चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 211–220
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 211–220
पृष्ठ 211
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम १६३ विरुद्ध भोजन अजीर्ण, असात्म्यप्रकृति के प्रतिकूल, अकाल, कुसमय, मात्रा से कम, गुरु- भारी और विषम भोजन उपस्थित गेगों को रोकना, अनुपस्थित ोगों को बल पूर्वक बाहर करना, इस प्रकार के कर्मों का विचार मन से भी न करे और सब प्रकार का उचित आहारभोजन करे । वह रोगी इसी प्रकार करे ॥ १७ ॥
सायाह्ने परे वाऽह्नि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालि- तण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलम- भिसमीक्ष्य च एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले । चतुर्थे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालितण्डुलानामुत्स्विन्नां विलेपी मुष्णादकद्वितीयाम- स्नेह लवण| मल्प-स्नेह -लवणा वा भाजयेत् एवं पचने षष्ठे चान्नकाले, सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालानां द्विप्रसृतं सुविन्नमादनमुष्णो- दकानुपानं तनुना तनु- स्नेह लवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भाजयेत्, एवमष्टमे नवमे चान्नकाले, दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्य- तमस्य मांसरसेनीदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्, एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले, अत ऊर्ध्वमन्नगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ १८ ॥
इसके पीछे रोगी को सायंकाल अथवा अगले दिन कुछ गरम पानी से सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराये । एक साल पुराने सांठी चावलों का यवागू बना कर जब गल जावे, तब थोड़ी गरम यबागू के ऊपर की माण्ड की पहिले पीले । फिर अग्नि का बल देखकर शेष गांढ़े भाग को खावे । इसा प्रकार दूसर तीसरे भोजन के समय भी अग्निवल को देखकर इसी प्रकार का यवागूखावं । चौथ भोजन काल में इसी प्रकार पुराने सांठों के चावलों से ( विलेपो रूप में बनाई ) थोड़े नमक और स्नेहरहित यवागूको गरम पानी के साथ खाये । ( प्रथम दो तीन समयों में जल, नमक और स्नेह नहीं खाना चाहिये ) । इस प्रकार पांचवें और छठे अन्न काल में चीये समय के अनुसार बरते । सातवें •भोजन समय में पुराने सांठी के चावलों को दो प्रसूति लेकर पकाये । इन चावलों को गरम पानी के साथ, थोड़े से घी एवं नमक के साथ मूंग के यूष के साथ खावे । इसी प्रकार आठवें और नवे भांजन के समय में भी करे । दसवें अन काल में बटेर, कपिञ्जल आदि किसी पशु-पक्षी के मांस रस के साथ धनी व भाई चावलों की यवागू खाये, तथा गरम पानी ऊपर से पीये । इसी प्रकार ग्यारहवें और बारहवें अन्न काल में क्रम से, मृदु, मध्य, कठिन ( अथवा
पृष्ठ 212
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६४ चरकसंहिता [अ० १५ गुरु, कठिन मधुर ) पदार्थों को सेवन करने पर सात दिन पीछे अपने स्वाभाविक भोजन को ग्रहण करे ॥ १८॥
