चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 221–230

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 221–230

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३

गुर्वम्ल-हरितद्दानादतिशोताम्बु- सेवनात् ।

शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् वाष्पनिग्रहात् ॥ १० ॥

मेघागमान्मनस्तापाद्देशकाल -विपर्ययात् ।

वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्त्रं च दुष्यति ॥ ११ ॥

ततः शिरसि जायन्ते रांगा विविधलक्षणाः । अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु महाराज बोले- हे सौम्य! जो कुछ तुमने पूछा है उसको ध्यान देकर सविस्तर मुनां । शिर के रोग पांच प्रकार के हैं, और पांच ही प्रकार के हृदय रोग हैं । दोषों के वात- पित्त -कफ के परिमाण से होने वाले रांग बासठ ( ६२ ) प्रकार के हैं । क्षय अट्ठारह ( १८) प्रकार के, प्रमेह मधुमेह के कारण होने वाले फोड़े सात प्रकार के, और दोषों की गति तान प्रकार की है । इसी को अब विस्तार से सुनां । मूत्र आदि के उपस्थित गोंको रोकने से, दिन में सोने से, रात्रि में जागने से, नशा करने ( मदकारक पदार्थों के सेवन ) से, ऊँचे या अधिक बोलने से, ओस से 9 सामने की वायु के झोंके से, अति स्त्री-संभोग से,असात्म्य अर्थात् प्रतिकूल, गंध के सूंघने से, धूल धुवां बर्फ या धूप के सेवन से, गरिष्ठ,खट्टे घनिया -मरिच आदिके अधिक खाने से बहुत ठण्डे पानी के सेवन से, शिर पर चोट लगने से, आम के दोष युक्त होने से ( अजीर्ण होने से ), रोने से, आंसुओं को रोकने से, बादलों के आने से, मानसिक विक्षोभ से, देश-काल के बदलने से ( इन के अयोग अतियोग या मिथ्यायोग होने से ), ( अथवा भूकम्प, उल्कापात आदि देश के मिथ्यायोग हैं इनसे वात, पित्त और कफ दूषित होकर शिर में रक्त को दूषित करते हैं । रक्त के दूषित होने से आगे कहे जाने वाले नानाप्रकार के लक्षणों वाले रोग थिर में उत्पन्न होते हैं ॥५- ११॥ प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥

यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते । प्राणधारियों के प्राण ( जीवन ) और सब इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) जहां पर स्थित हैं और जो शरीर के सब अंगों में मुख्य, श्रेष्ठ अंग है, उसको 'शिर' कहते हैं || १२|| referent वा स्यात्सवं वा रुज्यते शिरः ॥ १३ ॥

प्रतिश्या-मुख-नासाक्षि कर्ण -रोग-शिरोभ्रमाः ।

अदितं शिरसः कम्पो गलमन्या-धनुग्रहः ॥ १४ ॥

विविधाचापरे रोगा वातादि-क्रिमि -संभवाः ।

पृष्ठ 222

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२०४ चरकसंहिता [अ०१७ पृथग्दृष्टास्तु ये पञ्चसंग्रहे परमर्षिभिः ॥ १५ ॥

शिरोगांस्तान शृणु मे यथास्वैर्हेतुलक्षणैः । शिर में उत्पन्न होने वाले रोग - आधे शिर का दुखना, सारे शिर का दुखना, प्रतिश्याय ( जुकाम, सर्दी ), मुखरोग, नासिका के रोग, आंख के रांग, शिर में चक्कर आना; चेहरे का लकवा, शिर का हिलना, गलग्रह ( गले का बन्द होना ), मन्याग्रह ( गर्दन का इधर उधर न मुड़ सकना ), हनुग्रह ( जवादी भिचना ) और दूसरे वात आदि दोषों तथा कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोग शिर में होते हैं । बात, पित्त, कफ, सन्निपात और कृमिजन्य ये जो पांच प्रकार के शिरोरोग ( आगे जो अष्टोदरीय अध्याय १६ में ) महर्षियों ने कहे हैं उनमें से एक एक लक्षण सुनो ॥ १३-१५ ॥ उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां तीक्ष्णपानात्प्रजागरात् ॥ १६ ॥

