चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 261–270
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 261–270
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अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४३ की अधिकता, पसीने का अधिक आना, अंगों ( बगल आदि ) में पसीना आना, अंगों से दुर्गन्ध आना, अंगों का फटना, रक्त में क्लिन्नता ( बदबू ) आना, मांस की क्किन्नवा, त्वचा का जलना, मांस की जलन, त्वचा और मांस का फटना, त्वचा के ऊपर के चर्म का फटना, लाल-लाल फुन्सियां ( वरें के काटे के समान ), रक्तपित्त ( रक्तस्राव ), लाल- लाल धब्बे चकत्ते, हरा रंग हल्दी का सा पीला रंग, नीलिका ( झांई ), कक्ष्या ( बगल का मांस फटना ), कामला मुख की कटुता, मुख से दुर्गन्ध आना, प्यास का अधिक लगना, भोजन में अतृप्ति, मुख का पकना, गले का पकना, आंख का पकना, गुदा का पकना शिश्न का पकना, प्राणों का नाश, और आंखों के सामने अन्धेरा रहना, मल- मूत्र और आंख का हरा या पीला होना, ये चालीस पित्तजन्य रोग हैं । पित्त विकार असंख्य हैं, यहां पर मुख्य रांगो की गणना की गई है ॥ १४ ॥
सर्वेष्वपि खल्वेतेषु पित्तविकारध्वन्येषु चानुक्तषु पित्तस्येदमात्मरूप- मपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः पित्तविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः । तद्यथा औष्ण्यं तैक्ष्ण्यं लाघवम- नतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्जी गन्धश्च विस्रो रसौ च कटुकाम्लो पित्तस्याऽऽत्मरूपाणि, एवंविधत्वाश्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति । तं तं शरीरावयवमाविशतः । तद्यथा--दाहौष्ण्यपाक- स्वेद -क्लेद -कोथ- स्राव-रागा यथास्वं च गन्ध -वर्ण-रसाभिनिर्वर्तनं पित्तस्य कर्माणि, तैरन्विसं पित्तविकारमेवाध्यवस्येत् ॥ १५ ॥
तं मधुर तिक्तकषाय-शीतैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेह- विरेचन-प्रदेह -परि-पेकाभ्यङ्गावगाहादिभिः पित्तहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, विरेचन तु सर्वोपक्रमेभ्यः पित्ते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्वयादित एवाss-माशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं पित्तमूलं चापकर्षति, तत्रावजिते पित्तेऽपि शरीरान्तर्गताः पित्तविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथाऽग्नौ व्य-पोढे केवलमग्निगृहं शीवोभवति तद्वत् ॥ १६ ॥
इन सब यहां कहे या नहीं कहे हुए पित्त विकारों को या उसके एक भाग को स्वाभाविक रूप से ( किसी दूसरे दोष से न मिला होने पर ), कार्यों, एवं पित्त के लक्षणों से पहिचानकर कुशल वैद्य लोग पित्त रोग ही है, ऐसा निश्चय करते हैं । यथा गरमी, तीक्ष्णता, लघुता, चिकास की अधिकता न होना, सफेद और काले -लाल रंग को छोड़कर अन्यरंग, सड़ांद ( दुर्गन्ध युक्त ) कटु और खट्टा रस होना ये पिस के लक्षण हैं । निम्न प्रकार के कर्मों से पित्त की पहिचान होती है शरीर के जिस जिस अवयव में पित्त आश्रय लेता है, वहां कह
