चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 381–390
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 381–390
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STO RU ] सूत्रस्थानम ३६२ हॉ वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें कबु पक्ष में हो वह बस्तु हल्की समझनी चाहिये । विमर्दक ( मांस को नाना प्रकार से बनाने की विधि से ), नाना प्रकार के पदार्थों से मिका हुआ, पकाया, आम, क्लिन्न और भूने हुए मेद से गुरु, हृदय के लिये, प्रिय, वीर्यवर्धक और बलवान् पुरुषों के लिये हितकारी है । मलाई बाली दही को खूब मथकर इसमें दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, अजवायन, गुड़, अद्रक, सोंठ के साथ मिलाकर तैयार की रसाला पुष्टिकारक, वृष्य, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, बलकारक, रुचिकारक है । गुड़के साथ ही स्नेहक तृप्तिकारक,हृदय के लिये प्रिय और वातनाशक है । २७४-२७६ ॥ द्राक्षा-खर्जूर - कोलानां गुरु विष्टम्भि पानकम् ॥ २७७ ॥
परूषकाणां क्षौद्रस्य यचेक्षुविकृतिं प्रति ।
तेषां कटवलसंयोगाः पानकानां पृथक् पृथक् ॥२७८॥
द्रव्यमानं च विज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् ।
कटवूम्ल- स्वादु-लवणा लघवो रागषाडवाः ॥ २७६ ॥
मुखप्रियाच हृद्याच दीपना भक्तरोचनाः ।
आम्रामलकलेहाश्च बृंहणा बलवर्धनाः ॥ २८० ॥
रोचनास्तर्पणाश्वोक्ताः स्नेहमाधुर्यगौरवात् ।
बुद्ध्वा संयोगसंस्कारं द्रव्यमानं च तच्छ्रितम् ॥ २८१ ॥
गुणकर्माणि लेहानां तेषां तेषां तथा वदेत् । द्राक्षा, खजूर, बेर, फालसा, शहद, गन्ने का रस इनके रस में गुड़ या शर्कर डालकर बनाया हुआ शरबत, गुरु, मल -मूत्र का रोधक होता है । इन शरबतों में कटु या अम्ल वस्तुओं का योग तथा द्रव्य परिमाण जानकर रोग एवं रुचि के अनुसार पृथक् पृथक् रूप में देना चाहिये, इनके गुण कर्म पृथकू २ होजाते हैं । गुड़ के साथ आम रस को पका तेल, सोंठ आदि मिलाकर बनाया रस, वा अनार, दाख, फालसा, जामुन रसादि से बना मधुर पाक 'रागषाडव' कहाता है । वह कटु, अम्ल, स्वादु नमकीन, लघु, स्वादिष्ठ, हृदय को प्रिय, अमिदीपक और खाने में रुचिकर होता है । आम या आंवले के रस से बनाये चाटन, पुष्टिकारक, बलवर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक, होते हैं, क्योंकि इनमें स्नेह मधुरता और भारीपन होता है । द्रव्यों के संयोग संस्कार (पाक - विधि) और द्रव्यों की मात्रा को पाटने योग्य ( लेहों ) में देखकर विचार कर गुण कर्म का निश्चय करना चाहिये ॥ २७७-२८१ ॥
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चरकसंहिता [ ०२७ ३६४ रक्तपित्त कफोत्क्लेदि शुकं वातानुलोमनम् ॥ २८२ ॥
कन्दमूलफलार्थ च तद्वद्विद्यात्तदासुतम् ।
शिण्डाकी चाss सुतं चान्यत् काळाम्लं रोचनं लघु ।
विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाः शतमं भिषक् ॥ २८३ ॥
शुक ( चुक्र )-शुद्ध पात्र में गुड़, शहद, कांजी सहित मस्तु डालकर धान के ढेर में तीन शत रखने से शुक्त या चुक्र तैयार होता है । वह रक्त-पित्तनाशक, कफ को पतला करने वाला, वायु का अनुलोमक होता है । शुक्त में कन्द, मूल फल आदि डाले गये हों तो इसको 'आसुत' कहते हैं । चिण्डाकी ( सिरके में काला जीरा आदि डालने से ), आसुत, कालाम्ल ( देर तक रखने से जो अम्ल बन गया हो, अम्ल डालने से नहीं ) वह रोचक और लघु होता है । इस ग्यारहवें कृतान्नवर्ग का वैद्य अवश्य ज्ञान करे ॥ २८२-२८३ ॥ इति कृतान्नवर्गः । अथाऽऽहारयोगिवर्गः ।
कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ।
पित्तलं बद्धविण्मूत्रं न च लेष्माभिवर्धनम् ॥ २८४ ॥
वातघ्नेषूत्तमं बल्या त्वच्यं मेधाग्निवर्धनम् ।
तैलं संयोगसंस्कारात्सर्वरोगापहं मतम् ॥ २८५ ॥
तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जितश्रमाः ।
आसन्नतिबलाः संख्ये दैत्याधिपतयः पुरा ॥ २८६ ॥
ऐण्डतेलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् । वातासृग्गुल्म· हृद्रोग जीर्ण ज्वर- हरं परम् ।
कदुष्णं सापं तळं रक्तपित्तप्रदूषणम् ।
कफशुक्रानिलहरं कण्डूकोठविनाशनम् ॥ २८८ ॥
पियालतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् ।
हितमिच्छन्ति नात्यौष्ण्यात्संयोगे वातपित्तयोः ॥ २८६ ॥
आवस्य मधुराम्लं तु विपाके कटुकं तथा ।
उष्णवीर्यं हितं बाते रक्तपिशप्रकोपणम् ॥ २६० ॥
कुसुम्भलमुष्णं च विपाके कटुकं गुरु ।
विदाहि च विशेषेण सर्वरोगप्रकोपणम् ॥ २६१ ॥
ग्राण्डाकी इति च पाठा ।
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सूत्रस्थानम्
२६२ फलानां यानि चान्यानि तैकान्याहारसंविधो ।
गुणकर्मानि प्रयाद्यथाफलम् ॥ २९२ ॥
मधुरो इणो वृष्यो बल्यो मज्जा तथा बसा ।
यथासवं तु शैत्यौष्णे वसामजोर्विनिर्दिशेत् ॥ २ ९३ ॥
तिल का तेल कषाय अनुरस, स्वादु, सूक्ष्म ( स्रोतों में घुसनेवाला ) उम्म व्यवायी, छिद्रों में पहुंचने वाला ( शरीर में फैलनेवाला ), पित्तकारक, मक मूत्र को रोकने वाला है, परन्तु कफ को बढ़ानेवाला नहीं है । वातनाशक ओर घियों में श्रेष्ठ, बलकारक, स्वचा के लिये हितकारी, बुद्धि, ओर अभि को बढ़ाने वाला है, संयोग एवं संस्कार करने से सब रोगों को नाश करने वाला है । प्राचीन काल में इस तेल के प्रयोग से दैत्याधिपति, बुढ़ापे से रहित, विकार- शून्य, परिश्रम सहन करनेवाले, न थकने वाले, लड़ाई में बहुत बलवान् हुए थे । ( १ ) ऐरण्ड का तेल- मधुर, गुरु, कफ को बढ़ानेवाला, वातरक्त, गुल्म, हृदय रोग, अजीर्ण और ज्वरका नाशक है । सरसों का तेल कटु, उष्ण, रक्त-पित्त को दूषित करने वाला, कफ, शुक्र और वायु को नष्ट करने वाला, कन् और कोठ का नाशक है । ( सरसों के तेल कोखाने से रक्त पित्त दूषित होते हैं, मलने से नहीं ) ( ३ ) पियाक फळ ( चिरौंजी ) का तेल मधुर, गुरु, कफ को बढ़ाने वाला और बहुत गरम न होने से वात-पित्त के सम्मिलित विकारों में उत्तम है ( ४ ) अलसी का तेल-मधुर, अम्ल, विपाक में कटु, उष्णवीर्य वात-रोग में हितकारी, रक्त और पित्त को कुपित करने वाला है । ( ५ ) धनिये का तेल गरम, विपाक में कटु, गुरु, विदाहो और सब रोगों को ( दोषों को ) कुपित करने वाला है । जिन फलों से अन्य तेल तैयार किये जाते हैं, उन तैलों के गुण उन्हीं फलों के अनुसार समझने चाहिये । चिरायता तिक्तक, अतिमुक्तक, बिभीतक ( बहेड़ा ) ना रियल, बेर, अख-रोट, जीवन्ती, पियाल ( चिरौंजी ) कुर्बुदार, सूर्यबक्षी, त्रपुस, ऐरावास, ककरि कूष्माण्ड आदि के तेल मधुर, मधुवीर्य, मधुर विपाक वाले, वात पित्त को शान्त करने वाले, शीतवर्य, मार्गशोषक, मलमूत्रकारक, अग्निवर्धक होते हैं ( सुभुत ) मज्जा और वसा, मधुर रस, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, बलकारक होता हैं । इनकी शीतता और उष्णता प्राणियों के अनुसार समझनी चाहिये । जिस प्राणीका मांस उष्ण है उसकी मखा भी उष्ण, जिसका मांस शीत उस प्राणी की मजा भी शीत समझनी चाहिये ॥ २८४-२६३ ॥ सस्नेहंविपाकमधुरंदीपनं वृष्यमुष्णंरोचनं वातकफापहम्विश्वभेषजम् ॥॥ २६४ ॥
