चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 51–60
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 51–60
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सूत्रस्थानम् ३३ अ० २ ] ३ चूंकि आरोग्य का मूल साधन कोष्ठाग्नि है, इस लिये सत्र से मुख्य वस्तु कोष्ठाग्नि है । अतः अग्नि का सन्दीपन करने के लिये यवागू कहते हैं, ( १ ) पिप्पली, पिप्पली मूल ( पीपला मूल ), ( चव्य ) चत्रिका, ( चित्रक) चीता, सोंठ इन से बनाई हुई यवागू ( दीपनी ) अग्निवर्धक ओर शूलनाशक होती है ' ॥ १८ ॥
नागू तीन प्रकार की है, १ यवागू जो छः गुने जल में पकती है, २. मण्ड चौदह गुने जल में और ३. विलेपी चार गुने जल में पकाई जाती है ।
दधित्थ-बिल्व-चाङ्गरी-तक्र-दाडम-साधिता ।
पाचनी ग्राहिणी पेया, सवाते पाञ्च मूलिकी ॥ १६ ॥
( २ ) दधित्थ ( कैथ ), बिल्व ( बेलागरीगुदा- ), चांगेरी ( चोपतिया ), तक ( छाछ ), दाडम ( अनारदाना ) इन से बनाई हुई यवागू 'पाचनी' पाचन करने वाली 'ग्राहिणी' अर्थात् स्तम्भक वा मल को रोकने वाली है । ( ३ ) पंच मूल बृहत् पञ्चमूल-शालवर्णा, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी और गोखरू-यह पांच वातहर हैं इनसे सावित यवागू वातविकार के लिये उप- यांगी है ॥ १६ ॥
शालपर्णी-बला-बिल्वः पृश्निपर्ण्यच साधिता ।
दाहिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ २० ॥
( ४ ) शालपर्णी ( सालवन ), बला ( खरैटी ), बिल्व ( बेलगिरी ), और पृश्निपर्णी ( पीठापणीं ) इन से बनाई तथा अनार के रस से खट्टी की हुई यवागूपित्त-श्लेष्म जन्य अतिसार रोग में हितकारी है ॥ २० ॥
पयस्यर्धोदके छागे हीबेरोत्पलनागरैः ।
पेया रक्तातिसारनी पृश्निपर्ण्या च साधिता ॥ २१ ॥
( ५ ) बकरी का जितना दूध हो, उससे आधा पानी इस में मिला कर ( मिलित परिमाण छः गुना ), हूं।बेर ( नेत्रवाला ), उत्पल ( कमलगट्टा ) और सोंठ, और पृष्ठपर्णी ( पिठवन ) ये एक कर्ष मात्रा लेकर यवागूसिद्ध करनी चाहिये । यह यवागू रक्तातिसार को नष्ट करती है ॥ २१ ॥
१. पिप्पली आदि सब साधन द्रव्य मिलकर एक कर्ष अर्थात् चार मासे लेने चाहिये । इसको थोड़ा कूट लेना चाहिये, पकाने में आधा पानी जलाना चाहिये, पानी की मात्रा के भेद से नाना भेद हो जाते हैं ।
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३४ चरकसंहिता [ अ० २
दद्यात्सतिमिषां पेयां सामे साम्ला सनागराम् ।
श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्यां मूत्रकृच्छू सफाणिताम्॥ २२ ॥
