चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 171–180

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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अ०१२ । सूत्रस्थानम १५३ Raid An.... करना, चारों युगोंका संहार करनेवाले बादल, सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना इत्यादि होते हैं । वह भगवान् वायु उत्पत्ति के कारण हैं, अविनाशी हैं, एवं प्राणियों का उत्पादक तथा नाशक हैं । सुख एवं दुःख को देने वाला, मृत्यु, यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकर्मा, विश्वरूप सर्वग ( व्यापक ), सम्पूर्ण नियमों, कमों तथा शरीरों को बनाने वाला सभी वस्तुओं का विधाता, सूक्ष्म, व्यापक, विष्णु पृथ्व्यादिलोकों को आक्रमण करने वाला भगवान् वायु ही हैं ॥ ८ ॥

तच्छ्रुत्वा वायविदवचो मरीचिरुवाच यद्यप्येवमेतत्किमर्थ- स्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्य चाधिकृत्येयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ६ ॥

वायविदि के वचन को सुनकर भगवान् मरीचि ने कहा, यद्यपि आपने जो कहा है वह ठीक है तथापि आयुर्वेद में इस विषय को कहना या जानना निष्प्रयोजन है यहां तो वायविद उवाच केवल चिकित्सा- भिषक्सम्बन्धीपवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्र-ही कथा हो रही है ॥ ९ ॥

कारिणमात्यकिं चेन्नानुनिशम्येत्, सहमा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमप्रे- भिरक्षितमभिधास्यति प्रागेवैनमत्ययभयादिति । वायोर्यथार्या स्तुति-रपि भवत्यारोग्याय बलवर्णवृद्धये वर्चस्वत्वायोपचयाय ज्ञानोपपत्तये परमायुःप्रकषाय चेति ॥ १० ॥

वायविद बोले-चिकित्सा शास्त्र में वायु बहुत बलवान्, बहुत कठोर, अति शीघ्रकारी अतिचपल; अति दुःखदायक है, यदि ऐसा ज्ञात न हो तो, सहसा वायु के कुपित होने पर, वैद्य किस प्रकार से उसको बिना जाने पहिले ही इससे बचने को कहेगा । वायु के विषय में यथार्थ रूप में कहना, जानना, स्तुति करना भी आरोग्यलाभ, बल, कान्ति, तेज, शक्ति को बढ़ाने, शान वृद्धि करने और दीर्घतम आयु को प्राप्त करने और बढ़ाने के लिये है ॥ १० ॥

मरीचिरुवाच - अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभा-शुभानि करोति, तद्यथा - पक्तिमपति दर्शनमदर्शनं मात्रामात्रत्वमूष्मणः प्रकृति -विकृति वर्ण शौर्यं भयं क्रोधं हर्ष मोहं प्रसादमित्येवमादीनि पराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥

मरीचि बोले- शरीर में स्थित पित्त के अन्दर पहुंची हुई अग्नि ही कुपितः और अकुपित अवस्था में शुभ एवं अशुभ कर्मों को ( क्रमशः ) करती है ।

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१५४ चरकसंहिता [अ० १२ यथा - कुपित न होने पर पचन क्रिया को ( भ्राजक पिस ), स्वाभाविक रंग को ( रंजक पित्त ), शौर्य, हर्प, प्रसाद प्रसन्नता को( साधक अग्नि ) उत्पन्न करती है । कुपित होने पर, पाचन क्रिया की जड़ता, मन्द दृष्टि, उष्णता को अयोग्य प्रमाण में विकृत वर्ण, भय, कोध, मूर्च्छा उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कुपित और अकुपित अवस्थाओं में पित्त अन्य द्वन्द्वों को भी उत्पन्न करता है ॥ ११ ॥

तच्छ्रुत्वा मरीचिवचः काप्य उवाच सोम एव शरीरं इलेष्मान्त- तः शुभाशुभानि करोति, तद्यथा-दाढ्यं शैथिल्यमुपचयं कार्यमुत्साह- मालस्यं वृषतां क्लीवतां ज्ञानमज्ञानं बुद्धिं माहमेवमादीनि चापरोणि द्वन्द्वानीति ॥ १२ ॥

