चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 341–350
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 341–350
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम ३२३ इस के आगे अन्नपानविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भग-वान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२॥ इष्ट -वर्ण-गन्ध -रस -स्पर्श विधिविहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञ-कानां प्राणमाचक्षते कुशलाः, प्रत्यक्षफलदर्शनात्, तदिन्धना हान्तराग्नेः स्थितिः; तत् सत्त्वमूर्जयति तच्छरीर -धातुच्यूह- बल - वर्णेन्द्रियप्रसाद-करं यथोक्तमुपसेव्यमानं, विपरीतमहिताय संपद्यते ॥ ३ ॥
प्रिय या हितकर वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्शयुक्त विधिपूर्वक १ सेवन किया अन पान, प्राणिमात्र का प्राण है; ( ' अन्नं वै प्राणाः' ) ऐसा विद्वान् मनुष्य कहते हैं । सब प्राणियों के प्राण स्थिर रखने के लिये आहार मुख्य कारण है । यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सिद्ध है । ठीक प्रकार सेवन करने पर अन्न शरीर में स्थित जठराग्नि का आधार है और इस आंझ का अन्न इन्धन रूप होता है । अन्न के सेवन करने से मन की शक्ति बढ़ता है, शरीर के धातुसमूह, बल वर्ण बढ़ता है, तथा इन्द्रियां निर्मल होती हैं । विधि से विपरीत ' सेवन करने पर अन्न, विप रीत परिणाम उत्पन्न करता है ॥ ३ ॥
तस्माद्विवाहितावबोधनार्थ मन्नानविधिमखिलेनोपदेयामोऽग्नि-वेश! तत्स्वभावादुदकं क्लेदयति, लवणं विष्यन्दयति, क्षारः पाचयति, मधु संदधाति सर्पिः स्नेहयति, क्षीरं जीवयति, मांसं बृंहयति, रसः प्रीणयति, सुरा जर्जराकरोति, शीधुरवधमयति, द्राक्षासवो दीपयति, फाणितमाचिनोति, दधि शोफं जनयति, पिण्याकशाकं ग्लपयति, प्रभू-वान्तलो माषसूपः दृष्टिशुक्रघ्नः क्षारः, प्रायः पित्तलमम्लमन्यत्र दाडि-मामलकात्, प्रायो मधुरं श्लेष्मलमन्यत्र मधुनः पुराणाश्च शालियवगो- धूमात् प्रायः सर्व तिक्तं वातलमवृष्यं चान्यत्र वेत्राग्रपटोलात्, प्रायः कटुकं वातलमवृष्यं चान्यत्र पिप्पलीविश्वभेषजात् ॥ ४ ॥
इसलिये हे अग्निवेश! हितकारी और अहितकारी विषयका शान करनेके लिये अन्न-पान विधि को विस्तार से कहते हैं । स्वाभाविक रीति से जल (क्लिन्नता) उत्पन्न करता है । लवण विष्यन्द ( नरम बनाना, जलस्राव उत्पन्न ) करता है । चार पाचन करता है, शहद जोड़ता है, घी चिकना बनाता है । दूध जीवन देता है, मांस वृंहण पोषण देता है । रस क्षीणता को पुष्ट करता है । मद्य शरीर को जीर्ण करता है । [ सिरका ] शरीर का लेखन करता है, द्राक्षासव अग्नि को बढ़ाता है । सूत्रस्थान इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय ( ८ । सू० १६ ) में (' नारन- त्यादि भोजन करने के सम्बन्ध में उचित विधान किया है ।
