चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 411–420

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३९३

तन्महत्ता महामूलास्तचौजः परिरक्षता ।

परिहार्या विशेषेण मनसो दुःखहेतवः ॥ १३ ॥

हथं यत्स्याद्यदौजस्य स्रोतसां यत्प्रसादनम् ।

तत्सेव्यं प्रयत्नेन प्रशमो ज्ञानमेव च ॥ १४ ॥

हृदय स्थित मन की रक्षा में कारण छः अंगों वाले शरीर, बुद्धि आदि का हृदय स्थान है । ओजोवहा धमनियां भी इसी हृदय से निकलती हैं, यही हृदय इनका मूल है । इसलिये ओज की रक्षा करने के लिये मानसिक दुःखों के कारणों से विशेष रूप में बचना चाहिये । जो वस्तु हृदय और ओज के लिये हितकारी हो, एवं मनोवहा आदि स्रोतों को निर्मल करनेवाली हो और शान्ति तथा तत्वज्ञान को देने वाली हो, उसे प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।१३-१४ । अथ खल्वेकं प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतममेकं बलवर्धनानामेकं बृंहणा-नामेकं नन्दनानामेकं हर्षणानामेकमयनानामिति । तत्राहिंसा प्राणिनां प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं वीर्यं बलवर्धनानां विद्या बृंहणानां इन्द्रिय-जयो नन्दनानां तत्त्वावबोधो हर्षणानां ब्रह्मचर्यमयनानामित्यायुर्वेद-विदो मन्यन्ते ॥ १५ ॥

सेवन करने योग्य वस्तुएं कहते हैं -प्राणों को बढ़ाने के लिये सबसे उत्कृष्ट वस्तु एक ही है ( दूसरा नहीं ), बल को बढ़ाने में एक; दृष्य वस्तुओं में उत्कृष्टतम एक, श्रेय समृद्धिकारक हर्षोत्पादक में एक; मोक्षदायक में सबसे श्रेष्ठ वस्तु एक ही है । जैसे प्राणियों के प्राणों को बढ़ाने के लिये अहिंसा सबसे उत्कृष्ट है, बल वर्धकों में वीर्य, बृंहण वस्तुओं में विद्या, श्रेयस्कर वस्तुओं में इन्द्रियों का संयम, हर्षोत्पादक वस्तुओं में तत्त्वज्ञान और मोक्ष-दायक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य ही सबसे श्रेष्ठ है, ऐसा आयुर्वेद विद्वान् मानते हैं ॥ १५ ॥

तत्राऽऽयुर्वेदविदस्तन्त्रस्थानाध्यायप्रश्नानां पृथक्त्वेन वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्च प्रवक्तारो मन्तव्याः ॥ १६ ॥

_ress- कथं तत्रादीनि वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेत्यु-कानि भवन्तीति । अत्रोच्यते - तन्त्रमार्ष कात्स्म्र्त्स्न्येन यथाम्नायमुच्य मानं वाक्यशो भवत्युक्तम् । बुद्धया सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं वाग्मि-यस समास -प्रतिज्ञा हेतूदाहरणोपनय- निगमन- युक्ताभिस्त्रिविध-शिष्य-बुद्धिगम्यमानं वाक्यार्थशेो भवत्युतम् । तन्त्रनियतानामर्य- दुर्गाणां पुनविभावनैकमर्थावयवशो भवत्युक्तम् ॥ १७ ॥

पृष्ठ 412

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३६४ चरकसंहिता [अ० ३० जो पुरुष आयुर्वेद के ग्रन्थ, उनके स्थान, प्रसंग, अध्याय, प्रश्न उनके अवान्तर विषय, वाक्यार्थी और अर्थावयवों का निरूपण कर सकते हो, उनको आयुर्वेद का ज्ञाता मानना चाहिये । आयुर्वेद के ग्रन्थ में वाक्य, अर्थ और अर्थावयव किस प्रकार से कहे जाते हैं? यह कहते हैं, ऋषिकृत तन्त्र को ' अथ' से ' इति' पर्यन्त समस्त ग्रन्थ को पाठक्रम से पढ़ना वाक्यार्थ होता है । अर्थतव को बुद्धि से भली प्रकार समझ कर वाणी द्वारा व्यास अर्थात् विभाग, समास, प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण ( दृष्टान्त ), उपनय ' निगमन तीनों प्रकार ( उत्तम मध्यम और अवमकोटि ) के शिष्य जिस युक्ति से समझ सकें इस प्रकार से कहना वाक्यार्थशः निरूपण कहाता है । तन्त्र में आये हुए कठिन अर्थों को पुनः पुनः व्याख्यानों द्वारा स्पष्ट करना यह 'अर्थावयवशः निरूपण' होता है ॥ १६-१७ || - तत्र चेत्प्रष्टारः स्युः –चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानां कं वेदमुप- दिशन्त्यायुर्वेदविदः, किमायुः कस्मादायुर्वेदः, किं चायमायुर्वेदः शाश्वतोऽशाश्वतश्च । कवि कानि चास्याङ्गानि, कैश्वायमध्येतव्यः, किमर्थं चेति ॥ १८ ॥