मरीचि ऋषि के वचन सुनकर काप्य बोले- शरीरस्थ कफ में सोम ( जल तत्व ) पहुंच कर कुपित और अकुपित अवस्था में शुभ एव अशुभ कर्मों को करता है । अकुपित अवस्था मे शरीर की दृढ़ता वृद्धि, कार्यों में उत्साह, पुरुषत्व, ज्ञान, बुद्धि आदि को उत्पन्न करता है । कुक्ति होने पर शरीर का ढीलापन, निर्बलता, आलस्य, नपुंसकता, मूढ़ता मूच्छ आदि उत्पन्न करता है । इस प्रकार कुपित और अकुपित अवस्था मे दूसरे द्वन्द्वों को भी उत्पन्न करता है ॥१२ ॥

तच्छ्रुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-सर्व एव भवन्तः सम्यगाहुरन्यत्रैकान्तिकवचनात् सव एव खलु वातपित्त-श्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमव्यापन्नेन्द्रियं बल- वर्ण -सुखोपपन्नमायुषा महतोपपादयन्त सम्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन महतोपपादयन्ति पुरुषमह चामुष्मिच ठोके, विकृतास्त्वेनं महता विपययेणोपपादयन्त ऋतवस्त्रय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो-पघातकाले इति ॥ १३ ॥

काप्य ऋषि के वचनों को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले- आप सबने जो कुछ कहा वह सब ठीक है । परन्तु आपने जो यह कहा कि अकेला वायु या अकेला पित्त अथवा अकेला कफ ही कुपित और अकुपित अवस्था में सब शुभ- अशुभ कर्म करते हैं ---- यह वचन व्यभिचरित होने से ठीक नहीं है । सब हो वात पित्त कफ ( तीनों ) अकुपित अर्थात् स्वस्थावस्था में प्रकृति मुक्त, स्वस्थ इन्द्रिययुक्त पुरुष को, बल, वर्ण, सुख और दीर्घायुष्य प्रदान करते हैं । जिस प्रकार कि उचित रूप में सेवन किये हुए धर्म, अर्थ और काम पुरुष को

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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १५५ इस लोक में और परलोक में बड़े भारी कल्याण से युक्त करते हैं, जिस प्रकार की विकृत हुई तीनों ऋतुएं ( शीत, ग्रीष्म और वर्षा ) संसार को प्रलयकाल में कष्टों से पीड़ित करते हैं । इसी प्रकार कुपित हुए वात पित्त और कफ पुरुष को बड़े भारी विपरीत बल, वर्ण, सुख से हीन तथा अल्पायु बनाते हैं ॥ १३ ॥

तदृषयः सर्व एवानुमेनिरे वचनमात्रेयस्य भवगतोऽभिननन्दु- श्चेति ॥ १४ ॥

भवति चात्र ।

तदात्रेयवचः श्रुत्वा सर्व एवानुमेनिरे ।

ऋषयोऽभिननन्दुश्च यथेन्द्रवचनं सुराः ॥ १५ ॥

भगवान् आत्रेय के कथन को सब ऋषियों ने अनुमोदन किया । जिस प्रकार कि देवता इन्द्र केवचनों को सराहते हैं, इस प्रकार ऋषियों ने आत्रेय के वचनों की प्रशंसा की ॥ १४-१५ ॥

तत्र श्लोकौ-गुणाः षड्द्विविधो हेतुविविधं कर्म यत्पुनः ।

वाचतुर्विधं कर्म पृथक्च कफपित्तयोः ॥ १६ ॥

महर्षीणां मतिर्या या पुनर्वसुमतिश्च या । कलाकलीये वातस्य तत्सर्व संप्रकाशितम् ॥ १७ ॥ इति ।

वायु के छः गुण, दो प्रकार के कारण कुपित और अकुपित, वायु के नाना प्रकार के कर्म; कफ और पित्त के पृथक् कर्म, महर्षियों एवं पुनर्वसु आत्रेय की संमति, ये सब इस 'वात- कलाकलीय ' अध्याय में सम्पूर्ण रूप में कह दिया । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के वातकलाकलीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इति निर्देशचतुष्कस्तृतीयः ॥ ३ ॥

त्रयोदशोऽध्यायः ।

अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे स्नेह-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जेसा भगवानात्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

