चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 201–210
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 201–210
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ero १४ ] सूत्रस्थानम १८३ पर स्नेह लगाकर स्वेद लेना चाहिये । इस प्रकार सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है || ५२-५४ ||
य एवाश्मघनस्वेद -विधिर्भूमौ स एव तु ।
प्रशस्तायां निवातायां समायामुपदिश्यते ॥ ५५ ॥
( १० ) भू-स्वेद विधि -जो विधि अश्मघन स्वेद की है, वही भूस्वेद की है । इस स्वेद के लिये भूमि उत्तम, वायु रहित तथा समान हो ऊंची-नीची नहीं होनी चाहिये ॥५५॥
अर्धभागंकुम्भ त्रिभागं -कावा-पूर्णांशयनंभूमौतत्र निखानयेत्चोपरि ॥ ५६॥।
स्थानयेदासनं वाऽपि नातिसान्द्रपरिच्छदम् ।
अथ कुम्भ्यां सुसन्तप्तान् प्रक्षिपेदयसो गुडान् ॥ ५७ ॥
पाषाणांश्चष्मणा तेन तत्स्थः स्विद्यति ना सुखम् ।
सुसंवृताङ्गः स्वभ्यक्तः स्नेहर निलनाशनैः ॥ ५८ ॥
( ११ ) कुमा-स्वेद विधि - घड़े को वातहर देवदारु आदि के काथ से भरकर भूमि में आधा या तिहाई भाग गाड़ देना चाहिये । इसके ऊपर एक खाटबिछा दे । खाट के ऊपर बहुत गहरा मोटा कपड़ा न बिछाना चाहिये । फिर लोहे के गोले, या पत्थरों को खूब गरम करके भूमि में या गड़ी और बात हर काथ से भरी कुम्भा ( बड़े ) में गिरा दे । इनकी गरमी से, शय्या के ऊपर अंगों को लपेट कर लेटे हुए, शरीर पर वातनाशक स्नेह का मर्दन किये हुए पुरुष को सुखपूर्वक स्वेदन होता है ॥ ५६-५८ ॥
कूपं शयनविस्तारं द्विगुणं चापि वेध्यतः ।
देशे निवाते शस्तं च कुर्यादन्तः सुमार्जितम् ॥ ५६ ॥
हस्त्यश्व-गो- खरोष्ट्राणां करीषैर्दुग्धपूरिते ।
स्ववच्छन्नः सुसंस्तीर्णेऽभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६० ॥
( १२ ) कूप स्वेद -जितनी जगह पर खाट बिछती हो, उतने स्थान पर शय्या के बराबर लम्बा, चौड़ा एक गड्ढाखांदे | इस गड्ढे की गहराई दुगनी हो । इस कुए को वायु रहित स्थान पर बनावे इस कुए को अन्दर भली प्रकार लेप कर साफस्वच्छ कर लेना चाहिये । इस गर्त्त में हाथी, घोड़े आदि -के शुष्क मल ( गोटों को ) को डाल कर जला देना चाहिये । जब धुंआ निकलना बन्द हो जाय तब इस कूप के ऊपर चारपाई बिछा कर कोई वस्त्र इस पर बिछाकर शरीर पर वातहर तैल मर्दन करके, व्याघ्रचर्म, मृगछाला, -कम्बल आदि ओढ़कर लेटने से सुख पूर्वक स्वेद हो जाता है ॥५९-६० ॥
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१८४ चरकसंहिता [अ० १४
धीतिकां तु करीषाणां यथोक्तानां प्रदीपयेत् ।
शयनान्तः प्रमाणेन शय्यामुपरि तत्र च ॥ ६१ ॥
सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत् ।
स्ववच्छन्नः स्वर्षैस्तत्राभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ ६२ ॥
होलाकस्वेद इत्येष सुखः प्रोक्तो महर्षिणा ।
इति त्रयोदशविधः स्वेदोऽग्निगुणसंश्रयः ॥ ६३ ॥
