चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 191–200
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 191–200
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अ० १४] सूत्रस्थानम् १७३ द्रव्यवान् कल्पितो देशे स्वेदः कार्यकरो मतः ॥ ६ ॥
ब्याधि, काल, रोगी पुरुष, इच्छा इनके अनुसार न बहुत गरम, न बहुत कोमल, उस- उस रोग को नाश करने वाले द्रव्यों द्वारा स्वेदन करने योग्य स्थानों से दिया गया स्वेद कार्य करने में समर्थ होता है ॥ ६ ॥
व्याधौ शीते शरीरे च महान् स्वेदो महाबले ।
दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो हितः ॥ ७ ॥
वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते ।
सिग्ध-रूक्षस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चाप्युपकल्पितः ॥ ८ ॥
शीत रोग में और शीतशरीर में महाबलवान् पुरुष के लिये महास्वेद जिते शरीर सहन कर सके उतना ही देना चाहिये । शीत रोग और शीत शरीर वाले निर्बल पुरुष में दुर्बल स्वेद देना चाहिये । 'मध्यम बल' पुरुष में शीत व्याधि और शात शरीर में 'मध्यम स्वेद' देना चाहिये । वात-कफ -जनित ब्याधि में स्निग्व और रूक्ष द्रव्यों से बनाया स्निग्ध-रूक्ष स्वेद देना चाहिये | केवल वातजन्य व्याधियों में स्निग्ध पदार्थों से स्निग्ध स्वेद देना चाहिये । केवल कफजन्य व्याधि में रूक्ष पदार्थों से रूक्ष स्वंद देना चाहिये || ७-८||
आमाशयगते बाते कफे पक्वाशयाश्रिते ।
रूक्षपूर्वो हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च ॥ ६ ॥
वृषणी हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदुनैव वा ।
मध्यमं वङ्क्षणी शेषमङ्गावयवमिष्टतः ॥ १० । ।
वायु यदि आमाशय ( कफस्थान ) में पहुंचो हो तो प्रथम स्नेहकर्म न करके रूक्ष कर्म करे जिससे कफ निकल जाय । फिर वायु को शान्त करने के लिए स्नेहन कार्य करे । इसी प्रकार जब कफ पक्काशय ( वात स्थान ) में पहुंचा हो तब पहिले रूक्ष कार्य न करके स्नेहन कार्य करे ( जिससे कि वायु की शान्ति हो फिर कफ की शान्ति के लिये रूक्ष कार्य करे ) हृदय, आंख, " इनका मृदु स्वेद द्वारा स्वेदन करना चाहिये । यदि दूसरी चिकित्सा से कार्य चल जाय, तो स्वेद बिलकुल न करे । वंक्षण स्थित रांग में वंक्षणों में मध्यम स्वेद देना चाहिये । शेष अगों को ( रोगी की ) इच्छानुसार स्वेदन करे ॥ १०॥
शुद्धः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा ।
पद्मोत्पल-पलाशैर्वा स्वेद्यः संदृत्य चक्षुषी ॥ ११ ॥
मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि ।
जटाईजलजैईस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ॥ १२ ॥
धूल आदि दूषक पदार्थों से रहित, रूई से, रुई के वस्त्रों से अथवा गेहूं
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१७४ चरकसंहिता [अ०] १४ की पोटली बांध कर आंख पर स्वेद देना चाहिये । स्वेद देने से पूर्व आंख को कमल, या नीला कमल इनके पत्तों से ढांप लेना चाहिये । शीतल मोतियों की मालाओं से, शीतल पात्रों से, जल से भोगे कमलों से और हाथों से स्वेदन किये जाते रोगी के हृदय को स्पर्श करता रहे ॥ ११-१२॥
