चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 401–410

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 401–410

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नम् ०२८ ]

जातानामनुत्पतौ जाताना विनिवृत्तये ।

रोगाणां यो free: सुखार्थी तं समाचरेत् ॥ २३॥

सुखार्थाः सर्वभूतानां महाः सर्वाः प्रवृत्तयः ।

ज्ञानाज्ञानविशेषाच मार्गामार्गप्रवृत्तयः ॥ ३४ ॥

हितमेवानुरुध्यन्ते प्रपरीक्ष्य परीक्षकाः । रजोमोहावृतात्मानःश्रतं बुद्धिः स्मृतिर्दा प्रियमेवधृतिर्हितनिषेवणम्तु लौकिकाः ॥। ३५ ॥ वाग्विशुद्धिः शमो धैर्यमाश्रयन्ति परीक्षकम् ॥ ३६ ॥

लौकिकं नाश्रयन्त्येते गुणा मोहरजःश्रितम् ।

तन्मूला बहुलाश्चैव रोगाः शारीरमानसाः ॥ ३७ ॥

संक्षेप से सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि रोगों को उत्पन्न न होने देने की जो विधि कही है, तथा उत्पन्न हुए रोगों को हटाने की जां विधि कही है, उसका आचरण, सेवन करें । क्योंकि सब प्राणियों की सब प्रवृत्तियां सुख प्राप्त करने की इच्छा से ही होती हैं । ज्ञान और अज्ञान के मेद से ही मनुष्य मार्ग या अमार्ग का अनुसरण करने लगता है । परीक्षक विद्वान् परीक्षा करके हितकारी वस्तुओं का सेवन करते हैं, रजो गुण और मोह में फंसे साधारण जन प्रिय पदार्थ ही चाहते हैं । श्रुत, बुद्धि, स्मृतिदृढ़ता हितकारी वस्तुओं का सेवन, वाणी की बुद्धि, शम, और धैर्य्य, ये गुण विवेकी पुरुष में होते हैं । परन्तु मोह और रज से युक्त होने के कारण ढौकिक, अविवेकी पुरुष- में ये गुण नहीं होते । इसलिये इनको शारीरिक और मानसिक बहुत प्रकार के

रोग होते हैं । ३३-३७ ॥

प्रज्ञापराधायहितानर्थान् पञ्च निषेवते ।

संधारयति वेगांव सेवते साहसानि च ॥ ३८ ॥

वदात्वसुखसंज्ञेषु भावेष्वज्ञोऽनुरज्यते ।

1 रष्यते न तु विज्ञाता विज्ञाने झमलीकृते ॥ २६ ।

न रागानाप्यविज्ञानादाहारमुपयोजयेत् ।

परीक्ष्य हिम श्रीयादेो शाहारसंभवः ॥ ४० ॥

आहारस्य विभावष्टौ विशेषा हेतुसंज्ञकाः ।

शुभाशुभसमुत्पतो ताम् परीक्ष्योपयोजयेत् ॥ ४१ ॥

रायपध्वानि सदा परिहारा ।

भगत्यगुणतां प्रातः सम्भूनादि पडितः ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 402

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चरकसंहिता यत्तु रोगसमुत्थानमशक्यमिह केनचित् । २०२० परिहर्तु न तत्प्राप्य शोचितव्यं मनीषिणा ॥ ४३ ॥[

