चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 331–340

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 331 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१३ अ० २६ ] सूत्रस्थानम होने से होता है । रस प्रत्यक्ष है, विपाक सदा परोक्ष और वीर्य मांसअनुमानउष्णद्वाराहै । ज्ञात होता है । यथा— सैन्धव नमक शीत वीर्य और जलचर को चखकर कहीं २ वीर्य का प्रत्यक्ष द्वारा भी ज्ञान हो जाता है । यथा -राई, उड़द का तीक्ष्ण वीर्य का पता लग जाता है । यह वीर्यं सहज और कृत्रिम है भारीपन और मूंग का हल्कापन यह स्वभाव से ही है । और लाजा का हल्का- पन यह कृत्रिम है । ६१-६३ ॥

रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते ।

विशेषः कर्मणा चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥ ६४ ॥

कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णचित्रको मतः ।

तद्द्दन्वी प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ॥ ६५ ॥

विपं विषन्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् ।

ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत्प्रभावप्रभावितम् ॥ ६६ ॥

मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् ।

तत्प्रभाव कृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ ६७ ॥

किंचिद्रसेन कुरुते कर्म बीर्येण चापरम् ।

द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किंचन ॥ ६८ ॥

विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपोहति ।

साम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ ६६ ॥

सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्चाप्युदाहृतः । प्रभाव-—जिस स्थान पर रस, वीर्य और विपाक की समानता होने पर भी कार्य में विशेषता उत्पन्न होती हो, उसे 'प्रभाव' कहते हैं । जिस प्रकार चित्रक ( चीतामूल ) का रस कटु, विपाक कटु और वीर्य उष्ण है, उसी प्रकार दन्ती ( जमालगोटा ) भी कटु रस, कटु विपाक और उष्णवीर्य है । परन्तु जमालगोटा विरेचन करता है, चीता नहीं करता । जो विष विष को ( स्थावर विष जंगम विष को— 'तस्माद् दंष्ट्राविषं मौलम्' ) नष्ट करता है, उसकासंशोधनभी कारण प्रभाव है । जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों मार्गों का करता है, वह भी प्रभाव है । मणियों के धारण करने से विषनाथ, शूलहरणहैं । आदि जो नाना प्रकार के कार्य होते हैं, वे सब प्रभाव के कारण ही होते अब द्रव्य की वह अचिन्त्य शक्ति है जिसके विषय में कुछ कह नहीं सकते कि ता है । कोई द्रव्य अपने रस से 5 कोई वीर्य से, कोई गुण से, कोई विपाक प्रभाव से कार्य करता है । किसी पदार्थ में रस आदि का बल

पृष्ठ 332

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 332 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१४ चरकसंहिता [अ० २६ समान हो, तो वहां पर रस को विपाक, रस और विपाक को वीर्य, रख, विपाक, वीर्य को प्रभाव अपने स्वाभाविक बड़ से जीत लेता है । जिस प्रकार कि भैंस की चर्बी रस और विपाक में मधुर है, परन्तु वोर्य उष्ण है, इसलिये वह मधुर रस के कार्य पित्तशमन को न करके, उष्ण वीर्य के कार्य पित्तप्रकोप को करता है । मद्य, इसका रस और विपाक अम्ल है, वीर्य उष्ण है, परन्तु यही मद्य अपने प्रभाव से इन तीनों को रद्द करके स्त्रियों में दुग्ध उत्पन्न करता है । अब तक विपाक, वोर्य और प्रभाव का वर्णन भी प्रकार कर दिया है ॥ ६४-६६ ॥ षण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ ७० ॥

