चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 181–190
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 181–190
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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३ करने का अभ्यास है वे शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ) में दिन के समय तैल का पान करें ||४४-४६॥
वातातपसा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः ।
शुष्क- रेनो धिरा निष्पीत -कफ-मेदसः ॥ ४७ ॥
अस्थि-सन्धि- शिरा-स्नायु मर्म कोष्ठ-महारुजः ।
बलवान्मारुतो येषां खानि चाऽऽवृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥
महच्चाग्निबलं येषां वसा-सात्म्याश्च ये नराः ।
तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते ॥ ४६ ॥
वायु और धूप को सहन करने वाले, रूक्ष प्रकृति, भार के उठाने या मार्ग चलने वाले, परिश्रम के कारण जो निर्बल हो गये, जिनका वीर्य या रक्त सूख गया है; कफ क्षीण हो, मेद क्षीण हो, जिनका अन्धि सन्धि- सेरा, स्नायु मर्म कोष्ठ के भयानक रोग हो, जिनकी इन्द्रियों को बलवान् वायु घेरे रहता है, जिनका अग्निबल जाठराग्नि बलवान् हो, और जो वसा सेवन करने के अभ्यासी हों,ऐसे पुरुष स्नेहन करने के लिये वसा (चबीं ) का पान करें । ४७-४६ ।
दीप्ताग्नयः क्लेशसा घस्मराः स्नेहसेविनः ।
वातार्ताः क्रूर-कोष्टाश्च स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः ॥ ५० ॥
जिनकी जाठराग्नि दीस है, जो क्लेश को सहन कर सकते हों, खूप खाने वाले, स्नेहसेवन के अभ्यासी; वात रोगी और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को मजा द्वारा स्नेहन करना चाहिये ॥ ५ ॥
ये येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः ।
स्नेहनस्य प्रकर्षौ तु सप्तरात्र त्रिरात्रौ ॥ ५१ ॥
जिन जिन पुरुषों के लिये जो जो स्नेह हितकारी हैं, उनके लिये उसी स्नेह का उपदेश किया है । स्नेह की सेवन विधि दो प्रकार की है । एक सात रात की और दूसरी तीन रात की । इनमें क्रूरकोष्ठ व्यक्तियों के लिये सात रात, और मृदुकोष्ठ व्यक्ति के लिये तीन रात # ॥५१ ॥
स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः ।
व्यायाम- मद्य-स्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः ॥ ५२ ॥
स्नेहन के योग्य व्यक्ति -जो व्यक्ति स्वेद देने या संशोधन के योग्य हैं; Gजैसा आगे कहेंगे "त्र्यहावरं सप्तदिनं परन्तु स्निग्धो नरः स्वेदयितव्य दृष्टः । नातः परं स्नेहनमादिशन्ति" ।
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१६४ चरकसंहिता [अ० १३ रूक्षप्रकृति, वातरोगी, नित्य व्यायामसेवी, नित्य मद्यसेवी, नित्य स्त्रीमेवो, और जो चिन्ता ( शोक ) करते रहते हैं; वे व्यक्ति स्नेहन के योग्य हैं ॥ ५२ ॥
स्नेह के अयोग्य व्यक्ति -
संशोधनाते येषां रूक्षणं संप्रवक्ष्यते ।
न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन-कफ-मेदसाम् । ५३ ॥
अभिष्यण्णानन गुदा नित्यं मन्दाग्नश्च ये ।
तृष्णा मूर्च्छा-पताश्च गर्भिण्यस्तालु-शाषिणः ॥ ५४ ॥
अन्नद्विषश्छद्यन्ता जठरानगरादिताः ।
दुबलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ ५५ ॥
न स्नेा वर्तमानेषु न नस्ताच स्तिकर्मसु ।
