चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 391–400
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 391–400
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०२७ ] सूत्रस्थानम् गुरु होजाती हैं । गुरु पदार्थों को थोड़ा और बघु पदार्थों को अधिक सेवन करने से वे गुरु हो जाते हैं । इसलिये गुरु कता के निश्रय करने में भी मात्रा कारण है । गुरु पदार्थों को थोड़ा लेना और कघु पदार्थों को तुतिपूर्वक खाना चाहिये जिससे पेट फूल न जाय, श्वास चढ़ने न लगे । द्रव्य, मात्रा अर्थात् परिमाण की अपेक्षा करते हैं और मात्रा अभि को अपेक्षा करती है । क आरोग्यता, आयु और प्राण अभि पर आभित हैं -अग्नि के अधीन हैं । अब पान ( खान, पान ) रूपी इन्धन से अग्नि प्रदीप्त होती है, और खान पान के न मिलने से वह बुझ जाती है, शान्त होजाती है । जो पुरुष अल्प वळवाडे हो, मन्द क्रिया, मन्द-चेष्टावाले, अनारोग्य, रोगी, सुकुमार अर्थात् नाजुक प्रकृति, के आराम का जीवन व्यतीत करने वाले हैं उनके विषय में गुरु - बु का विचार करना चाहिये जिनकी अग्नि प्रचल हो, जो कठिन आहार को भी पचा सकते हो, नित्य मेहनत करने वाले, बड़े पेट वाले, जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो उनके विषय में गुरु लघु का विचार करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ३३७-३४२ ॥
हिताभिर्जुहुयान्नित्यमन्तराग्नि समाहितः ।
• अन्नपानसमिद्धिर्ना मात्राकालौ विचारयन् ॥ ३४३ ॥
आहिताग्निः सदा पथ्यान्यन्तरानौ जुहोति यः ।
दिवसे दिवसे ब्रह्म जपत्यथ ददाति च ॥ ३४४ ॥
नरं निःश्रेयसे युक्तं सात्म्यज्ञं पानभोजने ।
भजन्ते नाssमयाः केचिद्भाविनोऽप्यन्तरादृते ॥ ३४५ ॥
त्रिशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः ।
जीवत्यनातुरो जन्तुर्जितात्मा संमतः सवाम् ॥ ३४६ ॥
मनुष्य को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करके, हितकारी खान-पान रूपी समिधाओं से अन्तरामि में नित्यप्रति संयमित चित्त से हवन करे । at आहिताग्नि हवन करने वाला नित्य प्रति दोनों समय अन्तराग्नि में हितकारी अम की आहुति देकर ब्रह्म ( ओंकार ) का जप करता है और यथाशक्ति दान करता है, जिसको खान-पान सम्बन्धी साम्य का ज्ञान होता है, ऐसे पुण्यवान् पुरुषको कारण के बिना कभी भी रोग नहीं होते । इसी प्रकार संचित धर्म के प्रभाग से जन्मान्तर में भी रोग नहीं होते । हितकर आहार करने वाला व्यक्ति ३६००० रात्रि ( १०० वर्ष ) पर्य्यन्त मीरोगी, जितेन्द्रिय, और समनों से
भूषित होकर निवास करता है । २४३-३४६ ॥
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चरकसंहिता
पान -प्राणाः प्राणभृतामन्त्रमन्नं लोकोऽभिधावति ।
वर्णः प्रसादः सौस्वर्य बीचितं प्रतिभा सुखम् ॥ ३४७ ॥
तुष्टिः पुष्टिर्व मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
लौकिकं कर्म यद्वतौ स्वर्गतौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥
कर्मापवर्गे यथोक्तं तत्राप्यन्ने प्रतिष्ठितम् । अन, सब प्राणियों का प्राण है, सारा संसार इसी अन्न की याचना करता है ( पेट के लिये आदमी सब कुछ करता है ) । अन्न में ही वर्ण, शरीर की प्रशखता, सुस्वरता, जीवन, प्रतिभा, सुख, तुष्टि, हर्ष, पोषण, बल, मेघा, ये सब बातें स्थिर हैं । सांसारिक कर्म, तथा स्वर्ग प्राप्ति में यज्ञादि जो वैदिक मोक्षदायक यश, तप आदि कर्म हैं, वे सब अन में प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४७-३४८ ॥ तत्र श्लोकः ——अन्नपानगुणाः साग्र्या वर्गा द्वादश निश्चिताः ॥ ३४ ९ ॥
सगुणान्यनुपानानि गुरुलाघवसंग्रहः ।
अन्नपानविधावुक्तं तत्परीक्ष्यं विशेषतः ॥ ३५० ॥
इस अजपान नामक अध्याय में, अन्न-पान के गुण, बारह वर्गों में कह दिये हैं । अनुपान के गुण, गुरु एवं लघु विषय का निरूपण किया है, इस विधि को विचार कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४६-३५० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अद्यपान विधिर्नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः अथातो विविधाशितपीतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब से 'विविधाधित - पीतीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विविधम शितपीत -लीढ़-खादितं जन्तोर्हितमन्तरभिसन्धुचितबलेन यथात्वेनोष्मणा सम्यग्विपच्यमानं कालवदनवस्थित सर्वधातुपाकमनु- पसर्वातून मदतस्रोतः केवलं शरीरमुपचय -बल-वर्ण -सुखाबु योजयति, शरीरधात्नुर्जयति । भातको हि पात्याहाराः प्रकृतिन वर्तन्ते ॥ ३ ॥
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नम् I ८] पृथ्वी प्रकारमनुष्यका हितकारीका सायापदार्थ, पीया,,जाठराशिचाटा या केबनाकरप्रदीप्तदासों सेके सम्माकारण,भोजन, नामा जल, तेज, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों को अपनी-अपनी गरमी से ( पृथ्वी आदि के गुण वाले ) आहार द्रव्यों का पाचन होता है । इस प्रकार से पचा हुआ अन्न काल की भांति नित्य निरन्तर गति करता हुआ, सथ घाटको के निरन्तर पाक होने से जिस शरीर में क्षीणता उत्पन्न होरही है उस शरीर को तथा जिस शरीर में सब धातुओं की गरमी बनी हुई है, और वायुवह स्रोत. जिस शरीर में उपस्थित हैं, ऐसे सम्पूर्ण शरीर को वृद्धि करने के साथ साथ वल, वर्ण, सुख और आयु देता है, तथा शरीर के धातुओं को तेज प्रदान करता है । धातु हो जिनका भोजन है ऐसे रसादि धातु नित्य प्रति कोण होते हुए खाये हुए भोजन रूपी धातु को खाकर स्वस्थ अवस्था में रहते हैं ॥ ३ ॥
तत्राऽऽहारप्रसादाख्यो रसः किटं च मलाख्यमभिनिर्वर्तते किट्टात् स्वेद - मूत्रपुरीष-वात-पित्त -लेष्माणः कर्णाक्षि नासिकास्य- लोम- कूप-प्रज- नन- मलाः केश-इमश्रु -लोम- नखादयश्चावयवाःपुष्यन्ति । पुष्यन्ति त्वाहार- रसात्रस- रुधिर-मांस -मेदोऽस्थि मज्ज- शुक्रौजांसि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि घा -तुप्रसादसंज्ञकानि शरीर -सन्धि-बन्ध- पिच्छादयश्चावयवाः ते सर्व एव धा- तवो मलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुष्यन्तः स्वं मानमनुवर्तन्ते यथावयः शरीरम् । एवं रसमलौ स्वप्रमाणावस्थितौ आश्रयस्य सम धातोर्घातुसाम्यमनुवर्तयतः; निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां धातूनां वृद्धिक्षयाभ्यामाहारमूलायो रसः सात्म्यमुत्पादयत्यारोग्याय, किटं च मलानामेवमेव । स्वमानातिरिक्ताः पुनरुत्सर्गिणः शीतोष्णपर्य- यगुणैश्चोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यन्ते । तेषां तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतस्ययनमुखानि तानि यथाविभागेन यथास्वं धातूनापूरयन्ति । एवमिदं शरीरमशित-पोत -लीढ· खादित- प्रभवम्, अशित- पीत लोढ खादित-प्रभवाश्चास्मिन् शरीरे व्याधयो भवन्ति हिवाहितोपयोगविशेषास्त्वत्र शुभाशुभविशेषकरा भव--न्वीति ॥ ४ ॥
इस आहार से तीन वस्तुएं बनती हैं एक चादरूपी रख, २. किड र ग और २. व इनमें कि माय के पधोना, मूत्र, मन, बाबु, दिकफ और कान, आंख, नाक, सुख, कोम, कूप ओर सिम के उत्पन्नदो हैं । मा फेक दी रोम ( घरके बा ) और आदि -
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E चरकसंहिता यच पुष्ट होते हैं । आहार के प्रसाद रूपी रसभाग से, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा, शुक्र, ओज तथा पृथ्वी, अ, तेज, वायु, आकाश ( ये पंच महाभूत तो इन्द्रियों को बनाने वाले हैं ) अत्यन्त शुद्ध रूप में स्थित धातु, शरीर को बांधने वाली स्नायु, शिरा आदि सन्धियां, आक और दूध बनाते हैं । ये सब मल नामक धातु या प्रसाद रूप धातु रस और मल द्वारा पुष्ट होते हुए आयु के अनुसार अपने परिणाम में बनते हैं ( अथवा कृश, स्थूल, छोटे, बड़े में अपने परिणाम से बनते हैं ) । G आहार के रसादि धातु में बदलने के विषय में एक पक्ष यह है कि र, रक्त धातु में बदलता है और रक्त, मांस में, इस प्रकार आगे परिवर्तन- होता जाता है । जिस प्रकार दही जमते हुए सम्पूर्ण दूध दही रूप में बदलता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण रस रक्त रूप में बदल जाता है और रक्त मांस मैं इसी प्रकार आगे । दूसरे आचार्य इस परिवर्तन को 'केदार कुल्याम्याय' से मानते हैं । अर्थात् खेत में बहतो पानी की धार में से प्रत्येक क्यारी अपना २ पानी ले लेती है इसी प्रकार यहां पर भी अन्न से उत्पन्न रस, रस धातु में जाकर कुछ भाग से रस बन जाता है और शेष रस भाग रक्त में जाकर रक्त के गन्ध, वर्ण से मिल कर रक्त बन जाता है और शेष रख भाग आगे मांस धातु में पहुंचता है, वहां मांस के गन्ध-वर्ण में मिलकर मांस बन जाता है, और इससे अवशिष्ट रस भाग मेद में चला जाता है, वहां भी पूर्व की भाँति क्रिया होती है । इसी प्रकार आगे २ चलता जाता है । तीसरे पक्ष वाले कहते हैं कि- अन रस पृथक् २ धातुमार्ग में जाकर रसादि धातुओं का पोषण करता है, यह नहीं कि इस धातु को पोषण करने वाला ही रक्त धातु में जाता है । रस आदि को पोषण करने वाले स्रोत उत्तरोत्तर सूक्ष्म मुख वाले और