चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 231–240
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 231–240
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अ० १७ ] सूत्रस्थानम २१३ क्षय होने पर - मूत्र कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा आता है, मूत्र का रंग बदल जाता है । प्यास बहुत लगती है, गला और मुख सूखता है । कान, नाक, आंख मुख और त्वचा ( रोम कूप ) इन इन्द्रियों के मलों का क्षय होने से शून्यता, (ज्ञान की कमी), तथा रूक्षता और हलकापन इन इन्द्रियों में अपने- अपने मल के क्षय होने से उत्पन्न हो जाता है । ओज ( कान्ति ) के क्षीण होने पर- मनुष्य डरने लगता है, निर्बल हो जाता है, बार-बार सोचने लगता है, चिन्ता करने लगता है. इन्द्रियों का ज्ञान ठीक नहीं रहता, पीड़ित हो जाता है । शरीर की कान्ति विगड़ जाती है, मन अनवस्थित हो जाता है, शरीर रूखा और दुर्बल हो जाता है ॥ ६३-७३ ॥
हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीपत्सपीतकम् ।
ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ ७४ ॥
( प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।
सर्पिर्वणं मधुरसं लाजगन्धि प्रजायते ॥ १ ॥
भ्रमरैः फलपुष्पेभ्यो यथा संहियते मधु । एवमोजः स्वकर्मभ्यो गुणैः संहियते नृणाम् ॥ २ ॥ )
ओज का स्वरूप - हृदय के अन्दर जो शुद्ध ( निर्मल ) और लाल तथा थोड़ा सा पीला रस आदि धातुओं का सार रस रहता है, उसे 'ओज' कहते हैं । इसके नष्ट होने से मनुष्य भी नष्ट हो जाता है । जिस प्रकार कि भौंरे फळ और पुष्पों से मधु का संचय करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों के शारीरिक गुणों से ओज का संग्रह किया जाता है । शरीरधारियों के शरीर में सबसे प्रथम ओज उत्पन्न होता है । यह ओज घी के समान रंग में, मधुर रस, और इसमें लाजा के समान ( लाजा धान की ख़ील के समान ) गन्ध होती है ॥ ७४ ॥
व्यायामोऽनशनं चिन्ता रूक्षाल्पप्रमिताशनम् ।
वातातपौ भयं शोको रूक्षपानं प्रजागरः ॥ ७५ ॥।
कफ-शोणित- शक्राणां मलानां चातिवर्तनम् ।
कालो भूतोपघातश्च ज्ञातव्याः क्षयहेतवः ॥ ७६ ॥
क्षय के कारण - व्यायाम का अधिक करना, उपवास करना, चिन्ता करना, रूक्ष, थोड़ा और एक ही रस का खाना, वायु का या धूप का सेवन, भय, शोक, रूक्ष गुणवाले पदार्थों का पीना, रात में जागना, कफ, रक्त, शुक्र, मल इनका अधिक स्थाग करना, वृद्धावस्था, भूत अर्थात् सूक्ष्म क्रिमि आदि का आक्रमण, इन कारणों से अट्ठारह प्रकार का क्षय होता है ॥ ७५-७६ ॥
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२१४ चरकसंहिता [अ० १७
गुरु -स्निग्धाम्ललवणं भजतामतिमात्रशः ।
नवमन्नं च पानं च निद्रामास्यासुखानि च ॥ ७७ ॥
त्यक्त-व्यायाम- चिन्तानां संशोधनमकुर्वताम् ।
श्लेष्मा पित्तं च मेदश्च मांसं चातिप्रवर्धते ॥ ७८ ॥
तैरावृतगतिर्वायुरोज आदाय गच्छति ।
यदा बस्ति तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते ॥ ७६ ॥
समारुतस्य पित्तस्य कफस्य च मुहुर्मुहुः ।