( ६ ) अतिविषा ( अतीस ), नागर ( सोंठ ) इनके कषाय अथवा कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करे, इसे अनार के रस से खट्टी कर के आमा- तिसार ( रक्तातिसार ) में दे । ( ७ ) मूत्र कृच्छ्र रोग में श्वदंष्ट्रा ( गोखरू ) और कण्टकारी ( कटेरी ) इनके कषाय या कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करके इस में फाणित ( राब, आधा पका गुड़ ) डाल दे ॥ २२ ॥
विडङ्ग -पिप्पलीमूल-शिमुभिर्मरिचेन च ।
तक्रसिद्धा यवागूः स्यात्क्रिमिघ्नी ससुवचिका ॥ २३ ॥
( ८ ) वायविडंग, पिप्पलीमूल, शिग्रु ( सहजना ) और मरिच इनके कल्क से छः गुने तक में सिद्ध की हुई यवागू में सुवर्चिका ( सौवचल नमक डालकर
रोगी को देने से कृमि नष्ट होते हैं । यहाँ पानी के स्थान पर तक्र का प्रयोग करे ॥
मृद्वीका सारिवा लाजा-पिप्पली-मधुनागरैः ।
पिपासानी, त्रिपघ्नी च सोमराजीविपाचिता ॥ २४ ॥
( ६ ) मृद्वीका ( द्राक्षा दाख ) सारिवा ( अनन्त मूल ) लाजा ( खोलें ), पिप्पली, और सोंठ इन के कल्फ या कषाय से यवागूको छः गुने जल में सिद्ध करे । ठण्डा होने पर इस में शहद मिला कर पीने से प्यास शान्त होती है । ( १० ) सोमराजी ( बावची ) से सिद्ध की हुई यवागू ' विषघ्नी' अर्थात् ये हुए विष को नष्ट करने वाली है ॥ २४ ॥
सिद्धा वराहनिय बागूबृंहणी मता ।
गवेधुकानां भृष्टानां कर्षणीया समाक्षिका ॥ २५ ॥
( ११ ) सुअर के मांस रस में सिद्ध की हुई यवागू पुष्टि कारक होती है । ( १२ ) भूने हुए गेहुओं के सत्तू से बनाई हुई यबागूमें शहद मिला कर लेने से शरीर पतला होता है ॥ २५ ॥
सर्पिष्मती बहुतिला स्नेहनी लवणान्विता ।
कुशामलकनिर्यूहे श्यामाकानां विरूक्षणी ॥ २६ ॥
( १३ ) भी वाली, तिलयुक्त नमकीन यवागू स्नेहकारक है । वह शरीर को स्निग्ध करती है । तिलों के साथ कुछ चावल मिला लें । यवागूसिद्ध करके फिर इस में भी और नमक मिलायें ।
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अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५ ( १४ ) कुश ( दाम ) की जड़ और आमलक ( आंवले का फल ) इनको एक २ कर्ज लेकर छः गुने जल में कषाय करे इसमें श्यामाक तण्डुल पाक कर के सिद्ध करनी चाहिये । यह पान करने योग्य यवागू शरीर में रूक्षता उत्पन्न करती है ॥ २६ ॥
दशमूलीता कास-हिका-श्वास कफापहा ।
यमके मदिरासिद्धा पक्काशयरुजापहा ॥ २७ ॥
( १५ ) दशमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बृहती, गोखरू, बिल्व, श्योनाक, अरणी, गम्भारी, पाठा ) से सिद्ध की हुई यवागू कास, हिका, श्वास और कफ को नष्ट करती है । ( १६ ) यमक अर्थात् समान भाग घी और तैल लेकर इन में भूनी हुई एवं पानी के स्थान पर मदिरा लेकर उनमें सिद्ध की हुई यवागू ( मदिरा मिलाकर देने से ) पक्वाशय की पीड़ा को मिटाती है ॥ २७ ॥
शाकैमास्तिर्माषैः सिद्धा वर्चो निरस्यति ।
जम्ब्वाश्रास्थि -दधित्याम्ल -बिल्वेः सांग्राहिकी मता ॥ २८ ॥
