चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 161–170

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४६ और हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से कम शीत आदि का होना 'अयोग है । हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना अर्थात् शीतकाल में बारो या गरमी पड़ना, गर्मियों में शीत या वर्षा होना, वर्षा काल मैं शीत या गरमी पड़ना, काल का 'मिश्रयायोग' है । काल का ही दूसरा नाम

'परिणाम' है । ४१ ॥

इत्यसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविध- विकल्पाः कारणं विकाराणाम्, समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति ॥ सर्वेषामेव भावानां भावाभावो नान्तरेण योगायोगातियोगमिथ्या- योगान् समुपलभ्येते । यथास्वयुक्त्यपेक्षिणी हि भावाभावौ ॥ ४३ ॥

ये ऊपर कहे 'असात्म्येन्द्रियार्थ' 'प्रज्ञापराध' और ' परिणाम' ये तीनों अति- योग, अयोग मिथ्यायांग के द्वारा सब रोगों के कारण बनते हैं । इन्द्रियार्थ संयोग, बुद्धि- संयोग और काल-संयोग ये तीनों स्वास्थ्य के कारण बनते हैं । क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में जितने ही पदार्थ हैं, उनके दो ही स्वरूप हैं, एक भाव दूसरा अभाव | अपने स्वरूप में रहने का नाम 'भाव' और अपने स्वरूप में भिन्न दूसरे स्वरूप से रहना 'अभाव' है । ये दोनों ( भाव और अभाव ) काल, बुद्धि और इन्द्रियार्थं संयोग के समयोग, अतियोग, अयोग और मिथ्या- योग के बिना नहींहोते ॥ ४२-४३ ॥ यो रोगा इति-निजागन्तुमानसाः । तत्र निजः शरीरदोष समुत्थ:, आगन्तुर्भूत विष-वाय्वग्नि- संप्रहारादि-समुत्थः, मानसः पुनरिष्टस्या- लाभाल्लाभाच्चानिष्टस्योपजायते ॥ ४४ ॥

रोग तीन प्रकार के हैं, ( १ ) निज जो अपने शरीर में उत्पन्न हैं, ( २ ) आगन्तुज और ( ३ ) मानस । इनमें ( १ ) निज जो शरीर के दोष वात, पित्त, कफ के कारण उत्पन्न होने वाले हैं । ( २ ) आगन्तुज भूत, विष, स्थावर, जंगम विष से जन्य, दुष्ट बायु से, आग से चोट आदि से उत्पन्न होने वाले ( ३ ) इष्ट वस्तु के न मिलने और अनिष्ट वस्तु के मिल जाने से मानस रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ४४ ॥

तत्र बुद्धिमत्ता मानस- व्याधि- परीतेनापि सता बुद्धया हिताहितम- वेत्यावेक्ष्य धर्मार्थकामानामहितानामनुपसेवने हितानां चोपसेवने यत्तितव्यम्, नान्तरेण लोके त्रयमेतन्मानसं किश्चिनिष्पद्यते-सुखं वा खिंवा, तस्मादेतत्वानुष्ठेयं, तद्विद्यावृद्धानां चोपसेवने प्रयतितव्यम्, आत्म- देश-काल- बल- शक्ति-ज्ञाने यथावच्चेति ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 162

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४४ चरकसंहिता [अ० ११ बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि मानस व्याधि के रहते हुए भी लोभ, काम, क्रोध, मोह के विपरीत, उत्तम बुद्धि से हित और अहित कार्यों का विचार करते हुए, धर्म, अर्थ और काम इनके अहितकारक कार्यों को छोड़ने में, तत्पर, एवं धर्म, अर्थ और काम के लिये हितकारी कार्यों को सेवन करने में प्रयत्नवान् रहना चाहिये । क्योंकि संसार में धर्म अर्थ और काम तीनों के बिना मनोजन्य सुख वा दुःख कुछ भी नहीं होता । इसलिये इन ( धर्म, अर्थ और काम ) के हितकारी कार्यों का ग्रहण और अहितकारी कार्यों का त्याग करने में प्रयत्नशील रहना चाहिये, इस के लिये विद्यावृद्ध पुरुषों का सेवन करना चाहिये | आत्म- ज्ञान, देश ज्ञान, काल-ज्ञान, बल-ज्ञान, और शक्ति ज्ञान के लिये उचित रोति से प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४५ ॥