दर्शयत्याकृतिं गत्वा क्षयमाप्याय्यते पुनः ॥ =0 ॥
उपेक्षयाऽस्य जायन्ते पिडकाः सप्त दारुणाः ।
मांसववकाशेषु मर्मस्वपि च सन्धिषु ॥ ८१ ॥
मधुमेह का कारण - अति मात्रा में गुरु, स्निग्ध, खड्डे या नमकीन पदार्थों के खाने से, नवीन ( नवीन ऋतु के चावलल--Iगेहूँ आदि ) अन्न या नया पानी ( बरसात का पानी, कूओं या नदी से पीने पर ) अधिक सोने से, ऐश आरामतलबी का जीवन बिताने से, व्यायाम और चिन्ता न करने से, वमन विरेचन कर्मों के न करने से, कफ, पित्त, मेद और मांस बहुत बढ़ जाते हैं । इनके बढ़ने से मार्गों के रुक जाने से वायु आज धातु को लेकर मूत्राशय ( मूत्रसंस्थान ) में चली जाती है । तब कष्ट साध्य ' मधुमेह' रोग उत्पन्न होता है । बढ़े हुए बात, पित्त, कफ के लक्षण प्रथम प्रकट होते हैं । कुछ समय पीछे इन्हीं दोषों की क्षीणता ( क्षय ) के लक्षण दीखने लगते हैं, और फिर बढ़े हुए दोषों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं । इस समय उपेक्षा करने से सात भयानक पिकायें अधिक मांस से युक्त स्थानों में, मर्मस्थानों में और सन्धियों में उत्पन्न
हो जाती हैं । ७५-८१ ॥
शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षपी तथा ।
अजी विनताख्या च विद्रधी चेति सप्तमी ॥ ८२ ॥
अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावा क्लेदरुजान्विता ।
शराविका स्यात्पिडका शरावाकृतिसंस्थिता ॥ ८३॥
अवगाढातिं निस्तोदा महावास्तु-परिमहा ।
लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडका कच्छपी मता ॥ ८४ ॥
स्तब्धा शिराजालवती स्निग्धस्रावा महाशया ।
राजा निस्तोद बहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ ८५ ॥
पिढका नातिमहती क्षिप्रपाका महाराजा ।
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अ० [१७ ] सूत्रस्थानम् २१५ सर्षपी सर्षपाभाभिः पिडकाभिचिता भवेत् ॥ ८६ ॥
दहति त्वचमुत्थाने तृष्णा-मोह ज्वर-प्रदा ।
विसर्पत्यनिशं दुःखाद्दहत्यग्निरिवालजी ॥ ८७ ॥
अवगाढ- रुजा -क्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा ।
महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ ८८ ॥
खात पिकायें - शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अजी, विनता और विद्रधि ये सात प्रकार की कायें उत्पन्न होती हैं । किनारों से ऊँची और बीच से दवी, श्याव अर्थात् ऊदे रंग की, सावयुक्त और पीडायुक्त, यह पिड़का शराव ( परई, सकोरा के ) के आकार की होती है, इसे शराविका कहते हैं । जो गम्भीर वेदना वाली दर्दयुक्त, महावस्तु का आश्रय करके रहती है [ बहुत अधिक स्थान बेरा हो ] ऊपर से चिकनी और कलुवे की पीठ के समान ऊपर से उठी पिका 'कच्छपी' होती है । जड़ ( न हिलने वाली ), शिराओं के जालयुक्त, चिकने स्रावयुक्त, बड़े आशय में आश्रित, दर्द और चुभने की सी वेदनायुक्त तथा छोटे- छोटे छेदों से घिरी पिड़का 'जालिनी' होती है । बहुत बड़ी नहीं, जल्दी पकने वाली बहुत वेदना युक्त, सरसों के आकार की छोटी-छोटी पिकाओं से विरो पिड़का 'सर्पपी ' है । अलजी पिका के उत्पन्न होने पर त्वचा जलने लगती है, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर होता है । रात दिन दुःखी करती है, अग्नि के समान दुःख से रोगी जलता है, इसका नाम 'अजी' है । जिस में साब बहुत गाढ़ा हो, बहुत सख्त वेदना हो, स्राव हो, पिड़का पीठ या उदर में हो, बहुत बड़ी, दबी हुई सो, नीले रंग की पिडका को 'विनता '
