चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 441–450
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 441–450
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२ ] निवास्थानम् अतिमात्रा में अथवा शरीर की गरम स्थिति में खाने से मनुष्य का मा पित होजाता है और रक्त अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाता है । पित्त प्रकोप से रक्त का दोष- इस प्रकार प्रमाण में अधिक बढ़ा हुआ रक्त तथा प्रकुपित हुआ पिस सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है और यकृत् एवं लोहा से उत्पन्न होने वाले रक्तवह स्रोतों के बढ़े हुए रक्त के कारण मरे हुए मुखों को पहुँचकर बन्द कर देता है । इस प्रकार संसर्ग द्वारा पित- रक्त को दूषित कर देता है ॥ ३ ॥
तल्लोहितसंसर्गाल्लोहितप्रदूषणाल्लोहितगन्धवर्णानुविधानाच पि लोहितपित्तमित्याचक्षते ॥ ४ ॥
पित्त का रक्त के साथ संसर्ग होने से एवं शरीरस्थरक के पित्त के द्वारा दूषित होने से तथा पित्त का रक्त के समान गन्ध एवं रंग होने से पिस को 'रक्तपित्त' कहते हैं ॥ ४ ॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा— अनन्नाभिलाषो भुक्तस्य विवाहः शुकामलगन्धरस उद्गारश्छदेरभीक्ष्णागमनं छर्दितस्य बीम-रसता स्वरभेदो गात्राणां सदनं परिदाहो मुखाद्भूमागम इव लोइलोहि-तमत्स्यामगन्धित्वमपि चाss स्यस्य रक्त- दरित-हारिद्रवत्वमङ्गावयवशकु-न्मूत्र - खेद - लाला - सिङ्घाणकास्य - कर्णमल- पिडकोलिका पिडकानामङ्ग-वेदन- लोहित - नीलपीत श्यावानामर्चिष्मतां च रूपाणां स्वप्ने दर्शनम भीक्ष्णमिति लोहित-पित्त- पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥
रक्तपित्त के पूर्व रूप ये हैं-भोजन में अनिच्छा, खाये हुए अन्न का न पचना, खट्टे या शुक्त गन्ध अथवा रस की डकार आना, बार २ वमन की अभिरुचि, वमन में आये रक्त आदि पदार्थ की भयंकरता, स्वरभेद, अंगों का टूटना, शरीर में दाह, मुख से धुंए के समान श्वास आना, मुख से लोहा, रक्त, या मछली या कच्चे मांस की गन्ध आना, शरीर के अवयव, मल, मूत्र, पसीना, कार, नासिका का मल, मुख का मल, कान का मह, और नेत्र का मह तथा पिडकाओं का, लाल, हरा अथवा हल्दी के समान होम्स, अंथों में G रक्त के बढ़ने से रक्तवह स्रोतों के मुख खुल जाते हैं । परन्तु पिरा के कारण रक्त के दूषित होने से रक्त में घनता बढ़ जाती है । इससे उनका मुख बन्द हो जाता है । फ्लि रक को दूषित करता है ।रामलोडों का प्रभाव स्थान यकृत् और मीहा हैं ।
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४२४ [ ०२ बेदना, स्वम में काल, नीले, पीछे, काले वा जळते हुए पदार्थों का बार बार दर्शन होना, रक्तपित्त के पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥
उपद्रवास्तु खलु दौर्बल्यारोचकाविपाक- श्वास -कास- वरातीसार- शोफ शोष-पाण्डुरोगाः स्वरभेदश्च ॥ ६ ॥
रक्तपित्त के उपद्रव -दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, श्वास, काम, अर, अतिसार, सूजन, शोष, पाण्डुरोग, और स्वरमेद ये रक्तपित्त के उपद्रव हैं ॥६ ॥
मार्गों पुनरस्य द्वावृवं चाधश्च । तद्बहुश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मसं- सर्गादूर्ध्वं प्रपद्यमानं कर्णनासिकानेत्रास्येभ्यः प्रच्यवते । बहुबाते तु शरीरे बातसंसर्गादधः प्रपद्यमानं मूत्रपुरीषमार्गाभ्यां प्रच्यवते । बहु-वातश्लेष्मणि शरीरे श्लेष्मवात संसर्गाद् द्वावपि मार्गों प्रपद्यते, तौ मार्गों प्रपद्यमानं सर्वेभ्य एव यथोक्तेभ्यः खेभ्यः प्रच्यवते शरीरस्य ॥ ७ ॥