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३६६ चरकसंहिता [ ० २० www ne
श्लेष्मला मधुरा चाऽऽर्द्रा गुर्वी सिग्मा च पिप्पली ।
सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २१५ ॥
नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् ।
छेदित्वाच्छोषणत्वाच दीपनं कफवातजित् ॥ २९ ६ ॥
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कदुष्णं दीपनं लघु हि शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २६७ ॥
रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च ।
त्रिदोषनं समधुरं सैन्धवं लबणोत्तमम् ॥ २६८ ॥
सौम्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच सौगन्ध्याच रुचिप्रदम् ।
सौवर्चलं विबन्धनं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २६६ ॥
तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् ।
ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलेाम्यकरं विडम् ॥ २०० ॥
तिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्धिदम् ।
न कालवणे गन्धः सोबलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥
सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् ।
रोचनं लवणं सर्व पाकि स्रंस्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥
हत्पाण्डु- ग्रहणी-दोष -सीहानाह-गलग्रहान् ।
कासं कफज मर्शासि यावशको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥
तीक्ष्णोष्णो लघुरुक्ष क्लेदी पक्का विदारणः ।
दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंनिभः ॥ ३०४ ॥
कारव्यः कुञ्जिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बुरु ।
रोचनं दीपनं वात- कफ-दौर्गन्ध्य -नाशनम् ॥ ३०५ ॥
आहारयोगिनां भक्तिनिश्वयो न तु विद्यते ।
समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥
सोंठ -थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक, विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है । हरी पिप्पली-कफ- कारक, मधुर, गुरु औरस्निग्ध होती है । सूखी पिप्पली कफ बातनाशक कटु, उष्ण, वीर्यवर्धक है । काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, बीर्य को न बढ़ाने बाली, खघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली औरस्वादुशोषकगुरु, होनेकफवर्धकसे अभिदीपकहोती हैएवं। हींगकफ वातनाशकवायु -कफ विबन्धनाशकहै । और हरी, अवस्थाउष्णमें, अभिदीपक, घु, शुक्रनाशक, पाचक और रुचिकर है । सेन्वा समरुचि-