लम्बे हैं । इस प्रकार से रस को पोषण करने वाला भाग रसमार्ग में गमन करके रस का पोषण करता है, एवं रस का पोषण करने के पीछे रक्त पोषक मार्ग में जाने से रक्त का पोषण करता है, इस प्रकार रक्त का पोषण करने के पीछे मांस को पोषण करने वाला रस भाग दूर एवं सूक्ष्म मार्ग में गमन करने से मांस का पोषण करता है । इसी प्रकार आगे मेद आदि का पोषण हो जाता है । इस पक्ष में दूध आदि वृष्य वस्तुओं से उत्पन्न रख प्रभाव से शीघ्र ही शुक्र से मिलकर शुक्र का पोषण कर देता है, इसी प्रकार तुावस्था में भी एक दोष के दुष्ट होने से अन्य धातु दुष्ट नहीं होते, परन्तु परिमाण पक्ष में रस धातु के दुष्ट होने से रक आदि सेभाभीशरीर कीदूषितमृत्युहो जातेहोनीहैंचाहिये, इसके औरअतिरिक्तएक परिणाममाह के पक्ष मेंसेवनतीन सेचारदो उपवाससम्पूर्क:
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सूचन इस प्रकार से शरीर के अपने स्वरूप में ( न अधिक और न कम परिमाण में ) स्थित होने पर धातुसाम्यावस्था में रहते हैं । प्रसाद रूप धातुर्थीका क्षय या वृद्धि जो निमित को लेकर होती है, वह आहार के कारण ही होती हैं, इस किये आहार द्वारा वृद्धि और क्षय का सात्म्य उत्पन्न होकर आरोग्यता उत्पन्न होती है इसी प्रकार किट्ट और मछ भी शरीर के आरोग्य सम्पादन में सहायक होते हैं | अपने परिमाण से अधिक बढ़े हुए किट्ट और मल को बाहर निकाल कर तथा शीत से उत्पन्न मल में उष्ण, उष्ण से उत्पन्न मल में शीत परिच सेमल शरीर के धातुओं को समानावस्था में रखते हैं । इन मल अर्थात् प्रसाद नामक धातुओं के स्रोत गमन करने के मार्ग हैं और ये स्रोत जो जो जिन जिनके हैं उन उन धातुओं को पूर्ण करते हैं । इस प्रकार से यह सम्पूर्ण शरीर खाये, पिये, चाटे, चाखे आहार रूपी रस से पूर्ण होता है । और रोग भी इस शरीर में खाये, पिये, चाटे आदि भोजन से उत्पन्न होते हैं । इसमें हित बस्तुओं का उपयोग शुभकारी और अहित वस्तुओं का उपयोग अशुभकारी होता है ॥ ४ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - दृश्यन्ते हि भगवन्! हितसमाख्यातमप्याहारमुपयुञ्जाना व्याधिमन्तश्चागदाश्च तथैवाहित-समाख्यातम् एवं दृष्टे कथं हिताहितोपयोगविशेषात्मकं शुभाशु- भविशेषमुपलभामह इति ॥ ५ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः न हिताहारोपयोगिनामग्निवेश! तन्निमित्त- व्याधयो जायन्ते, न च केवलं हिताहारोपयोगादेव सर्वं व्याधिभयमति-क्रान्तं भवति, सन्ति हि ऋतेऽप्यहिताहारोपयोगादन्या रोगप्रकृतयः, -,,, प्रज्ञापराधः शब्द-स्पर्शतद्यथा-रूप -काळरस- विपर्ययःगन्धाश्चासात्म्या इति ताच रोगप्रकृतयोपरिणामश्यरसान सम्यगु-पयुब्जानमपि पुरुषमशुभेनोपपादयन्ति तस्माद्विताहारोपयोगिनोऽपि दृश्यन्ते व्याधिमन्तः । अहिताहारोपयोगिमा पुनः कारणतो न सद्यो दोषवान् भवत्यपचारः, न हि सर्वाण्यपथ्यानि तुल्यदोषाणि, न च सर्वे दोषास्तुल्यबलाः, न च सर्वाणि शरीराणि व्याधिक्षमित्वे समर्थानि भवन्ति, तदेव पर्थ्य देश-काळ -संयोग- वीर्य प्रमाणातियोगाद् भूय-शरीर शुक्रमय ही होना चाहिये और 'केदारकुल्या न्याय, वाका पच तीसरे के समान ही है । इसमें भी पुष्य वस्तुएं प्रभाव से शीघ्र शुक्र को उत्पन्न कर देती है ।