भवति चात्र । मानसं प्रति भैषज्यं त्रिवर्गस्यान्ववेक्षणम् । द्वियसेवा विज्ञानमात्मादीनां च सर्वशः ॥ ४६ ॥ इति ।

और इस प्रसङ्ग में एक इलांक हे औषध धर्म, अर्थ, काम ( त्रिवर्ग ) का सेवन करना, धर्म, अर्थ काम इन को उपदेश करने वाले विद्यावृद्ध पुरुष की सेवा करना, आत्मज्ञान, देश, काल, बड आदि का ज्ञान करना मानस रोगों की औषध हूँ || ४६ ॥ यो रोगमार्गा इति -शाखा, मर्मास्थिसन्धयः, कोष्ठश्च । तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्य रोगमार्गः । मर्माणि पुनर्वस्ति-हृदय-मूर्धादनि. अस्थि-सन्धयाऽस्थि - संयोगाः, तत्रोपनिबद्धाश्च स्नायुकण्डरा, स मध्यमो रोगमार्गः । काष्टः पुनरुच्यते महालोतः शरीरमध्यं महा-निम्नममपकाशयश्चेति पर्यायशब्देस्तन्त्रे, स रोगमार्ग आभ्यन्तरः । ४७| रोगों के तीन मार्ग हैं, जैसे-( १ ) शाखा, ( २ ) मर्म, अस्थि-सन्धियां और ( ३ ) कोष्ठ । इन मे शाखा रक्त आदि छः धातु और त्वचा ये सात बाह्य रोगमार्ग हैं, बस्ति ( मूत्राशय ), हृदय ( दिल ) और शिर, मस्तिष्क एक सौ सात मर्म और अस्थि ( हड्डियां ), सन्धियां ( अस्थियों के जोड़ ), तथा इन में बंधी हुई स्नायु और कण्डरायें ये ' मध्यम रोगमार्ग ' हैं, यह दूसरा मार्ग है । शरीर के बीच में, बड़ा भारी स्रोत, बड़े भारी गढ़े के तुल्य है, इस को आमाशय या पक्वाशय के नाम से कहते हैं, यह तीसरा ' आभ्यन्तर रोगमार्ग' है ॥ ४७ ॥

तत्रगण्ड- पिडकालज्यपची चर्म-कीलाधि मांस -मशक कुष्ठव्यङ्गादः विकारा बहिर्मार्गजाश्च वीसर्प-श्वयथु-गुल्मार्शो विद्रध्यादयः शाखानु सारिणो भवन्ति रोगाः ॥ ४ = ॥

पृष्ठ 163

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्रस्थानम् १४५ ११ ] १० पक्ष-वध-प्रहापतान कार्दित-शोष-राजयक्ष्मास्थि -मन्त्रि शुल-गुदभ्रं- शादयः शिरो-हृद्वस्ति -रोगादयश्च मध्यम-मार्गानुभारिणां भवन्ति गंगाः ॥ तीच्छलमक-विपूचिका-कासश्वास-हिकाऽऽनाहोदर- हायोऽन्नमार्गाश्च वीसर्प-श्वयथु -गुल्मार्शो विद्रध्यादयः काष्ठ- मा- र्गानुमारिणो भवन्ति रोगाः ॥ २० ॥

