चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 371–380
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 371–380
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सूत्रस्थानम् ३५३ ०२७ ] २३ कूंबा, वहाग, चश्मा, सरोवर, सरना आदि का पानी आनूप, पर्वत, और धन्वन अर्थात् जांग देश के गुण-दोषों के अनुसार समझना चाहिये ' । जो पानी पिच्छिल ( विकास ), क्रिमियुक्त क्रिम पसे, सरवास अथवा कीचड़ से मिला, जिस पानी का रंग बदल गया हो, रस बिगड़ गया हो, सान्द्र ( तरक न हो, गाढ़ा हो ), दुर्गन्ध युक्त हो, वह जब हितकारो नहीं है । समुद्र का
पानी विच ( आमगन्धी ) तानों दोषों को करने वाला; नमकान होता है ।
इसलिये नहीं पीना चाहिये । यह आठवां जलवर्ग समाप्त हुआ ॥ ११४-२१५ ॥
इति जनवर्गः । अथ दुग्धवर्गः ।
स्वादु शीतं मृदुस्निग्धं बहलं लक्ष्णपिच्छिलम् ।
गुरु मन्दं प्रसन्न च गव्यं दशगुणे पयः ॥ २१६ ॥
तदेवंगुणमेवोजः सामान्यादभिवर्धयेत् ।
प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्त रसायनम् ॥ २१७ ॥
महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः ।
स्नेहाऽन्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत् ॥ २१८ ॥
रूक्षाष्णं क्षीरमुष्ट्रीणामीषत्सलत्रणं लघु ।
शतं वात -कफानाह -कृमि-शाफादरार्शसाम् ॥ २५६ ॥
बल्यं स्थैर्यकरं सर्वमुष्णं चैकशर्फ पयः ।
साम्लं सलवणं रूक्षं शाखावानहर लघु ॥ २२० ॥।
छागं काषयमधुर शीतं प्राहि पयो लघु ।
रक्तपित्तातिसारनं क्षय-कास-अब रापहम् ॥ २२१ ॥
हिक्काश्वासकरं तूष्णं पित्तश्लेष्मलमाविकम् ।
हस्तिनीनां पयो बल्यं गुरु स्थैयेकरं परम् ॥ २२२ ॥
जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः ।
नावनं रक्तपित्ते च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम्॥ २२३ ॥
१. सुश्रुत में भी कहा है -अनूपदेशे यद् बारि गुग् तत् श्लेष्मवर्धकम् ।
विपरीतमतो मुख्यं वघु जाङ्गलमुच्यते ॥
सुश्रुत में कूप, तडाग, वापी झरने आदि के पानी के गुण पृथकपृथक दिये हैं ।
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[ ० २७ ३५४
रोचनं दीपनं वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।
पाकेम्लमुष्णं वातघ्नं मङ्गलं वृंहणं दधि ॥। २२४ ॥
पीनसे चातिसारे च शीतके विषमज्वरे ।
अरुचौ मूत्रकृच्छ्रं च कार्ये च दधि शस्यते ॥ २२५ ॥
शरद् -श्रीष्म-वसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् ।
रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेष्वहितं च तत् ॥ २३६ ॥
त्रिदोषं मन्दकं जातं वातघ्नं दधि, शक्रलः ।
सरः, श्लेष्मानिलघ्नस्तु मण्डः स्रोतोविंशोधनः ॥ २२७
शोफार्शी-महणी-दोष -मूत्र कृच्छ्रोदरा- रुचौ ।
स्नेहव्यापदि पाण्डुत्वे तक्रं दद्याद् गरेषु च ॥ २८ ॥
संग्राहि दीपनं हृद्यं नवनीतं नवोद्धृतम् ।
प्रण्यश- विकार-धनमदिता रुविनाशनम् ॥ २२९ ॥
स्मृति- बुद्धपनि शुक्रौजः कफ -मेदो-विवर्धनम् । वात-पित्तविषोन्माद शोषालक्ष्मी- विषापहम् ॥ २३० ॥ सर्वस्नेोत्तमं शीतं मधुरं रसपाकयोः ।
सहस्रवीर्यं विधिभिर्धृतं कर्मसहस्रकृत् ॥ २३१ ॥
मदापस्मार- मूर्च्छाय-शोषोन्माद-गर-ज्वरान् ।
योनिकर्णशिरःशूलं घृतं जीर्णमपोहति ॥ २३२ ॥