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[ २ स्वरसमध्ये संपद्यते स एव दोषः संसृष्टयोनिर्विषोपमम्मी- रिस्थितः प्राणायतनसमुत्यो ममप्रभाती वा भूवानमा चित्र- कारितमय संपयते, शरीराणि चातिस्थूलान्यतिकशाम्यनिविष्ठांसो णितास्थीनि दुर्बलान्यसाम्याहारोपचितान्यत्पहाराण्यपसरवानि वा भवन्त्यव्याधिसहानि, विपरीतानि पुनर्व्याधिसहानि, एम्बापध्या- हार- दोष शरीर-विशेषेभ्यो व्याधयो मृदवो दारुणाः क्षिप्रसमुत्याश्चिर-कारिणश्च भवन्ति । अत एव च वात- पित्त श्लेष्माणः स्थानविशेषे प्रकु-पिता व्याधिविशेषानभिनिवर्तयन्त्वग्निवेश! ॥ ६ ॥
इस प्रकार से कहते हुए आत्रेय ऋषि को अनिवेश बोले-'हे मयवान् । संसार में देखने में आता है, कि जो मनुष्य हितकारी आहार का उपभोग करते हैं, वे रोगी दिखाई देते हैं और अहितकारी भोजन करने वाले भी नीरोग दीखते हैं । अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा-हे अग्निवेश! जो मनुष्य हितकारी अन्न खाते हैं उनको इनके कारण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते और न hee हित आहार का उपसेवन ही सब रोगों से बचा सकता । अहित आहार को छोड़कर कुछ दूसरी भी रोग की प्रकृति है । यथा का विपर्य्यय ( ऋतुओं का परिवर्तन ), प्रज्ञापराध और परिणाम, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का अात्म्य ( अतियोग, मिथ्यायोग, या अयोग ) होना । ये रोग के कारण आहार रों का सम्यक् प्रकार से उपयोग करने पर भी पुरुष में अशुभ लक्षण उत्पन्न कर देते हैं । इसलिये हितकारी आहार को सेवन करने वाले भी रोगी दिखाई देते हैं । इसी प्रकार जो व्यक्ति अहित आहार का उपसेवन करते हैं, उनमें रोगों के ये कारण जल्दी दोषयुक्त नहीं होते । क्योंकि सम्पूर्ण अपथ्य समान दोषकारक नहीं हैं और सब दोष समान व वाले भी नहीं हैं और सारे शरीर रोम को सहन करने में समर्थ नहीं होते । इसलिये अपथ्य देश चावल पिचकारक हैं, यही आनूप देश के योग से अधिक अपथ्य कारक हो जाता है, काळ ( शरत्काळ में अपस्य बलवान् और हेमन्त में निर्बल ), संयोग दही राब के साथ बलवान् और शहद केसाथ निर्वक ), वीर्य ( संस्कार वा उष्ण करने से अपथ्यतमचोर शीत से अपथ्य ), प्रमाण अर्थात् मात्रा के अतियोग से अपश्यतम ओर होन क से निर्बक बन जाते हैं । इस प्रकार बहुत से कारणों के मिलने से, विरुद्ध चिकित्सा होने से गम्भीर आशयों में, शरीर के बहुत अन्तर प्रवेश कर जाने से १. त्वमांसाभयमुखानं गम्भीरं स्वन्तराश्रयम् ।