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२४४ चरकसंहिता [अ०२० पर दाह, गरमी, पाक ( पकना ), पसीना, क्लिन्नता, सडांद, खज, साव, रंग तथा पित्त के समान गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति होना ये पित्त के कर्म हैं । इन कार्यों से युक्त रोग को पित्त का विकार जानना चाहिये । इस पित्त को शान्त करने के लिए मधुर, तिक्त, कषाय, शीत उपक्रमों से चिकित्सा करनी चाहिये । पित्त नाशक स्नेह, विरेचन, प्रदेह, स्नान, मर्दन आदि कार्यो को मात्रा एवं समय को देखकर प्रयोग करना चाहिये । पित्त को शान्त करने के लिए वैद्य लोग विरेचन को हो सब से मुख्य साधन मानते हैं । यह जल्दी ही आमाशय में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण पित्तविकार को जड़ से बाहर निकल देता है । ऐसी अवस्था में पित्त के सम्पूर्ण शान्त न होने पर भी शरीरस्थ पित्तरोग ऐसे ही शान्त हो जाते हैं जिस प्रकार की भट्ठी से आग निकाल लेने पर मही अपने आप ठण्डी हो जाती है ॥ १६ ॥
श्लेष्मविकारांश्च विंशतिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः, तद्यथा— तृप्तिश्च 9 तन्द्रा च निद्राया आधिक्यं च स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च, आलस्य च मुखमाधुर्य च, मुखनाबरच,श्लेष्मोदुगिरणं च, मलस्याss-धिक्यं च, कण्ठोपलेपश्च, बलासा हृदयोपलेपच, धमनी प्रतिचयश्च, गलगण्डश्च, अतिस्थौल्यं च शीताग्निता च, उददेश्च, श्वेतावभासता'च, श्वेत -मूत्र- नेत्रवर्चस्त्वं- चेति विंशतिः श्लेष्मविकाराः श्लेष्मविका- राणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥१७ ॥
कफजन्यरोग बीस हैं । उन का कहते हैं यथा -भांजन न करने पर भा तृप्ति का अनुभव, तन्द्रा, नींद का अधिक आना, स्तैमित्य ( शरीर का गीले वन से ढंपा प्रतीत होना ), शरीर का भारीपन, आलस्य आना, भुख की मिठास, मुख से लाला बहना, कफ का वमन, शरीर से मल का अधिक निक-लना, कफ का क्षय, हृदय का भरा रहना, कण्ठ का भरा रहना, धर्मानियों का अवरोध, गलगण्ड, अतिस्थूल, मन्दाग्नि, उदर्द ( छपाकी ), श्वेत रंग की प्रतीति, मूत्र मल और नेत्र में सफेदी, ये बीस कफजन्य रोग हैं । कफजन्य विकार असंख्य हैं, परन्तु यहां पर प्रधान रोगों की गणना की है ॥ १७॥
सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु इलेष्मविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु श्लेष्मण इद-मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विभु-क्तसंदेहाः स्नेहगौरव- श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्यन्ति-माधुर्य-मान्यनि श्लेष्मण कुशलाःआत्मरूपाणि, तद्यथा--, एवंविधत्वाचश्वैत्य-शैत्य-कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा- वेत्य -शेत्य-कण्डू स्थैर्य गौरव स्नेह स्तम्भ - सुप्ति- लेदोपदेहबन्ध -माधुर्य-
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अ०२० ] सूत्रस्थानम् २४५ चिरकारित्वानि श्लेष्मणः कर्माणि तैरन्वितं श्लेष्मविकारमेवाध्यव-श्येत् ॥ १८ ॥
तं कटुक-तिक्तकषाय-तीक्ष्णोष्ण रूक्षैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्वेदन-वमन-शिरोविरेचन व्यायामादिभिः श्लेष्महरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, वमनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्धयादित एवाऽऽमाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति, तत्रात्र-जिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा -भिन्ने केदारसेतो शालिन्यव -षष्टिकादीन्यभिष्यन्दमानान्यम्भसा प्रशोषमापद्यन्ते तद्वदिति ॥ १६ ॥