शीत -शूल व्युपरमे स्तम्भ-गौरव - निग्रहे ।
संजाते मार्दवे वेदे स्वेदनाद्विरतिर्मता ॥ १३ ॥
सरदी और वेदना हट जाने पर, शरीर में जड़ता तथा भारीपन प्रतीत न होने पर और शरीर में कोमलता उत्पन्न होने से,तथा शरीर पर पसीना आ जाने पर स्वेद देना बन्द कर दे ॥ १३॥
पित्तप्रकोपो मूर्च्छा च शरीर सदनं तृषा ।
दाहः स्वेदाङ्ग दौर्बल्यमतिश्विन्नस्य लक्षणम् ॥ १४ ॥
उक्तस्तस्याशिताये यो प्रेष्मिकः सर्वशो विधिः ।
सोऽतिविन्नस्य कर्तव्यो मधुरः स्निग्धशीतलः ॥ १५ ॥
अतिस्वेदन के लक्षण और उपचार - अतिस्वेद देने से पित्त का प्रकोप, मूर्च्छा, शरीर में सुस्ती, प्यास का लगना, जलन, पसीने का बहुत आना, अंगों में निर्बलता आ जाती है । अतिस्वेद के लिये 'तस्याशितीय ( अध्याय ६ में ) कही हुई ग्रीष्म ऋतु की मधुर, स्निग्ध, शीतल गुणवाली सम्पूर्ण परिचर्या
( मद्य विधि को छोड़ कर ) करे । यह अतिस्वेद की चिकित्सा है ॥१४- १५॥
कषाय - मद्य-नित्यानां गर्भिण्या रक्तपित्तिनाम् ।
पित्ति सातिसाराणां रूक्षाणां मधुमेहिनाम् ॥ १६ ॥
विदग्ध भ्रष्ट नान विष-मद्य विकारिणाम् ।
श्रान्तानां नष्टसंज्ञानां स्थूलानां पित्तमेहिनाम् ॥ १७ ॥।
तृष्यतां क्षुधितानां च क्रुद्धानां शोचतामपि ।
कामल्युदरिणां चैव क्षतानामाढ्यरोगिणाम् ॥ १८ ॥
दुर्बलातिविशुष्काणामुपक्षीणोजसां तथा ।
भिषक् तैमिरिकाणां च न स्वेदमवतारयेत् ॥ १६ ॥
स्वेद न देने योग्य व्यक्ति--जो वात- कफ प्रकृति के मनुष्य नित्य प्रति पाचनादि कषायों और मद्य का सेवन करते हों, गर्भवती, रक्त-पित्त रोगी, पित्त 1 प्रकृति या पित्त जन्य रोग वाले व्यक्ति, अतिसार रोगी, रूक्ष प्रकृति, मधुमेही, सब प्रकार के प्रमेह रोगी, इनमें भी खास कर मधुमेह के रोगी, जिनकी गुदा पक गई हो, या गुदा बाहर आगई हो, विषरोगों, या नशे में मस्त अथवा
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अ० १४ ] सूत्रस्थानम् १७५ शराब से उत्पन्न रोगवाला, परिश्रम करने से थके, मूच्छित, बेहोश रांगी, स्थूल चर्बीवाले पुरुष, पित्तजन्य प्रमेही, प्यासे पुरुष, भूखे, क्रोधी, शोक- चिन्ता -प्रस्त, कामला, उदर रोगी, कुष्ठ रोगी, बात रक्त रोगी, निर्बल, बहुत रूक्ष शरीर वाले, जिनका ओज क्षीण हो गया हो उनका, तथा तिमिर रोगियों को स्वेद नहीं देना चाहिये । ( परन्तु तीव्र व्याधि में अल्पस्वेद दिया जा सकता है ) || १६-६६ ॥
प्रतिश्याये च कासे च हिक्काश्वासेप्रलाघवे ।
कर्णमन्या-शिरःशूले स्वरभेदे गलग्रह ॥ २० ॥
अर्दितंकाङ्ग सर्वाङ्ग-पक्षाघाते विनामके ।
कोष्टाना विबन्धेषु शुक्राघाते विजृम्भके ॥ २१ ॥
पार्श्व-पृष्ट कटी- कुक्षि संग्रहे गृध्रसीषु च ।
मन्त्रकृच्छ्रे महत्त्वं च मुष्कयोरङ्गमदके ॥ २२ ॥
पादोरुजानु जङ्घाति संग्रहे श्रयथावपि । लामेषु शीते च वपथ संकोचायामशलेषु स्तम्भ गौरव- वातकण्टकं-सुप्रिषु ॥। २३ ॥ सर्वाङ्गेषु विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते ॥ २४ ॥