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३२४ चरकसंहिता [अ० २७ फाणित [ ब ] वात, पित्त, कफ इन को बढ़ाता है, दही सूजन को उत्पन्न करता है । पिण्याक (तिलकल्क ) और हरे शाक प्रसन्नता का नाश करते हैं । उड़द की दाल मल को विशेष रूप से उत्पन्न करती है । चार नेत्र और शुक्र को नाश करते हैं । अनार और आंवले को छोड़ कर प्रायः सब अम्ल पित्तका-रक हैं । मधु और पुराने चावल, जौ और गेहूं को छोड़कर प्रायः करके मधुर रस कफकारक होता है, बेंत के अग्रिम भाग और परवल को छोड़ प्रायः करके सब तिक्त रस वायुकारक और शुक्रनाशक होते हैं । निप्पली और सोंठ को छोड़ कर प्राय: करके सब कटु रस वायुकारक तथा शुक्रनाशक हैं ॥। ४ ॥ परमतो वर्गसंग्रहेणाहारद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥
शूकधान्य-शमीधान्य- मांस -शाक-फलाश्रयान् ।
वर्गान् हरित मद्याम्बु -गोरसेक्षु - विकारिकान् ॥ ६ ॥
दश द्वौ च परौ वर्गों कृतान्नाहारयोगिनाम् ।
रसवीर्यविपाकै प्रभावैश्च प्रचक्ष्महे ॥ ७ ॥
इस के आगे वर्गक्रम से आहार पदार्थों की व्याख्या करेंगे । यथा -शूक-वर्ग, शमीधान्यवर्ग, मांसवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, हरितवर्ग, मद्यवर्ग, अम्बुवर्ग, गोरसवर्ग, इक्षुविकारवर्ग, कृतान्नवर्ग और आहारयोगवर्ग । इन बारह वर्गों में सब द्रव्यों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का वर्णन करेंगे ॥ ५-७ ॥
अथ शूकधान्यवर्गः- रक्तशालिर्महाशालिः कलमः शकुनाहृतः ।
तूर्णको दीर्घशुकश्च गौरः पाण्डूकलाङ्गली ॥ ८ ॥
सुगन्धिका लाहवालाः शारिवाख्याः प्रमोदकाः ।
पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ ६ ॥
शीता रसे विपाके च मधुराः स्वल्पमारुताः ।
बद्धाल्पवर्चसः स्निग्धा बृंहणाः शुक्रमूत्रलाः ॥ १० ॥
रक्तशालिर्वरस्तेषां तृष्णास्त्रिमलापहः ।
मस्तस्यानु कलमस्तस्याप्यनु ततः परे ॥ ११ ॥
यवका हायनाः पांशुबाप्या नैषधकादयः ।
शालीनां शालयः कुर्वन्त्यनुकारं गुणागुणैः ॥ १२ ॥
शीतः निघोऽगुरुः स्वादुत्रिदोषघ्नः स्थिरात्मकः ।
षष्टिकः प्रवरो गौरः कृष्णगौरस्ततोऽनु च ॥ १३ ॥
वरकोद्दालकौ चीन- शारदोज्ज्वल- दर्दुराः ।
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२५ गन्धलाः कुरुविन्दाश्च षष्टिकाल्पान्तर गुणः ॥ १४ ॥
मधुरश्याम्लपाकश्च ब्रीहिः पित्तकरो गुरुः ।
बहुमूत्रपुरीषोमा त्रिदोषस्त्वेव पाटलः ॥ १५ ॥
सको दुषः श्यामाकः कषायमधुरो लघुः ।
वातलः कफपित्तघ्नः शीतः संग्राहिशोषणः ॥ १६ ॥
हस्ति - श्यामाक- नीवार - तोय-पण गवेधुकाः प्रशातिकाम्भः श्यामाक-लोहिताणु-प्रियङ्गवः ॥ १७ ॥