इन सब कफ की विकारों में कहे हुए या नहीं कहे हुए रोगों को या उसके एक भाग को कफ के अपने स्वाभाविक रूप से, कार्यों से, लक्षणों से पहिचान कर कुशल पुरुष सन्देहरहित होकर श्लेष्मविकार ही हैं ऐसा निश्चय करते हैं । यथा चिकास, शीतलता, सफेदी, भारीपन, मधुरता, मसृणता ( पिच्छलता ), ये कफ के रूप हैं । निम्न प्रकार के कार्यों से कफ की पहिचान होती है— शरीर के अवयवों में प्रविष्ट होकर कफ सफ़ेदी, शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, चिकास, जड़ता, निष्क्रियता, क्लिन्नता, चिकनापन, अवरोध, मधुरता, देर में कार्य करना ये कफ के कार्य हैं । इनके द्वारा कफ रोग को जानना चाहिये । इस कफ को शान्त करने के लिये कटु, तिक्त, कषाय, तीक्ष्ण, गरम और रूक्ष उपक्रमणों से चिकित्सा करनी चाहिये । मात्रा और समय के अनुसार स्वेद, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम आदि श्लेष्मनाशक कार्यों का प्रयोग करे । कफ को शान्त करने के लिये वैद्य वमन को ही सब से उत्तम साधन मानते हैं । मन जल्दी से आमाशय में पहुंच कर सम्पूर्ण वैकारिक कफ को जड़ समेत बाहर कर देता है । इस कफ के पूर्ण रूप से शान्त न होने पर भी शरीर के अन्दर के कफरोग शान्त हो जाते हैं । जिस प्रकार कि धान्य, जी, सांठी पानी से भरे होने पर खेत की मेंढ के टूटने पर पानी से खुश्क हो जाते हैं, ( सूख जाते हैं ), इसी प्रकार कफ के निकलने से रोग भी नष्ट होजाते हैं ॥ १८-१६ ॥
भवन्ति चात्र - रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम् ।
ततः कर्म भिषक्पचाज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ २० ॥
यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यारभते भिषक् ।
अप्यषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया ॥ २१ ॥
यस्तु रोगविशेषज्ञः सर्व भैषज्य -कोविदः ।
देश- कार -प्रमाण ज्ञस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ॥ २२ ॥
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२४६ चरकसंहिता [ अ० २१ सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, उसके पीछे औषध की परीक्षा, इसके अनन्तर वैद्य ज्ञानपूर्वक चिकित्सा का आरम्भ करे । जो वैद्य, रोग की परीक्षा द्वारा निश्चय किये विना चिकित्सा कर्म आरम्भ कर देता है, भले ही वह वैद्य औषधि के विधान को जानता हो, तो भी उसकी सफलता निश्चित नहीं ( कभी हो जाती है, और कभी नहीं ) । जो वैद्य रोगों को भली प्रकार जानता है, इसी प्रकार औषधियों को भी जानता है, साथ में देश, काल और प्रमाण को भी समझता है, उसकी सफलता निश्चित, अवश्यम्भावी है ॥२०-२२॥
सत्र श्लोकाः संग्रहः प्रकृतिर्देशो विकारमुखमीरणम् ।
असंदेहोऽनुबन्धश्च रोगाणां संप्रकाशितः ॥ २३ ॥
दोषस्थानानि रोगाणां गणा नानात्मजाश्च ये ।
रूपं पृथक्त्वाद्दोषाणां कर्म चापरिणामि यत् ॥ २४ ॥
पृथक्त्वेन च दोषाणां निर्दिष्टाः समुपक्रमाः ।
सम्यङ् महति रोगाणामध्याये तत्त्वदर्शिना ॥ २५ ॥
रोगों की संक्षिप्त संख्या, इनके स्थान और इनके साक्षात् अथवा प्रेरक कारण,3 असन्देह, और अनुबन्ध, दोषों के स्थान, नानाप्रकार के रोगों की गणना, दोषों के पृथक् पृथक् रूप, और स्वाभाविक कर्म, दोषों के पृथक पृथक् शान्ति के उपाय, इस महारोग अध्याय में तस्वदर्शि पुनर्वसु ने कह दिये हैं ॥२३-२४॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के महारोगाध्यायो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः ।
अथातोऽष्टौनिन्दितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति छ स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'अष्टौनिन्दितीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
इह खलु शरीरमधिकृत्याष्टौ पुरुषा निन्दिता भवन्ति तद्यथा-अतिदीर्घश्चातिह्रस्वश्चाविलोमा चालोमा चातिकृष्णश्चाविगौरयातिस्थू-खचातिकृशश्चेति ॥ ३ ॥
इस लोक में शरीर के सम्बन्ध में ( मन के सम्बन्ध में अधार्मिक आदि इन से भिन्न हैं ) आठ पुरुष निन्दित माने जाते हैं । यथा १. अतिदीर्घ २.