शीत मारुत-संस्पर्शाद्व्यवायाद् वेगनिग्रहात् ।

अभिघातोपवासाच विरेकाद् वमनादपि ॥ १७ ॥

वाष्प-शोक-भय -त्रासाद् भार-मार्गातिकर्षणात् ।

शिरोगता वै धमनीर्वायुराविश्य कुप्यति ॥ १८ ॥

ततः शूलं महत्तस्य वातात्समुपजायते ।

निस्तुद्येते भृशं शङ्खौ घाटा संभिद्यते तथा ॥ १६ ॥

भ्रुवोर्मध्यं ललाटं च तपतीवातिवेदनम् ।

वध्येते स्वतः श्रोत्रे निष्कृष्येते इवाक्षिणी ॥ २० ॥

घूर्णतीव शिरः सर्वं संधिभ्य इव मुच्यते ।

स्फुरत्यतिशिराजालं स्तभ्यते च शिरोधरा ॥ २१ ॥।

स्निग्धोष्णमुपशेते च शिरोरोगेऽनिलात्मके । ऊंचे बोलने से, बहुत अधिक बोलने से, मद्य आदि तीक्ष्ण पदार्थों के पीने से, रात्रि में जागने से, ठण्डी वायु के स्पर्श से, अतिमैथुन से, मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, उपवास से, शिर पर चांट लगने से, अतिविरेचन से, अतिवमन से, वाष्प ( आंसु ) को रोकने से, शोक से भय से, भार के उठाने से, अतिमार्ग के चलने से, परिश्रम से वायु कुपित होकर सिर में गया हुआ, सिराओं में बढ़कर शिर में महान् शूल को उत्पन्न करता है । इस शूल के कारण शंख ( कनपटियों ) पीड़ित होते हैं, गर्दन फटती है, भ्रुवों के बीच में माथे पर बहुत वेदना होती है और माथा बहुत गरम होता है । कानों में गुंजार ( आवाज ) सुनाई देती है, आंखें बाहर निकलती प्रतीत होती हैं, शिर घूमता

पृष्ठ 223

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२०५ ० १७ ] सूत्रस्थानम् होती हैं, शिराओं के अन्दर हुआ प्रतीत होता है, शिर की सन्धियां फटती होतीप्रतीतहै, गर्दन जड़ बन जाती है, धड़कन विशेष ( स्पन्दन ) रूप से प्रतीतस्निग्ध और उष्ण क्रिया आराम देत

इधरप्रतीत -उधरहोता हैनहीं। येदिलाईवातजन्यजा सकतीशिरोरोगऔरके लक्षण हैं ॥१६-२१ ॥

कट्वम्ललवण-क्षार -मद्य क्राधातपानलेः ॥ । २२ ॥

पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुप्यते ॥। २३॥ दह्येते चक्षुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते ॥ २४ ॥ - आम्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरुस्निग्धातिभोजनैः। श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते ॥ २५ ॥

शिरो मन्दरुजं तेन सुप्तस्तिमितभारिकम् ।

भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकम् ॥ २६ ॥

बाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहा मदस्तृषात्रिदोषजे । कफाद् गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगेभोजनात् ॥ २७ ॥ क्लेदोऽसृकफतिल -क्षीर-गुडाजीर्ण--मांसानांपूतिदाषमस्योपजायते- संकीर्ण ।

