चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 41–50

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 41–50

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३ १. भेद का मूत्र थोड़ा तिक्त, स्निग्ध एवं पित्त का अविरोधी है, वह न तो पित्त को बढ़ाता है, और न पित्त को शमन करता है । २. बकरी का मूत्र कषाय और मधुर रस, सांतों के लिये हितकारी है, और त्रिदोषनाशक है । ३. गाय का मूत्र कुछ मधुर, दोपनाशक, कृमि, और कुछ का नाशक है । इसके पीने से खाज शमन होती है, एवं वात आदि से उत्पन्न पेट के रोगों में हितकर है । भैंस का मूत्र बवासीर, शोध, और उदर रोगों को नाश करने वाला, थोड़ा खारा और मलभेदक है । ५. हाथी का सूत्र नमकीन, कृमि और कुष्ठ रोग वाले पुरुषों के लिये हितकारी है । अवरुद्ध मल और मूत्र रोग अलसक रोग, विष रोग, श्लेष्म जन्य रोगों और बवासीर में श्रेष्ठ है । ६. ऊँट का सूत्र थोड़ा तिक्त, श्वास, काम और अर्श रोग का नाशक है । ७. घोड़ों का मूत्र तिक्त और कटु, कुष्ठ, विप और व्रण का नाशक है । ८. गधे का मूत्र अपस्मार ( मृगो, हिस्टोरिया ) उन्माद आदि ( नागद-पन ) का नाशक है ॥ १००-१०४ ॥

आठ प्रकार के दूध- इतीोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः ।

अतः क्षीराणि वक्ष्यन्ते कर्म चेपा गुणाश्च ये । १०५ ॥

अविक्षीरम जाक्षीरं गोक्षीरं माहिषं च यत् ।

उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ १०६ ॥

इस प्रकार ने इस शास्त्र में सामान्य और विशेष दोनों प्रकार से यथा-सामथ्य अर्थात् मूत्रों की जैसी जैसी शक्ति है, वैसे गुण कह दिये हैं । अब आठ प्रकार के दूध, इन के कर्म और गुण भी कहे जाते हैं:-१. भेड़ का, २. बकरी का, ३. गाय का, ४. भैंस का, ५. ऊँटनी का, ६. हथिनी का, ७. घोड़ी का और ८. स्त्रियों का दूध ॥१०५- १०६ ॥

सब दूधों के सामान्य गुण- प्रायशो मधुरंस्निग्धं शीतं स्तन्यं पयः स्मृतम् ।

प्रीणनं बृंहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम् ॥ १०७ ॥

जीवनीयं श्रमहरं श्वासकास निबर्हणम् ।

हन्ति शोणितपित्तं च संधानं विहतस्य च ॥ १०८ ॥

सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा ।

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२४ चरकसंहिता [अ० १ तृष्णानं दीपनीयं च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च ॥ १०६ ॥

पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे ।

अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विधीयते ॥ ११० ॥

योनिशुक्रप्रदोपेषु मृत्रेषु प्रदरेषु च ।

पुरीषे प्रथिते पथ्यं वातपित्तत्रिकारिणाम् ॥ १११ ॥

सब दूध प्रायः मधुर रस, स्निग्ध, शीत, ( स्तन्ध ) दूध बढ़ाने वाले, ( प्रीणन ) पुष्टि देने वाले, ( वृंहण ) शरीर को बढ़ाने वाले ( वृध्य ) वीर्य-वर्धक, ( मध्य ) बुद्धि के लिये हितकारी, ( बल्य ) शरीर कोबल देने वाले, ( मनस्कर ) मन को प्रसन्न करने वाले, ( जीवनीय ) जीवन के लिये हितकारी, ( श्रमहर ) थकावट को मिटाने वाले, श्वास और कास । कफ, कास को छोड़-कर शेष समस्त कासों को ) मिटाने वाले हैं । दून रक्त पित्तको नाश करता और टूटे हुए को जोड़ने वाला है, सब प्राणियों के लिये सात्य दोषों को शमन अर्थात् स्वस्थान में स्थित दोषों को शान्त करने वाला से 2 प्यास की नाश करने वाला, अग्निवर्धक, क्षीण और क्षत रोगियों के लिये हितकारी, पाण्डु रोग वातपित्त उदर अतीसार ज्वर जीर्ण श्वयथु ) शोध रोग में, विशेष शोष, गुल्मकरके, पथ्य है । यानि रोगों( में शु ज्वर), दादमें, मूत्रकृच्छ्र(रोग में, मलावरोध में; पथ्य और हितकारी है । वह वात-पित्त रोगियों के लिये भी पथ्य है ॥ १०७-१११ ॥