मुकुन्दो झिण्टिगर्मुटी चारुका वरकास्तथा ।
शिबिरोत्कटजूर्णाह्वाः श्यामाकसदृशा गुणैः ॥ १८ ॥
रूक्षः शीतोऽगुरुःस्वादुर्बहुवातशकृद्यवः ।
स्थैर्ये कृत्सकषायस्तु बल्यः श्लेष्मविकारनुत् ॥ १६ ॥
रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपित्तहा ।
मेदः क्रिमिविषघ्नश्च बल्यो वेणुयवो मतः ॥ २० ॥
सन्धानद्वातहरो गोधूमः स्वादुशीतलः ।
जीवनो बृंहणो वृष्यः स्निग्धः स्थेर्यकरो गुरुः ॥ २१ ॥
नन्दीमुखी मधूलीच मधुरस्निग्धशीतले ।
इत्ययं शुकधान्यानां पूर्वी वर्गः समाप्यते ॥ २२ ॥
रक्तशालि, महाशालि, कलम, शकुनाहृत, तूर्णक, दोर्घशुक, गौर, पाण्डुक, लांगुल, सुगन्धिकर ( हंसराज ), लोहवाल, शारिवा, प्रमोदक, पतंग और तपनीय तथा अन्य उत्तम शालि ( चावल ) ठण्डे रस और विपाक में मधुर, किंचित् वातकारक,स्निग्ध, पुष्टिकारक, शुक्र और मूत्रवर्द्धक हैं । मल को थोड़ा उत्पन्न करनेवाले एवं रोकने वाले हैं ( मधुर विपाक होने से कब्ज़ करना प्रभाव से है ) । इन सब चावलों में लाल चावल श्रेष्ठ हैं, ये लाल चावल तृषानाशक और त्रिदोषनाशक हैं । इन से उतर कर महान् शालि, फिर कलम और फिर उत्तरोत्तर गुण न्यून होते गये हैं । यवक, १ हायन, पांसु, वाप्य, नैषध आदि चावल ( मोटे धान्य ) लाल चावल आदि के विपरीत गुण करते हैं । अर्थात् लाल चावल, तृषानाशक और त्रिदोषहारक हैं और ये इन के बिरुद्ध गुण वाले हैं । ( ३ ) षष्टिक ( साठी ग्रीष्म ऋतु में पकने वाले ) धान्य शीत, लघु, १. यहां पर दिये हुए नाम नाना देशों में प्रसिद्ध हैं । इसलिये सत्र का "लिखना असम्भव है । 'शालि है मन्तं धान्यम्, षष्टिकादयश्च ग्रीष्मकाः, दाइन में यही भेद है ।
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३२६ चरकसंहिता [अ०२७ मधुर, त्रिदोष नाशक, शरीर को दृढ़ करने वाले हैं । इन में श्वेत साठी श्रेष्ठ हैं, और काली जाति के धान्य इन से हीन गुण वाले हैं, ( ४ ) वरक, उद्दा-लक, चीन; शारद, उज्ज्वल, दर्दुर, गन्धक और कुरुविन्द ये षष्ठिक धान्यों की जातियां हैं । ये गुणों में हीनगुण वाले होते हैं । ( ५ ) व्रीहि ( शरद् ऋतु में पकने वाले ) यावल, मधुर रस, अम्लपाकी, पित्तकारक गुरु हैं । इनमें पाटल जाति का धान्य मल- मूत्रवर्द्धक और त्रिदोषकारक है । ( ५ ) को दूष ( कोद्रव कुधान्य कोदों ). श्यामाक ( सांवक ) ये धान्य कषाय और मधुर रस, लघु, वायुकारक, कफ-पित्तनाशक, शीतवीर्य, संग्राही और शोषक हैं । ( ६ ) हस्ति, सांवक, नीवार ( देवभात ), तोयपर्णी, गवेधुक, प्रशातिका; अम्भःश्यामाक, लोहिताणु, प्रियंगु ( कांग ), मुकुन्द, झिंटी, गर्मुटी, चारुक, वरक, शिविर, उत्कट, जूर्णाह्न ( जोनार ) ये सब धान्य गुणों में सांवक के समान हैं । ( ७ ) जी रूक्ष, शीत, गुरु, मधुर रस, वायु और