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अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २४७ अतिह्रस्व, ३. अतिलोमा ( बहुत बालों वाला ), ४. अलोमा ( एक दम बाल रहित ) ५. अतिकृष्ण ( बहुत काला ) ६. अतिगौर, ७. अतिस्थूल ( बहुत मोटा ) और ८. अतिकुश ( बहुत पतला ) ॥ ३ ॥
तत्रातिस्थूलशयोर्भूय एवापरे निन्दितविशेषा भवन्ति; अतिस्थूल-स्य तावदायुषो हासो जरोपरोधः कृच्छ्रव्यवायता दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यं स्वेदाबाधः क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति भवन्त्यष्टौ दोषाः । तदति-स्थौल्यमतिसंपूरणाद् गुरु-मधुर-शीत-स्निग्धोपयोगादव्यायामादव्यवा-यादिवास्वप्नाद्धर्षनित्यत्वादचिन्तनाद बीजस्वभावाच्ञ्चोपजायते । तस्या-तिमात्रं मेदस्विनो मेदएवापचीयते न तथेतरे धातवः, तस्मादस्याऽऽयुषो ह्रासः; शैथिल्यात् सौकुमार्याद् गुरुत्वाच्च मेदसा जरोपरोधः, शुक्रबहु-त्वाद् मेदसाऽऽवृतमार्गत्वाच्च कृच्छ्रव्यवायता, दौर्बल्यमसमत्वाद्धातूनां दौर्गन्ध्यं मेदोदाषान्मेदसः स्वभावात्स्वेदलत्वाच्च, मेदसः श्लेष्मसंस- द्विष्यन्दत्वाद्बहुत्वाद्वयायामासहत्वाच्च स्वेदाबाधः तीक्ष्णाग्नि-त्वत्प्रभूतकोष्ठवायुत्वाच्च क्षुदतिमात्रं पिपासातियोगश्चेति ॥ ४ ॥
इन आठों पुरुषों में भी अतिस्थूल और अतिकृश ये दोनों पुरुष विशेष रूप से निन्दित हैं । इनमें अतिस्थूल पुरुष की आयु छोटी होती है, उसे बुढ़ापे जल्दी आ घेरता है, मैथुन में कठिनता, निर्बलता, शरीर में दुर्गन्ध, पसीना बहुत आता है, भूख और प्यास खूब अधिक लगती है, ये आठ दोष होते हैं । यह अतिस्थूलता अधिक भोजन करने से, गुरु, मधुर, शीत, स्निग्ध पदार्थों के मंत्रन से, व्यायाम न करने से, सम्भोग न करने से, दिन में सोने से, नित्य खुश ( वेफिकर ) रहने से, चिन्ता न करने से, माता पिता के स्थूल होने से उत्पन्न होती है । अतिस्थूळ पुरुष के शरीर में मेद के बढ़े होने पर आगे मेद ही बढ़ता जाता है और अन्य धातु नहीं बढ़ते । इसलिये ( विश्रम धातु होने से ) आयु छोटी होती है, मेद के शिथिल, सुकुमार और भारी होने से बुढ़ापे का जल्दी आना, शुक्र के कम होने से, मेद के द्वारा शुक्र बाह्य स्रोतों के रुक जाने से मैथुन में कठिनाई; धातुओं के विषम होने से दुर्बलता, मेद के दोष से, मेद के स्वभाव से तथा पसीने के अधिक आने से दुर्गन्ध, मेद के श्लेष्मा के साथ मिलने से, सड़ने से, बहुत होने से, भारी होने से और परिश्रम को न सह सकने के कारण पसीने का बहुत आना, अग्नि के प्रबल होने से और कोष्ठ में वायु को अधिकता से भूख अधिक और बहुत प्यास लगती है ॥ ४ ॥
भवन्ति चात्र --मेदसाssवृतमार्गत्वाद्वायुः कोट्ठे विशेषतः ।
चरन् संधुक्षयत्यग्निमाहारं शोषयत्यपि ॥ ५ ॥
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ariहिता [अ०२१