स्नेहन-प्रीणनाह्लाद- मार्दवेरुपलभ्यते ।

मुखस्थो मधुरश्चाssस्यं व्याप्नुवंल्लिम्पतीव च ॥ ७१ ॥

दन्तहर्षान्मुखस्रावात्स्वेदनान्मुखबोधनात् ।

विदाहाचा ssस्यकण्ठस्य प्राश्येवाम्लं रसं वदेत् ॥ ७२ ॥

प्रलीयन्क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे ।

यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ ७३ ॥

संवेजयेद्यो रसना निपाते तुदतीव च ।

विदद्दन्मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः । ७४ ॥

प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च ।

सतिको मुख-वैशद्य -शोष-प्रह्लाद कारकः ॥ ७५ ॥

वैद्य - स्तम्भ-जाड्यैर्यो रसनं योजयेद्रसः ।

नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ ७६ ॥ इति ॥

इसके आगे छः रसों के लक्षण कहते हैं । जो रस स्निग्धता, प्रसन्नता, आल्हाद अथवा मृदुता उत्पन्न करता है, मुख में रखने से सम्पूर्ण मुख को चिकास से भर देता है, लिसलिसा बना देता है, वह मधुर रस है । जो रस दांतों को खट्टा कर देता है, मुख से थूक ( लाला ) चुआता है, पसीना छाता हे, मुख में जागृति उत्पन्न कर देता है, मुख और गले में जलन करता है, वह 'अम्ल रस है । जो रस मुख में रखने से घुलने लगे, क्लिन्न नमीदार, लाला बहावे, मुख में हल्कापन लाये, मुख में विदाह करता हो, उसे 'लवण' रस कहते हैं । जो रस जीभ को छूते ही चुरचुराहट उत्पन्न करे और सुई जैसा चुभने लगे, मुख को जलाता हुआ नाक और आँखों से पानी बहाने लगे 'क ' रस है । जो रस जीभ के साथ स्पर्श होने पर जीम को जड़ कर है और कुछ अच्छा नहीं लगता और मुख को साफ करता है,

पृष्ठ 333

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 333 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० २६ । सूत्रस्थानम ३१५ आल्हादित करता है वह 'तिक्त' रस है । जिस रस के खाने से जीभ स्वच्छ, जड़ और स्तम्भित हो जाती है और गले को रोक देता है और हृदय को पीड़ित करता है, वह 'काय' रस है ॥ ७०-७६ ॥ एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयं पुनरग्निवेश उवाच -भगवन्! श्रुत- मेतदवितथमर्थसंपद्युक्तं भगवतो यथावद् द्रव्यगुणकर्माधिकारे वचः, परं त्वाहारविकाराणां वैरोधिकानां लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ७७ ॥।

तमुदाच भगवानात्रेयः - देहातुप्रत्यनीकभूतानि द्रव्याणि देह- धातुभिविरोधमापद्यन्ते परस्परगुणविरुद्धानि कानिचित् कानिचित्सं- योगात्संस्कारादपराणि देश-काल-मात्रादिभिश्चापराणि तथा स्वभावा- दपराणि ॥ ७८ ॥

तत्र यान्याहारमधिकृत्य भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते तेषामेकदेशं वैरोधिक- मधिकृत्योपदेक्ष्यामः -न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेत्, उभयं ह्येतन्मधुरं मधुरविपाकं महाभिष्यन्दि शीतोष्णत्वाद्विरुद्धवीर्य विरुद्ध वीर्याच्छाणितप्रदूषणाय महाभिष्यन्दित्वान्मार्गोपरोधाय चेति ॥ ७६॥