इन में गण्ड ( शोध, गलगण्ड रोग नहीं ), फुन्सी, अलजी, अग्नी, चर्म, कील, अभिमांस, मशक ( मस्से ), कुष्ठ, व्यंग, और अजगल्लिका आदि रोग 'बद्दिमार्ग' में होते है । वासर्प, सूजन, गुल्म, अर्थ, विद्रधि आदि राग शाखानु- सारी अर्थात् रक्तादि मार्गों के अनुमारी होते हैं । पक्षाघात, मन्याग्रह, अस्तानक अर्दित, शोप, राजयक्ष्मा, अस्थि शून, सन्धिशू, गुदभ्रंश आदि, हिका आदि एवं शिरो रोग, हृदय रोग तथा बस्ति रोग और अण्ड वृद्ध भी ये मध्यम, 'मार्गा- नुसारी' रोग हैं । ज्वर, अनीवार, छर्दि, अनमक, विषूचिका, ( हैजा ) कास, श्वास, हिका, आनाह, उदर, लोहा, आदि रोग 'अन्तर्मार्ग' से उत्पन्न होते हैं । बीसर्प, सूजन, गुल्म, अर्श और विद्रधि जो शाखानुसारी रोग हैं, वे कालानु- सारी होते है, ( रक्तानुसार राग काष्ठानुसारी नहीं हाते और कांष्ठानुसारा रांग शाखानुसारी रांग नहीं होते ) । ४६-५० ॥ त्रिविधाभिपज इति-

भिपद्म वराः सन्ति सन्त्येके सिद्धसाधिताः ।

सन्ति वंद्यगुणयुकाविधा भिषजा भुवि ॥ ५१ ।

भिषकभो तान प्रकार के होते हैं, १. छद्मचर, २. सिद्धसाधित और ३. वैद्य गुणों से युक्त ये तान प्रकार के चिकित्सक इस पृथ्वी पर मिलते हैं ॥ ५१ ॥

वैद्यभाण्डौषधैः पुस्तः पल्लवं रबलाकनैः । लभन्ते ये भिषक्शब्दमज्ञास्ते छद्मचर वैद्या का लक्षण – या औषधियोंप्रतिरूपकाःके ॥ बर्तन५२,॥ पुस्त अर्थात् मिट्टी या लोहे के बने मनुष्य के ढांचे, पुस्तकों, पत्तों को देखने से जो मनुष्य 'भिषकू' शब्द प्रात करते हैं, वे वंद्यों के नकलचा दागों मूर्ख हैं, वे त्याज्य हैं ।५.२ ।

श्री -यशा-ज्ञान-सिद्धानां व्यपदेशाद्विधाः ।

वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः ॥ ५३ ॥

सिद्धसाधत वैय -अन्य स्थान पर चिकित्सा कर्म में यश, ज्ञान, और सफ- ताप्राप्त किये हुए वैद्या के नाम से धोखा करके जो वैद्य बन जाते हैं, उनको

सिद्धाधिक वैद्य समझना । इनको भी छोड़ देना चाहिये ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 164

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४६ चरकसंहिता [ अ० ११

प्रयोग ज्ञान -विज्ञान-सिद्धि-सिद्धाः सुखप्रदाः ।

जीविताभिसरा ये स्युर्वैद्यत्वं तेष्ववस्थितम् ॥ ५४ ॥

सद्वैद्य का लक्षण --औषध का प्रयोग और शास्त्र का ज्ञान, लोक व्यव- हार के जानने, प्रख्यात एवं रोगियों को सुखी करने वाले 'प्राणाभिसर' कहाते हैं । इन्हीं पुरुषों में वैद्य का लक्षण विद्यमान है । उन्हीं को वैद्य कहना चाहिये ॥ त्रिविधमौषधमिति दैवव्यपाश्रयम्, युक्तिव्यपाश्रयम्, सवावज- यश्च । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधि -मणि- मङ्गल- बल्युपहार होम-नि- यम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात तीर्थगमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना । सत्त्वावजयः पुनरहितेभ्यो ऽर्थेभ्यो मनो- विनिग्रहः ॥ ५५ ॥

औषध तीन प्रकार की है— दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय और सत्त्वावजय । इनमें दैव व्यपाश्रय देव अर्थात् ईश्वर पर आश्रित औषध, मन्त्र, औषधि, मणि, मंगल, शुभ कर्म, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्तिपाट, नमस्कार तीथांटन आदि हैं । युक्ति अर्थात् योग पर आश्रित औषध आहार एवं औषध द्रव्यों. दोष नाशक पदार्थों की योजना । सत्त्वावजय - मन को अहितकारक विषयों से रोकना तीसरी प्रकार की औषध है ॥ ५५ ॥