-कहते हैं । ८२-८८ ॥
विद्रधिं द्विविधामाहुह्यामाभ्यन्तरीं तथा ।
बाह्य वस्नायु- मांसोत्था कण्डराभा महारुजा ॥ ८६ ॥
शीतकान्नविदापुष्ण-रूक्ष-शुष्कातिभोजनात् ।
विरुद्धाजीर्ण -संक्लिष्ट विषमासात्म्य भोजनात् ॥ ६० ॥
व्यापन्न- बहु-मद्यत्वाद्वेगसंधारणाच्छूमात् ।
जिम व्यायाम -शयनादतिभाराध्व मैथुनात् ॥ ६१ ॥
अन्तःशरीरे मांसासुगाविशन्ति यदा मळा: ।
तदा संजायते प्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः ॥ ६२ ॥
हृदये क्लोम्नि यकृति सीहि कुक्षौ च वृकयोः ।
treat वक्षणयोर्वापि बस्तौ वा तीव्रवेदनः ॥ ६३ ॥
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२१६ चरकसंहिता [ अ०१७
दुष्टरक्तातिमात्रत्वात्स वै शीघ्रं विदह्यते ।
ततः शीघ्रविदाहित्वाद्विद्रधीत्यभिधीयते ॥ ६४ ॥
व्यधच्छेद -भ्रमानाह-शब्द -स्फुरण सर्पणैः ।
वातिक, वैतिक तृष्णा दाह- मोह- मद- ज्वरैः ॥ ६५ ॥
जम्भोत्क्लेशारुचि-स्तम्भ-शीतकैः श्लैष्मिकीं विदुः ।
सर्वासु च महच्छूलं विद्रधीषूपजायते ॥ ६६ ॥
तप्तैः शस्त्रैर्यथा मध्येतोल्मुकैरिव दह्यते ।
विद्रधी व्यम्लतां याता वृश्चिकैरिव दश्यते ॥ ६७ ॥
तनुरूक्षारुणं स्राव फेनिलं वातविद्रधी ।
तिल-माष -कुलत्थोद -संनिभं पित्तविद्रधी ॥ ८ ॥
इलैष्मिकी स्रवति श्वेतं बहलं पिच्छिलं बहु ।
लक्षणं सर्वमेवैतद्भजते सान्निपातिकी ॥ ६ ॥
विद्रधि पिडका दो प्रकार की होती है यथा- बाह्या और आभ्यन्तरी । इनमें बाह्या विद्रधि त्वचा, स्नायु और मांस में उत्पन्न होती है, इसका आकार कण्डरा के समान होता है, इसमें बहुत वेदना होती है । अन्तः विद्रधि का निदान कहते हैं-- ठण्डा भोजन, दाह करने वाला भोजन, उष्ण, रूक्ष, शुष्क भोजन के खाने से, बहुत खाने में, विरुद्ध भोजन से अजीर्णावस्था में भोजन करने से, संकीर्ण ( अर्थात् मिश्रण किये खाने से ) विषम भोजन से, प्रकृति के प्रतिकूल भोजन से, व्यापन्न अर्थात् दूषित भोजन से, बहुत मद्यपान से, उपस्थित वेगों को रोकने से, परिश्रम से, कुटिल व्यायाम ( अंगों को अनुचित रूप से मोड़ने- तोड़ने ) से, कुटिल शयन ( टेढ़ा- मेढ़ा होकर सोने ) से, बहुत बोझ उठाने से, बहुत मार्ग चलने से, बहुत मैथुन के कारण जब मल ( वात, पित्त, कफ ) शरीर के अन्दर मांस और रक्त में घुस जाते हैं, तब गहरी और कठोर गांठ उत्पन्न हो जाते हैं । गांठ उत्पन्न होने के स्थान --हृदय, कोम ( पित्ताशय या आमाशय ), यकृत, प्लीहा, कुक्षि (पाव) में, वृक्कों ( गुदों ) में, नाभि में, पंक्षण ( जांघ की सन्धियों ) में और बस्ति ( मूत्राशय ) में उत्पन्न होती है और यहां तीव्र वेदना होती है । रक्त के बहुत अधिक दुष्ट होने से विद्रधि शीघ्र विदग्ध होने लगती है, विदग्ध होने से ही इसको ' विद्रधि' कहते हैं । वातजन्य विद्रधि में बींधने के समान, काटने के समान छेदने के समान पीड़ा होती है, चक्कर आता है, अफरा, शब्द सुनाई देता है, स्फुरण, धड़कन