स्वेद योग्य व्यक्ति -जुकाम, खांसी, हिका, दमा, शरीर का भारीपन, कान की दर्द, मन्या शूल, शिरोवेदना, स्वरभेद, गलग्रह, अर्दित ( चेहरे का लकवा ), एकांग वात, सर्वाङ्गवात, पक्षाघात रोग, विनामक ( दण्डापतानक आदि ) में, पेट का अफा, मल-मूत्र के अवरोध में ( कब्ज ), शुक्र के अवरोध, जम्माई का अधिक आना, पार्श्वशूल, पृष्ठवेदना, कटिशूल, कुक्षिशूल, गृधसी रोग, मूत्रकृच्छ्र रोग, अण्डवृद्धि, सारे शरीर में वेदना, पांव की वेदना या ऐंठन, घुटना अथवा जंघा की पीड़ा अथवा ऐंठन, खली अर्थात् हाथ-पांव के ऐठन में, आम रोग, शीतावस्था कंपकपी, वातकण्टक, गुल्फाश्रित वात रोग, शरीर को संकुचित करने वाले वात रोग, आयाम अन्तरायाम वात रोग, शूल-वेदना, स्तम्भ ( शरीर की जड़ता ), भारीपन, अंग का सो जाना या स्पर्श ज्ञान का अभाव, शून्यता, ज्वरादि और वात दलेष्मा आदि रोगों की दशाओं में स्वेद देना हितकारी है ॥२०-२४॥
स्वेदन द्रव्य- तिल- माष-कुलत्थाम्ल- घृत-तैलामिषौदनैः ।
पायसैः कृशरैर्मासैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
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१७६ चरकसंहिता [अ० १४
गो- खरोष्ट्र वराहाश्व -शकृद्भिः सतुषैर्यवैः ।
सिकता -पांशु-पाषाण करीषायस- पूटकैः ॥ २६ ॥
इनका स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् समुपाचरेत् ।
द्रव्याण्येतानि शम्यन्ते यथास्त्रं प्रस्तरेष्वपि ॥ २५ ॥
भूगृहेषु च जेन्नाकेपूष्णगर्भगृहेषु च ।
विधूमाङ्गारतप्तष्वभ्यतः स्विद्यति ना सुखम्॥ २८ ॥
तिल, उड़द, कुरुथी, अम्ल ( चांगेरी -चौपतिया ), घृत, तैल, ओदन- पके हुए चावल, खोर ( मात्रा-दूध का खोया ), ( तिल और मांस की खिचड़ी ), मास, इन पदार्थों को गोलाकार बना कर 'पिण्ड स्वेद का प्रयोग करना चाहिये । रूक्ष स्वेद के द्रव्य -गाय का गोबर, गधे का मल, ऊँट का मल, सुअर का मल और घोड़े की लीद, छिलकों वाले जौ, रेता, पांसु ( धूली- वारीक रेत ), पत्थर ( ईट का ) चूरा, छाना ( अरना ) का चूर आयस- लोहे का चूरा इनका पोटली बनाकर कफ रोगियों को स्वेद देना चाहिये और तिल, उड़द आदि में वातरोगियों का स्वेद देना चाहिये । पिण्ड स्वेद को ' संकर स्वेद ' कहते हैं । ये तिल आदि पदार्थ प्रस्तर स्वेद में भी प्रशस्त हैं । नाड़ी स्वेद - भूमि को खोद कर बनाया हुआ घर, जेन्ताक अर्थात् कृत्रिम विधि से गरम किया हुआ घर, उष्ण गर्म अर्थात् हमाम बिना खिड़का के घर, इनमें वातहर, या कफहर लकड़ियों की जलाकर धुर्वे रहित अंगारों से इन घरों को गरम करके, शरीर का स्नेहन करने के पीछे मनुष्य सुखपूर्वक स्वेद ले सकता है || २५-२८||
ग्राम्यानूपौदकं मांसं पयो बस्तशिरस्तथा ।
वराह-मध्य-पित्तास्रकू स्नेहवत्तिल-तण्डुलाः ॥ २६ ॥
इत्येतानि समुत्काध्य नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ।
देश - काल-विभागज्ञा युक्त्यपेक्षा भिषक्तमः ॥ ३० ॥
वारुणामृतकरण्ड- शिशु -मूलक-सर्षपैः । वासाशोभाञ्जनक--वंश- करञ्जार्कशंरेय मालती- -पत्रर मन्तकस्यसुरसार्जकेःच। ॥ ३१ ॥ पत्रैरुत्काथ्य सलिलं नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