अथैनं पुनरेव स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृत -होम - बल- मङ्गल-जप्य प्रायश्चित्तमिति- थि-नक्षत्र- करण- मुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्र विकारांच शरीराहार-यथाहोडनप्रतिविनीतंसात्म्य -सत्वव--प्रप्रकृति-पाययेत्वयसामवस्थान्तराणिप्रसमीक्ष्य दोष -भेषज-देश- काल-चल- सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनानन्तरलक्षणोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादये-दाबल- वर्ण-प्रकृति-लाभात् । बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिस मीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुप-हत वरू -संवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत्, अथैनं कामेष्ववसृजेत् ॥ १६ ॥
भवन्ति चात्र--अनेन विधिना राजा राजमात्रोऽथवा पुनः ।
यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमर्हति ॥ २० ॥
दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम् ।
पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ २१ ॥
न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः ।
न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ २२ ॥
यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि ।
तत्तत्सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥ २३ ॥
मलापहं रोगहरं बल- वर्ण-प्रसादनम् ।
पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥ २४ ॥
इसके सात दिन पीछे अब मनुष्य में बल आजाय, तब फिर स्नेहन और स्वेदन कर्म करके, प्रसन्न मन देखकर, रात्रि में सुखपूर्वक सोने पर, पहिले दिन का खाया भोजन भली प्रकार जीर्ण होने पर, अग्निहोत्र, बलि, मंगल, जप, 1 प्रायश्चित्त करके, पवित्र तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त का विचार करके, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करा कर त्रिवृत् कल्क ( विरेचन द्रव्य ) निशोथ के चूर्ण की एक अक्ष मात्रा, योग्य द्रव्य में मिलाकर पिलावे । औषध देते समय दोष, औषध मात्रा, देश, समय, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्व, प्रवृत्ति, आयु और रोगों की विवेचना कर ले । सम्यक् विरेचन होने पर वमन के पीछे की सम्पूर्ण विधि ( धूम्रपान को छोड़कर ) करे । जब तक कि शरीर में बल कान्ति न आय,
पृष्ठ 213
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ० १६ ] सूत्रस्थानम ५६५ शरीर स्वाभाविक रूप में न आय, तब तक बमनान्तर की विधि करे । जब बल और वर्ण आजाय, मन भी स्वस्थ हो जाय, तब सुखपूर्वक सुलाकर खाया हुआ भोजन भली प्रकार पचने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके चन्दन, अगर आदि शरीर में मलकर, माला, स्वच्छ वस्त्र पहिना कर सुन्दर बना कर, आभूषणों से आभूषित करके, मित्रों को दिखाकर, जाति, भाई, बन्धुओं को दिखाये और फिर निल्य के उचित आहार-विहार करने की छूट देदे । इस उपरोक्त विधि से राजा अथवा राजा के समान या बहुत धनी आदमी हो संशोधन करवा सकता है । दरिद्र निर्धन व्यक्ति को जब रोग होजाय और विरेचन लेने का अवसर हो, तो उस समय कठिन उपकरणों को इकट्ठा करना छोड़कर दवाई पान करावे । सत्र मनुष्यों को सब साधन नहीं जुट सकते और निर्धन व्यक्तियों को भयंकर रोग भी नहीं सताते ऐसा नहीं, आपत्ति काल ( रोगावस्था ) में मनुष्य जो भी औषध, वस्त्र या खान-पान कर सके, वह यथाशक्ति उसे करना चाहिये । मल-नाशक, रोगनाशक, बल, कान्ति को बढ़ाने वाले संशोधन औषध को पोकर मनुष्य दीर्घायु होता है ॥ २४ ॥
तत्र श्लोकाः -– ईश्वराणां वसुमतां वमनं सविरेचनम् ।
संभारा ये यदर्थं च समानीय प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
यथा प्रयोज्यं या मात्रा यदयोगस्य लक्षणम् ।
