चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 321–330

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३०३ वायु और पृथिवी गुण की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है । इस प्रकार से पञ्च महभूतों के कम अधिक होने से छः रस उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर और जंगम पदार्थों में महाभूतों के कम अधिक होने से नाना प्रकार के वर्ण, रंग, आकृति, रूप आदि बन जाते है, उसी प्रकार छः रस भी बन जाते हैं । इसी प्रकार महाभूतों के कम अधिक होने से ही काल, संवत्सर छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है । यथा— हेमन्त काल में सोम गुण की अधिकता होती है, शिशिर ऋतु में वायु और आकाश गुण की अधिकता होती है । ' तावेतावर्कवायू' (च० सू० अ० ६) में स्पष्ट कर चुके हैं । बीजाङ्कुरवत् कार्य कारण की भांति संसार के अनादि होने से, पंच महाभूत और ऋतुओं का कार्यकारण सम्बन्ध समझना चाहिये ॥ ३८॥

तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः लाघवात्सवनत्वाच वायोरूर्ध्वज्वलनत्वाश्च वहेः सलिलपृथिव्यात्मकस्तु प्रायेणाघोभाजः, पृथिव्या गुरुत्वान्निम्नगत्वाचोदकस्य, व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतो-भाजः ॥ ३६ ॥

इन में अग्नि और वायु गुण की अधिकता वाले रसयुक्त द्रव्य प्रायः ऊर्ध्वगामी ( वमनकारक ) होते हैं । क्योंकि वायु हल्की और उड़ने वाली है । अग्नि का स्वभाव ऊपर को जलने का है, वह ऊपर को गति करता है, इसलिए इन गुणों वाले द्रव्य ऊर्ध्वगामी हैं । जल और पृथ्वी गुण युक्त रस वाले द्रव्य प्रायः करके अघोगामी ( विरेचनकारक ) होते हैं । क्योंकि पृथिवी गुरु है और पानी का स्वभाव नीचाई की ओर बहना है । जिन पदार्थों में चारों तत्त्व मिले रहते हैं वे ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों तरह के होते हैं ॥ ३६ ॥

तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः । तत्र मधुरो रसः शरीरसाम्याद्रस - रुषिर -मांस -मेदोऽस्थि - मज्जौजः शुकाभिव- र्धन आयुष्यः षडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्णकरः पित्त- विष-मारुत प्रस्तृष्णा- प्रशमनस्त्वच्यः केश्यः कण्ठ्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः क्षीणक्षत संघानकरो प्राण-मुख कण्ठौष्ठ -जिह्ना -प्रह्लादनो दाइमूर्च्छाप्रशमनः षट्पदपिपीलिकानामिष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुच । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वप्नं गौरवमनन्ना- मिठाषमभिदौर्बल्यमास्यकण्ठमांसाभिवृद्धिं श्वास-कास प्रतिश्यायालस- -शीत- ज्वरानानाहास्य-माधुर्य- वमथु- संज्ञास्वरप्रणाश-गळगण्डगण्डमा-

