चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 421–430

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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०३० ] सूत्रस्थानम् ४०३

द्विषणीयं त्रिममयमूरुस्तभिकमेव च ।

वातरोगे बातरके योनिव्यापदि चैव यत् ॥ ६० ॥

त्रिंशचिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पान् परं शृणु । अभयामलकीय, प्राणकामीय, करप्रचितीय, आयुर्वेदसमुत्थानीय, संयोग- घरमूलीय, आसिक्तक्षीरीय, माषपर्ण, पुमाञ्जातबलादिक इन मिस्र २ आठ प्रकरणों के दो अध्याय हैं । इनमें पहिले चार प्रकरणों में रसायनाध्याय और दूसरे चार में वाजीकरणाध्याय कहा है । इसके पीछे ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्त- चिकित्सा, गुल्म-चिकित्सा, प्रमेह-चिकित्सा कुष्ठ, शोष, उन्माद, अपस्मार, उरःक्षत, शोफ, उदर, अर्श, ग्रहणी, पाण्डुरोग, श्वास, कास, अतीसार, छर्दि, सर्प, तृष्णा, विषरोग, मध्यरोग, द्वित्रणीय, त्रिमर्मीय, ऊरुस्तम्भ, वातव्याधि, बात- रक्त इस प्रकार से कुल मिलाकर चिकित्सा स्थान में तीस अध्याय हैं ॥ ५५-६० ॥ फलजीमूतकेक्ष्वाकु कल्पो धामार्गत्रस्य च ॥ ६१ ॥

पचमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने ।

श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गले ॥ ६२ ॥

तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्ताशङ्खिनीषु च ।

दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ ६३ ॥

मदनफलकल्प जीमूतकल्प, ईक्ष्वाकुकल्प, धामार्गवकल्प, वत्सक- कल्प, कृतवेधनकल्प, श्यामात्रिवृत्कल्प, महावृक्षकल्प, सप्तलाशंखिनीकल्प, और दन्ती-द्रवन्तीकल्प ये बारह अध्याय कल्पस्थान में हैं ॥ ६१-६३ ॥

कल्पना पचकर्माख्या बस्तिमूत्रा तथैव च ।

स्नेहव्यापदिकी सिद्धिनेत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६४ ॥

सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्धिस्तथैव च ।

प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्बस्त्याश्रया च या ॥ ६५ ॥

फळमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता ।

सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्नं चासु समाप्यते ॥ ६६ ॥।

सिद्धिस्थान, कल्पसिद्धि, पंचकमय सिद्धि, बस्तिसूत्रीय सिद्धि, स्नेहव्याप दिक सिद्धि, नेत्रव्यापदिक सिद्धि, वमन विरेचन-ध्यापसिद्धि, बस्तिव्यापदिक सिद्धि, प्रसृतयोगिकसिद्धि, त्रिममय सिद्धि, बस्ति सिद्धि, फळमात्र सिद्धि, और उत्तर सिद्धिये बारह अध्याय सिद्धि स्थान में हैं । इस प्रकार से यह अन्थ समाप्त होता है ॥ ६४-६६ ॥

स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चान्यायार्थः प्रवक्ष्यते ।

तं ब्रूयात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 422

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४०४ चरकसंहिता [अ० ३० प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषयों का निरूपण संग्रह रूप से प्रत्येक अध्याय के अन्त में दे दिया है और जो मुख्य विषय आया है, उसको स्थान २ पर संक्षिप्त रूप से फिर कह दिया है । इसलिये एक अध्याय का वर्णन जो यत्र तत्र आया है, वह सब वर्णन उसी एक अध्याय का समझना चाहिये ॥ ६७ ॥

पृच्छा तन्त्राद्यथान्नायं विधिना प्रश्न उच्यते ।

प्रश्नार्थे युक्तिमांस्तत्र तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६८ ॥