दूध के कर्म्म कहते हैं: -- नस्यालेपावगाहेषु वनास्थापनेषु च ।

विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र पुण्यते ॥ १४२ ॥

यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक्पृथक् ।

अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वक्ष्याम्यशेषतः ॥ ११३ ॥

यह दूध नस्य कर्म में, अवगाहन क्रिया में, आलेपन में, बमन में, आस्था-पन में,3 बस्ति में, विरेचन में, स्नेह कर्म में, सब स्थानों पर रसायन अर्थात् वाजीकरण आदि में भी प्रयुक्त होता है । यहां पर आठों प्रकार के दूधों के गुण - कर्म सामान्य रूप में कह दिये हैं । आगे 'अन्न पान विधि' नामक अध्याय ( सूत्रस्थान अ ० २७ ) में क्रमानुसार प्रत्येक दूध के गुण-कर्म पृथक् पृथक् सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥ ११२-११३ ॥ अथापरे यो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः । १ प्रायः शब्द से ऊँटनी के दूध का निषेध है । ऊँटनी का दूध नमकीन है ।

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अ० १ ] सूत्रस्थानम २५ स्नुकमन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक्पृथक् ॥ ११४ ॥

नेमकं विद्यात्तुहीक्षीरं विरेचने ।

क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वनने सविरेचनं ॥ ११५ ॥

अब शोधन के लिये कहे हुए छः वृक्षों में तीन का दूध और तीन की त्वचा ग्रहण कीजातीहै इनमें प्रथम वाले तीन वृक्ष फलिनी और मूलिनी वनस्पतियोंसे थकहै, उनके नाम १. स्तुट्टी ( धीर ); २. अर्क ( आक ) और ३. अश्मन्तक हैं । अमरतक का दूध बमन के लिये; स्नुद्दी का दूध विरेचन के रिये और आक का दूध वमन और विरेचन दोनों कार्यों

के लिये जानना चाहिये । ११४- ११५ ॥

मनपरान वृक्षानां हितवचः ।

पृतिकः कृष्णगन्धा च तिल्वकञ्च तथा तरुः ॥ ११६ ॥

विरेचने प्रयोक्तव्यः प्रतिकस्तित्वकस्तथा।

कृष्णगन्धा परीस शोधवशःसु चोच्यते ॥ १७ ॥

विद्रधिगusy कुष्टेष्वप्यलजीषु च ।

पवृक्षान्धनेारूपविद्याद्विचक्षणः । ११८ ॥

दूसरे दीप तीन वृक्ष हैं उनकी त्वचा हितकारी है । उन वृक्षों के नाम- प्रतीक ( करंज ), कृष्णगन्या और तिल्वक ( लोन ) हैं । इन में करंज और लोध वृक्ष की छाल विरेचन कार्य में प्रयुक्त होती है 1 और कृष्णगन्धा की छाल परि सर्प ( वीसर्प, एक्ज़ीमा, त्वग् रोग में ). शांथ, अर्श रोग, दद्दु ( दाद ), विद्रधि, गण्डमाला, कुष्ठ और अलजी नामक नाना रोगों में प्रयुक्त होती है । शिरोविरेचन में इसका प्रयोग रोग-भिषग्जितोय अध्याय ( विमानस्थान अ० ८ ) में कहेंगे | ११६-११८ ॥ इन ऊपर कहे हुए छः वृक्षों को शोधनकारक जाने । उपसंहार-

इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च ।

मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये दृष्टाः पयस्त्वचः ॥ ११६ ॥

फलिनी १६, मूलिनी १६, स्नेह ४, लवण ५, मूत्र ८, दूध ८, और शोधन वृक्ष६, जिनके दूध और त्वचा काम में आते हैं वे कह दिये हैं ॥ ११६ ॥

* अश्मन्तक के समान कार्य करने वाला वृक्ष अष्ठा है जो महाराष्ट्रों में होता है, इसका दूध वामक है ।

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२६ चरकसंहिता [अ० १

ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।

अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥ १२० ॥

बकरियां चराने वाले, भेंड़े चराने वाले, गौवें चराने वाले और अन्य तपस्वी या भील आदि जो कि जंगल में रहते हैं ये लोग ओषधियों को नाम रूप और आकृति से पहिचानते हैं ॥ १२० ॥

न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।

ओषधीनां परं प्राप्तिं कश्चिद्रदहति ॥ १२१ ॥

योगविन्नामरूपस्तासां तत्त्वविदुष्यते ।

किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिक्कू ॥ १२२ ॥

योगमासां तुयोविद्यादेशकालोपपादितम् ।

पुरुपं पुरुषं वीक्ष्य स विज्ञेयो मिलनः ॥ १२६ ॥

ओषधियों के नाम जान लेने मात्र से अथवा रूप से पहचान देने से भी कोई ओषधि के सम्यक् प्रयोग को नहीं जान सकता । इसलिये शास्त्र में इनका वर्णन किया जाता है । जो वैद्य ओषधियों को नाम, रूप, और उनकेयोग और प्रयोगों सहित जानता है, वह तो तत्त्ववित् हे हो, जो वैद्य आंधियोंको सभी प्रकार से समझता है; उसके लिये कहना ही क्या? और जो व्यक्तिक पुरुष के बल, शरीर, आहार, सार, सात्म्य, सत्त्व प्रकृतिऔर बसका विचार करके देश, काल, मात्रा के अनुसार औषधि को जानता है वह वैद्य ॥१२१-१२३॥ नजानी हुई औषधियों से हानियाँ--

यथा विपं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा ।

तथैौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ १२४ ॥

औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणस्त्रभिः ।

विज्ञातमपि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते ॥ १२५ ॥

जिस प्रकार न जाना हुआ ( मूढ़ आदमी से प्रयुक्त किया हुआ ) विष जिस प्रकार शस्त्र, जिस प्रकार अग्नि और जिस प्रकार अशनि ( वज्र ) या ( बिजली ) मृत्यु के कारण बनते हैं, उसी कार नाम रूप गुण से न जानी हुई औषधि भी मृत्यु का कारण हो सकता है और नामरूप और गुण से जानी हुई औषधि अमृत के समान है । नाम, रूप एवं गुण से न

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७ जानी हुई औषध या जाना हुई भी देश काल आदे का विचार न करके देने से अनिष्ट के लिए होती है, वह भारी अनर्थ उत्पन्न करती है ॥ १२४-१२५ ॥

योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत् ।

भेषजं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥ १२६ ॥

तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिवाह्येन भेषजम् ।

धीमता किञ्चिदा जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा ॥ १२७ ॥

तीक्ष्ण प्राणनाशक विष भी सम्यक प्रकार से प्रयोग करने पर उत्तम औषध का कार्य करता है । औप भी अनुचित प्रकार में प्रयोग करने पर तीक्ष्ण प्राण नाशक विपका काम करती है । इसलिये अनुचित रूप में प्रयोग को जाने वाली औषधि के विप के समान होने के कारण आयु एवं आरोप को चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि, देश काल मात्रा आदि का विचार न करके देने वाले मूढ वैद्य ने दो हुई औषध को कभी ग्रहण न करें ॥ १२६-१२७ ॥

कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सरोपं वासवाशनिः ।

सशेषमातुरं कुर्यान्न यज्ञमतमपधम् ॥ १२८ ॥

इन्द्र के हाथ से छूटा हुआ वज्र यदि मनुष्य के सिर पर गिर पड़े तो उससे बचना सम्भव हो सकता है, परन्तु मूर्ख वैद्य से दी हुई ओषधि रोगी को समाप्त ही कर डालती है, इससे बचना असम्भव है ॥ १२८ ॥

दुःखिताय शयानाय श्रद्दधानाय रोगिणे । यो पजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति ॥ १२६ ।.

