चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 431–440

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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अ० १ ] निदानस्थानम् ४१३ सम्प्राप्ति -उपरोक्त कारणों से कुपित हुवा वायु उष्णिमा के स्थान आमा-शय में पहुंच जाता है । वहां उष्णिमा के साथ मिलता है । फिर अर्थ के पाचन से उत्पन्न 'रस' नाम के धातु का आश्रय लेता है । इस धातु का आभय लेकर वायु रसवह और स्वेद वह स्रोतों को बन्द कर देता है, जठराग्नि को मन्द कर देता है और आमाशय से पाचकाभि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर में फैला देता है, इस लिये ज्वर उत्पन्न होता है । इस वातज्वर के निम्न लिखित लक्षण होते हैं ॥ तद्यथा- विषमारम्भविसर्गित्वम्, ऊष्मणो वैषम्यं, तीव्रतनुभावान- स्थानानि ज्वरस्य, जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते धर्मान्ते वा ज्वराभ्या-गमनमभिवृद्धिर्वा ज्वरस्य । विशेषेण परुषारुणवर्णत्वं नख -नयन -वदन-मूत्रपुरीष-स्वचामत्यर्थं क्लृप्तीभावश्च, अनेकविधोपमाश्चलाचलाच वेदना-स्वषां तेषामङ्गावयवानां तद्यथा-पादयोः सुप्तता, पिण्डिकयो रुद्वेष्टनं, जानुनोः केवलानां च सन्धीनां विश्लेषणमूर्वोः सादः, कटि-पार्श्व-पृष्ठ -स्कन्ध-बाह्वंसोरसां च भग्न- रुग्ण मृदित- मथित चटितावपीडितावनुन्नत्वमिव, इन्वोश्चाप्रसिद्धिः स्वनश्च कर्णयोः, शङ्खयोर्निस्तोदः, कषायास्यताऽऽस्य-वैरस्यं वा, मुख-तालु-कण्ठ-शोषः, पिपासा, हृदयग्रहः, शुष्कच्छर्दिः, शुष्ककासः, क्षवथूद्गारविनिग्रहोऽन्नरसखेदः, प्रसेकारोचकाविपाकाः, विषाद-विजृम्भा-विनाम-वेपथु - श्रम-भ्रम प्रलाप-जागरण-रोमहर्ष - दन्तह-र्षास्तथेोष्णाभिप्रायता, निदानोकानामनुपशयो विपरीतोपशयश्चेति बात-ज्वरस्य लिङ्गानि स्युः ॥ १० ॥

बातम्बर के लक्षण -– जैसे ज्वर के चढ़ने या उतरने के समय का नियम न होना, शरीर में उष्णिमा का नियम न होना, स्वर की तीव्रता या कम होने की प्रतीति में अस्थिरता, अन्न के पचन होने के समय, सायंकाल में, अथवा वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में स्वर का आना, अथवा ज्वर में वृद्धि होना; विशेषतः नख, आंख, मूत्र, मल, और त्वचा का बहुत कठिन और काला-लाल रंग पड़ना, मलमूत्र का अवरोध, ( नख वचा आदि का फटना ), भिन्न-भिन्न अंगों में नाना प्रकार की चल और अचल ( गतिशील या स्थिर ) पीड़ाओं का होना । जैसे —दोनों पांवों में सो जाने की सी प्रतीति, पिण्डकियों में ऐंठन, घुटने एवं सम्पूर्ण सन्धियों में टूटने और गीले कपड़े से ढांपे होने की भांति की दर्द जंबाओं में शिथिलता; कमर, पार्श्व-पीठ - स्कन्ध-बाहु और छाती में टूटने के समान, फटने के समान, मर्दन करने के समान, चटकने के समान,