योगातियोगयोर्यश्च दोषा ये चाप्युपद्रवाः ॥ २६ ॥
यदसेव्यं विशुद्धेन यश्च संसर्जनक्रमः ।
तत्सर्वं कल्पनाध्याये व्याजहार पुनर्वसुः ॥ २७ ॥
इसमें इलोक हैं —राजाओं के या धनी पुरुषों के वमन, विरेचन कार्य, उप-करण, इनको एकत्र करने का कारण, मात्रा, प्रयोग विधि, अयोग के लक्षण, योग और अतियोग के दोप, और उपद्रव, संशुद्ध व्यक्ति को क्या सेवन करना, किस प्रकार से छोड़ना, ये सब बातें इस 'कल्पनाध्याय ' में पुनवर्सु आत्रेय ने कह दीं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने उपकल्पनीयां नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
पोडशोऽध्यायः ।
अथातश्चिकित्साप्राभृतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पृष्ठ 214
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१९६ चरकसंहिता [ अ० १६ संशोधन कार्य के अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय' नामक अध्याय का व्यास्थान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।
नरं विरेचयति यं स योगात्सुखमश्रुते ॥ ३ ॥
वैद्यमानत्वबुधो विरेचयति मानवम् ।
सोऽतियोगादयोगाश्च मानवो दुःखमश्रुते ॥ ४ ॥
चिकित्सा प्राभृत चिकित्सा में कुशल या साधन सम्पन्न विद्वान्, ज्ञानवान्, शास्त्रवान्, आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया हुआ, चिकित्सा-कार्य में कुशल वैद्य जिस मनुष्य को वमन, विरेचन द्वारा संशोधन कराता है, वह मनुष्य वमन और विरेचन के सम्यक् योग से सुख भोगता है । अपने को वैद्य मानने वाला मूर्ख वैद्य जिस मनुष्य का वमन विरेचन द्वारा संशोधन कराता है वह मनुष्य वमन विरेचन के अयोग या अतियोग के कारण दुःख भोगता है ॥ ३-४॥
दौर्बल्यं लाघवं ग्लानिर्व्याधीनामणताऽरुचिः ।
हृद्वर्णशुद्धिः क्षुत्तृष्णा काले वेगप्रवर्तनम् ॥ ५ ॥
बुद्धीन्द्रियमनःशुद्धिर्मारुतस्यानुलोमता ।
सम्यग्विरितलिङ्गानि काय।ग्नेश्चानुवर्तनम् ॥ ६ ॥
सम्यग् विरेचन के लक्षण - शरीर में कमजोरी आना. हलकापन, शरीर में लानि ( प्रसन्नता का अभाव ), रोगों का घटना, भोजन में अनिच्छा, हृदय का शुद्ध होना, रंग का निखरना, भूख प्यास, समय पर वेगों का उपस्थित होना, बुद्धि- इन्द्रिय और मन की शुद्धता, प्रसन्नता, अपान वायु का नीचे को जाना और जाठराग्नि का क्रमशः बढ़ना ये सम्यग् योग के लक्षण है ॥ ५-६ ॥
ष्ठीवनं हृदयाशुद्धिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः ।
आध्मानमरुचिश्छर्दिरदौर्बल्य मलाघत्रम् ॥ ७ ॥
जघोरुसदनं तन्द्रा स्तैमित्यं पीनसागमः ।
क्षणान्यविरिक्तानां मारुतस्य च निग्रहः ॥ ८ ॥
विरेचन के अयोग के लक्षण - मुख से थोड़ा २ थूक या ओषध का बाहर आना, हृदय की जड़ता, वमन आने की भांति कफ और पित्त का मुख में आना, पेट में अफारा, भोजन में अनिच्छा, बमन की इच्छा, शरीर में निर्व कता का अनुभव न होना, शरीर में भारीपन, जांघ और टांग में पीड़ा, नींद का भान, शरीर के अंगों का गीले वस्त्र के तुल्य ठंडा प्रतीत होना, सरदी-जुकाम होना, और अपान वायु का रुक जाना, ये विरेचन के अयोग के लक्षण हैं ॥ ७-८॥
पृष्ठ 215
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ०१६ ] सूत्रस्थानम् १६७
विटू-पित्तश्लेष्म वातानामागतानां यथाक्रमम् ।
परं सवति यद्रक्तं मेदोमांसोदकोपमम् ॥ ६ ॥
निःश्लेष्मपित्तमुदकं शोणितं कृष्णमेव वा ।
तृष्यतो मारुतार्तस्य सोऽतियोगः प्रमुह्यतः ॥ १० ॥