पृष्ठ 322

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३०४ चरकसंहिता [ ७०२६ wwwwwwwwwww..c कालीपद गलशोफ बस्ति धमनीगण्डोपलेपाक्ष्यामयानमिष्यन्यमित्येव प्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति ॥ ( १ ) ॥ इन छः रसों में से एक-एक रस के आधार द्रव्य के अनुसार गुण, कर्म की व्याख्या करेंगे । इन में मधुर रस -जन्म से ही शरीर के अनुकूल ( सात्म्य ) है । ( जन्म से ही मधुर रसयुक्त दूध को पीकर बच्चा बढ़ता है ) । रस, रक्त, मांस, मेद, मब्बा, अस्थि, ओज और शुक्र को बढ़ाता है, आयुवर्द्धक, श्रोत्र, श्वक्, नासिका, चक्षु, रखना ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन इन को प्रसन्न, निर्मल करता है । बलकारक, कान्तिकारक पित्त- नाशक, विषनाशक, वायुनाशक, तृष्णानायक, त्वचा, केश, और स्वर के लिये हितकारी, आह्लादजनक, अभिघात आदि से बेहोश पुरुष को जीवन देने वाला, तुति करने वाला वृद्धि करने वाला, स्थिरकारक, क्षीण और क्षत व्यक्ति को पाषण करने एवं सन्धान अर्थात् टूटे का जोड़ने वाला नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ और जाम का आह्लाद करने वाला, जलन ओर मूर्च्छनाशक, भ्रमर और चिऊंटियों का प्रिय, स्निग्ध, शीत और गुरु है । यद्यपि इस मधुर रस में इतने गुण हैं, तो भी इस अकेले रस को ही निरन्तर अधिक मात्रा में खाने से स्थूलता कोमलता, आलस्य, नींद की अधिकता, भारीपन, अन में अरुचि, अभि की निर्बलता, मुख (गाल ), गले में मांस की वृद्धि, श्वास, कास, प्रतिश्याय, अलखक, शीतज्वर, आनाह ( अफारा ), मुख की मधुरता, वमन, संज्ञानाश, स्वर नाथ, गलगण्ड, गण्डमाला, श्वापद, गले को सूजन, बस्ति, धमनी गुदा ( गले में ) में मांस, चर्बी या कफ कोई पदार्थ बढ़ जाता है, नेत्र रोग, अभिष्यन्द, कफ रोग ( कफलाब ) आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अम्लो रसो भक्त रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति ऊर्जयति, वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमात्रावयति, भुक्तमपकर्षयति, केदयति, जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, वर्पयति, सबीजयति लोमानि कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांस विदति, कार्य शिथिलीकरोति, क्षीण-क्षत -कुश दुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपिच क्षताभिहतदष्ट -दुग्ध -भग्न- शून- व्युतावमूत्रित परिसर्पित -मर्दित -चिन भिन्न-विशिष्ट विद्धोत्लिष्टादीन पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिव कण्ठ-मुरो हृदयं च ॥ ( २ ) ॥ अम्फरस अल में रुचि पैदा करता है, अग्नि को बढ़ाता है, शरीर

पृष्ठ 323

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सूत्रस्थानम् ३०५ब० २६ ] २० बढ़ाता है, तेज देता है, मन को उत्तेजित ( जागृत ) करता है । इन्द्रियों को बलवान् करता है, बल को बढ़ाता है वायु का अनुलोमन करता है, हृदय के लिये हितकारी है । मुख में लार चुआता है, खाये हुए भोजन को बाहर निका- लता है, किन्न ( शरीर को गीला ) बनाता है । खाये भोजन को पचाता है, प्रसन्नता करता है खघु, उष्ण, स्निग्ध गुण वाला है ॥ यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय, तो दांतों को कोट करता है, ( खट्टा करता है ), तृप्ति अर्थात् भोजन में अनिच्छा उत्पन्न करता है, आंखों को मीचाता है, शरीर के बालों को कंपा देता है, ( रोमांचित करता है ), कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है, मांस में जलन पैदा करता है, शरीर को ढीला ( सुस्त करता है ), क्षीण, उरः- क्षत रोगी, निर्बल, कमजोर पुरुषों में सूजन उत्पन्न करता है और भी जखम, चोट, दांत लगे, जले, अस्थि आदिका टूटना, सूजन, सन्धिभ्रंय, प्राणियों के मूत्रजन्य विष, स्पर्शजन्य विष ( मकड़ी के ), रगड़ लगे हुए, दो टुकड़े हुए, चुमे हुए पिसे हुए आदि व्रणों को पका देता है । अग्निगुण होने से कण्ठ, छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है । ( २ ) ॥ लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः सरो विकास्यधः संस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भ-बन्ध संघात विधमनः सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमानावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहारमाहारयोगी, नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः पित्त कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयांत, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि प्रगालयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति,शोफान् स्फोटयति, दन्तश्च्यिावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वली-पति-खालित्यमापादयति, अपि च लोहित- पित्ताम्ल पित्त- वीसर्प बात-रक्त- विचर्चिकेन्द्रलुप्त-प्रभृतीन्विकारानुपजनयति ॥ ( ३ )॥ लवण रस - पाचक, नरम बनाने वाला, अग्निदीपक, नीचे गिराने वाला, -छेदन मेदन करने वाला, तीक्ष्ण, सर ( मल लाने वाला ), विकासी ( क्लेद का छेदन करने वाला ) अधःक्षसी, विष्यन्दशील ( रेचक ) विरलता करने वाला वातनाशक, मल-मूत्रादि के अवरोध को नाश करने वाला और जहां पर जरा सा अधकि हो जाता है, वहां पर और कोई दूसरा रस स्पष्ट नहीं. में थूक उत्पन्न करता है, कफ को पिघलाता है, मार्गों का शोधन