( १७ ) 'शाक' ( हरी सब्जियाँ ) मांस, तिल, माष ( उड़द ) इन के कल्क और कषाय से सिद्ध की हुई यवागू मल को बाहर निकालती है । ( १८ ) जम्बु अस्थि ( जामुन की गुठली ) आम्रास्थि ( आम की गुठली की गिरी ) दधित्थाम्ल ( कैथ कच्चा, खट्टी अवस्था में ), बिल्व ( बेलगिरी कच्चे हरे ), इनसे सिद्ध की हुई यवागू 'स्तम्भक' है ॥ २८ ॥
क्षार- चित्रक - हिङ्ग्वम्ल- वेतसर्भेदिनी मता ।
अभया-पिप्पलीमूल-विश्वैर्वातानुलोमनी ॥ २६ ॥
( १६ ) क्षार ( जवाखार I ), चित्रक ( चीतामूल ), हींग, अम्लवेतस ( अमलवेत), इन से सिद्ध की हुई यवागू मल को भेदन करके बाहर निकालती है । ( २० ) अभया ( जंगी हरड़ ), पीपल मूल और विश्व ( सोंठ ) इन से १ ' यमक' एक भाग घी और एक भाग तैल परस्पर समान और एक भाग मदिरा लेनी चाहिये । अथवा मूंग की दाल और सांठी के चावल परस्पर समान भाग मिलाकर मदिरा में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । ( जल्प कल्प -तक ) २. जवाखार बनाने के लिये हरे नवों को आग में स्वच्छ स्थान में जला लेना चाहिये । फिर इस को पानी में घोलकर वस्त्र में से छान लेना चाहिये । छाने हुए पदार्थ को आग पर गरम करके शुष्क कर लेना चाहिये ।
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३६ चरकसंहिता ( अ० २ सिद्ध की हुई यवागूबात का अनुलोमन अर्थात् कफ वातादि दांत्रों का परिपाक करके मल को अच्छी प्रकार से बाहर करती है ॥ २६ ॥
तक्रसिद्धा यवागूः स्याद् घृतव्यापत्तिनाशिनी ।
तैलव्यापदि शस्ता तु तत्रपिण्याकसाधिता ॥ ३० ॥
( २१ ) छाछ में सिद्ध की हुई यवागू घी के अधिक खाने से उत्पन्न विकार को नष्ट करती है । ( २२ ) छाछ और पियाक ( खल ) से सिद्ध की हुई यवागू तैल के अधिक खाने से उत्पन्न व्याधि में देने योग्य है ॥ ३० ॥
गव्यमांसरसैः साम्ला विषमज्वरनाशिनी ।
कण्ठ्या यवानां यमके पिप्पल्यामलकैः शृता ॥ ३१ ॥
( २३ ) गाय के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू को अनार, आंवला आदि ज्वर नाशक खटाई से खट्टा करके देने पर विषम ज्वर नष्ट होता है । ( २४ ) जौ को समान भाग लेकर घी और तैंक में भूनकर पिप्पली और अविले इनके कषाय या कल्क से सिद्ध की हुई यवागू कण्ठ के रोगों के लिये हितकर है ॥ ३१ ॥
ताम्रचूडरसे सिद्धा रेतोमार्गरुजापहा ।
समाषविदला वृष्या घृतक्षीरोपसाधिता ॥ ३२ ॥
( २५ ) 'ताम्रचूढ़ ' अर्थात् कुक्कुट के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागृ शुक्र मार्ग की पीड़ा को मिटाती है । ( २६ ) जल के स्थान पर दूध और घृत यथापरिमाण में लेकर उनमें उड़द की दाल या इसकी पिमी हुई पिट्ठी को पहिले घी में भूनकर दूध में
यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह शुक्रवर्धक है ॥ ३२ ॥