भूतीक पचमूलाभ्यां सुरया दधिमस्तुना ।
मूत्रैरम्लेश्च सस्नेहैर्नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
-एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके ।
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अ० १४ ] १२ सूत्रस्थानम् १७७ स्वेदनार्थं घृत -क्षीर- तेल-कोष्ठांश्च कारयेत् ॥ ३४ ॥
नाहीस्वेद के लिए - प्राम्य ( पालतू ) पशु और जलीय जन्तुओं का मांस, दूध, बकरी का शिर, सुअर का मध्यभाग, पित्त, रक्त, एरण्ड के बीज, तिल ( तुप रहित ) इन सबको यथायोग्य उबालकर नलिका द्वारा स्वेद देवे । देश, काल के विभाग को समझने वाला और युक्ति प्रयोग विधि जानने वाला वैद्य स्वेद देवे । यह स्वेद वात रोग में हितकारी है । वरना, गिलोय, ऐरण्ड, सहजन, मूली के बीज, बांसा, रेणु, करञ्ज, आक, पाषाणभेद और चागेरी के पत्त लाल सहजन, शिलाहा, अतक ( तुलसी भेद ) इनके पत्तों को और छालों को भी क्वाथ करके देश, काल के विभाग को जानने वाला, युक्ति को समझने वाला वैद्य नाहीस्वेद देवे, यह स्वेद कफ जन्य रोगों में हितकारी है । भूतक ( बड़ी अजवायन ), पञ्चमूल (बृहत्लञ्चमूल वात कफ हर होने से), सैरेय (झिंटी), दही का पानी ( मस्तु ), आठों प्रकार के मूत्र, अम्लवर्ग से, स्नेह, घृत, तैल आदि के साथ काथ करके वात-कफ मे नाहीस्वेद देना चाहिये । ये ग्राम्य मांस आदि तीनों निर्यूह ( काथ ) क्रम से, वातजन्य, कफजन्य, और बात-कफजन्य रोगों में 'जल कोष्ठक' अर्थात् इनके काथों से भरे द्रोणपात्र में खड़ा करके आदमी को स्वेद देवे । स्वेदन के लिये घी का कोठा ( कोण्ड ), दूध का कोठा, या तैल का कोठा भी बना लेना चाहिये ॥ २६-३४॥
गोधूम -शकर चूर्णयेवानामम्लसंयुतः ।
सस्नेह- किण्व लवणरुपनाहः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
उमया गन्धैः सुरायाःकुष्ठतैलाभ्यांकिण्वेनयुक्तयाजीवन्त्याचोपनाहयेत्शतपुष्या॥ ३६॥।
चर्मभिश्च पनद्धव्यः सलोमभिरपूतिभिः ।
उष्णवीर्यैरलाभे 'तुतु कौशेयाविकशाटकैः ॥ ३७ ॥
रात्रौ बद्धं दिवा मुन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् ।
विदाह- परिहारार्थं स्यात्प्रकर्षस्तु शीतले ॥ ३८ ॥
उपनाह विधि- गेहूं का दरकच चूर्ण, जौ का चूर्णं, कांजी, तैल, मद्यकिट्ट के साथ मिलाकर गरम करके उपनाह ( पुलटिस ) बांधना वातजन्य रोगों में उपकारी है । चन्दन अगरू आदि सुगन्धित पदार्थ मद्य पात्र में बैठे तलछट प्रक्षेप, जीवन्ती सौंफ, कफजन्य रोगों में इनकी पुलटिस लगावे । अलसी, कूठ और तैल से पुलटिस तैय्यार करे, इसे वात कफ रोगियों में प्रयोग करे दुर्गन्ध रहित, वालवाली एवं उष्ण वीर्य्य वाली खालों से लेप को बांध देना चाहिये । और जब ऐसे चमड़े न मिले तो रेशमी वस्त्रों से या ऊन से बने कम्बल से