तत्र भिषजा पृष्ठेनेवं चतुर्णामृकसामयजुरथर्ववेदानामात्मनोऽथ- वेदे भक्तिरादेश्या । वेदोह्याथर्वणः स्वस्त्ययन- बलि-मङ्गल -होम-नियम- प्रायश्चित्तोपवास- मन्त्रादि-परिप्राचिकित्सां प्राह, चिकित्सा चाऽऽयुषो हितायोपदिश्यते ॥ १६ ॥

वेदं चोपदिश्याऽऽयुर्वाच्यं; तत्राऽऽयुश्चेतनानुवृत्तिर्जीवितमनुबन्धो धारि चेत्ये कोऽर्थः ॥ २० ॥

तत्राऽऽयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः । कथमिति चेदुच्यते - स्वलक्षणतः सुखासुखतो हिताहिततः प्रमाणाप्रमाणतश्च । यतश्चाऽऽयुष्याण्यना- युष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यतोऽप्यायुर्वेदः । २१ ॥ तत्राऽऽयुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि केबलेनोपदेश्यन्ते तन्त्रेण ॥ २२ ॥

यदि कोई पूछे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों वेदों में से किस वेद को आयुर्वेद कहते हैं । आयुर्वेद का कौन से वेद के साथ सम्बन्ध है? आयु क्या है? आयुर्वेद किस लिये है १ यह आयुर्वेद शाश्वत

१. सिद्धान्तापपादितस्य साधनधर्मस्य साध्ये पुनः कथन सुपनयः ।

२. हेतुसाधितसाध्यधर्मकथनं निगमनम् ॥

पृष्ठ 413

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० ३० ] सूत्रस्थानम् (निष्य ) है या अशाश्वत ( अनित्य ) १ इस आयुर्वेद के कितने और कौन २ से अंग हैं? आयुर्वेद किन को पढ़ना चाहिये और इस आयुर्वेद का प्रयो- जन क्या है? वैद्य से इस प्रकार प्रश्न पूछे जाने पर वैद्य को लग्, यजुः, साम और अथर्व इन चारों वेदों में से अथर्व वेद में ही अपनी भक्ति ( भा ) बतानी चाहिये । क्योंकि अथर्ववेद ने स्वस्ति-अयन, बलि, मंगल, होम, नियम, प्रायश्चित्त वा उपवासदि द्वारा रोग की चिकित्सा कही है । चिकित्सा आयु की मंगल कामना से कही जाती है, आयुर्वेद यह अथर्ववेद का एक भाग है । वेद सम्बन्धी विवेचन करने के पीछे ही आयुसम्बन्धी विवेचन किया जाता है । चैतन्यपरम्परा, जीवित, अनुबन्धन, धारि ये आयु -शब्द के समानार्थवाची हैं । - आयुर्वेद किस लिये कहते हैं इसका उत्तर अपने लक्षण से, सुख-दुःख हित- कारी अहितकारी, प्रमाण अप्रमाण एवं आयुवर्द्धक और आयुश्चयकारक द्रव्योंके गुण कर्म सम्पूर्ण रूपमें कहे जाते हैं, इसलिये, इस शास्त्र को आयुर्वेद कहते हैं ॥ १८-२२ ॥ तत्रा ss युरुक्तं स्वलक्षणतो यथावदिद्देव । तत्र शारीरमानसाभ्यां रोगाभ्यामनभिदुतस्यानभिभूतस्य गत -बल - वीर्य यशः- पौरुष -पराक्रमस्यच विशेषेणज्ञान- विज्ञानेन्द्रियेन्द्रियार्थयौवनवतः समर्थानु-- बल-समुदाये वर्तमानस्य परमधि- रुचिर-विविधोपभोगस्य समृद्धसर्वारम्भस्य यथेष्टविचारिणः सुखमायुरुच्यते, असुखमतो विपर्ययेण । हितैषिणः पुनर्भूतां परस्वादुपरस्य सत्यवादिनः शमपरस्य परीक्ष्यकारिणोऽ- प्रमत्तस्य त्रिवर्ग परस्परेणानुपहतमुपसेवमानस्य पूजाईसंपूजकस्य ज्ञान- विज्ञानोपशम -शीलस्य वृद्धोपसेविनः सुनियत- राग रोषेध्यामद-- मान-वेगस्य सततं विविधप्रदानपरस्य तपो-ज्ञान-प्रशम -नित्यस्याध्यात्म- विदस्तत्परस्य लोकमिमं चामुं चापेक्षमाणस्य स्मृतिमतो हितमायुरु- च्यते । अहितमतो विपर्ययेण ॥ २३ ॥

