चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 31–40
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 31–40
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अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३ इस प्रकार सामान्य आदि छः कारणों का वर्णन किया गया है । अब उनका कार्य कहा जाता है । इस शास्त्र में 'धातुओं का साम्य करना' ही -प्रयोजन भीकार्य है [ घट-पट आदि कार्य नहीं है ] । इस शास्त्र का -१ धातुओं को समान रखना ही है । क्षीण हुए धातु बढ़ाने चाहिये, बढ़े हुए घटाने चाहिये और समान का रक्षण करना चाहिये । जैसा कि आगे कहेंगे- 'प्रयाजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं, आतुरस्य विकारप्रशमनञ्च' || ५३ ||
धातुओं के विपम होने का कारण - कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ ५४ ॥
काल [ शीत व ग्रीष्म रूपी संवत्सर अथवा परिणाम ],बुद्धि, और इन्द्रि वार्थ [ इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ] इन तीन के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग होने से दोनों प्रकार की शारीरिक और मान-सिक व्याधियां उत्पन्न होती है ॥ ५४ ॥
शरीर सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनाम०श्रयो मतः ।
तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः ॥ ५५ ॥
शरीर और सत्त्व ( मन ) वे दोनों ही [ पृथक् रूप से एवं सम्मिलित रूप में ] रोगों की अधिष्ठान भूमि है । और जिस प्रकार ये दोनों व्याधियों का आश्रय स्थान हैं, इसी प्रकार सुख का भी आश्रय स्थान यही हैं । - सुख का कारण काल, बुद्धि और इन्द्रियों के विषयों का, सम [ उचित रूप में ] योग होना ही आरोग्य का कारण हैं । कहा भी है- "मुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः” ॥ ५५ ॥
आत्मा का स्वरूप कहते हैं- निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः ।
चैतन्ये कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः ॥ ५६ ॥
१. "त्रीण्यायतनानीत्यथांनां, कर्मणः: कालस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगाः । असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविधविकल्पाती विकारकारणम् ” ॥ " समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति” । च० ॥
२. वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्व सेन्द्रियः ।
केशलोमनखाग्रान्तमलद्रवगुणैर्विना ॥ चरक ॥
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१४ चरकसंहिता [अ० १ निर्विकार ' और सूक्ष्म आत्मा, मन, शब्दादिगुण, इन्द्रियों द्वारा चैतन्य में कारण हैं, वह नित्य है, साक्षी है, क्योंकि वह सब क्रियाओं को देखता है । अचेतन शरीर और मनके चैतन्य में यह आत्मा ही कारण है; और वह नित्य है!
रोग प्रकृति- वायुः पित्त कफश्वोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः ।
मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ ५७ ॥
संक्षेप रूप में शारीरिक दोषों के कारण वात, पित्त और कफ हैं । और मानसिक दोषों के कारण रज और तम हैं । शारीरिक कोई भी रोग इन वात, पित्त, कफ के विना नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥
इनका प्रतीकार- प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वा दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः ।