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०१७ ] सूत्रस्थानम् २१७ और सर्पण होता है । पित्तजन्य विद्रधि में प्यास, जलन, मूर्च्छा, मद और ज्वर होता है । कफजन्य विद्रधि में जम्भाई, वमन, भोजन में अरुचि, शरीर की जड़ता और ठण्डक होती है । सब विद्रधियों में बहुत अधिक शुल उत्पन्न हो जाता है । गरम शस्त्रों से जिस प्रकार कोई मसल रहा हो, या गरम बस्तुओं से कोई जला रहा हो, ऐसा प्रतीत होता है । * विद्रधि के पकने पर बिच्छुओं के काटने के समान दर्द होता है । अब साव के लक्षण कहते हैं -साव के लक्षण जो स्राव पतला, रूक्ष, लाल और झागदार हो तो उसे वातज विद्रधि का स्राव, जो स्राव तिल, उड़द, कुलथी के पानी के समान हो तो पित्तज विद्राव का और जो लावत, घना, चिकना और मात्रा में बहुत हो तो कफज विद्रधि का होता है । संनिपातजन्य विद्रधि में सब दोषों के लक्षण होते हैं । ८६-६६ ॥ arrai विद्रधीनां साध्यासाध्यत्व-विशेष-ज्ञानार्थं स्थानकृतं लिङ्ग- विशेषमुपदेक्ष्यामः -- तत्र प्रधानमर्मजायां विद्रध्यां हृद्घट्टन - तमक प्रमोह- कासाः, क्लोमजायां पिपासा- मुख-शोप -गल -प्रहाः, यकृज्जायां श्वासः, प्लीजायामुच्छ्रासोपरोधः, कुक्षिजायां कुक्षिपाश्र्वान्तरसिशूलं वृक-जाय पार्श्वगृष्ट कटि-ग्रहः, नाभिजायां हिका, वङ्क्षणजायां सक्थिसादः, बस्तिजायां कृच्छ्र- प्रति- मूत्र- वर्चस्त्वं चेति ॥ १०० ॥
पक्कप्रभिन्नासूर्ध्वजासु मुखात्स्रावः स्रवति, अधोजासु गुदान्, उभयतस्तु नाभिजासु ॥ १०१ ॥
तास हुन्नाभिस्तिजाः परिपक्काः सान्निपातिकी च मरणाय, अवशिष्टाः पुनः कुशलमाशुप्रतिकारिणं चिकित्सकमासाद्योपशाम्यन्ति; तस्मादचिरोत्थित विद्रधि शत्र- सर्प- विद्युदग्नि तुल्यां स्नेह- स्वेद -विरेच नैराश्वेवोपक्रामेत् सर्वशो गुल्मवच्चेति ॥ १०२ ॥
अब इन विद्रधियों के साध्य असाध्य जानने के लिये स्थानजन्य विशेष लक्षण बतलाते हैं । यथा-प्रधान मर्मस्थान ( हृदय ) में उत्पन्न विद्रधि में हृदय का संघट्टन, तमक ( आंखों के आगे अन्धेरा ) सांस, मूर्च्छा, कास होता है । क्लोमजन्य विद्रधि में प्यास, मुख का सूखना, गलेका रुकना, यकृत् जन्य विद्रधि में श्वास, और प्लीहाजन्य विद्रधि में श्वास की रुकावट और मूर्च्छा, कुक्षि में विद्रधि होने पर कुक्षि और पार्श्व के बीच में शूल और उसी पार्श्व के * कई स्थानों पर कलिकाता की छपी पुस्तकों में निम्न पाठ है- "शस्त्रास्त्रेर्मिथत इव चोल्मुकैरिव दाते || ”