आयु का लक्षण ( चेतनानुवृत्ति चेतनपरम्परा ० ) इस स्थान पर कह दिया है । जिस मनुष्य को शारीरिक या मानसिक किसी प्रकार का रोग नहीं, शरीर में तारुण्य भरा है, शरीर में शक्ति, बल, वीर्य और पौष, पराक्रम है, ज्ञान, बुद्धि, इन्द्रिय और विषय बलवान् हैं, सम्पत्ति, प्रिय और नाना प्रकार के भोग्य पदार्थ अनुकूल हों, सब कार्यों में जिसको सफलता मिलती हो, स्वेच्छापूर्वक आहार- विहार करने योग्य जो मनुष्य हो, उसकी आयु सुखमय समझनी चाहिये । इसके विरुद्ध दुःखमय समझना । जो मनुष्य सब प्राणियों का कल्याण चाहता

पृष्ठ 414

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186 चरकसंहिता [अ० ३० हो, जो दूसरे के धन की इच्छा नहीं करता, सत्यवादी, धान्तमन ( संतोषी ), विचार कर कार्य करने वाला, उद्यमी, दूसरे की कष्ट न पहुंचाये, इस प्रकार से जो धर्म, अर्थ, काम का सेवन करता है, पूजा के योग्य पुरुषों का जो पूजन करता है, शान, विज्ञान, उपशम शील-स्वभाव का, वृद्ध पुरुषों का सत्संग ( सेवा ) करने वाला, राग, क्रोध, ईर्ष्या, मद, मान के वेगों को दमन करने वाला, निरन्तर नाना प्रकार के दान देने वाध, तप, शान में रत एवं सदा शान्त चित्त रहने वाला19, आत्मा के चिन्तन में दत्तचित्त इह लोक परलोक दोनों का ध्यान रखने वाला, उत्तम स्मरण शक्ति वाला जो पुरुष होता है, उसकी आयु हितकारी होती है, इससे विपरीत अहित है ॥ २३ ॥

प्रमाणमायुषस्त्वर्थेन्द्रिय -मनो-बुद्धि- चेष्टादीनां विकृतिलक्षणैरुपलम्य-dsनिमितैः, इदमस्मारक्षणान्मुहूर्ताद्दिवसात् त्रिपञ्चसप्तदशद्वादशाहात्प- क्षान्मासात्षण्मासात्संवत्सराद्वा स्वभावमापत्स्यत इति । तत्र स्वभावः, प्रवृत्तेरुपरमो, मरणमनित्यता, निरोध इत्येकोऽर्थः --इत्यायुषः प्रमाण-मतो विपरीतमप्रमाणम् । अरिष्टाधिकारे देहप्रकृतिलचणमधिकृत्य चोपदिष्टमायुषः प्रमाणमायुर्वेदे ॥ २४ ॥

प्रयोजनं चास्य –स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्र शमनं च ॥ २५ ॥