मानसो ज्ञानविज्ञानधेर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ५८ ॥
शारीरिक दोष देव व्यपाश्रय और युक्ति-व्यपाश्रय औषधियों से शान्त हो जाते हैं | मानसिक दोष ज्ञान ( आत्मा आदि के ), विज्ञान अर्थात् शास्त्र ज्ञान, ( धैर्य्य ) चित्त की स्थिरता, (स्मृति) अनुभूत पदार्थ का स्मरण, (समाधि) विषयों से मन को हटा कर आत्मा में लगाना इनसे शान्त हो जाते हैं । देव-व्यपाश्रय -मणि, मन्त्र, ओषधि, बलि, उपहार, होम, नियम प्रायश्चित्त आदि कर्म जो कि देव को आश्रय कर किये जाते हैं । युक्ति -व्यपाश्रय अर्थात् योजना, युक्ति को आश्रय कर किये गये संशो-धन, संशमन आदि कर्म ॥ ५८ ॥
वायु का लक्षण -- रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मवलोऽथ विशदः खरः ।
विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ ५६ ॥
वायु-रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल अर्थात् गतिशील, विशद अर्थात्- अपि- १. स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ॥ श्रुतिः । २ वायु को प्रथम लिखा है, क्योंकि वात जन्य रोग ही सत्र से अधिक हैं, 'अशीतिर्वात विकाराः' एवं 'वायुरेव भगवान्' वायु सबसे प्रबल है । सर्वेषाञ्च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एवं मूलं तल्लिङ्गत्वात् दृष्टफलत्वादा-गमाश्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यते । एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वात-पित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते || सुश्रुतः ॥
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अ० १: सूत्रस्थानम् १५ च्छिल और खर (कठोर) है । वह इन से विपरीत गुण वाले स्निग्ध, उष्ण गुरु, स्थूल, स्थिर, पिच्छिल और मृदु द्रव्यों से शान्त होता है । शीत से वायु बढ़ता है और उष्णता से कम होता है, इसलिये वायु को वैद्यक शास्त्र में शीत प्रकृति माना है । वैशेषिक दर्शन में इस को अनुष्णाशीत कहा'है-'अनुष्णाशीतः स्पर्शस्तु पचने मतः ॥ ० ॥ ५६ ॥
पित्त का लक्षण-
सस्नेह मुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु ।
विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यराश प्रशाम्यति ॥ ६० ॥
स्नेहसहित अर्थात् थोड़ा स्निग्ध, उष्ण ( गरम), तीक्ष्ण [ शीघ्र कार्य करने बाला, सूई की तरह तेज़ ], द्रव, अम्ल ( खट्टा ), सर ( गमनशील ), और कटु रस है । पित्त विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥६० ॥
कफ का लक्षण - गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः ।
ष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणगुणाः ॥ ६१ ॥
गुरु, शीत, मृदु,स्निग्ध, मधुर, स्थिर, और पिच्छिल ये कफ के गुण हैं । इन से विपरीत गुण वाले पदार्थों से ये गुण शान्त होते हैं । [ इन गुणों के शान्त होने से गुणी कफ भी शान्त हो जाता है ] ॥ ६१ ॥
साध्य रोगों की शान्ति- विपरीतगुणैर्देश मात्र कालोपपादितैः ।
भेषजैर्विनिवर्त्तन्ते विकाराः साध्यसंमताः ॥ ६२ ॥
साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते ।
भूयश्वातो यथाद्रव्यं गुणकर्म प्रवक्ष्यते ॥ ६३ ॥