( १३ ) होलाक स्वेद - हाथी, घोड़ा, गाय, गधा, ऊंट इनके छानों ( मल ) को लम्बी परन्तु गोलाकार ( धीतिका अर्थात् चिता के रूप में ) बना कर जला देना चाहिये और जब यह चिता धूम रहित हो जाय, सबै इस पर यथाक्त शय्या आदि बिछाकर, वातहर तेल का मर्दन करके, उष्ण वस्त्र ओढ़कर सोने से मुखपूर्वक पसीना आता है । यह सुखकारक होलाकस्नेद है । ये तेरह प्रकार के स्वेद अग्नि के अधीन हैं, इनका महर्षि ने उपदेश किया है ॥ ६१-६३ ॥
व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा ।
बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः ॥ ६४ ॥
स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते । अग्निरहित स्वेद -- व्यायाम ( शारीरिक भ्रम ), उष्ण सदन ( वायु और शीत स्पर्श रहित तहखाना भूमि के नीचे के गरम घर ), कम्बल आदि भारी वस्त्र, क्षुधा ( भूख ), बहुपान ( गरम पानी या मद्य आदि का बहुत पीना ), भय, क्रोध, उपनाह ( पुलटिस ) आहब ( युद्ध ), आतप ( धूप ), ये दस अग्नि के बिना भी शरीर में स्वेदन करते हैं ॥ ६४ ॥
इत्युक्तो द्विविधः स्वेदः संयुक्तोऽग्निगुणैर्न च ॥ ६५ ॥
एकाङ्ग सर्वाङ्ग -गतः स्निग्धो रूक्षस्तथैव च ।
इत्येतद् द्विविधं द्वन्द्वं स्वेदमुद्दिश्य कीर्तितम् ॥ ६६ ॥
स्निग्धः स्वेदेरुपक्रम्य स्विन्नः पध्याशनो भवेत् ।
तदहः स्विन्नगात्रस्तु व्यायामं वर्जयेन्नरः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार से दो प्रकार की स्वेद कह दिया; अग्नि गुण वाला और अग्नि-गुण रहित, एकांग और सर्वाग स्वेद, स्निग्ध एवं रूक्ष स्वेद, इस प्रकार तीन प्रकार के दो-दो स्वेदों को कह दिया, स्निग्ध मनुष्य की स्वेद द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । स्वेदन हो जाने पर पथ्य भोजन करना चाहिये । स्वेद दिया मनुष्य उस दिन व्यायाम को न करे ॥ ६५-६७॥
तत्र श्लोकाः । वेदो यथा कार्यकरो हितो येभ्यश्च यद्विधः ।
यत्र देशे यथा योग्यो देशो रत्यश्च यो यथा ॥ ६८ ॥
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अ०१५ ] सूत्रस्थानम् १८५
स्विन्नातिस्विन्नरूपाणि तथाऽतिस्विन्नभेषजम् ।
अस्वेद्याः स्वेदयोग्याच स्वेदद्रव्याणि कल्पना ॥ ६६ ॥
त्रयोदशविधः स्वेदो विना दशविधोऽग्निना ।
संग्रहेण च षट्स्वेदाः स्वेदाध्याये निदर्शिताः ॥ ७० ॥
स्वेदाधिकारे यद्वाच्यमुक्तमेतन्महर्षिणा । शिष्यैस्तु प्रतिपत्तव्यमुपदेष्टा पुनर्वसुः ॥ ७१ ॥ इति ।
किस प्रकार से स्वेद कार्य कर सकता है, किनके लिये उपकारी है, किस प्रकार, किस स्थान पर, कैसा स्थान, किस प्रकार रक्षा करनी, सम्यक् स्त्रिच, अतिस्वेद के लक्षण, अतिस्वेद की चिकित्सा, स्वंद के अयोग्य और स्वेद के योग्य, स्वेदन द्रव्य, तेरह प्रकार का स्वेद और विना अग्नि के दस प्रकार का स्वेद, संक्षेप रूप में छः स्वेद - ये सब स्वेदाध्याय में कह दिया । स्वेद अधि- कार में जो कुछ कहना चाहिये था वह सब महर्षि ने कह दिया है । शिष्यों को ठीक २ प्रकार समझना चाहिये, इसके उपदेश करने वाले पुनर्वसु आत्रेय हैं। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के स्वेदाध्यायो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः ।
अथात उपकल्पनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति हम्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब उपकल्पनीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २॥