तस्मात्स शीघ्रं जरयत्याहारं चातिकाङ्क्षति ।
विकारांश्चाश्नुते घोरान् कांश्चित्कालव्यतिक्रमात् ॥ ६॥
एतावुपद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ ।
एतौ हि दहतः स्थूलं वनदावो वनं यथा ॥ ७ ॥
मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः ।
विकारान् दारुणान् कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥
मेदोमांसातिवृद्धत्वाचलस्फिगुदरस्तनः ।
अथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थल उच्यते ॥ ६ ॥
इति मेदस्विनो दोषा हेतवो रूपमेव च ।
निर्दिष्टं वक्ष्यते वाच्यमतिकार्येऽप्यतः परम् ॥ १० ॥
मेद के द्वारा स्रोतों के रुक जाने पर वायु कोष्ट का आश्रय लेकर गति करता है, इससे अग्नि को बढ़ाता ( तेज करता है ) है, और भोजन को शुष्क करता है । इसलिये अग्नि आहार को शीघ्र जीर्ण कर देती है और अन्य आहार को चाहती है । आहार काल के अतिक्रमण होने से भयानक रोगों को उत्पन्न करती है । ये अग्नि और वायु विशेष रूप से उपद्रव करने वाले हैं । जिस प्रकार की जंगल की आग बन को जला देती है, उसी प्रकार ये वायु और अग्नि मोटे व्यक्ति को जला देते हैं । मेद के बहुत बढ़ने पर एक दम से वायु, पित्त, कफ, भयानक रोगों को उत्पन्न करके जीवन का नाश शीघ्रता से कर देते हैं । मेद के अति बढ़ने से मनुष्य के नितम्ब, उदर और स्तन पल- थल करने लगते हैं । शरीर का आकार और उत्साह शक्ति नष्ट हो जाते हैं । ऐसे पुरुष को अतिस्थूल कहते हैं । ये मेदस्वी पुरुष के दोष, कारण और लक्षण कह दियेसेवाइसके आगे अतिकृश व्यक्ति के लक्षण कहते हैं । ५–१० ॥ रूक्षान- -पानानां लङ्घनं क्रियातियोगः शोकध वेग-निद्रा प्रमिवाशनम्-विनिग्रहः ||। ११ ||
रूक्षस्योद्वर्तनं स्नानस्याभ्यासः प्रकृतिर्जरा ।
विकारानुशयः क्रोधः कुर्वन्त्यतिकृशं नरम् ॥ १२॥
व्यायाममविसौहित्यं क्षुत्पिपासामहौषधम् ।
कृशो न सहते वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥ १३ ॥
सीहां कासः क्षयः श्वासो गुल्माशस्युदराणि च ।
कृशं प्रावोऽभिधावन्ति रोगाच महणीगताः ॥ १४॥
शक- स्फिगुदर-प्रीमो धमनी- जाल-सन्ततः ।
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अ० २१ ] सूत्रस्थानम THE AA स्वगस्थिशेषोऽतिकृशः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥ १५॥
सततव्याधितावेताव तिस्थूलकृशौ नरौ ।
सततं चोपचय हि कर्षणै बृंहणैरपि ॥ १६॥
स्थौल्यका वरं कायं समोपकरणों हि तौ ।
agrt व्याधिरागच्छेत्स्थूलमेवातिपीडयेत् ॥ १ ॥