आयु का प्रमाण, इन्द्रियों के विषय ( शब्द स्पर्शादि ) मन, बुद्धि, चेष्टा आदि के विकृत लक्षणों से जाना जाता है । लक्षण को देखकर यह कहा जा सकता है कि अमुक मनुष्य एक मुहूर्त्त में, एक क्षण में, एक दिन में तीन दिन में, पांच दिन में सात दिन में" बारह, पन्द्रह दिनों में महीने, छः मास में, या साल भर में स्वभाव अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा । स्वभाव, प्रवृत्ति, उपरम, मरण, अनित्यता, निरोध ये शब्द एकार्थवाची पर्याय हैं । यह आयु का प्रमाण है, इसके विपरीत अप्रमाण । अरिष्टाधिकार ( इन्द्रियस्थान ) मैं देह, प्रकृति, लक्षणों के अधिकार से आयु का प्रमाण कहेंगे ॥ २४-२५ ॥ सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात्स्वभावसंसिद्ध- लक्षणत्वाद्भाव स्वाभावनित्यत्वाच्च । न हि नाभूत्कदाचिदायुषः सन्तानो बुद्धिसन्तानो वा शाश्वतश्वाऽऽयुषो वेदिता, अनादि च सुखदुःखं द्रव्य -हेतु लक्षणमपरापरयोगात्; एष चार्थसंग्रहो विभाव्यते आयु वेदलक्षणमिति । गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षादीनां च इन्द्वानी सामान्यविशेषा वृद्धिहासौ; यथोक्तम् । गुरुभिरभ्यस्वमानैर्गुरुणा- पचयो भवत्यपचयो लघूनामेवमेवेतरेषामित्येष भावस्वभावो नित्या

पृष्ठ 415

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II ० ३० ]] सूत्रस्थानम् स्वलक्षणं च द्रव्याणां पृथिव्यादीनां । सन्ति तु सर्वदा गुणाय नित्या- नित्याः । न चायुर्वेदस्याभूत्वोत्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यन्नावबोधोपदे-शाभ्याम् । एतद्वै द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके । स्वाभाविकं चाल्य लक्षणमकृतर्क, यदुक्तमिह चाऽऽद्येऽध्याये - यथाऽग्नेरौष्ण्यमपां द्रवत्वम् । भावस्वभावनित्यत्वमपि चास्य यथोक्तं गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरुणा- सुपचयो भवत्यपचयो लघूनामित्येवमादि ॥ २६ ॥

यह आयुर्वेद नित्य है, ऐसा माना जाता है । उसके तीन हेतु हैं, १. अनादि होने से, २. स्वभाव सिद्ध होने से, ३. पदार्थों के गुण, धर्म नित्य होने से । इसका विस्तार से वर्णन करते हैं । आयुर्वेद में आयुष्य का प्रतिपादन किया है और सर्वदा ही आयु की परम्परा सन्तान न्याय से चली आ रही है ( बिना आयु के कोई नहीं हुआ ) । इसी प्रकार बुद्धि की परम्परा भी अनादि काल से चली आ रही है । ( एक मरता है, दूसरा जीवित रहता है इस प्रकार से आयु की परम्परा चली आ रही है) इसलिये आयुष्यादि प्रतिपाद्य विषय अनादि है । इसको प्रतिपादन करने वाला आयुर्वेद भी अनादि है । आयुर्वेद उपकरण और आयुष्य उपकार्य है । विना उपकरण के कार्य नहीं रह सकता । इसी प्रकार बुद्धि के भी अनादि होने से आयुर्वेद का ज्ञान भी अनादि है और इस ज्ञान को जानने वाले भी अनादि हैं । दूसरा आरोग्यता या रोग को उत्पन्न करने वाले, अथवा रोग के लक्षण, कारण, चिकित्सा आयुर्वेद में प्रतिपादन किये हैं और वे अनादि है क्योंकि सुख-दुःख अनादि काल से चला आ रहा है, इसलिये इनको प्राप्त तथा नाश करने के भी उपाय अनादि होने चाहिये । तीसरी गुरु, हलका, ठण्ठा, गरम, स्निग्ध, रूक्ष पदार्थों के ये गुण धर्म भी नित्य हैं, इसलिये इन गुण धर्मों को बताने वाला आयुर्वेद भी नित्य है । पृथि- व्यादि पंच महाभूतों के गुण धर्म नित्य हैं, परन्तु इनसे बने पदार्थ अनित्य हैं । इसी प्रकार मिट्टी नित्य और मिट्टी से बना घड़ा अनित्य है । इस प्रकार से मनुष्य शरीर को बनाने वाले परिणाम नित्य हैं । और इस परिणाम रूप निर्माण -क्रिया को बतलाने वाला आयुर्वेद भी नित्य है । आयुर्वेद का एक समय अस्तित्व नहीं था, उत्पन्न हुआ है ऐसा कहीं पर सुनने में नहीं आता । जहाँ पर भी आयुर्वेद का प्रादुर्भाव लिखा है, वहां पर इसका अबोध या उपदेश रूप से प्रतिपादन किया है कि इन्द्र के उपदेश से भरद्वाज मुनि मृत्यु लोक में आयुर्वेद को बाये, यह उपदेश और ब्रह्मा के अन्दर जो क्षन का उदय हुआ यही इसकी उत्पत्ति है । आयुर्वेद स्वाभाविक एवं अकृतक है । जैसा कि