सपजावि महिषी-क्षीरवत्स्वानि निर्दिशेत् ।
पीयूष मोरटं चैव किलाटा विवधाश्च ये ॥ २३३ ॥
दीप्तामीनामनिद्राणां सर्व एते सुखप्रदाः ।
गुरवस्तर्पणा वृष्या बृंहणाः पवनापहाः ॥ २३४ ॥
बिशदा गुरवो रूक्षा प्राहिणस्तत्रपिण्डकाः ।
गोरसानामयं वर्गो नवमः परिकीर्तितः ॥ २३५ ॥
श्रीरवर्ग - दूध - मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु, मन्द, प्रसन्न इन द गुणोंवाला गाय का दूध है । ओज के भी ये ही दस गुण हैं । इस लिये सामान्य होने से दूध ओज को बढ़ाता है । इसलिये जीवनीय वस्तुओं में दूध सबसे अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है । वह रसायन है । भैंस का दूध - गाय के दूध से भारी, गाय के दूध से ठण्डा और उसमें स्नेह अर्थात् घी भी अधिक होता है, निद्रा न आने वाले के लिये तथा अभि के बहुत बढ़ने में हितकारी है, अभि को कम करता है । १. शुक्र इति पाठ: । २. मूत्रमहोदरा इति पाठः । ३. ज्वरापहम् इति पाठः ।
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are Rs } सूत्रस्थानम ३५५ ऊंटनी का दूध रूक्ष, उष्ण, थोड़ा नमकीन, घु, वात, कफ, आनाह कृमि, शोफ, उदर एवं अर्थ रोग में हितकारी है । एक खुर वाले धोड़ी या गधी, खच्चर आदि जानवरों का दूध बलकारक, शरीर को स्थिर बनाने बाळा, उष्ण, अम्ट-लवण रस, रूक्ष, हाथ पांव के वातविकारों को नाश करने वाला और लघु है । बकरी का दूध-कषाय, मधुर, शीतल, संग्राहि, लघु, रक्तपिच- अतीसार नाशक, क्षय, कास, ज्वर में हितकारी है । भेड़ो का दूध -हिका, श्वास रोग करने वाला, गरम, पित्त कफ को उत्पन्न करता है । हथिनी का दूध बल-कारक, गुरु, और शरीर को दृढ़ करने वाला है । स्त्रियों का दूध -जीवनीय, बृंहणीय, शरीर के सात्म्य, स्नेहक, नस्य के लिये और रक्तपिच में हितकारी, आंख के दुःखने में तर्पण करने के लिये उत्तम है । दही के गुण - दही रुचिकारक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, स्नेहन के योग्य, बलवर्धक, विपाक में अम्ल, उष्णवीर्य, वातनाशक, मंगलकारी, बृंहण, पौष्टिक है । पीनस, अतिसार, शीतजन्य विषमज्वर में, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, और स्वा भाविक कृशता में दही उत्तम है । शरद् ग्रीष्म और वसन्त ऋतु में दही का खाना निन्दित है । मन्दक ( जब, दही पूरी तरह न जमे उसे मन्दक कहते हैं ) दही त्रिदोषकारक है, और ठीक तरह जमा दही वातनाशक होता है । सरः ( दही के ऊपर की मलाई ) शुक्रवर्धक ( शुक्र की वृद्धि करने वाली ) है । दही का मण्ड स्वच्छ द्रबभाग ( मस्तु ), कफ-वात नाशक और स्रोतों को साफ़ करने वाला है । छाछ के गुण- शोफ, अर्श, ग्रहणी, मूत्राघात ( मूत्रावरोध ), उदर रोग अरुचि, स्नेहकर्म जन्य रोगों में, पाण्डुरोग में तथा संयोग जन्य विष में छाछ प्रशस्त है । मक्खन - संग्राही, अभिदीपक, हृच, ग्रहणी, अर्शरोग नाशक, अर्दित तथा अरुचि को मिटाता है । ताजा मक्खन ही अधिक प्रशस्त गुणकारी है, पुराना नहीं । गाय के घी के गुण - स्मरण शक्ति, बुद्धि, अभि, शुक्र, ओज, कफ- मेद, को बढ़ानेवाला, वात, पिच, विष, उन्माद, शोष, दौर्भाग्य, अशुभ एवं ज्वर का नाशक है । सब स्नेहों में घी उत्तम है, शीतल, मधुर ( रस एवं पाक में मधुर ) है । नाना प्रकार के कर्म करने वाले द्रव्यों से घी का संस्कार करने पर भी सहस्रों प्रकार के, कर्म कर सकता है । मद, अपस्मार, मूर्च्छा, घोष, उन्माद, विष, ज्वर, योनिरोग, कर्ण रोग, शिर के शूल में पुराना घी ( दस साल का पुराना --'जीर्ण तु दशवर्षातीतम् ) प्रशस्त है । अन्य बकरी आदि के घी का गुण उनके दूध के समान समझना चाहिये ।
