चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 361–370

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४३ ...

पिया मेषां सदृशं विद्यादौयं बिना गुणैः ।

श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु ॥ १५७ ॥

म गुरु विष्टम्भ चाङ्कोटफलमग्निजित् ।

गुरुष्णं मधुरं रूक्ष' केशनं च शमीफलम् ॥ १५८ ॥

विष्टम्भयति कार ' पित्तश्लेष्माविरोधि च ।

आम्रातकं दन्तशठमम्लं सकरमर्दकम् ॥ १५६ ॥

रक्तपित्तकरं विद्यादैरावतकमेव च ।

वातघ्नं दीपनं चैव वार्ताकं कटुतिक्तकम् ॥ १६० ॥

वातलं कफपित्तघ्नं विद्यार्त्यपटकीफलम् ।

पित्तश्लेष्मघ्नमम्लं च वातलं चाक्षिकीफलम् ॥ १६१ ॥

मधुराण्यनुपाकीनि वातपित्तहराणि च ।

अश्वत्थोदुम्बर- लक्ष-न्ययोधानां फलानि च ॥ १६२ ॥

कषायमधुराम्लानि वातलानि गुरूणि च ।

भल्लातकास्थ्यग्निसमं त्वङ्मांसं स्वादु शोतलम् ।

पञ्चमः फलवर्गोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ॥ १६३ ॥

फलवर्ग- —पकी हुई किशमिश प्यास, जलन, ज्वर, श्वास, रक्त -पित्त, उरः- क्षत, क्षय, वातपित्त, उदावर्त्त, स्वरमेद, मदात्यय, मुख की कटुता मुखघोष और और कास को शीघ्र नष्ट करती है । यह बृंहणी पुष्टिकारक, वृष्य, मधुर, स्निग्ध शीतल है । खजूर-मधुर, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, गुरु शोतल, क्षय, चोट लगने, जलन और वात- पित्त रोग में हितकारी है । फल्गु ( अंजीर ), तृप्तिकारक, बृंहण, गुरु, विष्टम्भी और शोतक है । फालसा और महुवा वात- पित्त रोग में उत्तम है । आम्रात ( आमदा ) मधुर, पुष्टिकारक, बलकारक, तृप्तिकारक, गुरु, स्निग्ध, कफकारक, शीतल, वृष्य और पेट में अफारा करताहै । ताडके फल ( ताक्फल ) और पका हुआ नारियल बृंहण, स्निग्ध, शीतल, बलकारक और मधुर होते हैं । भव्य ( कमरख ) मधुर, अम्लकषाय, विष्टम्भि, गुरु, शीतल, पिचश्लेष्म-कारक, स्तम्भक और मुख को शोधन करता है । खट्टा फालसा, द्राक्षा, साड़ी के बेर, आइक ( आयु या आलुबारा ), ये पित्तकफ को कुपित करने वाले हैं । इसी प्रकार बेर और लकुच ( ढ्यो ), भी पित्त- कफकोरक है । आरुक ( आलु-बुखारा ) बहुत गरम नहीं, स्वादुमधुर और खाने में स्वादिष्ठ, वृंदण पुष्टिकारक, १. 'घी' इति च पाठः ।