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चरकसंहिता [अ० ३०-३६८पहले अध्याय में कहा है ( हिताहितं सुखदुखं ० ) । अग्नि में उष्णिमा और पानी में तरलता स्वाभाविक है, बनाई हुई नहीं है इसी प्रकार आयुर्वेद भी स्वाभाविक है । भाव, अर्थात् स्वभाव के अकृत अर्थात् स्वाभाविक होने से भी आयुर्वेद नित्य है । यथा-गुरु पदार्थों के उपसेवन से गुरुता बढ़ती है । और लघु पदार्थों के उपसेवन से शरीर में लघुता बढ़ती है । इसलिये आयुर्वेद भी नित्य है । २६ 11 तस्याऽऽयुर्वेदस्याङ्गान्यष्टौ । तद्यथा -कायचिकित्सा, शालाक्यं शल्यापहर्तृकं, विष-गर- वैरोधिक प्रशमनं, भूतविद्या, कौमारभृत्यकं, रसायनानि, वाजीकरणमिति ॥ २७ ॥

इस आयुर्वेद के आठ अंग हैं । ( १ ) काय चिकित्सा, ( २ ) शालाक्य, ( ३ ) शल्यापहर्तृक, ( ४ ) विष-गर-वैरोधिक प्रशमन, ( ५ ) भूतविद्या, ( ६ ) कौमारभर-भृत्यक, ( ७ ) रसायन और ( ८ ) बीजीकरण ये आठ अंग हैं ॥ २७॥

ब्राह्मण - राजन्य- वैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्म- रात्मरक्षार्थं राजन्यैर्वृत्त्यर्थं वैश्यः+, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिप्र हार्थ सर्वैः । तत्र च यदध्यात्मविदां धर्मपथस्थापकानां धर्मप्रकाशकानां वा मातृ-पितृ - बन्धु-गुरु-जनस्य वा विकारप्रशमने प्रयत्नवान् भवति यच्चाऽऽयुर्वेदोक्तमध्यात्ममनुध्यायति वेदयत्यनुविधीयते वा सोऽप्यस्य परो धर्मः । या पुनरीश्वराणां वसुमतां वा सकाशात्सुखोपहारनिमित्ता भवत्यर्थावाप्तिरारक्षणं च याच स्वपरिगृहीतानां प्राणिनामातुर्या दारक्षा- सोऽस्यार्थः । यत्पुनरस्य विद्वद्-महणयशः शरण्यत्वं च या च शुश्रूषा यचेष्टानां विषयाणामारोग्यमाधत्त " सोऽस्य काम इति यथाप्रश्नमुक्तमशेषेण ॥ २८ ॥

यह आयुर्वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों को पढ़ना चाहिये । ब्राह्मणों को प्राणियों का भला करने के लिये, क्षत्रियों को अपनी रक्षा के लिये, वैश्योंको वृत्ति अर्थात्, जीविकोपार्जन के लिये पढ़ना चाहिये । अथवा धर्म, अर्थ, काम रूपी पुरुषार्थों के उद्देश्य से ही सब को पढ़ना चाहिये । इनमें जो तस्वज्ञान को जानने वाले, धर्मसंस्थापक, धर्मोपदेशक, माता, पिता, भाई बन्धु, पुरजनों के रोगों को दूर करने में प्रयत्नशील होता है और जो पढ़े हुये आयुर्वेद को दूसरों को पढ़ाता है, बतलाता है, वैसा करता है, वह इस का सर्वोत्तम धर्म है । राजाओं या रईसों, सेठों से आरोग्यता प्रदान करने पर जो धन की प्राप्ति होती है, आत्मरक्षा होती है, इसी प्रकार अपने आभयजीबी नौकर चाकर आदि को रोग मुक्त करता है वह इसका सर्वोत्तम अर्थ है । विद्वान् लोगों द्वारा