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१७८ [२०१४ A देनाबांधनाचाहियेचाहिये। दिन। मेंरात्रिबांधेमें बंधनप्रलेपकोचरकसंहितालगाकररात मेंबांधेखोलहुए बन्धन को दिन में खोल जलन उत्पन्न न हो । शीत ( हेमन्त और शिशिर ) कालदेना मेंचाहिये । जिससे कि डर नहीं संकरःदिन में प्रस्तरोबंधी पट्टीनाडीरात भीपरिषेकोऽवगाद्दनम्रह जाय, तो कोई डर। नहींबंधी॥ ३५-३८रहने में ॥ कोई जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षुः कुटी भूः कुम्भिकैव च कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश । ॥ ३६ ॥
स्वेदकर्मतान् केयथावत्प्रवक्ष्यामितेरह प्रकार हैं १. सर्वानेवानुपूर्वशःसंकर, २. प्रस्तर. ३.॥ ४० ॥ इति ।
५. अवगाहन, ६. जेन्ताक, ७ अश्मघन, ८ कर्षु, ९नाड़ी, ४ परिषेक, ११. कुम्भिक, १२. कूप, १३. होलाक, ये तेरह प्रकार के स्वेदकुटी, १०. भू स्वेदोंतत्रको क्रमशःवस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वाकहते हैं || ३ ९ -४० || पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनंहैं । इन तेरह इति विद्यात् ॥ ४१ ॥ संकरस्वेद ( १ ) संकरस्वेद - तिल, माष आदि पदार्थों का पिण्ड
लपेट कर अथवा बिना वस्त्र में लपेटे ही गरम करके स्वेदन बनाकर वस्त्र में नाम 'संकर-स्वेद ' है ॥४२॥ कार्य करने का शुक- शमी- धान्य- पुलाकानां बेसवारायस - प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तर- प्रच्छदे पञ्चाङ्गलोरुकृशरोत्कारिकादीनांव वा - गात्रस्य शयानस्योपरिशयानस्योपरि स्वेदनं प्रस्तरस्वेद स्वभ्यक्त सर्व- कार्कपत्र-प्रच्छदे वा विद्यात्( २॥ ) ४२प्रस्तर॥ स्वेद - शूक धान्य ( चावल गेहूँ आदि इति
( मूंग, उड़द, चना आदि ), पुलाक ( चावल रहित धान्य ), शमी धान्य ( (पायसउड़द कीमावाबनी, खोयापूरी या), पूबाकृशरा),, आदितिल, उड़दवस्तुओंकीकोबनी, यवागूपटास, ),उत्कारिकावेखवार, ( अथवा काष्ठ आदि कड़ी वस्तु पर फैलाये हुए ) रेशम, गरम करके, पत्थरफैलाकरको फैलाकरइन, परअथवाऔषधऐरण्डलगा, उरुबकदेवे । फिर( छोटासारेएरण्डशरीर ), कम्बलया आक( ऊनीके पत्रोंवस्त्रको) पत्तों या वस्त्र पर लेट कर स्वेद लेने का नाम 'प्रस्तरस्वेदपर स्नेह लगा कर इन ' है ॥४२ ॥
स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूल-फल-पत्र-शुङ्गादीनां मृग स्पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथाईमम्ल लवण-स्नेहोपसंहितानां-शकुनि-पिशित-शिर-रादीनां वा कुम्भ्यां वाष्पमनुद्वमन्त्यामुत्कथितानां नाड्या शरेषीकामूत्रक्षी-- वंश-
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अ० १४ ] सूत्रस्थानम १७६ दल- करञ्जार्क- पत्रान्यतम कृतया गजाग्र हस्त संस्थानया व्याम दीर्घया व्यामार्धदीर्घया वा व्याम चतुर्भागाष्टभागमूलामपरिणास्रोतसा सर्वता बाहर पत्र-संवृत- च्छिद्रया द्विखिव विनामितया वातहर- सिद्ध-स्नेहा-भ्यक्तगात्रो बाष्पमुपहरेत्, बाप्पा ह्यनूर्ध्वगामी विहृत- चण्ड-वेगस्त्वच-मदिन सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः ॥ ४३ ॥