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३४४ चरकसंहिता [ अ० २७ जल्दी पच जाता है, बहुत अधिक दोषों को नहीं बढ़ता । पारावत (कामरूप में प्रसिद्ध है ) दो प्रकार का है । मधुर और अम्ड । इनमें मधुर शीतल और अम्ब, उष्ण गुरु, अरुचि और अग्नि की तीवणता को नाश करता है । काश्मरी ( गम्भारी ) का फल लगभग कमरख के फल के समान है, इसी प्रकार खट्टे फालसे के समान तूद ( औत्तरपथिक शहतूत ) भी है । टंक का फळ कषाय मधुर, बातल, गुरु और शीतल है । कच्चा कैथ कण्ठ ( स्वर ) को नाश करने वाला ( स्वर बिठानेवाला ), विषनाशक, आम का संग्राहक, वायुकारक है । पका हुआ कैथ मधुर- अम्लकषाय रस एवं सुगन्धित होने से खाने में रुचिकर और अच्छी तरह पक जाने पर दोषनाशक, विषनाशक, संग्राही और गुरु है । पका हुआ बेल पचने में दुर्जर, दोषकारक, बहुत दुर्गन्धयुक्त वायु पैदा करने वाला है । कच्चा बेल स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ-वायुनाशक है । कच्चा आम (गुठली बैठने से पहिले) रक्तपित्तकारक, पिचका-रक है । पकने पर आम वायुनाशक, मांस शुक्र और बलवर्द्धक है । पका हुआ जामुन कषाय मधुर रस, गुरु विष्टम्भी, शीतल, कफ-पिथनाशक संग्राही और वायुकारक है । बेर- मधुर, स्निग्ध, रेचक, वात-पित्तनाशक है, सूखा बेर कफवातनाशक और पित्त के लिये अविरोधी है, पित्त का प्रकोप नहीं करता । सिञ्चितिका ( सेब, सफरजंद ) कषाय, मधुररस, शीतल, संग्राही है । गंगेरन ( नागबला ) और करीर ( करौदा ), कन्दुरी, तोदन और धाय के फल पका मधुर- कषाय, शीतल, पित्त- कफनाशक हैं । हुआ कटहल, केला और राजादन (खिरनी ) स्वादु, कषाय, स्निग्ध, शीतल, गुरु हैं । लबकी का फल ( इरफारेवड़ी ) कषाय और विशद एवं सुगन्धित होने से रुचिकर हय, वायुकारक तथा अवदंशक्षम ( इस फलको खाकर दूसरे वस्तुओंमें रुचि होती ) है, नीप ( कदम्ब ), शताहक ( शरका ), पीलु, तृणशून्य ( केतकी फल ), विकङ्कत, प्राचीन आमलक, दोषनाशक और विषनाशक हैं । इंगुद (हिंगोट ) का फल तिक्त मधुर स्निग्ध, उष्ण और कफवातनाशक है । तिन्दुक-फळ ( तेन्दु ), कफ-पित्तनाशक, कषाय, मधुर और लघु है । आंवले में लवण रस को छोड़कर और सब रस हैं और स्वेद मेद,कफ, उक्केद (वमन की रुचि) और पित्त के रोगों को नष्ट करता है, रूक्ष, स्वादु, कषाय, अम्ब, कफ-पित्तना-शक है । विभीतक ( बहेड़ा ), रस, रक्त, मांस, मेदजन्य रोगों को नष्ट करती है । स्वर मेद, कफ के उत्क्लेद, तथा पिच रोग नाशक है । खट्टा अनार कषाय, मधुर, वातनाशक, संग्राही, अभिदीपक, स्निग्ध और उष्ण है, तथा हृदय के

