चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 351–360
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 351–360
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सूत्रस्थानम् ३३३ अ० २७ J
मत्स्याःस्निग्धाच वृष्याश्च बहुदोषाः प्रकीर्तिताः ।
शैवलाहारभोजित्वात्स्वप्नस्य च विवर्जनात् ॥ ७° ॥
रोहितो दीपनीयश्च लघुपाको महाबलः ।
स्नेहनं बृंहणं वृष्यं श्रमघ्नमनिलापहम् ॥ ८० ॥
वराहपिशितं बल्यं रोचनं स्वेदनं गुरु ।
बल्यो वातहरो वृष्यश्चक्षुष्यो बलवर्धनः ॥ ८१ ॥
मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोषघ्नः कूर्म उच्यते ।
गव्यं केवलवातेषु पीनसे विषमज्वरे ॥ ८२ ॥
शुष्क- कास-श्रमात्यग्नि-मांस-क्षय-हितं च तत् ।
स्निग्धोष्णमधुरं वृष्यं माहिषं गुरु तर्पणम् ' ॥ ८३ ॥
दा बृहत्त्वमुत्साहं स्वप्नं च जनयत्यपि ।
धार्तराष्ट्रचकोराणां दक्षाणां शिखिनामपि ॥ ८४ ॥
चटकानां च यानि स्युरण्डानि च हितानि च ।
रेतःक्षीणेषु कासेषु दृद्रोगेषु क्षतेषु च ॥ ८५ ॥
मधुराण्यविदाहीनि २ सद्यो बलकराणि च ।
शरीरबृंहणे नान्यदाद्यं मांसाद्विशिष्यते ।
इति वर्गस्तृतीयोऽयं मांसानां परिकीर्तितः ॥ ८६ ॥
इनमें प्रसद्द, भूशय, आनूप, जलज और जलचर प्राणियों का मांस गुरू, स्निग्ध, मधुर, शक्ति बढ़ाने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक, कफपित्त को बढ़ाने वाला है, इनका मांस नित्य प्रति व्यायाम करने वाले, जिनकी जाठराग्नि प्रदीप्त हो, उनके लिये हितकारी है । 'प्रसह ' जानवर दो प्रकार के हैं । एक मांस खाने वाले सिंह आदि, दूसरे मांस न खाने वाले गाय आदि । इनमें क्षयमांस खाने वाले 'प्रसह ' पक्षी या पशुओं का मांस पुराने अर्श रोग, ग्रहणी रोग,, या निर्बल पुरुष के लिये उपकारी है । लावा ( बटेर ) आदि विष्किरवर्ग के पक्षी, प्रतुदपक्षी, जांगलदेश के पशु इनका मांस लघु, शीतल, मधुर कषाय रस, और पित्तप्रधान, मध्यम वात, कनिष्ठ कफ वाले सन्निपात में हितकारी है । बटेर आदि समस्त विष्किर पक्षियों का मांस ' सह' श्रेणो के मांसों से गुणों में मिलता है, थोड़ा ही अन्तर है । करी का मांस बहुत ठण्डा नहीं, बहुत भारी नहीं, बहुत स्निग्ध नहीं, कुछ ठण्डा, कुछ गुरु और कुछ स्निग्ध है) इसलिये वह दोषों को कुपित पाठः । २. मधुराण्यविपाकीनि इति पाठः । ३. खाद्यं इति पाठः ।