इह खलु राजानं राजमात्रं वाऽन्यं विपुलद्रव्यं संभृतसंभारं वमनं विरेचनं वा पाययितुकामेन भिषजा प्रागेवौषधपानात्संभारा उपकल्प-नीया भवन्ति, सम्यक्चैव हि गच्छत्यौषधे प्रतिभोगार्थाः, व्यापन्ने चौषधे व्यापदः परिसंख्याय प्रतीकारार्थाः । नहि संनिकृष्टे काले प्रादुर्भू- यामापदि सत्यपि क्रयाक्रये सुकरमाशु संभरणमौषधानां यथा-बदिति ॥ ३ ॥
इस लोक में राजा अथवा राजा के समान ठाठ वाले पुरुष को या बहुत धन और नौकर चाकरों वाले किसी रईस को वमन, विरेचन देने की इच्छा करने
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१०६ चरकसंहिता [ अ०१५ बाले वैद्य को चाहिये, कि, औषध पिलाने से पूर्व ही सब आवश्यक वस्तुएं अपने पास एकत्र कर ले । क्योंकि यदि औषध ठीक प्रकार से काम कर गई तो ये वस्तुवै फिर काम में आ जायेंगी और यदि प्रयोग से कुछ तकलीफ हो गई तो इनकी सहायता से प्रतिकार किया जा सकेगा । और यदि सत्र आवश्यक उपकरणों को समीप में न रक्खा जाय तो उपद्रव हो जाने पर तुरन्त बाज़ार से खरीद कर सब वस्तुओं को लाना भी उतना सरल नहीं होता जितना कि प्रथम से ही सब वस्तुओं का संग्रह करना सरल है । ३ ॥ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-ननु, भगवन्! आदावेव ज्ञानवता तथा प्रतिविधातव्यं यथा प्रतिविहिते सिध्येदेवौषधमेकान्तेन, सम्यक्प्रयोगनिमित्ता हि सर्वकर्मणां सिद्धिरिष्टा, व्यापच्चासम्यकप योगनिमित्ता । अथ सम्यगसम्यक् च समारब्धं कर्म सिध्यति व्यापद्यते वानियमेन" तुल्यं भवति ज्ञानमज्ञानेनेति ॥ ४ ॥
ऐसा कहते हुए भगवान् आत्रेय को अनिवेश बाल—- भगवन्! ज्ञानवान् वैद्य को पहिले से ही चाहिये कि वह संशोधन देने से पूर्व रोगी के बल, आयु, क्रिया, सहनशक्ति, सत्व, देश, काल, दोष का बलावल, प्रकृति आदि बातों का विचार करक योग्य मात्रा में आंषध पिलायें । जिसस कि औषध देने पर वह औषध निश्चय से ही गुणकारी सफर हो । क्योंकि सब कार्यों को भली प्रकार उचित रीति से करने पर सफलता अवश्य होती है । अनुचित राति से करने पर आपत्तियों का दाना भी निश्चित है । और यदि ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म उचित या अनुचित रूप से करने पर कभी सिद्ध हो जाता है, और कभी सिद्ध नहीं होता, तो ज्ञान अज्ञान के समान ही है, पढ़ना न पढ़ना बराबर हो जाता है । ४ । तमुवाच भगवानात्रेयः -शक्यं तथा प्रतिविधातुमस्माभिरस्म-द्विधर्वाऽप्यनिवेश! यथा प्रतिविहिते सिध्येदेवौषधमेकान्तेन, तच्च प्रयोगसौष्ठवमुपदेष्टुं यथावत् न हि कश्चिदस्ति य एतदेवमुपदिष्टमुपधा-रयितुमुत्सहेत, उपधार्य वा तथा प्रतिपत्तुं प्रयोक्तुं वा, सूक्ष्माणि हि दोष- भेषज- देश -काल -बल-शरीराहार-सात्म्य - सत्त्व-प्रकृति- वयसामव-स्थान्तराणि यान्यनुचिन्त्यमानानि विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुली- कुर्युः किं पुनरल्पबुद्धेः? । तस्मादुभयमेतद्यथावदुपदेक्ष्यामः सम्यक्- प्रयोगं चौषधानां व्यापन्नानां च व्यापत्साधनानि सिद्धिरत्तरकालम् || ५|| अनिवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा-हे अभिवेश! औषध देने पर निश्चय रूप से सफल हो, ऐसा औषधोपचार करना हम बा हम जैसे तपोबल द्वारा