अज्ञानी मनुष्य बुद्धि के दोष से पञ्चेन्द्रियों के अहित शब्द, स्पर्धादि विषयों -का सेवन करता है, मल मूत्रादि के वेगों को रोकता है, साहम के कामों को करता है, प्रारम्भ में सुखदायक और परिणाम में दुःखदायक कर्मों को करता है, इसलिये दुःख उठाता है । परन्तु ज्ञानी पुरुष ज्ञान द्वारा बुद्धि के स्वच्छ होने से इन कामों में नहीं फँसता, अतः सुखी रहता है । राग अर्थात् आसकि से ( जानते हुए भी भोजन अहितकर है, फिर भी कालच से ) या अशान से भोजन को नहीं खाना चाहिये, परीक्षा करके ज्ञानपूर्वक हितकारी अब को ही खाना चाहिये । क्योंकि शरीर आहार से उत्पन्न होता है । भोजन की शुभ- अशुभ परीक्षा के लिये आठ प्रकार की परीक्षा है । ये आठ परीक्षायें विमान स्थान अध्याय १ में प्रकृति- करण, संयोग आदि से कही हैं । भोजन की इन आठ विशेषताओं से परीक्षा करके भोजन करना चाहिये । जिन अपथ्यों से मनुष्य बच सकता हो उनसे बचने का सदा यत्न करना चाहिये, इस प्रकार करने से पुरुष अपराधरहित होता है और साधु पुरुषों में बुद्धिमान् गिना जाता है । क्योंकि प्रारब्ध से उत्पन्न व्याधि को साधु पुरुष बुरा नहीं मानते । जो रोग प्रारब्ध के बलवान् होने से उत्पन्न होता है वह यदि चिकित्सा कार्य के लिये असाध्य भी हो तो भी बुद्धिमान् मनुष्य को शोक, चिन्ता नहीं करनी चाहिये || ३८-४३ ॥

सत्र लोका: -आहारसंभवं वस्तु रोगाश्चाऽऽहारसंभवाः ।

हिताहितविशेषाय विशेषः सुखदुःखयोः ॥ ४४ ॥

सहत्वे चासहत्वे च दुःखानां देहसत्स्वयोः ।

विशेषो रोगसङ्घाश्च धातुजा ये पृथक् पृथक् ॥ ४५ ॥

तेषा चैव प्रशमनं कोष्ठाच्छाखा उपेत्य च ।

दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्ठमेव च ॥ ४६ ॥

प्राज्ञाज्ञयोविंशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् ।

विविधाशितपीतीये तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ४७ ॥

यह शरीर आहार से उत्पन्न होता है, रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं । हित और अहित की विशेषता ही सुख दुःख में कारण है । दुःखों के सहन करने या न सहन कर सकने में देह, सस्व आदि विशेषतायें धातुजन्य पृथक् २ रोग, इनकी चिकित्सा, दोष जिस प्रकार से कोड से शाखा में जाकर कुपित

पृष्ठ 403

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२५ होते श्री मिष्नता हैं और, थानाओंस्वस्थ औरसे जिसरोगी प्रकारके लियेकोडजो मेंकुछआतेहितकारीहैं, विवादहै, वह र अनिद्वार'विविध चितपीतीय' अध्याय में कह दिया ॥ ४४-४७ ॥ स्वग्निवेशकृते तन्मे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतु विविधातिपीतीयो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः समासः ॥ २८ ॥

समाप्तमिदं सप्तममन्नपानचतुष्कम् ।

एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।

अथातो दशप्राणायतनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा ssह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब आगे 'प्राणायतनीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः ।

शङ्खौ ममंत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम् ॥ ३ ॥

तानीन्द्रियाणि विज्ञानं चेतनाहेतुमामयम् ।

जानीते यः स वै विद्वान् प्राणाभिसर उच्यते ॥ ४ ॥ इति ॥

प्राण जिन स्थानों पर आश्रित हैं वे दस स्थान हैं । यथा ( १-२ ) शंख-प्रदेश ( कनपटी ) दो, ( ३५ ) तीन मर्म हृदय, वस्ति और धिर, ( ६ ) कण्ठ, ( ७ ) रक्त, ( ८ ) शुक्र, ( ९ ) ओज और ( १० ) गुदा ये दस प्राणों के स्थान हैं । इन दस स्थानों को, इन्द्रियों ( आध्यात्मिक ), चेतनाहेतु ( आत्मा ) और रोगों के कारण, लक्षण और ओषधि चिकित्सा को जो विद्वान् जानता है, वही 'प्राणाभिसर' कहलाता है ॥ ३-४ ॥ द्विविधास्तु खलु भिषजो भवन्त्यग्निवेश! प्राणानामेकेऽभिखरा इन्वारो रोगाणां रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानामिति ॥ ५ ॥

एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमनिवेश उवाच - भगवन्! ते कथम-नामिविया भवेयुरिति ॥ ६ ॥