विपरीत गुण वाले [ हेतु -विपरीत, व्याधि-विपरीत और हेतु और व्याधि दोनों के विपरीत और कार्य करनेवाले ] द्रव्यों की देश मात्रा, काल के अनुसार योजना करने पर औषध से साध्य व्याधियां शान्त हो जाती हैं, असाध्य रोग अच्छे नहीं होते । और जो रोग औषधियों से असाध्य हैं उन के लिए औषध का उपदेश भी नहीं किया जाता । इसके आगे फिर विस्तार से एक-एक द्रव्य के गुण कर्म को आचार्य कहेंगे ॥ ६२-६३ ॥
रसों की उत्पत्ति- रसनार्थो रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा ।
निर्वृत्तौ चच, विशेषे च प्रत्ययाः खाद्यस्त्रयः ॥ ६४ ॥
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१९ चरकसंहिता [ अ० १ रसनेन्द्रिय से ग्राह्यगुण रस है । इस रस की उत्पत्ति में आधार कारण जल और पृथिवी हैं । इस रस के भेद करने में आकाश, वायु और अग्नि ये तीनों निमित्त कारण होते हैं । वास्तव में रस को उत्पत्ति स्थान जल है और पृथ्वी इसका आधार है । क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से मिल जाता है । “बिष्टं ह्यपरं परेण ” न्याय० । जल और पृथ्वा म आकाश, वायु और अग्नि का भी
अंश समाविष्ट रहता है । कहा भी है- तेषामेकगुणं पूर्व गुणवृद्धिः परे परे ।
पूर्वः पूर्वी गुणश्चैव क्रमश गुणिषु स्मृतः ॥
इसीलिए, इस एक रस के छः भेद हो जाते हैं । जैसे --पृथिवी और जल की अधिकता से मधुर, पृथ्वी और आग्न को अधिकता से अम्द, जल और अग्नि की अधिकता से लवण, वायु और अग्नि की अधिकता से कटु, वायु और आकाश का अधिकता से तिक्त और वायु और पृथ्वी को अधिकता से कपायरस बनता है ॥ ६४ ॥
स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च ।
कषायश्चेति पट्काऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः ॥ ६८ ॥
स्वादु मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कपय येला संक्षेप से रस हैं । विस्तार से इनके परस्पर संयोग से ६३ भेद हो जाते हैं ॥ ६५ ॥
रसों के द्वारा दोपों की शान्ति--- स्वाद्वम्ललवणा वायुं कषायस्वादुति ककाः ।
जयन्ति पित्तं, श्लेष्माणं कषायकटुतिक्तकाः ॥ ६६ ॥
स्वादु, अम्ल और लवण ये रस वायु का शमन करतेहैं, कराय, मधुर और तिक्त रस पित्त को, कपाय, कटु और तिक्त रस कफ को शान्त करते हैं । कटु, अम्ल और लवण रस पित्त को कुपित अर्थात् उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं, स्वादु, मधुर अम्ल और लवण रस कप को, कटु, तिक्त और केपाय रस वायु को बढ़ाते हैं । इन रसों में प्रत्येक रस के द्रव्य, गुण और कर्म आगे( आत्रेय भद्रकाप्यीय नामक २६ वें अध्याय ) में विस्तार से कहेंगे ॥ ६६ ॥
द्रव्य के भेद-
किलिदोषप्रशमनं किंचिद्धातुप्रदूषणम् ।
स्वस्थवृत्तौ हिते किचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ ६७ ॥
द्रव्य तीन प्रकार के हैं । ( १ ) कुछ द्रव्य वात आदि दोषों का शोधन एवं शमन करते हैं । जैसे - तेल वायु का, घी पित्त का और मधु कफ का
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अ०१ सूत्रस्थानम् १७ शमन करता है और ( २ ) कुछ द्रव्य शरीरको धारण करनेवाले वात आदि वा रम आदि को दूषित वा कुपित करते हैं और ( ३ ) कुछ द्रव्य स्वास्थ्य कारक्षण करते ६, वे स्वस्थ अवस्था के लिए हितकारी हैं । जैसे-लाल चावल, सांडी के चावल, जो जीवन्ती शाक आदि । "शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा । " वाग्भटः ॥