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अ० ३० ] सूत्रस्थानम ३६६ प्रात यश, कीर्ति, सब लोगों का धरण में आना, आभयप्रदाता होना, आदर सत्कार लोगों से प्राप्त होना, प्रिय विषयों में आरोग्यता का प्राप्त होना यह इसका सर्वोत्तम काम है । इस प्रकार से सब प्रश्नों का पूरा २ उत्तर देदिया ॥ २८॥

err भिषगादित एव भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति । तद्यथा -तन्त्र तन्त्रार्थ स्थानानि स्थानार्थानध्यायानध्यायार्थान् प्रश्नार्था चेति । पृष्टेन चैतन्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेति ॥ २६ ॥

वैद्य परीक्षा के लिये वैद्य से आठ प्रश्न पूछे । यथा तन्त्र, तन्त्रार्थे, स्थान स्थानों के अर्थ, अध्याय और अध्याय के अर्थ, प्रश्न और प्रश्नार्थ । पूछे जाने पर वैद्य को सम्पूर्ण रूप से वाक्य वाक्यार्थ, अर्थावयव रूप से पूर्णतया कहना चाहिये ॥ २६ ॥

_artssयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शाखं लक्षणं तन्त्रमित्य-नर्थान्तरम् ॥ ३० ॥

तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः, स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो भूय एव शरीर- वृत्ति हेतु -व्याधि -कर्म -कार्य -काल-कर्तृकरण-विधि -विनि- याद्दशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेश्यन्ते तन्त्रेण || ३१|| इसमें आयुर्वेद शाखा, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण व तन्त्र ये सब एकार्थ. वाची शब्द हैं । तन्त्र का अर्थ " आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः " आयु-जिससे जानी जाती है वह आयुर्वेद- इस प्रकार अपने लक्षणों से कह दिया । हित अहित आयुरूप लक्षण है और यह अर्थ प्रकरण मेद से बहुत प्रकार का है । यथा शरीर (पश्च महाभूतों का समुदायरूप होने से अवयवादि भेद से बहुत प्रकार का है ), हेतु ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध, परिणाम ), व्याधि ( धातुवैषम्य ), कर्म ( चिकित्सा ), कार्य ( आरोग्यता ), काल (ऋतु आदि), कर्ता ( भिषक् ), करण ( भेषज ), विधि ( उपकल्पना विधान जिसे काल, द्रव्य और व्याधि की अपेक्षा से समझना चाहिये ) । इन प्रकरणों से ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से भली प्रकार सुगठित होता है । ये प्रकरण तन्त्र में सम्पूर्ण रूप से कहे जायेंगे ३०-३१ तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि । तद्यथा-श्लोक निदान-विमान-शारीरे- न्द्रिय-चिकित्सित-कल्पसिद्धि-स्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानं egrantestनि निदान-विमान- शरीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने इति ॥ ३२ ॥

इस तन्त्र के आठ स्थान हैं यथा -१० सूत्र ( श्लोक ) स्थान, २. निदान- स्थान, १. विमानस्थान, ४. शरीरस्थान, ५. इन्द्रियस्थान, ६. चिकित्सास्थान,

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४०० चरकसंहिता [अ० ३० ७. कल्पस्थान और ८. सिद्धिस्थान । इनमें लोकस्थान ३० अध्यायों का निदान, विमान और शारीरस्थान, आठ २ अध्यायों के इन्द्रियस्थान बारह का चिकित्सास्थान तीस का, कल्प और सिद्धिस्थान बारह अध्यायों के हैं ॥१२ ॥