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७० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६० कारक, अग्निवर्धक, पुष्प, आँखों के लिये हितकारी, अविवाही, विदोषनाशक, कुछ मधुरसौ औरनमकसब नमकों( संचलमें नमकश्रेष्ठ है)-। सूक्ष्म, उष्ण, कघु होने से तथा सुगन्धि होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हथ, उद्गार ( डकार ) को शोधन करने वाला है । बिड ( काला नमक )-तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी ( शरीर में फैलने बाला होने से ) अभिदीपक, शूलनाशक, एवं बायु को ऊपर या नीचे, अघोमार्ग दोनों से अनुलोमन करने वाला है । ऊद्भिद् नमक -तिक्त, कटु, क्षारयुक्त, तीक्ष्ण उदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है । काले लवण के गुण-संच नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती । समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है । पांशुज ( सजी ) जिससे धोबी कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है । सद प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या ब्रण को पकाने वाले; संसी और बात- नाशक हैं । जौ-खार - हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, जीश, आनाह, गलरोग, कफजन्य कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं । सब प्रकार के क्षार ( टंकण, सज्जी,.. पापड़ खार आदि ) तीक्ष्ण,, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्रेदि, अन्न और व्रण को पकाने वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का छेदन करने वाले अभि के समान गुण वाले ( उष्ण ) होते हैं । कारवी ( काला जीरा, ) कुंचीका ( मोटा जीरो ) ये रुचिकर अग्नि- दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध को नाश करने वाले हैं । खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि मिश्र भिन्न है । यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २६४-३०६ ॥ इत्याहारयोगिवर्गः ।
शुकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते ।
पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥
दागच्छति क्षिप्रं ततलघुतरं स्मृतम् ।
निस्तु युक्तिभृष्टं तु सूप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥
ह्यूकधान्य ( चावक, गेहूँ आदि ), धमीधान्य ( मूंग, मसूर, उड़द आदि ) ये एक ताक पुराने प्रशस्त हैं । मान करके पुराने भाज्य होते हैं ।
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[ २० जो मान्य होने पर जल्दी उग आता है ( जैसे ग्रीष्म के वह हल्का होता है और मूंग आदि दाल की वस्तुओं को तुरहित करके छिलका उतारकर थोड़ा भून लिया जाये तो ये क्यु हो जाते हैं ॥ ३०७-२०८ ॥
सूतं कृशातिमेध्यं च वृद्धं बाळं विषेर्हतम् ।
अगोचरभृतं व्यावसूदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ ३०६ ॥
अतोऽन्यथा हितं मांसं बृंहणं बलवर्धनम् ।
प्रीणनः सर्वधातूनां यो मांसरसः परम् ॥ ३ ९ ० ॥
'शुष्य व्याधिमुक्तानां कृशानां क्षीणरेतसाम् ।
बलवर्णार्थिनां चैव रसं विद्याद्यथाऽमृतम् ॥ ३११ ॥
सर्वरोगप्रशमनं यथास्वं विहितं रसम् ।
विद्यात्स्वयं बलकरं बयोबुद्धीन्द्रियायुषाम् ॥ ३१२ ॥
न्यायामनित्याः स्त्रीनित्या मद्यनित्याश्च ये नराः ।
नित्यं मांसरसाहारा नाऽऽतुराः स्युन दुर्बलाः ॥ ३१३ ॥