रूक्ष खान पान के सेवन से, उपवास से थोड़ा खाने से, स्नेहन, स्वेदन वमन, विरेचन आदि क्रियाओं के अतियोग से, शोक से, मल- मूत्र * उपस्थित वेगों को अथवा नींद के उपस्थित वेग को रोकने से, ह मर्दन किये बिना उबटन लगाकर स्नान ( नित्य प्रति ) करने से, स्वभाव से, बुढ़ापे से, रोगों के कारण ( रोग की कमजोरी में ) उत्पन्न कमजोरी में, मिथ्याहार-बिहार से, क्रोध से पुरुष बहुत कृश हो जाता है । परिश्रम, अतिशय पेट भर के खाना, भूख प्यास और बलवान् औषध, बहुत सर्दी, बहुत गरमी और मैथुन इनको कृश पुरुष सहन नहीं कर सकता । प्लीहा कास, क्षय, श्वास, गुल्म, अर्श, उदर रोग, और ग्रहणी रोग ( आमाशय आंत्र रोग ) प्रायः करके कृश ( निर्बल ) पुरुष को शीघ्र चिपटते हैं । नितम्ब, उदर और ग्रीवा शुष्क हो जाते हैं, शरीर पर धमनियों के जाल दीखने लगते हैं, त्वचा और अस्थियों का ही ढांचा बच जाता है, प्रन्थियां मोटी-मोटी हो जाती हैं, ऐसे पुरुष को ' अतिकृश ' कहते हैं । ये अतिस्थूल और अतिकृश पुरुष सदा रोगी रहते हैं । इसलिए कर्पण से ( स्थूल की ) और बृंहण से ( कृश पुरुष की) सदा परिचर्या करनी चाहिये । स्थूलता और कृशता में कृशता श्रेष्ठ है, क्योंकि यदि दोनों को एक ही समान चिकित्सा से साध्य व्याधि हो जाय तो स्थूल पुरुष ही अधिक पीड़ित होगा ( क्योंकि स्थूळ पुरुष का यदि संतर्पण किया जाय तो स्थूलता बढ़ती है, अपतर्पण करे तो वह सहन नहीं कर सकता, क्योंकि जाठराग्नि बढ़ी होती है ) ॥११- १७॥
सम- मांस-प्रमाणस्तु समसंहननो नरः ।
दृढेन्द्रियत्वाद् व्याधीनां न बलेनाभिभूयते ॥ १८ ॥
क्षुत्पिपासातपसः शीत-व्यायाम -संग्रहः ।
समपक्ता समजर: सम-मसि चयो मतः ॥ १६ ॥
जिस पुरुष की मांस पेशियां प्रमाण में उन्नत हैं और शरीर का संघटन ठीक प्रकार से है, इन्द्रियां बलवती हैं, वह पुरुष रोगों के बल से भी हार नहीं मानता । जो पुरुष भूख प्यास, धूप का सहन कर सके, शीत, व्यायाम को
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२५० चरकसंहिता [अ० २१ भली प्रकार सहन करले, न कम और न अधिक भोजन को जीर्ण करने वाला हो, जिसको बुढ़ापा ठीक समीप पर आये, वह पुरुष समान उपचय अर्थात् उचित शरीर की बनावट का होता है ॥ १८-१६ ॥
गुरु चातर्पणं चेष्टं स्थूलानां कर्षणं प्रति ।
कृशानां बृंहणार्थं च लघु संतर्पणं च यत् ॥ २० ॥
वातघ्नान्यन्नपानानि श्लेष्म-मेदो- इराणि च ।
रूक्षोष्णा बस्तयस्तीक्ष्णा रूक्षाण्युद्वर्तनानि च ॥ २१ ॥
गुडूची-भद्र- मुस्तानां प्रयोग फलस्तथा ।
तक्रारिष्टप्रयोगस्तु प्रयोगो माक्षिकस्य च ॥ २२ ॥
विडङ्गनागरं क्षारः काल-लोह -रजो मधु ।
यवामलकचूर्णं च प्रयोगः श्रेष्ठ उच्यते ॥ २३ ॥
बिल्वादिपञ्चमूलस्य प्रयोगः क्षौद्रसंयुतः ।
शिलाजतुप्रयोगस्तु साग्निमन्थरसः परः ॥ २४ ॥
प्रशातिका प्रियकुच श्यामाका यबका यवाः ।
जूर्णाह्वाः कोद्रवा मुद्गाः कुलत्थाश्चक्रमुद्द्रकाः ॥ २५ ॥
आढकीनां च बीजानि पटोलामलकैः सह ।
भोजनार्थं प्रयोज्यानि पानं चानु मधूदकम् ॥ २६ ॥
अरिष्टांश्चानुपानार्थे मेदो- मांस कफापहान् ।
अतिस्थौल्यविनाशाय संविभव्य प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
प्रजागरं व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च ।