इस प्रकार से कहते हुए महर्षि आत्रेय को अग्निवेश ने कहा कि हे भगवन्! आपने द्रव्यगुण कर्म के विषय में जो कुछ अर्थयुक्त वाणी कही है, वह यथार्थ रूप में सुन ली । परन्तु विरुद्ध आहार के लक्षणों को विस्तार से सुनने की इच्छा से, इसलिये आप उसको प्रतिगदन करें । इस पर आत्रेय ऋषि ने कहा-शरीर के रक्षादि सात धातु या वातादि दोष, इनको प्रकृति के विरुद्ध करने ( दूषित करने वाले द्रव्यों से शरीर के धातु विगढ़ जाते हैं । इन द्रव्यों में कुछ द्रव्य परस्पर गुणों से कुछ संयोग से और कुछ संस्कार से, कुछ देश, काल, मात्रा से और कुछ स्वभाव से ही दूषित करने वाले ( विरोधी गुण के ) होते हैं । परस्पर विरुद्ध जैसे मछलियों को दूध के साथ खाना । संयोग विरुद्ध - जैसे पके हुए बड़हल को उड़दों में मिलाकर खाना । संस्कार विरुद्ध-जैसे कबूतर को सरसों के तेल में भून कर खाना । देश दो प्रकार का है, भूमि और शरीर । भूमि विरुद्ध-—राख और धूल में मिला भोजन या परोक्ष में बना भोजन खाना । शरीरविरुद्ध - उष्णावस्था में मधु खाना । समयविरुद्ध -वासी रक्खा मकोय का ; खाना । मात्रा विरुद्ध -एक वजन में मधु और घी खाना स्वभाव विरुद्ध- विष ओज के विरुद्ध दसगुण रखता है । इनमें से जो विरोधी द्रव्य [मैं व्यवहार किये जाते हैं, उनके कुछ उदाहरण देते हैं । यथा-

पृष्ठ 334

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 334 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१६ चरकसंहिता [ अ० २६ मछलियों को दूध'के साथ नहीं खाना चाहिये । क्योंकि दोनों ही वस्तुएं मधुर रस और मधुर विपाक वाली हैं । इसलिये दोनों को एक साथ सेवन करने से कफ की बहुत वृद्धि होती है, दूध शीतवीर्य और मछलियां उष्णवीर्य हैं । इस-लिये रक्ततदनन्तरमात्रेयवचनमनुनिशम्यको दूषित करती हैं और महा अभिष्यन्दिभद्रकाप्योऽग्निवेशमुवाचहोने से स्रोतों को रोक देंगी-॥सर्वानेव मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेदन्यत्रै कस्माञ्चिलिचिमात्, स पुनः शकली सर्वतो लोहितराजी रोहितप्रकारः प्रायो भूमौ चरति, तं चेत्प-यसा सहाभ्यवहरे न्निःसंशयं शोणितजानां विबन्धजानां च व्याधीनाम-न्यतममथवा मरणं प्राप्नुयादिति ॥ ८० ॥

आत्रेय महर्षि के वचन को श्रवण कर भद्रकाप्य मुनि अग्निवेश को बोले कि एक चिलचिम मछली को छोड़कर और सब मछलियों को दूध के साथ खा सकते हैं । इस चिचिम मछली पर चारों ओर लाल लाल रेखायें, धारियां होती हैं, इसका रंग लाल होता है और प्रायः भूमि ( रेगिस्तान, जैसलमेर में जिसे रेगमाही मच्छी कहते हैं ) में फिरती हैं । इस मछली को दूध के साथखाने से निश्चय रूप में रक्तजन्य या अवरोध ( मलमूत्र ) जन्य रोगों या मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है ॥ ८० ॥

नेति भगवानात्रेयः । सर्वानेव मत्स्यान्न पयसाऽभ्यवहरेद्विशेषतस्तु चिलिचिमं स हि महाभिष्यन्दित्वात्स्थूललक्षणतरानेतान् व्याधीनुपज- नयत्यामविषमुदीरयति च ॥ ८१ ॥