पृष्ठ 432

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४१४ करचसंहिता [अ० १ अवपीडन अर्थात् दबाने के समान और सूर्या चुभने के समान वेदनायें होती हैं । इनुग्रह ( जवाड़े का न खुलना ), कानों में आवाज़ ( कर्णनाद ) कान एवं शंख प्रदेश ( कनपढी ) में वेदना, मुख का कषाय स्वाद, मुख में विरसता, मुख, तालु, कण्ठ का पुनः २ सूखना; प्यास का अधिक लगना, दिल या छाती का जकड़ना, रुक जाना, सूखी उबकाई, वमन होने पर वमन में किसी पदार्थ का बाहर न निकलना, सूखी खांसी, छींक और डकार का बन्द हो जाना; सब अन्नरसों में अनिच्छा ( अथवा अन्न रस का वमन ); मुख से पानी का बहना; अरुचि, भोजन की अनिच्छा, अविपाक ( भोजन का न पचना ), विषाद, जम्भाईयां आना, अंगों का मुड़ना-तुड़ना, अंगड़ाई आना, कम्पन, प्रलाप, जागरण ( नींद का न आना ), रोमों का भर-भरा आना ( दान्तों का स्तब्ध हो जाना ) गरम वस्तुओं को चाह; एवं वातज्वर के निदा-नभूत वस्तुओं का सेवन अनुकूल न आना तथा निदान ( रूक्ष लघु, शीतादि गुणों ) के विपरीत गुणों वाले पदार्थों को अनुकूल आना ये सब वातजर के लक्षण हैं ॥ १० ॥

उष्णाम्ल लवण- क्षार कटुकाजीर्ण भोजनेभ्योऽतिसेवितेभ्यस्तथाऽति- तीक्ष्णातपानि सन्ताप-श्रम - क्रोध- विषमाहारेभ्यश्च पित्तं प्रकोपमापद्यते । पिच प्रकोप के कारण - उष्ण, खट्टा, नमकीन, क्षार, कटु और अजीर्ण- कारक पदार्थों के अतिसेवन से; तथा अतितीक्ष्ण, बहुत धूप, अभिसन्ताप, भ्रम, क्रोध, विषम भोजन के सेवन से पित्त प्रकुपित होता है । तद्यदा प्रकुपितमामाशयादूष्माणमुपसृज्याऽऽद्यमाहारपरिणामघातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्त्रोतांसि पिधाय द्रवत्वादमिमुप-हत्य पक्तिस्थानादूष्माणं चहिनिरस्य प्रपीडयत्केवलं शरीरमनुप्रपद्यते तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । पित्तज्वर की सम्प्राप्ति -यह प्रकुपित हुवा पित्त आमाशय में स्थित उष्णिमा से मिलकर, अन्न के पाचन से उत्पन्न प्रसाद नामक रस से मिलकर रसबद्द और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है और पित्त द्रव होने से अभिको मन्द करता है, इसलिये पक्काशय से उष्णिमा को बाहर निकाल देता है, तब पिच सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर शरीर को पीड़ित करता है । इस प्रकार से

ज्वर को उत्पन्न करता है । पित्त ज्वर के लक्षण ये होते हैं ॥

तद्यथा -युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिषुद्धिर्वा मुक्कस्य विवाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा बिशेषेण, कटुकाया

पृष्ठ 433

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अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५ wwwwww प्राण-मुख- कण्ठोष्ठ तालु -पाकः, उष्मा,तृष्णा, भ्रमः मदर, मच्छ पिच्छ दनमवीसारोऽमद्वेषः सदनं संस्वेदः, प्रलापः, रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः शरीरे, हरिवहारिद्रत्वं नख- नयन-मदन- मूत्रपुरीष स्वचामत्यर्थमूष्मणस्ती- भावोऽतिमात्रं दाहः, शीताभिप्रायता, निदानोकानामनुपशयो, विप- तोपशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ ११ ॥

पित्त-ज्वर के लक्षण - यथा -सम्पूर्ण शरीर में एक साथ ( सहसा ) ज्वर का चढ़ना, अथवा ज्वर का बढ़ना; भोजन के पचने के समय, मध्यान्ह में, आधी रात में, शरद् ऋतु में, विशेष करके ज्वर बढ़ता है; मुख में कड़वापन; नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ, तालु का पकना; गरमी, प्यास का लगना, भ्रम, मद, मूर्च्छा, पित्त का वमन, अतिसार, अन्न में अनिच्छा, पसीना आना, प्रकाप, शरीर पर लाल लाल धब्बे वा चझे, फुन्सियां निकलना, नख-आंख-मुख -मूत्र- मल-त्वचा इन का रंग हरा या हल्दी के समान हो जाना; गरमी बहुत बढ़ जाना, बहुत अधिक जलन होना, शीत वस्तुओं की चाह रहना और पिच ज्वर के कारण रूप पदार्थों का अनुकूल न आना एवं विपरीत गुण वाले पदार्थों- का अनुकूल आना ये पित्तज्वर के लक्षण हैं ॥ ११ ॥

