चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 251–260
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 251–260
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अ० १६ ] सूत्रस्थानम् २३३ वडतीसारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-भय- शोकजाः, षडदावर्ता इति बात - मूत्रपुरीष शुक्र- च्छर्दि क्षवथुजाः ॥ ( ३ ) ॥ छः अतीसार हैं - वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, भयजन्य और शोकजन्य । छः उदावर्त्त हैं--- वातजन्य, मूत्रजन्य, पुरीषजन्य, शुक्रजन्य, छर्दिजन्य और क्षवथुजन्य ॥ ( ३ ) ॥ पच गुल्मा इति वात-पित्त- कफ सन्निपात रक्तजाः । पच सीहदोषा इति गुल्मैर्व्याख्याताः । पञ्च कासा इति वात-पित्त-कफ- क्षत क्षयजाः, पच श्वासा इति महोर्ध्वच्छिन्न-तमक क्षुद्राः । पञ्च हिक्का इति महती गम्भीरा व्यपेता क्षुद्रा चान्नजा च । पच तृष्णा इति वात-पित्तामक्षयोपस- र्गात्मिकाः । पच छर्दय इति द्विष्टार्थसंयोग-वात-पित्त-कफ- सन्निपातो- कात्मिकाः । पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानीति वात-पित्त-कफ- द्वेषायासाः, पञ्च शिरोरोगा इति पूर्वोद्देशमभिसमस्य वात-पित्त-कफ- सन्निपात- क्रिमिजाः । पब्च हृद्रोगा इति शिरोरोगैर्याख्याताः । पञ्च पाण्डुरोगा इति वात- पित्त-कफ-सन्निपात- मृद्भक्षणजाः । पञ्चोन्मादा इति वात- पित्त-कफ- सन्निपातागन्तुनिमित्ताः ॥ ( ४ ) ॥ पांच गुल्म हैं-वातजन्य, पित्राजन्य, ककजन्य, सन्निपातजन्य और रक्त ( आर्त्तव ) जन्य । पांच प्रकार के प्लीहा दोष -गुल्म के समान ( वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्तजन्य ) हैं पांच प्रकार के कास -वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, क्षत ( उरः क्षत ) जन्य और क्षयजन्य पांच प्रकार के श्वास- महा, ऊर्ध्व, छिन्न, तमक और क्षुद्र । पांच प्रकार की हिफा ( हिचकी - महती, गम्भीरा, व्यपेता, क्षुद्रा और अन्नजन्य । पांच प्रकार की प्यास (तुषा)- वातजन्य, पित्तजन्य, आमजन्य, क्षयजन्य और औपसर्गिक कारण से होने बाली । वमन भी पांच प्रकार का है - दूषित अन्न के खाने से, वातजन्य, पिजन्य, कफजन्य और सन्निपात से होने वाला ।पांच प्रकार का अपचन- वातजन्य, पिसजन्य, कफजन्य, द्वेष ( भांजन से द्वेष ) और आयास ( मोजन के पीछे सहसा श्रम करने से ) । पांच प्रकार के शिरोरोग-( ' अर्द्धावभेदको वा स्यात्'! से आरम्भ करके 'कियन्तः शिरसीय ' अध्याय में कह दिये गये हैं ) । वातजन्य, पिसजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य और कृमिजन्य पांच प्रकार के हृदय रोग - शिरोरोग की भांति हैं । पांच पाण्डुरोग- वातजन्य, पित्तजन्य, कफ--जन्य, सन्निपातजन्य और मिट्टी के खाने से उत्पन्न | पांच प्रकार का उन्माद- वातजन्य, पिराजन्य, कफजन्य, सन्निपात और आगन्तुज कारण से ॥ ( ४ ) ॥