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अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १८७ रजस्, तमस् से निर्मुक हुऐ पुरुषों से ही सम्भव है और इस प्रयोग की सफलता को पूरे पूरे रूप से उपदेश करने के लिये कोई तैय्यार नहीं । इसी प्रकार ऐसा भी कोई शिष्य नहीं है जो कि इस प्रयोग को यथावत् रूप में जान सके और जानकर प्रयोग ठीक २ प्रकार से कर सके, ऐसा भी कोई आदमी नहीं है, क्योंकि प्रत्येक पुरुष में दोष, औषध, देश समय, बल, शरीर, भोजन, सात्म्य, सत्व, प्रकृति, और आयु इनकी स्थिति प्रतिक्षण बदलती रहती है । इन दोष आदि की सूक्ष्म विवेचना निर्मल एवं विशाल बुद्धि वाले पुरुष की भी बुद्धि को चकरा देते हैं, फिर अल्पबुद्धि वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या? इसलिये थोड़ी बुद्धि वाले मनुष्य की बुद्धि की व्याकुल करने के कारण दोनों बाते अर्थात् औष-धियों का उचित प्रयोग और औषध प्रयोग के मिथ्यायोग से उत्पन्न आपत्तियों को सिद्धिस्थान में कहेंगे ॥ ५॥
इदानीं तावत्संभारान्विविधानपि समासेनोपदेक्ष्यामः, तद्यथा- दृढं निवासं प्रवातैकदेशं सुखप्रविचारमनुपत्यकं धूमातपजलरजसामन-भिगमनीयमतिष्टानां च शब्द-स्पर्श- रसरूप- -गन्धानां सोदपानोलूखल- मुसल वर्च:स्थान स्नान- भूमि-महानसोपेतं वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं गृहमेव तावत् पूर्वमुपकल्पयेत् ॥ ६ ॥
इस अध्याय में संशोधन के उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का संक्षेप से उपदेश करेंगे । सबसे पहिले मकान बनाने की विद्या ( स्थापत्य कर्म या वास्तुविद्या ) को जानने वाला चतुर शिल्पी ऐसा गृह बनाये जो मज़बूत हो, जिसमें खुश्री वायु सामने से न आकर एक पार्श्व से पर्याप्त मात्रा में आ सके । जिसमें रोगी आराम से घूम-फिर सके, पछाड़ की तराई या पहाड़ पर न बना हो, धुंवा, गरमी, धूप और धूल जिसमें न आ सकें, मन को अच्छे न लगने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जहां पर न जा सकें, पानी का घड़ा, ऊखल, मूसल, मलत्याग का स्थान, स्नानघर, रसोई, पाकशाला साथ हो || ६ || ततः शीळ-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नानुपचार-कुश- लान् सर्वकर्मसु पर्यवदातान् सूपौदन-पाचक-स्नापक -संवाहकोत्थापक- संवेशकौषधपेषकांश्च परिचारकान् सर्वकर्मस्व प्रतिकूलान्, तथा गीत- वादित्रोल्लापक श्लोक गाथाख्यायिकेतिहास पुराण -कुशलानभिप्रायज्ञान- मत देशकालविदः पारिषद्यांश्च तथा लावक- पिञ्जल -शश-हरिणेण- कालपुच्छक-मृग- मातृकोरभ्रान्, गां दोग्ध्रीं शीलवतीमनातुरा जीवद्वत्स