स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रागाः सुदारुणाः ॥ ५६ ॥
संशोधन किये बिना जिनका रूक्षण करना कहा जायेगा; उनको; जिनका कफ और मेद बढ़ा हो, जिनके नाक, मुख और गुदा से स्राव होता हो, जिनको सदा मन्दाग्नि रहती हो, प्यास और मूच्छों से आकान्त, गर्भवती, तालुकण्ठ जिनका सूखता हो; भोजन से अरुचि करने वाले, वमन करते हुए, उदर रोगी या विष से आक्रान्त दुर्बल, ग्लानि करने वाले ( कच्चे दिल के, घृणा करने की प्रकृति के ), स्नेह के पाने में जो प्रसन्न नहीं होते, घृणा करते हैं और मद ( नशे ) से ग्रस्त व्यक्तियों को और नस्य कर्म एवं अनुवासन बस्ति जिन्होंने ली हो उनकी स्नेहन नहीं देना चाहिये । यदि इनको स्नेह पिलाया जायगा तो भयानक रोग उत्पन्न हो जायँगे । रूक्षण के योग्य-- 'अभिष्यन्दा महादोषा
मर्कस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भ-प्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः ॥ ५३-५६ ॥
अस्निग्ध, स्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण- पुरीषं प्रथितं रूक्षं वायुरप्रगुणो, मृदुः । व्यक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ ५७ ॥
जिसका मल बंधा हुआ, रूक्षता वायु अपनी प्रकृति में न हो, जाठराग्नि मन्द हो, शरीर में कर्कशता रूखापन हो, तो समझे कि स्नेहन- क्रिया ठीक नहीं हुई ॥ ५७ ॥
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ।
मादवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥ ५८ ॥
वायु की अनुकूलता, जठराग्नि को बढ़ना ( भूख का लगना ), मक
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० १३ ] सूत्रस्थानम् १६५ चिकना और पतला, अंगों में कोमलता और चिकनापन हो, तो समझना चाहिये कि उचित रूप में स्नेहन हुवा है ॥ ५८ ॥
पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीपस्यात्रिपक्कता ।
तन्द्रीररुचिरुत्क्लेशः म्यादतिस्निग्धलक्षणम् ॥ ५६ ॥
पाण्डुता ( पीलापन, निस्तेज वर्ण ), शरीर में भारीपन, आलस्य, मल का भली प्रकार पाक न होना, अरुचि, सुस्ती, वमन की इच्छा ये अतिस्निग्ध
के लक्षण हैं । ५६ ॥
द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः ।
नातिस्निग्धमसंकीर्ण: स्नेहं पातुमिच्छता । ६० ॥
पिबेत्संशमनं स्नेहमन्नकाले प्रकाङ्क्षितः । स्नेह से पूर्व लेने योग्य हितकारी पदार्थ --स्नेह पान करने की इच्छावाले व्यक्ति को चाहिये कि स्नेह पाने से पहिले दिन, द्रव, और गरम, जो कफकारक न हो, अतिस्निग्ध, अतिविकार युक्त, असंकीर्ण ऐसे भोजन को मात्रा से खावे, जो दो तीन वस्तुओं को मिलाकर न बनाया गया हो और अगले दिन जब भोजन के समय आकांक्षा हो तब संशमन स्नेह का ही पान करे ॥ ६० ॥
शुद्धर्थं पुनराहारे नशे जीर्णे पिबेन्नरः ॥ ६१ ॥
संशोधन के उद्देश्य से स्नेह पान करने के लिये रात्रि का भोजन जीर्ण होने पर प्रातःकाल स्नेहपान करे ॥ ६१ ॥
उष्णोदकोपचारी स्याद् ब्रह्मचारी क्षपाशयः ।
शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदार्णाश्च न धारयेत् ॥ ६२ ॥
व्यायाममुचैवचनं क्राध -शांको हिमातपौ ।
वर्जयेदप्रवतं च सेवेत शयनासनम् ॥ ६३ ॥
स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च ।
स्नेहमिथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणा गदाः ॥ ६४ ॥