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०२७. सूत्रस्थानम् ३४५ किये रुचिकर कफपित्त का अविरोधी ( प्रकोपक नहीं ) रूक्ष है । मीठा अनार पित्तनाशक है इन सब में लट्टा अनार श्रेष्ठ है । वृक्षाग्छ (कोकम ) संग्राही, रूक्ष, उष्ण, वात-कफ में प्रशस्त है । अम्बिका ( इमली ) का फल पकने पर लगभग कोकम के समान गुणवाला होता है । अम्लवेतस का गुण भी इसी प्रकार है, परन्तु रेचक है । मातुलंग ( बिजौरे निम्बू) का केशर शूल, अरुचि, विबन्ध, मन्दाग्नि, मदात्यय, हिका, कास, श्वास, वमन, मठ सम्बन्धी रोगों में और तथा वातकफ- जन्य रोगों में प्रशस्त और लघु है । इसकी छाल, गिरी आदि गुरु और वातप्रकोपक है । बिना छाल का कचूर रोचक, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकारी, सुगन्धित, कफवातनाशक, श्वास, हिचकी और अर्श रोग में हितकारी है । नारंगी का फल -मधुर, कुछ खट्टा, हब, खाने में रुचिकर, पचने में दुर्जर, वातनाशक और गुरु है । बादाम, अभिषुक् ( पिस्ता ), अखरोट, मकूलक, निकोच, गुरु, उष्ण स्निग्ध, मधुर, शक्तिवर्धक, वायुनाशक, पुष्टिदायक और कफ- पित्त को बढ़ाने वाला है । इनमें पियाल के गुण भी इसी के समान हैं, परन्तु वह उष्ण नहीं है । श्लेष्मातक ( लसूड़े ) का फल कफकारक, मधुर, शीतल, गुरु है । अंकोटक का फल कफकारक, गुरु, विष्ट भी और अग्निनाशक है । शमी ( जंडी ) का फल गुरु, उष्ण, मधुर, शीतल और बालों का नाश-कारक है । करंज का फल विष्टम्भी और बात- कफ के लिये अविरोधी है । आम्रातक, दन्तठ ( निम्बू, खट्टा ), करौंदा और ऐरावत ये रक्क-पित्तनाशक हैं । वार्ताक, वातनाशक, अग्निदीपक, कटुतिक्त रस है । पित्तपापडे का फल वायुकारक और कफ पित्तनाशक है । आसिफीफल पित-कफनाशक, खट्टा और वायुकारक है । पीपल, गूलर, पिलखन, बढ़ इनके फल पकने पर मधुर और बात-पित्तनाशक हैं । कच्चे फल कषाय मधुर, अम्ब, वायुकारक और गुरु हैं । मिलावे का फल अग्नि के समान ( छाले डालने वाला ) है, मिळावे की छाल, मजा स्वादु, शीतल है । इस प्रकार से उपयोगी पांचवां

फलवर्ग भी कह दिया है । १२३-१६३ ॥

इति फलवर्गः । अथ हरित वर्गः ।

दोचनं दीपनं वृष्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् ।

वातमविषयेषु रसस्तस्थोपदिश्यते ॥ १६४ ॥

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३४६ चरकसंहिता [ ० २७

रोचनो दीपनस्तीक्ष्णः सुगन्धिर्मुखशोधनः ।

जम्बीरः कफवातघ्नः कृमिघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १६५ ॥