स्निग्ध-गुरु- मधुर -पिछल- शीताम्ल लवण- दिवास्वप्न- हर्षाऽव्यायामे- भ्योऽतिसेवितेभ्यः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते । कफ प्रकोप के कारण -चिकास, मीठे, भारी, शोतल, पिच्छिल, खट्टे नमकीन पदार्थों के अतिसेवन से, दिन में सोने से, हर्ष वा आनन्द के अति सेवन तथा व्यायाम के न करने से कफ प्रकुपित होता है । स या प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाऽऽयमाहा- रपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाया-ग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनु- प्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । कफज्वर की सम्प्राप्ति – कुपित कफ आमाशय में जाकर उष्णिमा के साथ मिळकर, अन्न के परिणाम भूत रस नामक धातु से मिल कर, रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द करके अग्नि को मन्द कर देता है । पक्काशय से अि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है । इस प्रकार से कफ ज्वर को उत्पन्न करता है । कफ ज्वर के लक्षण ये होते हैं । तथा- युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिर्षा । मात्रे पूर्वा पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण गुरुगात्रत्वमनन्ना-

पृष्ठ 434

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४१६ [अ० १ मिळायः, लेष्मप्रसेको, मुखस्य च माधुर्य, उल्लासो, हृदयोपछेपस्ति- मितत्वं छर्विद्वग्निता, निद्राधिक्यं, स्तम्भस्तन्द्रा, श्वासा, कासा, प्रतिश्यायः,शैत्यं, चैत्यं च नख- नयन-वदन -सूत्र- पुरीष-स्वचामत्यर्थ, शीत- fussia भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोकानाम- नुपशयो विपरीतोपशयश्चेति श्लेष्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ १२ ॥

कफज्वर के लक्षण - यथा सम्पूर्ण शरीर में ज्वर एक साथ आता है, या बढ़ता है । भोजन करने के समय ( या खा चुकने पर ही ) पूर्वाह्न में, रात्रि के प्रथम भाग में, या वसन्त ऋतु में ज्वर का वेग बढ़ा होता है । शरीर में भारीपन, भोजन में अरुचि, मुख से लार बहना, मुख में मिठास, वमन की रुचि, बेचैनी, हृदय का रुकना, हृदय ( आमाशय ) प्रदेश पर कफ का लगा रहना, आलस्य ( तन्द्रा ), वमन, अभि का मन्द होना, नींद का अधिक आना, जड़ता सुस्ती, खांसी, श्वास, जुकाम, शीत लगना, नख, आंख, मुख, मूत्र, मल और त्वचा में सफेदी; शरीर पर बहुतसी पिडिकाओं, फुन्सियों का निकल आना, इन पिडकाओं का स्पर्श शीतल होता है । उष्ण पदार्थों की चाह रहती है, कफज्वर के कारण वाले पदार्थों का अनुकूल न आना और विपरीत