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं जाङ्गमोद्भिदुपार्थिवम् ।
मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जासृगामिषम् ॥ ६८ ॥
विण्मूत्रं चर्म रेतोऽस्थि स्नायुः शृङ्गं खुरा नखाः ।
जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः ॥ ६६ ॥
द्रव्य फिर तीन प्रकार के है ( १ ) (जांगम ) प्राणियों से उत्पन्न होने वाले, आर ( २ ) ( आदि ) भूमिकोभेदन करके पृथ्वी में से उत्पन्न होने वाले वनस्पति आदि ( ३ ) ( पार्थित्र ) भूमि से उत्पन्न होने वाले स्वनि । अंगम द्रव्य- मधु ( शहद) १ गोरस, दूध, घी, आदि, पित्त, वसा (चर्ची), मज्जा, रक्त, मांस, विष्ठा, मूत्र, चर्म, वीर्य अस्थि, स्नायु, सींग, नख, खुर, (केश) शिर के बाल ( रोम ) शरीर के बाद रोचना अर्थात् गोरोचना, ये जंगमप्राणियों से लेकर व्यवहार में लाये जाते हैं ॥ ६८-६६ ॥
भीम द्रव्य- सुवर्ण समलाः पञ्च लोहाः ससिकताः सुधा ।
मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाखने ॥७० ॥
भौमौषधमुद्दिष्टम्, औद्भिदं तु चतुर्विधम् ।
वनस्पतिरुच वानस्पत्यस्तथौपधिः ॥ ७१ ॥
स्वर्ण, और इसका मल (शिलाजीत) पांच प्रकार के लोह जैसे रांगा, ताम्बा, चांदी और लोहा, ( सिकता ) बालू, (सुधा) चूना, पार्थिव विप, मनः शिला, (आल ) हरताल, (मणि) स्फटिक आदि, लवण सैन्धव आदि, [ गैरिक ] गेरु, ( अंजन ) सुरमा, ये पार्थिव औषध कहे हैं औद्भिद द्रव्य चार प्रकार के हैं । वनस्पति, वीरुत्, वानस्पत्य और ओषधि ॥ ७०-७१ ॥
फलैर्वनस्पतिः, पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि ।
ओषध्यः फलपाकान्ताः, प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥ ७२ ॥
( १ ) जिनमें बिना पुष्प के फल आता है, वे 'वनस्पति' हैं, जैसे गूलर, वट १. माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं मधुजातयः ।
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१८ चरकसंहिता [अ० १ पिलखन आदि, ( २ ) जिनमें फल और पुष्प दोनों आते हैं उनको ' वानस्पत्य' अर्थात् वृक्ष कहते हैं, जैसे आम, जामुन आदि, ( ३ ) जो फल आने पर नष्ट हो जाते हैं, उनको ' ओषधि' कहते हैं जैसे धान, चावल, जौ, गेहुं आदि और (४ ) जो लता के समान फैलने वाली हैं उनको 'वीरुधू कहते हैं जैसे गिलोय आदि ॥ ७२॥
औद्भिद पदार्थों के काम में आने वाले अंगः- मूलत्वक्सारनिर्यासनालस्वर सपल्लवाः ।
क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः ॥ ७३ ॥
पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाचौद्भिदो गणः । मूल, त्वचा, (सार) ७.न्दरका स्थिर सार भाग, (निर्यास ) गोंद, (नाइ) नाल, (स्वरस ) पीड़न करके द्रव्य से निकाला हुआ रस, ( पल्लव ) परो आम, जामुन आदि के, क्षार, (क्षर) दूध, थर आदि के फल, पुष्प, भस्म, तैल मिलावे आदि का; कांटे, पत्ते, शुंग अर्थात छोटे २ कांटे जो वृक्ष पर होते हैं जैसे सिम्बल के, कन्द अर्थात् फलद्दीन औषधियां के मूल, ( प्ररोह ) अंकुर यह ' औद्भिद गण ' हैं । बनस्पतियों के ये उपरोक्त अंश याम में आते हैं ॥ ७३ ॥
मूलिन्यः पोड कोनाः फलिन्यो विंशतिः स्मृताः ॥ ७४ ॥।
महास्नेहाञ्च चत्वारः पश्चैव लवणानि च ।
अष्टौ मूत्राणि सङ्घातान्यष्टाचेव पयांसि च ॥ ७५ ॥
शोधनार्थाश्च पड़ वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः ।
य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित् ॥ ७६ ॥