निरुक्तं तन्त्रणात्तन्त्रं स्थानमर्थप्रतिष्ठया ।

अधिकृत्यार्थमध्यायनामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६६ ॥

इति सर्व यथाप्रभमष्टकं संप्रकाशितम् ।

कात्स्न्र्त्स्न्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७० ॥

ग्रन्थ के प्रारम्भ करने में सामान्य विशेष रूप से अथवा पूर्वापरविरोध से रहित जो विचार करना है उसका नाम 'प्रश्न ' और विचार पूर्वक किये हुए प्रश्न का शास्त्र के आधार से युक्तिपूर्वक जो निर्णय है उसका नाम ' प्रश्नार्थ' है । जिसमें अनेक विषय एक साथ में एकत्र किये गये हों उसका नाम ' तन्त्र' है । तन्त्र अर्थात् शास्त्र में मुख्य मुख्य विषयों में से एक एक भाग को जो पृथक् पृथक् लेकर प्रतिपादन किया है उसका नाम ' अध्याय' है ( जैसे-दीर्घ- जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय- इत्यादि प्रत्येक विषय के अनुक्रम में निर्दिष्ट भाग का नाम अध्याय है ) । इस प्रकार तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानार्थ आदि जो आठ प्रश्न किये उनका उत्तर दे दिया है । यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का संक्षेप है ॥ ६८-७० ॥

सन्दिपालविकोत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये ।

वर्तकानामिवोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७१ ॥

तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् ।

परावरपरीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७२ ॥

शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः ।

भ्रमन्त्यल्पबलास्तन्त्रे ज्याशब्देनैव वर्तकाः ॥ ७३ ॥

पशुः पशूनां दौर्बल्यात्कञ्चिन्मध्ये वृकायते ।

ससस्त्वं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७४ ॥

तद्वदज्ञो ऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः ।

स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७५ ॥

बभ्रुर्मू इषोर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः ।

किं व वक्ष्यति संजल्पे कुण्डभेदी जडो यथा ॥ ७६ ॥

पृष्ठ 423

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२०३० ] सूत्रस्थानम् ४०१ कुछ ऐसे भी मनुष्य हैं जो शास्त्र के थोड़े से भाग को पढ़कर विको उत्पन्न करते हैं । सहसा उड़कर जिस प्रकार बटेर पक्षी उत्पात करने लगते हैं, उसी प्रकार अपठित वैद्य भी उत्पात किया करते हैं । इसलिये प्रथम जप ( बाद -विवाद में) तन्त्र, तन्त्रार्य आदि आठ प्रश्नों को पूछना चाहिये । अपने से श्रेष्ठ या हीन की परीक्षा करने के लिये यही आठ प्रश्न असली शास्त्र को जानने वालों के बल हैं । थोड़े बल बाले, जिन्होंने शास्त्र का कुछ थोड़ा सा भाग ही देखा होता है वे इन प्रश्नों से इस प्रकार से भाग खड़े होते हैं जिस प्रकार धनुष की डोरी की टंकार से बटेरें भाग जाते हैं । जैसे कोई पशु निर्बल पशुओं में अपने को मेड़िया मानकर बोलने लगता है, परन्तु जब कोई बलवान् पशु सामने आ जाता है, तब वह पुनः अपने असली रूप में आजाता है, वह जो होता है । वही बन जाता है । इसी प्रकार अपने मुख से प्रशंसा करने वाला मूर्ख मूर्खो में बैठकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगता है, परन्तु जब कोई पण्डित विद्वान् सामने आखड़ा होता है, तब यह अबुद्धि मूद, अबहुश्रुत, कुण्डभेदी ( दुष्ट- भ्रष्टयोनि ), जद मूर्ख, वाद प्रतिवाद में क्या कहेगा १ कुछ भी नहीं । जिस प्रकार मकड़ी के जाल में फंसा कीड़ा कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार यह मूढ़ भी विद्वान् के सामने कुछ नहीं कर सकता ॥ ७१-७७ ॥