मल-कारक, शरोर को स्थिर करने वाले, कषाय रख, बल कारक और कफजन्य विकारों को नाश करने वाले हैं । वेणुयव रूक्ष, मधुर, कषाय अनुरस, कफ-पित्तनाशक, मेद, कृमि और विष के नाशक एवं बलकारक हैं । ( ८ ) गेहूँ- टूटे हुए को मिलाने वाला, वातनाशक, स्वादु रस, शीत वीर्य जीवनीय, बृंहण-कारक, वृष्य, शुक्रवर्द्धक, स्निग्ध, स्थिरताकारक गुरु है । नान्दीमुखी और मधूली ये दोनों मधुर, स्निग्ध, शीतल हैं । यह शुकधान्धों का पहिला वर्ग समाप्त हुआ ॥ ८-२२ ॥ इति शूकधान्यवर्गः । अथ शमीधान्यवर्गः ।
कषायमधुरो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ।
विशदः श्लेष्मपित्तघ्नो मुद्गः सूयोत्तमो मतः ॥ २३ ॥
वृष्यः परं वातहरः स्निग्धोष्णमधुरो गुरुः ।
बल्यो बहुमलः पुस्त्वं माषः शीघ्रं ददाति च ॥ २४ ॥
राजमाषः सरो रुच्यः कफ-शुक्राम्ल पित्तकृत् ।
तत्स्वादुर्वातलो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ २५ ॥
उष्णाः कषायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः ।
कुलत्था प्राहिणः कास-हिक्काश्वासार्शसां हिताः ॥ २६ ॥
मधुरा मधुराः पाकैर्ब्राहिणोरूक्षशीवलाः ।
मकुष्ठकाः प्रशस्यन्ते रक्त पित्त -ज्वरादिषु ॥ २७ ॥
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२७
चणकाश्च मसूराच खण्डिकाः सहरेणवः ।
लघवः शीतमधुराः सकपाया विरूक्षणाः ॥ २८ ॥
पित्तश्लेष्मणि शस्यन्ते सूपेष्वालेपनेषु च ।
तेषां मसूरः संग्राही कलायो वातलः परः ॥ २६ ॥
त्रिग्घोष्णमधुरस्तिक्तः कषायः कटुकस्तिलः ।
त्वच्यः केश्यश्च बल्यश्च वावन्नः कफपित्तकृत् ॥ ३० ॥
गुर्योऽथ मधुराऽशीता बलन्यो रूक्षणात्मिकाः ।
सस्नेहा बलिभिर्भाज्या विविधाः शिम्विजातयः ॥ ३१ ॥
शिम्बी रूक्षा कषाया च कोष्ठवातप्रकोपिनी ।
न च वृष्या न चक्षुष्या विष्टभ्य च विपच्यते ॥ ३२ ॥
आढकी कफपित्तघ्नी वातला कफवातनुन् ।
अवल्गुजः सैडगजो, निष्पावा वातपित्तलाः ॥ ३३ ॥
काकाण्डोलात्मगुमानां माषवत्फलमादिशेत् ।
द्वितीयोऽयं शमाधान्यवर्गः प्रोक्ता महर्षिणा ॥ ३४ ॥
शमीधान्य वर्ग - १. मूंग कपाय, मधुर रस, रूक्ष, शीत, विपाक में कटु, लघु, स्वच्छ, श्लेष्म पित्तनाशक ओर दालों में सब से उत्तम और शमीधान्यों में भी उत्तम है । २. उड़द- अत्यन्त वृष्य, वातनाशक, स्निग्व; उष्ण, मधुर और गुरु हैं; ये बलकारक, अधिकमात्रा में मल उत्पन्न करने वाले,और पुरुषत्व को शीघ्र उत्पन्न करने वाले हैं । राजमाष मत्र-मेदक, रुचिकर, कफ, वीर्य और करने समान मधुर , अम्लपित्तऔर कोहैं । कुलत्थीवाले, उड़दकषाय केरख, विपाक में, वायुकारक अम्ल कफ, रूक्ष शुक्रस्वच्छ, कषायऔर, (,,, वायुनाशक, मादीगुरु संग्राही ) तथा कास श्वास हिचकी अर्श रोग में हितकारी है । मोठ मधुर रस, मधुर विपाक, संग्राहि, रूच, शीतल, रक्तपित्त