बाळं दोषहरं, द्धं त्रिदोष, मारुतापहम् ।

स्निग्धसिद्धं विशुष्कं तु मूलकं कफवातजित् ॥ १६६ ॥

हिका-कास-विष-श्वास-पार्श्व - शूल-विनाशनः ।

पित्तकृत्कफवातन्नः सुरसः पूतिगन्धहा ॥ १६७ ॥

यवानी चार्जकश्चैव शिशालेयसृष्टकम् ।

हथान्यास्वादनीयानि पित्तमुत्क्लेशयन्ति च ॥ १६८ ॥

गण्डीरो जलपिप्पल्यस्तुम्बुरुः शृङ्गवेरिका ।

तीक्ष्णोष्ण- कटु-रूक्षाणि कफवातहराणि च ॥ १६६ ॥

पुंस्त्वन्नः कटुरूशोष्णो भूस्तृणो वक्त्रशोधनः ।

खराश्वा कफवातनी बस्तिरोगरुजापहा ॥ १७० ॥

धान्यकं चाजगन्धा च सुमुखाश्चेति रोचनाः ।

सुगन्धना नातिकटुका दोषानुत्क्लेशयन्ति च ॥ १७१ ॥

प्राी गृञ्जनकस्तीक्ष्णो वातश्लेष्मार्शसां हितः ।

स्वेदनेऽभ्यवहार्ये च योजयेत्तमपित्तिनाम् ॥ १७२ ॥

श्लेष्मलो मारुतघ्नश्च पलाण्डुर्न च पित्तनुत् ।

आहारयोगी बल्यश्च गुरुर्वृष्योऽथ रोचनः ॥ १७३ ॥

कृमि कुष्ठ- किलासनो वातघ्नो गुल्मनाशनः ।

स्निग्धोष्ण वृष्यश्च लशुनः कटुको गुरुः ॥ १७४ ॥

शुष्काणि कफवातनान्येतान्येषां फलानि च ।

हरितानामयं चैषां षष्ठो वर्गः समाप्यते ॥ १७५ ॥

हरितवर्ग -आर्द्रक ( अदरक) रोचक, अभिदीपक, वीर्यवर्धक है । इस का रस वात-कफजन्य अवरोधों में गुणकारी है । नीम्बू, रुचिकारक, दीपक, तीक्ष्ण. सुगन्धित, मुख को साफ करने वाला, कफ-वातनाशक, कृमिनाशक और अन्न का पाचक है । कच्ची मूली दोषनाशक है और बढ़ने पर ( पक जाने पर ) त्रिदोषकारक है, स्निग्ध और सिद्ध ( पकाई हुई ) मूळी वायु नाशक, सूखी मूली कफ-वातनाशक है । तुलसी हिचकी, कास, विष, श्वास, पार्श्वशु का नाश करती तथा पित्तकारक, कफ- वायुनाशक एवं शरीर तथा ( १. मूली यावद्धि चाम्यतरखान्वितानि, नत्रप्ररूढानि च मूळकानि । ) तावक दीपनानि पितानिसस्लेव्माणि चैव ॥

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७० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४७.. अ के दुर्गन्ध को नष्ट करती है । अजवायन, अर्जक ( अजवका ), शोभा- ञ्जन, शालेयमृष्टक और राई ये हृदय को प्रिय और स्वादिष्ठ तथा पित्तवर्धक हैं । गण्डीर ( लाल और श्वेत भेद से दो प्रकार का है, यहां पर लाल का ग्रहण है । और श्वेत को शाकवर्ग में कह दिया है ), जल पिप्पली, तुम्बर, गोजिड्डा ( गाज़बां ) ये तीक्ष्ण, उष्ण, कटु, रूक्ष, कफ- वायुनाशक हैं । भूस्तृण ( गन्ध- तृण ), पुरुषत्वनाशक, कटु, रूक्ष, उष्ण और मुख का शोषक है । खराश्वा ( काळाजीरा ) कफवातनाशक, बस्तिरोग और बस्तिशूलनाशक है । धनिया, अजवायन, सुमुखा ( तुलसी मेद ), रोचक, सुगन्धि बहुत कटु नहीं और दोषों को उत्तेजित करते हैं । गाजर ( गृज्जन ) या शलजम संग्राही, तीक्ष्ण, वात -कफ अर्श रोग में हितकारी, स्वेदन कार्य में हितकारी है, इसका उपयोग पित्त जहां न बढ़ा हो वहां पर करना चाहिये । पलाण्डु ( प्याज़ ) कफकारक, वायुनाशक है, परन्तु पित्त नाशक नहीं है, भोजन में उपयोगी, बलकारक, गुरु, हृष्य और रुचिकर है । लहसुन कृमि, कुष्ठ, किलास रोग-नाशक, वायुनाशक, गुल्मनाशक, स्निग्ध और उष्ण, वीर्यवर्धक, कटु, और गुरु है । ये सब सूखे होने पर तथा इनके फल कफ-वायु नाशक हैं । यह छटा हरितवर्ग समाप्त हुआ । हरितवर्ग की वस्तुर्वे प्रायः हरी कच्ची ही बरती जाती हैं; इस लिये इसे हरितवर्ग कहते हैं -जैसे आजकल सलाद, प्याज टमाटर कच्चे खाने का रिवाज़ है ॥ १६४-१७५ ॥ इति हरित वर्गः । अथ मद्यवर्गः ।