रक्तपित्त के दो मार्ग --रक्तपित्त के बाहर आने के दो मार्ग हैं । एक ऊर्ध्वमार्ग और दूसरा अधोमार्ग । जिस समय शरीर में कफ की प्रधानता होती है उस समय शरीर का पिस कफ से मिलकर ऊर्ध्वगामी बन कर कान, नाक, नेत्र और मुखद्वार से बाहर निकलता है । वातप्रधान शरीर में पिच वायु से मिलकर अधोगामी होता है । इस अवस्था में वह मल मूत्र के रास्ते से बाहर निकलता है और जब शरीर में वात और कफ दोनों प्रबल होते हैं तब शरीर में बात और कफ से मिलकर ऊर्ध्वमार्ग एवं अघोमार्ग दोनों से बाहर आता है । इन दोनों मार्गों से बाहर निकलता हुआ रक्तपित्त शरीर के सम्पूर्ण छिद्रों से निकलने लगता है || ७ || तन्न यदूर्ध्वभागं तत्साध्यं, विरेचनोपक्रमणीयत्वाद् बहौषधत्वाच । यदधोभागं तथाप्यं वमनोपक्रमणीयत्वादल्पौषधत्वाच । यदुभयभागं तदसाध्यं, वमनविरेचनायोगित्वादनौषधत्वाच्चेति ॥ ८ ॥
साध्य असाध्य का विचार — इसमें जो रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी है, वह साध्य है, क्योंकि इसकी चिकित्सा विरेचन द्वारा होती है और विरेचन की औषधियां बहुत हैं । जो रक्तपित अधोगामी है वह याप्य अर्थात् कष्टसाध्य है, क्योंकि इस की चिकित्सा वमन द्वारा होती है और वमन की औषधियां कम हैं । जो रक्तपित उभय-मार्गगामी अर्थात् उर्ध्व अधोमार्गगामी है वह असाध्य है, क्योंकि इसमें वमन और विरेचन दोनों का उपयोग होता है और ऐसी ओष भियां नहींहैं ॥ ८ ॥
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निदानस्थानम् रक्तपित्तप्रकोपस्तु ख: पुरा दक्षयज्ञोद्यसे दद्रकोपप्रमदामिना प्राणिनां परिगतशरीरप्राणानामनु ज्वरमभवत् ॥१ ॥
तस्याऽऽशुकारिणो दावाग्नेरिवाऽऽपतितस्यात्ययिकस्याऽऽशु प्रशान्वौ यतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीक्ष्य संतर्पणेन वा मृदु-मधुर- शिशिर-विक्क-कषायैरभ्यवहार्यैः प्रदेह-परिषेकाबगाह-संस्पर्शनैर्वमना- धैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ १० ॥
रक्तपित्त का इतिहास - प्राचीन काल में जिस समय रुद्र के गणों ने दक्ष के यश का विश्वंस किया था । उस समय रूद्र के कोप से, सम्पूर्ण देहधारी प्राणियों को कष्ट देने वाले ज्वर के पीछे, अग्नि के समान उष्णशक्ति ( रक्तपिच) उत्पन्न हुआ । यह रक्तपित्त शीघ्र कार्य करने वाला, प्राणहारक एवं अग्नि के समान नाश करने वाला है । इसको शान्त करने का शीघ्र उपाय करना चाहिये । मात्रा, देश, काल आदि का विचार करके संतर्पण या अपतर्पण किया द्वारा अथवा मृदु, मधुर, शीत, कटु, कषाय, रसयुक्त भोजनों से, लेप, परिषेक, अवगाहन, संस्पर्शन, वमन आदि द्वारा सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१० ॥
भवन्ति चात्र- साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ।
विरेचनस्य योगित्वाद् बहुत्वाद्वेषजस्य च ॥११॥
विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् ।
यथ तत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥ १२॥
भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् ।
तस्मात्साध्यं मतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥ १३॥
ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य -जो रक्तपित्त ऊर्ध्वमार्ग-गामी हो, वह साध्य है, क्योंकि इसमें विरेचन द्वारा चिकित्सा की जाती है और विरेचन की औषधियां बहुत हैं । ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में पित्तदोष प्रधान होता है, और कफ दोष गौण होता है । पित्तदोष को शान्त करने के लिये विरेचन परम श्रेष्ठ क्रिया है । और जो कफ इसमें अनुबन्ध रूप में रहता है, इसके किये विरेचन मध्यम उपाय है । कषाय और तिक्त रसों के सिवाय मधुर रस भी अन्य १. 'दक्षयशवंसे रुद्रकोपामर्षाभिना' इति पाठः । २. ' मभवचरमनु' इति वा पाठः । ३. यह इतिहास आलंकारिक है । दक्ष का यश इस देह में ही है । रुद्र विष जाठराग्नि है । उसके विकृत होने से ही रोग उत्पन्न होते हैं ।
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४२६ चरकसंहिता [अ० २ औषधियों के साथ मिलकर योगवाही हो जाता है । इसलिये अगामी रक्त- पित्त साध्यहैं ॥११- १३॥
रक्तं तु यदधोभागं तथाप्यमिति निश्चयः ।
वमनस्याल्पयोगित्वादल्पत्वाद्वेषजस्य च ॥ १४ ॥
वमनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते ।
यच तत्रानुगो वायुस्तच्छान्तौ चावरं मतम् ॥ १५॥
तश्चायोगावहं तत्र कषायं वितकानि च ।
तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥ १६ ॥
अधोगामी रक्तपित्त याप्य - जो रक्तपित्त अधोमार्गगामी है वह माध्यै है । क्योंकि पित्त को जीतने के लिये ' वमन' पूर्णरूप से पर्याप्त क्रिया नहीं है और वमन की औषधियां भी कम हैं । कफ दोष के साथ मिश्रित पिच को निकालने में वमन पर्याप्त है । परन्तु रक्तपित के मूलरूप पित्त को निकालने में बमन श्रेष्ठ नहीं है । इसमें अनुबन्ध रूप से रहने वाले वायु को चमन करने के लिये वमन क्रिया निरूपयोगी है । इसी प्रकार कषाय और कटु रस जो रक्तपित्त के नाशक हैं, वे रस वायु को बढ़ाने वाले हैं इसलिये योगों में इनका उपयोग नहीं किया जा सकता इसलिये अधोगामी रक्तपित्त याप्य हो जाता है ॥ १४-१६ ॥
रक्तपितु यन्मार्गों द्वापि प्रतिपद्यते ।
असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादपि कारणात् ॥१७॥
न हि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् ।
प्रतिमागं च हरणं रक्तपित्ते विधीयते ॥ १८ ॥
एवमेवोपशमनं सर्वशो नास्य विद्यते । उभयमार्गगामी असाध्य रक्तपित्त-दोनों मार्गों से जाने वाला रक्तपित्त, उपरोक्त कारणों से असाध्य हो जाता है । क्योंकि ( १ ) इसके प्रति-कूल मार्ग के लिये संशोधन-चिकित्सा किसी प्रकार की भी नहीं है ।
और ( २ ) रक्तपिश में विरुद्ध मार्ग से संशोधन कार्य गुणकारी होता है ।
इसलिये सब प्रकार की शान्ति करने वाले कोई भी औषध नहीं है ॥ १७-१८ ॥
संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ १६ ॥
इत्युक्तं त्रिविधोदकं रक्त' मार्गविशेषतः । द्वि- दोषों से व त्रि -दोषण रक्तपित की चिकित्सा- दो दोनों यह तीनों दोषों से मिभित रक्तपिच में राम दोषों को शमन करने वाली योषधि देनी
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अ० २ ] निदानस्थानम् O चाहिये । इस प्रकार से रक्तपित के तीन प्रकार बाहर आने के मार्गों के मेदा- नुसार कह दिये ॥ १ ९ ॥ एभ्यस्तु खल हेतुम्य: किंचित्साध्यं न सिध्यति ॥ २० ॥
प्रेष्योपकरणाभावाद्दौरात्म्याद्वेयअकर्म साध्यत्वं कश्चिद्रोगोऽतिवर्ततेदोषतः ॥। २१ ॥
तत्रासाध्यत्वमेकं स्यात्साध्य याप्यपरिक्रमात् ।