प्राम्यानूपौदकपिशितानि च मधु-तिल-गुड-पयो-माष- मूलक- बिसै विरूढधान्यैव नैकधायात्, तन्मूलं च बाधिर्यान्ध्य- वेपथु -जाड्य-विक- - मकतामैन्निमण्यमथवा मरणमाप्नोति न पौष्करं, रोहिणीकं शार्क, कपोतान् वा सार्षप-तैल -मृष्टान्मधुपयोभ्यां सहाभ्यवहरेत्, तन्मूलं हि शोणिताभिष्यन्द-धमनी प्रविचयापस्मार-शङ्खक-गलगण्ड -रोहिणीकाना- मन्यतमं प्राप्नोत्यथवा मरणमिति । न मूलक-लशुन कृष्णगन्धार्जक- सुमुख-सुरसादीनि भक्षयित्वा पयः सेव्यं, कुष्ठाबाधभयात् । न जातुक- शाकं न लिकुचं पक्कं मधुपयोभ्यां सहोपयोज्यं एतद्धि मरणायाथवा बळ- वर्ण-तेजो- वीर्योपरोधायालघुव्याधये षाण्ढ्याय चेति । तदेव लिकुचं पक्कं न माष सूप-गुड सर्पिभिः सहोपयोज्यं वैरोधिकत्वात् । तथाऽम्लास तक-मातुलुङ्ग- लिकुच करमर्द-मोच- दन्त शठ- बदर- कोशाम्र-भव्य -ज कपित्थ-तिन्तिडीक- पारावता लोट- पनस नालिकेर दाडिमामलक

पृष्ठ 335

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 335 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१७ .. प्रकाराणि चान्यानि सर्व चाम्लं द्रवमद्रवं च पयसा सह विरुद्धम् । तथा ककुवनक -मकुष्ठक-कुलत्थ-माप -निष्पावाः पयसा सह विरुद्धाः। पद्मोत रिकाशार्क शार्क मेरेयो मधु च सहापयुक्तं विरुद्धं वातं चातिकोपयति । हारिद्रकः सर्षप -तैल- भृष्टो विरुद्धः पित्तं चातिकापयति । पायसी मन्था-नुपानो विरुद्धः श्लेष्माणं चातिकापर्यात । उपोदिका तिलकल्कसिद्धा हेतुरतीसारस्य । बलाका वारुण्या सह कुल्मापरपि विरुद्धा । सेव सूकरवखापरिभृष्टा सद्यो व्यापादयति मायूर- मांसमेरण्ड-सीसकावस- कमेरण्डाग्नि -प्लुष्टमेरण्ड- तेल युक्तं सद्यो व्यापादयति तदेव भस्मपांसु- परिध्वस्तं सक्षौद्रं मरणाय । हारीतकमांसं 'हारिद्रसीसकावसक्तं हारिद्रा- ग्निप्लुष्टं सद्यां व्यापादयति । तदेव भस्मपशुपरिध्वस्तं सक्षद्रिं मरणाय मत्स्यानस्तालनसिद्धाः पिप्पल्यस्तथा काकमाची मधु च मरणाय; मधु चोष्णमुष्णार्तस्य च मधु मरणाय । मधुसपिपी समधृत; मधु वारि चान्तरिक्षं समधृतं मधुपुष्करबीजं, मधु पीत्वाष्णोदकं, भल्लातकाष्णो दक; तक्रसिद्धः कम्पिल्लकः, पर्युषिता काकमाची, अङ्गारशुल्या भास- वेति विरुद्धानि - इत्येतद्यथाप्रश्नमभिनिर्दिष्टं भवतीति ॥ ८२ ॥

भगवान् आत्रेय ने कहा-यह ठीक नहीं । सभी मछलियों को दूध के साथ नहीं खाना चाहिये, परन्तु खासकर चिलचिम मछली को तो कभी भी नहीं खाना चाहिये । क्योंकि यह मछली ( चिलचिम ) बहुत अभिष्यन्द करने वाली है, इसलिये भयंकर बढ़े २ रोगों को और आमवित्र को उत्पन्न करती है । ग्राम्य, आनूप और जलचर प्राणियों का मांस, मधु, तिल, गुड, दूध, उड़द, मूली, भिस, नाल, अंकुरित धान्यों के साथ एक साथ नहीं खाना चाहिये । इन के साथ में खाने से बहरापन, अन्धत्व, कम्पन, जड़ता, अव्यक्त उच्चार ( मिन्मिन) गूंगापन, नाक से बोलना, अथवा मरण तक हो सकता है । पुष्करपत्र के शाक कटुरोहिणी के शाक की, या कबूतर के मांस के सरसों के तेल में भूनकर दूध और शहद के साथ नहीं खाना चाहिये; इन के खाने से रक्ताभिष्यन्द, सिराजन्य ग्रन्थि-रोग, अपस्मार, शंखकशूल, गलगण्ड, रोहिणी ( कण्ठरोहिणी ) रोगों में से कोई एक रोग अथवा मृत्यु प्राप्त होती है । मूलो, लहसुन, शोभाञ्जन की भाजी, अर्जक ( कुठरेक ), सुमुख ( राई ) और तुलसी आदि को खाकर दूध नहीं पीना चाहिये, क्योंकि कुष्ठरोग होने की शंका है । वंशपत्रिका का के या पके हुए ढ्यो ( बड़हल ) को शहद और दूध के साथ नहीं खाना द्रिक' इति च पाठः ।