पृष्ठ 324

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३०६ चरकसंहिता [अ० २६- करता है, शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है, आहार में रूचि उत्पन्न करता है, आहार में सदा बरता जाता है, बहुत भारी नहीं होता,स्निग्ध और उष्ण गुणवाला है । यही एक रस यदि अधिक सेवन किया जाय तो पिस को कुपित करता है, रक्त को बढ़ाता है, प्यास उत्पन्न करता है, संज्ञा नाश करता है, शरीर को गरम करता है, फाड़ता है, मांस को गलाता है, कुों को द्रवित करता है, विष को बढ़ाता है, सूजन को फाड़ता है, दांतों को गिरा देता है, पुरुषत्व का नाश करता है, इन्द्रियों को जड़ बनाता है । हुर्रियां पैदा करता, बालों को श्वेत करता, गंज अर्थात् बालों को गिराता है । इसके अतिरिक्त रक्तपित्त, अम्लपित्त, बोसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्स आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ( ३ ) ॥ कटुको रसोक्तं शोधयति, अग्नि दीपयति, भुक्तं शोषयति, प्राण-मात्रावयति, चक्षुविरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक -श्वयथूप-'चयोदर्दाभिष्यन्द + नेह- स्वेद- क्लेद मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं कण्डूर्विन श-यति, क्रिमीम हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्ध-रिछनत्ति, मार्गाविवृणोति श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रसवीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, बलं क्षिणोति, तृष्णां चोपजनयति । अपिच वाय्वग्निबाहुल्याद् भ्रम-म-द-द्रवधु' कम्प- तोद भेदश्वरण-भुज-पार्श्व पृष्ठ प्रभृतिषु मारुतजान्विका-रानुपजनयति । ( ४ ) ॥ कटु रस मुख का शोधन करता है, अग्नि को बढ़ाता है, खाये हुए भोजन को सुखाता है, नाक से कफ बहाता है, आंखों में आंसू लाता है, इन्द्रियों को उशेजित करता है, अल्सक, सूजन, वृद्धि, उदर्द, अभिष्यन्द, स्नेह, पसीना, वेद, मल का नाश करता है । कृमियों को मारता है, मांस का लेखन करता है ( स्थूलता को कम करता है ) । खाये हुए भोजन का रेचन करता है, खाज़ को मिटाता है, ब्रणो को बैठाता है, भरता है । जमे हुए रक्त को तोड़ता है, सन्धि-बन्धनों को छेदन करता है, मार्गों को साफ बनाता है, कफ को शान्त.. करता है । लघु, उष्ण और रूक्ष होता है । यही एक रस यदि अधिक मात्रा मे सेवन किया जाय तो कटु १. 'भ्रममदवमथु इति च पाठः ।

पृष्ठ 325

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अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०७ प्रभाव से ( कटु रस का कटु विपाक ) पुरुषत्व का नाश करता है । रस और वीर्य के प्रभाव से संज्ञानाश करता है । ग्लानि उत्पन्न करता है, अवसन करता है, कर्षण ( निर्बल ) करता है, मूर्च्छित करता है, शरीर को झुकाता है, अन्धकार लाता है, चक्कर लाता है, गले में जलन तथा शरीर में तापज्वर उत्पन्न करता है । बल को कम करता है, प्यास को पैदा करता है । वायु, अग्नि गुण की अधिकता होने से चक्कर; मुख ओठ में जलन, कंपकपी, चुभने की सी दर्द, मेदन जैसी पीड़ा, पांव, हाथ, पार्श्व पसलियों और पीठ में बात