जिन वनस्पतियों का मूल प्रयोग करने योग्य है वे 'मूलिन ' हैं । ऐसी वन-स्पतियां सालइ हैं, और जिन वनस्पतियों का फल उपयोगीहै वे 'फलिनी' हैं, ऐसी वनस्पतियां उन्नीस हैं । चार महास्नेह हैं जैसे वी, तैन्द्र, बसा, औरमजा; पांच प्रकार के नमक हैं, आठ प्रकार के मूत्र और आठ ही प्रकार के दूध और संशोधन के लिये छः वृक्ष पुनर्वसु आत्रेय मे कहें हैं । जो विद्वान् वैद्य रोगों में इन सब का प्रयोग करना जानता है वह आयुर्वेद को भली प्रकार से जानता है || ७४-७६ ||
सोलह ' मूनि' ओषधियों की गणना- हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा ।
सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक्श्रेणी गवाक्ष्यपि ॥ ७७ ॥
ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका ।
अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी ॥ ७८ ॥
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अ० १ ] सूत्रस्थानम् १६ १ हस्तीदन्ती ( चका ), २ हैमवती ( श्वेत वच ), ३ श्यामा (त्रिवृत ), ४ त्रिवृत् ( लाल जड़ वाली निशोथ ), ५ अधोगुडा ( विधारा ), ६ ससला ( शिकाकाई ), ७ श्वेतनाम ( श्वेत कोयल ), ८ प्रत्यक् श्रेणी ( दन्ती जमाल-गोटा ), ६ गवाक्षी ( इन्द्रायण ), १० ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), ११ बिम्बी ( कन्दूरी ), १२ शणपुष्पी ( झन झनियां ), १३ विराणिका ( उत्तरण ), १४ अजगन्धा ( हूकू ), १५ द्रवन्ती ( जंगली एरण्ड ), १६ क्षीरिणी ( हिरवी ) ये सोलह हैं || ७७-७८ ॥ इनके कर्म-
शणपुष्पीच बिम्बी च छर्दने हैमवत्यपि ।
श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने ॥ ७६ ॥
एकादशावशिष्टा याः प्रयोज्यास्ता विरेचने ।
इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः फलिनीः शृणु ॥ ८८ ॥
ऊपर कही हुई सोलह मूलिनी ओपधियों में शणपुष्पी, विम्बी, और हैम- वती ( श्वेतवचा ) ये तीन वमन कार्य में प्रयोग करनी चाहिये, श्वेत अपराजि-ता, ज्योतिष्मती ये दोनों शिरोविरेचन में, और शेष ग्यारह वनस्पतियां विरेचन कार्य में प्रयोग करनी चाहिये । सब कामों में इनके मूल ही काम में लाने चाहिये । इस प्रकार से ये सोच्छु 'मूलवाली, वनस्पतियां नाम और कर्म सहित कह दी गयी हैं । 'फलिनी' वनस्पतियों का नाम सुनो ॥ ७६-८० ॥
शङ्खिन्यथ विडङ्गानि त्रपुषं मदनानि च ।
आनूपं स्थलजं चैव क्लीतकं द्विविधं स्मृतम् ॥ ८१ ॥
धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ।
प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्युक्पुष्पा तथाऽभया ।
अन्तः कोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्व शारदम् ॥ ८२ ॥
कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत्कुटजस्य च ।
धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ॥ ८३ ॥
शंखिनी, विडङ्ग ( वायविडंग ), त्रपुष ( खीरा, ककड़ी ) मदन (मैन- फल ), आनूप क्लीक ( जल में पैदा होने वाली मुलहठी ), स्थलज क्लीतक शुष्क भूमि में पैदा होने वाली मुलहठी ), धामार्गव ( बड़ी तुरई ) इक्ष्वाकु ( कड़वी तुरई ), जीमूत ( वन्दाल ), कृतवेधन ( तुरई ), कडुवी प्रकीर्य्या और उदकीय ( दो प्रकार के करंज ), प्रत्यक् पुष्पा ( अपामार्ग ), अभया ( हरक ), अन्तःकोटरपुप्पी ( घाव पत्ता ), शारदा इस्तिपर्णी ( हस्तिपर्णी के