पृष्ठ 336

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 336 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३१८ चरकसंहिता [ अ० २६ चाहिये, क्योंकि इन के खाने से या तो मृत्यु हो जाती है, अथवा बल, वर्ण, तेज, वीर्य का नाश होता है और बढ़े २ रोग तथा नपुंसकता उत्पन्न होती है । इसी पके हुए ढ्यो फल को उड़द की दाल, गुड़ और घी के साथ मिलाकर नहीं खाना चाहिये क्योंकि संयोग विरुद्ध है । इसी प्रकार कच्चे आम, बिजौरा, ढ्यो, करौंदा, केला, निम्बू, बेर, जंगली आम, कमरख, जामुन, कैथ, इमली, फालसा, अखरोट, पनस ( कटहल ), नारियल, अनार, आंवला या इस प्रकार के अन्य सब तरल अथवा ठोस सब प्रकार के खट्टे पदार्थ दूध के साथ विरोधी गुण रखते हैं । इसी प्रकार कंगु ( नीवार धान्य ), जंगली मूंग, मोठ, कुलत्थी, उड़द, या पिट्टी से बने पदार्थ दूत्र के साथ विरोधी हैं । पद्मोत्तरिका के शाक, को शक्कर, मैरेय, मधु के साथ खाना विरुद्ध है और वायुकारक है । कबूतर को सरसों के तेल में भूनकर खाना विरुद्ध है, वह पिच को बहुत कुपित करता है । सत्तू को दूध में या खीर में मथकर खाना विरुद्ध है और श्लेष्मा को बढ़ाता है । तिल कल्क के साथ तेयार की हुई चोलाई की भाजी अतीसार रोग को उत्पन्न करती है । बलाका ( पक्षी ), वारुणी-शराब तथा कुल्माष ( धान्य ) के साथ विरुद्ध है । इसी बलाका पक्षी को सुअर की चर्बी मेंभूनकर खाने से शीघ्र मरण होता है । मोर का मांस, एरण्ड की कड़छी ( खौंचा, भूनने की लकड़ी ) से, एरण्ड की लकड़ियों की आग से, एरण्ड तैल में पकाकर खाने से तुरन्त मार देता है । हल्दा कबूतर का मांस, हलद की लकड़ी की बना कड़छी से, हलद की लकड़ियों के आंच में पकाकर खाने सेशीघ्र मार देता है । इसी कबूतर के मांस को राख, धूल में मिले हुए शहद में मिलाकर खाने से मृत्यु होती है । मछलियों की चर्बी में अथवा जिस बर्तन में मछलियां पकाई जाती हैं, उसी पात्र में पिप्पली, मकोय या शहद पकाकर खाने से मृत्यु होती है । उष्ण क्रिया करने पर या उष्ण शरीरावस्था में गरम शहद खाना मृत्यु का कारण होता है । एक मात्रा में मधु और घी, मधु और वृष्टि जल, शहद और कमलगट्टा, मधु पीकर गरमपानी, भिलावा और गरमपानी, छाछ में सिद्ध पकाया कमीला, रात की बासो रक्खी मकोय, अंगारों पर शूलाकृत भास ( कुक्कुट ) पक्षी का मांस ये विरुद्ध होते हैं । ये प्रश्न के अनुसार विरोधी अन्न कह दिये गये || ८१-८२ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः—