विरेचन के अतियोग के लक्षण- गुदा से प्रथम क्रमानुसार मल, पित्त, कफ और वायु बाहर निकलते हैं, परन्तु पीछे में रक्त बहता है । यह रक्त मांसरस, मेद मिश्रित या कफमिश्रित अथवा वित्तमिश्रित पानी की भांति, या लाल अथवा काला होता है । रोगी को वायु के कारण प्यान और मूर्च्छाआ जाती है, ये अतियोग के लक्षण हैं ॥६-१० ॥
वमनेऽतिकृते लिङ्गान्येतान्येव भवन्ति हि ।
उर्ध्वगा वातरोगाश्च वाम्महचाधिको भवेत् ॥ ११ ॥
चिकित्साप्राभृतं तस्मादुपेयाच्छरणं नरः ।
युज्याच एनमत्यन्तमायुषा च सुखेन च ॥ १२ ॥
मन के अतियोग में भी यही विरेचन के अतियोग के लक्षण होते हैं । परन्तु शरीर के कटिभाग से ऊपर बातरोग एवं जवान का रुकना, ये लक्षण विशेष अधिक होते हैं । इसलिये संशोधन कराने वाले मनुष्य को चाहिये कि विद्वान्, कर्मकुशल वैद्य की शरण में जाय जो इस रोगी को वमन विरेचन द्वारा आयु और सुख से युक्त कर सके, मूढ़ अज्ञानी के पास नहीं ॥११- १२॥
अविपाको रुचिः स्थोल्यं पाण्डुता गौरवं क्लमः ।
पिडका-कोठ कण्डूनां संभवोऽरतिरेव च ॥ १३ ॥
आलस्य श्रम -दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यमवसादकः ।
श्लेष्म-पित्त समुत्क्लेशो निद्रानाशोऽतिनिद्रता ॥ १४ ॥
तन्द्रा क्लैब्यमबुद्धित्व मशस्त-स्वप्न -दर्शनम् ।
बल-वर्ण-प्रणाशश्च तृप्यतो बृंहणैरपि ॥ १५ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि तस्मै संशोधनं हितम् ।
ऊध्वं चैवानुलोम्यं च यथादोषं यथाबलम् ॥ १६ ॥
संशोधन योग्य व्यक्ति - अपचन, अरुचि, मोटापा ( स्थूलता ), पाण्डुता, निस्तेज, पीलापन, शरीर का भारीपन, बिना परिश्रम के थकान चढ़ना, उदासी, शरीर पर छोटी २ फुन्सियां होना, कोठ ( छप्पे ) उठना, खाज का होना, बेचैनी, आलस्य, थकान, निर्बलता, शरीर से दुर्गन्ध आना, मन को अवसन्नता, सुस्ती, कफ या पित्त का बढ़ना, नींद का न आना, अथवा नींद का बहुत
पृष्ठ 216
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५६० चरकसंहिता [ अ० १६ आना, नपुंसकता, निरुत्साहता, बुद्धिमान्द्य बुरे भयानक स्वप्नों का आना, बल और कान्ति का नाश होना, पुष्टिकारक आहार खाने पर शरीर का पुष्ट न होना, जिसके शरीर में इनमें से बहुत से लक्षण हों तो उसमें सब दोष बढ़े हैं यह समझकर संशोधन करना हितकारी है । इसलिये अविपाक आदि लक्षणों को देख कर बल और दोष के अनुसार ऊर्ध्व अनुलोमन ( वमन ) या अधो- अनु लोमन ( विरेचन ) रूपी संशोधन देना हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
एवं विशुद्धकोष्ठस्य कायाग्निरभिवर्धते ।
व्याधयश्चोपशाम्यन्ति प्रकृतिश्चानुवर्तते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिर्वर्णश्चास्य प्रसीदति ।
बलं पुष्टिरपत्यं च वृषता चास्य जायते ॥ १८ ॥
जरां कृच्छ्रेण लभते चिरं जीवत्यनामयः ।
तस्मात्संशोधनं काले युक्तियुक्तं पिबेन्नरः ॥ १६ ॥
दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः ।
जिताः संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २० ॥
दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति ।
रोगाणां प्रसवानां च गतानामागतिर्भुवा ॥ २१ ॥
भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् ।
घृत- मांस -रस -क्षीर- हृद्य-यूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैर्निरूहेः सानुवासनैः ।
तथा स लभते शर्म युज्यते चाऽऽयुषा चिरम् ॥ २३ ॥