गुण वाले पदार्थों का अनुकूल आना होता है । ये कफज्वर के लक्षण हैं ॥ १२॥

विषमाशनादनशनादन्नपरिवर्त्तादृतुव्यापत्तेर सात्म्यगन्धोपप्राणाद् विषोपहतस्योदकस्य चोपयोगाद् गरेभ्यो गिरीणां चोपश्लेषात् स्नेह -स्वेद-वमन विरेचनाऽऽस्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगात् मि- ध्यासं सर्जनाद्वा स्त्रीणां च विषमप्रजननात् प्रजातानां च मिथ्योपचाराद्य-थोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथानिदानं द्वन्द्वानामन्यतमः सर्वे वा यो दोषा युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तयैवाऽऽनुपूर्व्या ज्वरम-भिनिर्वर्तयन्ति । तीन दोषों के प्रकोप के कारण ज्वर- विषम भोजन से, भोजन के न करने से, ऋतु के बदलने से, ऋतु के विकृत ( अतियोग, मिथ्यायोग ) होने से; प्रति-कूळ-गंधयुक्त पदार्थों के सूंघने से; विषयुक्त पानी के उपयोग से; संयोगजन्य विष के दोष से पर्वतों के पास में रहने से; स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुषासन, और शिरोविरेचन के अयोग्य प्रयोग से स्त्रियों के विषम प्रसब करने से; बालक की उत्पत्ति के पीछे मिथ्या परिचर्या से; और पूर्व कहे हुए वात, पित्त, कफ इन दोषों के परस्पर मिश्रण से दो दोष या तीनों दोष एक साथ प्रकुपित हो जाते हैं । औषधिको गन्ध से ज्वर होता है -यथा"-हाई फीवर" ।

पृष्ठ 435

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निदानस्थानम् २०.१ ] २७ तत्र पयोक्तानां म्रडिङ्गानां मिश्रीभावविशेषदर्शनादान् मम्यतमं वरं सान्निपातिकं वा विद्यात्॥ १३ ॥

संसर्गज व साक्षिपातिक ज्वर-इस प्रकार से दो दोष या तीन दोष साथ मिलकर अनुक्रम से -फफ बातज, कफ-पित्तज और कफ-वात-पित्तज स्वर को उत्पन्न करते हैं । इन्द्रज ज्वर में दो दोष कुपित होकर दोनों दोषों के लक्षण उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार तीनों दोषों से उत्पन्न ज्वर में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं । इन लक्षणों को देखकर दो या तीन दोषों से उत्पन्न ज्वरों को जाननाअभिघाताभिषङ्गाभिचाराभिशापेभ्यचाहिये ॥ १३ ॥ आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो - रोऽष्टमो भवति ।

आगन्तुज ज्वर - अभिघात ( चोट आदि के लगना ), अभिषंग ( काम आदि वेग ), अभिचार ( अथर्वमन्त्र आदि से वर पैदा करना ), अभिशाप ( गुरु, सिद्ध आदि पुरुषों का शाप ), इन मुख्य चार कारणों से व्यथापूर्वक आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होता है । ' यह ज्वर आठवां प्रकार का है । स किंचित्कालमागन्तुः केवलो भूत्वा पश्चाद् दोषैरनुत्रध्यते । सत्राभिघातजो वायुना दुष्टशोणिताधिष्ठानेन, अभिषङ्गजः पुनर्वाप चाभ्यां अभिचाराभिशापजौ तु सन्निपातेनानु त्रध्येते । स सप्तविधाव- राद्विशिष्टलिङ्गोपक्रमसमुत्थानत्वाद्विशिष्टो वेदितव्यः, कर्मणा साधारणेन चोपक्रम्यत इत्यष्टविधा ज्वरप्रकृतिरुक्ता ॥ १४ ॥

आगन्तुज ज्वर की सम्प्राप्ति -आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होकर कुछ काल ( सात दिन वा तीन दिन ) तक रहता है, फिर बात आदि दोष के साथ मिल जाता है । अभिघातज ज्वर में प्रथम चोट आदि से ज्वर उत्पन्न होता है, पीछे से दोष उत्पन्न होता है । इस उवर में वायु दूषित रक्त के साथ मिलकर इसका आश्रय करके रहता है । अभिषंगज ज्वर व्रात-पित्त का आश्रय करता है । अभिचार और अभिशाप से उत्पन्न ज्वर तीनों दोषों का आभय करके रहते हैं । आगन्तुज ज्वर के लक्षण, चिकित्सा और इसका निदान, दूसरे बात आदि दोषों से उत्पन्न सात प्रकार के ज्वर से सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं, अर्थात् देवव्यपाश्रय बलि मंगल आदि तथा युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा करनी चाहिये । इसका साधारण कर्म, सब प्रकार के ध्वरों में सामान्यतः एक ही १. 'व्यथापूर्व आगन्तुज ज्वर में व्यथा ही पूर्वरूप है । इन में प्रथम । म्बर होकर फिर दोषों का सम्बन्ध होता है ।