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३३४ चरकसंहिता [अ० २७ नहीं करता, कफ को उत्पन्न नहीं करता । उक्त गुणों के कारण मनुष्यों के मांस के समान धातुओं वाला है, जो गुण मनुष्य के धातुओं के हैं, वे ही गुण बकरी के मांस के हैं इसलिये पुष्टिकारक है । भेड़ का मांस मधुर, ठण्डा और भारी है । मधुर और शीतल होने से पित्तनाशक ' है । बकरी और भेड़ के मिश्रित स्थान में चरने से मांस का गुण अनिश्चित है, फिर भी सामान्य रूप से कह दिया । और जो मांस अपने गुणों में विशेषता रखते हैं उन को कहते हैं । मोर का मांस - आंख, कान, मेघा, अग्नि, तारुण्य, वर्ण, स्वर और आयु के लिये हितकारी; बलकारक, वायुनाशक और मांस एवं शुक्रवर्धक है । हंस का मांस गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, स्वर, वर्ण, बल को बढ़ाने वाला, बृंहण पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक और वातनाशक है । कुक्कुट का मांस स्निग्ध, उष्ण, वृष्य, पुष्टिकारक, स्वर को अच्छा करने वाला, बलकारक और विशेषतः वात-नाशक तथा पसीना लाता है । तित्तिर पक्षी का ( मरुभूमि और आनूप देश दोनों स्थानों में रहने से ) मांस मध्यम गुरु, मध्यम उष्ण और मध्यम मधुर है, वातप्रधान सन्निपात को शीघ्र शान्त करता है । कपिंजल पची का मांस -ठण्डा, मधुर और लघु होने से वात का जोर कम होने पर रक्तयुक्त पित्त या रक्तयुक्त कफ विकार में प्रशस्त है । लावा ( बटेर ), कषाय, मधुर, लघु, अग्निवर्धक, निपात को शमन करने वाले और विपाक में कटु हैं । घर में पाले हुए कबूतरों का मांस - कषाय, विशद, शीत, रक्तपित्तनाशक, मधुर विपाक वाला होता है । और जो कबूतर जंगल में रहते हैं, उन का मांस इन से कुछ हल्का और शीतल, संग्राही और मूत्र को कम करने वाला होता है । तोते का मांस - कषाय, विपाक में अम्ल, रूक्ष, ठण्डा, शोष, क्षय, दमा, मैं हितकारी, स्तम्भक, हल्का, दीपक होता है । खरगोश का मांस - कषाय, स्वच्छ, रूक्ष, शीतल, विपाक में कटु, हल्का, मधुर और होनवायु सन्निपात में प्रशस्त है । चिड़िया का मांस— मधुर, स्निग्ध, शक्ति व वीर्य को बढ़ाने वाला, सन्नि- १. सुश्रुत में भी कहा है- " बृंहणं मांसमौरभ्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु" । २. मिश्र-गोचरत्वात् - बकरी या मेद आनूप और मह दोनों प्रदेशों में रहती है । इसलिये इन की योनि निश्चित नहीं है । तित्तिर पक्षी धन्वर आनूप किसी एक स्थान पर रहता है, ऐसा निश्चित करके कहा जा. इसलिये वह इस श्रेणी में नहीं है ।
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५ P पात को शान्त करने वाला और विशेषतः वायुनाशक है ' । शिवा ( गीदड़ ) का मांस — मधुर रस, मधुर विपाक, त्रिदोषनाशक है । काले हरिण का मांस-हल्का, मल मूत्र को रोकने वाला और शीतल होता है । गोह का मांस - विपाक में मधुर, कषाय, कटु रस, वात- पित्तनाशक, पुष्टिकारक, बल- वर्धक है । शल्लकी का मांस - मधुर अम्लरस, विपाक में कटु, त्रिदोषनाशक, श्वास- कास नाशक है । मछलियों का मांस - गुरु, उष्ण, मधुर, बलकारक, पुष्टिकारक, वायुनाशक, स्निग्ध, वृष्य, वीर्यवर्धक और बहुत से दोषों को उत्पन्न करने वाला है । रोहू मछली का मांस -शैवाल ( सरवाल ) का भोजन करने से, कभी न सोने से, दीपनीय, अभिवर्धक, पचने में लघु और बहुत बल देने वाला है । सूअर का मांस - स्नेहन, बृंहण, वीर्यवर्धक, थकान और वायुनाशक बलकारक, रुचिकर और बहुत पसीना लाने वाला है । कछुए का मांस -बल- कारक, वातनाशक, वीर्यवर्धक, आंखों के लिये हितकारी, बलवर्धक, मेधा, बुद्धि और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, आयु के लिये हितकारी, घोषनाशक है । गाय का मांस-— केवल वात रोगों में, पीनस में, विषम ज्वर में, सूखी खांसीमें, कान में, अभि या मांस के बहुत अधिक क्षय हो जाने में हितकारी है । भैंस का मांस - स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वीर्यवर्धक, भारी, पुष्टिदायक, शरीर में दृढ़ता, पुष्टि, उत्साहवर्धक और नींद लाने वाला है । हंस ( जिन के पांव और चोंच काले होते हैं ) चकोर, बत्तख, मोर और चिड़ियां इनके अण्डे वीर्य की क्षीणता में, कास रोग में, हृदय रोग में, क्षत ( उरःक्षत ) में हितकारी हैं । ये अण्डे मधुर अविपाकी और तत्काल बलदायक हैं । खाद्य पदार्थ में शरीर को पुष्ट करने के लिये मांस से बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है । यह तीसरा मांस- वर्ग कह दिया || ५६-८६॥ इतिमांसवर्गः । अथ शाकवर्गः ।
पाठा शुषा शटीशाकं वास्तुकं सुनिषण्णकम् ।
विद्याद् माहि त्रिदोषघ्नं भिन्नवर्चस्तु वास्तुकम् ॥ ८७ ॥
त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ।
नात्युष्णशीतवीर्या च भेदिनी कुष्ठनाशनी ॥ ८८ ॥
राक्षकशाक' तु त्रिदोषशमनं लघु ॥
के लिये - "तृप्तिं चरकमांसानां गत्वा योऽनु पिबेत्पयः । ”
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चरकसंहिता [अ० २७ प्राहि शस्तं विशेषेण ग्रहण्यशविकारिणाम् ॥ ८६ ॥
कालशाक' तु कटुक' दीपनं गरशोफजित् ।
घूर्ण वातलं रूक्षं कालीयं शाकमुच्यते ॥ ६० ॥
दीपनी चोष्णवीर्या च प्राहिणी कफमारुते ।
प्रशस्यतेऽम्लचाङ्गेरी ग्रहण्यशहिता च सा ॥ ६१ ॥
मधुरा मधुरा पाके भेदिनी श्लेष्मवर्धिनी ।
वृष्यास्निग्धा च शीता च मदग्नी चाप्युपोदिका ॥ ६२ ॥
रूक्षो महाविषघ्नश्च प्रशस्तो रक्तपित्तिनाम् ।
मधुरोऽमधुरः पाके शीतलस्तण्डुलीयकः ॥ ६३ ॥
मण्डूकपर्णी वेत्राएं कुचेला वनतिक्तकम् ।
कर्कोटकावल्गुजको पटोळं शकुलादनी ॥ ६४ ॥
वृषपुष्पाणि शाङ्गेष्टा केबूकं सकठिल्लकम् ।
नाड़ी कलायं गोजिह्वा वार्तीकं तिलपर्णिका ॥ ६५ ॥
कुलकं कार्क निम्बं शाकं पार्पटिकं च यत् ।