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२१८ चरकसंहिता [ अ० १७ के कन्धे में दर्द होता है । वृक्कजन्य विद्रधि में पीठ का अकड़ना, कमर का जकड जाना, नाभिजन्य विधि में हिचकी, वंक्षणजन्य विद्रधि में जांघों में दर्द, बस्तिजन्य विद्रधि में मूत्र में कृच्छ्रता, दुर्गन्धयुक्त मूत्र, और बदबूदार मल आता है । हृदय, क्लोम, यकृत्, प्लीहा, और कुक्षि की विद्रधियों के पककर फूटने से स्राव सुख से, और नाभि के नीचे वंक्षण एवं बस्ति की विद्रधियों के फटने से गुदा के मार्ग से तथा नाभि की विद्रधि के फटने से मुख और गुदा दोनों मार्गों से स्राव बहता है । इन विद्रधियों में हृदय, नाभि और बस्ति में उत्पन्न विधि के पकने पर और सन्निपातजन्य विद्रधि मृत्युकारक होती हैं और शेष विद्रधियां कुशल चिकित्सक से शीघ्र प्रतिकार करने पर शान्त हो जाती हैं । इसलिये जल्दी ही नवीन विद्रधि को जो कि शस्त्र, सर्प, बिजली और अग्नि के समान पीड़ादायक है, उसकी स्नेहन, विरेचन द्वारा शीघ्र चिकित्सा करे । उनकी गुल्मों की भांति सम्पूर्ण चिकित्सा करनी चाहिये ॥
भवन्ति चात्र-विना प्रमेहमध्येता जायन्ते दुष्टमेदसः ।
तावचैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ १०३ ॥
शराविका कच्छपिका जालिनी चेति दुःसहाः ।
जायन्ते ता प्रतिबलाः प्रभूत श्लेष्म मेदसाम् ॥ १०४ ॥
सर्षपी चालजी चैव विनता विद्रधी च याः ।
साध्याः पित्तोल्बणास्ता हि संभवन्त्यल्पमेदसाम् ॥ १०५ ॥
मर्मस्वंसे गुदे पाण्योः स्तने सन्धिषु पादयोः ।
जायन्ते यस्य पिडकाः स प्रमेही न जीवति ॥। १०६ ॥
तथाऽन्याः पिडकाः सन्ति रक्तपीतासितारुणाः ।
पाण्डुराः पाण्डुवर्णाश्च भस्माभा मेचकप्रभाः ॥ १०७ ॥
कठिनाचान्याः स्थूलाः सूक्ष्मास्तथाऽपराः ।
मन्दवेगा महावेगाः स्वल्पशूला महारुजाः ॥ १०८ ॥
ता बुद्धवा मारुतादीनां यथास्तुलक्षणैः ।
श्रयादुपाचरेचाशु प्रागुपद्रवदर्शनात् ॥ १०६ ॥
ये पिढकार्ये मेद के दुष्ट होने पर बिना प्रमेह के भी उत्पन्न हो जाती हैं, और जब तक कि 'वास्तुपरिग्रह' अर्थात् स्थान को चारों ओर से पकड़ नहीं छेतीं, तब तक इनका पता नहीं चलता । शराविका, कच्छपिका और जालिनी 4 ये कठिनाई से सहन की जा सकती हैं । जिन में कफ और मेद अधिक होते हैं, उनमें ये उत्पन्न होती हैं और बहुत बलवान् होती हैं । सर्वपी, अकी विनता
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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१६ और विद्रधियेपित की अधिकता से होती हैं और ये साध्य हैं, ये थोड़ी चर्बीवालों में होती हैं । जिस प्रमेह रोगी के मर्म (हृदय, वस्ति, और नाभि में, कन्धे, गुदा, हाथ, स्तन, सन्धियों और पांव में पिडकायें उत्पन्न होती हैं, वह प्रमेह का रोगी नहीं बचता । इसी प्रकार अन्य दूसरी और भी पिकायें हैं जो लाल, पोली, काली, पाण्डुर ( धूसर ) पीले रंग की राख अर्थात् भस्म के समान; काले बालों की छाया जैसी, कुछ मृदु, कुछ कठिन, कुछ बड़ी, कुछ छोटी, कुछ मन्द वेग, कुछ तीव्रवेग, कोई थोड़ी वेदनावाली, कोई बहुत दर्दवाली होती हैं । इन वात, पित्त, कफ की विद्रधियों को इनके अपने अपने लक्षणों मे पहिचान कर उपद्रवों के उत्पन्न होने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १०३ - १० ९ ॥
तृट्-श्वास-मांस- संकोथ -मोह-हिका-मद-ज्वराः ।
वीसर्प-मर्म -संरोधाः पिडकानामुपद्रवाः ॥ ११० ॥
