चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 241–250

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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ज०१८ ] सूत्रस्थानम २२३ सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्वप-कल्कावलिप्त इव चिमिचिमायते संकुच्यते आयम्यत इति वातशोथः ॥ ५ ॥

उष्णतीक्ष्ण कटुक-क्षार -लवणाम्लाजीर्ण -भोजनेरग्न्यातप -प्रतापेश्व ft प्रकुपितं त्वमांसशोणितान्यभिभूय शोथं जनयति । स क्षिप्रो- स्थानप्रशमो भवति कृष्ण पीत-नील- ताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिल- ताम्र-लोमा उष्यते दूयते दह्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते न च स्पर्शमुष्णं वा सुपूयत इति पित्तशोथः ॥ ६ ॥

त्वङ्गुरु-मांस -मधुर-शोणितादीन्यभिभूय-शीतस्निग्धैरतिस्वप्न-- शोथंव्यायामादिभिश्चजनयति । स कृच्छ्रोस्थानप्रशमोश्लेष्मा प्रकुपितः भवति, पाण्डुः श्वेतावभासः स्निग्धः श्लक्ष्णो गुरुः स्थिरः स्त्यानः शुक्लाप्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति श्लेष्मशोथः ॥ ७ ॥

यथास्वकारणाकृति संसर्गाद् द्विदोषजास्त्रयः शोथा भवन्ति ॥८॥

यथास्वकारणाकृतिसन्निपातात्सान्निपातिक एकः ॥ ६ ॥

एवं भेदप्रकृतिभिस्ताभिर्भिद्यमानो द्विविधस्त्रिविधश्चतुर्विधः सप्त-free शोध उपलभ्यते, पुनश्चैक एव, उत्सेधसामान्यादिति ॥ १० ॥

इनमें इतना विशेष है कि--- शीत, रूक्ष, लघु, विशद अन्न, खानपान, परिश्रम, उपवास, वमन विरेचनादि कर्मों के बहुत करने और उपवास आदि से वायु कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त और मेद आदि, धातुओं पर अधिकार कर शोथ को उत्पन्न करता है । यह वातजन्य शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता और जल्दी ही शान्त हो जाता है । इस का रंग काला सा या लाल-काला अथवा स्वाभाविक रंग का रहता है । यह शोथ गतिशील, धड़कन युक्त, कर्कश, कठोर, त्वचा फटती सी जाती है, और बाल टूट जाते हैं । रोगी को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई चीरसा रहा हो, मेदन कर रहा हो, दबा रहा हो, सुई चुभाने का सा दर्द होता है, चिऊंटियां सी चलती हैं, सरसों पीसकर लेप करने जैसी चिरमराहट लगती है, सिकुड़ता और फैलता है, यह वातजन्य शोथ के लक्षण हैं । गरम, तीक्ष्ण, कडुवे, क्षार, नमकीन और खट्टे पदार्थों के खाने से, अजीर्ण अवस्था में भोजन करने से, आग और धूप के ताप के बहुत सेवन से, पित्त कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर प्रबल होकर शोथ उत्पन्न करता है । यह शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता और जल्दी शान्त हो जाता है । इसका रंग काला, पीला, नीला ताम्बे के समान, स्पर्श गरम और कोमल वाल भूरे या ताम्बे के रंग के हो जाते हैं । यह शोथ गरम होता, जलता सा है, पीड़ा देता

पृष्ठ 242

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२२४ चरकसंहिता [ अ० १८ है, तपाता है, गरम सा लगता है, पसीना आता है, नरमा जाता है, न तो स्पर्श और न गरमी को सहन करता है । यह पितजन्य शोथ है । भारी, मधुर, शीत, स्निग्ध भोजनों से, बहुत सोने से, व्यायाम न करने से, श्लेष्मा कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर अधिकार करके शोथ उत्पन्न करता है । यह शोथ देर में उत्पन्न होता ओर देर में ही शान्त होता है । इसका रंग धूसर ( धुमैला ) या श्वेत, चिकना, स्नेहयुक्त, भारी, स्थिर ( न हिलने वाला ), गाढ़ा, बालों का अप्र भाग श्वेत हो जाता है, स्पर्श को ओर गरमी को सहन कर लेता है, यह कफशोथ है । अपने अपने कारणों से दो दोष कुपित होकर दो दोषों के लक्षणों वाले शाथ को उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार से संवर्ग जन्य शोथ ३ प्रकार के हैं । तीनों दोषों के कारणों के मिलने से उत्पन्न सान्निपातिक शोथ एक प्रकार का है, इस में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं । इस प्रकार प्रकृति भेद से शोथ दो प्रकार के ( निज और आगन्तु ), तीन प्रकार के ( वातज, पित्तज, कफज़ ), चार प्रकार के ( वावजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य ), सात प्रकार के ( वातज, पित्तज, कफज, बातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, वित्तश्लैष्मिक और सान्निपातिक ) होते हैं । परन्तु सूजन की दृष्टि से शोथ एक ही प्रकार का है, सूजन का होना सब शोथों