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३५६ चरकसंहिता [ ० २७ पीयूष ( ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खीस ), मोरड ( यही पीयूष जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, इसको मोरट कहते हैं ), किकाट ( जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल किया जाय ) तथा इस प्रकार की अन्य वस्तुएं जिनकी अनि बढ़ी हुई हो, या जिनको अनिद्र रोग हो, उनके लिये सुखदायक हैं, गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक हैं । छाछ का छाना या पनीर ( छाछ या दही को कपड़े में लटका कर उसका द्रव भाग निकाल देने पर बचा भाग ) स्वच्छ, गुरु, रूक्ष और संग्राही है । यह नवां गोरस का वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१६-२३५ ॥ इति गोरसवर्गः । अक्षुवर्गः ।
वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः ।
श्लेष्मलो भक्षितस्येोर्यान्त्रिकस्तु विदह्यते ॥ २३६ ॥
शैत्यात्प्रसादान्माधुर्यात्पौण्ड्रकाद्वांशको वरः ॥
प्रभूत- कृमि-मज्जासृङ् मेदो- मांस करो गुडः ॥ २३७ ॥
क्षुद्रो गुडश्चतुर्भागविभागार्थावशेषितः ।
रसो गुरुर्यथापूर्व धौतः स्वल्पमलो गुडः ॥ २३८ ॥
यतो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलाः परम् ।
यथा यथैष वैमल्यं भवेच्छेत्यं तथा तथा ॥ २३६ ॥
वृष्याः क्षीणक्षतहिताः सस्नेहा गुडशर्कराः ।
कषायमधुराः शीताः सतिता याः सशर्कराः ॥ २४० ॥
रूक्षा वम्यतिसारघ्नी छेदनी मधुशर्करा ।
तृष्णास्रुपित्तदाहेषु प्रशस्ताः सर्वशर्कराः ॥ २४१ ॥
माक्षिकं भ्रामरं क्षा पौत्तिकं मधुजातयः ।
माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेषाद् भ्रामरं गुरु ॥ २४२ ॥
माक्षिकं तैलवणं स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते ।
क्षौद्रं तु कपिलं विद्याद् घृतवर्णं तु पौन्तिकम् ॥ २४३ ॥
वातलं गुरु शीतं च रक्तपित्तकफापहम् ।
संघात छेदनं रूक्षं कषायमधुरं मधु ॥ २४४ ॥
हन्यान्मधूष्णमुष्णार्तमथवा सविषान्वयात् ।
गुरु-रूक्षकषायत्वाच्छेत्याचापं हितं मधु ॥ २४५ ॥
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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५०
नातः कतमं किचिन्मयामासद्धि मानवम् ।
उपक्रमविरोधित्वात्सचो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४६ ॥
आमे सोष्णा क्रिया कार्या सा मध्यामे विरुध्यते ।
मध्यमं दारुणं यस्मात्सयो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४७ ॥