( ३ ) नाहीस्वेद - पहिले कह हुए स्वेदन द्रव्यों के मूल, फल, पत्र और कोंपल और पशु, पक्षी इनका मांस, शिर, पांव आदि उष्ण स्वभावयुक्त अथवा यथायोग्य अम्ल, लवण एवं स्नेह युक्त, आठों प्रकार के मूत्र, गौ आदि के दूध और मस्तु की घड़े में बन्द करके इसके मुख को ढक्कन से बन्द कर दे फिर इस को गरम करे । इस घड़े में दार, ईपीक आदि से बनी नलिका ( नली ) को लगाकर इसके द्वारा वातहर तैल से स्निग्ध पुरुष को स्वेद देना चाहिये । नलिका का स्वरूप सरकण्डा का अगला भाग, पत्ता, बांस का पत्ता, करंज का पत्ता, आक का पत्ता इन में से किसी की नलिका बनाले | नली हाथी की सूंड के समान ऊपर से मांटी नीचे पतली मुख पर से गोल हो, तथा व्याम अर्थात् पुरुष के दोनों हाथ फैला लेने पर इस लम्बाई के बराबर लम्बी, अथवा आधे व्याम लम्बी, और जड़ से अम्र तक व्याम के चौथाई भाग घेर में, वा व्याम का आठवां भाग होना चाहिये । और नाड़ी के चारों ओर जितने भी छेद हों, उन सब को वातनाशक एरण्ड आदि के पत्तों से बन्द करके दो या तीन बार टेही घूमा कर पात्रके मुख में लगी हुई नलिका से बाष्प रोगी को देने चाहियें । दो तीन बार टेढ़ी -मेड़ी घुमाने से बाष्प ऊपर की ओर न जाकर, प्रबल वेग से त्वचा को न जलाता हुआ सुखपूर्वक स्वेदन करता है || ४३|| वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्काथैः सुखोष्णैः कुम्भी- णिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः ॥ ४४ ॥
( ४ ) परिषेक स्वेद - वातनाशक एवं विशेष रूप से त्रिदोषनाशक द्रव्यों के मूल, फल, पत्र, शुंग आदि को सुखदायक क्वाथ -जिसे शरीर सहन कर सके इतने गरम काथ को सच्छिद्र बर्तन के ढक्कन में छेद रखकर जिससे बाष्प निकल सकें, अथवा बर्तन में नाली लगाकर यथायोग्य स्नेह से स्निग्ध शरीर वाले मनुष्य को कपड़ों से सम्पूर्ण रूप में ढांप कर स्वेद देना चाहिये ॥ ४४ ॥
वात रोक्काथ- क्षीर-तैल-घृत- पिशित-रसोष्ण- सलिल -कोष्ठ कावगाहस्तु यथोक्त एवावगाहः ॥ ४५ ॥
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१८० चरकसंहिता [अ०१४ ( ५ ) अवगाह स्वेद — बात नाशक द्रव्यों से काथ, घी, तेल, मांस रस गरम पानी बनाकर ' कोठी' लकड़ी का बना हुआ बड़ा पात्र जिसमें मनुष्य बैठ सके उसमें बैठकर स्नान करना अवगाहन है ॥ ४५॥
अथ जेन्ताकं चिकीर्षुर्भूमिं परीक्षेत-तत्र पूर्वस्यां दिश्युत्तरस्यां वा गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परीवाप पुष्करिण्यादीनां जलाशयानामन्यतमस्य कूले दक्षिणे पश्चिमे वा सूपतीर्थे सम-सुविभक्त-भूमि-भागे सप्ताष्टौ वाऽरत्नीरुपक्रम्योदकात्प्राङ्- मुखमुदङ्मुखं वाऽभिमुखतीर्थं कूटागारं कारयेत्, उत्सेधविस्तरतः परमरत्नीः षोडश, समन्तात्सुवृत्तं मृत्कर्म संपन्नमनेकवातायनम् । अस्य कूटागारस्यान्तः समन्ततो भित्तिम निविस्तारोत्सेधां पिण्डिकां कार- येदाकपाटात, मध्ये चास्य कूटागारस्य चतुष्किष्कुमात्र- पुरुषप्रमाणं मृन्मयं कुन्दसंस्थानं बहु- सूक्ष्म -च्छिद्रमङ्गार कोष्ठक स्तम्भं सपिधानं कारयेत् तं च खादिराणामाश्वकर्णादीनां वा काष्ठानां पूरयित्वा प्रदीपयेत् स यदा जानीयात्साधुदग्धानि काष्ठानि, विगतधूमान्यवतप्तं च केवलमग्निना तदग्निगृहं स्वेदयोग्येन चोष्मणा युक्तमिति, तत्रैनं पुरुषं वातहराभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं प्रवेशयेत्, प्रवेशयंश्चनमनु- शिष्यात्- "सौम्य! प्रविश कल्याणायाऽऽरोग्याय चेति प्रविश्य चैनां पिण्डिकामधिरुह्य पार्श्वापरपार्श्वाभ्यां यथासुखं शर्यथाः, न च त्वया स्वेद-मूर्च्छारीतेनापि सता पिण्डिकैषा विमोक्तव्या प्राणोच्छ्वासात् भ्रश्यमानो ह्यतः पिण्डिकावकाशाद् द्वारमनधिगच्छन् स्वेद-मूर्च्छा. परीततया सद्यः प्राणान् जह्याः, तस्मात्पिण्डिकामेनां न कथंचन मुचेथाः, त्वं यदा जानीया विगताभिष्यन्दमात्मानं सम्यक् प्रस्रुत-स्वद-पिच्छे सर्व स्रोता-विमुक्तं लघुभूतमपगत विबन्ध -स्तम्भ सुप्ति -वेदना-गौरव-मिति, ततस्तां पिण्डिकामनुसरन् द्वारं प्रपद्येथाः, निष्क्रम्य च न सहसा चक्षुषोः परिपालनार्थं शीतोदकमुपस्पृशेथाः, अपगत- सन्ताप- क्लमस्तु मुहुर्तात्सुखोष्णेन वारिणा यथान्यायं परिषिक्तोऽश्नीयाः -इति जेन्ताक-स्वेदः ॥ ४६ ॥
( ६ ) जेन्ताक स्वेद - जेन्ताक स्वेद करने की इच्छा करने वाला वैद्य सब से प्रथम भूमि की परीक्षा करे । इसके लिये मनुष्य के निवास स्थान से पूर्व अथवा उत्तर दिशा में जो भूमि-प्रदेश ( वृक्ष आदि के उत्पन्न होने से ) प्रशस्त एवं गुणवान् तथा सुन्दर हो, काळी मिट्टी वाला या स्वर्ण ( पीली
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अ० १४ ] सूत्रस्थानम १८१ मिट्टी ) मिट्टी का हो, तालाब, पुष्करिणी, बावड़ी अथवा बड़े तालाब के दक्षिण या पश्चिम किनारे पर, जहां पर किनारे का अच्छा घाट बना हो, जहां भूमि ऊंची नीची न हो, बिल्कुल समान हो । ( २ ) कूटागार निर्माण - वहां पर पानी से सात या आठ हाथ पीछे हटकर जलाशय के पश्चिम किनारे पर पूत्रों- भिमुम्ब अथवा जलाशय के दक्षिण किनारे पर उरारानिमुख कूटागार बनाना चाहिये । यह कूटागार ऊंचाई में १६ हाथ और चौड़ाई में १६ हाथ चारों ओर से गोलाकार बहुत रोशनदानों वाला मिट्टी से लिग पुता कर तैयार करना चाहिये । इस घर के अन्दर दिवार के चारों ओर किवाड़ तक एक हाथ भर ऊंत्री चबूतरी बनानी चाहिये । मध्य में चार हाथ विस्तृत पुरुष के परिमाण की मिट्टी से बनी, कन्दुक आकार की बहुत सूक्ष्म, छोटे २ छिद्रों वाला अंगार कोष्ठ रूप स्तम्भ बनाये, और इस का ढक्कन भी बनाये । ( ३ ) स्वेदन विधि इस भाड़ को खैर, अश्वकर्ण ( बड़े पत्तों वाला ढाक ) की लकड़ियों से भरकर जला देवे । जिस समय यह मालूम हो जाए कि लकड़ियां भी प्रकार जल चुकीं, धुंआ नहीं रहा, और घर भी आग से गरम हो गया है तथा पसाना देने की योग्यता वाली गरमी से युक्त है, तब वातहर तैल से स्निग्ध एवं वस्त्र से ढंके हुए पुरुष को इस घर में प्रवेश करावे । प्रवेश कराने से पूर्व उस को समझा दे कि हे सौम्य! कल्याण, मंगल और आरोग्यता के लिये इस घर में प्रवेश करो । इस घर में प्रविष्ट होकर इस चबूतरे के ऊपर दक्षिण पार्श्व से, या वाम पार्श्व से, जिससे चाहो उस पार्श्व से ( जैसे आराम मिले, वैसे ) सुखपूर्वक लेटो । परन्तु पसीने आने से उत्पन्न मूर्च्छा के कारण व्याकुल होने पर भी इस चबूतरे को प्राणों के रहने तक बिल्कुल