त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः ।

नरो नरकपाती स्यात्तस्य संभाषणादपि ॥ १३० ॥

जो प्राज्ञमानी अपने को बुद्धिमान् गिनने वाला वैद्य, औषध को न जान-कर दुःखी, अचेत पड़े, वैद्य मे श्रद्धा करने वाले रोगी को औषध देता है, ऐसे धर्म को छोड़ देने वाले विश्वासघाती मृत्यु के समान साक्षात् यम और दुर्मति, अज्ञ, मूढ़ वैद्य के साथ बोलने से भी मनुष्य नरकगामी होता है, फिर स्पर्श आदि से क्यों नहीं होगा ॥ १२६-१३० ॥

वरमाशीविषविपं कथितं ताम्रमेव वा ।

पीतमत्यग्निसंतप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः ॥ १३१ ॥

न तु श्रुतवां वेषं विभ्रता शरणागतात् ।

गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात् ॥ १३२ ॥

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२८ चरकसंहिता [अ० १ साँप का विष अथवा ताम्बे को उबाल कर पीना या आग में लाल किये हुए लोहे के गोले खा लेना, कहीं अधिक अच्छा है, परन्तु वैद्य का वेप पहिनकर शरण में आये हुए रोगीसे, अन्न, पान अथवा धन ग्रहण करना अच्छा नहीं ॥ १३१-१३२ ॥ वैद्य को क्या करना चाहिये?

भिभूतमानतः स्वगुणसंपदि ।

परं प्रयत्नमातिष्ठेत् प्राणदः स्वाद्यथा नृणाम् ॥ १३३ ॥

इसलिये वैद्य बनने की इच्छा करने वाले, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि, वैद्य के गुणों को प्राप्त करने में अत्यधिक प्रयत्न करे जिससे कि वह मनुष्यों के रोगों को दूर करके प्राण देने वाला सिद्ध हो ' ॥ १३३ ॥

तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते ।

स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत् ॥ १३४ ॥

जी औषध रोग को शान्त करने में समर्थ है वही ठीक प्रकार से प्रयुक्त की हुई औषध है और जो रोगों से रोगियों को मुक्त करें, वह ही वैद्यों में श्रेष्ठ वेद्य है ॥ १३४ ॥

सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणा ।

सिद्धिराख्याति व गुणैर्युक्त पिकय ॥ १३५ ॥

सब प्रकार के कम्मों की सिद्धि, सफलता, उन कमों के सम्पक प्रयोग की बतलाती है । सफलता ही सब गुणोंसे युक्त की श्रेष्ठताको भी बतलाती है । अर्थात् सफलता से दो वैद्य का नाम चमकता है ॥ १३५ ॥

अध्याय का संग्रह - तत्र लोकाः ।

आयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम् ।

सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः ॥ १३६ ॥

सम्पूर्ण कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम् ।

हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं संग्रहेण च ॥ १३७ ॥

रसाः संप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसंग्रहः ।

मूलिन्यश्व फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च ॥ १२८ ॥

मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये क्षीरत्वगाश्रयाः ।

कर्माणि चैषां सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः ॥ १३६ ॥

१. वैद्यगुण-सम्पत् श्रुतैः पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्म्मता ।

दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥

पृष्ठ 47

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अ० २ ] सूत्रस्थानम रह

वैद्यापवादो यत्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः ।

सर्वमेतत्समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा ॥ १४० ॥

आयुर्वेद का मलोक में आना, हेतु- रोगों का उत्पन्न होना, भरद्वाज मुनि द्वारा मर्त्यलोक में शास्त्रों का प्रचार, अभिवेशादि का तन्त्र बनाना, अग्निवेशादि द्वारा बनाये हुए तन्त्रों के लिये ऋषियों से दी हुई आज्ञा, हिताहित आदि लक्षण रूप सामान्यादि छः कारण, काव्यं धातुओं को समान करना आयुर्वेद का प्रयोजन है, संक्षेप ने गंगों के कारण, काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थ का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग ही दीप वात, पित्त, कफ, इनकी ऑपथ; आकाश आदि तीन, द्रव्य, जल और पृथिवी, इनके साथ रसमधुर आदि, द्रव्यसंग्रह; शमन आदि; एवं जंगम आदि के भेद से, मूलिनी -हस्तिदन्ती आदि सोलह; फलिनी -शंखिनी आदि उन्नीस, स्नेह घी आदि चार, महास्नेह; लवण-सौवर्चल आदि पांच मूत्र आठ क्षीर आठ, दूध वाले वृक्ष, छाल वाले स्नुही, पूतीक आदि छः वृक्ष; इनके वमन विरेचन आदि सब कर्म औषध के सम्यक् योग से जो गुण और असम्यक्योग से जो दुर्गुण हैं; मूढ़ वैद्य की निन्दा और सब गुणों से युक्त वैद्य के लक्षण; यह सब इस प्रथम ' दीर्घञ्जीवितीय' नामक अध्याय में महर्षि भगवान् आधेव ने सम्यक् प्रकार से कह दिया है ॥ १३६-१४०॥ इत्यांनवेशकृतं तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतं सूत्रस्थाने सभाषाभाष्ये भेषज- चतुष्कं दीर्घञ्जीवितीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातोऽपामार्गतण्डुलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति छ स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

वमन आदि पांच कर्म स्वस्थ एवं रोगी दोनों व्यक्तियों के लिये उपयोगी हैं । इसलिये पूर्व अध्याय में कहे हुए वमन आदि के द्रव्यों को अन्य द्रव्यों के साथ मिला कर इस अध्याय का अवतरण करते हैं । अपामार्ग ( चिरचिटा ) के बीजों का तुप रहित करके, तण्डुल बना कर काम में लाना चाहिए, यह बताने के लिये ' अपामार्ग सण्डुलीय' अध्याय है ।