विकार उत्पन्न करता है । ( ४ ) ॥

तिको रसः स्वयमरोचिष्णुररोचकघ्नो विषघ्नः कृमिघ्नो मूर्च्छा- दाह-कण्डू-कुष्ठ- तृष्णा-प्रशमनः त्वङ्मांसयोः स्थिरीकरणो ज्वरघ्नो दीपनः पाचनः स्तन्यशोधनो लेखनः क्लेद -मेदो वसा-मज्ज-लसीका-पूय-स्वेद-मूत्र- पुरीष-वित्त-श्लेष्मोपशोषणो रूक्षः शीतो लघुश्च । स एवंगुणोऽप्येक श्वा- त्यर्थमुपयुज्यमानो रौक्ष्यात्खरविशदस्वभावाच्च रस- रुधिर - मांस-मेदोऽ- स्थि मज्ज-शुक्राण्युच्छोषयति, स्रोतसां खरत्वमुपपादयति, बलमादत्ते, कर्षयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, वदनमुपशोषयति, अपच वातविकारानुपजनयति । ( ५ ) । तिक्त रस अपने आप अरुचिकारक होने पर भी दूसरे भोजनों में रुचि उत्पन्न करता है, इसलिये अरोचकनाशक है । विषनाशक, कृमिनाशक, मूर्च्छा, जलन, खाज़, कोद और प्यास को शान्त करने वाला, त्वचा मांस को स्थिर करने वाला, ज्वरनाशक, अग्निदीपक, पाचक, दूध का शोधन करने वाला, लेखन करने वाला, क्लेद, मेद, वसा, मज्जा, लसीका, पूय, स्वेद, मूत्र पुरीष ( मल ) पित्त, कफ को सुखाता है, रूक्ष, शीत और लघु है । यही रस अधिक मात्रा में सेवन करने से रूक्ष, कर्कश और विशद स्वभाव होने से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र का शोषण करता है, स्रोतों में खरता उत्पन्न करता है, बल देता है, शरीर की स्थूलता का कर्षण करता है, हर्ष का क्षय करता है, संज्ञानाश करता है, चकर उत्पन्न करता है, मुख में शुष्कता उत्पन्न करता है और अन्य वात रोगों को भी उत्पन्न देता है ॥ ( ५ ) ॥ I रसः संशमनः संप्राही संधारणः पीडनो रोपणः शोषणः इति च पाठा ।

पृष्ठ 326

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३०८ चरकसंहिता [अ० २६ स्तम्भनः श्लेष्म पित्त-रक्त- प्रशमनः शरीरक्लेदस्योपयोक्ता, रूक्षः शीतो गुरुच । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोषयति, हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यनबध्नाति, यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्र- पुरीषाण्यवगृह्णाति कर्षयति, म्लापयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खर- विशद-रूक्षत्वात्पक्ष- वध-महापतानकार्दित-प्रभृतीं वातविकारानुपन-नयतीति ॥ ( ६ ) ॥ कषाय रस संशमन करने वाला, संग्राहक, सन्धारक, व्रण का पीड़न करने वाला, रोपण, ब्रण को शुष्क करने वाला, स्तम्भन, कफ, रक्त, पित्तनाशक, शरीर में क्लेद को चूसने वाला, रूक्ष, शीत और गुरु है । यही रस अधिक मात्रा में उपयोग करने से मुख को सुखा देता है, हृदय को पीड़ित करता है, उदर में वायु से फुलाव उत्पन्न करता है, वाणी को जड़ कर देता है, स्रोतों को बन्द कर देता है, कृष्णता उत्पन्न करता है, पुरुषत्व को नष्ट करता है, अन्न को अवरोध करके पचन कराता है, बात, मूत्र, मल, रेतस् ( शुक्र ) को बन्द कर देता है, रोक देता है, शरीर को कर्षण करता है, म्लान कर ( सुरक्षा ) देता है, प्यास लगाता है, जकड़ देता है । खर, विशद और रूक्ष होने से पक्षवध, धनुग्रह, मन्याग्रह, पृष्ठग्रह, अपतानक, अर्दित आदि वात रोगों को

उत्पन्न करता है । ( ६ ) ॥

एवमेते षड्रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना उपकारकरा भवन्त्यष्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथोपयुज्य-मानाः । तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति ॥ ४१ ॥

इस प्रकार से ये छः रस पृथक् पृथक् या दो या तीन अथवा सब परस्पर, मिलकर मात्रा में योग्य प्रमाण से सेवन करने से सर्व प्राणिमात्र को आरोग्य पुष्टि देकर उपकार करते हैं और असम्यक् रूप में उपयोग करने से सब प्राणियों का अपकार करते हैं । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि इन को मात्रा में सम्यक् प्रकार से बरतें ॥ ४१ ॥

भवन्ति चात्र -शीतं बीर्येण यद् द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः ।