भवन्ति चात्र- द्वेत्रिंशके द्वादशकयं च त्रीण्यष्टकान्येषु समाप्तिरुक्ता ।

श्लोकौषधारिष्ट विकल्प-सिद्धि- निदान -मानाश्रय -संज्ञकेषु ॥ ३३ ॥

स्वे स्वे स्थाने यथास्वे च स्थानार्थ उपदेश्यते ।

सर्वशमध्यायशतं शृणु नामक्रमागतम् ॥ ३४ ॥

दीर्घजीवोऽप्यपामागतण्डुकारग्बधादिकौ ।

षविरेकाश्रयश्चेति चतुष्को भेषजाश्रयः ॥ ३५ ॥

मात्रातस्याशितीयौ च न वेगान्धारणं तथा ।

इन्द्रियोपक्रमश्चेति चत्वारः स्वास्थ्यवृत्तिकाः ॥ ३६ ॥

खुड्डाकश्च चतुष्पादां महास्तिनेषणस्तथा ।

सह बातकलाख्येन विद्यान्नंदे शिकान् बुधः ॥ ३७ ॥

स्नेहनस्वेदमाध्यायावुभौ यश्वीपकल्पनः ।

चिकित्साप्राभृतश्चैव सर्वा एवीपकल्पनाः ॥ ३८ ॥

कियन्तः शिरसीयश्च त्रिशोफाष्टोदरादिकौ ।

रोगाध्याया महांश्चैव रोगाध्यायचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥

अष्टौनिन्दितसंख्यातस्तथा लंबनतपेणौ ।

विधिशोणितकश्चेति व्याख्यातास्तत्र योजनाः ॥ ४० ॥

यज्जःपुरुषसंख्यातो भद्रकाप्यान्नपानिको ।

विविधाशितपीतीयश्चत्वारोऽन्नविनिश्वयै ॥ ४१ ॥

दशप्राणायतनिकस्तथाऽर्थेदशमूलिकः ।

द्वावेतौ प्राणदेहार्थी प्रांत वैद्यगुणाश्रयो ॥ ४२ ॥

औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः चतुष्काः षट्क्रमेणोक्ताः सप्तमञ्चान्नपानिकः ॥ ४३ ॥

महान्यायाविति त्रिंशत्कमर्थवत् ।

श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् ॥ ४४ ॥।

चतुष्काण महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः ।

श्लोकार्थः संप्रहार्थ लोकस्थानमतः स्मृतम् ॥ ४५ ॥

-इस ग्रन्थ में तीस तीस अध्याय के सूत्र और चिकिया है । बारह २

पृष्ठ 419

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० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् voK wwwww अध्याय के तीन अरिष्ट ( इन्द्रिय ), कल्प और सिद्धि स्थान, आठ २ अध्याय के निदान, विमान और शारीर ये तीन स्थान हैं । श्लोक, औषध, अरिह, विकल्प, सिद्धि, निदान, विमान और आभव नामक १२० अध्यायों में अन्य समाप्त हुआ है । अपने २ स्थान में यथायोग्य स्थानों का उपदेश तस्वार्थ सहित कहेंगे | इन १२० अध्यायों के क्रम से नाम सुनो- दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, षड्विरेचनश्चताभितीष, इन चार अध्यायों में ' औषध चतुष्क' का निरूपण किया है । मात्राशितीय, तस्या-शितीय, नवेगान्धारणीय और इन्द्रियोपक्रमणीय ये चार स्वास्थ्य चतुष्क हैं । खुड्डाकचतुष्पाद, महाचतुष्पाद, तितैषणीय और वातकलाकलीय ये चार निर्देश चतुष्क ( कर्त्तव्य अकर्त्तव्य विषयक ) हैं । स्नेहन, स्वेदन, उपकल्पनीय और चिकित्सा प्राभृतीय ये चार कल्पनाचतुष्क हैं । कियन्तः शिरसीय, त्रिशोथीय, अष्टोदरीय, महारोगाध्याय-ये चार रोगचतुष्क हैं । अष्टौनिन्दितीय लंघन- बृंहणीय सन्तर्पणीय और विभिधशोणितीय ये चार योजनाचतुष्क हैं । यज्जःपुरुषीय, आत्रे- यभद्रकाप्यीय, अन्नपानीय, विविधाशितपीतीय ये चार अन्नपान -चतुष्क हैं । दश प्राणायतनीय और अर्थे-दशमहामूलीय इन पिछले दोनों अध्यायों में प्राण, ओज, धमनी और वैद्यों के गुणों का निरूपण किया है । इस प्रकार से इस सूत्रस्थान में औषध चतुष्क, स्वास्थ्य -चतुष्क; निर्देश- चतुष्क, कल्पना -चतुष्क; रोग- चतुष्क; योजना - चतुष्क, अन्नपान- चतुष्क तथा पहले दो अध्यायों में इन अडाईस अध्यायों की सूची है । इस प्रकार से सूत्रस्थान के तीस अध्यायों में इन विषयों का वर्णन किया है । जिस प्रकार मनुष्य के सब अंगों में श्रेष्ठ मस्तिष्क है उसी प्रकार से सब ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है । इस सूत्र स्थान में उप-योगी चतुष्कों का संग्रह किया है । श्लोक रूप में संग्रह होने के कारण इसको 'श्लोकस्थान ' कहते हैं ॥। ३३-४५ ॥