सद्वृत्तन विगृह्णीयाद्भिषगल्प श्रुतैरपि ।

हन्यात्प्रश्नाष्टकेनादावितरस्त्विात्ममानिनः ॥ ७७ ॥

दम्भिनो मुखरा यज्ञाः प्रभूताबद्धभाषिणः ।

प्रायः प्रायेण सुमुखाः सन्तो युक्ताल्पभाषिणः ॥ ७८ ॥ ।

तत्त्वज्ञानप्रकाशार्थमहङ्कारमनाश्रिताः । परन्तु जो निरभिमानी सच्च वैद्य हो वे यदि थोड़े भी पढ़े लिखे हों तो भी उनके साथ शिष्टाचार, सम्मानपूर्वक बरतना चाहिये और जो आत्माभि-मानी हों उनको इन आठ प्रश्नों से परास्त करना चाहिये । ऐसे पुरुष प्रायः दम्भी, अपनी मुख से अपनी श्लाघा करने वाले, मूर्ख, बहुत एवं असम्बद प्रसंगरहित बोकने वाले होते हैं और जो अच्छे विद्वान होते हैं वे थोड़ा और

उचित प्रसंग में ही बोलते हैं, वे तत्वज्ञान का प्रकाश करने के लिये बोलते हैं ।

और अहंकार का आश्रय नहीं लेते हैं । ७७-७८ ॥

स्वल्पाधाराज्ञमुखरान्मर्षयेन विवादिनः ॥ ७९ ॥

परौ भूतेष्वनुक्रोशस्तवज्ञाने परा दया ।

येषां तेषामसद्वादनिमहे निरता मतिः ॥ ८० ॥

पृष्ठ 424

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४०६ चरकसंहिता [अ० ३० परन्तु जो अपने तस्वज्ञान को दिखाने के लिये अहंकार के कारण आये हों, जो थोड़े पढ़े हो, उन मूर्ख आत्मप्रशंसकों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । जिनकी प्राणीमात्र पर कृपा और तस्वशान में दया है उनकी असत्- बाद के रोकने में सदा मति रहती है । क्योंकि इस प्रकार न करने से असद् वैद्यों को उत्तेजन मिलकर संसार का अपकार होता है । इसलिये इनको निग्रह करने में सदा तत्पर रहना चाहिये ॥ ७६–८० ॥

असत्पक्षाक्षणित्वातिदम्भपारुष्यसाधनाः ।

भवन्त्यनाप्ताः स्वे तन्त्रे प्रायः परविकत्थकाः ॥ ८१ ॥

तान् कालपाशसदृशान्वर्जयेच्छास्त्रदूषकान् ।

प्रशम-ज्ञान-विज्ञान- पूर्णाः सेव्या भिषक्तमाः ॥ ८२ ॥

खोटे ( असत्) पक्ष को लेकर विवाद करना, मुझको समय नहीं है, फिर पूछना ऐसा बहाना करने वाले, पूछने पर शिर दुखता है, दाम्भिक, पूछने पर गुस्से या जोर से उत्तर दे और दूसरों को व्यर्थ निन्दा करने वाले अपने तन्त्र में अनभिज्ञ होते हैं । इस प्रकार के शास्त्र को बदनाम करने वालों को मृत्यु के फांसों के समान दूर से ही छोड़ देना चाहिये । जो शान्त, ज्ञान- विज्ञान से परिपूर्ण हों ऐसे उत्तम वैद्यों की सेवा करनी चाहिये ॥ ८१-८२ ॥

समयं दुःखमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम् ।

सुखं समग्र विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम् ॥ ८३ ॥

इदमेवमुदारार्थमज्ञानार्थप्रकाशकम् । शास्त्र' दृष्टिप्रनष्टानां यथैवाऽऽदित्यमण्डलम् ॥ ८४ ॥ इति ।

सब प्रकार के दुःखों का कारण शारीरिक और मानसिक ज्ञान का अभाव है । शरीर और मन सम्बन्धी ज्ञान न होने से सब रोग होते हैं । इन दोनों के विशुद्ध ज्ञान से सम्पूर्ण सुख- आरोग्य मिलता है । यह शास्त्र अति गम्भीर, दोनों लोकों में हितकारी अर्थ को बतलाता है, तथा अज्ञात वस्तु को प्रकाशित करता है, परन्तु जिस प्रकार नेत्रहीन पुरुष चमकते हुए सूर्य का कुछ भी उपयोग नहीं कर सकता, इसी प्रकार शास्त्रहीन व्यक्तियों के लिये यह कुछ काम नहीं दे सकता ॥ ८३-८४ ॥