तथा ज्वर में प्रशस्त हैं । चने, मसूर, खण्डिक त्रिपुट ( फाफरा ) और मटर लघु, शीतवीर्य, मधुर, कषाय रस, रूश्च, कफ-पित्त में हितकारी हैं । इन का उपयोग दाल में तथा लेप में होता है । इन में मसूर सब से अधिक संग्राही और मटर १. वृष्य वस्तु तीन प्रकार की होती है । यथा- शुक्रस्रुतिकरं किञ्चित् किञ्चिच्छुक्रविवर्धनम् । तिवृद्धिकरं किञ्चित् त्रिविधं वृष्यमुच्यते ॥ कोई वस्तु शुक्र का क्षरण करती, कोई शुक्र को बढ़ाती है और कोई दोनों है । उड़द में तीनों प्रकार के गुण हैं ।
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३२८ चरकसंहिता [ अ० २७ सब से अधिक वायुकारक है । तिल ( काले तिल ' ) स्निग्ध, उष्ण, मधुर रस, तीक्ष्ण, कषाय, तिक्त, त्वचा और बालों के लिये हितकारी, शक्तिदायक, वात-नाशक तथा कफ-पित्तवर्द्धक हैं । यहां पर कहे हुए शमीधान्यों के सिवाय जो दूसरे गोल जाति के धान्य हैं, वे सब गुरु, मधुर, उष्ण, बलनाशक, रूच, स्निग्ध, शक्तिशाली पुरुषों के खाने लायक हैं । सामान्यतः शिम्बीधान्य रूक्ष, कषाय, कोष्ठ में वायु का प्रकोप करने वाले, अवृष्य, नेत्रों के लिये अहितकारी और पचने तक मल मूत्र का अवरोध करने वाले है । अरहर ( तुअर ) कफ-पित्तनाशक, वायुकारक है । बाबची, चक्रमर्द के बीज, कफ वायुनाशक हैं । निष्पाव ( सफेद बाल लोभिया ) पिचकारक, वायुकारक हैं । काकाण्ड ( शूकरशिम्बी, कौंच ), उमा ( अलसी ), और कौंच इन का गुण उड़द के अनुसार है । इस प्रकार आत्रेय ऋषि ने शमीधान्य का दूसरा वर्ग कह दिया ॥ २३-३४ ॥ इति शमीधान्यवर्गः । अथ मांसवर्गः ।
गोखराश्वतश्वाश्व द्वीपि सिंहर्क्ष -वानराः ।
वृको व्याघ्रस्तरश्च बभ्रु-मार्जार-मूषिकाः ॥ ३५ ॥
लोपाको जम्बुकः श्येनो वान्तादश्चाष वायसौ ।
शशी मधुहा भासो गृधोलूक -कुलिङ्गकाः ॥ ३६ ॥
धूमीका कुररश्चेति प्रसद्दा मृगपक्षिणः । गाय, गधा, घोड़ा, ऊंठ, खच्चर, चीता, सिंह, भालु रीछ, बानर, मेड़िया, व्याघ्र, तरक्षु ( व्याघ्रभेद ), बभ्रु ( जिस के ऊपर बहुत सा बाल होते हैं ), बिल्ली, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, बाज, कुत्ता, चाप ( नीलकण्ठ ), कोवा, शशनी ( बाज़ चील ), कुरर ( भास ), मधुद्दा, गीध, उल्लू, कुलिंग ( बगुला की जाति ), धूमिका, कुरर ये 'प्रसह' श्रेणी के पशु पक्षी हैं ॥ ३५-३६ ॥ श्वेतः श्यामचित्रपृष्टः कालकः काकुली मृगः ॥ ३७ ॥
कृका चिल्लो भेको गोधा शल्लकगाण्डको ।
कदली नकुलः श्वाविदिति भूमिशयाः स्मृताः ॥ ३८ ॥
१. तिलों में काले तिल अच्छे हैं-- “ तिलेषु सर्वेष्वसितः प्रधानो मध्यः सितो, हीनतरास्ततोऽन्ये ।