रक्तपित्तस्य विज्ञानमिदं तस्योपदेक्ष्यते ॥ २२ ॥
साध्य रोग असाध्य हो जाने के कारण इन निम्नलिखित कारणों से कोई साध्य रोग असाध्य बन जाता है । जैसे भृत्य आदि के अभाव से, अन्य आब- श्यक सामग्री के अभाव से, आत्मसंयम के अभाव से रोगी के दुष्ट आहार- विहार के कारण; वैद्य के दोष से, तथा चिकित्सा न करने से साध्य रोग भी असाध्य हो जाता है । उभय मार्ग से जाने वाला रक्तपित्त असाध्य है । इसी प्रकार साध्य रक्तपित्त का याप्य हो जाना, या याप्य रक्तपिच का असाध्य हो जाना दोनों ही असाध्य हैं । इसके आगे रक्तपित्त विषयक विज्ञान और अधिक कहते हैं । २०-२२ ॥
यत्कृष्णमथवा नीलं यद्वा शक्रधनुष्प्रभम् ।
रक्तपित्तमसाध्यं तद्वाससो रब्जनं च यत् ॥ २३ ॥
भृशं पुत्यतिमात्रं च सर्वोपद्रववश्च यत् ।
बलमांसक्षये यच्च तच्च रक्तमसिद्धिमत् ॥ २४ ॥
येन चोपहतो रक्त' रक्तपित्तेन मानवः ।
पश्येद् दृश्यं वियश्चैव तच्चासाध्यम संशयम् ॥ २५ ॥
arter परित्यज्य याप्यं यत्नेन यापयेत् ।
साभ्यं चावहितः सिद्धं भेषजेः साधयेद्भिषक् ॥ २६ ॥
असाध्य रकपित्त के लक्षण --जो रक्तपित्त काला, नीला, अथवा इन्द्र धनुष के समान नाना प्रकार के रंगों वाला हो, और जिसमें वस्त्र पर लगा रक्त का दाग धोने से न मिटे और अतिशय दुर्गन्ध वाला हो, जिसमें सब उप- 1 अब हों, जिस के कारण रोमी का वह और मांस क्षीण होगया हो, वे असाध्य रक्तपित्त के लक्षण हैं । रक्तपित का रोगी जब सब पदार्थों को कालाक ही देखने लगे तब रक्तपित निःसंशय असाध्य समझना चाहिये । अवाप्य अब- स्पा की चिकित्सा आरम्भ ही नहीं करनी चाहिये, दुःसाध्य या मानसाध्य रोग
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४२८ चरकसंहिता [अ०३ की प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये । साध्य रोग की सावधान होकर गुण-कारी ओषधियों से चिकित्सा करनी चाहिये || २३-२६ ॥
सत्र श्लोकौ —कारणं नामनिर्वृत्तिं पूर्वरूपाण्युपद्रवाम्।
मार्गों दोषानुबन्धं च साध्यत्वं न च हेतुमत् ॥ २७ ॥
निदाने रक्तपित्तस्य व्याजहार पुनर्वसुः ।
वीत- मोह - रजोदोष -लोभ -मान-मद-स्पृहः ॥ २८ ॥ इति ॥
मोह, रजोगुण, दोष, लोभ, अभिमान, मद, और स्पृहा से रहित पुनर्वसु ने इस अध्याय में, रक्तपित्त की उत्पत्ति का कारण, पूर्वरूप, उपद्रव, इसके दोनों मार्ग, बात आदि दोषों का अनुबन्ध, साध्यासाध्यत्व, हेतु इत्यादि सब विषय वर्णन कर दिये हैं । इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने रक्तपित्तनिदानं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथातो गुल्मनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ' गुल्मनिदान' का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ' ॥ १-२ ॥ इह खलु पब्च गुल्मा भवन्ति । तद्यथा-वातगुल्मः, पित्तगुल्मः, श्लेष्मगुल्मो, निचयगुल्मः शोणितगुल्मश्चेति ॥ ३ ॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच -कथमिह भगवन्! पचानां गुल्मानां विशेषमभिजानीयाम् नह्यविशेषविद्रोगाणामौष- विदपि भिषक प्रशमनसमर्थो भवतीति ॥ ४ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः –समुत्थान- पूर्वरूप -लिङ्ग- वेदनोपशय -विशे- षेभ्यो विशेषविज्ञानं गुल्मानां भवत्यन्येषां च रोगाणामग्निवेश! वस्तु ख गुल्मेषूच्यमानं निबोध ॥ ५ ॥
१. शरीर के भीतर दोष संचित होकर पिण्डाकार होजाते हैं । इससे वे 'गुरुम' कहाते हैं ।