संशोधन का फल - इस उपरोक्त विधि से मनुष्य का कोष्ठ ( उदर ) साफ़ होने पर जाठराग्नि बढ़ जाती है, रोग शान्त हो जाते हैं, शरीर स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है । इन्द्रियां, मन-बुद्धि और कान्ति निर्मल हो जाती है । शरीर में बल, शक्ति, सामर्थ्य, संतान और पुरुषत्व उत्पन्न हो जाता है । बुढ़ापा देर में आता है और नीरोगी होकर मनुष्य देर तक जीता है । इसलिये मनुष्य दोष- संचयकाल में और संशोधन काल में वमन विरेचन कार्य को युक्तियुक्त रूप में करे । लंघन ( उपवास ) और पाचन रूपी संशमन क्रिया द्वारा वश में 1 किये हुए दोष कभी फिर भी ( समय मिलने पर ) कुपित हो सकते हैं; परन्तु जो दोष संशोधन कार्य के द्वारा वश में कर लिये जाते हैं, वे फिर कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि दोषों या वृक्षों का मूल अवशेष रहने पर रोगों अथवा न नष्ट होने पर रोगों की उत्पत्ति फिर हो जानी सम्भव होती है । औषध द्वारा दोष की जड़ कट जाने पर संशुद्ध हुए पुरुष को पथ्यकारक एवं शरीर
पृष्ठ 217
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६६ को बढ़ाने वाले भोजन देवे । यथा घो, मांसरस, दूध, हृदय के लिये हितकारी या मन को अच्छे लगने वाले यूप आदि बनाकर देवे शरीर पर तेल मलना, उबटन लगाना, स्नान, निरूह बस्ति, अनुवासनयस्ति का प्रयोग करे । इस प्रकार करने से सुख मिलता है तथा देर तक आयु का भोगता है ॥१७- २३॥
अतियोग होने पर क्या करना चाहिये- अतियोगानुबद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते ।
तेलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् ॥ २४ ॥
यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् ।
मात्रा- काल-बलापेक्षी स्मरन पूर्वमनुक्रमम् ॥ २१ ॥
स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये ।
जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ २६ ॥
जिन पुरुषों में अतियोग के लक्षण हो, उनके लिये उन उन रोगों को शान्त करने वाली उन औषधियों से सिद्ध किया घृत पान करावे और मधुक अर्थात् जीवनीयगण से सिद्ध तेल अनुवासन बस्ति के रूप में दे । जिस पुरुष में अयोग के लक्षण हों, उसको फिर से स्नेह और स्वेद देकर, पूर्व कही हुई मात्रा को, समय, वल आदि को क्रम से स्मरण करता हुआ, फिर से संशोधन के लिये देव । स्नेहन, स्वेदन संशोधन और पेयादि क्रम से विधिपूर्वक क्रिया न होने से जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, उनकी चिकित्सा ' सिद्धिस्थान' में कहेंगे । पहले जो मात्रा दी थी दुबारा उससे कुछ अधिक देवे ॥ २४-२६॥
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देद्दधातवः ।
हेतुसाम्यात्समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा ॥ २७ ॥
प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् ।
केचित्रापि मन्यन्ते हेतुं इतोरवर्तनम् ॥ २८ ॥
शरीर को धारण करने वाले जो धातु हैं वे कारणों की विषमता अर्थात् बढ़ने या घटने से बढ़ते या घटते हैं और शरीर के धातु कारण की समानता से समान रहा करते हैं । विषम और सम धातुओं का सदा स्वभाव से नाश होता है । इस समता और विषमता की निरन्तर प्रवृत्ति में ऐसा कारण रहता है । जिससे कि उनका वृद्धि और क्षय होता है, अर्थात् साम्य या विषमता के होने में कोई कारण अवश्य होता है, विना कारण इनके स्वाभाविक धर्म में अन्तर नहीं आता । धातु एक क्षण भी विषमावस्था में नहीं रह सकते । यह उनका धर्म है । सब पदार्थों की उत्पत्ति का कारण होता है, परन्तु विनाश कार्य में