पृष्ठ 436

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चरकसंहिता [अ० १ प्रकार की चिकित्न की जाती है, क्योंकि उबर एक ही प्रकार का है । इस प्रकार से उबर के आठ प्रकार कह दिये हैं ॥ १४॥

ज्वरस्त्वेक एव संतापलक्षणः । तमेवाभिप्रायविशेषाद् द्विविधमा- चक्षते । निजामन्तुविशेषाच । तत्र निजं द्विविधं त्रिविधं चतुर्विध सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥

वर तो एक ही प्रकार का है । क्योंकि सब प्रकार के ज्वरों में 'सन्ताप' ( गरमी ) पाई जाती है । परन्तु अभिप्राय विशेष को लेकर इसके निज ( शारीरिक ) और आगन्तुज ये दो भेद लिये जाते हैं । इसमें निजम्बर को वातादि दोषों की विकल्पना से ( संसृष्ट और असंसृष्ट शीत या उष्णभेद से ) दो प्रकार का ( वात आदि दोष मेद से ) तीन प्रकार का, ( वात, पित्त, कफ और सनिपातज भेद से ) चार प्रकार का ( दोष जन्य, मिश्रण सन्निपात भेद से ) सात प्रकार का कहा जाता है ॥ १५॥

तस्येमानि पूर्वरूपाणि । तद्यथा- मुखवैरस्यं गुरुगात्रत्वमनन्ना- भिलाषश्चक्षुषोराकुलत्वम स्रागमनं निद्राया आधिक्यमर तिजम्मा विनामो वेपथुः श्रम- भ्रम -प्रलाप-जागरण लोमहर्ष- दन्तहर्षाः शब्द -शीत-वातातपा सहत्वासहत्वमरोचकाधिपाको दौर्बल्यमङ्गमर्दः सदनमल्पप्राणता- दीर्घ- सूत्रताss स्यमुचितस्य कर्मणो हानिः प्रतीपता स्वकार्येषु गुरूणां वाक्ये. ष्वभ्यसूया, बालेषु प्रद्वेषः, स्वधर्मेष्वचिन्ता माल्यानुलेपन-भोजन -परि-क्लेशनं मधुरेषु भक्ष्येषु प्रद्वेषोऽम्ललवणकटुकप्रियता चेति ज्वरपूर्व-रूपाणि भवन्ति प्राक्सन्तापात् अपि चैनं सन्तापार्श्वमनुवन्ति ॥ १६ ॥

इत्येतान्येकैकशो ज्वरलिङ्गानि व्याख्यातानि भवन्ति बिस्तरस- मासाभ्याम् । ज्वर के पूर्वरूप - उस ज्वर के पूर्वरूप ये हैं । जैसे-मुख में बिरसता, शरीर में भारीपन, भोजन में अनिच्छा, आंखों में बेचैनी, आंखों से आंसू बहना; नींद का अधिक आना, ' बेचैनी, जंभाई आना, शरीर का मुदना कम्पन, श्रम, भ्रम, प्रकाप, नींद का न आना, लोमहर्ष, शब्द, शीत, 3 वायु, धूप की कभी सहन करने की रुचि और कभी सहने में अरुचि का होना; भोजन में १. ' अस्यागमनम्' इति वा पाठः । अर्थात् आंखे लाल हो जाती हैं । २. 'विराम' इति पाठान्तरम् अर्थात् मन की उदासीनता । ३. धीत के स्थान पर ' गीत' पाठान्तर है, वहां गीत अर्थात् संगीत में अनिच्छा ।

पृष्ठ 437

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४१९ ]अ० १ निदानस्थानम अरुचि, विपाक, सुर्यकता, अंगों का टूटना, शक्ति का हो जाना; अल्प- प्राणता, दीर्घसूत्रता ( काम में आमस्य ), आरम्भ किये हुए कार्य में इच्छाका न होना, अपने किये हुए काम में प्रतिकूलता, गुरुचनों के वाक्यों में भा बालकों से द्वेष, अपने कर्तव्य में ( धर्मकार्य में ) बेपर्वाही; फूलों की मान्य चन्दन का लेपन, और भोजन में दुःख मानना; मधुर वस्तुओं से द्वेष, खट्टे- नमकीन कडुवे पदार्थों की चाह होना, ये ज्वर के पूर्व रूप हैं संताप से भी पूर्व, सन्तापयुक्त रोगी में प्रतीत होने लगते हैं । इस प्रकार से ज्वर के लक्षण अडग अलग विस्तार एवं संक्षेप में कह दिये हैं ॥ १६ ॥