उपोदिकादधिभ्यां तु सिद्धा मदविनाशिनी ।
क्षुधं हन्यादपामार्गक्षीरगोधारसे शृता ॥ ३३ ॥
( २७ ) उपोदिका अर्थात् पोई को कल्क रूप में तथा दही को पानी के स्थान में लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह यवागू धतूरे आदि के विष को नष्ट करती है । पोई और दही से सिद्ध की यवागू मद नाशक है । ( २८ ) चिरचिटे के चावलों को दूध और गोह के मांस में पकाकर यवागू सिद्ध करे । इस से भूख का नाश होता है । यहां पर जल वा सादे चावल नहीं प्रयुक्त होते ॥ ३३ ॥
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अ० ३ सूत्रस्थानम ३७ उपसंहार- तत्र श्लोकाः । अष्टाविंशतिरित्येता यवाग्वः परिकीर्तिताः । पञ्चकर्माणि चाश्रित्य प्राक्ता भैषज्यसंग्रहः ॥ ३१ ॥;
पूर्व मूलफलज्ञानहेतोरुक्तं यौषधम् ।
पञ्चकर्माश्रयज्ञानहतास्तत्कीर्तितं पुनः ॥ ३५ ॥
इस अध्याय में अट्ठाईस प्रकार की यवागू कह दो हैं और पंच कर्म (वमन, विरेचन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन) इन के योग्य ओषधियां भी कह दो हैं । मूलिनी, फलनी आदिका ज्ञान कराने के लिये जो औषधियां प्रथम अध्याय में कही हैं, ये औषधि पंचमोंने अन्य व्याधियों में उपयुक्त हैं, इसलिये यहां पर फिर लिखीहैं ॥ ३४-३५ ॥
स्मृतिमान् युक्तिदेोजितात्मा प्रतिपत्तिमान् ।
भिपगपधसंयोगचिकित्सां कर्तुमर्हति ॥ ३६ ॥
( स्मृतिमान् ) स्मरण शक्ति वाला, ( हेतुज्ञ ) रोग के कारण का जानने वाला, ( युक्तिश ) योजना, व्याधि के साधन रूप राज्य कीकल्पना को जानने वाला, अथवा मात्रा की भांति द्रव्य, व्याधि और व्याधि रूप को जानने वाला, (जितात्मा) भ्रम-प्रसाद रहित ( प्रतिपत्तिमान् ) उत्तम सूझ वाला, वैद्य औषधियों के योग से उपचार करने में समर्थ हो सकता है ॥ ३६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिकृते सूत्रस्थाने सभाषाभाष्य भेषज- चतुष्केऽपामार्गतण्डुलायो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ।
अथात आरग्वधीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माSSह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
रोगी की हितकामना से यवागू कहकर उसी प्रसंग में प्रदेह चूर्ण आदि कहते हैं । इसके लिये 'आरग्वधीय' नामक तीसरे अध्याय का व्याख्यान करते हैं ऐसा भगवान् आत्रेय कहते हैं । इस अध्याय का आरम्भ 'आरग्वध' से हुआ है, इसलिये इस अध्याय का नाम आरग्वधीय है ॥ १२॥
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३८ चरकसंहिता [अ०३
आरग्वधः सैडगजः करओ वासा गुडूची मदनं हरिद्रे ।
श्याह्नः सुराः खदिरोधवश्च निम्बो विडङ्गं करवीरकत्वक् ॥ ३॥
प्रन्थिच भौर्जो लशुनः शिरीषः सलोमशो गुग्गुलुकृष्णगन्धे ।