कुपितानिलमूलत्वाद् गूढमूकोदयादपि ।
गुल्मा विधात्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ सुश्रुत ॥
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०३ ] निदानस्थानम ४२६ गुल्म के मेद गुल्म पांच प्रकार के होते हैं । जैसे ( १ ) बातगुल्म, (२) पितगुल्म, ( ३ ) कफगुल्म, ( ४ ) निचयगुल्म और ( ५ ) रक्तगुल्म ' । इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अभिवेश ने पूछा कि इन पांच प्रकार के गुल्मों के विषय में विशेष ( मेद शान ) शान किस प्रकार करूँ? क्योंकि इनके भेदों को सम्पूर्णरूप से जाने बिना, सम्पूर्ण औषध-शान होने पर भी वैद्य रोगों के शमन करने में समर्थ नहीं होता । भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया - –हे अग्निवेश! उत्पत्ति, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना और उपशय इनके मेद से भिन्न-भिन्न गुल्मों का विशेष ज्ञान होता है । और इन्हीं साधनों से दूसरे अन्य रोगों का भी पता चलता है । इसलिये गुल्म के लक्षण आदि का वर्णन करते हैं, इसको ध्यान से सुनो और समझो ॥३-५ ॥ यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वर- वमन विरेचनातीसाराणामन्य-तमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्र- मस्नेहपूर्वे वा वमनविरेचने पिवत्यनुदीणां वा छर्दिमुदीरयत्युदीर्णान् वात - मूत्रपुरीष-वेगान्निरुणद्धयत्य शितो वा पिवति नवोदकमतिमात्र- मतिमात्रसंक्षोभिणा वा यानेन यात्यतिव्यवाय व्यायाम मद्यरुचिर्वाs-भिघातसृच्छति वा विषमाशन- शयनासन-स्थान चङ्क्रमण -सेवी भवत्य- न्यद्वा किंचिदेवंविधं विष ममतिमात्रं व्यायामजातमारभते, तस्थाप-चाराद्वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ६ ॥
वातगुल्म — जब वातप्रकृति का मनुष्य विशेष कर ज्वर, वमन, विरेचन और अतिसार इनमें से किसी एक के कारण कृश हो जाता है, इस स्थिति में जब वह वायुकारक आहार या अति शीतल पदार्थों का सेवन करता है, वा स्नेहन कर्म किये बिना विरेचन का उपयोग करता है, वमन की इच्छा न रहने पर भी बलात्कार से वमन करता है, अधोवायु, मल, मूत्र के उपस्थित वेगों को रोकता है, अधिक भोजन करके नवीन पानी ( बरसात में कुएं आदि का पानी ) अधिक पीता है, बहुत अधिक शकोले वाली गाड़ी वा सवारी से यात्रा करता है, स्त्री- सम्भोग और मद्य के अति उपयोग से, रुचि के अभिघात होने से, विषम स्थिति में बैठने, सोने, चलने या रहने से, इसी प्रकार के अन्य २. इन पांच गुल्मों के सिवाय तीन और भी गुल्म हैं जैसा कि आगे चिकित्सा में कहेंगे -– “व्यामिश्रलिंगानपरांस्तु गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषवकल्पनार्थम्' । अर्थात् वातपिचज, पिराकफज और वातकरुज । इस प्रकार से आठ प्रकार के गुल्म हैं । २. 'विषमतिमात्रं' इति च पाठः ।
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४३० चरकसंहिता [अ०३ म्याम आदि अमजनक कार्यों को अधिक मात्रा में करने से, वायु प्रकुपित होजाता है ॥ १ ॥
स प्रकुपितो महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात्कठिनीभूतमाप्लुत्य पिण्डतोऽवस्थानं करोति हृदि बस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा । स शूलमुप- जनयति श्रन्यानेकविधान् 3 पिण्डितवावतिष्ठते, स पिण्डितत्वाद् गुल्म इत्युच्यते ॥ ७ ॥