तत्र श्लोकाः- अर्थे दश महामूला: संज्ञा चैषां यथा कृता ।

अयनान्ताः षडमथाश्च रूपं वेदविदां च यत् ॥ ८५ ॥

सप्तकवाष्टकश्चैव परिप्रश्नः सनिर्णयः ।

यथा वाच्यं यदर्थं च यद्विवाचैकदेशिकाः ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 425

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० ३० ] सूत्रस्थानम् II

अर्थे दशमहामूळे सर्वमेतत्प्रकाशितम् ।

संग्रहवायमध्यायतन्त्रस्यास्यैव केवलः ॥ ८७ ॥

यथा सुमनसां सूत्रं संप्रहार्थं विधीयते ।

संग्रहार्थ तथाऽर्थानामृषिणा संग्रहः कृतः ॥ ८८ ॥

हृदय से सम्बन्धित दस धमनियां, 'महामूला' इस संज्ञा होने के कारण, आयुवर्द्धक, छः उत्तम उपाय, आयुर्वेद का स्वरूप, सात व आठ प्रश्न विशेष, वाक्यांश, अर्थाश, निर्णय और अधूरे वैद्य, इतने विषयों का निरूपण इस ' अर्थे दशमहामूलीय' अध्याय में किया है । इस ग्रन्थ में वर्णित सब विषयों का संक्षिप्त निरूपण भी इस अध्याय में किया है । जिस प्रकार कि फूलों की माका को गूंथने के लिये सूत्र की आवश्यकता संग्रह करने के लिये ऋषि ने यह सूत्र ( सूत्रस्थानहोती है )उसीबनायाप्रकारहै ॥ सब८५विषयों ॥का इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अर्थे दशमहामूलीयो नाम त्रिंशसमोऽध्यायः ॥ ३० ॥

अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इयताऽवधिना सर्वे सूत्रस्थानं समाप्यते ॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ।

पृष्ठ 426

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निदानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो ज्वरनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके आगे ज्वरनिदान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ इह खलु हेतुर्निमित्तमायतनं मित्यनर्थान्तरम् । तत्त्रिविधं -कर्ताअसाम्येन्द्रियार्थसंयोगःकारणं प्रत्ययः समुत्थानं, प्रज्ञापराधःनिदान-परिणामश्चेति ॥ ३ ॥

निदान के पर्याय—इस निदान स्थान में हेतु निमित्त, आयतन, कर्ता कारण, प्रत्यय, समुत्थान ये निदान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं । निदान अर्थात् रोगों को उत्पत्ति का कारण तीन प्रकार का है, १. असाम्येन्द्रियार्थ- संयोग, २. प्रज्ञापराध ( बुद्धि का दोष ) और ३. परिणाम ( काल ) ॥ ३ ॥

अतस्त्रिविधिविकल्प्पा व्याधयः प्रादुर्भवन्त्याग्नेय-सौम्य-वायव्याः । द्विविधाश्चापरे राजसास्तामसाच । तत्र व्याधिरामयो गढ़ आतको यक्ष्मा ज्वरो विकारो रोग इत्यनर्थान्तरम् ॥ ४ ॥

इसलिये रोग भी तीन प्रकार के ही होते हैं । १. आग्नेय ( पित्तजन्य ) २. सौम्य ( कफजन्य ), और ३. वायव्य ( वायुजन्य ) । ये शारीरिक रोय के

१. जिससे रोग जाना जाय उसका नाम 'निदान' है ।

' निश्चित्य दीयते प्रतिपाद्यते व्याधिरनेनेति निदानम्' ॥ जैलट ॥

२. संक्षेप में लिंग को निर्देश करने वाला सूत्रस्थान कहने के पश्चात् हेतु और लिंग को बताने वाला 'निदानस्थान ' कहते हैं । क्योंकि हेतु और किंग को जानकर की हुई चिकित्सा फलवती होती है । हेतु सन्निकृष्ट विप्रकृष्ट, व्यभिचार और प्रधान मेद से चार प्रकार का है । विस्तार के लिये मधुको देखिये |

