्वक जिन्दगी बसर करता है, कोई दुःख से जीवन व्यतीत करता है, आयु की विषमता, थोड़ा जीना या अधिक देर जीना, यहां किए कर्म का फल न मिलना, पढ़े सोखे विना ही रोने, दुग्ध पान ( स्तन्य पान ), हँसने डरने आदि कार्यों में प्रवृत्ति का होना, शरीर पर राज्यचिह्न या दारिद्रयसूचक चिह्नों का होना, एक सहश काम करने पर भी फल में भिन्नता का रहना, कहीं पर बुद्धि का होना और " पर बुद्धि का न होना, जाति, पूर्व जन्म वृत्तान्त का स्मरण करना, यहां मरने पर फिर यहां आना, एक समान एक दृष्टि से देखने पर प्रिय एवं य, राग-द्वेष बुद्धि का उत्पन्न होना ये सब बातें पुनर्जन्म को सिद्ध करती हैं ।
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चरकसंहिता ६०१ १३८ अत एवानुमीयते -यत्स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पोर्वदेहिकं
दैवसंज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्येतत्फलम्, इतश्चान्यद्भविष्यतीति ।
फलाद्बीजमनुमीयते फलं च बीजात् ॥ ३० ॥
उपरोक्त बातों को देखकर ही अनुमान भी किया जाता है कि अपना किया हुआ कर्म नहीं छोड़ा जा सकता, उसका विनाश नहीं हो सकता, पूर्व जन्म में किया हुआ 'भाग्य' नामक आनुबन्धिक अर्थात् आत्मा के साथ परलोक में भा निश्चित रूप से बँधा हुआ है । उसी का यह फल है जो कि माता पिता से पुत्र भिन्न प्रकृति के उत्पन्न होते हैं इत्यादि । यहां किये कर्म से दूसरा जन्म होगा, बीज से फल का अनुमान होता है, कर्म से पुनर्जन्म का और पुनर्जन्म से कर्म का अनुमान होता है ॥ ३० ॥
युक्तिश्षा - पड़धातुसमुदायाद् गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात् क्रिया, कृतस्य कर्मणः फलं नाकूनस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात, कर्म-सदृशं फलं नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिरिति युक्ति: ॥ ३१ ॥
युक्ति भी है कि- पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश और चेतना इन छः धातुओं के समुदाय मिलने से गर्भ उत्पन्न होता है और कर्त्ता और करण ( साधन ) के मिलने से क्रिया उत्पन्न होती है, कर्त्ता आत्मा, करण स्त्री पुरुष उनके संयोग से गर्भाशय रूप क्षेत्र में जन्म होता है किये हुए हो कर्म का फल होता है, न किये हुए कर्म का फल नहीं होता । जिस प्रकार बिना बीज
के अंकुर उत्पन्न नहीं होता वेसे कर्म के अनुसार समान ही फल मिलता है।
यथा—एक जाति के बीज से दूसरी जाति का फल उत्पन्न नहीं होता ॥ ३१ ॥
एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भवे धर्मद्वारेष्ववधीयेत, तद्यथा-गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रिया यामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽ-तिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यनसूयायां देहवाङमानसे कर्मण्य-क्लिष्टे देहेन्द्रिय मनोऽर्थ- बुद्धयात्म- परीक्षायां मनः समाधाविति यानि चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्ग्याणि वृत्तिपुष्टि. कराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुम्, तथा हि कुर्वन्निह चंव यशो लभते प्रेत्य च स्वर्गमिति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति ॥ ३२ ॥
इस प्रकार आप्तोपदेश. प्रत्यक्ष, अनुमान और युनि चारों प्रमाणों द्वारा पुनर्जन्म के सिद्ध होने पर धर्म-साधन के मार्गों में चित्त लगावे । यथा-स माता, पिता, आचार्य की सेवा, अध्ययन- पठन में, ब्रह्मचर्य काय, मन, वा से मैथुन त्याग, ब्रह्मचर्य्यपालन, विवाह कर्म में, सन्तानोत्पत्ति, आश्रित जन्