प्रकृत्या मद्यमम्लोष्ण मम्लं चोक्तं विपाकतः ।

सर्व सामान्यतस्तस्य विशेष उपदेश्यते ॥ १७६ ॥

कशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् ।

सुरा प्रशस्ता बावनी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥ १७७ ॥

हिका -श्वास प्रतिश्याय-कास-वर्षो प्रहारुचौ ।

बम्यानाहबिबन्धेषु वातनी मदिरा हिता ॥ १७८ ॥

शूल-प्रवाहिकाटोप कफवातार्शसां हितः ।

जगलो प्राहिरुक्षोष्णः शोफनो भुखपाचनः ॥ १७६ ॥

झोफार्शी- प्रहणीदोष पाण्डुरोगारुचिज्वरान् ।

इन्स्यरिष्टः कफकृतान् रोगान् रोचनदीपनः ॥ १८० ॥

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३४८ चरकसंहिता [ अ० २७

मुखप्रियः सुखमदः सुगन्धिर्वस्तिरोगनुत् ।

अरणीयः परिणतो यो वर्ण्य शार्करः ॥ १८ ९ ॥

रोचनो दीपनो हृद्यः शोषशोफार्शसा हितः ।

स्नेह श्लेष्म-विकारनो वर्ण्यः पकरसो मतः ॥ १८२ ॥

जरणीयो विषन्धनः स्वरवर्णविशोधनः ।

कर्षणः शीतरसिको हितः शोफोदरार्शसाम् ॥ १८३ ॥

सृष्टभिशकृद्वातो गौडस्तर्पणदीपनः ।

पाण्डुरोगत्रणहिता दीपनी चाक्षिकी मता ॥ १८४ ॥

सुरासवस्तीव्रमदो वातन्नो बदनप्रियः ।

छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मैरेयो मधुरो गुरुः ॥ १८५ ॥

धावक्याभिषुतो हथो रूक्षो रोचनदीपनः ।

माध्वीकवन्न चात्युष्णो मृद्वीकेक्षुरसासवः ॥ १८६ ॥

रोचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पित्ताविरोधि च ।

विबन्धनं कफनं च मधु लध्वल्पमारुतम् ॥ १८७ ॥

सुरासमण्डा रूक्षोष्णा यवानां वातपित्तला ।

गुर्वी जीर्यति विष्टभ्य श्लेष्मला तु मधूलिका ॥१८८॥

दीपनं जरणीयं च त्पाण्डुकृमिरोगनुत् ।

प्रण्यर्शोहितं भेदि सौवीरकतुषोदकम् ॥ १८६ ॥

दाहज्वरापहं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् ।

बिन्धनमविसंसि दीपनं चाम्छकालिकम् ॥ १६० ॥

प्रायशोऽभिनवं मद्यं गुरु दोषसमीरणम् ।

स्रोतसां शोधनं जीर्ण दीपनं लघु रोचनम् ॥ १६१ ॥

हर्षणं प्रीणनं बल्यं भय- शोक श्रमापहम् ।

प्रागल्भ्य - वीर्य-प्रतिभा -तुष्टि पुष्टि-बल-प्रदम् ॥ १६२ ॥

सायकैर्विधिवक्त्या पीतं स्यादमृतं यथा ।

वर्गोऽयं सप्तमो मद्यमधिकृत्य प्रकीर्तितः ॥ १६३ ॥

मद्यवर्ग -- स्वभाव से मद्य खट्टा, उष्ण है, वह रस में अम्ल नहीं, विपाक में अम्क है । पीने पर दांत खट्टे होजाते हैं, मुख से लाब होता है इसलिये अम्क ' है । यह बात सब मयों में समान है, विशेष रूप से आगे कहते हैं— सुरा ( अनुदुतमण्ड ) कृश पुरुषों के लिये, मूत्र रुक जाने पर, ग्रहणी, अर्थ- १. मद्य सर्वेषां ममानामुपर्युपरि वर्त्तते ॥० ॥