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तथा शरीर में चिरकाल से पक जाने पर, आदि दस मायामयों मेंस्थित होने से, मर्मस्थानों को पीड़ित करने से बहुत दुःख देने के कारण अगम्य होने से, शीघ्र विकार उत्पन्न करने से अपथ्य बलवान् बन जाता है । इसी प्रकार बहुत मोटा, बहुत कुछ, जिनके मांस, रक्त, अस्थि, ढोडे, निर्बंध हो गये हों जो विषम शरीर वाले हैं, जो असात्म्य आहार को सेवन करने वाले, धोका खाने वाले अल्प सत्व वाले शरीर रोगों को सहन नहीं कर सकते । इनके विक रीत गुणों वाले शरीर व्याधि को सहन कर सकते हैं । इसलिये अपथ्य आइन्द दोष शरीर को विशेषता से रोग मृदु, दारुण, शीघ्र होने वाले, अथवा देर में होने वाले होते हैं । इसलिये हे अभिवेश! वात, पित्त, कफ विशेष स्थानों में कुपित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५-६ ॥ तत्र रसादिषु स्थानेषु प्रकुपितानां दोषाणां यस्मिन् यस्मिन् स्थाने ये ये व्याघयः संभवन्ति तांस्तान् यथावदनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥
अश्रद्धा चारुचिचास्य वैरस्पमरसज्ञता ।
लासो गौरवं तन्द्रा साङ्गमर्दो ज्वरस्तमः ॥ ८ ॥
पाण्डुत्वं स्रोतसां रोधः क्लैन्यं सादः कृशाङ्गता ।
नाशोऽरयथाकालं वलयः पलितानि च ॥ ६ ॥
रसप्रदोषजा रोगा, वक्ष्यन्ते रक्तदोषजाः ।
कुष्ठ - वीसर्प पिडका रक्तपित्तमसृग्दरः ॥ १० ॥
गुदमेद्रास्यपाक सीहा गुल्मोऽथ विद्रधी ।
नीलिका कामला व्यङ्ग विसवस्तिलकालकाः ॥ ११ ॥
ददुश्वर्मदलं श्वित्रं पामा कोठासमण्डलम् ।
रक्तप्रदोषाज्जायन्ते, शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १२ ॥
अघिसार्बुदं कील-गल-शालक -शुण्डिकाः ।
पूतिमांसाळजी-गण्ड-गण्डमालोपजिह्विकाः ॥ १३ ॥
विद्यान्मांसाश्रयान्, मेदःसंश्रयास्तु प्रचक्ष्महे ।
निन्दितानि प्रमेहाना पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १४ ॥
अभ्यस्थि- दन्तदन्तास्थि - भेदशूलं विवर्णता ।
'केश -छोम -नख -श्मश्रु -दोषाचास्थिप्रकोपजाः ॥ १५ ॥
रुक पर्वणां भ्रमो मूर्च्छादर्शनं तमसो मताः ।
अछाम पर्वजानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥
मोदकाव्यमर्षयम् ।
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चरकसंहिता २८ रोगिणं वा की मल्पायुविरूपं वा प्रजायते ॥ १७ ॥
न या संज्ञायते गर्भः पतति प्रस्रवत्यपि ।
शुक्रं हि दुष्टं सापत्यं सदारं बाधते नरम् ॥ १८ ॥
इनमें रस आदि स्थानों में कुपित बात आदि दोष, जिस जिस स्थान पर जो जो रोग उत्पन्न करते हैं उन उन रोगों को कहते हैं - अमदा, भोजन में श्रद्धा न होना, अरुचि ( भोजन में अरुचि, अनिच्छा ), मारीपन, तन्द्रा, शरीर में पीड़ा, ज्वर, तम, अन्धकार, पाण्डु वर्ण स्रोतों का अवरोध, नपुंसकता, साद ( शिथिलता ) शरीर की निर्बलता, अभि ( जाठराशि ) का नाश, विना समय के झुर्रियां और बालों का श्वेत होना ये रसजन्य रोग हैं । रक्तजन्य रोग कहते हैं -कुष्ठ, वीसर्प, पिडकार्ये, रक्तपित्त, रक्तप्रदर, गुद-पाक, शिश्न का पकना, सीहा, गुल्म, विद्रधि नीलिका, व्यंग ( साई ), कामला, विष्कव, तिल के आकार के मस्से, दाद, चर्मदल श्वित्र, पामा, कोठ, रक्कमण्डल ( काळ वाढ चके ) ये रक्तजन्य रोग हैं । मांसजन्य रोग कहते हैं- अधिमांत, अर्बुद, कील, गलशालूक, ( गले में शोथ होने से बढ़ा हुआ मांस ) गलशुण्डिका, पूतिमांस, अब्जी, गलगण्ड, गण्डमाळा, उपजिह्निका, ये मांसजन्य रोग हैं । मेदजन्य रोग-कहते हैं प्रमेह के निन्दित पूर्वरूप ( बालों की जटिलता, आदि अथवा अतिस्थूल पुरुष के आयु हात आदि आठ रूप ) ये रोग हैं अथवा अतिस्थूलता से उत्पन्न आयु का हास आदि रोग मेद जन्य है । अस्थि के नीचे दूसरी अस्थि आना, अधिदन्त, दन्तमेद, दांत दुखना, अस्थियों में धूल, केश, रोम, नख और दाढ़ी मूंछ के रंग का परिवर्तन होना ये अस्थिजन्य रोग हैं । जोड़ों में दर्द, चक्कर आना, मूर्छा, आँखों के सामने अंधेरा खाना, व्रण, शिर में छोटी-छोटी फुन्सियां छोटे-छोटे जोड़ों में गांठें पड़ जाना ये मज्जाजन्य रोग हैं । शुक्र के दोष से नपुंसकता, अहर्षण ( ध्वज के खड़े होने पर भी मैथुन में अधकि ), संतान रोगी, नपुंसक या थोड़ी आयु वाली, विरूप, उत्पन्न हो, अथवा गर्भ नहीं रहता, रहने पर गिर जाता है या तीन मास से पूर्व हो यह जाता है । दूषित शुक्र, बच्चे और स्त्री दोनों को तकलीफ देता है ॥ १७-१८ ॥
इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यदा मताः ।
eपघातोपतापायां योजयन्तीन्द्रियाणि ते ॥ १६ ॥
स्नायौ शिराकण्डरयोर्दुष्टाः क्रिश्यन्ति मानवम् । ५४
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सूत्रस्थान स्तम्भ-सङ्कोच लीमिन्धि-स्फुरण सुनिभिः ॥ २० ॥
नामित्य पिता भेद-शोष-प्रदूषणम् ।
दोषा मानां कुर्वन्ति सङ्गोत्सर्गावतीव च ॥ २१ ॥
विविधादशितात्पीतादहिवालीढखादितात् ।
भवन्त्येते मनुष्याणां विकारा य उदाहृताः ॥ २२ ॥
तेषामिच्छन्ननुत्पत्ति सेवेत मतिमान् सदा ।
हितान्येवाशिवादीनि न स्युस्तज्जास्तथाऽऽमयाः ॥ २३ ॥
जिस समय अपथ्य आहार के कारण मल कुपित होकर इन्द्रियों में स्थित होते हैं, उस समय ये मळ इन्द्रियों का नाश या इन्द्रियों को पीड़ित करने लगते हैं । ये मल वायु, शिरा, कण्डराओं में कुपित होकर मनुष्य को बहुत कष्ट पहुं-चाते हैं । इससे स्तम्भ, जड़ता, संकोच सिकुड़ना, खली हाथ पांव का मुह जाना, ग्रन्थि ( स्नायु आदि में गांठ ), स्फुरण, घमन, और संज्ञानाथ उत्पन्न होता है । जिस समय बात आदि दोष मलों का आश्रय लेकर कुपित होते हैं, उस समय मल का मेद ( अतीसार ) तथा मलों को सुखाना अथवा मलों के रंग को विकृत करना या महों का अवरोध अथवा अतिप्रवृत्ति उत्पन्न कर देते हैं । जो रोग यहां पर लिखे हैं, वे नाना प्रकार के खान, पान, चाटन, खाद्य रूप आहार द्वारा मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं । ये रोग उत्पन्न न हो, इस इच्छा से मनुष्य सदा हितकारक आहार का सेवन करे, जिससे कि आहारजन्य रोग न होवें ॥ १६-२३ ॥
रजानां विकाराणां सर्व लङ्घनमौषधम् ।
विधिशोणितकेऽध्याये रक्तजानां भिषग्जितम् ॥ २४ ॥
मसिजानां तु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च ।
अष्टौनिन्दितकेऽध्याये मेदाजानां चिकित्सितम् ॥ २५ ॥
याश्रयाणां व्याधीनां पञ्चकर्माणि भेषजम् ।
बस्तयः क्षीरसपषि तिक्तको पहितानि च ॥ २६ ॥