॥ २८|| ततः शिरसि संक्कंदात्क्रिमयः पापकर्मणः । जनयन्ति व्यवच्छेद-रुजाशिरोरोगं-कण्डूशांफ-जाता- दौर्गन्ध्यबीभत्स-दुःखितम्लक्षणम् ॥। २६ ॥ क्रिमिरोगातुरं विद्यात्क्रिमीणा लक्षणेन च के सेवन से, पिचजन्य शिरीरंग —कडुबे, खट्टे, नमकीन, क्षार पदार्थोंशिर में कुपित होकर शराब के पीने से, कांध से धूर से, आगमें सेजलन शिरोरोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर हैं,,पिचप्यासऔरहोतीपीड़ाहै होती, चक्करहै, आतातथा शीत उपचार अनुकूल पड़ता है । आंखें जलती में निरुद्योगी आलस्य का सुख- है, और पसीना आता है । कफजन्य शिगेरोगसोना, गुरु, भारी और स्निग्ध घी आदि मय जीवन व्यतीत करना, दिन में अर्थात् कफ शिर में कुपित होकर शिरो- युक्त पदार्थों के अतिभोजन से श्लेष्मा में रोगको उत्पन्न करता है । इससे शिर है धीमी, भारी२ होवेदनाजाताहोतीहै । हैतन्द्रा, शिर, कार्यसोयामें हुआ सा प्रतीत होता है, शिर जड़ हो जाता उत्पन्न हो जाती है । त्रिदोषजन्य अनिच्छा, आलस्य और भोजन में अवचि कम्पन, पित्त के कारण जलन, शिरोरोग बात के कारण चकर आना औरऔर तन्द्रा, त्रिदोष जन्य शिरोरोग मूर्च्छा और प्यास, कफ के कारण भारीपन,

पृष्ठ 224

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२०६ चरकसंहिता [अ० १७ में होती है । कृमि जन्य शिरोरोग -तिल, दूध, गुड़ इनके अधिक सेवन से, अजीर्ण और दुग्धयुक्त सड़ा गला भोजन करने से, संकीर्ण ( बहुत गढ़बद चीजें मिलाकर ) भोजन करने से शिर के वातादि दोष बढ़कर शिर में रक्त, कफ और मांस को दूषित बनाकर रोग उत्पन्न करते हैं । पाप करनेवाल पुरुष के शिर में इस क्लेद से कीड़े उत्पन्न होकर बीभत्स अर्थात् घृणाजनक भयंकर शिरोरोग उत्पन्न करते हैं । इससे काटने, छेदने, के समान पीड़ा, खाज, सूजन, दुर्गन्ध और बहुत अधिक कष्ट होता है । इन लक्षणों को तथा कृमियों को देखकर कृमिरोग समझना चाहिये ॥ २२-२६ ॥ पांच प्रकार के हृदयरोग- शोकोपवास व्यायाम-शुष्क- रूक्षाल्प-भोजनैः ॥ ३० ॥

वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् ।

वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमहिः शून्यता दरः ॥ ३१ ॥

हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना ।

उष्णाम्ल लवण-क्षार -कटका जीर्ण भोजनैः ॥ ३२ ॥

मद्यक्राधातपेश्वाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति ।

हृद्दाहस्तिक्तता वक्त्रे तिक्ताम्लो गिरणं क्रमः ॥ ३३ ॥

तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्त-हृद्रोगलक्षणम् ।

अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम् ॥ ३४ ॥

निद्रासुखं चाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् ।

हृदयं कफहृद्रोगे सुप्त-स्तिमितभारिकम् ॥ ३५ ॥

तन्द्रा रुचि परीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा ।

हेतु- लक्षण-संसर्गादुच्यते सान्निपातिकः ॥ ३६ ॥

( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः )

त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते ।

तिल-क्षीर-गुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ ३७ ॥

मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्वास्योपगच्छति ।

संक्लेदात्क्रिमयश्वास्य भवन्त्युपहतात्मनः ॥ ३८ ॥

ममैकदेशे गंजाताः सर्पन्ता भक्षयन्ति च ।

तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते ॥ ३६ ॥

छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जात कण्डू महारुजम् ।

हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैलिङ्गैर्बुद्धवा सुदारुणम् ।