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डा० २७ ] सूत्रस्थानम् 382 रोग में हितकारी, वायुनाशक तथा स्तन्य ( दूध ) और रकचप में उपकारी है । मदिरा ( सुरामण्ड ) हिचकी, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलावरोध, अरुचि, यमन, अफारा, विबन्ध में हितकारी एवं वायुनाशक है । जगळ ( अन्न से बनी सुरा ) शूल, प्रवाहिका, अफारा, कफ -वायु और अर्शरोग में हितकारी संग्राही, रूक्ष, उष्ण, शोफनाशक और अन्न को पचाने वाली है । अरिष्ट ( औषध काय से सम्पादित ) घोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, ज्वर एवं कफजन्य रोगों को नष्ट करता है, रोचक और अनिवर्धक है । शार्कर ( शर्करा का प्राकृतिक आसव ) खाने में प्रिय, सुखपूर्वक नशा करने वाला, सुगन्धित, बस्तिरोगनाशक जीर्ण होकर पचने वाला. हृदय को प्रिय, वर्ण, कान्तिकारक है । पक्क रस ( गन्ने के रस को पका कर बनाने पर ) रोचक, अभिदीपक, हृद्य, शोष, शोफ, अर्श रोग में हितकारी, स्नेह -श्लेष्मा के रोगों का नाशक और कान्तिकारक है । श्रीत रस ( गन्ने के अपक्क रस से बनाया ) लाघवकारक, विबन्धनाशक, स्वर वर्ण को साफ करने वाला, लेखन, शोफ, उदर, अर्श रोग में हितकारी है । गौड ( गुड़ से बना ) मद्य रेचक, वायु का अनुलोमक, तृप्तिकारक और अग्निवर्धक है । बहेड़े का मद्य पाण्डुरोग, व्रण में हितकारी और दीपक है । सुरासव ( सुरा को ही पानी के स्थान पर जहां व्यवहार करें ) तीव्र मदकारी, वायु- नाशक, मुख और शरीर के लिये प्रिय है । महुवे के फूलों से बना आसव छेदक और तीक्ष्ण है, मैरेय ' मधुर और गुरु है । धाय के फूलों से बना आसब हृद्य, रूक्ष, रोचक और दीपक है । मृदीका रस और गन्ने के रस को मिलाकर तैयार किया हुआ आसव माध्वीक से बने आसव के समान गरम नहीं, रोचक, दीपक, हृद्य, बलकर और पिथ के लिये अविरोधी है । मधु प्रधान आसव विबन्धना- शक, कफनाशक, लघु और थोड़ी वायुकारक है । मण्ड के साथ सुरा ( यव- तण्डुलों से बनी ) रुक्ष, उष्ण, वात-पित्तकारक है । मधूलक ( गेहूँ से बनी मद्य) गुरु,, पेट में अफारा करके जीर्ण होती है, कफकारक है । धान्य- तुष से बनी कांजी दीपक, लघु, हृदय पांडु, कृमि, रोगनाशक, ग्रहणी, अर्शरोग में हितकारी और रेचक है । खट्टी कांजी के पीने से दाह, ज्वर नष्ट होता है, वात-क- नाशक, विबन्धनाशक, अविस्रंसी, दीपक है । नवीन मद्य प्रायः गुरु और दोष प्रकोपक होता है । पुराना मद्य स्रोतों का शोधक, दीपक, लघु, रुचिकर, हर्षो- १. मैरेय - 'आसवस्य सुरायाश्च द्वयोरेकत्र भाजने । सन्धानं तद् विजानीयात् मैरेयसुभगाश्रयम् ॥ ' २. एक वर्ष के पीछे शराब पुरानी मानी जाती है ।

पृष्ठ 368

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३५० चरकसंहिता ज० २७ स्पादक, पुष्टिदायक, बलकारक, भय, शोक, भ्रम को मिटाने वाला है । सात्त्विक विधिपूर्वक सेवन किया हुआ मध अमृत के समान होता है, यह मच अत्यन्त वीर्यप्रद, प्रतिभा, प्रसन्नता, पुष्टिवल को देता है । यह सातवां मद्यवर्ग समास हुआ । १७६-२६३ ॥ इति मद्यवर्गः । अथ जलवर्गः ।

जलमेकविधं सर्व पतत्यैन्द्रं नभस्तलात् ।

तत्पतत्पतितं चैव देशकालावपेक्षते ॥ १६४ ॥

खात्पतत्सोमवाय्वकैः स्पृष्टं कालानुवर्तिभिः ।

शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु षड्गुणम् ।

प्रकृत्या दिव्यमुदकं, भ्रष्टं पात्रमपेक्षते । १ ९ ६ ॥

श्वेते कषायं भवति पाण्डुरे चैव तिक्तकम् ।

कपिले क्षारसंसृष्टभूषरे लवणान्वितम् ।

कटु पर्वत विस्तारे मधुरं कृष्णमृत्तिके ॥ १६७ ॥

एतत्षाड्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि ।

तथाऽव्यक्तरसं विद्यादैन्द्रं कारं हिमं च यत् ॥ १६८ ॥

यदन्तरीक्षात्पततोन्द्रसृष्टं चोकैश्च पात्रैः परिगृह्यतेऽम्भः सदैन्द्रमित्येव वदन्ति धीरा नरेन्द्रपेयं सलिलं प्रधानम् ॥ १६६ ॥