उपद्रव - प्यास, श्वास, मांस का संकोच, मुच्छा, हिचकी, मद और अवर, सर्प, और हृदय आदि मर्म का अवरोध, ये पिडकाओं के उपद्रव हैं ॥११० ॥
क्षयः स्थानं च वृद्धिश्व दोषाणां त्रिविधा गतिः ।
ऊर्ध्व चाश्च तिर्यक् च विज्ञेया त्रिविधाऽपरा ॥ १११ ॥
इत्युक्ता विधिभेदेन दोषाणां त्रिविधा गतिः ।
त्रिविधा चापरा कोष्ठ शाखा मर्मास्थि-सन्धिषु ॥ ११२ ॥
चय- प्रकोप प्रशमाः पित्तादीनां यथाक्रमम् ।
भवन्त्येकैकशः पटसु कालेष्वभ्रागमादिषु ॥ ११३ ॥
गतिः कालकृता चैषा चयाद्या पुनरुच्यते ।
गतिश्च द्विविधा दृष्टा प्राकृती वैकृती च या ॥। ११ ॥
पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणामुपजायते ।
तच पित्तं प्रकुपितं विकारान् कुरुते बहून् ॥ ११५ ॥
प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।
सवः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥ ११६ ॥
सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः ।
तेनैव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥ ११७ ॥।
नित्यसंनिहितामित्रं समीक्ष्याऽऽत्मानमात्मवान् ।
नित्यं युक्तः परिचरेदिच्छन्नायुरनित्त्ररम् ॥ ११८ ॥
दोषों की गति तीन प्रकार की होती है - य (घटना), स्थान (खम रहना), और वृद्धि ( बढ़ना ), अथवा ( ऊर्ध्व ) ऊपर जाना, ( अब: ) नीचे जाना -और ( तिर्यक् ), तिरछा जाना ये दूसरी प्रकार की दोषों को गति हैं । विधि
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२२० चरकसंहिता [अ० १७ मेद से दोषों की तीन प्रकार की गति कह दो, एक और प्रकार से भी तीन प्रकार की गति होती हैयथा -कोष्ठ, शाखा, एवं मर्मास्थि और सन्धि इनमें दोषों का संचय, प्रकोप और शमन यह तीन प्रकार की गति हैं । यथा-छः ऋतुओं में एक-एक दोष की तीनों जातियां होती हैं । यथा वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद् ऋतु में प्रकोप और हेमन्त में शान्ति । प्रोष्म में वायु का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति । हेमन्त में कफ का संचय वसन्त में प्रकोप और ग्रीष्म में कफ की शान्ति होती है । दोषों के संचय आदि की गति दो प्रकार की है । यथा -प्राकृत और वैकृत । पित्त का वर्षा ऋतु में संचय होना प्राकृत गति है और वसन्त में संचय होना बँकृत गति है । इसी प्रकार कफ का हेमन्त में संचय होना प्राकृत और वर्षा में संचय होना बैंकृत है, वायु का ग्रीष्म ऋतु में संचय होना प्राकृत और शरद् में संचय होना वैकृत है । प्राकृत स्वास्थ्यावस्था, वैकृत रुग्णावस्था है, इस प्रकार से पित्त आदि दोषों की भी दो प्रकार की गति है । मनुष्यों का पाचन पित्त की ही गरमी से होता है और वह पिच विकृत होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है । प्राकृत स्वास्थ्यावस्था में स्थित कफ शरीर का बल, और आजरूप होता है, परन्तु यही विकृत, रुग्णावस्था में मल और पाप्मा अर्थात् पापरोग उत्पन्न करता है । वायु के कारण ही शरीर की सब चेष्टाएं, क्रियायें होती हैं । यही वायु प्राणियों का प्राण है । इस के विकृत होने पर रोग उत्पन्न होते हैं, और इन्हीं रोगों से इसी विकृत वायु से मनुष्य मर जाता है । मनुष्य को चाहिये कि वह समझ ले कि शत्रु ( वैकृत, पित्त, वायु, कफ ये दोष ) सदा समीप में खड़े हैं, इसलिये अपने कल्याण में मन को लगाकर प्रशस्त मन से परीक्षा करके नित्य ही न जानेवाली दीर्घ आयु की सदा इच्छा करता हुआ दीर्घायु होने का प्रयत्न करे । १११-११८।