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२३४ चरकसंहिता [अ० १९ चत्वारोऽपस्मारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-निमित्तमाः । चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायकः, चत्वारो मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छाया इत्यपस्मारैर्व्याख्याताः । चत्वारः शोषा इति साहस- संधारण-क्षय -विष- माशनजाः, चत्वारि क्लैव्यानीति बीजोपघाताद्ध्वजभङ्गाज्जराबाः शुक्रक्षयाथ ॥ ( ५ ) । चार अपस्मार -वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य और सन्निपातजन्य । चार आंख के और चार कान के रोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग चार ग्रहणी दोष, चार मद, चार मूर्च्छायें, ये अपस्मार के समान ( वात, पित्त, कफ और सन्निपातजन्य ) हैं । चार प्रकार का शोष, साहस, सन्धारण ( मल- मूत्र के उपस्थित वेगों का रोकना ) क्षय तथा विषम भोजनजन्य । चार प्रकार की नपुंसकता -बीज के ( वीर्य के ) दोष से, ध्वज ( साधन ) के दोषसे, जरा ( बुढ़ापे ) से और शुक्र के क्षय के कारण । ( ५ ) ॥ त्रयः शोथा इति वात-पित्त-श्लेष्म- निमित्ताः, त्रीणि किलासानीति रक्तताम्र-शुक्लानि, त्रिविधं लोहित- पित्तमित्यूर्ध्व भागमधोभागमुभय- भागं च ॥ ( ६ ) ॥ शोथ तीन प्रकार का - वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य तीन प्रकार के किलास-रक्त ( लाल ), ताम्र और शुक्ल ( श्वेत ) । तीन प्रकार का रक्त- पित्त उर्ध्वगामि, अधागामि और उभयगामि ( ऊर्ध्व एवं अधः दोनों मार्गों से जाने वाला ) | ( ६ ) ॥ द्वौ ज्वराविति उष्णाभिप्रायः शीतसमुत्थश्च शीताभिप्रायश्रोष्णस -सुस्थ, द्वौ णौ इति निजश्वागन्तुजश्च द्वावायामाविति बाह्यश्चाभ्यन्त रख द्वे गृस्याविति वाताद्वातकफाच, द्वे कामले इति कोष्ठाश्रया शाखा- श्रया च द्विविधमाममित्यलसको विसूचिका च, द्विविधं वातरतमिति गम्भीरमुत्तानंच, द्विविधान्यर्शासीति शुष्काण्यार्द्राणि च ॥ ( ७ ) ॥ ज्वर दो प्रकार का शीत से उत्पन्न हुआ, जिसमें उष्ण उपचार की इच्छा हो, यह एक प्रकार का, उष्णिमा से उत्पन्न हुआ जिसमें शीत उपचार की इच्छा हो(,बाह्ययह दूसरीकारण प्रकारसे ) दोकाआयाम। व्रण दोबाह्यप्रकारऔरकेआभ्यन्तरनिज ( शारीरिकदो प्रकार) औरकाआगन्तुकसी रोग-वातजन्य और वात-कफजन्य । कामका दो प्रकार का कोठाभित और शाला-भित । आम दो प्रकार का अहसक और विसूचिका ( हैना ) । सातरक्त दो
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अ० [१६ ] सूत्रस्थानम् २३५ प्रकार का गम्भीर और उत्तान ( स्वचा के पृष्ठवृत्ति ), अर्थ दो प्रकार शुष्क और आर्द्र ॥ ७ ॥
एक ऊरुस्तम्भ इति आमत्रिदोषसमुत्थानः एकः संन्यास इति त्रिदोषात्मको मनःशरीराधिष्ठानसमुत्थः, एको महागद इति अतस्त्वा भिनिवेशः ॥ ( ८ ) ॥ ऊरुस्तम्भ एक प्रकार का --आम- दोषमिश्रित त्रिदोष जन्य । संन्यास एक प्रकार का त्रिदोषजन्य, मन और शरीर में आश्रित । महागद एक प्रकार का अतस्त्वाभिनिवेश अर्थात् यथार्थ तत्त्व का न जानना यह मन का विकार है है और संसार के सब दुःखों का कारण है ॥ ८ ॥