ज्वरस्तु खलु महेश्वर- कोप-प्रभवः सर्वप्राणिनां प्राणहरो देहेन्द्रि यमनस्तापकरः प्रज्ञा-बल- वर्ण- हर्षोत्साह -सादनः ',श्रम-क्लम-मोहाहारोप-रोध-संजननो, ज्वरयति शरीराणि इति ज्वरः, नान्ये व्याधयस्तथा दारुणा बहूपद्रवा दुश्चिकित्स्याश्च यथाऽयमिति, स सर्वरोगाधिपति- नातिर्यग्योनिषु बहुविधैः शब्दैरभिधीयते सर्वप्राणभृतश्च सज्वरा एव जायन्ते सवरा एव म्रियन्ते स महामोह:, तेनाभिभूता देहिनः प्राग्दैहिकं कर्म किंचिदपि न स्मरन्ति, सर्वप्राणभृतां च ज्वर एवान्ते प्राणानादत्ते ॥ १७ ॥

ज्वर का परिणाम - पर महेश्वर के क्रोध से उत्पन्न हुआ है । यह ज्वर सब प्राणियों का प्राण लेने वाला, इन्द्रिय और मन को ताप ( दुःख ) देने वाला; बुद्धि, बल, कान्ति, हर्ष, उत्साह का नाश करने वाला, व्याधि, भ्रम, क्लान्ति, मोह और सुभानाथ को उत्पन्न करने वाला है । ज्वर शब्द की निरुक्ति-—ज्वर शरीरों को पीड़ित करता है, इसलिये इसको 'ज्वर' कहते हैं । इसके समान कठिन, बहुत उपद्रवयुक्त, चिकित्सा करने में दुःसाध्य और दूसरा रोग नहीं हैं । ज्वर ही सब रोग का अधिपति है । नाना-प्रकार के पशु पक्षियों में अनेक प्रकार के शब्दों से कहा जाता है । २ सब प्राणी वर के साथ उत्पन्न होते हैं और उमर के साथ ही मरते हैं । ज्वर महा-मोह स्वरूप है, इसलिये इस ज्वर से आक्रान्त होने से पूर्वजन्म ( पूर्व शरीर ) के किसी भी कर्म का स्मरण नहीं करता । यह ज्वर ही सब प्राणियों के प्राणों का हरण करता है || १७ || १. 'स्वाहास्करः' इति पाठः । २. यथा -हाथियों में होने वाले उधर को 'पाकल ', गायों में होने वाले ज्वर को 'खेरिक', मछलियों के ज्वर को 'इन्द्र-ब्लक', पक्षियों के ज्वर को ' भ्रामक' कहते हैं ।

पृष्ठ 438

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४२० चरकसंहिता [अ० १ तत्र पूर्वरूपदर्शने वरादौ वा हिर्त लध्वशनमतर्पणं वा वर स्वाऽऽमाशयसमुत्थत्वात् ततः कषायपानाभ्यङ्ग -स्वेद प्रदेह -परिषेकानुले-पन- वमन विरेचनाऽऽस्थापनानुवासनोपशमन -नस्तःकर्म -धूप धूमपाना- जन-क्षीरभोजन- विधानं च यथास्वं युक्त्या प्रयोज्यम् । ज्वर के चिकित्सा सूत्र - ज्वर के पूर्व रूप होने पर अथवा ज्वर के प्रारम्भ में ही हलका अन्न सेवन करना अथवा लंघन करना चाहिये । क्योंकि वर आमाशय से उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर कषाय ( काथ ) अभ्यंग, स्वेद प्रदेह ( लेप ), परिषेक, अनुलोमन ( बात को अनुकूल करने की क्रिया ), वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासनबस्ति, कर्म उपशमन, नस्यकर्म, धूपन, धूमपान, अंजन और दूध भोजन की कल्पना, यथायोग्य उपयोग करना चाहिये ॥ जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते, यथास्वौषधसिद्धस्य सपिहि स्नेहाद्वातं शमयति, संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च । तस्माज्जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिर्द्दित मुदकमिवाग्निमुष्टेषु द्रव्येष्विति १८ जीर्णश्वर में घृतपान - सब प्रकार के जीर्ण ज्वरों में घी का पान करना प्रशस्त है । इसके लिये योग्य रीति से ओषधियों द्वारा सिद्ध किया घी काम में काना चाहिये । चिकना होने से घो वायु का शमन करता है, भिन्न २ ओष-घियों के संस्कार से कफ को शीतलता से पित्त और उष्मा को शान्त करता है । इसलिये सब प्रकार के जीर्णज्वरों में घी ऐसा ही हितकारक होता है जिस प्रकार कि आग से जलते हुए पदार्थों के लिये पानी हितकारक है ॥ १८॥