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१५६ चरकसाहता [अ० १३

सांख्यैः संख्यातसंख्येयैः सहाss सीनं पुनर्वसुम् ।

जगद्धितार्थं पप्रच्छ वह्निवेशः स्वसंशयम् ॥ ३ ॥

जिन तत्त्वज्ञानी लोगों ने जानने योग्य बातों को भी प्रकार जान लिया था ऐसे मुनियों के साथ बैठे हुए पुनर्वसु आत्रेय से, ऋषि अग्निवेश ने अपने सन्देह को जगत् के कल्याण के लिये पूछा ॥ ३ ॥

यिोनयः, कति स्नेहाः, के च स्नेहगुणाः पृथक् ।

कालानुपाने के, कस्य, कति, काश्च विचारणाः ॥ ३ ॥

कति मात्राः कथंमाना; का च वेषूपदिश्यते ।

aar daal हितः स्नेहः, प्रकर्षः स्नेहने च कः ॥ ५ ॥

स्नेह्या: के के न चस्निग्धाः स्निग्वातिस्निग्धलन्नणम् ।

कि पानात्प्रथमं पीते जीर्णे किं च हिताहितम् ॥ ६ ॥

के मृदु-कर -कोष्ठा का व्यापदः सिद्धयश्च काः ।

अच्छे संशोधने चैव स्नेहूं का वृत्तिरिष्यते ॥ ७ ॥

विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो! ।

स्नेहस्यामितविज्ञान! शास्त्रमिच्छामि वेदितुम् ॥ ८ ॥

स्नेहों के उत्पत्ति स्थान कौन से हैं? स्नेह कितने हैं? पृथक् पृथक् प्रत्येक स्नेह के गुण क्या हैं? प्रत्येक स्नेह का समय, अनुपान क्या है? विचारणाएं कितने प्रकार की हैं! मात्र यें कितनी हैं? उनका परिमाण क्या है? और कौन सा परिमाण किसके लिये कहा गया है? कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी है! स्नेहन में कौन से स्नेह उत्तम हैं? स्नेह के योग्य कौन है? स्नेह के अयोग्य कौन हैं? अस्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण क्या हैं? स्नेहपान से पूर्व क्या पाना और क्या नहीं पीना चाहिये? स्नेह के जीर्ण होने पर क्या पीना हितकारी और क्या अहितकारी है? मृदु, क्रूर, कोष्ठ वाले कौन हैं? स्नेह से कौन से रोग उत्पन्न होते हैं? उनका उपचार क्या है? संशमन, संशोधन और स्नेहन में कैसे बर्ताव से रहें? किन २ पुरुषों में विचारणा किस विधि से प्रयोग करनी चाहिये? हे प्रभो! स्नेह सम्बन्धी अनन्त ज्ञान को जानने को मेरी इच्छा है ॥ ४-८ ॥

अथ तत्संशयच्छेत्ता प्रत्युवाच पुनर्वसुः ।

स्नेहानां द्विविधा सौम्य! योनिः स्थावर-जङ्गमा ॥ ६ ॥

तिलः प्रियालाभिषेक बिभीतकचित्राभयरण्ड-मधूक- सर्षपाः ।

कुसुम्भ -बिल्वारुक- मूलकात स्रो- निकोटकालोड- कर -शिक्षुकाः ॥ १० ॥

पृष्ठ 175

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अ०] १३ J सूत्रस्थानम १५७

स्नेहाश्रयाः स्थावरसंज्ञितास्तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणः ।

तेषां दधि-क्षीर घृनामिषं वमा स्नेहेषु मज्जा च तथापदिश्यते ॥। ११ ॥

अनिवेश के सन्देह को दूर करने वाले भगवान् पुनर्वसु ने उत्तर दिया- स्नेहों के उत्पत्ति स्थान दो प्रकार के हैं; स्थावर और जंगम | इनमे - तिल, पियाल, ( चिरोंजी फल ) अभिपुक ( चिलगोज़ा ), बहेड़ा, चीता, हरड़ बढ़ी, ऐरण्ड, महुवा, सरसों, कुसुम्भ, बेलागरी, मिलवा, मूल्क, अलसी, निकोटक अखरोट, नाटा करंजुआ, सोजन ये स्नेह के स्थावर उत्पत्ति स्थान हैं । मछलियों, मृग ( पशु ), पक्षी एवं उनका दूध, दही, घृत, माँस वसा और मजा ये स्नेह के जंगम उत्पत्ति स्थान कहे हैं ॥ ६-११ ॥