त्याज्य मांस - मरा हुआ, कृश दुर्बल प्राणी का बहुत चर्बी वाला, बुढ़े पशु का, बालक का विष द्वारा मारा, अगोचरभृत अर्थात् अपने स्वाभाविक स्थान को छोड़कर दूसरे प्रदेश में पले ( जलीय देश के प्राणी को मरुस्थल में पोषण करने पर ), व्याड अर्थात् व्यात्र या सांर आदि हिंसक पशुओं से मारे हुए पशु का मांस त्याज्य है । इससे विपरीत प्रकार का मांस हितकारी, शरीर का पोषक, बलकारक है । मांस रख, पुष्टिदायक, सब प्राणियों के लिये हितकारी, हृदय को प्रिय होता है । सूखते हुए, कृश होते हुए, रोग से उठे हुए, निर्बल, शुक्र जिनका क्षीण हो गया है, बल या कान्ति को चाहने वाले पुरुषों के लिये मांसरस अमृत के समान है । मांस रस सब रोगों को शान्त करने वाला है, स्वर के लिये उत्तम, आयुवर्धन, बुद्धि और इन्द्रियों के लिये हितकारी एवं बलकारक है । जो पुरुष निस्य प्रात व्यायाम करते, स्त्री संग करते, शराब पीते हैं और नित्य प्रति मांस रस का सेवन करते हैं, वे न रोगी होते और न निर्मक होते हैं ॥ ३०१-३१३ ॥
कमिवातातपहतं शष्कं जीर्णमनार्तवम् ।
शाकं निःस्नेहसिद्धं च वर्ज्य यच्चापरिस्रुतम् ॥ ३१४ ॥
पुराणमा संक्रिष्टं कृमिन्याहिमातपैः । अदेशकाल किनं यत्स्यात्फलमसाधु तत् ॥ ३१५ H. उन्माद रोग में मांस का निषेध है-यथा 'उन्मादे
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२४ हरियानां वाशार्क निर्देशा साधनारते - स्यान्यचाम्बुमोरशाक कमिसादीनां, वातस्वे, धूपस्वेसे वर्गेमग विधिः( सूखा ), शुन्छ॥ २१६, पुराना॥ में उत्पन्न नहीं हुआ, और जो धाक बिना स्नेह ( घी या तेव ) के तैयार किया गया हो और जिसका कि भांप कर पानी न निकाल दिया गया हो, वह धाक स्याज्य है । जो फल पुराना, ( बहुत पका ), कच्चा, सड़ा, कृमि सर्प या हिंसक पश्च से खाया हुआ हो बर्फ या धूप से खराब हो, भले देश में उत्पन्न न हुआ, किन्न ( सड़ा ) हो वह फल उत्तम नहीं । पकाने की विधि को छोड़कर हरित- वर्ग को शाकों की भाति समझना चाहिये । अर्थात् इनमें पानी का निचोड़ना, घी आदि में संस्कारित करना नहीं है । मद्य, जल, दूध आदि के अच्छे- बुरे का निश्चय इनके अपने अपने वर्ग में कर दिया है ॥ ३१४-३१६ ॥
यदाहारगुणैः पानं विपरीतं तदिष्यते ।
अन्नानुपानं धातूनां दृष्टं यन्न विरोधि च ॥ ३१७ ॥
आसवानां समुद्दिष्टा अशीतिश्चतुरुत्तरा ।
जलं पेयमपेयं च परीक्ष्यानुपिवेद्धितम् ॥ ३१८ ॥
स्निग्धोष्णं मारुते शस्तं पित मधुरशीतलम् ।
कफेऽनुपानं रूक्षोष्ण, क्षये मांसरसः परम् ॥ ३१६ ॥
उपवासाध्व भाष्य-स्त्री मारुतातप -कर्मभिः ।
कान्तानामनुपानार्थं पयः पथ्यं यथाऽसृतम् ॥ ३२० ॥
सुरा कृशानां पुष्ट्यर्थमनुपानं प्रशस्यते ।
कायर्थ स्थूलदेहानामनुशस्तं मधूदकम् ॥ ३२१ ॥
अल्पानीनामनिद्राणां तन्द्रा -शोक-भय-क्लमः ।
मद्यमांसाचितानां च मद्यमेवानुशस्यते ॥ ३२२ ॥
अयानुपानकर्म प्रवक्ष्यामि- अनुपानं तर्पयति, प्रीणयति, ऊर्जयति, पर्याप्तिमभिनिवर्तयति, भक्तमवसादयति, अन्नसंघातं भिनति, मार्दव-मापादयति, क्लेदयति, जरयति, सुखपरिणामिवामाशुन्यबायितां चाSS-हारस्योपजनयतीति ॥ ३२३|| अनुपान जो पेय पदार्थ आहार गुण के विपरीत ( यथा- उष्ण आहार के पीछे शीत अनुपान ) तथा जो धातुओं का विरोधी न हो अपितु साम्य करने अनु-पश्चात् भोजनात् इत्यर्थः पानं जन्मदिपानम् ॥ दाह के पीछे मधुर, दूध वा पीछे कोणी ( सहा ) अनुपान न देवें, इसलिये कि धातुओं का विरोधी न हो ।