त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥ ४० ॥

पृष्ठ 225

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[अ०] १७ ] सूत्रस्थानम् २०७ ( १ ) शोक, उपवास, व्यायाम ( परिश्रम ), रूक्ष, शुष्क, और स्वल्प भोजनों से कुपित होकर वायु हृदय में जाकर इसको दूषित करके तीव्र वेदना को उत्पन्न करती है । इससे कम्पन, ऐंटन के समान वेदना, जड़ता, मूच्छा, शून्यता ( ज्ञान का अभाव ), चक्कर आना आदि लक्षण वातजन्य हृदय वेदना में होते हैं | भाजन के जीर्ण होनेपर ये लक्षण बहुत बढ़ जाते हैं । ( २ ) पित्त-जन्य हृदय शूल - गरम, खट्टे, नमकीन, क्षार, कटु रस के अधिक सेवन से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, मद्यपान से, क्रोध या धूप में बैठने या चलने से, पित्त हृदय में पहुंचकर जल्दीही कुपित हो जाता है, कुपित होकर तीव्र वेदना उत्पन्न करता है । इस कारण हृदय में जलन, मुख में कडुआपन, खड्डे, पित्तयुक्त डकार का आना, बिना परिश्रम के थकान, प्यास, मूर्च्छा, चक्कर आना, पसीना आना ये पित्तजन्य हृदयशूल के लक्षण हैं । ( ३ ) कफजन्य हृदयशूल - बहुत परिणाम में भोजन करने से, भारी, स्निग्ध पदार्थों के सेवन से, चिन्ता न करने या थोड़ा करने, शारीरिक चेष्टाओं के कम करने से, दिन में बेफिकरी से सोने और अधिक सोने से कफ कुपित होकर हृदय में जाकर रस को दूषित करके हृदयशूल उत्पन्न करता है । इसके कारण हृदय सोया हुआ, सुस्त, गीले वस्त्र से ढंपा हुआ सा, भारी प्रतीत होता है और आलस्य, अरुचि उत्पन्न होती है और ऐसा मालूम होता है कि किसी ने हृदय पर पत्थर रख दिया हो । ( ४ ) त्रिदोषजन्य हृदय शूल- तीनों दोषों के मिलने से, तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न होते हैं, उसको त्रिदोषजन्य हृदयशूल कहते हैं । ( ५ ) कृमि जन्य —त्रिदोषजन्य हृदयरोग में जो दुरात्मा तिल, दूध, गुड़ ( अजीर्णावस्था में भोजन, सड़ा हुआ भोजन, विरुद्ध भोजन आदि ) सेवन करता है, उसके हृदय के एक भाग में ग्रन्थि ( गांठ ) उत्पन्न हो जाती है तथा रस का संक्लिन्न-भाग सड़ने लगता है । रस के संक्लेदन से कृमि उत्पन्न हो जाते हैं । ये कृमि हृदय के एक भाग में उत्पन्न होकर अन्य स्थान में फैलने लगते हैं और हृदय को खाने लगते हैं । इस अवस्था में रोगी को ऐसी वेदना होती है मानों कोई उसके हृदय में सुईयां चुभा रहा है । शस्त्रों से कोई हृदय को काटता है, हृदय में बहुत खाज एवं पीड़ा उठती है । इन लक्षणों को देखकर कृमिजन्य भयानक हृदय रोग को समझकर विद्वान् शीघ्र मृत्यु करने वाले रंग को शान्त करने का यत्न करे || ३०-४० ॥

द्वयुल्बणैकोल्बणैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट् ।

मैको विकारास्ते सन्निपातात्रयोदश ॥। ४१ ॥

सर्गे नव पद तेभ्य एकवृद्धचा समैस्रयः ।

पृष्ठ 226

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२०८ चरकसंहिता [अ० १७ पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धर्व्याधयः पञ्चविंशतिः ॥ ४२ ॥

यथा वृद्धैस्तथा क्षीर्दोषैः स्युः पञ्चविंशतिः ।

वृद्धि- क्षय-कृतञ्चान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते ॥ ४३ ॥