सर्वेषां ते जातानां तिलतल प्रशस्यते ।

बलार्थे स्नेहने चायमंग्डं तु विरंचने ॥ १२ ॥

सपिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहात्तमा मताः ।

एभ्यश्वात्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ १३ ॥

सब प्रकार के तैों में तिल का तेल श्रेष्ठ दे । बल और मृदुता लाने के लिये तिल का तेल सत्र में श्रेष्ठ है और विरेचन के लिये एरण्ड का तैल सर्व- श्रेष्ठ है । सब प्रकार के स्नेहां में घी, तैल, वसा और मज्जा ये चार ष्ठ हैं । इन चारों में भी घी सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि यह अन्य पदार्थों का गुण अपन में देता है ॥ १२-१३ ॥

घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौ जसां हितम् ।

निर्वापणं मृदुकरं स्वर वर्ण प्रसादनम् ॥ ११ ॥

बी बात और पित्त का नाशक है, रस, शुक्र और ओज को बढ़ाता है, बढ़ी हुई उष्णिमा को शान्त करता है, शरीर मे कोमलता पैदा करता है, स्वर और कान्ति को बढ़ाता है ॥ १४ ॥

मारुतनं न च वर्धनं बलवर्धनम् ।

त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तेलं योनिविशोधनम्॥ १५ ॥

तैलवायु नाशक, परन्तु कफ को नहीं बढ़ाता, बलवर्धक, त्वचा के लिये हितकारी, उष्णवीर्य, उष्ण गुण, शरीर को स्थिर ( टिकाऊ ) बनाने वाला एवं स्त्रीजननेंद्रिय ( गर्भाशय ) का शोधन करने वाला है, ( तिल तेल में ये गुण विशेष रूप से हैं ) ॥ १५ ॥

विद्ध-भात भ्रष्ट-योनि -कर्ण-शिरोरुजि ।

पौरुषापचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ॥। १६ ॥

पृष्ठ 176

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१५८ चरकसंहिता [ अ० १३ भाले आदि से बिंधने चोट लगाकर अस्थि आदि के टूटने चोट लगने, योनि की भ्रंशता ( गर्भाशय आदि अंगों की स्थान च्युति ), कर्ण रोग, शिरो रोग, पुरुषत्व बढ़ाने, शरीर को चिकना करने और व्यायाम अर्थात् शारीरिक श्रम में वसा ( चर्बी ) हितकारी है ॥ १६ ॥

बल-शुक्र-रस-लेष्म- मेदो मज्ज -विवर्धनः ।

मज्जा विशेषतोऽस्नां च बलकृत्स्नेहने हितः ॥ १७ ॥

बल, शुक्र, रस, कफ, मेद और मज्जा को बढ़ाती है । विशेषकर अस्थियों की शक्ति बढ़ाती एवं शरीर को चिकना बनाने में विशेष रूप से हितकारी है || १७ ||

सर्पिः शरदि पातव्यं वसा मज्जा च माधवे ।

तैलं प्रावृषि, नात्युष्णशीते स्नेहं पिवेन्नरः ॥ १८ ॥

वातपित्ताधिके रात्रावृष्णे चापि पिवेन्नरः ।

श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेचामलभास्करे ॥ १६ ॥

श्री शरद् ऋतु ( आश्विन कार्तिक ) में चर्बी और मजा वसन्त ऋतु ( फाल्गुन चैत्र ) में और तैल वर्षाकाल ( श्रावण भाद्रपद ) में सेवन करना चाहिये । अति उष्ण काल ( ग्रीष्म ) अथवा आते शीतकाल ( हेमन्त ) में स्नेह नहीं पीना चाहिये । तीव्र व्याधि में, ग्रीष्म ऋतु में, रात्रि के समय; बात और पित्त की अधिकता होने पर स्नेह पी लेना चाहिये । कफप्रधान व्याधि में शीतकाल के अन्दर ( हेमन्त शिशिर ऋतु में ) मध्याह्न समय में दिन के समय स्नेहपान करना चाहिये ॥ १८- १६ ॥

अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपीत्ताधिकेन वा ।

मूच्छ पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत् ॥ २० ॥

शीते रात्रौ पिबेत्स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा ।

आनाहमरुचि शलं पाण्डुतां वा समृच्छति ॥ २१ ॥

जलमुष्णं घृते पेयं, यूषम्तेलेऽनुशस्यते ।

वसामज्योस्तु मण्डः स्यात्सर्वेपूष्णमथाम्बु वा ॥ २२ ॥

वातप्रधान या पित्तप्रधान रोगी ग्रीष्म ऋतु में या दिन के समय यदि स्नेहपान करता है तो मूर्छा, प्यास, उन्माद अथवा कामला रोग उत्पन्न हो जाते हैं । कफप्रधान रोगी यदि शीत ऋतु में या रात्रि के समय स्नेहपान करता है तो उसे अफरा, अरुचि, शूल-पीड़ा या पाण्डुरोग उत्पन्न हो जाता है । घी पीने के उपरान्त गरम जल, तैल के उपरान्त यूष और वसा एवं मजा के

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अ०१३ | सूत्रस्थानम् १५६ उपरान्त मण्ड ( माड ) पीना उत्तम है । अथवा सब ( घी, तेल, वसा और मजा ) के पीछे गरम पानी पीना श्रेयस्कर है ॥ २०-२२ ॥

स्नेह की विचारणाएं- आदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि ।

यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ॥ २३ ॥

सक्तवस्तलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च ।

भक्ष्यमभ्यञ्जनं बतिस्तथा चोत्तरबस्तयः ॥ २४ ॥

गण्डूषः कर्णतेलंच नस्यं कर्णानिम् ।

चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ॥ २५ ॥

स्नेह की विचारणा ( उपयोगप्रयोग विधि ) २४ चौबीस प्रकार की है । जैसे -( १ ) आंदन -चावल पांच गुणे जल में पकाओ, ( २ ) विलेपी अर्थात् दरकच किये चावलों की चार गुणे जल में पकाने से बहुत मांडयुक्त यवागू बनता है ( ३ ) रस ( मांस रस ) ठीक तरह से पका मांस, ( ४ ) यवागू ( दरकच किये चावलों को छः गुणे जल में पकाने से मांड युक्त द्रव हो) | ( ५ ) सूप --दाल को १६ या १४ या १८ गुणे जल में पका कर चतुर्थांश शेष रखे, ( ६ ) शाक, ( ७ ) यूष- अ को दल कर १४ या १८ गुणे जल में पकाने आधा पानी शेष रखे । काम्बलिक, खड, सत्तू, तिलपिष्ट ( तिलकुट या खल ) मदिरा, चाटन, भक्ष्य, ( मालपूआ, पूरणपोळी आदि ), अभ्यंजन मालिश, बस्ति, उत्तर बस्ति, गण्डूष ( गराले ), अर्थात् मुख में तैल का रखना, कान मे तेल डालना, नस्य कर्म, नेत्र के अन्दर स्नेह प्रदान करके आंख की तृम करना, यह स्नेह की चौबीस प्रकार की प्रविचारणा अर्थात् सेवन विधि है || २३-२५ ॥

अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहुर्विचारणाम्।

स्नेहम्य स भिषग्दृष्टः कल्पः प्राथमकल्पिकः ॥ २६ ॥

शुद्ध स्नेहपीने को 'विचारणा' नहीं कहते । यह तो स्नेह का सर्व प्रथम श्रेष्ठ रूप है । इसके पीछे प्रकृति, देह, दोष आदि देखकर पाचन शक्ति की विवेचना करके ओटन आदि सेवन विधि करनी चाहिये ॥ २६ ॥

रसञ्चापहतः स्नेहः समास व्यास-योगिभिः ।

षड्भषिष्टिषा संख्यां प्राप्नोत्येकच केवलः ॥ २७ ॥

एवमेषा चतुःषष्टिः स्नेहानां प्रविचारणाः । * प्रविचार्यत अवचार्यतेऽनुकल्पेनीपयुज्यतेऽनयेति प्रविचारणा ।

पृष्ठ 178

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१६० चरकसंहिता [ अ० १३ ओकर्तु व्याधि-पुरुषान् प्रयोज्या जानना भवेत् ॥ २७ ॥