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम ३२६ काकुलीमृग (माल्या सर्प) की चार श्रेणियां हैं यथा -- श्वेत, काली, चित-कचरी और कालक, कुर्थीका चिल्लट ( चियार ), मेंढक, शल्लक, गोह, गाण्डक ( गोह का भेद, सर्पणी ), कदली, नेवला, श्वावित् ये भूमिशय या बिलेशय अर्थात् बिल में रहनेवाले हैं ॥ ३७-३८ ॥
सृमरश्चमरः खड्गो महिषो गयो गजः ।
न्यङ्कुर्बराहश्चानूपा मृगाः सर्वे रुरुस्तथा ॥ ३६ ॥
सृमर: ( सूबर ) चमर ( चमरिया गाय ), गेंदा, भैसा, नील गाय, हाथी न्यंकु ( हरिण ), सुअर ( छोटा ) और रूरु ( बारह सींगा ) ये सब 'आनूप' अर्थात् जल बहुल प्रदेश के पशु हैं ॥३६॥
कूर्मः कर्कटको मत्स्यः शिशुमारस्तिमिङ्गिलः ।
शुक्ति-शङ्खद्र कुम्भीर- चुलुकी- मकरादयः ॥ ४० ॥
इति वारिशयाः प्रोक्ताः, वक्ष्यन्ते वारिचारिणः । कछुआ, कैकड़ा, मछली, तिमिगिल ( मछली भेद ), सीप शंखमें होने वाले जन्तु शिशुमार, उद्र ( जल बिदाल, ऊदबिलाव ) कुम्भीर ( नाका ), चुलुकी, और मकर ये ' बारिशय ' अर्थात्जल में रहने वाले जन्तु हैं । पानी पर रहने वाले प्राणियों के नाम कहते हैं ॥ ४० ॥
हंसः क्रौञ्च बलाका च बकः कारण्डवः सवः ॥ ४१ ॥
शरारिः पुष्कराश्च केशरी मानतुण्डकः ।
मृणालकण्ठो मद्गुच कादम्बः काकतुण्डकः ॥। ४२ ॥
उत्क्रोशः पुण्डरीकाक्षो मेघरावोऽम्बुकुक्कुटी ।
आरा नन्दीमुखी वाटी सुमुखाः सहचारिणः ॥ ४३ ॥
रोहिणी कामकाली च सारसो रक्तशीर्षकः ।
चक्रवाकास्तथाऽन्ये च खगाः सन्त्यम्बुचारिणः ॥ ४४ ॥
हंस, कौंच, बलाका, बगुल्ला, कारण्डव ( हंसभेद बत्तख ), लव, शरारि, पुष्कराह, केशरी, मानतुण्डक, मद्गु ( जलकौवा ), कादम्ब, काकतुण्ड, उत्क्रोश ( कुरल ), पुण्डरीकाक्ष, मेघराव ( मेघनाद मोर ), अम्बुकुक्कटी (पानी की मुर्गी ), आरा, नन्दीमुखी, वाटी, सुमुख, सहचारी, रोहिणी, कामकाली, सारस, लाल शिर वाला सारस, चक्रवाक ( चकवा ) और अन्य जलचर पक्षी नीमें विचरने वाले हैं ॥ ४१-४४॥
पृषतः शरभो रामः श्वदंष्ट्रा मृगमातृका ।
शरण कुरङ्ग गोकर्णः कोट्टकारकः ॥ ४५ ॥
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३३० चरकसंहिता [अ० २७
चारुको हरिणैणौ च शम्बरः कालपुच्छकः ।
ऋष्व वरपोतश्च विज्ञेया जाङ्गला मृगाः ॥ ४६ ॥
चित विरंगे हरिण, शरभ ( आठ पांव का ऊंठ के आकार का मोटे सींगों का एक हरिण, इस के पीठ में चार पाये होते हैं, काश्मीर देश में प्रसिद्ध है ), राम ( हिमालय का महामृग ) श्वदंष्ट्रा ( चार दांत का एक जाति का पशु ), मृगमातृका ( छोटा-मोटे उदर वाला पशु ), शश हरिण, कुरङ ( हरिणमेद ) गोकर्ण ( गाय के से मुख का हरिण ), कोट्टकारक, चारुष्क, हरिण, एण, शम्बर ( सांभर ), कालपुच्छ, ऋष्य और वरपोत ये जंगली मृग हैं । यहां पर शश- शब्द मृगवाची है । जैसे चन्द्रमा को शशांक और मृगाङ्क कहते हैं इसमें वस्तु तो एक होनी चाहिये या तो शशका चिन्ह हो या मृग का ॥ ४५-४६ ॥