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२० चरकसंहिता [अ० १ शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ), कम्पिल्लक (कमीला), आरग्बध ( अमलतास), कुटज ( कूड़े का फल, इन्द्र जौ ), ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां हैं ॥ ८१-८३ ॥
इनके कर्म- मदनं कुटजं चैव पुषं हस्तिपर्णिनी ।
एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च ॥ ८४ ॥
नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पा विधीयते ।
दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने ॥ ८५ ॥
धामार्गव, इक्ष्वाकु, जीमूत, अमलतास, मैनफल, कुड़े का फल, खारा, और हस्तिपर्णी के शरद ऋतु में उत्पन्न फल ये आठ वनस्पतियां वमन, आस्थापन और निरूह बस्ति कर्म में प्रयोग करना चाहिये । अपामार्ग ( चिरचिटे ) का फल नस्य कर्ममें प्रयोग करना चाहिये । और शेष दस वनस्पतियों का प्रयोग विरेचन कार्य में करना चाहिये । इस प्रकार से ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां नाम और कम्पं द्वारा कह दी है । ४८५ ॥
चार प्रकार के स्नेह- नामकर्मभिरक्तानि फलान्ये कानविंशतिः ।
सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेही चविधः ॥ ६ ॥
सर्पि ( घी ), तेल, वसा ( चर्चा ) और मजा ( जवा गुडायोंके भीतरी भाग का स्नेह, चिकनाई ) व चार कह है ॥ ८६ ॥
इनके कर्म कहते है:-- पानाभ्यञ्जनस्त्यर्थं नस्वाथ वयाः ।
स्नेहना जीवना बल्या वशपचयवर्धनः ॥ ८ ॥
स्नेहा होते च विहिता वातपित्तकफापहाः! ये चारों स्नेह ( पान ) शरीर में मुख मार्ग से देने, शरीर पर मालिश करने, ( बस्ती ) गुदा या उपस्थमार्ग से देने, और ( नस्य ) नाक से देने में प्रयुक्त होते हैं । ये स्नेह शरीर का स्नेहन करते हैं, शरीर को जीवन देते हैं. शरीर का तर्पण करते हैं, बल और शक्ति को बढ़ाते हैं । ये स्नेह बात, पित्त और कफ को नष्ट करते हैं ॥ ८७ ॥
लवण-- सौवर्चलं सैन्धवं च बिडमौद्भिदमेव च ॥ ८८ ॥ }
सामुद्रेण सहतानि पञ्च स्युर्लवणानि च । पांच प्रकार के नमक है । ( १ ) सैन्धव (सेन्धा नमक ) सब नमकों में श्रेष्ठ
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अ० १ ] सूत्रस्थानम् २१ (२)सौवर्चल ( संचल ), (३) (बिड ) काला नमक, (४) ( औद्भिद ) काच नमक और (५) सामुद्र, समुद्र के पानी से तैय्यार किया हुआ, ये पांच प्रकार के लवण या नमक हैं ॥ ८८ ॥
लवणों के कर्मी स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतनानि च ॥ ८६ ॥
आळेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधा तथा ।
अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने ॥ ६० ॥
अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरस विरेचने ।
शस्त्रकर्मणि वस्त्यर्थमञ्जनात्सादनेषु च ॥ ६१ ॥
अजीर्णानाहयावति गुल्ने झूले तोदरे ।
उक्तानि लवणानि, ऊर्ध्व सूत्राण्यष्टी निर्वाध मे ॥ ६२ ॥
ये ननक स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और दीपनीय अर्थात् विशेष रूप से अग्नि बढ़ानेवाले हैं । ये नमक आलेपन में, स्नेहन में, और स्वेदन कार्य में, अधोभाग-विरेचन और ऊर्ध्व विरेचन द्वारा दोपों को बाहर निकालने में, निरूहण में, अनु वासन में, अभ्यङ्ग में, भोजन में, ओर शिर के विरेचन में, शस्त्र कर्म में, वत्ति अर्थात् फल वर्त्ति आदि में, अञ्जन में, उबटन में, अजीर्ण में, अफारे में,