शारीर- दोष प्रकोपे तु खलशरीरमेवाऽऽश्रित्य प्रायशस्त्रिविधमौषध- मिच्छन्ति -अन्तःपरिमार्जनम्, बहिःपरिमार्जनम्, शस्त्रप्रणिधानं चेति । तत्रान्तःपरिमार्जनं यदन्तः शरीरमनुप्रविश्यौषधमाहार-जात -व्याधीन् प्र- मार्ष्टि । यत्पुनर्बहिःस्पर्शमाश्रित्याभ्यङ्ग- स्वेद- प्रदेह- परिषेकोन्मर्दनाद्यैरा- मयान् प्रमार्ष्टि तद्बहिःपरिमार्जनम् । शस्त्रप्रणिधानं पुनश्छेदन- भेदन - व्यध-न- दारण -लेखनोत्पाटन- प्रच्छन-सीवनैषण-क्षार जलौकसश्चेति ॥ ५६ ॥

शरीर के वात, पित्त, कफ इन दोषों के कुपित होने पर शरीर को ही आश्रय करके तीन प्रकार की औषधों का विशेष रूप से व्यवहार करते हैं । जैसे अन्तःपरिमार्जन, बहिःपरिमार्जन और शस्त्र-प्रणिधान । इनमें जो औषध या आहार शरीर के अन्दर घुसकर उत्पन्न हुए रोगों को शान्त करता है वह 'अन्तःपरिमार्जन' है और जो शरीर के बाहर ही त्वचा पर अभ्यंग, स्वेद, प्रलेप, परिषेक, उन्मर्दन ( मालिश ) आदि द्वारा रोगों को शान्त करता है, उसे ' हि परिमार्जन' कहते हैं । छेदन ( दो करना ) भेदन ( आशय के अन्दर घुसना " व्यधन ( आशयों से भिन्न स्थान में मेदन करना ), दारण ( चीरना ), लेखन ( खुरेचना ), उत्पाटन ( उखाड़ना ), प्रच्छन ( शस्त्र आदि से फाड़ना,

पृष्ठ 165

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० ११ ] सूत्रस्थानम १४७ सीवन ( सीना ), एषण ( नाही या गति व्रण को ढूंढना ), क्षार ( द्रव्यों को भस्मकर क्षरण होने वाला सार भाग ), जलौका ( जोंक ) इनके उपयोग की शस्त्र-प्रणिधान कहते हैं ॥ ५६ ॥