नानाद्रव्यात्मकत्वाच योगवाहि परं मधु । इतीक्षुविकृतिप्रायो वर्गोऽयं दशमो मतः ॥ २४ = ॥ · विकारवर्ग - गने का दांतों से चूसकर खाया हुआ रस वीर्य वर्धक, शीतल, रेचक,स्निग्ध, पौष्टिक, मधुर एवं कफकारक होता है । यान्त्रिक (कोल्हू) में पेल कर निकाला हुआ रस विदाहयुक्त हो जाता है । छिलके और गांठ के योग से उसमें विदाह उत्पन्न होता है और बाहर धूप में वायु के योग से भी विदाह उत्पन्न होता है । पौण्डा ( नरम छिलके का ) गन्ना अधिक शीतक, अधिक निर्मल ( प्रसन्नता देने वाला ) और अधिक मोठा होता है, बांस गन्ना इससे उतर कर होता है । गुरु - अतिशय कृमि, मज्जा, रक्त, मेद, और मांस को बढ़ाता है । हुद गुड़ ( काले रंग का गुड़ ), चार भाग तीन भाग और आधा भाग बचा-कर गन्ने के रस से बनाये गुड़ की अपेक्षा पूर्वापर क्रम से गुरु हैं । अर्थात् क्षुद्र गुड़ चार भाग से बने गुड़ से और चार भाग का गुड़ तीन भाग के गुड़ से अधिक गुरु हैं । साफ करके बनाया हुआ अर्थात् थोड़े मढ वाला गुरु कम नुकसान करता । इसके पीछे मत्स्यण्डिका ( राब ) खांब, शकर, उत्तरो- तर निर्मल -स्वच्छ होते जाते हैं और जिस प्रकार इनमें स्वच्छता बढ़ती है । उसी प्रकार शीतलता भी बढ़ती जाती है । अर्थात् राब से खाण्ड और खाण्ड से शकर शीतल है । गुड़ से बनी शकर वीर्यवर्धक, क्षीण, उरःक्षत के रोगी के लिये हितकारी स्नेहयुक्त होती है । धमासे के काथ से बनाई शर्करा कषाय, मधुर रस, शीतक और कुछ तिक्त होती है । मधु की शर्करा, रूक्ष, वमन, अतिसार नाशक, छेदक ( कफ आदि को तोड़ने वाली ) होती है । तृष्णा रक्तपित्त और दाह रोग में सब धर्करायें प्रशस्त हैं । मधु के गुण -मधु की चार जातियां हैं । यथा १. माक्षिक ( बड़ी मक्खियों या पिंगक रंग की मक्लियों से बना ), २. भ्रामर (भ्रमरों द्वारा बनाया) ३. क्षोद्र (छोटी मक्खियों द्वारा बना) ४. पौशिक (पीसी मक्खियों से बना श्वेत रंग का)। इन चारों प्रकार के शहद में 'मालिक' शहद श्रेष्ठ है । भ्रमरों से बनाया मधु विशेषतः गुरु होता है । माशिक शहद का रंग लेक के समान ( पीला ) और
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३५८ चरकसंहिता [ ० २७ पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीका होता है । सोद्र शहद श्वेत होता है' । मधु - वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है । मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है, इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से मारक होता है । मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा सेवन करना उराम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम विकार में उष्ण क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना प्रकार की रस -वीर्य वाली औषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह दसवां विकार वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६- २४८ ॥ इतीवर्गः । अथ कृतान्नवर्गः ।
क्षुत्तृष्णा-ग्लानि दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ ।
स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोनुलोमनी ॥ २४६ ॥