लावो वर्ती बकश्चैव वार्तीकः सकपिञ्जलः ।
चकोरश्वोपचक्रश्च कुक्कुभो रक्तवर्णकः ॥ ४७ ॥
लावाद्या विष्किरास्त्वेते वक्ष्यन्ते वर्तकादयः ।
वर्तको वर्तिका व बहीं तित्तिरिकुक्कुटो ॥ ४८ ॥
कङ्क- सारपदेन्द्राभ-गोनर्द-गिरिवर्तकाः क्रकरोऽवकरचैव वारटाश्चेति विष्किराः ॥ ४६ ॥
बटेर, वर्त्ती ( तीतर ), बक ( बगुला ), वार्तीक ( बतख ), कपिञ्जल (श्वेत तीतर), चकोर, उपचक्र (चकोर मेद ), कुक्कुम, रक्तवर्णक, विष्किर पक्षी हैं । वर्त्तक ( बटेर ), वर्त्तिका, बहीं ( मोर ), तीतर, कुकुट, कक, सारपद, इन्द्राभ, गोनर्द, गिरिवर्त्तक, कर, अवकर और वारटा से सब मुर्गा जाति के ' विष्किर' पक्षी हैं ॥ ४७-४९ ॥
शतपत्रो भृङ्गराजः कोयष्टी जीवजीवकः ।
कैरातः कोकिलोऽत्यूहो गोपापुत्रः प्रियात्मजः ॥ ५० ॥
लट्वा टूषको बहा डिण्डिमानकः ।
जटी दुन्दुभिवा ( पा ) कार-लोह- पृष्ठ-कुलिङ्गकाः ॥ ५१ ॥
कपोत- शुक- सारङ्गाश्विरिटी ककुयष्टिकाः ।
शारिका कलविङ्कच चटकोऽङ्गारचूडकः ॥ ५२ ॥
पारावतः पानविक इत्युक्ताः प्रतुदा द्विजाः । शतपत्र ( कटफोड़ा ) भृंगराज ( भांवरा ), कोयष्टि ( कोड़ा ) जीवजी कैरात, कोकिल, अत्यूहा, गोपापुत्र, प्रियात्मज, लट्वा, लटूबक, बभ्रु पक्षी, पीले बालोंवाला पक्षी ), मटहा डिंडिमानक ( उत्कट
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अ ० २७ ] सूत्रस्थानम ३३१ दुन्दुभि, वाकार, लोहपृष्ठ, कुलिंग, कबूतर, तोता, चारक, चिरिटा, ककुयष्टिक, सारिका, कलर्विक, चटक, अंगारचूड़क ( बुलबुल ), पारावत, पानविक ये सब
'प्रतुद' पक्षी हैं । ५०-५२ ॥
प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसहास्तेन संज्ञिताः ॥ ५३ ॥
भूशया बिलवासित्वादानूपाऽनूपसंश्रयात् ।
जले निवासाज्जलजा जलेचर्याज्जलेचराः ॥ ५४ ॥
स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जाङ्गलचारिणः ।
विकीर्य विष्किराचैव प्रतुद्य प्रतुदाः स्मृताः ॥ ५५ ॥
योनिरष्टविधा त्वेषां मांसानां परिकीर्तिता । गाय, घोड़ा,बाघ आदि प्राणी भक्ष्य दृष्टि से एकदम जोर से खाने पर गिरते हैं, इसलिये इनको 'प्रसह ' कहते हैं । सांप, मेंढक आदि बिल में रहते हैं, इस-लिये इनको ' बिलेशय' कहते हैं । हाथी भैंसा आदि प्राणी पानी के आश्रय से रहते हैं, इसलिये इनको ' आनून' कहते हैं । पानी में रहने से 'जलज', जल में चरने विचरने से 'जलचर', स्थलभूमि पर चलने वाले जंगल में फिरने वाले पशुओं को 'जांगल' कहते हैं । तीतर आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को बिखेर कर खाते हैं, इसलिये 'विष्किर' और तोता आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को चोंच से तोड़कर खाते हैं इस लिये 'प्रतुद' कहलाते हैं । इस प्रकार से मांस के आठ उत्पत्तिस्थान हैं ॥ ५३-५५ ॥ प्रसद्दा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ॥ ५६ ॥