भगवानुवाच य इमे कुलीनाः पर्यवदातभताः परिदृष्टकर्माणो दहाः शुचयो जिवहता जितात्मानः सर्वोपकरणवन्तः सर्वेन्द्रियों- प्रतिज्ञाः प्रतिपचिद्वास्ते प्राणानाममिसरा, इन्वा रोगा-

पृष्ठ 404

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३८६ चरकसंहिता [ ० २९ णाम्, तथाविधा हि केवले शरीरज्ञाने शरीराभिनिर्वृति-ज्ञान- प्रकृति- विकार-ज्ञाने च निःसंशयाः सुख-साध्य - कृच्छ्र- साध्य -याप्य प्रत्या- ख्येयानां च रोगाणां समुत्थान- पूर्वरूप -लिङ्ग- वेनोपशय-विशेष- विज्ञाने व्यपगतसन्देहाः, त्रिविधस्याऽऽयुर्वेदसूत्रस्य ससंग्रह-व्याकरणस्य सत्रिवि-धौषधमामस्य प्रवक्तारः, पञ्चत्रिंशतश्च मूलफलानां चतुर्णां च स्नेहाना पचानां च लवणानामष्टानां च मूत्राणामष्टानां च क्षीराणां क्षीरत्वग्वृ-क्षाणां च षण्णां शिरोविरोचनादेश्च पञ्चकर्माश्रयस्योषधगणस्याष्टाविंश-ते यवागूनां द्वात्रिंशच चूर्णप्रदेहानां षण्णां च विरेचनशतानां पञ्चानां च कषायशतानां स्वस्थवृत्तावपि च भोजन -पान-नियम-स्थान--न-चक्रमण- शय्यासन- मात्रा-द्रव्याञ्जन- धूम -नावनाभ्यञ्जन- परिमार्जन वेगविधारणा-व्यायाम-सात्म्येन्द्रिय- परीक्षोपक्रम -सद्वृत्त कुशलाः; चतुष्पादोपगृहीते च भेषजे षोडशकले सविनिश्वये सन्त्रिपर्येषणे सवातकलाकलज्ञाने व्यप- गतसन्देहाः, चतुर्विधस्य च स्नेहस्य चतुर्विंशत्युपनयस्योपकल्पनी यस्य चतुःषष्टिपर्यन्तस्य व्यवस्थापयितारो बहुविधानामुक्तानां च स्नेहा- स्वेद्य- वम्य- विरेच्यौषधोपचाराणां च कुशलाः; शिरोरोगादेश्व दोषांशवि- कल्पजस्य व्याधिसंग्रहस्य सक्षयपिडकाविद्रघेस्त्रयाणां च शोफानां बहु- विधशोफानुबन्धानामष्टाचत्वारिंशतश्च रोगाधिकरणानां चत्वारिंशदुत्त- रस्य च नानात्मजस्य व्याधिशतस्य तथा विगर्हितातिस्थूलातिकृशानां च सहेतुलक्षणोपक्रमाणां स्वप्नस्य च हिताहितस्यास्वप्नातिस्वप्नस्य सहेतुपक्रमस्य षण्णां च लङ्घनादीनामुपक्रमाणां सन्तर्पणापतर्पणजाना रोगाणां सरूपप्रशमनानां च शोणितजानां व्याधीनां मदमूच्र्छायसं- न्यासानां च सकारणरूपौषधोपचाराणां कुशळाः; कुशलाचाऽऽहारविधि- विनिश्चयस्य प्रकृत्या च हिताहितानामाहारविकाराणामध्य संग्रहस्याऽऽ- सवानां च चतुरशीतेः द्रव्यगुणविनिश्चयस्य रसानुरससंश्रयस्य सवि- कल्पकवैरोधिकस्य द्वादशवर्गाश्रयस्य चान्नपानस्य सगुणप्रभावस्य सानु- पानगुणस्य नवविधस्यार्थसंग्रहस्याऽऽहारगतेय हिताहितोपयोगविशेषा- त्मकस्य च शुभाशुभविशेषस्य घात्वाश्रयाणां च रोगाणामौषधसंग्रहाणां च दशानां च प्राणायतनानां यं च वक्ष्यामो ऽर्थोदशमहामूलीये त्रिंशत्तमा- ध्याये तत्र च कृत्स्नस्य तन्त्रोद्देशलक्षणस्य तन्त्रस्य च प्रहण-धारण-विज्ञान- प्रयोग-कर्म-कार्य -काल -कर्तृकरण-कुशलाकुशला स्मृति- मति-शास्त्र -संयु-कि-मुक्ति-मावस्याऽऽत्मनः शीलगुणैरविसंवादनेन च संपादनेन सर्वा