मत छोड़े । क्योंकि इस चबूतरे पर से फिसल कर दर्वाजे को न पाकर मूर्च्छा की व्याकुलता के कारण प्राण निकल जायंगे । इसलिए चबूतरे को बिल्कुल न छोड़ना । जिस समय कफ का जोर घट जाय, पसीना भी सब स्त्रोतों से भली प्रकार निकल जाय, सारे छिद्र खुल जायें, शरीर हल्का हो जाय, मल बन्ध, जड़ता, स्पर्श ज्ञान का अभाव, पीड़ा और भारीपन शरीर में नहीं रहे, उस समय चबूतरे के साथ साथ चलकर दर्बाजे के पास पहुंच जाना और बाहर निकल कर आंखों की रक्षा के लिये सहसा शीतल जल का प्रयोग न करना कुछ देर ठहर कर जब थकान और गरमी, शिथिलता दूर हो जाय तब थोड़े गरम पानी से इच्छानुसार स्नान करके भोजन करना || ४६ ॥
शयानस्य प्रमाणेन घनामश्ममयीं शिलाम् ।
तापयित्वा मारुतनेर्दारुभिः संप्रदीपितैः ॥ ४७ ॥
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१८२ चरकसंहिता [अ० १४
व्यपोहच सर्वानङ्गारान् प्रोक्ष्य चवाष्णवारिणा ।
af शिलामथ कुर्वीत कौषेयाविक- संस्तराम् ॥ ४८ ॥
तस्यां स्वभ्यक्तसर्वाङ्गः स्वपन्स्विद्यति ना सुखम् ।
कौरवाजिन-कौषेय प्रावाराद्यैः सुसंवृतः ॥ ४६ ॥
इत्युक्तोऽश्मघनस्वेदः, कर्पूश्वेदः प्रवक्ष्यते । (७ ) अश्मघन स्वेद विधि - पुरुष लेट सके, इतनी बड़ी लम्बी चौड़ी, मजबूत पत्थर की बनी शिला को; वातनाशक ( देवदारु या अगर आदि ) लकड़ियां जलाकर गरम करे । गरम होने पर सब अंगारों को दूर हटा दे, शिला पर गरम पानी छिड़क देवे (( जिससे कि ऊपर की गरमी बाहर हो जाये ) सब अंगों पर तैल का अभ्यं करके मनुष्य सोता हुआ सूत को चादर, मृग चर्म, रेशमी चादर कम्बल आदि भली प्रकार आढ़कर मुख पूर्वकस्विन्न होता है । इस प्रकार अश्मघन स्वेद बता दिया गया. अब कर्पू-स्वेद बताया जाता है ||४७-४६ ॥ खानयेच्छयनस्याधः कर्पू, स्थानविभागवित् ॥ ५० ॥
दीप्तैरधूमैरङ्गारैस्तां कर्षू पूरयेत्ततः ।
तस्यामुपरि शय्यायां स्वपन स्विद्यति ना सुखम् ॥ ५१ ॥
( ८ ) कर्षूस्वेद विधि -स्थान के विभाग को जानने वाला वेद्य शय्या के नीचे हाण्डा के आकार का एक गोल गड्ढा बनावे | इस गड्ढे को जलते हुए परन्तु धूमरहित अंगारों से भर दे । इस गड्ढे के ऊपर खाट बिछाकर लेटने से सुख पूर्वक पसीना आता है ॥ ५०-५१ ॥
अनत्युत्सेधविस्तार वृत्ताकारामलोचनाम् ।
घनभित्ति कुटीं कृत्वा कुष्ठाद्यैः संप्रलेपयेत् ॥ ५२ ॥
कुटीमध्ये भिषक्शय्यां स्वास्तीर्णां चोपकल्पयेत् ।
प्रावाराजिन- कौषेय- कुथ -कम्बल-गोलकेः ॥ ५३ ॥
इसन्तिकाभिरङ्गार -पूर्णाभिस्तां च सर्वशः ।
परिवार्यान्तरार हेइभ्यक्तः स्त्रियते सुखम् ॥ ५४ ॥
( ६ ) कुटीस्वेद विधि -न बहुत ऊंची और न बहुत चौड़ी गोलाकार, रोशनदान रहित (जिसमें वायु के लिये छेद न हों तथा मोटी दिवारों वाली कुटी बनाये । इस घर को अन्दर से कुष्ठ आदि उष्णवोर्य द्रव्यों से लेन देना चाहिये । इस लिपी कुटी के बीच में वैद्य लम्बी चौड़ी शय्या बनाये । इस शय्या के चारों ओर अंगारों से भरी अंगीठियां रख देवे । फिर व्याघ्रचर्म, मृगचर्म, रेशम, कम्बल, चित्र विचित्र गरम वस्त्र शय्या पर बिछाकर, लपेट लेने चाहिये । शरीर