विंशतिः क्रिमिजात इति युक्राः पिपीलिकाश्चेति द्विविधा बहि- लजाः, केशादाः लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति षट्शोणितजाः, अन्त्रादा उदरादा हृदयदराश्चुरवो दर्भपुष्पाः सौगन्धिका महागुदाश्चेति सप्त कफजाः, ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति पञ्च पुरीषजा इति विंशतिः क्रिमिजातयः । विंशतिः प्रमेहा इति उदकमेहश्चेक्षुरसमेहश्च सान्द्रमेहश्व सान्द्रप्रसाद मेह शुक्रमेह शुक्रमेहश्च शीतमेहश्च शनैर्मेहश्च सिकतामेह लालामेह-श्चेति दश श्लेष्मनिमित्ताः, क्षारमेहश्च कलमेहश्च नीलमेहश्रच लोहि- मेदश्चमष्ठामेहश्च हरिद्रा मेहश्चेति षट् पित्तनिमित्ताः, वसामेहश्व मज्जमहश्च हस्तिमेहश्च मधुमेहश्वेति चत्वारो वातनिमित्ता इति विंशतिः प्रमेहाः । विंशतियनिव्यापद इति वातिकी पैत्तिकी श्लैष्मिकी सान्निपातिकी चेति चतस्रः, दोष -दूष्य-संसर्ग -प्रकृति -निर्देशरवशिष्टाः षोडश निर्दिश्यन्ते, तद्यथा - रक्तयोनिश्वारजस्का चाचरणा चातिच-रणा च प्राकूचरणा चोपप्लुता चोदावर्तिनी च कर्णिनी च पुत्रघ्नी चान्त- र्मुखी च सूचीमुखी च शुष्का च वामिनी च षण्डयोनिश्च महायोनि- चेति विंशतियनिव्यापदः । केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्ट इति ॥ ४ ॥
कृमियों की जातियां बीस प्रकार की हैं, यथा—यूक ( जूं) और पिपीलि-काएं ( लोग ) में दो प्रकार के कृमि बाह्य मल ( पसीने आदि ) से उत्पन्न होते हैं । केबादकोमाद, कोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्तुमावा ये छः सातरक्तजन्य,जन्यअन्वाद, कक्क, उदराद, लेडिह, हृदयचर, सालक,,चुकऔर, दर्भपुष्पसौसुराद, सौगन्धिकये पांच पुरीषमन्य, महामुदहैं ये। बीस प्रकार के कृमि हैं ।
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२३६ चरकसंहिता [ अ० १६ प्रमेह बीस प्रकार के हैं । शुक्लमेह, शुक्रमेह, शीतमेह, शनैर्मेह, सिकतामेह, लाल मेह, उदकमेह, इक्षुमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह ये दस प्रमेह कफजन्य, क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितामेह, मंजिष्ठामेह, हरिद्रामेह ये छः प्रमेह पित्तजन्य, वसामेह, मज्जामेह, हस्तिमेह ओर मधुमेह ये चार प्रमेह वातजन्य हैं । इस प्रकार से बीस प्रकार के प्रमेह हैं । योनिरोग बीस प्रकार के यथा वातिकी, पैत्तिकी, श्लैष्मिकी और सान्निपातिकी ये चार और बाकी सोलह दोषवातादि, वष्य रक्कादि इनके संसर्ग से तथा प्रकृति निर्देश से होते हैं यथा -रक्तयोनि, अरजस्का, अचरणा, अतिचरणा, प्राक्चरणा, उपप्लुता, परिप्लुता, उदावर्तिनी, कर्णिनी, पुत्रनी, अन्तर्मुखी, सूचीमुखी, शुष्का, वामिनी, घण्डयोनि और महा- योनि ये बीस प्रकार के योनिरोग हैं । यहां पर केवल रोगों को नाम गणना ही की गई है, आगे विस्तार से यथास्थान कहेंगे ॥ ४ ॥
सर्वएव विकारा निजा नान्यत्र वातपित्तकफेभ्यो निर्वर्तन्ते, यथा हि शकुनिः सर्व दिवसमपि परिपतन् स्वां छायां नातिवर्तते,तथा स्वधा-तुवैषम्यनिमित्तः सर्वविकारा वातपित्तकफान्नातिवर्तन्ते, वातपित्त-इष्मणां पुनः स्थान -संस्थान -प्रकृति-विशेषानभिसमीक्ष्य नदात्मकानपि सर्वविकारांस्तानेवोपदिशन्ति बुद्धिमन्त इति ॥ ५ ॥
कहे या न कहे हुए सत्र प्रकार के रोग ( शारीरिक रोग ) वात पित्त कफ को छोड़कर नहीं हो सकते । वातरित्त कफ के कारण ही सब शारीरिक रोग होते हैं । जिस प्रकार कि सारे दिन भर उड़ता रहने पर भो पक्षो अपनी छाया का अतिक्रमण ( उल्लंघन ) नहीं कर सकता, उसी प्रकार शरीर के धातुओं की विषमता से उत्पन्न होनेवाले सब रोग वात पित्त और कफ को नहीं छोड़ सकते । वात, पित्त और कफ ही स्थान ( रसादि बस्ति आदि ), संस्थान ( आकृति लक्षण ), प्रकृति ( कारण ) इनकी विशेषताओं को देखकर, एवं वातादि जन्य सब विकारों को इन्हीं से उत्पन्न उक्त बुद्धिमान् कहते हैं ॥ ५ ॥