में सामान्य है । ५-१०॥

भवन्ति चात्र =- शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च ।

पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत् ॥ ११ ॥

यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्कं प्रणश्यति ।

स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत्स च वातिकः ॥ १२ ॥

यः पिपासाज्वरार्त्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते ।

खिद्यते क्लिद्यते गन्धी स पेतः श्वयथुः स्मृतः ॥१३॥

यः पीत- नेत्र- वक्त्रत्वक पूर्व मध्यात् प्रश्यते ।

तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते ॥ १४ ॥

यः शीतलः सतगतिः कण्डूमान् पाण्डुरेव च ।

निपीडिता नोन्नमति श्वयथुः स कफात्मकः ॥ १५ ॥

यस्य शस्त्रकुशच्छेदाच्छोणितं न प्रवर्तते ।

कृच्छ्रेण पिच्छान् स्रवति स चापि कफसंभवः ॥ १६ ॥

निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद् द्विदोषजः ।

सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोथो व्यामिश्रहेतुजः ॥ १७ ॥

पृष्ठ 243

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अ० १८ ] १५ सूत्रस्थानम् " २२५ सूजन होने पर जिसका शरीर सोया हुआ, (चेतना, स्पर्श ज्ञान का अभाव) सा प्रतीत हो, पीड़ा होती हो, दबाने पर फिर जल्दी से ऊपर उठ जाता हो, उसे वातजन्य शोथ समझना चाहिये और जिस शोथ का रंग लाल, काळा हो, जो सूजन रात्रि में नष्ट हो जाती है, एवं स्वेदन, उष्ण क्रिया अथवा मर्दन से हो जाता है, वह वातजन्य शोथ है । जिस शोथ में रोगो को प्यास बहुत लगे, स्वर की पीड़ा हो, जलन हो पकता हो, पसीना आता हो, नरम पड़ता हो, गन्ध आती हो, वह पित्तजन्य शांथ है जिस में कि त्वचा, नेत्र, मुख पीले हो जाते दों, और जो कि प्रथम बीच में से सूजता हो, त्वचा जिसमें पतली हो और रोगी को अतिसार हो तो उसे पित्तजन्य शोध समझना चाहिये । जो सूजन ठण्डी, पसीना न हो, जो हिले जुळे नहीं, जिसमें खाज उठती हो, जिसका रंग घूसर हो, दबाने से फिर ऊपर उठ जाये, वह सूजन कफजन्य है । जिस में कि शस्त्र या कुशा से काटने पर रक्त नहीं बढ़ता, अथवा कठिनाई से थोड़ा थोड़ा चिकना नाव बहता है, वह सूजन भी कफजन्य है । दो दोषों के कारणों से दो दोषों के लक्षणों वाला संसर्गजन्य ( द्विदोषज ) शोथ होता है । सब दोषों के मिलने से सब लक्षणों वाला सनिपातजन्य शोथ होता है ॥ ११-१७ ॥

यस्तु पादाभिनिवृत्तः शोथः सर्वाङ्गगो भवेत् ।

जन्ताः स च सुकटः स्यात्प्रसृतः स्त्रीमुखाच्च यः ॥ १८ ॥

यश्चापि गुहाप्रभवः स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ।

स च कष्टतमो ज्ञेयो यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥ १६ ॥

जो सुजन पुरुषों के पांच से आरम्भ करके और स्त्रियों के मुख से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है वह कष्टप्राय होता है और जो शोथ स्त्री या पुरुष के गुझ भाग से प्रारम्भ होकर सारे शरीर में फैलता है, अथवा जिस शोध में उपद्रव हो, वह शांथ तो अति अधिक कष्टसाध्य है ॥ १८-१९ ॥