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www wwwwwwwww.mm [ ३०० चरकसंहिता ० २० बाका हो, वह अनुपान प्रशस्त है । 'यमःपुरुषीय' अध्याय में चौरासी प्रकार के आसव कहे हैं । वह पीना हितकारी है, या नहीं इसका विचार करके हितकारी to पीना चाहिये । वायुदोष में स्निग्ध और उष्ण; पित्तविकार में मधुर और शीतक कफ में रूक्षा एवं उष्ण तथा लय में रस का अनुपान श्रेष्ठ है । उपवास से, मार्ग चलने से ऊँचे या बहुत बोलने से स्त्रीसंग, वायु, धूप या पंच कर्मों के कारण जो थके हुए हों, उनको अनुपान देने के लिये दूध अमृत के समान पथ्य, हितकारी है । मोटे शरीर वालों को पतला बनाने के लिये पानी में शहद मिलाकर देना उत्तम है । जिनको मन्दग्नि हो, नींद न आती हो, तन्द्रा, शोक, भय, क्लम से थके, मद्य मास सेवन करने वालों के लिये मद्य अनुपान ही श्रेष्ठ है । अनुपान के कर्म ( गुण ) कहते हैं - अनुपान शरीर का तर्पण करता है, शरीर को और जीवन को पुष्ट करता है, तेज बढ़ाता है, खाये हुए भोजन से मिलकर शरीर में मिल जाता है, खाये हुए को पचाता है, मिले हुए अन्न को तोड़ता,पृथक् पृथक् करता है । शरीर में कोमलता है, आहार को क्लिन करता, पचाता और सुख पूर्वक पचाकर शीघ्र शरीर में व्याप्त कर देता है ॥ ३२३ ॥
- भवति चात्र अनुपानं हितं युक्तं तर्पयत्याशु मानवम् ।
सुखं पचति चाऽऽहारमायुषे च बलाय च ॥ ३२४ ॥
योग्य हितकारी अनुपान मनुष्य को शीघ्र तर्पण कर देता है । भोजन को सुखपूर्वक पचाता है और आयु एवं बल को बढ़ाता है ॥ ३२४ ॥
नोर्ध्वाङ्गमारुताविष्टा न हिका-श्वास-कासिनः ।
न गीत-भाष्याध्ययन-प्रसक्ता नोरसि क्षताः ॥। ३२५ ॥
पिबेयुरुदकं भुक्त्वा, सद्धि कण्ठोरसि स्थितम् ।
स्नेहमाहारजं हत्वा भूयो दोषाय कल्पते ॥ ३२६ ॥
अनुपानैकदेशोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ।
द्रव्यं तु न हि निर्देष्टुं शक्यं कास्म्र्त्स्न्येन नामभिः ॥ ३२७ ॥
यथा नानौषधं किंचिद्देशजानां वचो यथा ।
द्रव्यं तत्तत्तथा वाच्यमनुक्तमिह यद्भवेत् ॥ ३२८ ॥
किनको अनुपान नहीं करना चाहिये - कण्ठ, छाती; शिर, ( ऊयोग ) मैं जब वायु का जोर से, जिनको हिचकी, प्रवास, कास रोग हो, ग्रीड, भाषण, अध्ययन में यो खगे रहते हों, जिनकी छाती में पोट कमी हो इनको भोजन
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ero Ro ] सूजस्थानम् करके पानी अनुपाम रूप में नहीं पीना चाहिये । इस अवस्था में पिया रानी कण्ठ, छाती ( आमाशय ) में स्थित आहारजन्य स्नेह को दूषित करके नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है । प्रायः उपयोग में आने वाले आहार, खान- पान का कुछ मान यहाँ पर कह दिया है । खानपान के सब द्रव्यों का नाम से कथन करना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार की कोई भी औषध रहित वनस्पति नहीं, जिस प्रकार देश वाले उसे जैसा गुणकारी या हानि कारक कहते हों, उसके अनुसार यहाँ पर न करे हुए
द्रव्य को समझना चाहिये । गुणशान के विषय में और भी कहते हैं ॥ ३२८॥
चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया ।
लिङ्ग प्रमाणं संस्कारो मात्राचात्र परीक्ष्यते ॥ ३२६ ॥
चरोऽनूप जलाकाश-घन्वाद्यो भक्ष्यसंविधिः ।
जलजानूपजाचैव जलानूपचराश्च•ये!॥ ३३० ॥
गुरुभक्ष्याश्च ये सवाः सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।
लघुभक्ष्यास्तु लघवो धन्वजाधन्वचारिणः ॥ ३३१ ॥
शरीरावयवाः सक्थि-शिर -स्कन्धादयस्तथा ।
सक्थिमांसाद् गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्ततः शिरः ॥ ३३२ ॥
वृषणौ चर्ममेद' च श्रोणी वृकौ यद् गुदम् ।