स्थौल्य मिच्छन् परित्यक्तुं क्रमेणाभिप्रवर्धयेत् ॥ २८ ॥
स्थूल पुरुषों को कृश बनाने के लिये गुरु ( भारी ) और अपतर्पण क्रिया ( यथा शहद भारी होने से अग्नि को कम करता है और अपतर्पण होने से मेद की कम करता है ) उचित है । कुश पुरुषों को मोटा करने के लिये लघु एवं सन्तर्पण क्रिया करनी चाहिये । अतिस्थूल की चिकित्सा - वातनाशक खान पान, कफ और मेदनाशक आहार, रूखी एवं गरम बस्तियां, तीक्ष्ण, रूक्ष उबटन का मलना, गिलोय, नागर मोथा, इनका, या त्रिफला का काथ देना, तक्रारिष्ट का प्रयोग अथवा मधु का उपयोग, वायविडंग, सोंठ, क्षार, कान्त लोह भस्म को शहद के साथ, जौ और आंवले का चूर्ण, इनका प्रयोग उत्तम है । बिल्व, अरणी, सोना पाठ, काश्मरी, पाटना इनके काय में मधु प्रक्षेप करके पीना, अग्निमन्थ (अरणी) के रस के साथ शिलाजीत
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अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५१ का उपयोग, प्रचातिक ( नीवार धान्य ), प्रियंगु, श्यामाक ( सविक ), क्षुद्रजन, जौ, कंगनी, कोदों धान्य, मूंग, कुलथी, जंगली मूंग, अरहर की दाल, परवल, आंवला इनके साथ खाने के लिये देवे; और पीने के लिये पानी में शहद मिला के देना चाहिये । अनुपान के लिये मेद, मांस और कफ को नष्ट करने वाले अरिष्टों को अतिस्थूलता नाश करने के लिये प्रयोग करना चाहिये । स्थूळता का नाश करने की इच्छा वाले पुरुष को, रात में जागना, मैथुन, परिश्रम करना, चिन्ता करना इनको क्रम से शनैः शनैः बढ़ाना चाहिये ॥ २०-२८ ॥
स्वप्नो हर्षः सुखा शय्या मनसो निर्वृतिः शमः ।
चिन्ता व्यवाय व्यायाम -विरामः प्रियदर्शनम् ॥ २६ ॥
नवान्नानि नवं मद्य प्राम्यानूपौदका रसाः ।
संस्कृतानि च मांसानि दधि सर्पिः पयांसि च ॥ ३० ॥
इक्षवः शालयो मांसा गोधूमा गुडवैकृतम् ।
बस्तयः स्निग्धमधुरास्तैलाभ्यङ्गश्च सर्वदा ॥ ३१ ॥
स्निग्धमुद्वर्तनं स्नानं गन्धमाल्यनिषेवणम् ।
शुक्लवासो यथाकालं दोषाणामवसेचनम् ॥ ३२ ॥
रसायनानां वृष्याणां योगानामुपसेवनम् ।
इत्वाऽतिकार्यमादत्ते नृणामुपचयं परम् ॥ ३३ ॥
अचिन्तनाश्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च ।
स्वप्नप्रसङ्गाच नरो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥
कृश रोग की चिकित्सा - रात में और दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना, आराम, गद्देदार पलंग पर सोना, बैठना, मनकी बेफिकरी, शान्ति, चिन्ता न करना, सम्भोग का न करना, भ्रम न करना ओर इच्छित वस्तुओं का दर्शन, नये अन्न, नया मद्य, ग्राम्य और जलचर प्राणियों के मांस का रस, संस्कृत ( अच्छी प्रकार बनाये ) मांस, दही, घी और दूध, गन्ने, चावल (लाल चावल) मांस, गेहूँ, गुरु से बनी वस्तुएं, स्निग्ध और मधुर बस्तियां, सर्वदा तक मर्दन स्निग्ध उबटन, स्नान, सुगन्ध और माला का धारण करना, सफेद वस्त्र, समय समय -पर वातादि दोषों का बाहर निकालना, रसायन एवं वाजीकरण-योगों का सेवन करने से कृशता दूर होकर पुष्टि, बल ( मोटापा ) आता है । कार्यों की चिन्ता न करने ( बेफिकरी ) से, नित्य प्रति सन्तर्पण क्रिया द्वारा और रात दिन सोने से मनुष्य सुअर की तरह पुष्ट हो जाता है ॥ २६-२४ ॥ यदा तु मनसि कान्ते कर्मात्मानः क्रमान्विताः ।