पृष्ठ 427

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० १ ] निदानस्थानम् ४०६ मेद हैं । मानसिक रोग भी दो प्रकार के हैं । १. राजस ( रजोगुण से उत्पन्न हुए ), और २. तामस, ( तमोगुण से उत्पन्न हुए ) । रोग के पर्य्याय -– व्याधि, आमय, गद, आतंक, यक्ष्मा, ज्वर, विकार और रोग ये सब शब्द एक ही अर्थ ( रोग ) को कहते हैं ॥ ४ ॥

तस्योपलब्धिर्निदान- पूर्वरूप-लिङ्गोपशय -संप्राप्तितः ॥ ५॥

निदान पंचक अर्थात्रोगज्ञान के पांच उपाय - १. निदान २. पूर्वरूप, १. लिंग ( रूप ), ४. उपशय और ५. सम्प्राप्ति, इन पांच उपायों से रोग पहिचाना जाता है ॥ ५ ॥

तत्र निदानं कारणमित्युक्तमत्रे पूर्वरूपं प्रागुत्पत्तिलक्षणं व्यावेः । रोगों के कारण को निदान कहते हैं, यह पहिले कह चुके हैं । रोग के उत्पन्न होने से पूर्व जो लक्षण उत्पन्न होते हैं, उनको 'पूर्वरूप' कहते हैं । (जैसे भाई का आना, अंगों का टूटना, शिर का दुखना आदि ये ज्वर के पूर्वरूप हैं । ) रोग के आगे चलनेवाले लक्षण पूर्वरूप हैं । जैसे राजा के आने की सूचना राजा के आगे चलने वाले लोगों से मिल जाती है । प्रादुर्भूतलक्षणं पुनर्लिङ्गं तत्र लिङ्गमाकृतिर्लक्षणं चिह्नं संस्थानं व्यन्जनं रूपमित्यनर्थान्तरमस्मिन्नर्थे । रोग के उत्पन्न होने पर जो लक्षण स्पष्ट होते हैं, जिन लक्षणों से रोग का भान होने लगता है, उनको लिंग कहते हैं । इसके लिंग, आकृति, लक्षण, चिह्न, संस्थान, व्यज्जन और रूप ये सब पर्यायवाची हैं । उपशयः पुनर्हेतुव्याधिविपरीतानां विपरीतार्थ कारिणां चौषधा-हारविहाराणामुपयोगः सुखानुबन्धः । उपाय - हेतुविपरीत, व्याधि -विपरीत और विपरीतार्यकारी, औषध, आहार और विहार का सुखोत्पत्ति के लिये सेवन करना 'उपशय' ' है । १. उपशय द्वारा गूढ़ लिंगों, चिह्नों वाली व्याधि की परीक्षा की जाती है । जैसे ' मलेरिया ' और ' काळाज़ार' रोग में । इनमें मलेरिया कुनीन से चला जाता है, परन्तु कालाज़ार नहीं जाता । इसका विवरण नीचे लिखे प्रकार से जानें । औषध -जैसे शीत कफ ज्वर में सोंठ अन्न-जैसे भ्रम- यातजन्य स्वर में मांस रस और चावल । हेतुविपरीत बिहार - जैसे दिन में सोने से उत्पन्न कफ ज्वर में रात को जागना ।

पृष्ठ 428

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४१० [अ०१ संप्राप्तिर्जातिरागतिरित्यनर्थान्तरं ध्यायेः । सा संख्याश्रायान्य -विधि- विकल्प-बल-काल-विशेषैभिद्यते । संख्या तावद्यथा- मष्टौ ज्वराः, पन गुरुमाः, सप्त कुष्ठाम्येवमादिः । प्राधान्यं पुनर्दोषाणां खरतमाध्यां योगेनोप- लभ्यते । तत्र द्वयोस्वरत्रिषु तम इति । विधिर्नाम द्विविधा व्याधयो निजागन्तुभेदेन, त्रिविधात्रिदोषभेदेन, चतुर्विधाः साध्यासाध्य -मृदुदा कालविशेषःरुण-भेदेन । समवेतानांपुनर्व्याधीनासृत्वहोरात्राऽऽहारपुनर्दोषाणामंशांश -बल-विकल्पोऽस्मिन्नर्थे- काल -विधि -विनियतो। बल- भवति । तस्माद् व्याधीन् भिषगनुपहतसत्त्वबुद्धिर्हेत्वादिभिर्भावैर्यथा- वदनुबुध्येत ॥ ६ ॥