छर्दिः श्वासाऽरुचिस्तृष्णा अवरोऽतीसार एव च ।

सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ॥ २० ॥

उपद्रव -वमन, श्वास, अरुचि, प्यास, ज्वर, अवोसार और निर्बलता संक्षेप में ये सात शोध के उपद्रव हैं ॥ २० ॥

यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते ।

आशु संजनयेच्छोथं जायतऽस्योपजिह्निका ॥ २१ ॥

वस्य श्लेष्मा प्रकुपितः काकले व्यवतिष्ठते ।

आशु संजनयेच्छोकं करोति गम्शुण्डिकाम् ॥ २२ ॥

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२२६ चरकसंहिता [अ० १८ www

यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवनिष्ठते ।

शनः संजनयेच्छोथं गलगण्डोऽस्य जायते ॥ २३ ॥

यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गळे स्थितः ।

आशु संजनयेच्छथं जायतेऽस्य गलग्रहः ॥ २४ ॥

उपजिह्निका रोग - जब कफ कुपित होकर जिह्वा की जद में एकत्र होकर शोथ उत्पन्न करता है, उसे 'उपजिह्निका' कहते हैं । गलशुण्डिका -जब कफ कुपित होकर काकल लग्रन्थि का आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इस रोग को 'गलशुण्डिका' कहते हैं । जब कफ कुपित होकर गले के बाहर आकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इसे 'गलगण्ड' कहते हैं । यह सूजन बहुत धीरे धीरे होता है । जब बफ कुपित होकर गले के अन्दर रहकर शीघ्र ही सूजन उत्पन्न करता है, उसे 'गलग्रह' ( गले का रुक जाना, स्वर का बेट जाना ) कहते हैं ॥ २१-२४॥

यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति ।

शोथं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते ॥ २५ ॥

यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते ।

शोथं सरागं जनयेत् पिढका तस्य जायते ॥ २६ ॥

यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुध्यति तिका विसवो व्यङ्गो नीलिका चास्य जायते ॥ २७ ॥

यस्य पितं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते ।

श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते ॥ २८ ॥

यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते ।

ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते ॥ २६ ॥

जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ मिलकर त्वचा में फैलता है, तब लाल रंग की सूजन उत्पन्न होती है, इस को ' विसर्प' कहते हैं । जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ त्वचा में स्थिर हो जाता है, तब लाल रंग के उत्पन्न शोध को ' पिडका ' ( फुन्सी) कहते हैं । जब कुपित पित्त रक्त में पहुंच कर शुष्क हो जाता है तब नीलिका, तिल, व्यंग, चर्मकील, लसन, शांई आदि रोग होते हैं । जब कुपित्त पित्त शंखप्रदेश ( कनपटी ) में आकर रुक जाता है, तब 'शंखक' नाम का भयानक शोथ उत्पन्न होता है । जब कुपित पित्त कान की जड़ में आकर रुक जाता है, तब स्वर के अन्त में भयंकर सूजन उत्पन्न होती है, यह सूजन मारक होती है ॥ २५-२९॥