पृष्ठ 405

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प २ ] सूर्यस्थानम III णि चेतसो मैत्रस्य मातृ - पितृ-भ्रातृ-बन्धुवदेवं युक्ता भवन्त्यनिवेश! प्राणानामभिसरा हन्तारो रोगाणामिति ॥ ७ ॥

वैद्यों के लक्षण -– हे अभिवेश! वैद्य दो प्रकार के होते हैं । एक, 'माथा-मिसर' प्राणों को खाने वाले और रोगों का नाश करने वाले । दूसरे 'रोगामि-सर रोगों को खाने वाले और प्राणों का नाश करने वाले । इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अभिवेश बोले-हम इन दोनों प्रकार के वैद्यों को किस प्रकार से किन किन लक्षणों से जान सकते हैं । भगवान् आत्रेय ने कहा कि जो कुलीन उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हों, जिनकी बुद्धि व शास्त्रज्ञान निर्मल हो, जिन्होंने क्रिया- कर्म देखा हो, जो अनु-भवी, चतुर, सदाचारी, अभ्यस्त हाथ वाले ( शस्त्र चलाने में जिनको संशय न हो, कुशल हाथवाले ) जितेन्द्रिय, सर्व सामग्री से सम्पन्न, आंख, कान आदि सब इन्द्रियों से युक्त, जो कि शरीर की नीरोगस्थिति को भली प्रकार जानते हैं, उत्तम सूज्ञ व परिणाम को भली प्रकार जानने वाले हों वे वैद्य प्राणरक्ष-क एवं रोगनाशक होते हैं । इस प्रकार से वैद्य सम्पूर्ण शरीर के ज्ञान से, वीर्य और शोणित के संयोग से शरीर किस प्रकार बनता है इसको जान. शारीरस्थान में कहे सांख्यशास्त्र के अनुसार प्रकृति विकृति के शान को बिना सन्देह के समझते हों, सुखसाध्य, कष्टसाध्य, याप्य वा असाध्य इन चार प्रकार के रोगों के कारण, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना, अनुकूल, आहार-विहार भली प्रकार जानते हों, सम्पूर्ण आयुर्वेद के सूत्र रूप जो त्रिविध सूत्र हेतु, लिंग, लक्षण और औषध का ज्ञान है इसको; सामान्य और विशेष रूप से इनके संक्षेप और विस्तार को तथा तीन प्रकार की औषध दैवव्य-पाभय और युक्तिव्यपाश्रय, सत्वावजय समूह को जाननेवाले, १६ प्रकार की मूलिनी ओषधियोंको, १६ प्रकार की फलवर्ग की ओषधियों को, चार प्रकार के स्नेहों, पांच प्रकार के नमक, आठ प्रकार के मूत्र, आठ प्रकार के दूष छः प्रकार के क्षीरी वृक्षों को, शिरोविरेचनादि पांचकर्मों के औषध समूहों को, अहा-इस प्रकार की यवागुओं को, ३२ प्रकार के चूर्ण या प्रदेहों को, छः सौ विरेचन, पांच सौ कषाय, मनुष्यों की प्रकृति स्वस्थ रहे इसके लिये भोजन, पान, के नियम, स्थान, चलना,फिरना, सोना, बैठना, मात्रा, द्रव्य, अंजन, धूमपान, नस्य, अम्यंजन, स्नान, वेगों को न रोकना, व्यायाम, सात्म्य, इन्द्रियपरीक्षा- उपक्रम, सच में कुशल, इनके नियमों को जानने वाले, चिकित्सा के चारों पाद और १. ' बन्धुवदेवमुक्ता' इति पाठः ॥