इत्यर्थसंग्रहो निदानस्थानस्योद्दिष्टो भवति, तं विस्तरेण भूयस्तरम- तोऽनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥

व्याधि की सम्प्राप्ति, जाति और भगति ये तीनों शब्द एक ही अर्थ के औषध -जैसे अतिसार में पाठा स्तम्भन । अन्न-जैसे अतिसार में मसूर । व्याधिविपरीत बिहार-जैसे उदावर्त्त में प्रवाहण । औषध -जैसे वातजन्य शोथ में दशमूल । हेतु- व्याधिविपरीत अन्न-जैसे शीत ज्वर में ज्वरनाशक यवागू । बिहार -जैसे दिन में सोने से उत्पन्न तन्द्रा में रात्रिजागरण । औषध -जैसे पिचजन्य शोध में गरम उपनाह ( पुकटिस ) हेतु: अन्न-जैसे पित्तजन्य शोध में विदाही अन्न । विपरीतार्थकारी बिहार -जैसे बावोन्माद में भय बतलाना । औषध -जैसे छर्दि में मैनफल से वमन कराना । व्याधि- अन्न- जैसे अतिसार में दूध से विरेचन । विपरीतार्थकारी बिहार -जैसे छर्दि में प्रवाहण । औषध जैसे अग्नि से जलने पर अगरका छेप । हेतु- व्याधि-विपरीतार्थकारी अन्न-जैसे मदात्यय रोग में मद्यपान । बिहार - जैसे श्रमजनित मूढबात में पानी में तैरना ।

पृष्ठ 429

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STOR ] गम् वाचकहैं । यह सव्याति १. संख्या, २. प्राधान्य ५. बकाल मेद से पांच प्रकार की है । ( १) संख्यासम्प्राप्ति - प्रत्येक रोग के मेदों की गणना का नाम संचा संप्राप्ति है । जैसे आठ प्रकार के अवर, पांच प्रकार के गुल्म, साथ प्रकार के कुष्ठ इत्यादि । (२ ) प्राधान्य-सम्प्राप्ति दोषों के अधिकतर व अधिकतम ( तारतम्य ) से रोगों की प्रधानता व अप्रधानता होती है । ( वृद्ध पित्त, वृद्धतर बायु और वृद्ध- तम कफ, यह एक प्रकार का सन्निपात है ) दो दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो अधिकतर, तीन दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो 'अधिकतम' समझना चाहिये । २ ( ३ ) विधि- सम्प्राप्ति -व्याधि भेद से विधिरूप सम्प्राप्ति होती है । निज अर्थात् शारीरिक और आगन्तुज भेद से व्याधि दो प्रकार का है । बात आदि दोष मेद से तीन प्रकार का, और साध्य, असाध्य, मृदु और दारुण मेद से चार प्रकार का है । ( ४) विकल्प संप्राप्ति -जिस समय वात आदि दोष दो या तीन मिळते हैं, उस समय अंशांश बल की कल्पना ( विवेचना ) को विकल्प सम्प्राप्ति कहते हैं । यथा- वायु के प्रकुपित होने पर भी कभी तो वात का शीत अंश बलवान् होता है, कभी लघु अंश और कभी रूक्ष अंश एवं कभी लघु और रूक्ष दोनों अंश बलवान् होते हैं । ( ५ ) बलका सम्प्राप्ति -–ऋतु, दिन, रात, आहार और काल भेद से रोग के बलकाल में अन्तर पढ़ जाता है । जैसे ऋतु और करुश्वर का वसन्त, अहोरात्र कफज्वर का पूर्वाह्न और प्रदोष, आहार- कफज्वर का भुक्तमात्रकाळ । स्वस्थचित्त एवं बुद्धिमान् वैद्य ( धैर्य एवं शान्ति तथा बुद्धि से ) हेतु पूर्वरूप आदि से रोगों की यथार्थ परीक्षा करे । यह निदानस्थान का संक्षेप में वर्णन कर दिया, अब इसी का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥६-७ ॥ तत्र प्रथमत एव तावदाद्याँलोभाभिद्रोह कोप-प्रभवानष्टौ व्याधी-निदानपूर्वेण क्रमेणानुव्याख्यास्यामः तथा सूत्रसंग्रहमात्र चिकि १. कुछ लोग रोगोत्पति के अन्तिम कारण से उत्पन्न कर्म को सम्प्राप्ति कहते हैं । यथा -'स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयम्' यहां से लेकर 'तदा स्वर-ममिनिर्वर्तयति' तक ज्वर की सम्माति कही है । २. माधव -निदान में स्वतन्त्रता और परतन्त्रता को लक्ष्य में रखकर रो की प्रधानता या अप्रधानता की परीक्षा की है ।