मन-शुक्र- समुत्थानामौषधं स्वादुतिक्तकम् ।
अनं व्यवायव्यायाम शुद्धिः काले च मात्रया ॥ २७ ॥
शान्तिरिन्द्रियज्ञानां तु त्रिममये प्रवक्ष्यते ।
स्नाय्वादिजानां प्रशमो वक्ष्यते वातरोगिके ॥ २८ ॥
न वेगान्धारणेऽध्याये चिकित्सासंग्रहः कृतः ।
मजाना विकाराणां सिद्धियोका कचित्कचित् ॥ २४ ॥
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करचईता [ २८ रसजन्म सब विकारों की चिकित्सा कंपन अर्थात् उपवास है । रक्तजन्य रोगों की चिकित्सा विधिद्योषित अध्याय में कहेंगे । मांसजन्य रोगों की चिकित्सा शस्त्र, क्षार और अभि कर्म से होती है । मेदजन्य रोगों की चिकित्सा 'अष्टौन- न्दित' अध्याय में कह दी है । अस्थियों में आमित रोगों की चिकित्सा पंचकर्म, एवं तिक्त वस्तुओं से तथा दूध एवं घृत से सिद्ध बस्तियां ( विशेष ) चिकित्सा हैं । मजा और शुक्र से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा स्वादु, विक अम्ब, व्यवाय, ( स्त्री-संग ) व्यायाम और समय पर मात्रानुसार वमन आदि से शुद्धि है । इन्द्रियजन्य रोगों की चिकित्सा 'त्रिममय' अध्याय में कहेंगे । स्नायु आदि से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा वातरोगाधिकार में कहेंगे । मलजन्य रोगों की चिकित्सा 'न वेगान्धारणीय' अध्याय में कह दी और कहीं २ ( अतिसार, ग्रहणी आदि मैं ) आगे भी कहेंगे ॥ २४-२६ ॥
व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्याद्धितस्यानवचारणात् ।
कोष्ठाच्छा मला यान्ति द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ३० ॥
तत्रस्थाश्च विलम्बन्ते कदाचिन्न समीरिताः ।
नादेशकाले कुप्यन्ति भूयो हेतुप्रतीक्षिणः ॥ ३१ ॥
निम्न कारणों से दोष शाखाओं में पहुंच जाते हैं, यथा ब्यायाम से उत्पन्न कोभ से कोष्ठ को छोड़कर मल शाखा में आजाते हैं । अग्नि के तीक्ष्ण होने से पिछड़े हुए दोष शाखा में आ जाते हैं । हितकारी वस्तु के अति सेवन से बहुत बढ़े हुए दोष पानी के पूर की भांति अपने स्थान पर भरकर दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं । बायु के गतिशील होने से वायु द्वारा दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं । वहां शाखा आदि में पहुंचकर रोग उत्पन्न करने में विलम्ब करते हैं । क्योंकि निर्बल दोष किसी प्रबल दोष की प्रेरणा के बिना कुपित नहीं हो सकते । इसलिये उचितस्थान पर और उचित काल में ही कुपित होते हैं । वे निर्बल दोष और कारण की प्रतीक्षा करते रहते हैं । बलवान् दोष दूसरे प्रेरक
कारण की बाट नहीं देखते । शाखाओं से दोष कोष्ठ में किस प्रकार जाते हैं ।
यह कहते हैं ॥ ३०-३१ ॥
वृद्धयाभिष्यन्दनात् पाकात्स्रोतोमुखविशोधनात् ।
शाखां मुक्त्वा मलाः कोष्ठं यान्ति वायोध निमहात् ॥ ३२ ॥
दोषों के बढ़ने से, ( अभिष्यन्द से बचपन से सरल होने से ) दोष के पकने से, स्रोतों के मुख खुल जाने से अबरोध हटने से तथा फेंकने वाली वायु के रुक जाने से ये स्थित दोष कोड में आजाते हैं ॥ १२ ॥