वृद्धिरेकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः ।

द्वन्द्व-वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥ ४४ ॥

वात आदि दोषों के परस्पर संसर्ग से होने वाले विकारों के बासठ ( ६२ ) भेद- बढ़े हुए वात, पित्त, कफ के परस्पर संसर्ग ते सन्निपात जन्य तेरह ( १३ ) विकार होते हैं । दो दोषों की अधिकता और एक की न्यूनता से ( वात-पित्त बढ़े, कफ कम हो, पित्त -कफ बढ़े और वात कम हो, वात कफ बढ़े और रित कम हो ) तीन; एकदोष की वृद्धि और दो दोष की न्यूनता से ( वात बढ़े, पित्त-कफ न्यून, पिच बढ़े वायु-कफ न्यून; कफ बढ़े और वायु-पित्त न्यून ) तीन; इस प्रकार छः सन्निपात हैं; हीन, मध्य और अधिक भेद से ये छः सन्निपात हैं ( जैसे - वृद्ध बात, वृद्धतर पित्त, वृद्धतम कफ; वृद्ध बात, वृद्धतर कफ, वृद्धतम पित्त; वृद्ध पित्त, वृद्धतर कफ और वृद्धतम वात; वृद्ध कफ, वृद्ध तर वात और वृद्धतम पित्त ) और वात- पित्त कफ तीनों दोषों के बढ़ने से एक प्रकार का इस प्रकार से तेरह प्रकार के सन्निपात हैं । अब दो दोषों के भेद कहते हैं - बढ़े हुए वात, पित्त, कफ इनमें किन्हीं दो दोषों के परस्पर मिलने से नौ भेद हो जाते हैं । यह संयोग एक-एक दोष की वृद्धि से छः प्रकार का, और तीनों की समान वृद्धि से तीन प्रकार होता है । छः प्रकार का यथा- वृद्ध वात अधिक, वृद्ध पित्त; वृद्ध पित्ताधिक, वृद्ध वात; वृद्ध वाताधिक, वृद्ध करु; वृद्ध कफाधिक, वृद्ध वात, वृद्ध पित्ताधिक वृद्धकफ, वृद्धकफाधिक वृद्ध पित्त -ये छः प्रकार का तीन प्रकार का यथा -वृद्ध समवात पित्तज, वृद्ध समवातकफज, वृद्ध समपित्तकफज । इस प्रकार से नौ प्रकार का हुआ । पृथकू रूप में बढ़े हुए वात, पित्त, कफ से ( अलग- अलग उत्पन्न हुए ) रोग तीन प्रकार से होते हैं । यथा वृद्धवातज वृद्धपित्तज और वृद्धकफज । इस प्रकार बढ़े हुए दोषों से २५ प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार दोषों के बढ़ने से २५ मेद बनते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पच्चीस भेद बन जाते हैं । वृद्धि और क्षय द्वारा उत्पन्न भेदों के अतिरिक्त दोषों के अन्य भेद बतलाते हैं । यथा-एक दोष की वृद्धि, एक दोष की समता, और एक दोष का क्षय । यथा वृद्ध वात, समर्पित, क्षीण कफ; वृद्ध वात, सम कफ, क्षीण पित्त; वृद्ध पित्त, सम बात, क्षीण कफ; वृद्ध पित्त, सम कफ, क्षीण पित्त;

पृष्ठ 227

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सूत्रस्थानम् २०६ ० १७ ] १४ वृद्ध कफ, सम पित; क्षण बात; वृद्ध कफ, सम बात, क्षीण पित्त ये छः प्रकार । दो दोषों की वृद्धि और एक दोष का क्षय, यथा वृद्ध पित्त कफ, क्षीण वात; वृद्ध वात कफ, क्षीण पित्त; वृद्ध वात पित्त, क्षीण कफ, यह तीन प्रकार का । एक दोष की वृद्धि और दो दोषों का क्षय यथा वृद्ध कफ, क्षीण बात -पित्त, बुद्ध पिच क्षीण कफ त्रात, वृद्ध वात क्षीण पित्त-कफ ये तीन । इस प्रकार से ये बारह भेद उपरोक्त पचास भेद से पृथक हैं । कुल मिलकर बासठ ( ६२ ) मेद हो जाते हैं ॥ ४१-४४॥