पृष्ठ 218
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०० चरकसंहिता [ अ० १६ कारण नहीं होता । इसलिये कुछ आचार्य पदार्थों के निरन्तर विनाश में कारण की अपेक्षा नहीं करते हैं । कुछ विद्वान् पदार्थों के नाश में उत्पादक या प्रवर्तक कारण के अभाव को ही कारण मानते हैं ॥ २७-२८॥
एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत ।
arrate कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २६ ॥
भेषजे विषमान् धातून कान समीकुरुते भिषक् ।
का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ ३० ॥
तच्छिष्यवचनं'श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः । इस प्रकार कहते हुए आचार्य पुनर्वसु को लक्ष्य करके अग्निवेश बोले— भगवन्! शरीर की धातुर्वे जब स्वतः अपने स्वभाव में आ जाती हैं तब चिकित्सा के साधनों से सम्पन्न वैद्य से कर्म साध्य क्या है । फिर क्या काम? और तब किन विषम हुए धातुओं का ओषधियों से वैद्य समान करता है? और यदि धातुओं की विषमता ही सदा रहे, तब चिकित्सा क्या वस्तु है? और यदि विषमता का नाश सदा होना ही अवश्यम्भावी है, फिर वैद्य किस लिये चिकित्सा कर्म करते हैं? इस प्रकार अग्निवेश के वचन को सुनकर पुनर्वनु आत्रेय बोले ॥ श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥ ३५ ॥
ननाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् ।
ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥ ३२ ॥
शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते ।
निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ ३३ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां स्मृतम् ॥ ६४ ॥
कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति ।
समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया ॥ ३५ ॥
त्यागाद्विषमतूनां समानां चोपसेवनात् ।
विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥ ३६ ॥
सस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून संजनयेत्समान् ।
चिकित्साप्राभृतस्तस्माद्दाता देहसुखायुषाम् ॥३७ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च ।
दावा संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् ॥ ३८ ॥
हे सौम्य! जो युक्ति महर्षियों ने बुद्धि द्वारा देखी, वह सुनो । नित्यगमन-
पृष्ठ 219
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०१ अ० १६ ] सूत्रस्थानम् शील काल के नाथ के कारण की तरह नाश के कारण के अभाव से पदार्थों के नाश का कारण नहीं जाना जाता । कोई भी पदार्थ जैसा उत्पन्न होता है, वैसा ही शीघ्रगामी होने से नष्ट होता है । उनके विनाश में कोई कारण नहीं है । उनमें किसी संस्कार का आधान नहीं किया जा सकता । पदार्थों के नाश होने के कारण का पता नहीं चलता क्योंकि नाश के कारण का ही अभाव है । जैसे- नित्य काल का भी नाश होता दिखाई देता है, परन्तु इस नाश के कारण का पता नहीं चलता, क्योंकि यह काल बहुत शीघ्रगामी है । धातु-पदार्थ भी काल के समान बहुत शीघ्रगामी है इसलिये इनके नाश का कारण न होने से ही अज्ञात है । धातुओं की पूर्वावस्था के निरोध में भी कोई कारण नहीं है । जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर के अन्दर विषम हुए धातु समानावस्था में आते हैं, उन क्रियाओं को रोगों की