यत्किंचिद्दोषमुत्क्लेश्य न निईरति कायतः ।

आहारजातं तत्सर्वमहितायोपपद्यते ॥ ८३ ॥

पृष्ठ 337

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 337 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

० २६ ] सूत्रस्थानम

यच्चापि देश-कालाग्नि-मात्रा' सात्म्यानिलादिभिः ।

संस्कारतो वीर्यतच कोष्टावस्थाक्रमैरपि ॥ ८४ ॥

परिहारोपचाराभ्यां पाकात्संयोगतोऽपि च ।

विरुद्धं तच न हितं हृत्संपद्विधिभिश्च यत् ॥ ८५ ॥

विरुद्धं देशतस्तावद्रक्षतीक्ष्णादि धन्वनि ।

आनूपे स्निग्धशीतादि भेषजं यन्निषेव्यते ॥ ८६ ॥

tadisपि विरुद्धं यच्छीतरूक्षादि सेवनम् ।

शीते काले तथोष्णे च कटुकोष्णादिसेवनम् ॥ ८७ ॥

विरुद्धमनले द्वन्नानुरूपं चतुर्विधे ।

मधुसर्पिः समधृतं मात्रया तद्विरुध्यते ॥ ८८ ॥

कटुकोष्णादिसात्म्यस्य स्वादुशीतादि सेवनम् ।

यत्तत्साम्यविरुद्धं तु विरुद्धं त्वनिलादिभिः ॥ ८६ ॥

या समानगुणाभ्यासविरुद्धान्नौषधक्रिया ।

संस्कारतो विरुद्धं तद्यद्भोज्यं विपद् भवेत् ॥ ६० ॥

ऐरण्डसीसकासक्तं शिखिमासं तथैव हि ।

विरुद्धं वीर्यतां ज्ञेयं वीर्यतः शांतलात्मकम् ॥। ६१ ॥

तत्संयोज्योष्णवीर्येण द्रव्येण सह सेव्यते ।

क्रूरकोष्ठस्य चात्यल्पं मन्दवीर्यमभेदनम् ॥ ६२ ॥

मृदुकोष्ठस्य गुरु च भेदनीयं तथा बहु ।

एतत्कोष्ठविरुद्धंतु, विरुद्धं स्यादवस्थया ॥ ६३ ॥

श्रम- व्यवाय-व्यायाम-सक्तस्यानिलकोपनम् ।

निद्रालसस्यालसस्य भोजनं श्लेष्मकोपनम् ॥ ६४ ॥

यच्चानुत्सृज्य विण्मूत्रं भुङ्क्ते यश्चाबुभुक्षितः ।

तच्च क्रमविरुद्धं स्याद्यच्चातिक्षुद्वशानुगः ॥ ६५ ॥

परिहारविरुद्धं तु वराहादीन्निषेव्य यत् ।

सेवेतोष्णं, घृतादींश्च पीत्वा शीतं निषेवते ॥ ६६ ।

विरुद्धं पाकतश्चापि दुष्टदुर्दारुसाधिनम् । अपक्च -तण्डुलात्यर्थ-पक्क- दग्धं च यद्भवेत् ।

संयोगतो विरुद्धं यथथाऽम्लं पयसा सह ।

मनोरुचितं यश्च हृद्विरुद्धं तदुच्यते ॥ ६८ ॥

[भ्यासात्म्यानिकादिभिरिति च पाठः ।

पृष्ठ 338

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 338 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२० चरकसंहिता [ अ० २६