प्रकृतिस्थं यदा पित्तं मारुतः श्लेष्मणः क्षये ।

स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति ॥ ४५ ॥

तदा भेदश्च दाहच तत्र तत्रानवस्थितः ।

गादेशे भवत्यस्य श्रमा दौर्बल्यमेव च ॥ ४६ ॥

साम्ये स्थितं कफं वायुः क्षीणे पित्ते यदा बली ।

कर्षे कुर्यात्तदा शूलं सशैत्य-स्तम्भ -गौरवम् ॥ ४७ ॥

यदाऽनिलं प्रकृतिगं पित्तं कफपरिक्षये ।

संरुणद्धि तदा दाहः शूलं चास्योपजायते ॥ ४८ ॥

श्लेष्माणं हि समं पित्तं यदा बातपरिक्षये ।

निपीडयेत्तदा कुर्यात्सतन्द्रागौरवं ज्वरम् ॥। ४६ ॥

• प्रवृद्धो हि यदा श्लेष्मा पित्ते क्षीणं समीरणम्।

रुन्ध्यात्तदा प्रकुर्वीत शीतकं गौरवं रुजम् ॥ ५० ॥

समीरणे परिक्षीणे कफः पित्तं समत्वगम् ।

कुर्वीत संनिरुन्धानो मृद्वग्नित्वं शिरोग्रहम् ॥ ५१ ॥

निद्रां तन्द्रां प्रलापं च हृद्रोगं गात्रगौरवम् ।

नखादीनां च पीतत्वं ष्ठीवनं कफपित्तयोः ॥ ५२ ॥

निवातस्य तु कफः पित्तेन सहितश्चरन् ।

करोत्यरोचकापाकौ सदनं गौरवं तथा ॥ ५३ ॥

इल्लासमास्यस्रवणं दूयनं पाण्डुतां मदम् ।

विरेकस्य हि वैषम्यं वैषम्यमनलस्य च ॥ ५४ ॥

क्षीणपित्तस्य तु श्लेष्मा मारुतेनोपसंहितः ।

स्तम्भं शैत्यं च तोदं च जनयत्यनवस्थितम् ॥ ५५ ॥

गौरवं मृदुतामग्नेर्भकाश्रद्धां प्रवेपनम् ।

नखादीनां च शुरूत्वं गात्रपारुष्यमेव च ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 228