स्नेहनकाल में हित अहित --पीने, स्नान, शौच आदि कार्यों में गरम *पानी का व्यवहार करे, मैथुन को छोड़ दे । रात्रि में सोये, दिन में न सोये रात में न जागे, उपस्थित हुए मल, मूत्र, वायु और डकार के वेगों को न रोके । व्यायाम- श्रम, और जोर से या अधिक भाषण, क्रोध, शोक, सरदी या गरमी न सहे । खुली वायु में वायु के सामने न बैठे और न सोये । स्नेह को पीने के पीछे इन कार्यों का पालन करे । स्नेह पीने के पीछे पुनः स्नेह पान करने पर, स्नेह पीकर भोजन आदि में दूसरी बार स्नेह युक्त पदार्थ खाने से, स्नेह के मिथ्यायोग से भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६२-६४॥
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१६६ चरकसंहिता [अ० १३
मृदुकोष्ठात्रेण नित्यच्छोपसेवया ।
निति क्रूरकोष्टस्तु सप्तरात्रेण मानवः ॥ ६५ ॥
मृदुकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का अच्छपान करके तीन रात्रि तक सेवन करने पर स्निग्ध हो जाता है । क्रूरकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का सात दिन अच्छपान करके स्निग्ध हंता है ॥ ६५ ॥
गुडमिक्षुरसं मस्तु श्रीरमुल्लांडितं दधि ।
पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्य- त्रिफला- रसम्॥ ६६ ॥
द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा ।
मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते ॥ ६७ ॥
गुड़, गन्ने का रस, मस्तु ( दही का द्रव्य भाग ), दूध, बोई हुई दही ( मट्ठा ), खीर,खिचड़ी, घी, गम्भारो का रस, त्रिफला ( हरड़, बहेड़े, आंवले का रस ), अंगूर का रस, पीलू का रम, गरम जल, नवीन मदिरा ( पुरानी नहीं ) इनको पीने से मृदुकोष्ठ, व्यक्तियों को विरेचन हो जाता है । अर्थात् जिनको इन वस्तुओं के सेवन से विरेचन हो जाय, वह मृदु कोष्ठ होता है ।६६-६७।
विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन ।
भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहण्यत्युल्बणानिला ॥ ६८ ॥
इन पदार्थों से 'क्रूरकोष्ठ' वाले व्यक्ति को कभी विरेचन नहीं होता । क्योंकि 'क्रूरकोष्ठ' व्यक्ति की ग्रहणी ( नाही ) अति प्रबल वायुवाली होती है ॥ ६८ ॥
उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता ।
मृदुकोष्ठस्य तस्मात्स सुविरेच्यो नरः स्मृतः ॥ ६३ ॥
मृदुकोष्ठ की ग्रहणी और पित्त प्रबल एवं मन्दकफ तथा अल्पवायु युक्त है । इसलिये गुड़ आदि से उसे विरेचन हो जाता है ॥ ६६ ॥
स्नेह की व्यापत्तियां--
उदीर्णपित्ता ग्रहणी यस्य चाग्निवलं महत् ।
भस्मीभवति तस्याऽऽशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा ॥ ७० ॥
स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली ।
स्नेहाग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्गामुदीरयेत् ॥ ११ ॥
नालं स्नेहसमृद्धम्य शमायान्नं सुगुर्वपि ।
स चेत्सुशीतं सलिलं नाऽऽसादयति दह्यते ॥ ७२ ॥
यथैवाऽऽशीविषः कक्षमध्यगः स्वविषाग्निना ।