संपद्विरुद्धं तद्विद्यादसंजातरसं तु यत् ।

अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा ॥ ६६ ॥

ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृतेन यत् ।

तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्धमुपयोजितम् ॥ १०० ॥

सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्तास्तरुणस्य च ।

स्नेह-व्यायाम -बलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ १०१ ॥

पाण्ड्यान्ध्य -वीसर्प -दकोदराणां विस्फोटकोन्माद-भगन्दराणाम् ।

मूर्च्छा -मदाध्मान -गलामयानां पाण्ड्वामयस्याऽऽम विषस्य चैव ॥ १०२॥

किलास कुष्ठ-प्रहणी- गदानां शोषास्र पित्त ज्वर-पीनसानाम् ।

संतानदोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम् ॥ १०३ ॥

जो भोजन दोषों को विशेष रूप में कुपित करके शरीर से बाहर नहीं करता, अर्थात् कुपित अवस्था में शरीर में ही रहने देता है वह सब अन्न अहितकारी होता है । इसी प्रकार देश, काल, अग्नि, सात्म्य, वायु आदि दोष, संस्कार वीर्य, कोष्ठ, अवस्था, क्रम, परिहार, उपचार, पाक, संयोग, हृत्-संपत् और विधि में जो द्रव्य विरोधी हों, वे अहितकारी हैं । मारवाद आदि निर्जल देशों में रूच, तीक्ष्ण पदार्थ; जलबहुल ( बंगाल आदि ) प्रदेश मे स्निग्ध और शीतपदार्थों का सेवन करना देशविरुद्ध है । इसी प्रकार शीत ऋतु में शीत और रूक्ष पदार्थों का सेवन या उष्णकाल में कटु और उष्ण पदार्थों का सेवन कालविरुद्ध है । अग्नि के विषम, मन्द या तीक्ष्ण या सम इन चार प्रकार की जाठराभि में विरोधी अन्न-पान ( यथा -तीक्ष्णाग्नि में मन्द आहार और मन्दाग्नि में गुरु आहार करना ) विरोधी है । मधु और घी एकसमान मात्रामे परस्पर विरोधी हैं । जिस पुरुषको कटु, उष्ण आदि वस्तुओं का सात्म्य हो, वह यदि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करे तो यह सात्म्य- विरोधी है । समान गुणों के अभ्यास के विरुद्ध जो आहार है वह वायु आदि दोषों का भी विरोधी है । एरण्ड की कड़छी से पकाया हुआ मोर का मांस विष के समान होने से संस्कार- विरुद्ध है । जो वस्तु शीतवीर्य हो उस को यदि उष्णवीर्य की वस्तु के साथ मिलाकर खाया जाये तो यह वीर्य-विरोधी है । क्रूरकोष्ठ वाले पुरुष को थोड़ा, मृदुवीर्य अथवा अरेचक पदार्थ देना और मृदुकोष्ठ वाले पुरुष को गुरू, बहुत अथवा रेचक पदार्थ देना, कोष्ठबिरोधी है । परिश्रम, मैथुन, स्त्रीसंग और व्यायाम में लगे हुए पुरुष को वायुकोपक आहार दे या निद्राशील, आलसी पुरुष को कफकोपक भोजन देना अवस्थाविरुद्ध जो मल मूत्र का त्याग किये बिना, बिना भूख के खाना, अथवा बहुत