कफपित्तहरं तिक्कं शीतं कटु विपच्यते ॥ ६६ ॥
सर्वाणि सूप्यशाकानि फञ्जी चिल्ली कुतुम्बकः ।
आलुकानि च सर्वाणि सपत्राणि कुटिजरम् ॥ ६७ ॥
शणशाल्मलिपुष्पाणि कर्बुदारः सुवर्चला ।
निष्पावः कोविदारश्च पत्तुरचुचुपर्णिका ॥ ७ ॥
कुमारजीवोकलम्बनालिकासूर्यःलोट्टाकःकुसुम्भवृकधूमपालङ्कया मारिषस्तथाको ॥ ।॥ लक्ष्मणा प्रपुनाडी च नलिनीका कुठेरकः । लोणिका यवशाकं च कुष्माण्डकमवल्गुजम् ॥ १०० ॥
यातुकः शालकल्याणी त्रिपर्णी पीलुपर्णिका ।
शाकं गुरु च रूक्षं च प्रायो विष्टभ्य जीर्यति ॥ १०१ ॥
मधुर शीतवीर्यं च पुरीषस्य च भेदनम् ।
स्विन्नं निष्पीडितरसं स्नेहाढ्यं तत्प्रशस्यते ॥ १०२ ॥
शणस्य कोविदारस्य कर्बुदारस्य शाल्मलेः ।
पुष्पं प्राहि प्रशस्तं च रक्तपित्त विशेषतः ॥ १०३ ॥
न्यप्रोधोदुम्बराश्वत्थ - प्लक्ष-पद्मादि-पल्लवाः ।
कषायाः स्तम्भनाः शीता हिताः पित्तातिसारिणाम् ॥
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सूत्रस्थानमwwwwwwwwsअ ० २७ ] २२
वायुं वत्सादनी हन्यात्कर्फ गण्डीरचित्रको ।
श्रेयसी बिल्वपर्णी च बिल्वपत्रं च वातनुत् ॥ १०५ ॥
भण्डी शतावरीशाकं बला जीवन्तिकं च यत् ।
पवण्याः पर्वपुष्प्याश्च वातपित्तहरं स्मृतम् ॥ १०६ ॥
लघुभिन्नशत्तिकं लाङ्गलक्युरुबूकयोः ।
तिळवेतसशाकं च शाकं पञ्चाङ्गुलस्य च ॥ १०७ ॥
वातलं कटुतिकाम्लमघोमार्गप्रवर्तकम् ।
रूक्षाम्लमुष्णं कौसुम्भं कफघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १०८ ॥
पुर्वारुकेस्वादु-गुरु -विष्टम्भि-शीतले ।
मुखप्रियं च रूक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति ॥ १०६ ॥
एर्वारुकं च संपर्क दाह-तृष्णा-क्लमार्ति-नुत् ।
वर्षोभेदान्यलाबूनि रूक्षशीतगुरूणि च ॥ ११० ॥
चिर्भद्र्युर्वारुके तद्वद्वचभेदहिते तु ते ।
कूष्माण्डमुक्तं सक्षारं मधुराम्लं तथा लघु ॥। १११ ॥
सृष्टमूत्रपुरीषं च सर्वदोषनिबर्हणम् ।
लुटं च कदम्बं च नदीमाषक मैन्दुकम् ॥ ११२ ॥
विशदं गुरु शीतं च समभिष्यन्दि चोच्यते ।
उत्पलानि कषायाणि रक्तपित्तहराणि च ॥ ११३ ॥
तथा तालप्रलम्बं च उरःक्षतरुजापहम् ।
खर्जूरं तालशस्यं च रक्तपित्राक्षयापहम् ॥ ११४ ॥
तरूट- बिस- शाळूक-क्रौञ्चादन- कशेरुकम् ।
शृङ्गाटमङ्कलोड्यं च गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥ ११५ ॥
कुमुदोत्पलनालास्तु सपुष्पाः सफलाः स्मृताः ।
शीताः स्वादुकषायास्तु कफमारुतकोपनाः । ११६ ॥
कषायमीषद्विष्टम्भि रक्तपित्तहरं स्मृतम् ।
पौष्करं तु भवेद् बीजं मधुरं रसपाकयोः ॥ ११७ ॥
बल्यः शीतो गुरुःस्निग्धस्तर्पणो बृंहणात्मकः ।
वातपित्तहरः स्वादुर्वृष्यो युञ्जातकः स्मृतः ॥ ११८ ॥
जीबनो बृंहणो वृष्यः कण्ठ्यः शस्तो रसायने ।
'विदारिकन्दो बल्यश्च मूत्रलः स्वादुशीतलः ॥ ११६ ॥
अम्लिकायाः स्मृतः कन्दो महण्यर्शोहितो लघुः ।
ष्णः कफवातघ्नो प्राही शस्त्रे मदात्यये ॥ १२० ॥
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३३८ चरकसंहिता [ अ० २७ wwwww
त्रिदोषं बद्धविण्मूत्रं सार्षपं शाकमुच्यते ।
सद्वत्पिण्डालकं विद्यात्कन्दत्वाच मुखप्रियम् ॥ १२१ ॥
सर्पच्छनाक वस्तु हथोऽन्यान्रजातयः ।
शीताः पीनसका मधुरा गुर्व्य एव च ॥ १२२ ॥
चतुर्थः शाकषर्गोऽयं पत्रकन्दफलाश्रयः । शाकवर्ग -पाठा, शुषा ( सुशवी ), कचूर, वास्तुक ( बथुआ ), सुनिषण्णक ( मेथी ) ये सब शाक ( भाजी ) ग्राहक, त्रिदोषनाशक हैं, परन्तु बथुआ की भाजी ज़रा रेचक है । काकमाची ( मकोय ) की भाजी तीनों दोषों को नाथ करने वाली, पुष्टिदायक, और रसायन है, यह न तो बहुत गरम और न बहुत ठण्डी है, मध्यमवीर्य, रेचक और कुष्ठनाशक है' । राजक्षवक की भाजी त्रिदोषनाशक, लघु, संग्राही है, ग्रहणी और अर्श रोग में विशेषतः हित- काल नामक शाक-क- वटु, अभिदीपक, संयोगजन्य कारी है । विषनाशक और शोथनाशक, लघु, उष्ण, वायुकारक और रूक्ष है । खट्टी चांगेरी ( चौपतिया ) की भाजी- अभिदीपक, उष्णवीर्य, संग्राही, कफ वायु रोग में उत्तम तथा ग्रहणी और अर्श रोग में हितकारी है । उपोदिका (चौलाई) मधुर रस मधुर विपाक, रेचक, श्लेष्मवर्धक, वृष्य;स्निग्ध, शीतल और उन्मादनाशक ( धतूरे आदि के मद को नष्ट करनेवाली) है | तण्डुलीयक (चौलाई का भेद) रूक्ष, मद और विषनाशक, रक्तपित्त रोग में श्रेष्ठ, मधुर रस, मधुर विपाक और शीतल है । मण्डूकपर्णी का शाक, बेंत का अग्र भाग, कुचेा, वनतिक्ता, ककोड़ा, अवल्गुजा ( बाबची ), परबल, शकुनादनी, असे के फूल, शार्ङ्गष्टा केम्बुक, कठिल्लक ( पुनर्नवा ), नाही ( नाहीच ), कटाय ( मटर ), गोजिह्वा ( गाज़वां ), वातक ( बैंगन ), तिलपर्णी( हुलहुल ), कुलक ( करेला या परबल का मेद ), कर्कश ( अरुण- दत्त के अनुसार कुचला, चक्रदत्त के अनुसार कर्कोटक ), नीम का शाक, पित्तपापड़ा इन की भाजी कफ- पित्त नाशक, तिक्त, शीत और कटु विपाक है । 'सूप्य शाक ' ( माषपर्णी, उड़दपर्णी आदि ) पंजी ( ब्राह्मण, यष्टिका, भांग ), चिल्की कुतुम्बक ( द्रोणपुष्पी, गोमा ), आलुक ( आलु, रतालु, पिण्डालु कन्द मूल ), इन के पसे और कुटिजर ( जंगली बथुआ ), सन, सिम्बल के फूल, कर्बुदार ( कचनार ), सुवर्चला ( हुलहुल ), निष्पाव ( पालक ), कोविदार १. सुश्रुत में काकमाची को "तिता काकमाची वातं शमयत्युष्णवीर्य- त्वात् । " उष्णवीर्य कहा है । २. 'चिएकी - 'माषपर्ण्या शुनः पुच्छे चिल्की स्याच्छाककोप्रयोहै जनेनिः ।