अपामार्गस्य बीजानि पिप्पलीमरिचानि च ।

विडङ्गान्यथ शिमणि सर्षपास्तुम्बुरूणि च ॥ ३ ॥

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३० चरकसंहिता [ अ०२

अजाजी चाजगन्धां च पीलुन्येला हरेणकाम् ।

पृथ्वी सुरसां श्वेता कुठेरकफणिजकौ ॥ ४ ॥

शिरीषबीजं लशुनं हरिद्रे लवणद्वयम् ।

ज्योतिष्मती नागरं च दद्याच्छीर्षविरेचने ॥ ५ ॥

गौरवे शिरसः शूले पीनसेऽर्धावभेदके ।

क्रिमिव्याधावपस्मारे प्राणनाशे प्रमोहके ॥ ६ ॥

अपामार्ग ( चिरचिडे ) के तण्डुर, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, सहजना के बीज, श्वेत सरसों, तेजबल के बीज, जीरा, अजमोदा ( तिलवन ), पीलू, एला ( छोटी इलायची ), हरेणु ( रेणुका, मेंहदी के बीज ), पृथ्वीका ( कलौंजी ), सुरसा ( काली तुलसी ), श्वेता ( अपराजिता ), कुठेरक ( मरवा ), फणिजक ( तुलसी का भेद ), शिरीष बीज ( सिरस के बीज ). शुन ( लहसन ), दोनों हरिद्रा ( हल्दी और दारु हल्दी ), दोनों लवण ( सैन्धव और सौवर्चल ), ज्योतिष्मती ( मालकंगनी), और नागर ( सोंठ ) ये शिरोविरेचन के लिये उपयोग में लानी चाहिये । इन उपरोक्त औषधियों में 'श्वेता ' और 'ज्योतिष्मती' ये दो द्रव्य 'मूलिनी' आपक्षियों में गिने गये हैं । इसलिये इनका मूळग्रहण करना चाहिये, और अपा- मार्ग ( चिरचिटा ) के तण्डुल उपयोग में लाने चाहिये । (गौरव ) शिर के भारीपन में ( शिरःशूल ) शिर के दुखने में, (पीनस ) नाक से दुर्गन्ध युक्त साव, कफ आता हो, ( अवभेदक ) आधा शिर दुःखता हो, ( कृमि-व्याधि ) कृमि जन्य शिरो रोग में, ( अपस्मार ) मृगी में, ( प्राण नाश ) प्राण शक्ति के नष्ट होने पर और ( प्रमोहक ) मूर्छा इन रोगों में शिरो विरेचन के रूपमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ३-६ ॥ वमनकारक द्रव्य-

मदनं मधुकं निम्बं जीमूतं कृतवेधनम् ।

पिप्पली कुटजेक्ष्वाकूण्येला धामार्गवाणि च ॥ ७ ॥

उपस्थिते श्लेष्मपित्ते व्याधावामाशयाश्रये ।

बमनार्थं प्रयुञ्जीत भिषग देहमदूषयन् ॥ ८ ॥

मदन ( मैनफल ), मधुक ( मुलहठी ), नीम ( नीम की छाल ), जीमूत ( कडुबी तुरई ), कृतवेधन ( कडुबा तुम्बा ), पिप्पली, कुटज ( कुदा ), इक्ष्वाकु ( कडुबी घिया या आल ), एला ( छोटी इलायची ) धामार्गव ( तुरई

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अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३१ कडुवी ) ये दस वस्तुएँ कफपित्त जन्य व्याधि में अथवा आमाशय में आश्रित व्याधि की अवस्था में, शरीर को हानि किये बिना वैद्य वमन के लिये देवे । इनमें मदन, मधुक, जीमूत, कृतवेचन, कुटज, इक्ष्वाकु और धामार्गव इनका फल लेना चाहिये और पिप्पली इलायची काभी फल तथा नीम की छाल लेनी चाहिये || ७-८ ॥

विरेचन द्रव्य - त्रिवृतां त्रिफलां दन्तीं नलिनीं मप्तलां वचाम् ।

कम्पिल्लकं गवाक्षी च क्षीरिणीमुदकीर्यकाम् ॥ ६ ॥

पीन्यारग्वधं द्रानां द्रवन्तीं निचुलानि च ।

पकाशयगते दोष विरेकार्य प्रयोजयेत् ॥ १० ॥

त्रिवृत ( निशोथ ) त्रिफला ( हरड बहेडा, आंवला ), दन्ती ( जमाल-गोटा ), नीलिनी ( नील का मूल ), सप्तया ( शिकाकाई ), वच, कम्पिल्लक ( कमीला ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), क्षीरिणी ( हिरवी ) उदकीय ( नाटा करञ्ज ), पीलू फल, आरग्वध ( अमलतान ), द्रवन्ती ( बड़ा जमाल गोटा ), निचुल ( हिञ्जल फल ), ये वस्तुएं दोष के पक्वाशय में स्थित होने पर विरेचन के लिये देनी चाहिये ( शरीर में अन्यत्र स्थित होने पर नहीं' ) । इन में त्रिवृत, नागदन्ती, सप्तला गवाक्षी, क्षारिणी, और द्रवन्ती का मूल लेना चाहिये, और नलिनी, तथा वच का भी मूल और शेत्रों का फल ग्रहण करना चाहिये ॥ ६-१० ॥