वर्पणी प्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका । १. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं- 'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं क्षात्रमेव च । आमोदालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥ ' शिलाजतु, तेल आदि भी योगवाही हैं । योगवाही होने पर भी स्नेहन कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में था, कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं । २. रोगव्वरापहा इति पाठः ।
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० २७ ] सूत्रस्थानम् VE मण्डः संदीपयत्यग्निं वातं चाप्यनुलोमयेत् ॥ २५० ॥
मृदूकरोति स्रोतांसि स्वेदं संजनयत्यपि ।
क्यानां विरितानां जीर्णे स्नेहे च तृष्यताम् ॥ २५१ ॥
दोपनत्वाल्लघुत्वाच मण्डः स्यात्प्राणधारणः ।
लाजपेया श्रमनी तु क्षामकण्ठस्य देहिनः ॥ २५२ ॥
तृष्णावीसारशमनो धातुसाम्यकरः शिवः ।
लाजमण्डोऽग्निजननो दाहमूर्च्छानिवारणः ॥ २५३ ॥
मन्दाग्निविषमानीनां बाल-स्थविर-योषिताम् ।
देव सुकुमाराणां लाज मण्डः सुसंस्कृतः ॥ २५४ ॥
क्षुत्पिपासापहः पथ्यः शुद्धानां तु मलापहः ।
शृतः पिप्पलिशुण्ठीभ्यां युक्तो लाजाम्लदाडिमैः ॥ २५५ ॥
पेया ( ग्यारह गुने पानी में थोड़ी स्विन्न होने पर बनी हुई कांजी ) भूख, प्यास, ग्लानि, दुर्बलता, उदर रोग को नष्ट करती है, स्वेदकारक, अभि को बढ़ाती और वायु, मल का अनुलोमन करती है । विलेपी ( चार गुने पानी में बनाई ) तृप्तिकारक, संग्राही लघु, हृदय के अनुकूल होती है । मण्ड ( चौदह गुने पानी में तैयार किया ) अभि का दीपन और वायु का अनुलोमन करता है, स्रोतों को कोमल करता तथा पसीना लाता है । उपवास किये, विरेचन किये, स्नेहपान के जीर्ण होने पर, प्यास लगने पर; अग्निदीपक और लघु होने से मण्ड का सेवन करना उत्तम है ( मण्ड, लघु और दीपक गुण वाला है ) । लाजपेया ( लाज अर्थात् खीलों से बनाई पेया ) श्रमनाशक, गले के खुश्क होजाने पर हितकारी है । लाजमण्ड, अभिवर्धक, दाह- मूछनाशक है । मन्दामि और विषमाझि वाले पुरुषों के लिये, बालक, वृद्ध, स्त्रियों को तथा कोमल नाजुक प्रकृति वालों को लाजमण्ड पका करके देना चाहिये । जो भूख और प्यास को सहन न कर सकते हों, पथ्य सेवन करते हों, वमन विरेचन से जो -शुद्ध देह वाले हों, परन्तु थोड़ा मल वमन विरेचन के पीछे रुक गया हो इस अवस्था में पिप्पली. सोंठ, अनारदाना ( खट्टे अनार के रस ) से बनाया लाजमण्ड अभि को बढ़ाता और वायु का अनुलोमन करता है ॥ २४ ९ -२५५ ॥
सुधतः प्रस्तुतः स्विनः संतप्तचोदनो लघुः ।
अधौतोऽप्रस्रुतोऽस्विनः शीतश्वाप्योदनो गुरुः ॥ २५६ ॥
भ्रष्टतण्डुलमिच्छन्ति गरष्मामयेष्वपि ।
मांस -शाक- सा-तैलं घृत-मज्ज-फलौदनाः ॥ २५७ ॥
धनिया,, पिप्पली, सोंठ, मरिच के साथ पकाना चाहिये ।
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३६० चरकसंहिता [ ० २०
बल्याः संतर्पणा या गुरवो गृहयन्ति च ।
सम्माषतिलं क्षीर मुद्ग- संयोग साधिता ॥ २५८ ॥
कुल्माषा गुरवो रुक्षा बातला मिनवर्चसः ।
स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य -गोधूम- यावकाः ॥ २५६ ॥
भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् ।
अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥
सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् । भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम चावल ( भात ) घु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मजा और फल इनको मिलाकर तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते है । इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका-रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो उड़द, मूंग, गेहूं, जौ आदि से पिट्टी करके बनायें जांय, वे जिस वस्तु से बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघु गुण वाले होते हैं । अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत- यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत मास- स्नेहादि से संस्कृत ] मांस रस; अग्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर भारी हैं x अर्थात् अकृत यूत्र से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक मांसरस भारी है । अल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६-२६० ॥ सक्तबो वातला रूक्षा बहुवर्थोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाख ते ।
मधुरा छघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥
प्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा- छदि-ज्वरापहाः । वायुकारक, कक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुको- मक, पीने पर जल्दी ही तुति करने वाले " एवं शीघ्र बलकारक है शाि
x अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकेबिना ।
विशेयं लक्षणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥
* सुश्रुत ने "पवनापहा " वायुनाशक किला है ।
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२० ] सूत्रस्थानम
( हेमन्त धान्य ) धान्य से बनाये खश, मधुर, कघु, शीतक होते हैं ।
संग्राही, रक्तपित्त, तृष्णा, वमन, और उपर के नाशक हैं ॥ २६१-२६२ ॥
हन्यात् व्यधीन् यबापूपो यावको बाट्य एव च ॥ २६३ ॥
उदावर्त- प्रतिश्याय -कास -मेह-गलग्रहान् ।
घानासंज्ञान्तु ये भक्ष्याः प्रायस्ते लेखनात्मकाः ॥ २६४ ॥
शुकवार्षणाचैव विष्टम्भित्वाच दुर्जराः ।
विरुद्धानाः शष्कुल्यो मधुक्रीडाः सपिण्डकाः ॥ २६५ ॥
पूपाः पूपलिकाचा गुरवः पैष्टिकाः परम् । जौ के पूरे, जौ की बढ़ियां, वाक्य, [ भूने जौ के चावल ], ये उदावर्च, प्रतिश्याय, कास, प्रमेह और गले के रोगों को मिटाती हैं । धाना ( भूने जो ), प्रायः करके ले बन, कफ आदि के उखाड़ने वाले हैं । एवं शुष्क होने से प्यास लगाने वाले है । विष्टम्भी होने से देर में पचते हैं । विरूढ धाना ( अंकुरित धान्य ), शष्कुली ( चावलों को पीसकर तिल मिलाकर तेल में पकाने से ), मधुकोड़ा ( पकाकर घन बनाकर बीच में शहद रखने से ), सपिण्डका ( मधु कोड़ा, पूरन पोली ), धूप ( पूढे ), पूपलिका ( मालपुआ; चापड़ा ), ये अत्यन्त गुरु और पौष्टिक होते हैं ॥ ६३-२६५ ॥ फल-मसि वसा-शाक पलल छौद्र-संस्कृताः ॥ २६६ ॥
भक्ष्या वृष्याश्च बल्याश्च गुरवो बृंहणात्मकाः ।
बेशबारा गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ॥ २६७ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्याः क्षीरेचुरसपूपकाः ।
सगुडाः सतिलाचैव सक्षीरक्षौद्रशर्कराः ॥ २६८ ॥