तयोरम्लं यदुष्णं च यबोष्णं कटुकं तयोः ॥ ४२ ॥

तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः ।

वीर्यतोSविपरीतानां पाकसमोपदेश्यते ॥ ४३ ॥

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०२६ ] सूत्रस्थानम् ३०६

यथा पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्यचित्रको ।

.. एवमादीनि चान्यानि निर्विशेद्रसतो भिषक् ॥ ४४ ॥

इसमें श्लोक हैं—रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य जो द्रव्य रस और विपाक में मधुर हो, उस को शीतवीर्य समझना चाहिये, और जो द्रव्य रस और पाक में अम्ल हो, उस को उष्णवीर्य, जो द्रव्य रस और पाक में कटु हो, उस को भी उष्णवीर्य समझना चाहिये । जो द्रव्य वीर्य और विपाक में विरोधि न हों-एक समान हों, उनके गुणों का ज्ञान रस से ही करना चाहिये । परन्तु इस का अपवाद भी है । जहां पर रस समान हैं, वहां पर विशक द्वारा गुणों का ज्ञान होता है । जिस प्रकार कि दूध और घी मधुर रस और मधुर विपाक हैं, इन का वीर्य भी शीत है, इसी प्रकार चव्य और चित्रक इन का रस और विपाक कटु हैं, इसलिये वीर्य भी इन का 'उष्ण' है । इस प्रकार से अन्य द्रव्यों को भी रसनिर्देश से वैद्य सुगमता से समझ सकता है । क्योंकि रस के अनुसार गुण हैं ॥ ४२–४४ ॥

मधुरं किंचिदुष्णं स्यात्कषायं तिक्तमेव च ।

यथा महत्पश्च मूढं यथा चानूपमामिषम् ॥ ४५ ॥

aaणं सैन्धवं नोष्णमम्ल मामलकं तथा ।

अर्कागुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते ॥ ४६ ॥

किंचिदम्लं हि संग्राहि किंचिदम्लं भिनन्ति च ।

यथा कपित्थं संग्राहि, भेदि चामलकं तथा ॥ ४७ ॥

पिप्पली नागरं वृष्यं कटु चावृष्यमुच्यते ।

कषायः स्वम्भनः शीतः सोऽभयायामतोऽन्यथा ॥ ४८ ॥

तस्माद्रसोपदेशेन न सर्व द्रव्यमादिशेत् ।

दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम् ॥ ४६ ॥

कभी कभी मधुर, कषाय और तिक्त रस भी उष्णवीर्य हो जाते हैं । यथा-बिल्वादि महापञ्चमूल तिक और कषाय होने पर भी उष्ण वीर्य हैं, और जल-चर या जलदेशीय मांस मधुर होने पर भी उष्ण है । सैन्धव नमक उष्णवीर्य नहीं और आंवला खट्टा होने पर भी उष्णवीर्य नहीं है । आकड़ा, अगरू और गिलोय ये तिक रस होने पर भी 'उष्ण' वीर्य हैं । अम्ब -रस में कोई द्रव्य एक और कोई रेचक हैं । जिस प्रकार की कैथ अम्ल होने पर संग्राही और अक होने पर भी रेचक है । पिप्पली और सोंठ कटु रख होने पर भी वर्धक ) हैं, क्योंकि उनका मधुर विपाक है और बैसे - कटु-रस

पृष्ठ 328

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३१० चरकसंहिता [अ० २६ अवृष्य होता है । कषाय रस स्तम्भनकारक और शीतवीर्य होता है, परन्तु हरक का कषाय रस रेचक और उष्ण वीर्य है । इस लिये रस को ही देखकर सब द्रव्य के गुण नहीं समझने चाहिये । रस की समानता होने पर भी द्रव्य द्रव्य में गुणमेद देखा जाता है ॥ ४५-४९ ॥

रौक्ष्यात्कषायो रूक्षाणामुत्तमो मध्यमः कटुः ।

तिक्तोऽवर स्तथोष्णानामुष्णत्वाल्लवणः परः ॥ ५० ॥

मध्योऽग्लः कटुकश्चान्त्यः,स्निग्धानां मधुरः परः ।

मध्योऽम्लो लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहान्निरुच्यते ॥ ५१॥

मध्योत्कृष्टवराः शैत्यात्कषाय-स्वादुतिक्तकाः । [ तिक्तात्कषायो मधुरः शीताच्छीततरः स्वादुर्गुरुत्वादधिकः कषायाल्लवणोऽवरः परः ॥। ]५२ ॥