ऋतावृताविह ख्याताः सर्व एवाम्भसो गुणाः ।

ईषत्कषायमधुरं सुसूक्ष्मं विशदं लघु ॥। २०० ॥

अरुक्षमनभिष्यन्दि सर्व पानीयमुत्तमम् ।

गुर्वभिष्यन्दि पानीयं वार्षिकं मधुरं नवम् ॥ २०१ ॥

तनु लघ्वनभिष्यन्दि प्रायः शरदि वर्षति ।

तन्तु ये सुकुमाराः स्युः स्निग्धभूयिष्ठभोजनाः ॥ २०२ ॥

तेषां भोक्ये च भवत्ये च लेहो पेये च शस्यते ।

हेमन्ते सलिलं स्निधं वृष्यं बलहितं गुरु ॥ २०३ ॥

किंचिततो लघुतरं शिशिरे कफवातजित् ।

कषायमधुरं रूक्षं विद्याद्वासन्तिकं जलम् ॥ २०४ ॥

प्रैष्मिकं त्वनभिष्यन्दि रूपमित्येष निश्वयः ।

विभ्रान्तेषु तु कालेषु यत्प्रयच्छन्ति तोयदाः ॥ २०५ ॥

पृष्ठ 369

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३५१ ०२७ ] सूत्रस्थानम्

सिळं ता दोषाय युज्यते नात्र संशयः ।

राजभी राजमात्रैश्च सुकुमारेश्व मानवैः ॥ २०६ ॥

संग्रहीताः शरचापः प्रयोक्तव्या विशेषतः ।

नद्यः पाषाण -विच्छिन्न- विक्षुब्धाभिहतोदकाः ॥ २०७ ॥

हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः ।

नयः पाषाण- सिकतावाहिन्यो विमलोदकाः ॥ २०८ ॥

मलयप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् ।

पश्चिमाभिमुखा याच पध्यास्ता निर्मलोदकाः ॥ २०६ ॥

प्रायो मृदुवहा गुययाश्च पूर्वसमुद्रगाः ।

पारियात्रभवा याश्च विन्ध्यसहाभवाश्च याः ॥ २१० ॥

शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य च ।

वसुधा -कीट- सर्पा मल -संदूषितोदकाः ॥ २११ ॥

वर्षा जलवा नद्यः सर्वदोषसमीरणाः ।

वापी -कूप-तडागोत्स-सरः-प्रस्रवणादिषु ॥ २१२ ॥

आनूपशैलधन्वानां गुणदोषैर्विभावयेत् ।

पिच्छिलं कृमिळं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः ॥ २१३ ॥

विवर्ण' विरसं सान्द्र दुर्गन्धि न हितं जलम् ।

विस्रं त्रिदोषं लवणमम्बु यद्वरुणालयम् ॥ २१४ ॥

इत्यम्बुबर्गः प्रोक्तोऽयमष्टमः सुविनिश्चितः ।

जलवर्गः समुद्दिष्टो मानवानां सुखप्रदः ॥ २१५ ॥

सम्पूर्ण पानी एक प्रकार का है । यह पानी बरसात के रूप में आकाश से गिरता है । यह गिरता हुआ, और गिरकर, [ गुण-दोष के लिये ] देश, "समय की अपेक्षा करता है । आकाश से गिरता हुआ पानी ऋतु के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और बायु ( आकाश में स्थित धूलि, तथा क्षुद्र जन्तु आदि परमाणुओं से मिलकर ) तथा भूमि के ऊपर गिर कर उस ऋतु के अनुसार भूमि की शीतलता, उष्णिमा,स्निग्धता, रूक्षता आदि के सम्बन्ध होने पर उसी गुण वाला हो जाता है । आकाश से गिरता हुआ पानी स्वभाव से शीतक पवित्र, कल्याणकारी, स्वादिष्ठ, स्वच्छ हल्का- इन छः गुणों वाला है । नीचे भूमि पर गिरकर पात्र की अपेक्षा से गुण वाला बन जाता है । श्वेत भूमि पर गिरने से पानी कसैला, पाण्डुर जमीन में तिक; कपिल भूमि अर्थात् वारमिभित ( ऊसर में ) नमकीन; पहाड़ की भूमि पर कटु और काकी भूमि में मधुर हो