प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाऽऽभ्यन्तरेण वा ।

कर्मणा लभते शम शत्रोपक्रमणन वा ॥ ५७ ॥

बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते ।

उत्पद्यमानं प्रथमं रोग शत्रुमवाबुधः ॥ ५८ ॥

अहिं प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते ।

स जातमूला मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः ॥ ५६ ॥

नपीडितस्तुमूढो लभतेमतिं संज्ञांपश्चात्कुरुतेतावद्यावन्नव्याधिनिपीड्यते ॥। ६० ॥

अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींश्चाऽऽहूय भाषते ।

सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्विषगानीयतामिति ॥ ६१ ॥

तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम् ।

कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम् ॥ ६२ ॥

स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जावितम् ।

गोधा लाङ्गूलबद्धेवाऽऽकृष्यमाणा बलीयसा ६३ ॥

तस्मात्प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा ।

भेषजः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ६४ ॥

बुद्धिमान् रोग के होने पर 'बहिःपरिमार्जन' अथवा 'अन्तःपरिमार्जन' या ' शस्त्र क्रिया ' से शान्ति प्राप्त करता है । परन्तु बाल, अनभिज्ञ पुरुष मोह वश अथवा प्रमाद से उत्पन्न होते हुए रोग को पहिले से उसी प्रकार नहीं जानता; जिस प्रकार मूर्ख अपने उत्पन्न होते हुए शत्रु को नहीं पहिचानता । रोग प्रथम सूक्ष्म रूप में होता है, और पीछे बढ़ जाता है । बढ़ने पर इस रोग की जड़ जम जाती है, जड़ पकड़ लेने पर रोग मूढ़ व्यक्ति की आयु और बल दोनों को हर लेता है | जब तक मनुष्य रोग से पीड़ित नहीं होता, तब तक प्रतीकार का विचार नहीं करता और जब दुःखित हो जाता है, तब रोग के निराकरण सोचा करता है । सब पुत्रों, स्त्रियों और जाति सम्बन्धियों को बुला कर कहता कि 'मेरा सर्वस्व देकर भी किसी वैद्य को लाओ' इस प्रकार के रोगग्रस्त, नर्बल, क्षीणेन्द्रिय, दीन, मरणासन्न व्यक्ति की कौन वैद्य रक्षा कर सकता है? वह मूढ रक्षा करने वाले को न पाकर प्राण त्याग देता है, जिस प्रकार पूंछ में

पृष्ठ 166

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४८ चरकसंहिता [ अ० १२ रस्सी से बँधी गोहबलवान पुरुष द्वारा खींचने पर मर जातीहै ऐसे ही वह भी मर जाता है । इसलिये जो व्यक्ति सुख चाहे वह रोगों के उत्पन्न होने से पूर्वं ( संचयावस्था में, रोगों की तरुणदशा में ) ही दांत्रों का औषधियों से प्रतीकार करे ॥ ५७ ६४ ॥ तत्र श्लोकौ ।

एषणाश्चाप्युपस्तम्भा बलं कारणमामयाः ।

तिस्रेषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥ ६५ ॥

त्रिवेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता । भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ ६६ ॥ इति ।

तिलैषणीय अध्याय में बुद्धिमान् ऋषि कृष्णात्रेयने तीन एषणायें, उपस्तम्भ, बल,, रोगों के कारण, रोगमार्ग, वैद्य, भैषज्य, औषध, इन आठों के तीन तीन मेद कर कल्पना सहित उपदेश किये है ॥ ६५-६६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के तिस्रेषणीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

द्वादशोऽध्यायः ।

अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माssछ भगवानात्रयः ॥ २ ॥

इसके आगे 'बातकला कलाय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ वातकलाकलज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समु-पविश्य महर्षयः पप्रच्छुरन्योन्यं किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपनम्, उपशमनानि वाऽस्य कान, कथं चैनमसंघातवन्तमनवस्थितमनासाथ प्रकोपनप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिता-कुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिःशरीरेभ्यो. बेति ॥ ३ ॥

बायु के अंशांश विकल्पना के सम्बन्ध में महर्षि लोग एकत्र होकर परी एक दूसरे के मत जानने के लिये पूछने लगे कि वायु के क्या गुण हैं वायु को प्रकुपित करने वाले कौन से कारण हैं? कुपित वायु को शान्त करने

पृष्ठ 167

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १४६ वाली कौन सी वस्तुएं हैं? और किस प्रकार से इस अमूर्त, अदृश्य एवं निरन्तर गतिशील, चंचलस्वभाव वायु को विना प्राप्त किये कुपित करने वाली वस्तुएं इसे कैसे कुपित करती हैं, अथवा शान्त करने वाली वस्तुएं किस प्रकार से इस को शान्त करती हैं? और शरीर के अन्दर गति करने वाले एवं लोक में चलने वाले, कुपित एवं अकुपित वायु के शरीर के अन्दर गति करते हुए कौन २ से कर्म हैं, और शरीर के बाहर लोक में गति करते हुए इस के कौन से कर्म होते हैं? ॥ ३ ॥

अत्रोवाच कुशः साङ्कृत्यायनः-रूक्ष- लघु -शीत-दारुण- खर-विशदाः दारुण fe इस, वानगुणाखरप्रसङ्ग, विशदमें भवन्तिये छः साङ्कृत्यायनगुण॥ ४होते॥ हैं कुरा|| ४|| बोले-वायु के रूक्ष, लघु, शीत, तच्छ्रुत्वा वाक्यं कुमारशिरा भरद्वाज उवाच -एवमेतद्यथा भग-बानाह. एत एव वातगुणा भवन्ति स त्वेवंगुणद्रव्येरेवंप्रभावेश्व कर्मभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाध्यासो हि धातूनां वृद्धिकारणमिति ॥ ५ ॥