भवतश्चात्र- स्वधातुवैषम्यनिमित्तज्ञा ये विकारसङङ्घा बहवः शरीरे ।
न ते पृथक् पित्तकफानिलेभ्य आगन्तवस्त्वेव ततो विशिष्टाः ॥ ६॥
आगन्तुरन्वेति निजं विकारं निजस्तथाऽऽगन्तुमपि प्रवृद्धः ।
तत्रानुबन्धं प्रकृतिं च सम्यक् ज्ञात्वा ततः कर्म समारभेत ॥ ७॥
प्रायः जितने रोग शरीर के अन्दर शरीर की धातुओं की विषमता से उत्पन्न होते हैं, वे पित्त, कफ और वायु से पृथक नहीं होते । आगन्तुक रोग इन बात पित्त, कफ से पृथक्हैं ।
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अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७ निज ( स्वतःशरीर में उत्पन्न हुए ) रोग को आगन्तुज रोग अनुमान करता है । इसी प्रकार आगन्तुज ( अभिघातजन्य ) रोग के पीछे ( कारण को लेकर ), निज ( अर्थात् शारीरिक लक्षणोंसे लक्षित ) रोग भी हो जाता है । जैसे चोट लगने के पीछे ज्वर हो जाता है इसलिये अनुबन्धन ( अप्रधान, मुख्य ) और प्रकृति ( मूल कारण को भली प्रकार जानकर चिकित्साकर्म आरम्भ करना चाहिये ॥ ६–७ ॥
तत्र श्लोकौ -– विंशकारचैककाश्चैव त्रिकाचोक्तास्त्रयस्त्रयः ।
द्विकाश्चाष्टौ चतुष्काश्च दश द्वादश पञ्चकाः ॥ ८ ॥
राष्ट्रका वर्गाः षट्कौ द्वो सप्तकास्त्रयः ।
अष्टोदरीये रोगाणामध्याये संप्रकाशिताः ॥ ६ ॥
इस ' अष्टोदय' नामक अध्याय में बीस प्रकार के तीन, एक प्रकार के सीन, तीन प्रकार के तीन, दो प्रकार के आठ, चार प्रकार के दस बारह प्रकार के पांच, चार प्रकार के आठ छः प्रकार के दो और सात प्रकार के तीन रोग कहे हैं।-॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के अष्टोदरीयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥
विंशोऽध्यायः ।
अथातो महारोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे महारोगाध्याय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे- जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
चत्वारो रोगा भवन्ति - आगन्तु -वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । तेषां चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं रुक्सामान्यात् । द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषां, आगन्तु-निज विभागात् । द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीर- बिशेषात् । विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठान- लिङ्गायतन- विकल्प -विशेषात् " तेषामपरिसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
मुखानि तु खल्वागन्वोर्नख-दशन-पतनाभिचाराभिशापभिषङ्ग- व्वध-बन्ध- पीडनरज्जु -वहन-मन्त्राशनि- भूतोपसर्गादीनि निजस्य तु मुखं बात -पित्तश्लेष्मणांवैषम्यम् ॥ ४ ॥
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२३० चरकसंहिता [ III I II द्वयोस्तु खल्वागन्तुनिजयोः प्रेरणमसाम्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञा- पराध, परिणामश्चेति ॥ ५ ॥
सर्वेऽपि तु खल्वेऽभिप्रवृद्धाश्चत्वारो रोगाः परस्परमनुबध्नन्ति, न चान्योन्यसंदेहमापद्यन्ते ॥ ६ ॥