फणिज्जको वत्सकसप्तपर्णो पीलूनि कुष्ठं सुमनःप्रवाळाः ॥ ४ ॥
वचा हरेणवृता निकुम्भो भल्लातकं गैरिकमञ्जन ।
मनःशिलाले गृहधूम एला काशीसलोध्रार्जुनमुस्तसर्जाः ॥ ५ ॥
इत्यर्धरूपैर्विहिताः षडेते गोपित्तपीताः पुनरेव पिष्टाः ।
सिद्धाः परं सर्षपतैलयुक्ताश्चर्णप्रदेहा भिषजा प्रयोज्याः ॥ ६ ॥
कुष्ठानि कृच्छ्राणि नवं किलासं सुरेन्द्रलुप्तं किटिभं सददु ।
भगन्दराशांस्यपचीं सपामां हन्युः प्रयुक्तास्त्वचिरान्नराणाम् ॥ ७ ॥
'आरग्वध' से लेकर ' सर्ज' इस शब्द तक तीन श्लोकों में कहे हुए छः योग हैं, इनको गाय के पित्त में पीस कर काम में लाना चाहिये । यथा— ( १) आरग्वध (अमलतास), ऐडगज (पनवाड़ ), करञ्ज ( नाटा करंज ), वासा (वासे के पत्ते), गुडूची (गिलोय), मदन ( मैनफल ), दो हरिद्रा ( हल्दी और दारूहल्दी ) । ( २ ) श्रयाह्न ( गन्दा विरांजा ), सुरा ( देवदार ), खदिर ( खैर ), और धव ( धावन ), निम्ब ( नोम के पत्ते ), विडंग ( वायविडंग ), करवीरत्वक् ( कनेर की छाल ) यह दूसरा । ( ३ ) भोजपत्र की गायें, लशुन ( लहसन ), शिरीष (सिरस की छाल), लोमशा ( जटामांस| ), गूगल, कृष्ण- गन्धा ( सहजना ) यह तीसरा । ( ४ ) फणिजक ( मरवा ) वत्सक ( इन्द्र जौ) सप्तपर्ण ( सातवन ), पीलू कुष्ठ ( कूठ ), सुमनःप्रवाल ( चमेली के कोमल पत्ते) यह चौथा । ( ५ ) वचा ( वच ), हरेणु ( रेणुका बीज, मेंहदी के बीज ), त्रिवृत् ( निशोथ ), निकुम्भ ( जमाल गोटा ), भल्लातक ( भिलावा ), गैरिक ( गेरू ), अंजन ( रसाञ्जन), यह पांचवां, ( ६ ) मनःशिला ( मैनसिल ), आल ( हरिताल ), गृहधूम ( घरका धुंआसा ), एला ( छोटी इलायची ), काशीस ( पुष्प कासीस ), लोध्र ( पठानी लोध ), अर्जुन ( अर्जुन वृक्ष की छाल ), मुस्ता (नागरमोंथा), सर्ज्ज ( राल ) यह छठा योग हुआ । इनमें से किसी योग को चूर्ण के रूप में तैयार करके गाय के पित्त के साथ फिर पीसे । फिर इसको सरसों के तेल में मिला कर द्रव रूप बनाकर लगाने से कष्टसाध्य कुष्ठरोग, नया किलास इन्द्रलुप्त बालों का गिरना किटिभ ( कुष्ठ मेद ) दहु ( दाद ), भगन्दर बवासीर, चर्मकील, अपची ( न पकने वाली गाठें ) और पामा ( खाज ) शीघ्र ही मनुष्यों के नष्ट होते हैं । ३-७ ॥
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अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६ A अब सातवां योग कहते हैं- कुष्ठं हरिद्रे सुरसं पटोलं निम्बाश्वगन्धे सुरदारु शिश्रु । ससर्षपं तुम्बुरुधान्यवन्यं चण्डां च चूर्णानि समानि कुर्यात् ॥ ८॥