सद् गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ३३३ ॥
स्वभावाल्लघवो मुद्गास्तथा लावकपिञ्जलाः: स्वभावाद गुरवो भाषा वराहमहिषास्तथा ॥ ३३४ ॥
धातूनां शोणिताद्यानां गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ।
अलसेभ्यो विशिष्यन्ते प्राणिनो ये बहुक्रियाः ॥ ३३५ ॥
गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां खीणां च लाघवम् ।
महाप्रमाणा गुरवः स्वजातौ लघवोऽन्यथा ॥ ३३६ ॥
चर ( जिस स्थान पर विचरता है ), शरीरावयव ( शरीर का अंग ), स्वभाव ( प्रकृति ), धातु ( रस, रक्तादि धातु ), क्रिया, लिंग, प्रमाण, संस्कार, मात्रा ये बातें गुरु लघु विचार करने में देखनी चाहिये । चर, गति रूपचर वीर भव्य रूप घर मेद से दो प्रकार के हैं । इनमें गति रूप पर आनूप अर्थात् बहुल प्रदेश में विचरने वाले, आकाश में, धन्व देश में तथा जक आनूप दोनों देशों में विचरने वाले हैं । मध्य रूप चर गुरु, श्रीतक पदार्थ
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चरकसंहिता [ ० २७ खाते हैं ऐसे दोनों प्रकार के प्राणी गुरु होते हैं । धन्य प्रदेश में उत्पन्न या धन्य ( रेवीके ) देश में विचरने वाले तथा कघु भोजन करने वाले प्राणी कघु होते हैं । जांघ, शिर, स्कन्ध आदि शरीर के अवयव हैं । इनमें जंघा से स्कन्द, स्कन्ध से क्रोड़ और क्रोड़ से शिर का मांस गुरु होता है । शिर से वृषण और वृषण से इनका धर्म, फिर शिश्न, फिर भोणी भाग, फिर वृक ( गुर्दे ) और फिर यकृत्, उसके पीछे गुर्दा और पीछे मध्यास्थि ( मजा या अस्थि के ऊपर का मांस) गुरु होता है । स्वभाव वा प्रकृति से मूंग, बटेर कपिंजल लघु होते हैं और उड़द सुअर, भैंस ये गुरु होते हैं । धातुओं में रक्त मांस, और मेद ये क्रमशः उत्तरोत्तर गुरु होते जाते हैं । जो प्राणी बहुत चेष्टाशील होते हैं, वे आलसी स्वभाव वाले प्राणियों से भिन्न अर्थात् लघु होते हैं ( आरसी प्राणी गुरु होते हैं ) लिंग की दृष्टि से मर गुरु और मादा पशु लघु होते हैं, ( पशुओं में यह नियम है, परन्तु पक्षियों में नर लघु होता है । ) अपनी जाति में बड़े शरीर वाले गुरु और छोटे शरीर के प्राणी लघु होते हैं ॥ ३२९ -३३६ ॥
गुरूणां लाघवं विद्यात्संस्कारात्सविपर्ययम् ।
श्रीहेर्लाजा यथा च स्युः सचना सिद्धपिण्डिकाः ॥। ३३७ ॥
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने ।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ ३३८ ॥
गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।
मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते मात्रा चाग्निमपेक्षते ॥ ३३६ ॥
बलमारोग्यमायुश्च प्राणावाग्नौ प्रतिष्ठिताः ।
अन्नपानेन्धनेाग्निर्दीप्यते शाम्यतेऽन्यथा ' ॥ ३४० ॥
गुरुलाघवचिन्तेयं प्रायेणाल्पबलान् प्रति ।
मन्दक्रियाननारोग्यान् सुकुमारान् सुखोचितान् ॥ ३४१ ॥
दीमाग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महादराः ।
ये नराः प्रति तचिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ३४२ ॥
संस्कार द्वारा गुरु पदार्थ लघु और लघु पदार्थ गुरु बन जाते हैं । जैसे हि ( धान्य ) स्वभाव से गुरु हैं, परन्तु काजा के रूप में अघु बन जाते हैं और सच स्वभाव से घु होने पर भी उनकी आग से पकाई पिण्डिकायें १. उचक्रपति व्येति चान्न्रथा इति वा पाठः ।