इस को सुनकर ऋषि कुमारशिरा भरद्वाज बोले- "जिस प्रकार आपने कहा, ठीक इसी प्रकार है । ये रूक्ष आदि छः गुण ही वाय के हैं, इसलिये इन गुणों वाले पदार्थों इन गुण वाले प्रभावों और इन गुण वाले कर्मों के पुनः २ सेवन करने से वायु का प्रकोप होता है । क्योंकि धातुओं के समान गुण वाले पदार्थों व कर्मों के पुनः २ सेवन करने से धातुओं को वृद्धि होती है ” ॥ ५॥

तच्छ्रुत्वा वाक्यं काङ्कायनो बाह्वोकभिषगुवाच -एवमेतद्यथा भगवानाह एतान्येव वानप्रकोपनानि भवन्ति, अतो विपरीतानि खल्वस्य प्रशमनानि भवन्ति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारण-मिति ॥ ६ ॥

इस बात को सुनकर काङ्कायन नाम बाह्लीक ( बलख ) देश के वैद्य बोले-'जिस प्रकार आपने कहा ठीक ऐसा ही है । ये ही कारण वात को कुपित करते हैं । इनके विपरीत स्निग्ध, गुरु, उष्ण, मृदु, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, स्थूल, स्थिर, गुण वाले द्रव्य या इस प्रकार के कर्म इस कुपित वायु को प्रशमन करते हैं । क्योंकि कोपक वस्तुओं के कारणों के विपरीत गुण वाले द्रव्य धातुओं को शान्त करते हैं ॥ ६ ॥

तच्छुत्वा वाक्यं बडिशो धामार्गव उवाच-एवमेतद्यथा भगवा-

पृष्ठ 168

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५० चरकसंहिता [ अ० १२ नाह, एतान्येव वातप्रकोपप्रशमनानि भवन्ति, यथा ह्येनमसंघातनमव- स्थितमनासाद्य प्रकोपप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा तथाऽनु- व्याख्यास्यामः । वातप्रकोपनानि खलु रूक्ष-लघु- शीत- दारुण- ख-र-विशद- शुषिर कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं, गत्वाऽऽप्या- य्यमानः प्रकोपमापद्यते, वातप्रशमनानि पुनः स्निग्ध -गुरूष्ण-श्लक्ष्ण- मृदु-पिच्छिल घन-कराणि शरीराणाम्, तथाविधेषु शरीरेषु वायुरसज्य- मानश्चरन् प्रशान्तिमापद्यते ॥ ७ ॥

कांकायन ऋषि के वचन सुनकर बडिश धामार्गव बोले -– आपने जो कहा सो ठीक ही कहा है । ये ही आपके कहे हुए कारण वायु को कुपित और शान्त करने वाले होते हैं । जिस प्रकार कि इस सूक्ष्म एवं निरन्तर गतिशील वायु को प्राप्त करके ये रूक्ष आदि गुण इस वायु को कुपित करते हैं, तथा शान्त करते हैं इसकी व्याख्या करेंगे । बात को कुपित करने वाले द्रव्य शरीर को रूक्ष लघु ठण्डा दारुण ( कठिन ) खरखरा विशद ( जो चिप चिपा न हो ) और छिद्र युक्त कर देते हैं । रूक्ष लघु आदि शरीर में आश्रय पाकर संचित हुआ वायु प्रकुपित हो जाता है । वात को शान्त करने वाले द्रव्य एवं कर्म शरीर को स्निग्ध, गुरु, उष्ण (गरम), लक्ष्ण, मृदु ( कोमल ), चिपचिपा, तथा गाढ़ा कर देते हैं । इस प्रकार के शरीर में संचार करता हुआ वायु आश्रय न पाकर शान्त हो जाता है ॥ ७ ॥