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२१० चरकसंहिता [अ०१७

ही कफे मारुतस्तु पित्त' तु कुपितं द्वयम् ।

करोति यानि लिङ्गानि शृणु तानि समासतः ॥ ५७ ॥

भ्रममुद्वेष्टनं तोदं दाहं स्फुटनवेपने ।

अङ्गमर्द परीशोषं दूयनं धूपनं तथा ॥ ५८ ॥

वात-पित्त-क्षये श्लेष्मा स्रोतांस्यपि दधद्भृशम् ।

चेष्टा-प्रणाशं मूच्छां च वाक्सङ्गं च करोति हि ॥ ५६ ॥

श्लेष्मवातक्षये पित्तं देहौजः स्रंसयेच्चरत् ।

ग्लानिमिन्द्रियदौर्बल्यं तृष्णां मूच्छां क्रियाक्षयम् ॥ ६२ ॥

पित्त -श्लेष्म-क्षये वायुर्मर्माण्यभिनिपीडयन् ।

प्रणाशयति संज्ञां च वेपयत्यथवा नरम् ॥ ६१ ॥

जिस समय कि पित्त अपनी प्रकृति में होता है और कफ क्षीण होता है, उस समय वायु पित्त को उसके स्थान से लेकर शरीर में इधर-उधर दौड़ता है । जिससे कि फटने की सी दर्द, जलन, थकान और निर्बलता उत्पन्न होती है । शरीर में कफ के प्रकृत अवस्था में होने से, पिच के क्षीण होने पर कुपित वान् वायु कफ के साथ मिलकर वेदना, जड़ता, ठण्डक और भारीपन शरीर में उत्पन्न करती है । शरीर में कफ क्षीण हो, पित्त कुपित हो, वायु प्रकृति रूप में हो, तो पित्त वायु की गति बन्द करके जलन और दर्द उत्पन्न करता है । कफ समानावस्था में हो, पित्त कुपित और वायु का क्षय हो तो, कफ को रोककर पित्त शरीर में तन्द्रा अर्थात् आलस्य, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है । क्षीण हो, और वायु समानावस्थ हो, तोकफ बढ़ा हुआ हो, पित्त ठण्डक, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर कफ वायुकी गति कोवायु का क्षय हो बन्द, पित्तकरके समानावस्था में हो, कफ बढ़ा हुआ हो, तो कफदेता पित्तहै । की गति को बन्द करके, मन्दाग्नि, शिर का जकड़ना, नींद का आना, आलस्य, प्रलाप, हृदय रोग, शरीर का भारीपन, नख, श्रेष्ठ, आंख आदि को पीलापन तथा थूक में कफ और पित्त आने लगता है । वायु क्षीण हो और कफ एवं पित्त दोनों बढ़े हुए एक साथ मिलकर शरीर में अरुचि, अविपाक भोजन का अपचन, पीड़ा, भारीपन, वमन की रुचि, मुख से लार गिरना, पीड़ा, पीलापन, नशा सा मल त्याग में विषमता, मल का कभी आना कभी नहीं आना, इसी प्रकार अग्नि की विषमता कभी भूख लगना और कभी नहीं लगना ये लक्षण उत्पन्न करते हैं । पित्त के क्षीण होने पर कफ वायु के साथ मिलकर शरीर में जड़ता, उण्डक, कभी यहां और कभी वहां अनिश्चित स्थान पर वेदना, भारीपन, अग्नि की निता, भोजन में अनिच्छा, कम्पन, नल ( मल, ओष्ठ,

पृष्ठ 229

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अ०१७ ] सूत्रस्थानम २११ आंख ) में सफ़ेद रंग और शरीर में रूक्षता अर्थात् रूखापन आ जाता है । कफ के क्षीण होने पर, वायु और पित्त दोनों कुपित होकर जो लक्षण शरीर में उत्पन्न करते हैं, उनको संक्षेप से तुनो । शिर में चक्कर आना ऐंठन की पीड़ा, चुभने की सी दर्द, जलन, शरीर का फटना, कम्पन, अंगों का टूटना, शुष्कता, पीड़ा और धूप में बैठने से जैसे अंग गरम हो जाते हैं ऐसी जलन होती है । वात और पित्त दोनों क्षीण हों, केवल कफ बढ़ा हो तो सब स्रोतों को कफ रोक लेता है । इससे क्रियायें नष्ट हो जाती हैं, मूर्च्छा, जीभ वाणी का बन्द हो जाना होता है । कफ और वात के क्षीण होने पर पित्त गति करता हुआ शरीर के ओज ( कान्ति ) को चलायमान कर देता है । शरीर में ग्लानि, थकान, इन्द्रियों की दुर्बलता, प्यास, मूर्च्छाऔर चेष्टाओं का नाश हो जाता है । पित्त और कफ के क्षीण होने पर वायु मर्म स्थानों को विशेष रूप में पीड़ित करती है । इससे मनुष्य की संज्ञा ( चना ) नष्ट हो जाती है, अथवा मनुष्य कांपता है ॥ ४५-६१ ॥

दोषाः प्रवृद्धाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथाबलम् ।

श्रीणा जहति लिङ्गं वं समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ ६२ ॥

बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने ( स्वाभाविक ) लक्षणों को उन्नति की अवस्था में दिखाते हैं । यथा- पित्त का स्वाभाविक लक्षण उष्णत्व है । बढ़ने पर तीन उष्णिमा उत्पन्न करेगा । दोष क्षीण होने पर अपने स्वाभाविक लक्षणों को छोड़ देते हैं, जैसे पित्त के क्षीण होने से स्वाभाविक उष्णमा नहीं रहती । समानावस्था में दोष अपना अपना काम करते हैं ॥ ६२॥

वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा ।

क्षयास्तत्रानिलादीनामुक्त संक्षीणलक्षणम् ॥ ६३ ॥

घट्टते सहते शब्द नोचैर्द्रवति दूयते ।

हृदयं ताम्यति स्वल्पचेष्टस्यापि रसक्षये ॥ ६४ ॥

परुषा स्पुटिता म्लाना त्वक्षा रक्तसंक्षये ।

मांसक्षये विशेषेण स्फिग्ग्रीवोदरशुष्कता ॥ ६५ ॥

सन्धीनां स्फुटनं ग्लानिरक्ष्णोरायास एव च ।

लक्षणं मेदास क्षीणे तनुत्वं चोदरस्य च ॥ ६६ ॥

केश-छोम-नख-श्मश्रु-द्विज -प्रपतनं श्रमः ।

ज्ञेयमस्थिक्षये रूपं सन्धिशैथिल्यमेव च ॥ ६७ ॥

शीर्यन्त इव चास्थीनि दुर्बलानि लघूनि च ।

प्रतं वातरोगाच क्षीणे मज्जनि देहिनाम् ॥ ६८ ॥

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 230 का मूल पृष्ठ
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२१२ चरकसंहिता [ अ० १७