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३ ९ ( लाल कचनार ), पत्तुर ( शालिच ), चुचुपर्णिका ( नाहीच का भेद ) उंदुरकानी ( आखुपर्णी ), कुमारजीव ( जीवशाक ), छोट्टाक ( कोहा मारिष ), पाक्य ( पालक ), मारिष कलम्ब नालिका, आसुरी ( राई ), कुसुम्भ ( धनिया ), वृकधूमक, लक्ष्मणा, प्रपुखाड़ ( चक्रमर्द ), नलिनी ( कमल की नाक, मिस ), कुठेरक ( तुलसी मेद ), लोणिका ( लणी ), यवशाक ( खेत पापड़ा ), कूष्माण्डक ( पेठा ), अवल्गुजा ( बाबची ), यातुक ( सफेद शाल- पर्णी ), शालकल्याणी, त्रिपत्री ( हंसपादिका ), पीलुपर्णी ( मोरटक, मोरबेल ), इन की भाजी गुरु, रूक्ष और प्राय: करके जब तक पचती नहीं, तब तक पेट में अफरा करती है, मधुर, शीतवीर्य और मल के रेचक है । इनको पानी में भापकर ( बिना बाहर का पानी मिलाये ) रस निकाल कर इस में घी या तेल मिलाकर खाना उत्तम है । सन, कचनार, लाल कचनार और सिम्बल इनके फूल संग्राही है, इसलिये रक्तपित्त में विशेषतः प्रशस्त हैं । न्यग्रोध ( बद ), गूलर, पीपल, पिलखन, कमल आदि के पत्रो कषाय रस, स्तम्भक, शीत तथा पित्तातिसार में हितकारी हैं । वत्सादनी ( गिलोय ) की भाजी वायु नाशक, गण्डीर ( मठ, कडुवा जिमीकन्द ) और चीता की भाजी कफनाशक, श्रेयसी ( गज पिप्पली ), बिल्वपर्णी और बेल के पत्तों की भाजी वायुनाशक है । भण्डी ( भिण्डो ), शतावर, बला, खरैटी, जीवन्ती, पर्वणी ( इन्द्रवारुणी ), पर्वपुष्पी इन की भाजी वातपित्तनाशक है । लांगली ( कलिहारी) की, लाल एरण्ड की भाजी तिक्त, रेचक और लघु है । तिक्त अम्ल वेतस ( या बेंत का शाक ), या एरण्ड की भाजी वायुकारक, कटु, तिक्त, अम्ल तथा रेचक है । कुसुम्भ की भाजी रूक्ष, अम्ल, उष्ण, कफनाशक, पित्तवर्धक है । त्रपुस ( खीरा ), उर्वारुक ( ककड़ी ), स्वादु गुरु, अवष्टम्भ करने वाली और शीतल है । इनमें खीरा मुखप्रिय ( खाने में स्वादु ), रूक्ष और बहुत मूत्र लाने वाले हैं । पका हुआ उर्वारुक ( ककड़ी ), प्यास, जलन थकान की पीड़ा को नष्ट करती है । अलाबू ( दूधी, घीया, ढ ) मल का रेचक, रूक्ष, शीतल और गुरु है । चिर्भटी ( ककड़ी ), एवों-रुक भी रेचक हैं । पेठा कद्दू- क्षारयुक्त, मधुर, अम्ल, लघु, मल मूत्र का रेचक, त्रिदोषनाशक है ' । १. कच्चे और पक्के कृष्माण्ड के गुणों में अन्तर है । यथा- "पित्तमं तेषु कूष्माण्डं बालं मध्यं कफावहम् । पक्कं लघुष्णं स क्षारं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ सर्वदोषहरं हृचम् ||”