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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६७ जिसको ग्रहणी ( अग्नि को अधिष्ठान भूमि ) प्रबल पित्तवाली हो ( कफ और वायु से युक्त न हो ), और जिसका अग्निबल बढ़ा होता है, उस पुरुष का पिया हुआ स्नेह अग्नि के तेज से शीघ्र भस्म हो जाता है । यह मद्दा- बलवान् जाठराग्नि पीये हुए स्नेह को जीर्ण करके फिर बलवान् बनकर ओज को घटाती हुई, उपद्रवों से युक्त प्रबल प्यास को पैदा कर देती है । ऐसी अवस्था में स्नेह के कारण बहुत बढ़ी हुई जाठराग्नि को शान्त करने के लिये गुरु भोजन भी समर्थ नहीं होता । इसलिये स्नेान से प्रबल अग्नि वाले पुरुष को यदि शोतल जल पीने के लिये नहीं दिया जाय तो वह इसी अग्नि से जलने लगता है । जिस प्रकार कि घास फूस या कांटों के बीच में फंसा हुआ सांप अपनी अग्नि रूपो अपने विप से स्वयं जलने लगता है और दुगुने क्रोध से फुंकारें मारता है ॥ ७०-७२ ॥ व्यापत्तियों के उपाय कहते हैं- अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छदयेद्भिषक ॥ ७३ ॥
शीतोदकं पुनः पात्वा भुक्त्वा रूझानमुल्लिखेत् ।
न सर्पिः केवलं पित्तं पेयं साम विशेषतः ॥ ७४ ॥
सर्वानुरजेद्देहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् । यदि स्नेह के पान में अजणावस्था अर्थात् स्नेह के जीर्ण न हुए विना ही प्यास लगने लगे तब वैद्य स्नेह को वमन से बाहर करा देवे । इसके पीछे शीतल जल और रूक्ष भोजन कराके फिर वमन करा देवे । इसलिये केवल पित्त की प्रधानता में, विशेष कर आम सहित पित्त विकार में घी नहीं पीना चाहिये । क्योंकि पित्त के तोक्ष्ण गुणवाला होने से सम्पूर्ण देह में व्यास होने वाला वी रूप स्नेह सारे शरीर में फैल जायगा । शरीर में फैलकर उसको पीला कर देता और चेतना नाश करके प्राण नाश कर देता है ॥ ७३-७४ ॥ तन्द्रा सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसंज्ञता ॥ ७५ ॥
कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोकाशस्य रुचिस्तृषा ।
जठरं ग्रहणादोषः स्तेमित्यं वाक्यनिग्रहः ॥ ७६ ॥
शूलमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नविभ्रमात् ।
तत्राप्युलेखनं शस्तं स्वेदः कालन क्षणम् ॥ ७७ ॥
प्रति प्रति व्याधिवलं बुद्ध्वा स्रंसनमेव च ।
तकारिष्टप्रयोग रूस-यानान्न सेवनम् ॥ ७८ ॥
मूत्राणां त्रिफलायाच स्नेह-व्यापत्ति- भेषजम् ।
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१६० चरकसंहिता [अ० १३ तन्द्रा ( आलस्य), उत्क्लेश ( वमन की इच्छा ), आनाह ( अफ़रा ) ज्वर, स्तम्भ ( शरीर की जड़ता ), संज्ञानाश, कुष्ठ, खाज, पाण्डुता, शोथ, अर्श, अरुचि, प्यास, मरोड़ा, ग्रहणी रोग, स्तैमित्य ( अंगों का गीले कपड़े में लिपटने का सा भान होना, वा ऐंठन ), वाणी का बन्द हो जाना, उदरशूल, आमदोष, स्नेह के मिथ्यायांग के ये लक्षण हैं । इन लक्षणों के होने पर भी वमन कराना चाहिये, स्वेद देना चाहिये, समय की प्रतीक्षा करनी ( स्नेह दोष के क्षय होने तक भोजन नहीं करना ) चाहिये, प्रत्येक व्याधि का बल विचार करके जो व्याधि संधन योग्य हो उसका संसन करना चाहिये । इसी प्रकार 'तारिष्ट' का प्रयोग, रूक्ष ( सूखा ) खान यान देना आठों प्रकार के मूत्रों और त्रिफला का सेवन करना स्नेह जन्य रोगों की चिकित्सा है ॥ ७५०७८ ॥
रोग होने के कारण- अकाले चाहितचैव मात्रया न च योजितः ॥ ७६ ॥
स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः । स्नेह लेने के ठीक समय पर स्नेह न लेने से, जोस्नेह::जिस पुरुष के लिये हितकारी नहीं है उसके सेवन से 3 उचित मात्रा में न लेने से, स्नह के मिथ्या, अनुचित उपयोग से, और स्नेह के अति सेवन से स्नेह जन्य विकार उत्पन्न होते हैं ॥ ७६ ॥