पृष्ठ 406

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३ चरकसंहिता [ ० २९ सो अंगों में सन्देहरहित, तीन प्रकार की बासना, वायु के गुण-दोष में सन्दे- हरहित; चार प्रकार के स्नेह, स्नेह की २४ प्रकार की विचारणा में चतुरः रस मेद के ६४ प्रकार की योग्य योजना करने में, बहुत प्रकार के स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन ओषधियों को यथायोग्य प्रयोग करने में कुशल, शिरोरोगादि रोग, वातादि दोषों की अधिकता या कमी से उत्पन्न होने वाले रोगों को; क्षय, पिड़का, तीन प्रकार की विद्रधि, शोथजन्य नाना प्रकार के रोगों को, रोगों के ४८ प्रकरण, १४० प्रकार के वात, पित्त, कफ रोगों को निन्दित अतिस्थूल अतिकृश पुरुषों की हेतु, लक्षण, चिकित्सा को हितकर अहितकर निद्रा को; अनिद्रा व अतिनिद्रा के कारण और चिकित्सा को लंघनादि छः प्रकार की चिकित्सा को, सन्तर्पण अपतर्पण से होने वाले रोगों को, उनकी चिकित्सा को जानें, रक्तजन्य रोग, मद, मूर्छा और संन्यास के कारण, लक्षण और चिकित्सा में कुशल, आहारविधि में कुशल स्वभावतः पथ्यापथ्य आहार व संस्कार से होने वाले परिवर्तन, चौरासी ( ८४ ) प्रकार के आसव, रस व अनुरसात्मक द्रव्य गुण निश्चय, विकल्प में कुशल अन्नपान के बारह वर्ग, गुण, प्रभाव, अनुपान गुण, अन्नपानादि से, रसादि धातुओं की उत्पति किस प्रकार होती है, पथ्यापथ्य, आहार के हितकारी फल, वातादि दोष के प्रकुपित होने से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा, प्राणा- यतनों के दस स्थान, इन सब विषयों में तथा अगले ' अर्थे दशमहामूलीय' अध्याय में जो कुछ कहेंगे, उन सब में निपुण, आयुर्वेद के उद्देश, लक्षण को जानने वाले हों, एवं आयुर्वेद शास्त्र के ग्रहण करने, ग्रहण किये हुए को धारण करने और अर्थ से जानने, प्रयोग, चिकित्सा-प्रयोग, अनेक प्रकार से चिकित्सा करने, कार्य धातुओं के समान करने, काल, क्रिया, काल, कत्तों, भिषक्कू, करण औषध में कुशल, तथा स्मरण शक्ति, बुद्धि, शास्त्रयोजना और तर्कशान में समर्थ, अपने शील, स्वभाव रूपी गुणों से सब प्रणि मात्रा में मन, आत्मा द्वारा, माता, पिता, भाई, बन्धु, आदि के समान मैत्री भाव रखने में कुशल होते हैं, स्नेह का व्यवहार करते हैं, हे अग्निवेश! इस प्रकार के जो वैद्य होते हैं, वे 'प्राणा- भिसर ' अर्थात् प्राणरक्षक तथा रोगनाशक होते हैं ॥ ५-७ ॥ अतो विपर्ययेण विपरीता रोगाणामभिसरा इन्तारः प्राणानां भिष- कूलप्रतिच्छन्नाः कण्टकभूता लोकस्य प्रतिरूपकत्यक्तधर्माणो राक्षां प्रमादाच्चरन्ति राष्ट्राणि । तेषामिदं विशेषविज्ञानम् । अत्यर्थं वैद्यचेवेण इलाघमाना विशिखान्तरमनुचरन्ति कर्मलोभात् श्रुत्वा च कस्यचिदा-