- बातगुल्म की सम्प्राप्ति इस प्रकार से कुपित हुआ वायु महासोतों से घुस कर अपने रूक्ष गुण के कारण कठिन होकर कोष्ठ में फैलकर गोल-पिण्डाकार बन जाता है और हृदय बस्तिभाग, दोनों पार्श्वभाग अथवा नाभि भाग में शूल अथवा अनेक प्रकार की गांठें उत्पन्न कर देता है । वायु गोलाकार बनकर पिण्डाकार होने से 'गुल्म' कहा जाता है । ( इसी को 'बायुगोला' कहते हैं, जोकि बातगुल्म का अपभ्रंश है । ) ॥ ७॥
स मुहुराधर्माति, मुहुरणुत्वमापद्यते, अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, पिपीलकासंप्रचार इबाङ्गेषु, तोद -स्फुरणायाम- संकोच-सुप्ति-हर्ष - प्रलयोदय- बहुलस्तदातुरश्च सूच्येव शकुनेव बाति- विद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते शुष्यति चाऽऽस्यम्, उ- च्छ्वासश्चोपरुध्यते । हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे । वातगुल्म के लक्षण - यह वातगुल्म क्षण भर में फैलकर बड़ा हो जाता है । और क्षण भर में सिकुड़कर छोटा हो जाता है, इसकी पीड़ा अनिश्चित, कभी अधिक और कभी कम हो जाती है । इसका कारण वायु का चंचल स्वभाव है, शरीर के अवयवों में कीड़ियों के चलने की सी प्रतीति होती है, इसमें तोद (चुभने की सी वेदना ), स्फुरण ( धड़कन ), आयाम ( विस्तार ), संकोच ( सिकुड़ना ), सुप्ति ( स्पर्शज्ञान का अभाव ), हर्ष ( स्पर्शज्ञानका बढ़ना ), प्रलय ( नाच ), उदय ( जन्म ) प्रायः होते हैं अर्थात् कभी तो उत्पन्न होते हैं, और कभी शान्त हो जाते हैं । इस अवस्था में रोगी सूई चुभने या कील आदि से विंधने का सा अनुभव करता है । सन्ध्याकालमें पीड़ा होती है, रोगी का मुख सूल जाता है, श्वास घुटने या बन्द होने लगता है, वेदना के समय शरीर रोमा--चित हो जाता है ॥ सीहाssटोपान्त्र- कूजना विपाकोदावर्ताङ्गमर्द-मन्या- शिरःशङ्खसूळ-- अनरोगाचैनमुपद्रवन्ति, कृष्णारुण-परुषत्व -नख- नयन -बदन-सूत्र -पुरी- पश्च भवति ।
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[ ३ ] मिहागत्वानम् मी आठो ( बाबु का आध्यान ), बांधो में गुड़-गुरु ध्वनि, अचल, दाव, अंगों का टूटना, मन्याशूक, शिरःशुक, शंख, मध्य-रोगः खादि नाना उपद्रव होने लगते हैं । रोगी की त्वचा, नख, सुख, मूत्र और मळ का रंग काला या लाल हो जाता है, तथा ये कर्कश हो जाते हैं । निदानोकानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरते-इति वातगुल्मः ॥ ८ ॥
वातगुल्म के कारणानुकूल आहार-विहार करने से रोग शान्त नहीं होता, परन्तु रोग के कारण के विपरीत गुणवाले आहार- बिहार से रोग शान्त हो जाता है । वातगुल्म के ये लक्षण हैं ॥८॥
तैरेव तु कर्शनैः कशितस्याम्ल लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्ण- शुक व्यापन्न-मद्य- हरित -कफलाम्लानां विदाहिनां च शाक- धान्व -मांसादीना- मुपयोगाद जीर्णाशनाद्रौक्ष्यानुगते चाऽऽमाशये वमनविरेचनमतिवेलं संधारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमा- पद्यते ॥ ६ ॥
बात के साथ पिस प्रकोप के कारण - वातगुल्म में कहे हुए कारणों से कति हुआ पुरुष जब खट्टे, नमकीन, कड़वे, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, शुक्त, सढ़े, खराब हुए, मद्य, या हरी सब्जियां और फल खाता या दाहकारक शाक या मांस का सेवन करता है, अजीर्ण यां अध्यशन ( भोजन के ऊपर फिर भोजन करने ) से आमाशय में रूक्षता के उत्पन्न होने से वमन, विरेचन के वेगों को बहुत देर तक रोकने से, वायु या धूप के अतिसेवन करने से वायु के साथ पित्त भी कुपित होजाता है ॥ ६ ॥