अम्लात्कदुस्ततस्तितो लघुत्वादुत्तमो मतः ।

केचिल्लघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम् ॥ ५३ ॥।

गौरवे लाघवे चैव सोऽवरस्तुभयोरपि । इन छः रसों में कषाय, कटु, तिक्त तीनों रस रूक्ष हैं । इनमें भी कषाय रस रूक्षतम ( उत्तम ), कटु रसरूक्षतर ( मध्यम ) और तिक रस रूक्ष (अवर) है । इसी प्रकार लवण रस उष्णतम ( उत्तम ), अम्ल उष्णतर ( मध्यम ), कटु रस उष्ण ( अवर ) है । मधुर रस स्निग्धतम ( उत्तम ), अम्ल रस स्निग्धतर ( मध्यम ), लवण रस स्निग्ध ( अवर ) है । शैत्य धर्म सम्बन्ध की दृष्टि में कषाय रस मध्यम; स्वादु रस उत्कृष्ट और तिक्त रस अवर है । गुरुता की दृष्टि से मधुर रस सबसे गुरु कषाय रस मध्यम और लवण रस सब से अवर है । लघु गुण की दृष्टि से अम्ल रस उत्तम, कटु मध्यम और तिक्त रस अवर है । कुछ आचार्य लवण रस को सब से लघु ( अवर ) मानते हैं । क्योंकि अम्ल में पृथ्वी कारण है, लवण में जल कारण है । इसलिये पृथिवीजन्य रस की अपेक्षा जलजन्य वस्तु हलकी होनी चाहिये, इसलिये भूतों के आधार से गौरव या लाघव का ज्ञान नहीं करना चाहिये । क्योंकि पानी की अधिकता से उत्पन्न रस, पृथ्वी की अधिकता से उत्पन्न कषाय रस से 'गुरु' होता है । यहां पर गुरुस्व की से. लघु माना है । वास्तव में इस मतभेद का कोई विशेष अर्थ नहीं, क्योिं ही पक्ष ( वण रस ) को अमर मानते हैं । अम्ल, कटु, तिक रस जो लवण रस को गुरु समझते हैं; वे गुरुता की दृष्टि से देखते हैं.

पृष्ठ 329

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३११ अ० २६ ] सूत्रस्थानम् www मानते हैं वे लघुख होने से लघु समझते हैं । दोनों ही पक्ष किचित् गुरुत्व

स्वीकार करते हैं ।

परं चातो विपाकानां लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ ५४ ॥

कटुतिक्तकषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ।

अम्लोऽम्लं पच्यते, स्वादुर्मधुरं लवणस्तथा ॥ १५॥

मधुरो लवणाम्लौ चस्निग्धभावात्यो रसाः ।

बात- मूत्रपुरीषाणां प्रायो मोझे सुखा मताः ॥ १६॥

कटुतिक्तकषायास्तु रूक्षभावात्त्रयो रसाः ।

दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम् ॥ ५७ ॥

शुका बद्धविण्मूत्र विपाको वातलः कटुः ।

मधुर: सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः ॥ ५८ ॥

पित्तकृत्सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः । तेषांविपाकलक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतांगुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लावतोऽन्यथाप्रति ॥। ५६ ॥ प्रव्याणां गुणवंशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत् ॥ ६० ॥

विपाक -इसके आगे विपाकों ' का लक्षण कहते हैं । कटु, तिक, कषाय -रस के आधार भूत द्रव्यों का विपाक प्रायः कटु होता है । ( पिप्पलो कटु रस होने पर भी विपाक में प्रायः कटु होता है । पिप्पली कटु रस होने पर भी विपाक में मधुर है, इसलिये प्राय शब्द है ) । अम्ल रस का अम्ड और मधुर तथा लवण रस का मधुर विपाक होता है । मधुर, अम्ल और लवण ये तीनों रस स्निग्ध होने के कारण वायु, मूत्र, मल को सुख पूर्वक बाहर निकालने में सहायक होते हैं । कटु, तिक्त और कषाय रस रूक्षगुण होने से बात, मल, मूत्र और शुक्र के बाहर निकालने में कष्ट रूप होते हैं, अवरोध करते हैं । जिस द्रव्य का विपाक कटु होता है, वह वीर्यनाशक, मल मूत्र का अवरोध करने वाला और वायुकारक होता है । जिस द्रव्य का विपाक मधुर होता है, वह मल मूत्र का प्रवर्त्तक ( रेचक ) और कफ एवं शुक्र को बढ़ाता है । जिस द्रव्य का विपाकहै । अम्ल होता है, वह पित्तकारक, मल-मूत्र का रेचक और वीर्यनाशक होता १. विपाक—खाये हुए अन्न का जाठराग्नि में पाचन क्रिया के पश्चात् रस उत्पन्न होता है उसका नाम विपाक है ।