तैस्तत्रयुक्तः प्रथमं शरीरं तैलाक्तमुद्वर्तयितुं यतेत तेनास्य कण्डूः पिडकाः सकोठाः कुष्ठानि शाफान शमं व्रजन्ति ॥ ॥ कुष्ठ ( कूठ ), दोनों हल्दी ( दारूहल्दा और हल्दी ), सुरसा ( तुलसी ), पटोल ( परवल ), निम्न ( नीम के पत्ते ), अश्वगन्धा ( असमन्ध ), सुरदारु ( देवदार ), शिशु ( सहजना ), सर्पप ( श्वेत सरसां ), तुम्बुरु, धान्य (धनिया) वन्य ( कैवर्त्त मुस्ता ), चण्डा ( चारक ) इन पन्द्रह औषधियों को परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को छाल में पीसकर शरीर पर लगाना चाहिए । शरीर पर लगाने से पूर्व तैल का उबटन लगा लेना चाहिये । इस लेप के लगाने से कण्डू ( खाज़ ), पिडका ( छोटी २ फुन्सियां ), कोठ (न दबने वालीफुन्सियां ), कुछ काढ और शांफ (सूजन) नष्ट होते हैं ॥ ८-६ ॥ आठवां योग --- कुष्ठामृतासङ्गकटङ्कटेरीकाशीस कम्पिल्लकलो मुस्ताः सौगन्धिकं सर्जरसो विडङ्गं मनःशिलाले करवीरकत्वक् ॥ १० ॥
तैलाक्तगात्रस्य कृतानि चूर्णान्येतानि दद्यादव चूणनार्थम् ।
दद्रः सकण्डूः किटिभानि पामा विचर्चिका चैव तथेति शान्तिम्॥११॥
कुष्ठ ( कूठ ), अमृता ( गिलोय ), संग ( नीला तुत्थ ), कटंकटेरी ( दारु हल्दी ), काशीस ( हीरा कसीस ), कम्पिल्लक ( कमीला ), मुस्त (नागर मोथा ), लोध्र ( पठानी लोध ), सौगन्धिक ( कहार पुष्प, सुगन्धि ), सर्जरस ( राल ), मनःशिला ( मैंनसिल ), आल ( हरताल), करवोरत्वक् ( कनेर को छाल ), इन चौदह ओषधियों का चूर्ण करके अवचूर्ण ( अर्थात् मलने ) के लिए देना चाहिये । प्रथम शरीर पर तैल की मालिश कर लेनी चाहिये । इस से दाद, कण्डू, खाज़, किटिभ, कुष्ठ, पामा, विसर्प, विचर्चिका सावयुक्त फुन्सियां, नष्ट होती हैं । कोई अमृतासंग एक वस्तु मानकर नीला थोथ अर्थ करते हैं ॥ १०-११ ॥ नवां योग- मनःशिलाले मरिचानि तैलमार्क पयः कुछहरः प्रदेहः । मनःशिला ( मैनसिल ), आल ( हरताल ), मरिच, वैक ( सरसों का तेल कुशहर होने से ), ' आर्कग्यस्' ( आक का दूध ) इनको परस्पर मिला कर लेप चना कर लगाने से कुष्ठ अच्छा होता है ।
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४० चरकसंहिता [अ०३ इस योग में पानी को मिलाना नहीं चाहिये, अपितु आक के दूध में ही
सब बनाना चाहिये ।
त्थंदसवांवि योग--मरिचानि कुष्टं लोधं च तद्वन समनःशिलं स्यात् ॥ ५२ ॥
तुत्थ ( नीला थोथा ), विडंग ( वायविडंग), मरिच (काली मरिच), कुष्ट ( कूट ). लोभ ( पटानी लांच ), मनःशिला ( मनसिल) इनके चूर्ण का पूर्व की भांति आक के दूध में मिलाकर लगाना चाहिये ॥ १२॥
ग्यारहवां लेप- रसाञ्जनं प्रपुनाडबीजं युक्तः कपित्थस्य रसेन लेपः । रसाञ्जनं ( रमत ). प्रप्नाडीज ( पनवाड़ के बीज ), इन को कैथ के पत्तों के रस में मिलाकर लगाने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है । पानी का उपयोग नहीं करना चाहिये । बारहवां योग— करव्जबीजेडगजं सकुष्टं गोमूत्रपिष्टं च परः प्रदेहः ॥ १३ ॥
करंज ( नाटा करंज बीज ), ऐडगज ( चक्रमर्द ) और कुष्ठ ( कूट ), इनकी गोमूत्र में पास कर लेप करने से कुष्ट नष्ट होता है ॥ १६ ॥