पृष्ठ 245

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ero १८ ] सूत्रस्थानम २२७

वातः लीहानमुद्भूय कुपितो यस्य तिष्ठति ।

शनैः परितुदन् पार्श्व सीहा तस्याभिवर्धते ॥ ३० ॥

यस्य वायुः प्रकुपितो गुल्मस्थानेऽवतिष्ठते ।

शोथं सशूलं जनयन् गुल्मस्तस्योपजायते ॥ ३१ ॥

यस्य वायुः प्रकुपितः शोथशुलकरश्चरन् ।

क्षणाद्वृषणौ याति ब्रघ्नस्तस्योपजायते ॥ ३२ ॥

यस्य वातः प्रकुपितस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः ।

शोथं संजनयेत् कुतावुदरं तस्य जायते ॥ ३३ ॥।

यस्य वातः प्रकुपितः कुक्षिमाश्रित्य तिष्ठति ।

नाघो व्रजति नाप्यध्वमानाहस्तस्य जायते ॥ ३४ ॥

रोगाश्चोत्सेधसामान्यादधिमांसाबुदादयः ।

विशिष्टा नामरूपाभ्यां निर्देश्याः शोथसंग्रहे । ३५ ॥

जब वायु कुपित होकर प्लीहा ( तिल्ली ) को ऊपर करती है, तब पार्श्वो को धीरे धीरे दबाती हुई प्लीहा बढ़ जाती है । जब वायु कुपित होकर ( हृदय, नाभि, बस्ति और दोनों पाव ) गुल्म स्थानों का आश्रय ले लेती है तब शूलयुक्त सूजन उत्पन्न होती है, इसे 'गुल्म' कहते हैं । जब वायु कुपित होकर सूजन और दर्द को उत्पन्न करती हुई वंक्षण ( जंघासन्धि ) प्रदेश से अण्डकोष में जाती है, तब 'ब्रघ्न' रोग होता है । जब वायु कुपित होकर त्वचा और मांस के बीच में उदर के अन्दर पहुंचकर आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करती है, तब 'उदर' रोग उत्पन्न हो जाता है । जब वाय कुपित होकर उदर का आश्रय लेकर स्थिर हो जाती है, न तो नीचे जाती है और न ऊपर जाती है, इस को 'आनाह' कहते हैं । अघिमांस, अर्बुद आदि रोग में सूजन की समानता होने से, नाम और रूप से भिन्न होने पर भी इनका इसे शोथसंग्रह में निर्देश करना चाहिये || ३०-३५ ॥

वात-शि-कफा यस्य युगपत्कुपितास्त्रयः ।

जिह्वामूलेऽवतिष्ठन्ते विदद्दन्तः समुच्छ्रिताः ॥ ३६ ॥

जनयन्ति भृशं शोथं वेदना पृथग्विधाः ।

तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणीकेति निर्दिशेत् ॥ ३७ ॥

त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् ।

कुशलेन त्वनुकान्तः क्षिप्रंसंपद्यते सुखी ॥ ३८ ॥

सन्ति होवंविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः ।

ये हन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 246

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२२८ चरकसंहिता [अ०१८

साध्याचाप्यपरे सन्ति व्याधयो मृदुसंमताः ।

यत्नायत्नकृतं येषु कर्म: सिध्यत्यसंशयम् ॥ ४० ॥

असाध्याश्चापरे सन्ति व्याधयो याप्यसंज्ञिताः ।

सावपि कृतं येषु कर्म यात्राकरं भवेत् ॥ ४१ ॥

पुरुष वात, पित्त, कफ ये तीनों इकट्ठे मिलकर जिस के कुपित होकर जिल्हाकी जड़ में स्थित होते हैं और जलन और बहुत सूजन उत्पन्न करते हैं, तथा नाना प्रकार की पीड़ायें देते हैं इस शीघ्रकारी रोग को 'रोहिणी' कहते हैं । इस रोग के कारण मनुष्य केवल तीन दिन जीवित रहता है । इस बीच में यदि कुशल वैद्य से शीघ्र चिकित्सा कराई जाये तो मनुष्य बच जाता है । इस प्रकार के बहुत से भयानक परन्तु साध्य रोग हैं, जिनकी चिकित्सा न करने अथवा मिथ्या वा अशुद्ध चिकित्सा करने से मनुष्य मर जाता है । दूसरे कोमल रोग ऐसे सुखसाध्य हैं, जिनमें कि यक्षपूर्वक या अयत्नपूर्वक ( योग्य या अयोग्य वैद्य ) के चिकित्सा करने से भी निश्चित रूप में आराम होजाते हैं । दूसरे असाध्य रोग हैं, जिनको 'याप्य' कहा है । जिन रोगों में भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी जो याप्य रहते हैं, वे कुछ समय के लिये अच्छे हो जाते हैं ॥४१॥

सन्ति चाप्यपरे रोगाः कर्म येषु न सिध्यति ।

अपि न वैद्येतान् विद्वानुपाचरेत् ॥ ४२ ॥

साध्या वाऽप्यसाध्याश्च व्याधयो द्विविधाः स्मृताः ।

मृदु-दारुण भेदेन ते भवन्ति चतुर्विधाः ॥ ४३ ॥

एक और प्रकार के रोग हैं, जिनमें किसी प्रकार की भी चिकित्सा सफल नहीं होती । इन रोगों में मूढ़ लोग ही उत्साह से काम करते हैं, परन्तु विद्वान् इनकी चिकित्सा नहीं करते । रंग दो प्रकार के हैं-'साध्य' और'असाध्य' । और मृदु और दारुण भेद से ( दोनों ) चार प्रकार के होजाते हैं । मृदु- साध्य, दारुण-साध्य, मृदु - असाध्य और दारुण असाध्य ॥ ४२-४३ ॥

तएवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि ।

राजा - वर्ण- समुत्थान -स्थान- संस्थान -नामभिः ॥ ४४ ॥

व्यवस्थाकरणं तेषा यथास्थूलेषु संग्रहः ।

तथा प्रकृति सामान्यं बिकारेषूपदिश्यते ॥ ४५ ॥

विकारनामाकुशलो न जिह्वीयात्कदाचन ।

न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥ ४६ ॥

स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः ।

पृष्ठ 247

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ero १८ j सूत्रस्थानम् २२६ स्थानान्तरगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् ॥ ४७ ॥

तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च ।

समुत्थानविशेषांश्च बुद्ध्वा कर्म समाचरेत् ॥ ४८ ॥

यो त्रिविधं ज्ञात्वा कर्माण्यारभते भिषक् ।

ज्ञानपूर्व यथान्यायं स कर्मसु न मुह्यति ॥ ४६ ॥

ये रोग रुजा ( पीड़ा ), वर्ण, समुत्थान अर्थात् कारण ( जैसे रूक्ष भोजन या रात्रि जागरण आदि के कारण से वायु कुपित होकर भिन्न चिकित्सा से शान्त होता है ) स्थान ( आमाशय, रसादि ), संस्थान ( आकृति गुल्म, अर्बुद आदि ), नामभेद इन भेदों के कारण भेद होने से असंख्य बन जाते हैं । चिकित्सा कार्य में व्यवहार करने के लिये स्थूल संग्रह ( अष्टोदरीय संग्रह ) किया है । इसलिये चिकित्सा कार्य में प्रकृति की समानता से यह रोग वातजन्य, यह पित्तजन्य, यह कफजन्य इत्यादि रोगों की व्यवस्था बांधनी चाहिये । रोगों को नाम से न जानने वाला वैद्य कभी भी चिकित्सा कार्य में लज्जा न उठावे । सब रोगों की नाम द्वारा स्थिति नहीं, ( सब रोगों के नाम नहीं) हैं । कोई एक दोष कारण विशेष से कुपित होकर अन्य स्थान पर पहुंचकर नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है । इसलिये रोग के स्वभाव को, उस के अधिष्ठान को, उस के मेदों को और रोग के विशेष कारणों को जानकर चिकित्सा कार्य करना चाहिये । जो वैद्य इन तान बातों को जानकर चिकित्सा का कार्य ज्ञानपूर्वक उचित रूप से करता है, वह चिकित्सा कार्य में मोहित नहीं होता, वह भूल नहीं करता ॥ ४४-४६ ॥