छःरसों ( मधुर अम्ल लवण, तिक्त, कटु ओर कषाय ) के परस्पर मिलने से ६३ प्रकार के मंद हो जाते हैं । इन तिरसउ भेदों के साथ जब स्नेह मिलता है, तो वह भी ६३ प्रकार का हो जाता है और जब किसी भी रस के साथ न मिलकर शुद्ध स्नेह रूप में ही रहता है, तब एक भेद होता है । इस एक प्रकार को भी मिलाकर स्नेह के ६४ प्रकार हो जाते हैं । इस प्रकार से स्नेह की विचारणा अर्थात् सेवन विधि ६४ ( चौंसठ ) प्रकार की है । ( ओक ) सात्म्य, ऋतु और रोग वल आदि का विचार करके सेवन विधि का प्रयोग करना चाहिये || २७-२८ ॥

स्नेह की मात्रा- - अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते ।

प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रा जर प्रति ॥ २६ ॥

इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्रा स्नेहस्य माननः ।

वास प्रयोगान्वक्ष्यामि पुरुषं पुरुषं प्रति ॥ ३० ॥

स्नेह की मात्रा तीन प्रकार की है । प्रधान, मध्यम और हस्त्र । इनमें जो स्नेह की मात्रा रात और दिन ( २४ घण्टे ) में जीर्ण होती है, वह स्नेह की प्रधान मात्रा है और जा सारे दिन भर ( १२ घण्टे ) में जीर्ण होती है वह मध्यम, और जो आवे दिन ( ६ घण्टे ) में जाण होती है वह स्नेहकी इस मात्रा है । ये मात्राएं स्नेह के ज्ञाण होने के समय के अनुसार हैं । इस प्रकार - से स्नेह की मात्रा और मान कह दिया है ॥ २६-३० ॥ अत्र प्रत्येक पुरुष के लिये स्नेह के प्रयोगों को कहते हैं- प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासासहा नराः । पात्र कश्चोत्तमवलो येषां ये चोत्तमा बले ॥ ३१ ॥

गुल्मिनः सर्पदशश्च विसर्पोपहताश्च ये ।

उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चत एव च ॥ ३२ ॥

पित्रेयुरुत्तमां मात्र, तस्याः पाने गुणान् शृणु विकारान् शमयत्येषा शीघ्रं सम्यक्प्रयाजिता ॥ ३३ ॥

दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी ।

बल्या पुनर्नत्रकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥ ३४ ॥

“तके कपित्थनाङ्गेरोमरिचा जाजिचित्रकैः । सुरकः खण्डयूपोऽयं काम्बलिको मतः ॥ दयम्को लवण -स्नेह- तिलमाषान्वितः शृतः ॥ "

पृष्ठ 179

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सूत्रस्थानम् १६१ अ० १३ ] ११ " जो मनुष्य नित्य प्रति विशेष रूप में स्नेह का व्यवहार करते हैं, भूख और प्यास को न सहन कर सकने वाले, उत्तम बलवान् जठराग्नि वाले, श्रेष्ठ शारीरिक बल वाले, गुल्मरांगी, सर्पविषाक्रान्त रोगी, बीसर्व रोगी, पागल, मूत्रकृच्छ्र रोगी और जिनका मल सूखा रहता है, वे स्नेह की उत्तम मात्रा का पान करें । स्नेह की प्रधान मात्रा के पीने का गुण सुनो-यदि मात्रा को भली प्रकार से प्रयोग किया जाये तो उपरोक्त समस्त रोग मिट जाते हैं । वह शरीर के दोषों को खींच कर बाहर कर देती है, शरीर के सब भागों में ऊपर, नांचे, तिरछे सब जगह फैल जाती है । वह बलवर्द्धक एवं शरीर, इन्द्रिय और चिस को फिर से हरा भरा बना देती है ॥ ३१-३४ ॥