पृष्ठ 339

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 339 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० २६ ] २१ सूत्रस्थानम् ३२१ लाचार होकर खाना ये क्रमविरुद्ध है । सुअर आदि का मांस खाकर या गरम अथवा घी आदि खाकर ऊपर शीतल पदार्थों का सेवन करना परिहार विरोधी है । दुष्ट या बुरी ( बांस आदि, या मिट्टी के तेल से ) लकड़ियों से पकाये, कच्चे-पके, बहुत पके, या जले हुए चावल आदि आहार का खाना पाकविरोधी कहते हैं । खटाई का दूध के साथ संयोग करना यह संयोगविरोधी है । जो आहार मन को नहीं रुचता वह हृदयविरोधी है । जिस आहार में रस उत्पन्न नहीं हुआ वह सम्मविरुद्ध है । इसी प्रकार जिस आहार का रस नष्ट हो गया या बिगड़ गया है, वह भी सम्पद्विरुद्ध है । जो भोजन एकान्त में नहीं खाया जाता है वह आहारविधि अर्थात् शास्त्र के विरुद्ध है । इस प्रकार का विरोधी अन्न भो स्वस्थ पुरुष को, जिसकी अनि दीप्त हो, युवा पुरुष को, सात्म्य वन गया हो, या अल्पमात्रा में हो अथवा स्नेह एवं व्यायाम से बलवान् बने पुरुष को विरुद्ध भोजन विशेष हानि नहीं करते । विरोधी अन्न के सेवन से निम्न रोग उत्पन्न होते हैं । यथा -नपुंसकता, अन्धापन, वीसर्प, जलोदर, विस्फोटक, उन्माद, भगन्दर, मूच्छा, मद, अकारा, गलरोग, पाण्डुरोग, आमविष, किलास, कुष्ठ, संग्रहणी, शोष, रक्तपित्त, ज्वर, पीनस । इसी प्रकार संतति में पहुंचने वाले दोषों एवं मृत्यु का भी कारण विरुद्ध आहार को ही कहते हैं ॥ ८३-१०३ ॥ एषां च खलु परेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्यधीनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति । यथा-वमनं विरेचनं च तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्येः पूर्वमभिसंस्कारः शरीर-स्येति ॥ १०४ ॥

इस प्रकार के विरुद्ध अन्न पान के सेवन से अथवा अन्य विरोधरूपी कारणों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा के ये उपाय हैं । यथा -वमन, विरेचन, उक्त रोगों के विरोधी द्रव्यों का शान्ति के लिये उपयोग करना, विरुद्ध आहार-जन्य रोगों के विरुद्धद्रव्यों का निरन्तर उपयोग करके शरीर को संस्कृत करना, अथवा रसायन ओषधियों से शरीर को शुद्ध करना ॥ १०४ ॥

भवति चात्र - विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् ।

वमनं शमनं चैव पूर्व वा हितसेवनम् ॥ १०५ ॥

"रूद्ध आहार से उत्पन्न रोगों को विरेचन, वमन, संशमन क्रिया अथवा धि के निवारणार्थ पहले ही पथ्य तक रसायनादि का सेवन नष्ट १९४५ ॥

पृष्ठ 340

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 340 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३२२ चरकसंहिता [अ० २७

तत्र लोकाः- मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये ।

द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रयाः ॥ १०६ ॥

कारणं रससंख्या या रसानुरसलक्षणम् ।

परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक् पृथक् ॥ १०७ ॥

पञ्जात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना ।

ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः ॥ १०८ ॥

षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः ।

उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणी ॥ १०६ ॥

प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु ।

पाकप्रभावयोलिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः । ११० ॥

षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत्स्वलणम् । यद्यद्विरुध्यते तस्माद्येन यत्कारि चैव यत् ।

रोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत् ।

आत्रेयभद्रकाप्यीये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ११२ ॥

रस-निश्चय सम्बन्ध में महर्षियों की भिन्न २ मति, द्रव्यों के गुण कर्म, रस की संख्या, इन के भेद होने के कारण, रस या अनुरस का लक्षण, पर आदि गुण एवं उन के लक्षण, पंच महाभूतों से उत्पन्न रसों की संख्या, कौन कौन द्रव्य ऊर्ध्वगामी, अधोगामी क्रिया करते हैं, छः रसों के विभाग, रसके आधार-भूत द्रव्यों के सामान्य गुण, कर्म और इनके अपवाद, गौरव, लघुता, रसों में उत्कृष्ट, मध्यम, अवर भेद, विपाक, प्रभाव का लक्षण, वीर्य कितने प्रकार का, छः रसों के लक्षण, परस्पर विरुद्ध द्रव्य, इन के सेवन से उत्पन्न विकार एवं इन रोगों की औषध ये सब विषय इस 'आत्रेय भद्रकाप्यीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने कह दिये || १०६-११२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के आत्रेयभद्रका प्यीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः समाप्तः ॥ २६ ॥

सप्तविंशोऽध्यायः ।

अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