वायु रोग में, गुल्म में शूल रोग में, और उदर रोगों में प्रयोग किये जाते हैं ।
ये पांचों प्रकार के नमक कह दिये ॥ =६-२ ॥
आट मूत्र- मुख्यानि यानि यानि सर्वाण्यायशासने ।
अविमूत्रमजासूत्रं गोमत्रं माहिषं तथा ॥ ६३ ॥
हस्तिमुत्रमथस्य यस्य च खरस्य च । अब जो मुख्य आठ मूत्र आत्रेय ऋषि ने कहे हैं वे सुनिये— ( १ ) भेड़ का मूत्र, ( २ ) बकरी का मूत्र, (३ ) गाय का मूत्र, ( ४) भैंस का मूत्र, ( ५ ) हाथी का सूत्र, ( ६ ) ऊँट का मूत्र, ( ७ ) घोड़े का मूत्र और (८ ) गधे का मूत्र ये आठ प्रकार के सूत्र हैं ' ॥ ६३ ॥
सूत्रों के सामान्य गुण - उष्णं तीक्ष्णमथो रूक्षं कटुकं लवणान्वितम् ॥ ६४ ॥
मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च । १. गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम् ॥ ” भावप्रकाश ।
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२२ चरकसंहिता [अ० १ युक्तास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने ॥ ६५ ॥
स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमानाद्देष्वगदेषु च ।
उदरेश्वथ चार्शःसु गुल्मकुष्ठकिलासिषु ॥ ६६ ॥
तद्युक्तमुपनाहेषु परिपेके तथैव च ।
दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपदिश्यते ॥ ६१ ॥
पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं सर्वथोच्यते ।
श्लेष्माणं शमयेत्पीतं मारुतं चानुलोमयेत् ॥ ६८ ॥
कर्पेपित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसंग्रहः ।
सामान्येन मयोक्तस्तु पृथक्त्वेन प्रवक्ष्यते ॥ ६६ ॥
ये आठों प्रकार के मूत्र गरम, तांक्ष्ण, रूखे, कटु रस, और लवण रस से युक्त हैं । आटों प्रकार के मूत्र उत्सादन में, आलेपन में, प्रलेवन में, आस्थापन में निरूह में, विरेचन में स्वेदन में, नाड़ीस्वेद में, आनाह अर्थात् अफारे में, अगद अर्थात्विपनाशक औषधियों में प्रयुक्त होते हैं । उदर रोगों में, अर्श रोग में, गुल्म, कुछ (कोट ) और किलास (कुछ का भेद), उपनाह, पुलटिस आदि में, परिषेक अर्थात् सेचन कार्य में प्रयुक्त होते | ये मूत्र (दीपन) अग्निदीपक, (विपन्न) विपनाशक, और (क्रिमिघ्न) कृभि-नाशक कहे जाते हैं । ये पाण्डु रोगियों के लिये पान, आहार और भेपज आदि कल्पना में उत्तम, हितकारी हैं । पिया हुवा मूत्र श्लेष्मा ( कफ) को शमन करता है, वायुको अनुलोमन करता है, और पित्त को अधोमार्ग में खींचता है, पित्त का विरेचन करता है । ये आठों सूत्रोंके सामान्य से गुण ऋद्ध दिये हैं । ६५-६६ ॥ आठों मूत्रमें से एक एक के जो पृथक २ गुण है आगे कहे जातेहैं—
अविमूत्रं सतिक्तं स्यात्स्निग्धं पित्ताविरोधि च ।
आज कंपायमधुरं पथ्यं दोपान्निहन्ति च ॥ १०० ॥
गव्यं समधुरं किंचिद्दोपघ्नं क्रिमिकुष्ठनुन् ।
कण्डूलं शमयेत्पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम् ॥ १०१ ॥
अर्श:शोफोदरघ्नं तु सक्षारं माहिषं सरम्! हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम् ॥ १०२ ॥
प्रशस्तं वद्धविण्मूत्रविषश्लेष्मामयार्शसाम् ।
सतिक्तं श्वासकासन्नमर्शोघ्नं चौष्टमुच्यते ॥ १०३ ॥।
वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्ठत्रणविषापहम् ।
खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम् ॥ १०४ ॥