तच्छ्रुत्वा बडिशवचनमवितथमृषिगणैरनुम तमुवाच वार्योविदो राजर्षिः - एवमेतत्सर्वमनपवादं यथा भगवानाह यानि तु खलु वायोः कुपिताकुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिः शरीरेभ्यो वा भवन्ति तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपमानैः साध- यित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवक्ष्यामः, वायुस्तन्त्र यन्त्र धरः, प्राणोदान- समान- व्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चेष्टानामुश्चावचानां, नियन्ता प्रणेता च मनसः सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियार्थानामभिवोढा, सर्व -शरीर-धातु- व्यूह- करः, सन्धानकरः शरीरस्य, प्रवर्तको वाचः, प्रकृतिः स्पर्श -शब्दयोः, श्रात्रस्पर्शनयोर्मूलं, हर्षोत्साहयायनिः; समीरणोऽग्नेः, दोषसंशोषणः, क्षेप्ता बहिर्मलाना, स्थूलानुस्रातसां भेत्ता, कर्ता गर्भा-कृतीनाम्, आयुषोऽनुवृत्ति-प्रत्यय -भूता भवत्यकुपितः । कुपितस्तु खलु शरीरे शरीरं नानाविधविकाररुपतपति बलवर्ण-सुखायुषामुपघाताय, मनो व्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहन्ति, विनिहन्ति गर्भान् विकृतिमा-

पृष्ठ 169

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१ पादयत्यतिकालं धारयति, भय-शोक -मोह - देन्याविप्रलापाञ्जनयति, प्राणवरुणद्धि । प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा- धरणीधारणं, ज्वलनोज्ज्वालनं, आदित्य- चन्द्र- नक्षत्र ग्रह गणानां सन्तान-गति-विधानं सृष्टिश्व मेधानां, अपां च विसर्गः, प्रवर्तनं स्रोतसां, पुष्पफलानां चाभिनिर्वर्तनम् उद्भेदनं चोद्भिदानां ऋतूनां प्रविभागः, विभागों धातूनां धातुमानसंस्था नव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः, शस्या-भिवधनमविक्लेदोपशोषणेऽवैकारिक विकाराश्चेति । प्रकुपितस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा- उत्पीडनं सागराणां, उद्वर्तनं सरसां प्रतिसरणमापगानाम्, आकम्पनं च भूमेः, आधमनमम्बुदानां शिखरिशिखरावमथनं, उन्मथनमनाकद्दानां, नीहार-निर्ह्राद-पांसु -सिकता मत्स्य भेकारग क्षार रुधिराश्माशनि-विसर्गः व्यापादनं च षण्णामृतूनां शस्यानामसंघातः, भूतानां चापसर्गः, भावानां चाभावकरणं, चतुर्युगान्तकराणां मेघ-सूर्यानलानिलानां विसर्गः । स हि भगवान् प्रभवश्चाव्ययश्च भूतानां भावाभावकरः, सुखा-सुखयविधाता, मृत्युः, यमो, नियन्ता, प्रजापतिः, अदितिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः, सर्वगः, सवतन्त्राणां विधाता, भावानामणुर्विभुर्विष्णुः, कान्ता लोकानां वायुरेव भगवानिति ॥ ८ ॥

शि के सत्य एवं ऋषियों के अनुमोदित उस वचन को सुन कर राजर्षि वायविद ने कहा- आपने जो कुछ कहा है वह सब ठीक ही है, अर्थात् इन नियमों के प्रतिकूल एक भी उदाहरण नहीं है । "अपवाद" का अर्थ निन्दाभी होता है । अभिप्राय यह है कि सब ऋषियों का इस विषय में एक ही मत है । कुपित तथा शान्त हुये शरीर में संचार करने वाले एवं शरीर से बाहर संचार करने वाले वायुके शरीर में तथा शरीर से बाहर जो कर्म हैं उनके अवयवों को प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध कर तथा वायु को नमस्कार कर यथाशक्ति कहूँगा । वायु शरीररूपी यन्त्रों को धारण करने वाला है । 'तन्त्र' शब्द से शरीरस्थ धातुओं के जो अपने - अपने नियम हैं उनसे अभिप्राय है । यन्त्र से अभिप्राय जिसके द्वारा शरीरस्थ धातुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना आदि यापार होता है । अर्थात् तन्त्र ( नियम ) एवं यन्त्र दोनों को धारण करनेवाला है । वायु प्राणादि पांच रूपों वाला है । सम्पूर्ण उच्च या नीच विविध प्रकार की चेष्टाओं का प्रवर्त्तक है, मनका नियामक तथा नेता ( लेजाने वाला ) है ( वायु