आगन्तु व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमा- पादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्व वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ७ ॥
तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा- बस्तिः पुरीषाधानं कटिः सक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि, तत्रापि पक्काशयो विशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामा-शयश्च पित्तस्थानानि तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो प्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि1 तत्राप्युरो विशेषेग श्लेष्मणः स्थानम् ॥ ८॥
सर्वशरीरचरास्तु वातपित्तश्लेष्माणो हि सर्वस्मिन् शरीरे कुपिता-कुपिताः शुभाशुभानि कुर्वन्ति प्रकृतिभूताः शुभान्युपचय- बल- वर्ण- प्रसादादीनि अशुभाति पुनर्विकृतिमापन्नानि विकारसंज्ञकानि ॥ ८ ॥
मष्टोदरीयेतत्र विकारःव्याख्याताः- सामान्यजा, नानात्मजांस्त्विहाध्याये, नानात्मजाश्च । तत्र सामान्यजाःऽनुव्याख्यास्यामःपूर्व-,तद्यथा - अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशल्पित्तविकाराः विंशतिः श्लेष्मविकाराः ॥ १० ॥
रोग चार प्रकार के हैं आगन्तुज, वात, पित्त, कफजन्य, । इन चारों में ही रुक् पीड़ा सामान्य है, इसलिये एक प्रकार है, वेदना को समानता होने से । इन चारों प्रकार के रोगों की प्रकृति दो प्रकार की है; आगन्तुज और निज शरीर में उत्पन्न होने वाले । इन रोगों के अधिष्ठान, आश्रय दो प्रकार के हैं, मन और शरीर । किन्तु रोग असंख्य है । क्योंकि प्रकृति, कारण नाम आदि अधिष्ठान ( दूष्य, रस, रक्तादि ), लिंग ( लक्षण ), आयतन ( बाह्य हेतु दुष्ट आहार-बिहार ) इनके भेद असंख्य हैं । इसलिये रोग भी अगणित प्रकार के हो जाते हैं । आगन्तुज रोगों के मुख्य कारण दान्त का लगना, गिरना, अभिचार ( मारण आदि ), अभिशाप -शाप देना, अभिषन, अभिघात ( चोट का लगना ) वध ( मारना ), बन्धन ( बाँधना ), दबाना, रस्सी से बांधना, जलाना, शस्त्र का लगना, बिजली जा गिरना, वे सूक्ष्मभूत तत्व के उपद्रव के कारण हैं । जिन शारीरिक जन्य रोगों के मुख्य कारण बात,
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अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३६ पिच और कफ को विषमता है । इन दोनों ( आगन्तुज और निज ) प्रकार के रोगों का मूल प्रेरक ( प्रवृत्ति का ) कारण असात्म्येन्द्रियार्थ- संयोग, प्रज्ञापराध और परिणाम है । ये चारों प्रकार के रोग बढ़कर परस्पर एक दूसरे में मिल जाते हैं । परन्तु तो मी सन्देह को उत्पन्न नहीं करते । परस्पर मिलने पर भी लक्षण पृथक् पृथक् दीख पड़ते हैं । आगन्तुज रांग प्रथम शरीर के अन्दर पीड़ा को उत्पन्न करता है और पीछे से वात, पित्त और कफ की विषमता को उत्पन्न करता है । निज रोग प्रथम वात, पित्त, कफ की विषमता को उत्पन्न करते हैं और फिर पीछे से पीड़ा की उत्पन्न करते हैं । तीनों ही दोषों का शरीर में स्थान विभाग कहते हैं - यथा - बस्ति ( मूत्राशय ), पुरीषाधान ( पक्काशय ), कटि ( कमर ), सक्थिएं ( जंघायें ) और पांव की अस्थियां ये वायु के 'स्थान हैं । इनमें भी पक्काशय विशेष करके वायु का स्थान है । पसीना, रस, लसीका. रुधिर और आमाशय ( का निचला भाग ) ये पित्त के स्थान हैं । इनमें भी आमाशय मुख्य करके वित्त का स्थान है । छाती, शिर, ग्रीवा, व सन्धियां, आमाशय का ( ऊपर का भाग ) और मेद, ये कफ के स्थान हैं । इनमें भी छाती विशेष करके कफ का स्थान है । ये बात, पित्त, कफ तीनों दोष सम्पूर्ण शरीर में गति करते हैं, और गति करते हुए कुपित या अकुपित अवस्था में रहकर सम्पूर्ण शरीर में शुभ या अशुभ लक्षणों को उत्पन्न करते हैं । यथा - प्रकृतिभूत स्वस्थरूप में रहकर शुभ लक्षणों को, यथा - उपचय ( शरीर की पुष्टि ), बल- कान्ति की वृद्धि, वर्ण ( कान्ति ) की उज्ज्वलता और विकृत ( कुपित रूप ) अशुभ लक्षणों ( रोगों ) को उत्पन्न करते हैं । विकार ( रोग ) दो प्रकार के हैं - सामान्य और नानात्मज । सामान्य -वातादि दोष प्रत्येक मिलकर जो रोग उत्पन्न करते हैं । नानात्मज----जब वातादि दोष परस्पर न मिल कर स्वतन्त्ररूप से रोग उत्पन्न करते हैं । इनमें सामान्यज रोग पहिले ' अष्टोदरीय ' अध्याय में कह दिये हैं और नानात्मज रोगों का इस अध्याय में वर्णन करेंगे । यथा -अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्तरोग और बीस प्रकार के कफ रोग हैं ॥ ३-१० ॥ ौ घातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्व, विपादिका च पादशूलं च पादभ्रंशश्च पादसुप्तता च, बातखुडता च, १ प्राण अपान भेद से वायु के स्थान अन्यत्र कहेंगे । यहां पर बताये हुए स्थानों में इन दोषों के विकार प्रायः करके होते हैं, अतः इनकी गणना की है । २ आमाशय के ऊर्ध्वभाग में पित्त और अधोभाग में कफ का स्थान है ।
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२४० चरकसंहिता [ ० २० HAAAA गुल्फप्रहश्च, पिण्डिकोद्वेष्टनं च गृध्रसी च, जानुभेदश्य, जानुविष ऊरुस्तम्भय, ऊरुसादृश्य, पाङ्गल्यं च, गुदभ्रंशन, गुरार्तिश्व, वृषणोत्से-पच, शेफःस्तम्भख वङ्क्षणानाइच, श्रोणिभेद, विभेदश्य, उदावर्तश्च खञ्जत्वं च [ कुब्जत्वं च ] वामनत्वं च त्रिकमहश्य, पृष्ठप्रदश्व, पाश्ववमर्दव, उदरवेश्च हन्मोह, हृदय, वक्ष-उद्धर्षश्च वक्षउपरोधश्च ( वक्षस्तोदश्च ) बाहुशोपश्व प्रोवास्तम्भव मन्यास्तम्भश्च कण्ठोद्ध्वंसश्च हनुस्तम्भश्च, ओष्ठभेदश्व, (अक्षिभेदश्व ) दन्तभेदश्च दन्तशैथिल्यं च मूकत्वं च ( गद्गदत्वं च ) वाक्सङ्गश्व, कषायास्यता च मुखशांषव अरसज्ञता च, [ अगन्धज्ञता च प्राण-नाशश्च, ] कणेशले च, अशब्दश्रवणं च उचैःश्रुतिश्च, बाधियं च, वर्त्मस्तम्भश्च वर्त्मसंकोचश्व, तिमिरं च, अक्षिशूलं च, अक्षिव्युदासश्च, भ्रूयुदासश्च शङ्खभेदश्व, ललाटभेदञ्च, शिरोरुक् च केशभूमिस्फुटनं च, अदितं च, एकाङ्गरोगश्च सर्वाङ्गरागश्च [ पक्षवधश्च ] आक्षेपश्च दण्डकन, श्रम, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च विषादश्य, (हिक्का च), अतिप्रलापश्च ग्लानिश्च, रौक्ष्यं च पारुष्यं च श्यावारुणाव भालता च, अस्वप्नच, अनवस्थितत्वं चेत्यशीतिर्वातविकारा वातविकाराणा- मपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥ ११ ॥