दौर्बल्यं मुखशोषश्च पाण्डुत्वं सदनं श्रमः ।

लैब्यं शुक्राविसर्गश्च क्षीणशुक्रस्य लक्षणम् ॥। ६६ ॥

क्षीणे शकृति चान्त्राणि पीडयन्निव मारुतः ।

रूक्षस्योन्नमयन् कुक्षिं तिर्यगूर्ध्वं च गच्छति ॥ ७० ॥।

मूत्रक्षये मूत्रकृच्छ्र मूत्रवैवर्ण्यमेव च ।

पिपासा बाधते चास्य मुखं च परिशुष्यति ॥ ७१ ॥

मलायनानि चान्यानि शून्यानि च लघूनि च ।

विशुष्काणि च लक्ष्यन्ते यथास्वं मलसंक्षये ॥ ७२ ॥

बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः ।

दुश्छायो दुर्मना रूक्षः क्षामश्चैवौजसः क्षये ॥ ७३ ॥

अट्ठारह प्रकार के क्षय - वात, पित्त, कफ ये तीन दोष; रस -रक्त आदि धातु, मल, मूत्र, कान का मल, इत्यादि सात मल और ओज इन ( अट्ठारह ) के क्षीण होने के लक्षण कहते हैं । इनमें वात, पित्त, कफ के क्षीण अवस्था के लक्षण कह दिये हैं । रस के क्षीण होने पर हृदय मथा बिलोया हुआ प्रतीत होता है, ऊँची आवाज़ को सहन नहीं कर सकता, हृदय जल्दी-जल्दी चलता है । पीड़ा होती है, ग्लानि होती है और थोड़ी क्रिया होती है, अथवा थोड़ी चेष्टा से भी हृदय में उद्विग्नता आ जाती है । रक्त का क्षय होने पर त्वचा कठोर हो जाती है, फट जाती है, झुर्रियां पड़ जाती हैं और रूखो बन जाती है । मांस के क्षय होने पर सारा शरीर क्षीण हो जाता है, परन्तु नितम्ब, ग्रीवा और पेट विशेष रूप से पतले हो जाते हैं । अर्थात् मेद चर्बी के क्षीण होने पर सन्धियां टूटने-फूटने लगती हैं, अंगों में ग्लानि, आलस्य, आंखों पर थकान और पेट पतला हो जाता है । अस्थियों के क्षय होने पर-शिर के बाल, शरीर के रोम, दाढ़ी- मूंछ के बाल, दांत, नख गिरने लगते हैं । शरीर थका प्रतीत होता है, और सब सन्धियां शिथिल पड़ जाती हैं । मज्जा के क्षीण होने पर -अस्थियां मुरझाती गिरती हुई प्रतीत होती हैं, अस्थियां निर्बल और छोटी ( हलकी ) हो जाती हैं और वातरोग जोर कर जाते हैं, निरन्तर वात रोग रहने लगता है । शुक्र के क्षीण होने पर घरीर में निर्बलता, मुख में सूखापन, चेहरे पर पीलास, पीड़ा, थकान, पुरुषत्व की न्यूनता, सम्भोग समय में शुक्र का अभाव रहता है । मल के क्षीण होने पर - वायु आंतों ( अन्तड़ियों ) को दबाती दुःखी करती प्रतीत होती है । शरीर अन्दर और बाहर से रूक्ष हो जाता है । वायु पेट को ऊपर उठाती हुई तिरछी या ऊपर को जाती है ( नीचे नहीं जाती ) । मूत्र के