नित्याः प्राणभृतां देहे वात-पित्त -कफास्त्रयः ।

विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुभुत्सेत पण्डितः ॥ ५० ॥

उत्साहोच्छवासनिःश्वास-चेष्टा धातुगतिः समा ।

समो मोक्ष गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ ५१ ॥

दर्शनं पतिरुष्मा च क्षुत्तृष्णा देहमार्दवम् ।

प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ ५२ ॥

स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् ।

क्षमा धृतिरलोभ कफकर्माविकारजम् ॥ ५३ ॥

वावे पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।

कर्मणः प्राकृताद्वानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 248

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२३० चरकसंहिता [ अ० १८

दोष-प्रकृति - वैशेष्यं नियतं वृद्धिलक्षणम् ।

दोषाणां प्रकति निर्वृद्धिश्चैवं परीक्ष्यते ॥ ५५ ॥ इति ॥

शरीरधारियों के शरीर में वात, पित्त और कफ ये तीनों निस्य सदा रहते हैं । वे या तो विकृत अवस्था में रहते हैं, या प्रकृत अर्थात् स्वाभाविक रूप में रहते हैं । विद्वान् को चाहिये कि वह इन को पहिचाने, जाने कि विकृतावस्था में हैं, या प्रकृतावस्था में । काम करने में उत्साह, सांस का अन्दर और बाहर आना, चेष्टा, रस, रक्त आदि धातुओं की गति को समान रखना, पुरीष, मल- मूत्र आदि गमनशील वस्तुओं को ठीक प्रकार से बाहर करना, ये अविकृत वायु के कर्म हैं । देखना, अन्न का पचन, देहकी, उष्णिमा, भूख प्यास का लगना, शरीर की कोमलता, कान्ति, मन की प्रसन्नता, और बुद्धि का होना ये अविकृत पित्त के कार्य हैं । चिकनाई, सन्धियों का बन्धन, स्थिरता, भारीपन, पुरुषत्व, बल, सहन शक्ति, मन की स्थिरता, धैर्य, लोभ का न होना ये अविकृत कफ के कार्य हैं । वात, पित्त, कफ इन के क्षीण होने पर लक्षण कहते हैं- स्वाभाविक कर्मों में न्यूनता आती है अथवा स्वाभाविक कर्मों के विरोधी कार्यों की वृद्धि होती है ( यथा वायु के क्षीण होने पर उत्साह के विपरीत विषाद बढ़ता है, पित्त के क्षीण होने पर नहीं दीखता, कफ के क्षीण होने पर रूक्षता बढ़ती है ) । वृद्धि का लक्षण कहते हैं -दोष की प्रकृति ( स्वभाव ) का वैषम्य ( बढ़ना ) वृद्धि का लक्षण होता है । यथा- कफ की स्निग्धता, मधुरता और शीतलता यह प्रकृति है, इसका अति स्निग्ध, अति शीत होना वृद्धि है । इस प्रकार दोषों की प्रकृति, शनि और वृद्धि की परीक्षा करनी चाहिये || ५०-५५ ॥ तत्र श्लोकाः ।

संख्यां निमित्तं रूपाणि शोथानां साध्यतां न च ।

तेषां तेषां विकाराणां शोफस्तिस्तिश्च पूर्वजान् ॥ ५६ ॥

विधि विकाराणां त्रिविधं बोध्यसंग्रहम् ।

प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु ॥ ५७ ॥

वीत-राग-रजो -दोष-लोभ मान-मद-स्वहः ।

व्याख्यातवाखिशोफीये रोगाध्याये पुनर्वसुः ॥ ५८ ॥

शोधों की संख्या, कारण, लक्षण, साध्यासाध्य इनसे उत्पन्न रोगों को और जिन रोगों में शोथ प्रथम होता है उनको, रोगों के विधि, मेद से तीन प्रकार की प्रकृति का शान, दोषों के स्वाभाविक कर्म, बुद्धि और हानि के साथ, यह सब

पृष्ठ 249

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सूत्रस्थानम् २३१ मोह, रथ दोष, लोभ, मान, मद, स्पृहा इन से रहित पुनर्वसु महर्षि ने 'त्रियो- श्रीय अध्याय में कह दिया || ५६-५८|| इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के त्रिशांथीयो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

ऊनविंशोऽध्यायः ।

अथातोऽोदरीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब ' अष्टोदय' अध्याय की व्याख्या करेंगे, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है । इह खल्वष्टावुराणि, अष्टौ मूत्रावाताः, अप्रैौ क्षोरदोषाः, अष्टौ रेतोदोषाः, सप्त कुष्ठानि सप्त पिडकाः, सत वीसर्पाः, षडतीसाराः, पदावर्ता, पञ्च गुल्माः, पञ्च लोहदोषाः, पञ्च कासाः, पञ्च श्वासाः, पक्ष हिकाः, पन तृष्णाः, पन छर्दयः, पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानि पश्र्च शिरोरोगाः, पञ्च हृद्रोगाः, पच पाण्डुरोगाः, पचोन्मादाः, चत्वारोऽप- स्माराः, चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरागाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छायाः, चत्वारः शोषाः, चत्वारि क्लैव्यानि " त्रयः शोथाः, त्रीणि किलासानि त्रिविधं हितपिश, द्वो अरी, द्वो व्रणी, द्वावायामो, द्वे गृस्यौ, द्वे कामले, द्विविधमामं द्विविधं वातरक्तं, द्विविधान्यर्शासि, एक ऊरुस्तम्भः, एकः संन्यासः, एका महागदः, विंशतिः क्रिमिजातयः, विंशतिः प्रमेहाः, विंशतिर्योनित्र्यापदः इत्यष्टचत्वारिंशद्रोगाधिकरणा- न्यस्मिन् संग्रहे समुद्दिष्टानि ॥ ३ ॥