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अ० ११ ] सूत्रस्थानम १३६ के पोषण में, अतिथि सत्कार में यथाशक्ति छान देने में दूसरे के धन को न चाहने में, द्वन्द्व सुख-दुःख सहने में, दूसरे के गुणोंमें दोष न देखने में, शरीर को विना कष्ट पहुँचाये शरीर, वाणी और मन स कर्म करने में, देहपरीक्षा में, इन्द्रिय परीक्षा, मन परीक्षा, विषय की परीक्षा, ज्ञान की परीक्षा, आत्म परीक्षा, और मन की समाधि ( चित्तवृत्तिनिरोध ) में मन का लगाना ही धर्म मार्ग है । और भी दूसरे इसी प्रकार के कर्म, सज्जनों से अनिन्दत, पूजित, स्वर्ग मुख को देने वाले, जीवन पालन करने वाले हों, उनको करने का उद्योग करे, ऐसा करने पर इहलोक में यश मिलता है और मरने पर स्वर्ग अथात् पुनर्जन्म मे सुख मिलेगा, इस प्रकार से तीसरी परन्दोकैषणा भी कह दो ॥ ३२ ॥
अथ खलु त्रय उपस्तम्भाः, त्रिविधं बलम्, त्रीण्यायतनानि, त्रयो रोगाः, त्रयो रोगमार्गाः, त्रिविधा भिपजः, त्रिविधमौषधमिति ॥ ३३॥
तीन प्रकार के उपस्तम्भ अर्थात् शरीर को धारण करने वाले तत्र हैं, तीन प्रकार के बल हैं, तीन कारण हैं । तीन प्रकार के रोग हैं, तीन रागमार्ग हैं, तीन प्रकार के चिकित्सक हैं, तीन प्रकार की औपन हैं ॥ ३३ ॥
त्रय उपस्तम्भा इति-आहारः, स्वप्नो, ब्रह्मचर्यमिति । एभिस्त्रिभिर्यु-क्तियुक्तैरुपस्तब्धमुपस्तम्भैः शरीरं बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्त्तते याव दायुः -संस्कारात् संस्कारमहितमनुपसेव मानस्य, य इहैवोपयते ॥ ३४॥
तीन उपस्तम्भ तत्व जो शरीर को धारण करते हैं, आहार, स्वप्न और ब्रह्मचर्य हैं । ये तीनों की युक्ति पूर्वक प्रयुक्त करने पर शरीर दृढ़, मजबूत बल, वर्ण, पुष्टि से युक्त होता है, जब तक शरीर में धर्माधर्म आयु के बनाने में कारण रहते हैं । इन तीनों उपस्तम्भों का उचित मात्रा में सेवन करना ही आयु का कारण है | अहित वस्तुत्रों का सेवन न करना ही आयु में कारण है, उन अहित वस्तुवों को यहीं पर कहेंगें ॥ ३४ ॥
त्रिविधं बलमिति सहजं कालजं युक्तिकृतं च । तत्र सहजं यच्छरी-रसत्त्वयोः प्राकृतम्, कालकृत मृतुविभागजं वयःकृतं च, युक्तिकृतं पुन- स्तद्यदाहारचेष्टायोगजम् ॥ ३५ ॥
तीन प्रकार का बल है – -सहज, कालजन्य और युक्तिजन्य, इन में उत्पत्ति समय ही शरीर और मन को गर्भाशय में मिलता है जो बल उसे सहज या प्रकृतिक बल कहते हैं । कालजन्य ऋतुओं के विभागानुसार आहार-विहार के द्वारा और बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था में उत्पन्न बल । यौवनावस्था में बला-
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१४० चरकसंहिता [ अ० १६ धिक्य रहता है । बलकारक आहार या चेष्टा विहार से जो बल उत्पन्न किया जाता है वह युक्तित है ॥ ३५ ॥
यातनानीति अर्थानां कर्मणः कालस्य च।तियोगायोग-मिध्या- योगाः । तत्रातिप्रभावनां हयानामतिमात्रं दर्शनमनियोगः, सर्वशोऽ- दर्शनयोगः, अतिसूक्ष्मातिश्लिष्टानिविप्रकृष्टरोड-भैरवद्धन द्वि - बीम- स-विकृतादि-रूप-दर्शनं मिथ्यायोगः । तथाऽनिमात्र स्तनित-पटहोल- प्रादीनां शब्दानामतिमात्रं श्रवणमतियोगः, सर्वोऽश्रवणमयोगः, पर- पेट विनाशोपघात घर्षण भीषणादि शब्दश्रवणं मिथ्यायोगः । तथाऽ- तितीक्ष्णादिनां गन्धानामतिनात्रं प्रागमनियोगः सर्वशोऽघा योग: पूर्ति द्विमेध्य-क्लिन्न- विप-पवन -कुणप गन्धादि घ्राणं मिथ्या- योग:, तथा रसानामत्यादानमतियोगः, अनादाननयोगः मिथ्यायोगो राशि- वयेवादार विधि-विशेषायतनेपूपदेक्ष्यते; तथाऽ तशीतोष्णानां स्पृश्यानां स्नानाभ्यङ्गात्सादनादीनां चात्युपसेवनमतियोगः, सर्वशाऽनुप- सेवनमयोगः,स्नानादीनां शीतोष्णादीनां चस्यानामनानुपूर्योपसेवनं विषम-स्थानाभिघाताशुचि- भूत संस्पर्शादयश्चेति मिश्रयायोगः ॥ ३६ ॥