ध्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः ।

शोषोन्मादनिदाने च स्यादपस्मारिणां च यत् ॥ ४६ ॥

इत्यध्यायाष्टकमिदं निदानस्थानमुच्यते । वर निदान, रक्तपित्त निदान, गुल्म निदान, प्रमेह निदान, कुष्ठ निदान, शोष निदान, उन्माद निदान और अपस्मार निदान —-ये आठ अध्याय निदान-स्थान में हैं ॥ ४६ ॥

रसेषु त्रिविधे कुक्षौ ध्वंसे जनपदस्य च ॥ ४७ ॥

त्रिविधे रोगविज्ञाने स्रोतःस्वपि च वर्तने ।

पृष्ठ 420

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 420 का मूल पृष्ठ
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४०२ [अ०३० रोगानीके व्याधिरूपे रोगाणां च भिषग्जिते ॥ ४८ ॥

अष्ट विमानान्युक्तानि मानार्थानि महर्षिणा । विमान स्थान में रस विमान त्रिविधकुक्षीय, जनपदोदध्वंसनीय, त्रिवि- घरोग विशेषविज्ञानीय स्रोतोविमान, रोगानीक, व्याधिरूपीय और रोगमिष-ग्जितीय- ये आठ अध्याय हैं ॥ ४७-४८ ॥ कतिधापुरुषीयं च गोत्रेणातुल्यमेव च ॥ ४ ९ ॥

खुडीका महती चैव गर्भावक्रान्तिरुच्यते ।

पुरुषस्य शरीरस्य विचयौ द्वौ विनिश्चितौ ॥ ५० ॥

शरीरसंख्या सूत्रं च जातेरष्टममुच्यते ।

इत्युद्दिष्टानि मुनिना शारीराण्य त्रिसूनुना ॥ ५१ ॥

शरीर स्थान में कतिधापुरुषीय, अतुल्यगोत्रीय, खुड्डीकागर्भावक्रान्ति, पुरुष-विचय, शारीरविन्वय, शरीरसंख्या और जातिसूत्रीय ये आठ अध्याय हैं । ४ ९०५१ ।

वर्णस्वरीयः पुष्पाख्यस्तृतीयः परिमर्षणः ।

तथैव चेन्द्रियानीकः पूर्वरूपिक एव च ॥ ५२ ॥

कतमानिशरीरीयः पन्नरूपोऽप्यवाक्शिराः ।

यस्यश्यावनिमित्तच सद्योमरण एव च ५३ ॥

अणुज्योतिरिति ख्यातस्तथा गोमयचूर्णवान् ।

द्वादशाध्यायकं स्थानमिन्द्रियाणां प्रकीर्तितम् ॥ ५४ ॥

वर्णस्वरीय, पुष्पितक, परिमर्पणीय, इन्द्रियानीक, पूर्वरूपीय, कतमानि शरीराणि, पद्मरूपीय, अवाक्शिरसीय, यस्यश्यावनिमित्तीय, सद्योमरणीय, अणु- ज्योतीय और गोमयचूर्णीय ये बारह अध्याय इन्द्र्यस्थान में हैं ॥ ५२-५४ ॥

अभयामलकीयं च प्राणकामीयमेव च ।

करप्रचितिकं वेदसमुत्थानं रसायनम् ॥ ५५ ॥

संयोगशरमूलीयमासकक्षीरिकं तथा ।

माषपर्णभृतीयं च पुमाब्जातबलादिकम् ॥ ५६ ॥

चतुष्कद्वयमप्येतदध्यायद्वयमुच्यते ॥

रसायनमिति ज्ञेयं वाजीकरणमेव च ॥ ५७ ॥

राणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः ।

शोषोन्मादेऽप्यपस्मार-क्षत-शोफोदरार्शसाम् ॥ ५८ ॥

ग्रहणीपाण्डुरोगाणां श्वासकासातिसारिणाम् ।

छविसर्पतुष्णानां विषमद्यविकारिणाम् ॥ ५६ ॥