गुरूष्ण-स्निग्ध -मधुरा बलोपचयवर्धनाः ।
वृष्याः परं वातहराः कफपित्ताभिवर्धिनः ॥ ५७ ॥
हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्ताग्नयश्च ये ।
प्रसानां विशेषेण मांस मांसाशिनां भिषक् ॥ ५८ ॥
जीर्णार्शो- प्रहणी -दोष -शोषार्तानां प्रयोजयेत् ।
लावायो बैक वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः ॥ ५६ ॥
लघवः शीतमधुराः सकषाया हिता नृणाम् ।
पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ॥ ६० ॥
विष्किरावर्तकाद्यास्तु प्रसहाल्पान्तरा गुणैः ।
नातिशीत गुरु-स्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६१ ॥
शरीर धातु सामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् ।
मधुरशीतत्वाद् गुरु बृंहणमाविकम् ॥ ६२ ॥
खजाविके मिश्रगोचरत्वादनिश्चिते ।
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चरकसंहिता [अ० २७ सामान्येनोपदिष्टानां मांसानां स्वगुणैः पृथक् ॥ ६३ ॥
केषांचिद् गुणवैशेष्याद्विशेष उपदेक्ष्यते ।
दर्शन श्रोत्र-मेधाग्नि- वयो- वर्ण-स्वरायुषाम् ॥ ६४ ॥
aff हिततो बल्यो वातघ्नो मांसशुक्रलः ।
गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुराः स्वर - वर्ण- बल- प्रदाः ॥ ६५ ॥
बृंहणाः शुक्रलाचोक्ता हंसा मारुतनाशनाः ।
स्निग्धाश्रोष्णाच वृष्या च बृंहणाः स्वरबोधनाः ॥ ६६ ।
बल्याः परं वातहराः स्वेदनाश्चरणायुधाः ।
गुरूष्णमधुरो नातिधन्वानूपनिषेवणात् ॥ ६७ ॥
तित्तिरिः संजयेच्छीघ्रं त्रीन् दोषाननिलोल्बणान् ।
पित्तश्लेष्मविकारेषु सरतेषु कपिञ्जलाः ॥ ६८ ॥
मन्दवातेषु शस्यन्ते शैत्य-माधुर्य-लाघवात् ।
लावाः कषायमधुरा लघवोऽग्निविवर्धनाः ॥ ६६ ॥
सन्निपातप्रशमनाः कटुकाश्च विपाकतः ।
कषायमधुराः शीतारक्तपित्तनिबर्हणाः ॥ ७० ॥
विपाके मधुराचैव कपोता गृहवासिनः ।
तेभ्यो लघुतराः किंचित्कपोता वनवासिनः ॥ ७१ ॥
शीताः संग्राहिणश्चैव स्वल्पमूत्रकराश्च ते ।
शुकमसिं कषायाम्लं विपाके रूक्षशीतलम् ॥ ७२ ॥।
शोष -कास - क्षय हितं संग्राहि लघु दीपनम् ।
कषायो विशदो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ॥ ७३ ॥
शशः स्वादुः प्रशस्तश्च संनिपातेऽनिलावरे ।
चटका मधुराः स्निग्धा बलशुक्रविवर्धनाः ॥ ७४ ॥
सन्निपातप्रशमनाः शमना मारुतस्य च ।
मधुरामधुराः पाके त्रिदोषशमनाः शिवाः ॥ ७५ ॥
लघवो बद्धविण्मूत्राः शीतार्श्वणाः प्रकीर्तिताः गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका रसे ॥ ७६ ॥
बात -पित्त- प्रशमनी बृंहणी बलवर्धनी ।
शलको मधुराम्लश्च विपाके कटुकः स्मृतः ॥ ७७ ॥
बात-पित्त-कफघ्नच कास श्वास-हरस्तथा ।
गुरूष्णमधुरा बल्या बृंहणा पवनापहाः ॥ ७८ ॥