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२५२ चरकसंहिता [ अ० २१ विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ३५ ॥
निद्रायतं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम् ।
वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ ३६ ॥
अकालेऽतिप्रसङ्गाच न च निद्रा निषेविता ।
सुखायुषा पराकुर्यात्काल रात्रिरिवापरा ॥ ३६ ॥
युक्का पुनर्युके निद्रा देहं सुखायुषा ।
पुरुषं योगिनं सिद्धया सत्या बुद्धिरिवाऽऽगता ॥ ३८ ॥
गीताध्ययन-मद्य स्त्री-कर्म - भाराध्व -कर्षिताः ।
अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ३६ ॥
तृष्णातीसारशूलार्ताः श्वासिनो हिकिनः कृशाः ।
पतिताभिहतोन्मत्ताः क्लान्ता यानप्रजागरैः ॥ ४० ॥
क्रोध-शोक-भय-क्लान्ता दिवास्वप्नोचिताच ये ।
सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥। ४१ ॥
धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते ।
श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चाऽऽयुत्रः ॥ ४२ ॥
जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय हो जाती है, इन्द्रियां क्रियारहित हो जाती हैं ( रूप, रसादि विषयों से हट जाती है ), तब पुरुष सो जाता है । यदि विधिपूर्वक नींद का सेवन किया जाय तो सुख, शरीर की पुष्टि, बल, पुरुषत्व ज्ञान और जीवन नींद के अधीन हैं और यदि निद्रा का विधि से सेवन न किया जाय तो दुःख, कृशता, बलनाश, क्क़ीबता, अज्ञान, और मरण ये नींद के अधीन हैं । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि दूसरी प्रय रात्रि के समान अकाल ( दिन में या सन्ध्याकाल में ) सोना, या बहुत सोना छोड़ दे । ये नींद के मिथ्यायोग हैं । यदि निद्रा उचित रूप में सेवन की जाय तो शरीर को सुख और आयु से ऐसे ही युक्त करती है जिस प्रकार योगी पुरुष को सिद्धि से तत्वज्ञान प्राप्त होता है । गीत गाने से कृष्णपुरुष, पढ़ने से कृश, मद्यपान करने वाले स्त्री-सेवा करने वाले, वमन विरेचनादि कर्म में, मार्ग चलने से कृश हुए, अतिसार आदि से कृश, अजीर्ण रोगी, उरक्षत रोगी, क्षीण ( जिनके रस रकादि धातु क्षीण) हो, वृद्ध, बालक, स्त्रियां ( कमज़ोर ) तृष्णारोगी, शूल से पीड़ित, श्वास से कृश, ऊपर से गिरे, चोट लगे हुए, उन्मत ( धतूरा आदि खाने से ), थके हुए, सवारी करने से रात में जगने से, क्रोध, शोक, भय से निष्क्रिय पुरुषों को दिन में सोना उचित है । ये उपर लिखे पुरुष सब कालों में दिन में सो सकते हैं ।