पृष्ठ 430

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४१२ चरकसंहिता [अ० १ त्वायाः । चिकित्सितेषु चोत्तरकालं तथोद्दिष्टं यथोपचितविकाराननुल्या- ख्यास्यामः ||८|| इनमें प्रथम निदान क्रम से छोभ, अभिद्रोह, कोप आदि से उत्पन्न आठ रोगों का वर्णन निदान स्थान में करेंगे, इसके पीछे संक्षेप से चिकित्सासूत्र कहेंगे । इसके अनन्तर सब रोगों का सविस्तर वर्णन चिकित्सास्थान में किया जायगा ॥ ८ ॥

इह तु व्वर एवाौ विकाराणामुपदिश्यते, तत्प्रथमत्वाच्छारी- राणाम् । अथ खल्वष्टाभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणाम् । तद्यथा वातात् पित्तात् कफात् वातपित्ताभ्यां वातकफाभ्यां पित्तश्लेष्मभ्यां वात- पित्तश्लेष्मभ्यः, आगन्तोरष्टमात्कारणात् । तस्य निदान-पूर्वरूप- लिङ्गो-पशय -संप्राप्ति-विशेषानुपदेक्ष्यामः ॥ ६ ॥

ज्वर निदान - सब रोगों में प्रथम ज्वर का ही वर्णन करते हैं । क्योंकि शारीरिक रोगों में सब से मुख्य ज्वर है । मनुष्यों को ज्वर आठ कारणों से होता है । १. वात से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. वात-पित्त से, ५. पित्त-कफ से, ६. वात- कफ से, ७. वात-कफ और पित्त ( सन्निपात ) से और ८. आगन्तुज कारण से । अब ज्वर के निदान, पूर्वरूप, लिंग, उपचय और सम्प्राप्ति का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥ e ॥ तद्यथा--रूक्ष-लघु-शीत -व्यायाम -वमन विरेचनाऽऽस्थापन-शिरोविरे- चनावियोग-वेगसंधारणानशनाभिघात व्यवायोद्वेग- शोक -शोणिताभिषेक-जागरण-विषम- शरीर -न्यासेभ्योऽतिसेवितेभ्यो वायुः प्रकोपमापद्यते । वात प्रकोप के कारण -रूक्ष, लघु, शीत, व्यायाम, वमन, विरेचन, आस्थापन इनके अतियोग से, मल-मूत्र आदि के उपस्थित वेग को रोकने से, उपवास से, चोट लगने से, स्त्रीसंग, उद्वेग, शोक, और रक्त के अधिक निकलने से, रात्रि जागरण से, विषम रीति से शरीर के अवयवों को रखने से, इन कारणों के अतिसेवन से वायु प्रकुपित होती है । स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणः स्थानमूष्मणा सह मिश्री- भूतraffeआद्यमाहारपरिणामधातुंपिधायाग्निमुपहत्यरसनामानमन्ववेत्यपक्तिस्थानादूष्माणं रसस्वेदवहानिबहिर्निरस्य केवलंप शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति । तत्येमानि विज्ञानि भवन्ति ॥