चिकित्सा कहते हैं, यह 'चिकित्सा ' वैद्यों का कर्म है । शरीर के अन्दर धातुओं में विषमता उत्पन्न न हो और समान अवस्था में ही धातु सदा बने रहें, इसलिये चिकित्सा क्रिया की जाती हैं । काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थों के अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग इन विषम हेतुओं के छोड़ने से, समयोग रूप में कारणों के सेवन करने से धातु विषम नहीं होते, और विषम हुए धातु समान हो जाते है । चिकित्सा- कुशल वैद्य समान कारणों से धातुओं को समान बनाने का यत्न करें । इस प्रकार करने से वैद्य शरीर के सुख और आयुष्य अर्थात् दीर्घायु को प्रदान करता है । मनुष्य को शारीरिक सुख और आयुष्य प्रदान करने से वैद्य इहलोक एवं परलोक दोनों लोकों में धर्म, अर्थ और काम ( त्रिवर्ग ) को देने वाला होता है ॥ ३१-३८ ॥
तत्र श्लोकाः-चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः ।
योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥ ३६ ॥
बहुदोपस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये ।
चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धि-व्यापत्ति -संश्रयम् ॥ ४० ॥
या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् ।
चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ४१ ॥
चिकित्साप्राभृत में वैद्य के गुण वैद्य के विपरीत मूढ़ वैद्य के अवगुण, संशोधन के सम्यक्योग और अतियोग के लक्षण; बहुत दोषों के लक्षण, संशोधन केगुण, चिकित्सा का सूत्र रूप, चिकित्सा के युक्तियुक्त होने में शंका- समाधान;
पृष्ठ 220
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०२ चरकसंहिता अ० १७ - चिकित्सा का प्रयोजन –ये सब बातें 'चिकित्सा-प्राभृतीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने उपदेश की हैं ॥ ३६-४१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाच चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥
इति कल्पनाचतुष्कः समाप्तः ॥ ४ ॥
सप्तदशोऽध्यायः ।
अथातः कियन्तः शिरसीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति स्माsss भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रोगों को उपदेश करने की इच्छा से ' कियन्तःशिरसीयं ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ कियन्तः शिरसि प्रोक्ता रोगा हृदि च देहिनाम् ॥ ३ ॥
कति चाप्यनिलादीनां रोगा मानविकल्पजाः ।
क्षयाः कति समाख्याताः पिडकाः कति चानघ ॥ ४ ॥
गतिः कतिविधा चोक्ता दोषाणां दोषसूदन । अग्निवेश ने पूछा कि हे दोषों को नाश करने वाले महर्षि! मनुष्यों के शिर सम्बन्धी रोग कितने हैं? हृदय सन्बन्धी रोग कितने हैं? बात आदि दोनों के संसर्ग भेद से कुल कितने प्रकार के रोग हो जाते हैं? क्षय रोग कितने प्रकार के हैं? पिकायें कितनी प्रकार की हैं? और दोषों की गति कितने प्रकार की है? कृपा कर कहिये ॥ ३-४॥ हुताशवेशस्य वचस्तच्छ्रुत्वा गुरुरत्रवीत् ॥ ५ ॥
पृष्टवानसि यत्सौम्य तन्मे शृणु सुविस्तरम् ।
दृष्टाः पञ्च शिरोरोगाः पञ्चैव हृदयामयाः ॥ ६ ॥
व्याधीनां द्वधिका षष्टिर्दोष-मान-विकल्पजा ।
दशाष्टौ च क्षयाः सप्त पिडका माधुमेहिकाः ॥ ७ ॥
दोषाणां त्रिविधा चोक्ता गतिविस्तरतः शृणु ।
सन्धारणादिवास्वप्नाद्रात्री जागरणान्मदात् ॥ ८ ॥
उच्चैर्भाष्यादवश्यायात्प्राग्वातादतिमैथुनात् ।
गन्धादसात्म्यादाघाताद्रजो धूम-हिमातपात् ॥ ६ ॥