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१८८ चरकसंहिता |अ०१५ सुप्रतिविहित- तृण- शरण-पानीयां, जलपाड्याचमनीयोदकोष्ठमणिक-घट- पिर पर्योग-कुम्भी कुम्भ-कुण्ड- शराव दव-कटोदचन -परिपचन-मन्थान- धर्म-- सूत्र-कार्पासोर्णादीनि च शयनासनादीनि चोपन्यस्त-भृङ्गार- प्रतिग्रहाणि सुप्रयुक्तास्तरणोत्तर-प्रच्छदोपधानानि स्वापाश्रयाणि संवेश- नोपवेशन-स्नेह-+वेदाभ्यङ्ग -प्रदेह- परिषेकानुलेपन- वमन विरेचना स्थापना- नुवासन शिरोविरेचन मत्रोच्चार कर्मणामुपचारसुखानि, सुप्रनालितांप- घानाश्च मुऋण-खर- मध्यमा दृषदः, शस्त्राणि चोपकरणार्थानि घूमनेत्रं च, बस्तिनेत्रं चोत्तरवस्तिकं च, कुशहस्तकं च, तुलां च, मानभ्राण्डं च, घृत-तैल-वसा-मज्ज- क्षौद्र -फाणित-लवणेन्धनोदक-मधु -सीधु -सुरा- सौवी- रक -तुषोदक- मैरेय -मेदक -दधि-मण्डोदश्विद्धान्याम्ल-मूत्राणि च, तथा शालि- षष्टिक मुद्ग - माप -यव- तिल- कुलत्थ -बदर-मृद्वीका काश्मर्य परूषका-भयामलक-विभीतकानि, नानाविधानि च स्नेहस्वेदोपकरणानि द्रव्याणि, तथैवोर्ध्वहरानुलोमिकाभय-भाजि संग्रहणीय दीपनीय -पाचनीयोपशम-नीय वातहराणि समाख्यातानि चाषधानि यच्चान्यदपि किंचिद् व्यापदः परिसंख्यायोपकरणं विद्यात्, यश्च प्रतिभांगार्थ; तत्तदुपकल्पयेत् ॥ ७ ॥
इस के उपरान्त पवित्र शुद्ध स्वभाव, निर्मल आचरण के रोगी से प्रेम रखने वाले, कर्मकुशल, सेवाकर्म में दक्ष, अपने २ कर्म में कुशल ( शिक्षित ) रसोई बनाने में होशियार रसोइये, स्नान कराने वाले हाथ पांव मलने वाले, शरीर को पकड़ थाम कर खड़ा करने वाले, बिठानेवाले औषध दवाई पीसने वाले सब कार्यों में अनुकूल नौकर, गाने बजाने में चतुर, स्तुतिपाठ करने वाले, श्लोक, गाथा, कहानी, आख्यायिका, बात-चीत, इतिहास, पुराण आदि सुनाने वाले, अभिप्रायों, को उसके इशारों से पहिचाननेवाले, मालिक के मन के अनुकूल, देश, काल को समझने वाले यार -दोस्त, सोसायटी के आदमी वहां रहने चाहियें । इसी प्रकार बटेर, कपिञ्जल ( कबड़ा ), खरगोश, हरिण; काला हरिण, कालपुच्छ ( हरिण का भेद ), मृगमातृका ( बड़े पेटवाला हरिण, बारहसींगा ), ओर मेढ़ा इन को भी एकत्र करना चाहिये । दूध देनेवालो, अच्छे शान्त स्वभाव की, रोगरहित, जिसका बछड़ा जीता हो, ऐसी गाय रक्खे । इस गाय के लिये रहने, घास और पानी का अच्छा बन्दोबस्त करे, छोटा पात्र, आचमन का पात्र, पानी रखने का बड़ा पात्र, मणिक ( मटका ), घड़ा, थाली, कढ़ाही, बड़ा घड़ा, मजबूत छोटा कलसा कुंडा गहरा बर्त्तन, ठकोरा, ढक्कन, कड़छी, चटाई, ढांकने का ऊपर का ढक्कन, तेल पकाने की कड़ाही, रई
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अ०१५ ] सूत्रस्थानम १८६ ( मथानी ), मृगछाल, पुराने ( परन्तु साफ धुले ) बस्न, सूत, कपास, रूई, ऊन तथा लेटने या बैठने के साधनों ( खाट, तकिया, आसन ) के पास में पानी बरतने का गंगासागर, पीकदान, और सुन्दर सफेद चांदनी की भांति श्वेत चादर और तकिया लगा पलंग, सुखपूर्वक बैठने के लिये गादी, तकिया या आराम- कुर्सी, एवं स्नेहन, स्वेदन अभ्यंग, प्रलेन, स्नान, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन, मूत्र याग ( पेशाब घर ) का स्थान, मल- त्याग का स्थान ( संडास ), उत्तम एवं मुखकारक तथा साधनयुक्त बनाने । स्वच्छ धुली, चिकनी, खुरदरी, मध्यम रूप की पत्थर की शिला ( सिल, दबाई आदि पीसने के लिये ) एवं कैंची, फांदा गण्डासा, दरांती आदि शस्त्र ये सब पदार्थ एकत्र करे । धूमनेत्र-धूगनलिका, और उत्तर बस्ति का नलिका, बुहारनो ( झाडू ), तराजू, द्रव