पृष्ठ 407

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अ० २ ] सूत्रस्थानम AAAA ३८६ www. तुर्यमभितः परिपतन्ति संभवणे चास्याऽऽत्मनो वैद्यगुणामुचैर्वदन्ति, arrer वैद्यः प्रतिकर्म करोति तस्य च दोषान् मुहुर्मुहुदाहरन्ति आतुरमित्राणि च प्रहर्षणोपजापोपसेवादिभिरिच्छन्त्यात्मीकर्तुं खल्पे-agat चाssत्मनः ख्यापयन्ति, कर्म चाssसाथ मुहुर्मुहुरवलोकयन्ति दायेणाज्ञानमात्मनः प्रच्छादयितुकामाः, व्याधिं चापवर्तयितुमशक्नु वन्तो व्याधितमेवानुपकरणमपचारिकमनात्मवन्तमुद्दिशन्ति, असं गतं चैनमभिसमीक्ष्यान्यमाश्रयन्ति देशमपदेशमात्मनः कृत्वा, प्राकृत-जनसन्निपाते चाऽऽत्मनः कौशलमकुशलवद्वर्णयन्ति, अघीरवच धैर्यमपवदन्ति धीराणां विद्वजनसन्निपातं चाभिसमीक्ष्य प्रतिभयमिव कान्तारमध्वगाः परिहरन्ति दूरात् यचैषां कश्चित्सूत्रावयवो भवत्यु- पयुक्तस्तमप्रकृते प्रकृतान्तरे वा सततमुदाहरन्ति न चानुयोगमिच्छ न्त्यनुयोक्तुं वा मृत्योरिव चानुयोगादुद्विजन्ते, न चेषामाचार्यः शिष्यो वा सब्रह्मचारी वैवादिको वा कश्चित्मज्ञायत इति ॥ ८ ॥

इनसे विपरीत गुण वाले वैद्य 'रोगामिसर' अर्थात् रोगों को लानेवाले और प्राणों का नाश करने वाले होते हैं । ये वैद्य वैद्य के वेष में लोक में कांटे के समान दुःखदायी, बिगाड़ करने वाले, द्रोह करने वाले, धर्म का त्याग करके, राजाओं के आलस्य से हो राष्ट्र में विचरते हैं । इन वैद्यों के विशेष लक्षण ये है ये वैद्य के समान वस्त्र धारण करके अपनी प्रशंसा करते हुए रोगी के घर में गली में चिकित्सा कर्म के लोभ से जाते हैं, किसी को रोगी सुनकर उसको चारों ओर से घेर बैठते हैं, और अपने गुणानुवादों को ऊंचे २ सुनाने लगते हैं । जो पहले वैद्य चिकित्सा कर रहा है, उसके दोषों को बार २ कहते हैं । रोगी के मित्रों को खुश करके, चापलूसी, चुगली से, सेवा आदि द्वारा अपना बनाना चाहते हैं । और अपनी इच्छा को थोड़ा बतलाते हैं । चिकित्सा कार्य मिलने पर वार २ इधर उधर देखते हैं । चालाकी से अपने अज्ञान को छिपाने की चेष्टा करते हुए, रोग को अच्छा करने में अशक्त होने पर रोगी को ही उलाहना देने लगते हैं, तुम्हारे पास साधन नहीं, सेवक नहीं, पथ्य नहीं रखते । मरता हुआ देखकर बहाना करके दूसरे देश में चले जाते हैं । भोले भाले आदमी को देखकर अपनी कुशलता को मूर्ख पुरुष की भांति विरुद्ध वचनों द्वारा प्रकट करते हैं । धीर पुरुषों के सामने अधीर की भांति जोर २ से अपना धैर्य कहने लगते हैं । विद्वान् मनुष्यों को देखकर दुम दबाकर ऐसे भाग जाते हैं, जिस प्रकार कि भयंकर भय की आशंका से जंगल के रास्ते को

पृष्ठ 408

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३६० चरकसंहिता [अ० २९ दूर से ही छोड़ देते हैं । इन लोगों को जो जरासा भी आयुर्वेद चिकित्सा का सूत्र मिल जाता है, तो उसीको बेसमय या विना मतलब के ( प्रसंग के विना ही) बार २ बोलने लगते हैं । ये न तो स्वयं किसी से कुछ पूछते हैं और न यह चाहते हैं कि कोई हमसे पूछे । वे प्रश्न के पूछने से मृत्यु से जैसे डर कर भागते हैं । न तो कोई इनका आचार्य, न कोई शिष्य और न कोई