पृष्ठ 170

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५२ चरकसंहिता [ अ]० १२ मनको अनिष्ट विषयसे लौटा कर इष्ट विषय में लगाता है ) यही वायु सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों में प्रेरणा करता है । सम्पूर्ण शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों का वहन करने वाला भी वायु हो है । वायु ही शरीरस्थ धातुओं को यथानियम अपने २ स्थलों पर स्थापित करता है । शरीर को जोड़ने वाला भी यही वायु है, वाणी को प्रवृत्त करने वाला, स्पर्श तथा शब्द की प्रकृति ( कारण ) आंत्रेन्द्रिय एवं स्पर्शनेन्द्रिय का मूल कारण वायु ही है । यह वायु हर्ष तथा उत्साह की योनि है ( अभिव्यक्ति) का कारण है । अग्नि का प्रेरक शरीरस्थ दोषों का शोषण करनेवाला | मलोंको बाहर निकालने वाला, स्थल एवं सूक्ष्म स्रोतों को भेदन करने वाला, शरीरात्यत्ति के समय गर्भ की आकृ तियों को बनाने वाला भी वायु ही है । यह वायु आयु के अनुवर्त्तन-परिपालन का कारणभूत होता है । उपर्युक्त सभी कर्म शान्तवायु के कहे गये हैं । शरीर में कुपित हुआ वायु तो शरीर को नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित करता है, जिस से बलवर्णादि क्षीण होता है, मनको दुःखित करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को नष्ट करता है, गर्भ को नाश करता है अथवा जितने काल तक गर्भ को गर्भाशय में रहना चाहिये उससे अधिक काल तक गर्भाशय में ठहराता है । भय, शांक, मोह, दीनता, अतिप्रलाप इनको उत्पन्न करता है और मृत्यु कामी कारण होता है । प्रकृतिस्थ वायु के लोक में संचरण करने से ये कर्म होते हैं, जैसे- पृथ्वी का धारण करना, अग्नि को जलाना, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहों को बराबर नियमपूर्वक गति में रखना, बादलों को बनाना,जलों का छोड़ना, स्रोतों को बहाना फल-फूलों को उत्पन्न करना, वृक्षादि को पृथ्वी से बाहर निकालना( अंकुरित करना), [ ओ का विभाग करना, स्वर्णादि धातुओं का आकार तथा परिमाण को व्यक्त करना, बीजों में अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति पैदा करना, शस्यादि को बढ़ाना, उसे सड़ने तथा सूखने न देना अन्य जो भी प्रकृति कार्य हैं उसे करना, जब यह वायु प्रकुपित हो कर संसार में संचरण करता है तो इससे ये कर्म होते है- समुद्रों को उत्पादन करना, तालाब आदि जलाशय के जलों को ऊँचा- करना ( अर्थात् तट के बाहर जल को निकालना ) नदिओं को विपरीत दिशा में बहाना भूकंप कराना, मेघों का गर्जन कराना,पर्वतों के चांटियों को तोड़ना, वृक्षों को उखाड़ना,नीहार, गर्जन, धूलि. बालू, मछली, मेढक, सांप, क्षार ( राख), रुधिर,छोटे २ पत्थर तथा बिजली को आकाश से गिराना, छहों ऋऋतुओं को नाश करना, अन्नको उत्पन्न न होने देना, प्राणियों को मारना, उत्पन्न हुये वस्तुओं का नाश