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
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३५२ चरकसंहिता [अ० २७ जाता है । भूमि का जल इन छः गुणों वाला होता है । बरसात का पानी, बर्फ का पानी और कार अर्थात् ओले के पानी में कोई रख व्यक्त नहीं होता । आकाश से गिरते हुए पानी को नदी आदि स्थानों के अतिरिक्त, किसी शुद्ध पात्र में एकत्र कर लिया जाय तो इसे बरसात का पानी कहते हैं । यह पानी राजाओं के पीने योग्य है । ऋतु-ऋतु के अनुसार बरसात के पानी में गुण होते हैं । जो पानी थोड़ा कषाय, मधुर, पतला ( सूक्ष्म ), सच्छ, लघु, अरूक्ष अनभिष्यन्दि, कफ न करे, वह पानी उत्तम समझना चाहिये । बरसात का नया पानी गुरु, अभिष्यन्दि और मधुर रस होता है । शरद ऋतु में बरसात का पानी बहुत स्वच्छ, ब्घु, अनभिष्यन्दि कफ नहीं करने वाला होता है । यह पानी सुकमार, एवं विशेषतः स्निग्ध एवं बहुत भोजन खाने वाले पुरुषों के भोजन में, भक्षण ( दांत से काट कर खाने की वस्तुओं ) में, पीने और चाटने में भी प्रशस्त है । हेमन्त ऋतु में बरसात का पानी स्निग्ध, वीर्यवर्धक, बल-कारक, गुरु है । शिशिर ऋतु में बरसात का और हेमन्त ऋतु के पानी से कुछ हल्का एवं कफवातनाशक होता है । वसन्त ऋतु में बरसात का पानी कषाय, मधुर रस और रूक्ष होता है । ग्रीष्म ऋतु में बरसात का पानी कफनाशक और रूक्ष होता है, विभ्रान्त अर्थात् बरसात के दिनों में बादलों से जो पानी गिरता है वह निश्चित रूप में दोषकारक होता है । राजाओं, श्रीमन्तों, रईसों तथा सुकुमार पुरुषों को चाहिये कि वे शरद् ऋतु में बरसात के पानी को इकट्ठा करलें और सारे साल इसीका उपयोग करें । हिमालय से उत्पन्न नदियों का पानी पत्थरों की टक्कर के कारण मये जाने से निर्दोष, पथ्यकारी, पुण्य है । इनको देवता व ऋषि सेवन करते थे, ये अति पुण्यकारी है । मलयाचल पर्वत से उत्पन्न नदियों का पानी पत्थर, रेतीली भूमि में बहने से स्वच्छ हो जाता है । इन का जल भी अमृत के समान है । पश्चिम समुद्र में गिरने वाली नदियां पथ्यकारी एवं स्वच्छ पानी वाली हैं । पूर्वीय समुद्र में गिरने वाली नदियां धीरे धीरे चलती हैं और गुरु पानी बाकी हैं । पारियात्र पर्वत से उत्पन्न होनेवाळी, विन्ध्याचल एवं सह्याद्रि के पहाड़ों से उत्पन्न नदियां शिरोरोग, हृदयरोग, कुष्ठ और श्लीपद रोग को उत्पन्न करती हैं । बरसात का पानी, मिट्टी, कृमि, फीट, सर्प, चूहा आदि के मों से दूषित हो कर नदियों में जाकर मिलता है, इसलिये सब नदियों का पानी दूषित वा है इसलिये इस ऋतु में नदियों का पानी दोष बढ़ाने वाला होता है । बाकी,