सबसे प्रथम वात रोगों को कहते हैं । यथा -नखों का टूटना, विपादिका ( पांव का फटना ), पादशूल ( पांत्र की वेदना ), पादभ्रंश, पादसुतता ( पांव का सोना, ज्ञानशून्यता ), वातखुड्डुका, गुल्फमद; पिण्डिकोद्वेष्टन ( पिण्डलियों में ऐंठन ), राधसी, जानुमेद और जानु विश्लेष, ऊरुस्तम्भ, ऊरुसाद, पंगुता, गुदभ्रंश, गुदा, वृषणोत्क्षेप ( अंडकोश का ऊपर खींचना ) शेफस्तम्भ ( शिभ में अकड़ाहट रहना ), वंक्षण में आनाह, श्रोणिमेद ( नितम्बों का फटना ), विभेद ( मलमेद ), उदावर्स, खञ्जत्व ( लंगड़ापन ), कुब्जत्य ( कुचकापन ), वामनत्व ( नाटापन ), त्रिकप्रद, पृष्ठग्रह. पाश्वमर्द ( पसलियों की पीड़ा ), उदरावेष्टन ( पेट में ऐंठन ), हृन्मोह ( हृदय की मूर्छा ), हृदुद्राव ( हृदय का द्रवित या धड़कन अधिक होना ) वक्षः उद्धर्ष ( छातो में पीड़ा ), वयोपरोध ( छाती का रुकजाना ), बाहुशोष ( भुजा का सूचना ), ग्रीवास्तम्भ ( श्रीवा का अकड़ना ), मन्यास्तम्भ ( घाट की अकड़ाहट ), कण्ठोदुष्वंस ( स्वरभंग ), हनुस्तम्भ ( मुख का, जवादी का खुन रहना ), अहमेद (ओष्ठ की विदीर्णता) दम्मेद ( दांतों का टूटना ), दन्तशैथिल्य ( दांतों को शिथिलता ), मूकत्व ( भूंगापन ), बाक्संह ( वाणी का रुकना ), मुख का कसैलापन, मुख की
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सूत्रस्थानम् २४१५०२० ] १६ शुभकता, स्वाद का ज्ञान न होना, गन्धज्ञान का अभाव, त्राणशक्ति का अमाव प्राणशक्ति का नाश होना, कान में वेदना, शब्द का सुनाई न देना, ऊंचा सुनाई देना, बहरापन, पलकों का स्तम्भ, पलकों का संकुचित होना, शंख, कनपटी का फटना, माये का फटना, शिरोवेदना, बालों की भूमि का फटना, अर्दित बात, एकांग रोग, सर्वांग रोग, पञ्चवध ( पक्षाघात ) आक्षेपक, दण्डापतनक, थकान, चक्कर आना, कम्पन, जम्माई, विषाद, चिन्ता, बहुत प्रलाप, ग्लानि, रूक्षता, कर्कशता, लाल-लाल रक्त की चमक, नींद का न आना, तिमिर ( काच रोग, आँख में वेदना, आंख का पलटना, भ्रुवों का संकुचित होना और चित्त की अनवस्थितता, चंचलता ( अस्थिरता ) ये अस्सी बात विकार हैं । वात विकार असंख्य हैं—यहां पर प्रधान प्रधान वात रोगों की गणना की है ॥ ११ । सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूतेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिद-मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेद्दा वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा—रौक्ष्यं लाघवं वैशद्यं शैत्यं गतिरमूर्तत्वं चेति वायोरात्मरूपाणि, एवंविधत्वाच कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः; तद्यथा- स्रंस - भ्रंश व्यासङ्ग- भेद-साद-हर्ष- तर्ष वर्त-मर्द-कम्प चाल- तोद व्यथा -चे- ष्टादीनि तथा स्वर-परुष-विशद- सुषिर वारुण-कषाय- विरस-मुखशोष-शूल- सुप्ति -संकुचन स्तम्भनखञ्जतादीनि च वायोः कर्माणि तैरन्वितं वातविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १२ ॥
तं मधुराम्ल लवण-स्निग्धोष्णैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुषास- ननस्तःकर्म भोजनाभ्यङ्गात्सादन- परिषेकादिभिर्वाविहरेमात्र काळं च प्रमाणीकृत्य; आस्थापनानुवासनं तु खलु सर्वोपक्रमेभ्या वाते प्रधान-तमं मन्यन्ते भिषजः, तद्धयादित एव पक्काशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं बातमूलं छिनन्ति तत्राबजिते बातेऽपि शरीरान्तर्गता बात-विकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा वनस्पतेर्मूले छिन्नं स्कन्धशाखावरोह-कुसुमफलपलाशादीनां नियतो विनाशस्तद्वत् ॥ १३ ॥