भवन्ति चात्र - यथा प्रज्वलितं वेश्म परिषिञ्जन्ति वारिणा ।

राः शान्तिमभिप्रेत्य तथा जीर्णन्वरे घृतम् ॥ १६ ॥

स्नेहाद्वातं शमयति, शैत्यात्पित्तं नियच्छति ।

घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥ २० ॥

नान्यः स्नेहस्तथा कश्वित्संस्कारमनुवर्तते ।

यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेोत्तमं मतम् ॥ २१ ॥

संस्कारसिद्ध घृत -जिस प्रकार आग से जलते हुए घर को बुझाने के लिये मनुष्य पानी डाला करते हैं, उसी प्रकार जीर्णज्वर में घृत का उपयोग उत्तम है घी स्नेह गुण से वायु को, शीतगुण से पित्त को तथा जिस औषधि से सिद्ध किया जाता है उस ओषधि का गुण लेकर कफ को शान्त करता है । घृत की श्रेष्ठता - जिस प्रकार भी दूसरी दवाईयों के गुण अपने में ग्रहण

पृष्ठ 439

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अ० २ ] निदानस्थानम् ४२१ करके संस्कारयुक्त हो जाता है उस प्रकार और कोई अन्य स्नेह पदार्थों के गुण ग्रहण नहीं करता । इसलिये सब स्नेहों में घी ही श्रेष्ठ है ।११-२१॥

गद्योको यः पुनः लोकैरर्थः समनुगीयते ।

तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गते ॥ २२ ॥

जो अर्थ गद्यरूप में कहा गया है, उसी को श्लोक रूप में कहते हैं । इसमें पुनरुक्त दोष नहीं है । क्योंकि गद्य में कहे हुए विषय को ही पुनः और अधिक स्पष्ट और दृढ़ करने के लिये पद्य में कहा जाता है ॥ २२॥

तत्र लोका: - त्रिविधं नामपर्यायैर्हेतुं पञ्चविधं गदम् ।

गदलक्षणपर्यायान् व्याधेः पञ्चविधं ग्रहम् ॥ २३ ॥

वरमष्टविधं तस्य प्रकृष्टासन्नकारणम् ।

पूर्वरूपं च रूपं च भेषजं संग्रहेण च ॥ २४ ॥

व्याख्यातवान् ' ज्वरस्वामे निदाने विगतज्वरः ।

भगवानग्निवेशाय प्रणताय पुनर्वसुः ॥ २५ ॥

रोगों के तीन प्रकार के हेतु, पर्य्यायवाचक शब्द, पांच प्रकार के रोग, इनके लक्षण, पर्यायवाचक शब्द, रोगों के पांच प्रकारों का संग्रह, ज्वर के आठ मेद, इसके समीप एवं दूरवर्ती कारण, आर के पूर्वरूप, रूप और औषध का संक्षेप में वर्णन, ये सब विषय 'ज्वर-निदान ' नामक अध्याय में विनीत अभिवेश को भगवान् पुनर्वसु ने उपदेश किये । इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने ज्वरनिदानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः अथातो रक्तपित्त निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा ssह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब रक्तपित्त निदान का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ पित्तं यथा भूतं लोहितपित्तमिति संज्ञां लभते तथाऽनुव्याख्या-स्यामः । यदा जन्तुर्यबकोद्दालक कोरदूषक- प्रायाण्यन्नानि भुक्के शोषण- १. 'ब्याबहार' इति पाठः ।