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३४० चरकसंहिता [अ० २७ लुट ( केंबुक कन्द शाक ) और कदम्ब नन्दी भाषक ( उन्दी मान-वक ), ऐन्द्रक इन की भाजी स्वच्छ, गुरु, शीतल, कफकारक है । मीका कमल कषाय रस और रक्त पिचनाशक है । ताल प्रखम्ब ( ताड़ का अंकुर ), खर्जूर, तळशस्य ( ताल के सिर की मज्जा ) रक्त-पित्त और क्षयरोगनाशक है । तरुट ( तिरट कन्द ), बिस वा भिस, कमल की दण्डी, लाल कमल का कन्द, कौंचादन ( डूकर कन्द, कमल ), कशेरू, शृंगाटक (सिंघाड़ा ) अंकालोढ्य ( ह्रस्थ उत्पत्नकन्द ), गुरु, विष्टम्भि और शीतल हैं । कुमुद ( श्वेत कमल ), उत्पल ( नीला कमल ) फूल और फल समेत शीतल, मधुर, कषाय रस, कफ वायु के प्रकोपक हैं । पुष्कर का बीज कषाय रस, थोड़ा विष्टम्भ करने वाला, रक्तपित्तनाशक, मधुर रस और मधुर विपाक है । मुंजातक ( औचरपथिक कन्द ) बलकारक, शीतल, गुरु, स्निग्ध, तृप्तिकारक, बृंहण पुष्टि-कारक, वात-पित्तनाशक, मधुर वृष्य है । विदारीकन्द, जीवनीय, बृंहण, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, रसायन में प्रशस्त, बलकारक, मूत्ररेचक, मधुर और शीतल है । अम्लीकन्द ( आसाम में होता है आंवर जाति का कन्द ) ग्रहणी, अर्थ में हितकारी, लघु, बहुत गरम, कफ वातनाशक, संग्राहि और मदात्यय रोग में प्रशस्त है । सरसों का शाक—त्रिदोषकारक मल- मूत्र का अवरोधक है । पिण्डालु ( रतालु ) भी इसी प्रकार का है, परन्तु कन्द जाति का होने से खाने में अच्छा लगता है । सर्पछत्रक (खुम्बी) को छोड़कर अन्य सब इस प्रकार की भाजियां शीतल, पीनस रोग को उत्पन्न करने वाली, मधुर गुरु होती हैं । इस प्रकार से पत्ते, कन्द और फलवाला शाकवर्ग समाप्त हुआ ॥ ८७-१२२ ॥ इति शाकवर्गः । छाथ फलवगः
तृष्णा- दाह-ज्वर -श्वास- रक्त-पित्त- क्षत- क्षयान् ।
वातपित्तमुदात्तं स्वरभेदं मदात्ययम् ॥ १२३ ॥
तिकास्यतामास्यशोषं कासं चाऽऽशु व्यपोहति ।
मृद्वीका बृंहणं वृष्या मधुरास्निग्धशीतला ॥ १२४ ॥
मधुरं वृंहणं वृष्यं खर्जूरं गुरु शीतलम् ।
क्षयेऽभिघाते दाहे च वातपित्ते च तद्धिवम् ॥ १२५ ॥
तर्पणं वृंहणं फल्गु गुरु विष्टम्भि शीतलम् ।
परूषक' मधूक' च वातपित्ते च शस्यते ॥ १२६ ॥
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२७ ] सूत्रस्थानम्
मधुरं वृंहणं बल्यमानातं तर्पणं गुरु ।
सस्नेहं श्लेष्मलं शीतं वृष्यं विष्टभ्य जीर्यति ॥ १२७ ॥
तालशस्यानि सिद्धानि नारिकेलफलानि च ।
वृंहणस्निग्धशीतानि बल्यानि मधुराणि च ॥ १२८ ॥
मधुराम्लकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम् ।
पित्तश्लेष्मकरं भव्यं प्राहि वक्त्रविशोधनम् ॥ १२६ ॥
अम्लं परूषकं द्राक्षा बदराण्यारुकाणि च ।
पित्तश्लेष्म प्रकोपीणि कर्कन्धुलकुचान्यपि ॥ १३० ॥
नात्युष्ण गुरु संपर्क स्वादुप्रायं मुखप्रियम् ।
बृहणं जीर्यति क्षिप्रं नातिदोषलमारुकम् ॥ १३१ ॥
द्विविधं शीतमुष्णं च मधुरं चाम्लमेव च ।
गुरु पारावतं ज्ञेयमरुच्यत्यग्निनाशनम् ॥ १३२ ॥
भव्यादल्पान्तरगुणं काश्मर्यफलमुच्यते ।