स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ ८० ॥।
स्नेहवद्- द्रवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम् ।
एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत् ॥ ८१ ॥
स्नेह पान के पीछे पुरुष तीन रात तक ठहरे । इन तीन दिनों में स्नेह मिश्रित द्रव, उष्ण मांस रस युक्त भात खाकर विरेचन लेवे । एक दिन जिसने आराम किया ऐसा पुरुष पहले की भांति भोजन करके वमन ( कारक द्रव्य ) पीये ॥ ८०-८१ ॥ स्यात्वसंशोधनार्थये वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत् । संशमन के उद्देश्य से स्नेहपान करने में विरेचन लिये हुए के समान व्यवहार करना चाहिये । विचारणा का प्रयोग- स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्टाच ये नराः ॥ ८२ ॥
कशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा 1।
लाब-तैत्तिर- मायूर-इसि -वाराह-कौक्कुटाः ॥ ८३ ॥
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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६
गव्याजरमात्म्याच रसाः स्युः स्नेहने हिताः ।
ra- कोल -कुलत्थाच स्नेहाः सगुडशर्कराः ॥ ८४ ॥।
दाडिमं दधि सव्योषं रस-संयोग-मंग्रहः । जो मनुष्य स्नेह से द्वेष करते हों, जो नित्य प्रति स्नेह का व्यवहार करते हों, मृदुकोष्ठ वाले, कष्ट को सहन न करने वाले, जो नित्य मदिरासेवी हों, उनमें विचारणा का प्रयोग करना चाहिये । प्रयोग करने की विधि कहते हैं- वटेर, मोर, हंस, सुअर, मुर्गी, हाथी, बकरा, मेंढा और मछली इनके मांसों का रस स्नेहन क्रिया में हितकारा है । इन मांसरसों का संस्कार करने के लिये जौ, बेर, कुलथी, घी या तेल, गुड़, शक्कर अनारदाना, दही, सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, ये यथायोग्य मिलाने चाहियें ॥ ८२-८४ ॥ स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः ॥ ८५ ॥
कृशराश्च बहुम्नेहास्ति २काम्बलिकास्तथा । घी ( स्नेह में ) भून कर बनाये हुए तिलकुट को भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन करते हैं । इसी प्रकार बहुत स्नेह वाली खिचड़ी तथा तिल युक्त 'काम्बलिक अर्थात् यूप' - भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन करते हैं ॥ ८५ ॥
पिबेद्रोफाणितं शृङ्गवेरंमर्जीनीयाश्चच तैलं च सुरया महभोजनम्॥ ८६। ॥ फाणित ( आधा पका गन्ने का रस, राव ), अदरख, और तैल इन तीनों को एक करके, शराब में मिलाकर रूक्ष व्यक्ति पीये । इसके जीर्ण होने पर भुने हुए मांस से भोजन खाये ॥ ८६ ॥
तैलं सुख्या मण्डेन वसां मज्जानमेव वा ॥ ८७ ॥
पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः । वातप्रकृति का मनुष्य मद्य, या मण्ड के साथ तैल, वसा या मज्जा को मिलाकर पीये तो स्नेहन होता है । बात प्रकृति का आदमी राब के साथ दूध को पीये तो भी स्नेहन होता है ॥ ८७ ॥
धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः ॥ ८८ ॥
नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम् । धागेष्ण, ताजे दुहे हुए दूध को शर्करा एवं घी के साथ पीने से शरीर का तुरन्त स्नेहन होता है । अथवा राब के साथ दही की मलाई खाने से भी स्नेहन तुरन्त होता है ॥ ८८ ॥