सहाध्यायीfreeहोता है ॥ प्रविश्यैव८ ॥ व्याधितांस्तर्कयन्ति ते ।

atiसमिव संश्रित्य बने शाकुन्तिको द्विजान् ॥ ६ ॥

श्रुत -दृष्टि- क्रिया-काल-मात्रा ज्ञान-बहिष्कृताः ।

वर्जनीया हि ते मृत्योश्वरन्त्यनुचरा भुवि ॥ १० ॥

वृत्तिहेतोर्भिषङ्मानपूर्णान् मूर्खविशारदान् ।

वर्जयेदारो विद्वान् सर्पास्ते पीतमारुताः ॥ ११ ॥

ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।

जितस्ताजितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ १२ ॥

रोगी को देखकर वैद्य का वेष पहिन कर रोगी के घर में घुस जाते हैं । ये जंगल में पहुंचे चिड़ीमार की तरह पक्षियों को जाल में फंसाने वाले होते हैं । इनको शास्त्रश्रवण, कर्मदर्शन, चिकित्सा और काल, मात्रा शास्त्र का ज्ञान नहीं होता । ये मृत्यु के नौकर होकर पृथ्वी पर विचरते हैं, इसलिये इनको छोड़ देना चाहिये । जीविका प्राप्त करने के लिये वैद्य बने हुए, पूरे मूर्खों को, बुद्धिमान् रोगी छोड़ देवे, क्योंकि वे वायु पिये हुए सांप के समान है । जो वैद्य शास्त्रशानी," कर्म में दक्ष, पवित्र, कर्मकुशल, जितहस्त, संयमी, ऐसे प्राणाभिसर वैद्यों को नित्य प्रति नमस्कार है ॥ ६-१२ ॥

तत्र श्लोकः-दश प्राणायतनिके श्लोकस्थानार्थ संग्रहः ।

द्विविधा भिषजयोक्ताः प्राणस्याऽऽयतनानि च ॥ १३ ॥

इस दश प्राणायतनीय अध्याय में सम्पूर्ण सूत्रस्थान की संक्षिप्त सूची, दो प्रकार के वैद्य, शरीर के दस प्राणायतन ये विषय प्रतिपादन कर दिये हैं ॥१३॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दशप्राणायतनीयो नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २६ ॥

पृष्ठ 409

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अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३९ १ त्रिंशचमोऽध्यायः reads दशमहामूलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति स्मा sह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके आगे ' अर्थेदशमहामूकीय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

अर्थे दश महामूलाः समासक्ता महाफलाः ।

महचार्थश्च हृदयं पर्यायैरुच्यते बुधैः ॥ ३ ॥

हृदय जिनका मूलस्थान है ऐसी महान् कार्य करने वाली दस धमनियां हृदय में आभित हैं । 'महत्' और ' अर्थ' ये हृदय के हो नामान्तर हैं ॥ ३ ॥