मापने के लिये पात्र, घी, तैल, वसा, मज्जा, मधु, राव ( आधा पका गुड़ ), नमक, ईंधन, पान, मधु, सीधु, सुरा, कांजी, तुपादक, मैरेय, मेदक, दही, दही का पानो, छाछ, धान्य, कांजी, आठों प्रकार के मूत्र, शालि ( हेमन्त धान्य ), साटो चावल, मूंग, उड़द, जौ, तिल, कुलत्थी, बेर, किशमिस, फालसा, हरद, आंबन्ध, बहेड़ा और नाना प्रकार के स्नेह एवं स्वोदन के साधन, दमन, विरेचन के पदार्थ, संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय, शानक. वातनाशक गण की ओषधियां तथा इनके अतिरिक्त और भी जो सावन या द्रव्य आपत्तियों को दूर करने वाले हों, उनकी ओर जो उपयोग के लिये आवश्यक प्रतीत हों, उन सबका एकत्र करना चाहिये ॥ ७ ॥
ततस्तं पुरुषं यथोक्ताभ्यां स्नेहस्वेदाभ्यां यथानुपपादयेत् । तं चेदस्मिन्नन्तरे मानसः शारीरो वा व्याधिः कश्चित्तीत्रतरः सहसाऽभ्या-गच्छेत्तमेव तावदस्योपावर्तयितुं यतेत । ततस्तमुपावर्त्य तावन्तमेवैनं कालं तथाविधेनेव कर्मणोपाचरेत् ॥ ८ ॥
साधन द्रव्य एकत्र करने के उपगन्त पुरुष को पहिले कही हुई विधि से स्नेह एवं स्ववेदन क्रिया करनी चाहिये । स्नेहन और स्वेदन किया करते हुए च में यदि सहसा कोई भयानक तीव्र, शारीरिक या मानसिक व्याधि उत्पन्न जाय तो स्नेहन और स्वेदन बन्द करके प्रथम उत्पन्न व्याधि का प्रतीकार करना चाहिये । इस उपस्थित रोग के प्रतीकार में जितने दिन लगे, उतने दिनों तक रोग को आराम करना चाहिये ॥ ८॥
ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहत मन समभिसमीक्ष्य सुखोष प्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहत वस्त्रसंवीतं देवताग्नि-दिज-गुरु -वृद्ध-वेद्यानचितवन्तं इष्टे नक्षत्र -तिथि-करण- मुहूर्ते कारयित्वा
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चरकसंहिता [अ० १५ ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधुमधु- सैन्धव-फाणितोपहितां मदन-फल- कषाय -मात्रां पाययेत् ॥ ६ ॥
फिर मनुष्य को स्नेह एवं स्वेदन क्रिया से युक्त कराकर, सुखपूर्वक बिठाकर, पहिले दिन का खाया भोजन जीर्ण होने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके, शरीर पर चन्दन अगरु आदि द्रव्य लगाकर, माला पहिना कर, उत्तम स्वच्छ वस्त्र पहिने हुए, देवता, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध और बैथ की पूजा कराकर, पुण्य नक्षत्र, तिथि मुहूर्त में, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करवा कर प्रशस्त मंगल क्रिया- आशीर्वाद मन्त्रों से अभिमन्त्रित शहद, मुलैहटी, सैन्धव नमक, गुड़ से युक्त मदनफल के कषाय को उचित मात्रा में पिलावे ॥६॥
मदनफल- कषाय-मात्राप्रमाणं तु खल सर्वसंशोधनमात्राप्रमाणानि च प्रतिपुरुषमपेक्षितव्यानि भवन्ति; यावद्धि यस्य संशोधनं पीतं वैकारिक- दोष-हरणायोपपद्यते न चातियोगायोगाथ, तावदस्य मात्रा- प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ १० ॥