आस्थापन और अनुवासन के द्रव्य- पाटलांचाग्निमन्थं च बिल्वं श्योनाकमेव च ।

कारमयं शालपर्णी च पृश्निपर्णी निदिग्धिकाम् ॥ ११ ॥

वलां श्वदंष्ट्रां बृहतीमेरण्डं सपुनर्नवम् ।

यवान् कुलत्थान् कोलानि गुडूचीं मदनानि च ॥ १२ ॥

पलाशं कत्तृणं चैव स्नेहांश्च लवणानि च । उदावर्ते विबन्धेष युञ्ज्यादास्थापने सदा ।

अत एवोषधगणात्संकल्प्यमनुवासनम् ।

मारुतघ्नमिति प्रोक्तः संग्रहः पाञ्चकर्मिकः ॥ १४ ॥

पाटला ( पाटल ), अग्निमन्थ ( अरणी ), बिल्व ( बेल ), श्योनाक ( टेंटु, सोनापाठा ), काश्मरी ( गम्भारी ), शालपर्णी ( सलवन ), पृश्निपर्णी ( पोठा-पर्णी ), निदिग्धिका ( कटेरी, भटकटैया ), बला ( खरेंटी ), श्वदंष्ट्र' ( गोखरू)

पृष्ठ 50

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३२ चरकसंहिता [अ० २ बृहती ( बड़ी कटेरी ), एरण्ड ( एरण्डमूल ), पुनर्नवा ( सांठी घास ), यब ( जी ), कुलत्थ ( कुलथी ), काल (बेर ), गुडूचा (गिलोय), मदन | मैनफल ), ( पलाशपांचों(नमकढाक ),) ये कतृणउनतीस( रोहिपद्रव्य ( गउदावर्त्त), स्नेह )( अपान चारों स्नेहवायु कीघी आदि गति), लवणहोने पर, वियन्त्र मल मूत्र आदि के आरोपमें घर आस्थापन नामक बस्ति कर्म में प्रयोग करने चाहिये | इन्हीं में अनुवासन बस्ति बना कर नष्ट करने के लिये प्रयोग करनीचाहिये । यह क्षेप में पंचकर्म चमन वायु, विरेको चन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन ) कह दिये हैं ॥ ११-१४ ॥

तान्युपस्थितदोषाणां स्नेहस्वेदोपपादनः ।

पञ्च कर्माणि कुत मात्राकाली विचारयन् ॥ १५ ॥

प्रवृत्त होने के लिये तैयार दीप वालोंको वन और वंदन कराके, शरीरबल की अपेक्षा से मात्राऔर काल का विचार करके वे पंचकमों का करावे ॥ १५ ॥

मात्रा और काल के विचार करने की आवश्यकता

मात्राकालाश्रया युक्तिः, सिद्धियुक्त प्रतिष्ठिता ।1

तित्युपरि युक्तिज्ञा द्रव्यज्ञानवतां सदा ॥ १२ ।

पदार्थों कीयोजना नाकाऔरत है । शरी अग्न बल, आयु, व्याधिवल, दोपवल आदि के अनुकूल और विशेष समय में प्रयुक्त हुआ द्रव्य भली प्रकार अपने कार्यको कर तद्धि चिकि त्सित किया को सफलता युक्ति में आश्रित है।वना को जानने वाला वैध द्रव्य अवधको जानने वालों में से सदा श्रेष्ठ है । स्वम्य तथा आतुर पुरुषों के लिये पंच कर्मों का उपदेश कर चुक ॥ १६ ॥

रोगियों के लिये आहार विशेष यवागूः- अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यवागूर्विविधोपधाः ।

विविधानां विकाराणां तत्साध्यानां निवृत्तये ॥ १७ ॥

इसके आगे यवागू से अच्छे होने वाले नाना प्रकार के रोगों के नाश के लिये नाना प्रकार की औषधियों से सिद्ध यवागू ( लाप्सी ) कहेंगे ॥ १७ ॥

पिप्पलीपिप्पलीमूलचन्यचित्रकनागरैः ।

बापनीया स्याच्छूलघ्नी चोपसाधिता ॥ १८ ॥

१. जिस प्रकार मृदु विरेचक ओषधियां रात्रि को सोते समय लेने से उत्तम गुण करती हैं ।