रोग के आयतन अर्थात् कारण तीन हैं, अर्थ, अर्थात् इन्द्रियों के विषय कर्म और कार इन तीनों का अतियोग, अयोग और मिथ्यावंग ये तीन रोगों के ' आयतन' हैं । बहुत चमकने वाले पदार्थ सूर्य आदि का देर तक देखना चन्तु इन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा ही न देखना ' योग' है । बहुत क्लेशदायक पदार्थ का देखना बहुत दूर की वस्तु को देखना, रोद्र, भयानक-डरावनी, अद्भुत, अप्रिय बीभत्न और विकृत रूपों को देखना, आँख का 'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार बादल कीघरघराहटकी अधिक सुनना, ढोल या नगाड़े की आवाज को बहुत सुनना, तो आदि के बहुत ॐ शब्द को अधिक सुनना, कान का 'अतियोग' है । सर्वथा न सुनना 'अयोग' है । कठोर, पुत्र धन आदि इष्ट वस्तुओं के नाश को सुनना, इष्ट वस्तु के मरण को सुनना, दुर्व-चन, तिरस्कार सुनना, भयोत्पादक भयानक शब्दों का सुनना, आंत्रेन्द्रिय का 'मिथ्यायोग' है । अति तत्र ( मरिच आदि ) गन्ध का सूचना, उम्र, चमेलो आदि गन्ध का अधिक सूचना, माल कंगनी आदि गन्ध का अधिक मात्रा में सूंघना, नासा का 'अतियोग है । सर्वथा न सूंघना नाक का 'अयोग' है, सड़ी- दुर्गन्धयुक्त, गली की अपवित्र जहरीली वायु, मुर्दे की गन्ध जैसी वस्तुओं को सूंघना नाक का 'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार मधुर आदि रसों का अधिक
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अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४१ मात्रा में उपयोग रसनेन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा रसों का न खाना अयोग है । आगे विमान स्थान ( अ० १ ) में कहे हुए प्रकृति, करण, संयोग, देश, काल, उपयोग, संस्थापयोक्त और राशि इन आठ में से राशि को छोड़कर शेष सात के विरुद्ध आहार करने का नाम रसनेन्द्रिय का 'मिथ्यायोग' है । बहुत ठण्डे बहुत गरम स्पर्श, बहुत अधिक स्नान, बहुत मालिश, बहुत उबटन लगाना, स्व -इन्द्रिय का 'अतियोग है । इनके बिल्कुल सेवन न करना ' अयोग' है, ऊंचे नीचे स्थान का, चीट घाव आदि और शत्र आदि अपवित्र वस्तुओं का स्पर्श करना 'मिथ्यायोग' है ॥ ३६ ॥
तकं स्पर्शनेन्द्रियमिन्द्रियाणामिन्द्रियव्यापकं चेतः, समवायि स्प- नव्याप्यमपि च चेतः, तस्मात्सर्वेन्द्रियाणां व्यापकस्पर्शकृतो यो भावविशेषः सोऽयमनुपशयात्पञ्चविधस्त्रिविध विकल्पो भवत्यसात्म्येन्द्रि यार्थसंयोगः; सात्म्यार्थी पशयार्थः ॥ ३७ ॥
इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से एक स्पर्शन (त्वचा ) इन्द्रिय शेष घाण, रसना, चक्षु और कर्ण इन चार इन्द्रियों में और गुदा, लिंग, हाथ, पैर और वाणी में भी व्यापक हैं और यह गूदन्द्रिय मन के साथ समवाय सम्बन्ध से संयुक्त है, इसलिये त्वग् इन्द्रिय सब इन्द्रियों में फैली होने से और चित्त का इस त्वगिन्द्रिय के साथ समवाय सम्बन्ध होने से मन भी व्यापक हो जाता है । इसलिये सब इन्द्रियों में व्यापकस्पर्शेन्द्रिय के साथ समवाय सम्बन्ध से जुडा हुआ मन, आत्मा के अभीप्सित विषय को ग्रहण करने के लिये सर्वेन्द्रिय द्वारा प्राप्त मार्ग