" जठरेणाग्नियोगात् यदुदयति रसान्तरम् ।

रखाना परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
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३१२ arcifer [ ०२६ इन विपाकों में मधुर विपाक गुरु और कटु तथा अम्ल विपाक लघु होते हैं । विपाक के अल्पत्व और बहुत्व उस उस द्रव्य के रस रूपी गुण की अधिकता या न्यूनता पर निर्भर करते हैं । उदाहरण के लिये गन्ने में मधुर रस अधिक प्रमाण में है, इसलिये इसका विपाक भी मधुर ( उत्तम ) होगा । इसी प्रकार जिसमें मध्यम प्रमाण में होगा उस का विपाक भी मध्यम, जिसमें न्यून प्रमाण में होगा, उसका विपाक भी अवर होगा । प्रत्येक पदार्थ का विपाक उसके रस के परिमाण में होता है ॥ ५४-६० ॥

तीक्ष्णं रूक्षं मृदु स्निग्धं लघुष्णं गुरु शीतलम् ' ।

वीर्यमष्टविधं केचित्केचिद् द्विविधमास्थिताः ॥ ६ ९ ॥

शीतोष्णमिति, बीयं तु क्रियते येन या क्रिया ।

नावीर्यं कुरुते किंचित्सर्वा वीर्यकृता क्रिया ॥ ६२ ॥

रसो निपाते द्रव्याणां विपाकः कर्मनिष्ठया ।

वीर्यं यावद्दधीवासान्निपाताश्चोपलभ्यते ॥ ६३ ॥

कोई आचार्य वीर्य की आठ प्रकार मानते हैं । यथा - मृदु, तीक्ष्ण रूक्ष, लघु, स्निग्ध, उष्ण और शीतल । और कोई आचार्य वीर्य को दो प्रकार का मानते हैं । यथा - शीत और उष्ण । रस, विपाक और प्रभाव इनसे व्यतिरिक्त जो द्रव्य के अन्दर छिपी शक्ति विशेष कार्य करती है, उसका नाम 'वीर्य ' है । कार्यरहित वस्तु कुछ क्रिया नहीं कर सकती, सम्पूर्ण क्रियायें वीर्य अर्थात् शक्ति से होती हैं । रस, वीर्य और विपाक के पृथक्-पृथक् लक्षण कहकर अब एक द्रव्य में स्पष्ट करते हैं । जिह्वा के साथ किसी पदार्थ का सम्बन्ध होने पर जो रस ( खट्टा, कडुवा ) अनुभव होता है, वह रस, वस्तु के पाचन होने के पीछे शरीर में कफ- वृद्धि, पित्तवृद्धि, वीर्यवृद्धि, वातवृद्धि आदि कार्य के होने से जो अनुभव होता है, उसका नाम विपाक है । वस्तु का ( पचन से पूर्व और रसना के सम्बन्ध होने के पीछे ) शरीर के साथ संयोग होने से वीर्य का ज्ञान होता है । तथा— जलचर प्राणियों के मांस का जिह्वा के साथ सम्बन्ध मात्र से उष्णत्व स्पष्ट हो. जाता है, मरिच का तीक्ष्णवीर्य जिहा स्पर्श से मालूम हो जाता है । मरिच की अभिवर्धक दीपन क्रिया शरीर के साथ सम्बन्ध होने पर ज्ञात होती है । रसका शान द्रव्य का जिला के साथ सम्बन्ध होने पर तुरन्त होता है; विपाक का कर्म से; वीर्य का ज्ञान-शरीर में जब तक रहने से तथा जिहा के साथ स १. 'मृदुतीक्ष्णगुरुस्निग्धलघुरुक्षोष्णशीतलम् । इति च पाठः ।