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१७० चरकसंहिता [अ० १३ प्रसूतिकी पेया पायसो माषमिश्रकः ॥ ८६ ॥
क्षीरसिद्धसपिम्तेल-वसाबहुस्नेहःमज्जा- स्नेहयेदचिरान्नरम्तण्डुल प्रसृतेः शृता| ॥ ६० ॥
पाप्रसृतिकी पेया पेया स्नेहनमिच्छता । आगे कही जाने वाली 'पांचप्रसूतिका पेया' को पीकर मनुष्य शीघ्र हो स्निग्ध बन जाता है । उड़दों को चावलों में मिलाकर घो आदि स्नेह में खूब भून कर दूध में पकाई ( घी से युक्त ) खोर जल्दी ही स्निग्ध कर देती है । पांच प्रसृति की पेया-घी, तेल, बना, मजा और चावल प्रत्येक आठ आठ तोले लेकर छः गुने जल में पकावे । इसका नाम 'पाञ्चप्रसूतिकी पेया' है । स्नेहन की इच्छा करने वाले व्यक्ति को इसका सेवन करना चाहिये ॥ ८६-६० ॥
ग्राम्यानूपदिकं मांसं गुडं दधि पयस्तिलान् ।
कुष्ठी शोथा प्रमेही च स्नेहने न प्रयोजयेत् ॥ ६१ ॥
स्नेहैर्यथास्वं तान् सिद्धेः स्नेह्येदविकारिभिः ।
पिप्पलीभिरीतक्या सिद्धेखि कलयाऽपि वा ॥ ६२ ॥
कुष्ठ रोगी, शोथ ( सोज ) रोगी, प्रमेह रोगी -इनके स्नेहन के लिए ग्राम्य निन्दित मांस, जलीय मांस, गुड, दही, दूध और तिल इनका प्रयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि ये वस्तुयें इनकी बढ़ाता हैं । इन रोगियों के लिये, इन रोगों को नाश करने वाली औषधियां से सिद्ध किये हुए घृत आदि स्नेह एवं इन रोगियों के लिये विकार न करने वाले स्नेहों से इनकी चिकित्सा करनी चाहिये । अथवा पिप्पली के कल्क या हरीतकी ( हरड़ ) के कल्क अथवा त्रिफला के कल्क द्वारा सिद्ध घृतादि स्नेह द्वारा कुष्ठ रोगी, शोष-रोगा, प्रमेह- रोगी का स्नेहन करना चाहिये ॥ ६१ - ९ २ ॥
द्राक्षाऽमलक- यूषाभ्यां दध्ना चाम्लेन साधयेत् ।
व्योषगर्भं भिषक स्नेहं पीत्वा स्निह्यति तन्नरः ॥ ६३ ॥
द्राक्षायूष, आंवले का यूष, और खट्टी दही ( ये मिलित चार भाग ) सोंठ, मरिच और पिप्पली ( मिलित एक भाग ) इनका कल्क डाल कर उचित मात्रा से धृत सिद्ध करना चाहिये । इस घृत के पान करने से मनुष्य का स्नेहन होता है ॥ ६३ ॥
यव-कोल -कुलत्थानां रसाः क्षीरं सुरा दधि ।
क्षारः सर्पिश्च तत्सिद्धं स्नेहनीयं घृतात्तमम् ॥ ६४ ॥
जौ, बेर, कुलथी, प्रत्येक का क्वाथ ( रस ), दूध, दही और मद्य, क्षार
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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १७१ और घी, इनको मिला कर घी सिद्ध करना चाहिये । यह स्नेहन के लिये श्रेष्ठ है ॥ ६४ ॥
तैल-मज्ज-वसा-सर्पिबंदर- त्रिफला रसैः ।
योनि- शुक्र प्रदोषेषु साधयित्वा प्रयोजयेत् ॥ ६५ ॥।
तैल, वसा, मज्जा, घी, बेर और त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, आंवला ) इनका रस ( क्वाथ ) में ( पृथक् या मिलित चारों स्नेह सिद्ध करने चाहिये ) । यह स्नेह योनिरोग और वीर्यरोगों में स्नेहन कार्य के लिये उपयोगी हैं ॥१५॥
गृहात्यम्बु यथा वस्त्रं प्रस्रवत्यधिकं यथा ।
तथाऽग्निर्जीर्यति स्नेहं तथा स्त्रवत चाधिकम्॥ ९६ ॥
जिस प्रकार वस्त्र पानी का उचित मात्रा का ही ग्रहण करता है और अधिक पानी निकल जाता है; इस प्रकार अग्नि स्नेह की योग्य मात्रा को ही जीर्ण करतो है, अधिक मात्रा निकल जाती है ॥६६॥
यथा वाक्य मृत्पिण्डमासिकं त्वरया जलम् ।