तत्प्रकुपितं मारत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छच तानेव वेदनाप्रका- रानुपजनयति य उक्ता बातगुल्मे, पित्त त्वेनं विदहति कुक्षौ घुरसि कण्ठे च स विदह्यमानः सधूममिवोद्गार मुद्गिरत्यग्लान्वितं गुल्मा- वाशास्य दाते दूयते धूप्यते उष्णायते स्विद्यति क्रियते शिथिल इव च स्पर्शासहोऽल्परोमानो भवति । ज्वर-भ्रम-दवथु पिपासा -गल- वदन- तालु- शोष-प्रमोह- विड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति, हरित- हारिद्रत्वङ्- नख- भवति । निदानोकानि चास्य नोपशेरते, विप- रीतानि चोपशेरते - इति पित्तगुल्मः ॥ १० ॥
पितगुल्म की सम्प्राप्ति —स प्रकार से कुपित हुआ पित्त और वायु | आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर बातगुल्म में कही हुई वेदनाओं को
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४३२ चरकसंहिता [अ० ३ उत्पन्न करते हैं । ' पित्तगुल्म में विशेषता यह है कि प्रकुपित पित कृषि, हृदय, arters और कण्ठ इन स्थानों में दाह उत्पन्न करता है । इस दाह के कारण धुंए के समान और खट्टा डकार रोगी को आता है और गुल्म के स्थान में दाह होता है, धूंआ निकलता है, गरमी रहती है, पसीना आता है, किन्नता होती है, शरीर ढीला पड़ा प्रतीत होता है, स्पर्श की असह्यता रहती है और किञ्चित् रोमांच रहता है । वर भ्रम, दवथु ( धक्धक् स्पन्दन ), पिपासा, गले मुख और तालु में शुष्कता, मूर्च्छा, मल का पतला आना, ये उपद्रव होजाते हैं । त्वचा, नख, आँख, मूत्र और मल इनका रंग हरा या हल्दी के समान होजाता है । इसके निदान के समान गुण वाली वस्तुओं के
उपयोग से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है ।
यह पित्तगुल्म का वर्णन हुआ ॥ १० ॥
draतैरव तु कर्शनैः कर्षितस्यात्य शनादतिस्निग्ध-गुरु- मधु-शीताशना-पिष्ठेक्षु- श्रीर-माष- तिल-गुड- विकृति सेवनान्मन्दक-मद्यातिपानाद्धरितका-विप्रणयनादानूपौदक -प्राम्य-मांसातिभक्षणात्संधारणादविसुहितस्य चाति- प्रगाढ मुदपानात्संक्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोप मापद्यते ॥ ११ ॥
बात के साथ कफ प्रकोप के कारण-वातगुल्म में कहे हुए कारणों से कुश हुए व्यक्ति के अत्यन्त भोजन करने से, अतिस्निग्ध, गुरु, मधुर, शीत पदार्थों के खाने से, पीठी ( उड़द आदि को पीसकर ), ईख, दूध, उड़द, तिल, गुड़ इनसे बने पदार्थों के अति सेवन से, मन्दक-दही और मद्य के अति- सेवन से, हरे शाक, आनूप या जलचर प्राणियों के अथवा ग्राम्य मांस के अति सेवन से, शरीर को बहुत विचोभित करने से, वायु कफ के साथ मिलकर कुपित होजाता है । ११ ॥ तं प्रकुपितं मारत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छच तानेव गाढवेद- नाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे । श्लेष्मा स्वस्य शीतज्वरारो- काविपाकाङ्गमर्द-हर्ष- द्रोगच्छर्दि निद्रालस्य- स्तैमित्य गौरव शिरोभि- तापानुपजनयति, अपिच गुल्मस्य स्थैर्य -गौरव काठिन्यावगाढ-सुप्तताः, १. आमाशय के एकदेश में मूर्च्छित होने से पिचगुल्म और कफगुल्म बस्ति में नहीं होते । क्योंकि नाभि और स्तनों के बीच के स्थान को आमा- शय कहते हैं । वातगुल्म बस्ति में भी होता है । इसलिये बातगुल्म में 'महालोस्' शब्द पड़ा है । महास्रोतस् शब्दसे बस्ति का भी ग्रहण होजाता है ।