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
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४२२ चरकसंहिता [अ०२ तीक्ष्णमपि चानजातं निष्पाव-माप-कुल -हार- स्पोपहितं दबि मण्डोवश्वित्कट्बराम्ल -काजिकोपसेकं बाराह माहिषाबिक मात्स्व-गव्य- पिशित -पिण्याक -पिण्डालु -शुष्क -शाकोपहितं मूलक-सर्पप-खशुन-करज- शि- मधुशि -खडयूष- भूस्तृण-सुमुख- सुरस- कुठेर गण्डीर कालमानक-- पर्णास- क्षवक- फणिज्जकोपदंशं सुरासौवीरक-तुषोदक -मैरेय-मेदक- मधूल- वाऽतिमात्रमतिवेलंक - शुक्त- कुवल -बदाम्लपयःप्रायानुपानं- पिवति पयसा वापिष्टान्नोत्तरभूयिष्ठमुष्णामितप्तोसमश्नाति रोहिणीकं काण- कपोतं वा सर्पपतैलक्षारसिद्धं कुलत्थ-पिण्याक -जाम्बव - कुच -पकैः शौक्तिकैर्वा सह क्षीरमाममतिमात्रमथवा पिवत्युष्णाभितप्तस्तस्यैवमा-चरतः पितं प्रकोपमापद्यते, लोहितं च स्वप्रमाणमतिवर्तते तस्मिन् प्रमाणातिप्रवृत्ते पितं प्रकुपितं शरीरमनुसर्पद्यदेव यकृत्सहप्रभवाणां लोहितवद्दानां स्रोतसां लोहिताभिष्यन्दगुरूणि मुखान्यासाद्य प्रति-रुन्ध्यात्तदैव लोहितं दूषयति ॥ ३ ॥

जिस प्रकार से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं । जब मनुष्य यबक ( ब्रीहि विशेष ), उद्दालक ( वनकोद्रव ) कोरदूष, इनमें मिले खान-पान के अति सेवन से, अथवा दूसरे कोई अति उष्ण या तीक्ष्ण गुण वाले अन्न के सेवन करने से, अथवा पूर, उड़द, कुलथी, दालें, क्षारयुक्त पदार्थों के सेवन से, दही, दधिमण्ड ( मस्तु ), उदश्वित् ( आधा जल मिश्रित तक ), कट्ब, ( बिना पानी का तक्र या खट्टी छाछ ), अम्लकांजी ( खट्टी कांजी ), सूअर, भैंस, मेद, मछली और गाय के मांस के सेवन से, पिण्याक ( फेणी ) पिण्डालु, कचालु शुष्क शाक ( सुखे शाक ) से युक्त अन्न पान के सेवन से, मूली, सरसों, लशुन, करल, सहजन, मधुशिम ( मीठा सहजन ), खडयूष ( कढी आदि ), भूस्तृण ( रोहिष तृण ), सुमुख, सुरस, कुठेर, गण्डीर, काखमानक, पर्णास, क्षवक और फणिजक ( सब तुलसी के भेद ) इनके सेवन से, सुरा, सौबीर ( कांजी ), तुषोदक, मैरेय, मेदक, मधूलक ( महुवे की शराब ), शुक्त ( सिरका आदि ), कुवल ( बड़ा बेर ), बेर अथवा दूसरे खट्टे पदार्थ मिश्रित वस्तुओं के अस्यन्त उपयोग करने से, अधिक उष्णिमा में रहने के पीछे अथवा पिट्ठी युक्त अन्न के खाने के उपरान्त बार बार पानी के पीने से, अथवा दूध के साथ रोहितक शाक या कबूतर का मांत, सरसों के तेल पिण्याक अथवा, जामुनसार में, कस्बासिद्ध कियेआदिहुएपकेपदार्थोंहुए फलोंके खानेके व्ययसे, अथवाकांजी कुलयीका, उड़ददूध,