मदनफल के कपास की मात्रा, तथा सम्पूर्ण संशोधनों की मात्रा प्रत्येक पुरुष को देखकर निश्चित की जाती है । जितनी मात्रा पान करने पर शरार के विकार जन्य दोषों को बाहर निकाल सके और अतियोग आदि विकार उत्पन्न न करे, उतनी इस संशोधन औषध की मात्रा वैद्य को समझनी चाहिये ॥ पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङक्षेत् । तस्य यदा जानीयात्स्वेद- प्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रच- लितं कुक्षिसमाध्यापनेन च कुक्षिमनुगतं, हृल्लासास्यस्रवणाभ्यामपिचो- र्ध्वमुखीभूतमथास्मै जानुलममसंबाधं सुप्रयुक्तास्तरणोत्तरप्रच्छदोप- धानं स्वापाश्रयमासनमुपवेष्टुं प्रयच्छेत् ॥ ११ ॥
प्रतिग्रहांश्चोपचारयेत्— ललाटप्रतिग्रहे पार्श्वोपग्रहणे नाभिप्रपीडने पृष्ठोन्मदने चानपत्रपनीयाः सुहृदोऽनुमताः प्रयतेरन् ॥ १२ ॥
उचित मात्रा में वमन औषध पिलाकर कुछ काल तक एकाग्र चित्त है ध्यानावस्थित होकर प्रतीक्षा करे और जब पसीना उत्पन्न होकर दोष निकल जावे, शरीर में रोमांच हो तब दोष को अपने स्थान से चलायमान समझे । जब उदर में अफारा प्रतीत हो, उस समय दोष को पेट में आया समझे । जब वमन! की इच्छा, और मुख से थूक गिरने लगे उस समय दोष को एकत्र होकर ऊपर की ओर आता हुआ जानना चाहिये । इसके पीछे रोगी मनुष्य को घुटने उठा-. कर मिलाकर, बैठने को उत्तम गद्दे और चद्दर तथा तकिये से युक्त खाट देवे!
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अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१ वमन करते हुए रोगी को पकड़ कर सहारा देना चाहिये । इसके लिये कोई माथे को कोई पसलियों को पकड़े, काई पेट को दबाये, और कोई पीठ को मले! इस कार्य में जिनके सामने लज्जा अनुभव न हो ऐसे मनोनुकूल मित्र सहा- यता करें ॥११- १२॥ अथैनमनुशिष्यात् त्रिवृतौष्ट -ताल-कण्ठो नातिमहता व्यायामेन वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनस्य ग्रीवामूर्ध्वशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान् प्रवर्तयन सुपरिलिखितनखाभ्यामङ्गुलीभ्यामुत्पल कुमुद-सौगन्धिक-ना- Safarn भिप्रशन् सुखं प्रवत्तयस्व -इति ॥ १३ ॥
स तथाविधं कुर्यात् । ततोऽस्य वेगान् प्रतिग्रहागतानवेक्षेताव- हितः । वेगविशेषदर्शनाद्धि कुशलो योगायोगातियोगविशेषानुपलभेत, वेगविशेषदर्शी पुनः कृत्यं यथार्हमवबुध्येत लक्षणेन, तस्माद्वेगानवे- क्षेतावहितः || १४ || बहुत इसकेअधिकअनन्तरबल से वैद्यनहींरोगी, प्रत्युतकोसाधारणउपदेश देशक्तिकि सेतालुबाहरऔरआतेगलाहुएखोलवेग करको बाहर करे | इसके लिये गर्दन, तथा मुख को आगे की ओर झुका दे तथा अनु- पस्थित वेग को बाहर निकालने के लिये खूब अच्छी प्रकार से नखों से रहित दो अंगुलियों, अथवा कमल, कुमुद या सुगन्धित कमल की डण्डो से धीरे - धीरे गले के भीतर स्पर्श करे और वेग को बाहर कर देवे । रोगी वैद्य के कहे अनु सार करे । वैद्य रोगी के वमन किये पदार्थ को सावधानी से देखे । कुशल, चतुर वैद्य वेग को देख कर ही सम्यक् योग, अयोग और अतियोग का अनु- मान कर सकता है । वेग को समझने में चतुर वैद्य वेग देखकर लक्षणों से अतियोग आदि के प्रतिकार को ठीक प्रकार से समझ लेता है । इसलिये वैद्य सावधानी से वेगों को देखे ॥१३-१४॥ तन्त्रामृन्ययोग- योगातियोग विशेषज्ञानानि भवन्ति, तद्यथा-अप्र-- वृत्तिः कुतश्चित् केवलस्य वाऽप्यौषधस्य विभ्रंशो विबन्धो वेगानामयो- क्षणानि भवन्ति । काले प्रवृत्तिरनतिमहतो व्यथा यथाक्रमं दोषह- रणं स्वयं चावस्थानमिति योगलक्षणानि भवन्ति । योगेन तु दाषप्रमाण- विशेषेण तीक्ष्ण- मृदु - मध्यविभागो ज्ञेयः, योगाधिक्येन तु फेनिल-रक्त- चन्द्रिकोपगमनमित्यवियोगलक्षणानि भवन्ति । तत्रातियोगायोगनि- तिनमनुपद्रवान् विद्यात्- आध्मानं परिकर्तिका परिस्रावो हृदयो- पसरणमङ्गग्रहो जीवादानं विभ्रंशः स्तम्भः क्लम उपद्रव इति ॥ १५ ॥
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१६२ चरकसंहिता [ अ० १५ अयोग, सम्यक् योग और अतियोग के विशेष लक्षण ये हैं । जैसे किसी विशेष कारण से ( गले में अंगुली आदि डालने से भी वमन का थोड़ा आना अथवा, वमनकारक औषध ही का केवल बाहर आना ) वेगों का रुक जाना ये अयोग के चिन्ह हैं । न तो बहुत जल्दी और न देर में ठीक समय पर वमन का आना; वमन करने में कष्ट का अधिक न होना, क्रम से पहले कफ, फिर पित्त और अन्त में वायु इन दोषों का बाहर अना; और वमन का अपने आप रुक जाना सम्यक् योग के लक्षण हैं । सम्यक् योग में दोषों के प्रमाणों के अनुसार तीक्ष्ण, मृदु और मध्य भाग होते हैं । वमन के अतियोग से झागदार, रक्तमिश्रित चन्द्रिका का आना ये अतियोग के लक्षण हैं । अतियोग और अयोग से होने वाले उपद्रवों को जानना चाहिये । अफारा, गुदा में काटने के समान पीड़ा होना, स्राव होना, हृदय का बाहर आना, अर्थात् कलेजे का मुख को आना ( आमाशय का बाहर आना सा प्रतीत होना ), अंगों में वेदना और जकड़ना, रक्त का बाहर निकलना, शरीर का विभ्रम ( चक्कर आना ), शरीर की जड़ता, शरीर में थकान, उदासी का होना, ये अयांग और अतियोग के उपद्रव है ॥ १५ ॥
योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्रक्षालित-पाणि-पादास्यं मुहूर्तमाश्वास्य, स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं साम- येतः पाययित्वा पुनरेवोदकमुपस्पर्शयेत् ॥ १६ ॥
उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातनागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्- उच्चभाष्यमत्यासनमतिस्थानमति चङ्क्रमणं क्रोध-शोक-हिमातपावश्याया- तिप्रवातान्यानयानं प्राम्यवमेमस्वपनं निशि दिवा स्वप्नं विरुद्धाजी-र्णासात्म्याकालप्रमितातिहीन-गुरु- विषम -भोजन वेग- सन्धारणादीरण-मिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमाहारमद्यात् इति । स तथा कुर्यात् ॥ १७ ॥
सम्यक् यांग से वमन कर चुकने पर रोगी को देखकर उसके हाथ पांव, मुख धुलवा कर थोड़ी देर विश्राम लेने दे । इसके पीछे स्नैहिक, गैरेचनिक या । उपशमनीय कोई एक प्रकार का धूम यथाशक्ति पिलाकर फिर पानी से हाथ पांव धुला देवे । पानी से मुंह हाथ धुलाकर वमन किये पुरुष को वायुरहित--सीधी वायु जिसमें न आ सके एक पार्श्व से आये, ऐसे घर में लेजा कर लेटा दे और निम्न आदेश करे –ऊंचा बोलना, बहुत देर बैठना, बहुत सोना, बहुत चलना- फिरना, क्रोध, शोक, ठण्डक, धूप, ओस, वायु में अधिक बैठना, घोड़े आदि की सवारी अधिक करना, मैथुन, रात में जागना, दिन में सोना,