इन सब यहां पर कहें या न कहे हुए वातविकारों में वायु के अपने स्वाभाविक ( अन्य उपाधि से न हुए ) कर्मों से, तथा अपने लक्षणों से वायु को पहिचान कर बात के एक भाग को देखकर सन्देह राहेत हाकर कुशल चिकित्सक वात रोग ही है ऐसा पहिचानते हैं । वे ये हैं यथा रूक्षता, लघुता
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२४२ चरकसंहिता [अ० २० (हल्कापन) विशदता, शीतलता, गति, अमूर्त्तत्व ( अदृश्यत्व), ये वायु के स्वरूपहैं । वायु के कर्मों से पहिचान - शरीर के जिस जिस अवयव में वायु आश्रय लेती है, वहां पर स्रंस (खिसकना), भ्रंश ( दूर खिसकना ), विस्तार, अवसन्नता, हर्ष, प्यास, मर्दन की पीड़ा, आवर्त्तन, हिलने की चुभने की पीड़ा, चेष्टा आदि कम्पन, कर्कशता, कठोरता, पृथक्करण, छेद करना, लाल रंग, कषाय रस, मुख की विरसता, मुख का शुष्क होना, दर्द, शून्यता, संकोच, स्तम्भन, खञ्जत्व ( लंगड़ापन ) आदि वायु के काम हैं । इन लक्षणों वाले को वातरोग ही जानना चाहिये । इस वायु की मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, उष्ण क्रियाओं से चिकित्सा करनी चाहिये । स्नेहन, स्वेदन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य कर्म, भोजन, मर्दन, उबटन लगाना, परिषेक स्नान आदि वातनाशक कर्मों को मात्रा और काल का विचार करके प्रयोग करना चाहिये । इन सब कर्मों में वैद्य लोग आस्थापन और अनुवासन ( बस्ति ) को ही सब से श्रेष्ठ उपाय वायु के लिये मानते हैं । यह शीघ्रता से पक्वाशय में पहुंचकर सम्पूर्ण रोगों को उत्पन्न करने वाले वायु को जदसे नष्ट कर देती है । ऐसी अवस्था में वायु के पूर्ण शान्त न होने पर भी शरीर के अन्दर के वायुरोग शान्त हो जाते हैं, जैसे --वनस्पतियों के जड़ के कट जाने पर लता, शाखा, अंकुर, फल, फूल पत्ते आदि का नाश अवश्यम्भावी है ॥ १२-१३ ॥ पित्तविकाराश्चत्वारिंशदत ऊर्ध्व व्याख्यारयन्ते तद्यथा - ओपश्च प्लोष[ अङ्गदा, दाहश्व].,ऊष्माधिक्यंदवथुश्च, घूमकश्चच, अतिस्वेदश्व, अम्लकब्ध,, विदाहश्च[ अङ्गम्वेदश्वअन्तर्दाद्दश्व, ] अङ्ग-, गन्धश्च, अङ्गावदरणं च शोणितक्लेदश्व, मांसक्लेदश्च त्वग्दाह, मसिदाह, त्वगवदरणं च चर्मावदरणं च रक्तकोठाञ्च (रक्तविस्फो टाव ) रक्तपितं च " रक्तमण्डलानि च हरितत्वं च दारिद्रत्वं च, नीलिका च, कक्षा च, कामला च, तिक्तास्यता च, ( लोहितगन्धास्यता च ) पूतिमुखता च, तृष्णाया आधिक्यं च अतृप्तिश्व. आस्यपाकश्च गलपाका, अक्षिपाकश्च गुदपाकश्च, मेढपाकश्च जीवादानं च तम:- प्रवेशश्च हरित -हारिद्र-मूत्र-नेत्र - वर्चस्त्वं चेति चत्वारिंशत्पित्तविकाराः पित्तविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याता भवन्ति ॥ १४॥
इसके आगे पित्तजन्य, विकारों की व्याख्या करते हैं - पिश विकार- ओष ( पास में रखी अग्नि की आंच ), प्लोष ( जलने के समान जलन ), दाह जलना ), दवयु ( सब अंगों में जलने के समान धक्धक् होना), धूमक ( धूर्ये जैसा वमन आना ), खट्टास, जलन, शरीर के अन्दर दाह, अंगों में दाह, गरमी