तत्र श्लोकौ । शिरोरोगाः सहृद्रोगा रोगा मानविकल्पजाः ।
क्षयाः सपिडकाश्वोक्ता दोषाणां गतिरेव च ॥ ११६ ॥
कियन्तःशिरसीयेऽस्मिन्नध्याये तस्वदर्शिना ।
ज्ञानार्थ भिषजां चैव प्रजानां च हितैषिणा ॥ १२० ॥
शिरोरोग, हृदय के रोग, दोषों के परिमाण भेद से होनेवाले रोग, दीषों के क्षय से, पिढकार्ये, दोषों की गति, इन सब बातों का तत्वदर्शी महर्षि ने ' कियन्तः शिरसीय ' अध्याय में, वैद्यों के ज्ञान और प्रजाओं की मंगलकामना से उपदेश किया है || ११ - १२० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के कियन्तः शिरसीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
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अ० १८ । सूत्रस्थानम् २२१
अष्टादशोऽध्यायः ।
अथातस्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'त्रिशोथीय अध्याय' का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ यः शोथा भवन्ति वात- पित्त- श्लेष्म-निमित्ताः । ते पुनर्द्विविधाः निजागन्तुभेदेन । तत्राऽऽगन्तवश्लेदन-भेदन- क्षणन-भजन- पिच्छनोत्पे-षण- प्रहार -बध- बन्धन- वेष्टन-व्यधन-पीडनादिभिर्वा भल्लातक-पुष्प -फल-रसात्मगुप्ता-शूक- क्रिमिशुकाहितपत्र-लता - गुल्म-संस्पर्शनैर्वा स्वेदन-परि सर्पणावमूत्रणैर्वा विषिणां सविषाविष प्राणि-दंष्ट्रा दन्त विषाण- नख-निपातैर्वा सागर-विष -वात- हिम- दहन संस्पर्शनेर्वा शोथाः समुपजायन्ते । ते पुनर्यथास्वं हेतुजैर्व्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैः, बन्ध-मन्त्रागद- प्रलेप -प्रताप-निर्वापणादिभिचोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशा-न्तिमापद्यन्ते ॥ ३ ॥
शोथ ( सूजन ) तीन प्रकार का है । १. वात से, २. पित्त से और ३. कफ से । यह तीन प्रकार का शोथ फिर दो प्रकार का है । ( १ ) शरीर में उत्पन्न होने वाला निज और ( २ ) बाहर कारण से उत्पन्न होने वाला आगन्तु । इन में आगन्तु शोथ छेदन ( दो खण्ड करना ), मेदन ( फाड़ना ), क्षणन ( चूर्ण करना ), भञ्जन ( तोड़ना, सर्जरी करना ), पिच्छन ( बहुत दबाना ), उत्पेषण ( शिला पर पीसने की भांति पीसने ) से, वेष्टन ( रज्जु आदि सं लपेटना ), प्रहार ( चोट ), वध ( मारने ) से, बन्धन ( बांधना ), व्यधन ( बंधिना ), पीड़न और ( दबाने ) आदि से उत्पन्न होता है अथवा भिलावे के पुष्प या फल अथवा रसके लाने से, आत्मगुप्ता ( कौंच की फली ), शुक, कृमिशूक ( रोयें वाला कीड़ा ), अहितपत्र ( बिच्छू बूटी के पत्र ), लता (बेल ) गुल्म ( झंकार शाड़ों ) के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है