तेरहवां योग--
उभे हरिद्रे कुटजस्य बीजं करञ्जबीजं सुमनःपलान् ।
त्वचं समयां हयमारकस्य लेप तिलक्षारयुतं विदध्यात् ॥ १४ ॥
दोनों प्रकार की हल्दी ( साधारण हल्दी और दाद हल्दी, कुटज बीज (इन्द्रजौ), करंज बीज ( करए का बीज ), सुमनःकाल ( चमेली के कोमल नये पत्ते ), हयमारक ( कनेर ) की अन्दर कीत्वचा, और तिल क्षार ( तिल की नाल का क्षार भस्म) इनका लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ रोग मिटता है ॥ १४॥
चौदहवां योग- मनःशिला त्वक्कुटजात्कुष्टात् सलोमशः सैडगजः करञ्जः ।
ग्रन्थिच भौर्जः करवीरमूलं चूर्णानि साध्यानि तुपोदकेन ॥ १५॥
पलाशनिर्दाहरसेन चापि कर्षोद्धृतान्याढक संमितेन ।
दवले प्रवदन्ति लेपमेतत्परं कुष्ठनिपूदनाय ॥ १६ ॥
मनःसिल, कुटजत्वक् ) कूड़े की छाल ), कुष्ठ ( कूठ ) लोमश, ( जटा... मांसी ), ऐडगज ( चक्रमर्द ), करंज, ( करंजुआ ), भोजे ( भोजपत्र की गांठें ), करवीर ( कनेर की जद), ये आटो द्रव्य प्रत्येक एक एक कर्ष ( दो २
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अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४१ तोला ) लेकर तुधोदक ( यव-काञ्जिक ) एक आढक तथा 'पलाश- निर्दाह रस ' अर्थात् ढाक के वृक्ष की जलाने से उत्पन्न रस एक आढक परिमाण (८ सेर) लेकर पाक करना चाहिये । पाक इतना करना चाहिये कि वह कड़छी पर चिप- टने लगे | यह प्रलेप कुष्ट रोग को नष्ट करने के लिये श्रेष्ठ है || १५-१६ ॥
पन्द्रहवां योग- पर्णानि पिष्ट्वा चतुरङ्गुलस्य तक्रेग पर्णान्यथ काकमाच्याः ।
तैलाक्तगात्रस्य नरम्य कुष्ठान्युद्वर्तयेदश्वहनच्छदेश्च ॥ १७ ॥।
अमलतास के पत्तों, मकोय के पत्तों का और अश्वहनच्छद ( कनेर ) के पत्तोंकईकोछाछविद्वान्के साथकामाच्यापीसकर शरीरपर्णानिपर तैय कासेनाशएक करकेअन्य कुष्टरोगयोग की मेंकल्पनामले | करते हैं । इसी प्रकार 'अश्वच्छ ' इम से तीसरा योग मानते हैं ॥ १७ ॥
सोलहवां योग- को कुलत्थाः सुरदारु रास्ता मापानसतिफलानि कुष्ठम् ।
वचा शताला यवचूर्णमम्लमुष्णानि वातामयिनां प्रदेदः ॥ १ = ॥
कोल ( शाड़ी के बेर ), कुलत्थ ( कुलत्थी ), सुरदारु ( देवदारु ), रास्ना उड़द, अतसी ( अलमी ), तैलफल ( एरण्ड के बीज ), कुष्ठ ( कूट ), बचा ( वच ) शताह्ना ( सौंफ ), और अवचूर्ण ( यवक्षार ) इनको 'अम्' ( कांजी ) के साथ पीसकर प्रलेन बनाकर गरम करके वातरोगी के लिये प्रयुक्त करें । इससे वातरोग नष्ट होते हैं ॥ १८॥
सत्रहवां योग- आनूपमत्स्यामिपवेसवारैरुष्णैः प्रदेहः पवनापहः स्यात् ।
स्नेहैश्चतुर्भिर्दशमूलमिश्रैर्गन्धौपधैश्च। निलजित्प्रदेहः ॥ १६ ॥