मध्यम मात्रा - अरुका स्फोट-रिडका- कण्डू-पामाभिरर्दिताः ।

कुष्ठिश्च प्रमीढाच वातशाणितिकाश्च ये ॥ ३५ ॥

नातित्राशिनश्चैव मृदुकाष्ठास्तथंच च ।

पिबेयुमध्यमां मात्रां मध्यमाश्चापि ये बले ॥ ३६ ॥

मात्रषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी ।

सुखे न च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ॥ ३७ ॥

गांठें, फोड़े, फुन्सियां, खाज, पामा, कुष्ठरोगी, प्रमेही, अतिमूत्ररोगी, वातरक्तरोगी, अधिक न खाने वाले, न कम खाने वाले, मृदुकाष्ठ वाले, : ( जिनको दूध से भी विरेचन हो जाता है ), और मध्यम बल वाले व्यक्ति स्नेह की मध्यम मात्रा का पान करें । यह मध्यममात्रा मृदु- विरेचक, थोड़ा कष्ट करने वाली, एवं बल को बहुत नहीं घटाती, सुखपूर्वक सरलता से शरीर को कोमल कर देती है, इसीलिये शरीर को शोधन करने के लिये हितकारी है ॥ ३५-३७ ॥

ह्रस्व मात्रा - ये'तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः ।

रिक्तका g त्वमहितं येषां मन्दानयश्च ये ॥ ३८ ॥

वरातीसार-कासारच येषां चिरसमुत्थिताः ।

स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बळे ॥ ३६ ॥

परिहारे सुखा चषा मात्रा स्नेहनगृहणी ।

वृष्या मल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ॥ ४० ॥

वृद्ध, बालक, कोमल, नाजुक प्रकृति के, ऐश की जिन्दगी बसर करने

पृष्ठ 180

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१६२ चरकसंहिता [अ० १३ वाले, खाली पेट रहने से जिनके पेट में दर्द होने लगता है, मन्दाग्नि, निर्बल जाठराशि वाले, जिनको ज्वर, अतीसार, कास पुराना बहुत दिनों का हो, और निर्बल, अल्प शारीरिक बल वाले व्यक्ति स्नेह की दस्व मात्रा लेवें । यह मात्रा जीर्ण होने में सरल है, सुखपूर्वक पच जाती है । शरीर को चिकना करती एवं बल बढ़ाती है । पुरुषत्वकारक. बलकारक, निरापद एवं देर तक सेवन व्यवहार में लाई जा सकती है ॥ ३८-४० ॥ कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी है-

वात-पित्त प्रकृतयो वात-पित्त विकारिणः ।

चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ४१ ॥

आयुःप्रकर्षकामाश्च व - वर्ण-स्वरार्थिनः ।

पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ॥ ४२ ॥

दीप्त योज: स्मृति मेधाग्नि-बुद्धीन्द्रिय- बलार्थिनः ।

पिबेयुः सपिरातच दाह-शस्त्र-विषाग्निभिः ॥ ४३ ॥

जिनकी प्रकृति वात-पित्त हो, वात-पित्त के रोगी, उत्तम दृष्टि चाहने वाले. उरःक्षत रोग से क्षीण, निर्बल, वृद्ध, बालक, निर्बल मनुष्य, आयु की वृद्धि की कामना करने वाले, बल, वर्ण, कान्ति, स्वर को चाहने वाले, शरीर पुष्टि के इच्छुक, संतति की चाह वाले, सुकुमारता, कोमलता के इच्छुक, तेज, ओज, स्मृति, बुद्धि, अग्नि, धारण करने की शक्तिऔर इन्द्रिय बल को चाहने वाले और आग, जल, शस्त्र, विष से आक्रान्त रोगी घी का सेवन करें ॥ ४१-४३ ॥

प्रवृद्ध- श्लेष्म-मेदम्काश्चल-स्थूल-गलोदराः ।

वातव्याधिभिराविष्टा वात प्रकृतयश्च ये ॥ ४४ ॥

बलं तनुत्वं लघुतां दृढ़तां स्थिरगात्रताम् ।

स्निग्ध- श्लक्ष्ण-तनुत्वतां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ॥ ४५ ॥

कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडीभिरर्दिताः ।

पिबेयुः शीतले काले तैलं तंलोचिताश्च ये ॥ ४६ ॥

जिनमें कफ की या चर्बी की अधिकता हो, जिनका पेट या गर्दन मोटी और ढीली हो, बात रोगों से पीड़ित, बात प्रकृति के, जो बल, पतलापन, हल्कापन, मजबूती, शरीर की स्थिरता ( संघटन ), चिकनापन, और त्वचा की कोमलता चाहते हैं, कृमिरोग से आक्रान्त, क्रूर कोष्ठ वाले ( जिनको तीव्र , विरेचन से प्रभाव होता है ), नाडीव्रण से आक्रान्त और जिनको तेल सेवन