अथवा विषयुक्त प्राणियों के पसीने से, शरीर पर चलने फिरने से, इन के मूत्रों से, विषैले प्राणियों के जाद, दांत, सींग, नख आदि के प्रहार से, कृत्रिम विषयुक्त वायु, बरफ या अग्नि के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है । ये आगन्तु शोथ प्रथम कारणों से उत्पन्न लक्षणों से प्रकट होते हैं । आगन्तु शोथ या रोग में व्यथा प्रथम उत्पन्न होती है, और पीछे शरीर के दोषों से सम्बन्धित होते हैं ।
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२२२ चरकसंहिता [अ०१८ Ene ये शोथ बन्धन ( सुखप्रद लेप आदि की पट्टी बांधने से ), मन्त्र से, औषध, प्रलेप, प्रताप, निर्वापण ( सेक आदि द्वारा वायु को निकालने से ) एवं शोधन रोपणादि से चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥
निजाः पुनः स्नेह-स्वेदन-वमन विरेचनास्थापनानुवासन-शिरोविरे- चनानामयथावत्प्रयोगात् मिध्यासंसर्जनाद्वा खर्यलसक विसूचिका-श्वा स-कासावीसार-शोष -पाण्डुरोग- ज्वरोदर- प्रदर-भगन्दरार्शो-विकारातिक- कुष्ठ कण्डू-पिडकादिभिर्वा छर्दि श्रवथूद्गार शुक्रबात-मूत्र-पुरी- प -वेग-विधारणैर्वा कर्म रोगोपबासातिकर्षितस्य वा सहसाऽविगुर्वम्ल- लवण -पिष्टान -फल-शाक- राग - दधि-हरीतक -मद्य- मन्दक- विरूढ-ड-बब -शक- शमी -धान्यानपौदकपिशितोपयोगात् मृत्पङ्क-लोष्ट- भक्षणाल्लवणातिभक्ष- णाद्वा गर्भ-संपीडनादाम -गर्भ प्रपतनात् प्रजातानां च मिथ्योपचारादु- दीर्णदोषत्वाच्च शोथाः प्रादुर्भवन्तीत्युक्तः सामान्यो हेतुः ॥ ४ ॥
'निज' अर्थात् शरीर के अन्दर स्वतः उत्पन्न होनेवाले शोध -स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और शिरोविरेचन के अति या हीन अथवा मिथ्या योग से, इन कर्मों के पीछे अपथ्य से, बमन, अलसक, विधू-चिका, श्वास, कास, अतिसार, शोष, पाण्डु रोग, ज्वर, उदर रोग, प्रदर, भग-न्दर, अर्श रोग से, संशोधन कर्म से, कुष्ठ, खाज, पिका आदि से, छींक, वमन, डकार, शुक्र, वायु और मल के उपस्थित वेगों को रोकने से और संशोधन कर्मों से उत्पन्न रोगों से, उपवास से, शरीर के बहुत कर्षण से, एक-दम से बहुत भारी. खट्टे, नमकीन पदार्थों के खाने से, पोठी से बने भोजनों से, फल, शाक, राग ( रायता ) पादव, ( खीर आदि ), दही, इरी भाजी, मद्य, मन्दक- धीमे पढ़े उतरे मद्य को पीने से, अंकुरित अन्न, नवीन अन्न से, शुक धान्य-चावल गेहूँ आदि, शमीधान्य उड़द मूँग आदि, जलचर प्राणियों के मांस के सेवन से, मिट्टी, कीचड़, मिट्टी का ढेला इनके खाने से नमक के अधिक खाने से, गर्भ पर दबाव पड़ने से, गर्भपात से, प्रसव के पश्चात् उचित परिचर्या न होने से, दोषों के बढ़ने से शोथ उत्पन्न होता है । ये शरीर जन्य शोथों के सामान्य लक्षण हैं ॥ ४ ॥
अयं त्वत्र विशेष: - शीव रूक्ष-लघु -विशद- श्रमोपवासातिकर्षण-क्ष-पणादिभिर्वायुः प्रकुपितस्त्वङ्- मांस- शोणितादीन्यभिभूय शोथं जनर्यात । सोत्थापनप्रशमो भवति तथा श्यावारुणवर्णः प्रकृतिवर्णो वा, चलः स्पन्दनः खर- परुष- भिन्न-त्वग्लोमा छिद्यत इव भिथत इव पीयत.