तिस्रंसते स्नेहस्तथा त्वरितसेवितः ॥ ६७ ॥
लवणोपहिताः स्नेहाः स्नेहयन्त्यचिरान्नरम् ।
तद्वचभिष्यन्द्यरूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ ६८ ॥
स्नेह प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमनन्तरम् ।
स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमथेतरत् ॥ ६६ ॥
जिस प्रकार मिट्टी के ढेले पर जल्दी से गिरा हुआ बहुतसा पानी, ढेले को गीला करके वह जाता है, और ढेला गलने लगता है, उसी प्रकार जल्दी से अधिक मात्रा में पिया स्नेह जल्दी से गुदा मार्ग से बाहर बह जाता है । जितने भी स्नेह कहे हैं, वे सब संन्धव-लवण के साथ सेवन करने से मनुष्य को शीघ्र हीस्निग्ध कर देते हैं । क्योंकि नमक अभिष्यन्दि, ( द्रवकारक ) अरूक्ष, सूक्ष्म, उष्ण और व्यवायी गुण वाला है । संशोधन करने से पूर्व स्नेहन करना चाहिये । इसके पीछे स्वेदन करना चाहिये । स्नेह और स्वेदन कर चुकने पर पीछे संशोधन अथवा संशमन चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६६॥ * अभिष्यन्दि होने से दोषसमूह को तोड़ता है । रूक्ष न होने से स्नेहन करता है । सूक्ष्म होने से शरीर के सूक्ष्म भागों में घुम जाता है । गरम होने से पिये हुए स्नेह को शीघ्र जीर्ण करता है । व्यवायी होने से स्नेह के साथ सारे शरीर में फैल जाता है ।
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१७२ चरकसंहिता [अ० १४ तत्र श्लोकः ।
स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नो व्यापत् सिद्धिः सभेषजा ।
यथाप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना ॥ १०० ॥
स्नेहों के प्रकार, सम्पूर्ण स्नेहविधि, स्नेह की व्यापत्तियों और उनकी मेष - ओषध समेत सिद्धि भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के प्रश्नानु- सार सब कह दी || १००॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के स्नेहाध्यायो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ।
चतुर्दशोऽध्यायः ।
अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsss भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अ ( स्नेह कर्म के उपरान्त ) स्वेद सम्बन्धी अध्याय का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अतः स्वेदाः प्रवक्ष्यन्ते यैर्यथावत्प्रयोजितैः 1 स्वेदसाध्याः प्रशाम्यन्ति गदा वातकफात्मकाः ॥ ३ ॥
अब स्वेद विधियों का उपदेश करेंगे, जिनकी उचित प्रकार से करने पर स्वेदन से शान्त होने वाले, वात- कफ-जन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥
स्नेहपूर्वं प्रयुक्तेन स्वेदेनाssवर्जितेऽनिले ।
पुरीष -मूत्र-रेतांसि न सज्जन्ति कथञ्चन ॥ ४ ॥
पहले स्नेहन कार्य करके वायु को शमन कर लेने पर शरीर में मल, मूत्र और वीर्य ये किसी भी प्रकार रुके नहीं रहते ॥ ४ ॥
rato पि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनेः ।
नमयन्ति यथान्यायं किं पुनर्जीवतो नरान् ॥५ ॥
सूखे हुए काठ ( बांस आदि लकड़ियां ) भी स्नेहन और स्वेदन द्वारा मन के अनुसार मोड़ी या सांधी की जा सकती हैं, फिर जीवित ( रसयुक्त और कोमल ) मनुष्यों को वैद्य क्या स्नेहन और स्वेदन द्वारा इच्छानुसार परिवर्तित नहीं कर सकेगा १ ॥ ५ ॥
रोग -व्याधितापेक्षो नात्युष्णोऽतिमृदुर्न च ।