आनूपामिप (जलप्राय देश में चरने वाले पशुओं का मांस ) मत्स्यामिष ( मछलियों का मांत ) इनसे बनाये हुए वेसवार ( अस्थि रहित मांस को भाप से स्विन्न करके शिला पर पीस लेना चाहिये, फिर इसमें गुड़, घी, पिप्पली, मरिच मिलाने से वेसवार बनता है ) । इस को गरम करके लेप करने से वायु का नाश होता है । १- ढाक के वृक्ष की प्रधान मुख्यजद को काट कर इस के नीचे एक मिट्टी का घड़ा रख देना चाहिये । और ऊपर के भाग को जलाना चाहिये । जलाने पर जो रस निकलता है, उस रस को लेना चाहिये । आज कल खैर या शीशम का तेल पाताल यन्त्र से निकालते हैं ।
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४२ चरकसंहिता [ अ०३ www st अठारहवां योग- घी, तेल, वसा और मज्जा इन चार स्नेहों को दशमल के साथ मिला कर अथवा चारों स्नेहों को ज्वर अधिकार में कही चन्दन आदि सुगन्धित औषधियों के साथ मिलाकर लेप करने से वातविकार नष्ट होते हैं । यहां पर न कहने पर भी पानी मिलाना चाहिये ॥ १६ ॥
उन्नीसवां योग- तक्रेण युक्तं यवचूर्णमुष्णं सक्षारमार्ति' जठरे निहन्यात् । जौ के आटे की यवखार के साथ छाछ में पीसकर पेट पर लगाने से पीड़ा
को नष्ट करता है ।
बीसवां योग- कुष्ठं शताह्वां सवचां यवानां चूर्णं सतैलाम्लमुशन्ति वाते ॥ २० ॥
कुष्ठ ( कूट ), शताह्ना ( सौंफ ), वचा (बच), जी के आटे की तिल के तैल और अम्ल ( कांजी ) में मिलाकर लगाने से वातविकार नष्ट होते हैं ॥ २०॥
इक्कीसवां योग- उभे शताह्ने मधुकं मधूकं बलां प्रियालं च कशेरुकं च ।
घृतं विदारींच सितोपलां च कुर्यात्प्रदेहं पवने सरते ॥ २१॥
सौंफ और सोया, मधुक ( मुलैठी ), मधूक महुवा ) वटा ( खरैंटी ), प्रियाल ( प्याल, पकने पर यह काला फल होता है, जिसमें से चिरौंजी निकलती है ), कशेरू, घृत ( गाय का ) विदारी कन्द, सितोपला ( मिश्री, खड़ी शक्कर ), इनका पानी के साथ लेप वातरक्त रोग में लाभदायक है ॥ २१ ॥
बाईसवां योग- रान गुडूचीं मधुकं बले द्वं सजीवकं सर्वभकं पयश्च ।
घृतं च सिद्धं मधुशेषयुक्तं रक्तानिलातिं प्रणुदेत्प्रदेहः ॥२२॥
रास्ना, गुडूची ( गिलाय ), मधुक ( मुलहठी ), दोनों प्रकार की बलाएं ( खरैंटी और अतिबला - सफेद और पीले फूल की खरैटी ), जोक्क, ऋषभक, गाय का दूध; गाय का घी, मधुशेष ( मोम ) इनसे सिद्ध घी रूप लेप बातरक्त
रोग को नष्ट करता है । इस योग से घृत सिद्ध किया जाता है १" ॥ २२ ॥
१. रास्ना से लेकर ऋषभक तक सब ओषधियों का कल्क बनाना चाहिये । यह कल्क घी, स्नेह से चतुर्थांश होना चाहिये । और दूध बी स्नेह से दूना होना चाहिये । इससे घी सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध होने पर वस्न में से छान कर उष्णावस्था में ही इसमें मोम मिला देनी चाहिये । मोम की मात्रा स्नेह से चतुर्थाश अर्थात् कल्क के बराबर होनी चाहिये ।