षडङ्गमङ्ग' विज्ञानमिन्द्रियाण्यर्थपञ्चकम् ।

आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम् ॥ ४ ॥

प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते ।

गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थचिन्तकैः ॥ ५ ॥

तस्योपघातान्मूर्च्छायं भेदान्मरणमृच्छति ।

यद्धि तत्स्पर्शविज्ञानं धारि तत्तत्र संभितम् ॥ ६ ॥

तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंग्रहः ।

हृदयं महदुर्थश्चत स्मादुक्तं चिकित्सकैः ॥ ७ ॥

छः अंगोंवाला शरीर ( दो हाथ, दो पांव, शिर और ग्रीवा एवं कटि का मध्य भाग ), विज्ञान ( निश्वयात्मक बुद्धि ), पांच ज्ञानेन्द्रियां तथा इन इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श आदि विषय, आत्मा, गुणयुक्त मन, चिन्त्य ( मन के विषय ) ये सब हृदय में आश्रित हैं । यहां पर यह संशय हो सकता है कि हृदय तो दो अंगुल मात्र है, इसमें छ अंगों वाला शरीर किस प्रकार समा सकता है । इन्द्रियां अपने आभितों में स्थित हैं, विषय बाह्य द्रव्यों में आश्रित हैं । आत्मा व्यापक होने से अनाश्रित है, गुणयुक्त मन भी अनाभित है, ध्येय आदि हृदय में नहीं रहते । इस सन्देह का उत्तर देते हैं कि हृदय में ये भाव ( पदार्थ ) कार्य-कारण सम्बन्ध से अविरोध रूप में रहते हैं । इनमें आधार-आधेय- सम्बन्ध नहीं, परन्तु आश्रय- आश्रयि, अथवा अन्वयव्यतिरेक सम्बन्ध है । आगारकर्णिका अर्थात् घर को ढांपने के बीचमें एक बड़ी बनी होती है और उसके दोनों ओर दूसरी शहतीरीयां पड़ी रहती हैं, उसी प्रकार हृदय के चारों ओर ये वस्तुयें पड़ी हैं । इस हृदय को उपघात ( चोट लगने से मूर्छा हो

पृष्ठ 410

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३१२ चरकसंहिता [ to ३० जाती है और हृदय के विदीर्ण होने से मनुष्य मर जाता है । हृदय के नाथ होने से हृदय में आभित संसारी आत्मा भी नष्ट हो जाता है । स्पर्श को जो जानता है या जिसके कारण स्पर्श ज्ञान होता है वही ' धारी' शरीर इद्रिय, सव और आत्मा के संयोग ( शरीरेन्द्रियसस्थात्मसंयोगो धारि जीवितम् ) ये सब हृदय में आश्रित हैं । यह हृदय परम ( श्रेष्ठ ) ओज का स्थान है, चैतन्य विषयों में फैले हुए मन का इसी हृदय में संग्रह होता है । विषयों में गये हुए इसी मनको हृदय में रोकने से योगी बनते हैं और योग मोठ का साधन ( योगो मोक्षप्रवर्त्तकः ) है । इसलिये हृदय को महत् और इन शब्दों से

चिकित्सक कहते हैं । ४-७ ॥

तेन मूलेन महता महामूला मता दश ।

ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विधम्यन्ते समन्ततः ॥ ८ ॥

जसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वजन्तवः यह सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ ६ ॥

यत्सारमादौ गर्भस्य यत्तद्गर्भरसाद्रसः ।

संघर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुरा ॥ १० ॥

यस्य नाशात्त नाशोऽस्ति धारि यदुद्धृदयाश्रितम् ।

यः शरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः ॥ ११ ॥

तत्फला बहुधा वा ताः फलन्तीव महाफलाः ।

ध्मानाद्धमन्यः स्रवणात् स्रोतांसि सरणात्सिराः ॥ १२ ॥

इस हृदय से महामूल वाली ( जिनका प्रभावस्थान बड़ा है, ऐसी ) दस ओजवाहिनी धमनियां निकल कर इस सम्पूर्ण शरीर में फैलती हैं । जिस ओज के पुष्ट होने पर सब प्राणी जीते हैं, जिस ओज के बिना प्राणियों का जीवन नहीं रह सकता, जो ओज शुक्र रक्तसंयोग से बने गर्भ में सारभूत है, और जो शुक्र रक्त के संयोग से बने कलल रूप में रसरूप सार है, जो ओज हृदय के बनने पर स्पष्ट होकर हृदय में रहता है, जिस ओज के नष्ट होने पर ( धातुओं का क्षय न होने पर भी ) मृत्यु निश्चित है, जो कि प्राणों को धारण करने में मुख्य है, जिस ओज में प्राण आश्रित हैं उस ओज को लेजाने वाली, ओजोवहा, महाफला दस धमनियां हृदय का आश्रय लेकर अनेक प्रकार से फलती हैं । वे हृदय में दस होती हुई भी शरीर में प्रतान मेदों से असंख्य बनजाती हैं । पूरण अर्थात् बाह्य रस द्वारा भरने से ( स्पन्दन होने से ), धमनियाँ, सवण अर्थात् रस, पौष्य वस्तु का सवण होने से स्रोतस् और दूसरे देश या स्थान में जाने से 'सिरा ' कहलाती हैं ॥ ८-१२ ॥