से, उस विषय को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय तक पहुंच जाता है । इस से सब इन्द्रियों में व्यापक त्वक् के स्पर्श से उत्पन्न जो अपने अपने विषय के ज्ञान विशेष उत्पन्न होते हैं, वे शरीर के अनुकूल न होने पर, पांच प्रकार के होने पर भी तीन प्रकार होते हैं । यथा ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग ' अर्थात् इन्द्रियों का विषय के साथ अनुचित रूप से संयोग होना अतियोग, अयोग और मिथ्या-योग इन तीन प्रकार का हो जाता है । सात्म्य का अर्थ उपशय है, शरीर के जो अनुकूल पड़े वह 'सात्म्य' हे ॥ ३७ ॥
कर्म वाङ्मनः शरीर प्रवृत्तिः । तत्र वाङ्मनःशरीरातिप्रवृत्तिरति- गः, सर्वशोऽप्रवृत्तिरयोगः, वेग-धारणोदीरण-विषम- स्खलन -गमन-प- नाङ्ग प्रणिधानाङ्ग प्रदूषण प्रहार-मर्दन-प्राणोपरोध -संक्लेशनादिः शा-मेरो मिथ्यायोगः । सूचकानृताकाल- कलहाप्रियाबद्धानुपचार- परुष- बच-
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१४२ चरकसंहिता [अ० ११ नादिर्वाङ्मिथ्यायोगः । भय-शोक-क्रोध -लोभ -मोह-मानेर्ष्या-मिथ्यादर्श- नादिर्मानसो मिथ्यायोगः ॥ ३८ ॥
वाणी मन और शरीर इन की चेष्टा का नाम 'कर्म' है, इन में वाणी, मन और शरीर की अतिप्रवृत्ति का नाम ' अतियोग' है । इन को सर्वथा प्रवृत्ति न होना ' अयोग ' है । वाणी, मल-मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना, अनुपस्थित air को बलपूर्वक बाहर निकालना, सम स्थान पर विषम ( टेढ़ा- मेढ़ा ) गिरना, अनुचित रूप से चलना, ऊंचे स्थान से कूदना, अंगों को टेढ़ा- मेढ़ा करना, अंगों को पीड़ित करना, खुजाना. दबाना आदि, अङ्गों पर दण्ड आदि से प्रहार करना, अङ्गों को मर्दन करना, श्वास घोटना, श्वास बन्द करना, मंक्लेश व्रत, उपवास आदि, विषम नृत्य आदि कर्म भी शरीर के 'मिथ्यायोग ' हैं । निन्दा, चुगली, मिथ्या बोलना, बिना समय के बात करना, झगड़ा करना, जीको दुःखाने वाला अप्रिय, असम्बद्ध, प्रतिकूल और कर्कश बोलना, वाणी का 'मिथ्यायांग' है । भय, शोक, चिन्ता, क्रोध, लोभ, मोह, अज्ञान, मान, अहंकार, ईर्ष्या, मिथ्यादर्शन, नास्तिक्य बुद्धि ये मन के 'मिथ्यायोग ' हैं ॥ ३८ ॥
संग्रहेण चातियोगायोगवजं कर्म वाड-मनः शरीरजम हितमनुप- दिष्टं यत् तच्च मिथ्यायोगं विद्यात् ॥ ३६ ॥ इति त्रिविध-विकल्पं त्रिवि
मेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्येत् ॥ ४० ॥
संक्षेप में- वाणी, मन और शरीर के जो अहितकारी और नहीं कहे हुए कर्म हैं, जिनका अतियोग या अयोग में समावेश नहीं होता, वे सब 'मिथ्या- योग' जानने चाहियें । वाणी, मन और शरीर इनके अतियोग अयोग और मिथ्या- योग को 'प्रज्ञापराध' कहते हैं ॥ ३६-४० ॥ शीतोष्ण -वर्ष- लक्षणाः पुनर्हेमन्त-प्रीष्म-वर्षाः संवत्सरः स कालः । तत्रातिमात्र स्वलक्षणः कालः कालातियोगः, हीन-श्वलक्षणः कालः काला-योग:, यथास्वलक्षण -विपरीतलक्षणस्तु कालः कालमिथ्यायोगः । कालः पुनः परिणाम उच्यते ॥। ४१ ॥ हेमन्त और शिशिर शीत काल, बसन्त और ग्रीष्म उष्ण काल, वर्षा और शरद और वर्षा काल । इस प्रकार से हेमन्त शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शब्द इन छः ऋतओं वाला सम्वत्सर रूप काल, शीत, उष्ण और वर्षा के रूप में तीन प्रकार का है । इन में अपने लक्षणों से अधिक हेमन्त आदि का होत काल का ' अतियोग' है, शीतकाल में बहुत अधिक शीत, ग्रीष्म में'बहुत अधि गरमी, वर्षा काल में बहुत अधिक बरसात पड़ना ये काल के 'अतियोग' है...