इस आयुर्वेद शास्त्र में आठ प्रकार के उदर रोग हैं, आठ सूत्राघात हैं, आठ प्रकार के दूध के दोष, आठ प्रकार के वीर्य दोष । सात प्रकार के कुष्ठ, -सात पिढकार्ये, सात वीसर्प । छः प्रकार के अतीसार, छः उदावर्स । पांच गुल्म' पांच प्लीहा के दोष, पांच कास, पांच श्वास, पांच हिचकियां, पांच तृष्णायें, पांच छर्दिमन, पांच प्रकार की अन में अरुचि, पांच प्रकार के शिरोरोग, पांच हृदय रोग, पांच प्रकार के पाण्डुरोग, पांच उन्माद चार प्रकार के अपस्मार, चार नेत्ररोग, चार कर्णरोग, चार प्रकार के प्रतिश्याय, चार सुख रोग, बार

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३० चरकसंहिता [ 070 12 प्रकार के ग्रहणी रोग, चार प्रकार के मदरोग, चार प्रकार की मूर्छा, चार प्रकार के घोष, चार प्रकार की क्लीवता तीन प्रकारका शोथ, तीन प्रकार का किलास, तीन प्रकार का रक्तपित्त, दो प्रकार का ज्वर, दो प्रकार के व्रण, दो प्रकार के आयाम, दो प्रकार की गृध्रसी, दो प्रकार का कामला, दो प्रकार की आम, दो प्रकार का बातरक्त, दो प्रकार का अर्श । एक प्रकार का अस्तम्भ, एक प्रकार का संन्यास, एक प्रकार का महामद; बीस प्रकार के कृमिभेद, बीस प्रकार के प्रमेह, बीस प्रकार के योनि रोग, इस प्रकार से इस स्थूल संग्रह में अड़तालीस प्रकार के रोगों की गणना है ॥ ३ ॥

इन को स्पष्ट करके कहते हैं- raft थशमभिनिर्देक्ष्यामः - अष्टावुदराणीति बात- पित्त-कफ-सन्निपात प्लीह- बद्ध- च्छिद्र- दकोदराणीति, अष्टौ मूत्राघाता इति वात- पित्त-कफ- सन्निपाताश्मरी- शर्कर-शुक्र-शोणितजा इति, अष्टौ क्षीरदोषा इति वैवर्ण्य वैगन्ध्यं वैरम्यं पेच्छिल्यं फेनसङ्घातो रौक्ष्यं गौरवमति-स्नेहवति, अष्टौ रेतोदोषा इति न्नु शुष्कं फेनिलमश्वेतं पूत्यतिपिच्छिल-मन्यधातूपहितमवसादि चेति ॥ ( १ ) ॥ आठ प्रकार के उदर रोग हैं- वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य फीहोदर, बद्धोदर, छिद्रोदर और दकोदर ये आठ आठ मूत्राघात - वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, अश्मरीजन्य, शर्कराजन्य, शुक्रजन्य और शोणितजन्य स्त्रियों के दूध में आठ प्रकार के दोष हैं — वैवर्ण्य, वैगन्ध्य, वैरस्य, पच्छिल्य, फेनसघात ( साग का बहुत आना ), रौक्ष्य ( रूखापन ), गौरव ( भारीपन पानी में नीचे बैठना ) और अति स्नेह ( चिकनाई की अधिकता ) वीर्य के दोष आठ हैं-तनु ( पतला ), शुष्क, फेनिल ( झागदार ), अश्वेत ( मेला, धूसर रंग ), पूति ( दुर्गन्धयुक्त ), अति पिच्छिल ( बहुत चिकना ), अन्य धातु से मिश्रित और अवसादि ( हीनसत्त्व ) ॥ ( १ ) ॥ सप्त कुटनीति कपालोदुम्बर -मण्डल जिह्न-पुण्डरीक- सिध्म -काक- कानीति, सप्त पिडका इति शराविका कच्छपिका जालिनी सर्वप्यलजी विनता विद्रधिश्चेति सप्त वीसर्पा इति वात- पित्त-कफाग्नि -कर्दम -प्रन्थि- सन्निपाताख्याः ॥ ( २ ) ॥ सात प्रकार के कुष्ठ —कपाल, उदुम्बर, मण्डल, शुध्यजिह, पुण्डरीक, सिम और काकणिका । सात पिकायें---शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अळजी, विनता और विद्रधि । सात विसर्प-यातजन्म, पित्त जन्य, कफजन्य, अग्नि, कर्दमक, ग्रन्थि और सन्निपातजन्य ॥ (२) ॥