वृष्यावल्याश्च भक्ष्यास्तु ते परं गुरवः स्मृताः । फळ, मांस, वसा, शाक, पलल ( तिल का चूर्ण ), मधु इनके साथ बनाये खाद्य पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, गुरु और पौष्टिक हैं । वेशवार ( मांस में से हड्डी निकाल कर पत्थर पर पिसकर पिप्पली, मरिच, गुड़ और घी के साथ पका केने पर वेशवार बनता है ) गुरु, स्निग्ध, बलशक्तिवर्धक है । दूध और गन्ने के रस से तैयार किये खाद्य पदार्थ गुरु, तृप्तिकारक और वीर्यवर्धक है । गुड़, तिल, दूध और शर्करा से बनाये पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, और बहुत गुरु है ॥ २६६-२६८ ॥ सस्नेहा: म्नेहसिद्धाय भक्ष्या विविधलक्षणाः ॥ २६६ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्या हुथा गौधूमिका मताः । संस्काराल्लघवः सन्ति मक्ष्या मोधूमपैष्टिकाः ॥ २७०. ) '
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३६२ चरकसंहिता [ ० २७ घाना -पर्पट -पूपाद्यास्ताम्बुदुद्ध्वा निर्दिशेत्तथा । गेहूँ के आटे को घी आदि स्नेह में मथकर या बी आदि स्नेह मैं पका कर नाना प्रकार के जो खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं वे सब गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक ( बीर्यवर्धक ) और हृदय को प्रिय होते हैं । इसी प्रकार गेहूं आदि के जो पदार्थ अधिक अग्निसंयोग से तैयार किये जाते हैं, जो कि स्वभाव से गुरु हैं, वे भी संस्कार द्वारा लघु बन जाते हैं । इसी प्रकार गेहूँ की पीठी, धान्य पर्पट, पूप आदि वस्तुएं भारी होने पर संस्कार के कारण लघु बन जाती हैं । इसलिये बैद्य को संस्कार का विचार करके गुणों का निश्चय करना चाहिये || २६६ - २७० || पृथुका गुरवो भृष्टान्भक्षये इल्पशस्तु तान् ॥ २७१ ॥
यावा विष्टभ्य जीर्यन्ति सरसा भिन्नवर्चसः ।
सूप्यान्नविकृता भक्ष्या वातला रूक्षशीतलाः ॥ २७२ ॥
सकटुस्नेहलवणानल्पशो भक्षयेत्तु तान् ।
मृदुपाकाश्च ये भक्ष्याः स्थूलाच कठिनाश्च ये ॥ २७३ ॥
गुरवस्ते व्यतिक्रान्तपाकाः पुष्टिबलप्रदाः । पृथुक ( चिवड़ा ) भारी होता है । भूने हुए चिवड़े को थोड़ा खाना चाहिये । याव ( जौ का बना चिवड़ा ) पेट में अवरोध करके जीर्ण होते हैं । सरस ( न भूने हुए जौ ) रेचक हैं । सूप्य अन्न ( मूंग, उड़द आदि से बनी वस्तुएं ) वायुकारक, रूच, शीतल होते हैं । इनको कटु रस, स्नेह ( घी या तैल), नमक के साथ थोड़ी मात्रा में खाना चाहिये । जो खाद्य पदार्थ मीठी आँच पर बनते हैं और जो स्थूल और कठोर होते हैं, वे गुरु, एवं देर में पचते -हैं तथा पुष्टि और बल देते हैं ॥ २७१-२७३ ॥ द्रव्यसंयोगसंस्कारं द्रव्यमानं पृथक्तथा ॥ २७४ ॥
भक्ष्याणामादिशेद् बुद्ध्वा यथास्वं गुरुलाघवम् ।
नानाद्रव्यैः समायुक्तः पक्कामक्लिन्नभर्जितैः ॐ । २७५ ॥
विमर्दका गुरुर्हद्यो वृष्यो बलवर्त्ता हितः ।
रसाला बृंहणी वृध्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा ॥ २७६ ॥
स्नेहनं तर्पणं हृद्यं वातघ्नं सगुडं दधि । किसी पदार्थ के गुरु या लघु होने का निश्चय उस पदार्थ के मूल स्वभाव, संयोग, संस्कार ( पकाने की विधि ) ), मिलने के परिणाम ( राशि ), आदि सब बातों का विचार करके करना चाहिये । जिसमें ये बातें गुरु पक्ष में जाती वस्था बन्हिषु भर्मितेः ॥ इति वा पाठः ॥