तथैवाल्पान्तरगुणं तूदमम्लपरूषकात् ॥ १३३ ॥
कषायमधुरं टङ्कं वातलं गुरु शीतलम् ।
कपित्थं विषकण्ठघ्नमामं संग्राहि वातलम् ॥ १३४ ॥
मधुराम्लकषायत्वात्सौगन्ध्याश्च रुचिप्रदम् ।
तदेव पर्क दोषघ्नं विषघ्नं प्राहि गुर्वपि ॥ १३५ ॥।
बिल्वं तु दुर्जरं सिद्धं दोषलं पूतिमारुतम् ।
स्निग्धोष्णतीक्ष्णं तद्वालं दीपनं कफवातजित् ॥ १३६ ॥
वातपित्तकर' बालमापूर्ण पित्तवर्धनम् ।
पक्कमात्रं जयेद्वायुं मांसशुक्रबलप्रदम् ॥ १३७ ॥
कषायमधुरप्रायं गुरु विष्टम्भि शीतलम् ।
जाम्बवं कफपित्तघ्नं प्राहि वातकर परम् ॥ १३८ ॥
मधुरं बदरं स्निग्धं भेदनं वातपित्तजित् ।
तच्छ्रुष्कं कफवातघ्नं पित्ते न च विरुध्यते ॥ १३६ ॥
कषायमधुरं शीतं प्राहि सिम्बितिकाफलम् ।
गाङ्गेरुक करीरं च विम्बीतोदनधन्वनम् ॥ १५० ॥
मधुरं सकषायं च शीतं पित्तकफापहम् ।
संपर्क पनसं मोचं राजादनफलानि च ॥ १४१ ॥
स्वनि सकषायाणिस्निग्धशीतगुरूणि च ।
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३४२ चरकसंहिता [ अ० कषायविशदत्वाच सौगन्ध्याच रुचिप्रदम् ॥ १४२ ॥
अवदंशक्षमं रूक्षं वातलं लवलीफलम् ।
नीपं सभार्गकं पीलु तृणशून्यं ' विकङ्कतम् ॥ १४३ ॥
प्राचीनामलकं चैव दोषघ्नं गरहारि च ।
ऐकुदं तिक्तमधुरं स्निग्धोष्णं कफवातजित् ॥ १४४ ॥
तिन्दुकं कफपित्तघ्नं कषायमधुरं लघु ।
विद्यादामलके सर्वान् रसाँल्लवणवर्जितान् ॥ १४५ ॥
स्वेद-मेदः -कफोत्क्लेद- पित्तरोग- विनाशनम् ।
रूक्षं स्वादु कषायाम्लं कफपित्तहरं परम् ॥ १४६ ॥
रसासृङ् -मांस- मेदो -जान्दोषान् हन्ति बिभीतकम् ।
स्वरभेद -कफोत्क्लेद-पित्तरोग-विनाशनम् ।
अम्लं कषायमधुरं वातघ्नं प्राहि दीपनम् ॥ १४७ ॥
स्निग्धोष्णं दाडिमं हृद्यं कफपित्ताविरोधि च ।
रूक्षाम्लं दाडिमं यत्तु तत्पित्तानिलकोपनम् ॥ १४८ ॥
मधुरं पित्तनुतेषां तद्धि दाडिममुत्तमम् ।
वृक्षाम्लं प्राहि रूक्षोष्णं वातश्लेष्मणि शस्यते ॥ १४६ ॥
अम्लिकायाः फलं पर्क तस्मादल्पान्तरं गुणैः ।
गुणैस्तैरेव संयुक्तं भेदनं त्वम्लवेतसम् ॥ १५० ॥
शूले रुची विबन्धे च मन्द्रेऽनौ मद्यविक्लवे ।
हिकाकासे च श्वासे च वम्यां वर्चोगदेषु च ॥ १५१ ॥
वातश्लेष्मसमुत्थेषु सर्वेष्वेतेषु दिश्यते ।
केशरं मातुलुङ्गस्य लघु शीतमतोऽन्यथा ॥ १५२ ॥
गुर्वी त्वगस्य कटुका मारुतस्य च नाशिनी ।
रोचनो दीपनो हृद्यः सुगन्धिस्त्वग्विवर्जितः ॥ १५३ ॥
कर्चूरः कफवातघ्नः श्वासहिकार्शसां हितः ।
मधुरं किंचिदम्लं च हृद्यं भक्तप्ररोचनम् ॥ १५४ ॥
दुर्जरं वातशमनं नागरङ्गफलं गुरु ।
बातामाभिषेकाक्षोट-मकलक- निकोकचाः ॥ १५५ ॥
गुरूष्णस्निग्धमधुराः सोरुमाणा बलप्रदाः ।
वातघ्ना बृंहणा वृष्याः कफपित्ताभिवर्धनाः ॥ १५६ ॥
२. शाह, शताचकमिति च पाठो ।