चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 451–460
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 451–460
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STO 2 ] २८ निदानस्थानम ४३३ तथा कास-श्वास -प्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चाविप्रवृद्धः श्वेत्यं च स्वर् नख -नयन- वदन-मूत्र- पुरीषेषूपजनयति । निदानोतानि चास्य नोपशेरते, तद्विपरीतानि चोपशेरते -इति श्लेष्मगुल्मः ॥ १२ ॥
कफगुल्म की सम्प्राप्ति -इस प्रकार से कुपित कफ और वायु आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में उत्पन्न करते हैं । प्रकुपित कफ शीतज्वर कही हुई, अनेकअरुचिप्रकारअविपाकको तीव्रअंगोंवेदनायेंमें वेदना, रोमहर्ष, हृदयरोग, वमन, निद्रा, आलस्य, स्तिमितता ( भारीपन ), शिर और अंगों में उष्णिमा, ( ताप ) उत्पन्न करता है । इस गुल्म में स्थिरता ( हिलने का अभाव ), भारीपन, कठिनता, स्पर्शज्ञान का एकदम अभाव, ( बधिरता ) रहती है । बहुत बढ़ने पर कास, श्वास, प्रतिश्याय और क्षय रोग उत्पन्न करता है । त्वचा, नख, आंख, मुख, मल, मूत्र, उनका रंग श्वेत हो जाता है । इसके निदान के समान गुण वाले आहार- विहार से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है । यह कफगुल्म का निदान कह दिया है ॥ १२ ॥
त्रिदोष हेतु लिङ्ग -सन्निपातात्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कु शलाः । स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः ॥ १३ ॥
सान्निपातिक गुल्म —-जिस गुल्म में तीनों दोषों के हेतु और तीनों दोषों के लक्षण मिले होते हैं; उसको बुद्धिमान् वैद्य ' सान्निपातिक गुल्म' कहते हैं । यह सान्निपातिक गुल्म चिकित्सा में विरोधि होने से चिकित्सा कर्म में असाध्य है ॥ १३ ॥
शोणितगुल्मस्तु खलु खिया एव भवति न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त-वागमनवैशेष्यात् । पारतन्त्र्यादवैशारद्यात्सततमुपचारानुरोधाद्वेगानुदीर्णानुपरुन्धन्त्या आमगर्भे वाऽप्यचिरात्पतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजावाया ऋतौ वा बात-प्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ १४ ॥
रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों को ही होता है, पुरुषों में नहीं होता, क्योंकि स्त्रियों में ही गर्भाशय तथा रजोदर्शन होता है । 'स्त्रियां परवश होने से वेगों को रोकती हैं, अधिश्चित होने से, पति आदि की सेवा में तत्पर रहने से और मक मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, इन कारणों से या अपक १. सामन्यतः रक्त का दूषित होना और दूसरे गुल्मों में भी मिलता है । । प्रकार आगे कहेंगे ।
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४३४ परकर्यादिता [अ०३ गर्भ के गिर जाने से, या वाटक प्रसव करने के पीछे अथवा काक में पा प्रकोपक वस्तुओं के सेवन करने से वायु शीघ्र ही प्रकुपित हो जाता है ॥ १४ ॥
स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्याऽऽर्तयमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । तस्याः शूळ-कासातीसारच्छ- रोचकाविपाकाङ्गमर्द निद्रालस्य स्तैमित्य-कफ-प्रसेकाः समुपजायन्ते । स्वनयोश्च स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्यं, ग्लानिश्चक्षुषोर्मूर्च्छा, हल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोरीषच्चोद्गमो रोमराज्याः, योन्यावाटा- त्वं अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमानावश्चोपजायते, केवलखास्या गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १५ ॥
रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति -– यह कुपित वायु योनिमुख में प्रविष्ट होकर आय को रोक देता है । प्रत्येक मास में रुक रुक कर यह आर्त्तव कोष्ठ को बड़ा कर देता है । इससे स्त्री को शूल, कास, अतीसार, वमन, अरुचि, अविपाक, अंगों का टूटना, निद्रा, आलस्य, कफ का ( लार का ) मुख से आना, स्तनों में दूध का आना ओठ एवं स्तनों के चूचुकों का काला हो जाना, आंखों में ग्लानि, मूर्च्छा, वमन की अभिरुचि, गर्भ के समान अनेक लक्षण, पांव में सूजन, रोमराजि में विस्फुरण योनि का फैल जाना, योनि में दुर्गन्ध आना तथा योनि में से स्राव होना इत्यादि विकार उत्पन्न होजाते हैं । इस प्रकार गुल्म पेट में हिलता है, अज्ञानी लोग गर्भरहित स्त्री को भी गर्भिणी कहने लगते हैं ॥ १५॥
एषां तु खलु पश्चानां गुल्मानां प्रागभिनिर्वृशेरिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा- अनन्नाभिलषणमरोचकाविपाकावनिवैषम्यं विवाहो भुक्तस्य विपाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानाम प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषदागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्र- कूजनापरिहर्षणातिवृत्तपुरीषताऽबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासह-त्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १६ ॥
• आतव रोग का यह प्रभाव है कि स्तनों में दूध आजाता है । गमोवस्था में भी आर्तव के रुकने से स्तनों में दूध आता है । गर्भवती स्त्री में जो रस बनता है, उसके तीन कार्य होते हैं । ( १ ) माता के शरीर का पोषण, ( २ ) स्तनों में दूध, (१) बच्चे का पोषण, इसलिये यह आर्तव भी स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है । १. जो स्त्रियां बच्चों के लिये बहुत लालायित रहती हैं उनमें भी ऋतु धर्म के रुक जाने पर ये लक्षण दीखने लगते हैं । इस अवस्था में यदि सुंघाकर परीक्षा करें तो सिवाय वायु के और कुछ उपलब्ध नहीं होता
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०३ ] निदानस्थानम् ४३ गुल्म का पूर्वरूप इन पांचो प्रकार के गुल्मों की उत्पत्ति से पूर्व निम्न-लिखित लक्षण होते हैं । यथा--अन में अनिच्छा, अरुचि, अस्पिाक, अभि की विषमता ( कभी तेज़ और कभी मन्द ), विदाह ( जसन ), भोजन के पचने के समय जलन, विना कारण के वमन और डकार आना, अधोवायु, मूत्र व मकों की अप्रवृत्ति अथवा प्रवाहण की प्रवृत्ति होने पर भी मलादि का बाहर न निकलना, अथवा थोड़ा आना, त्रातशूल, पेट में गुड़-गुदाहट, आंतों में अफारा, शरीर में रोमांच, गांठदार मल का आना, भूख का न लगना, कृशता, पेट भर अन्न खाने पर उसका सहन न होना, इत्यादि लक्षण सब प्रकार के गुल्मों के पूर्वरूप हैं ॥ १६ ॥
सर्वेष्वपि च खल्वेतेषु न कश्चिद्वातादृते संभवति गुल्मः ॥ १७ ॥
इन सब प्रकार के गुल्मों का मूलभूत कारण वायु ही है, वायु के बिना कोई भी गुल्म नहीं होता ॥ १७॥
तेषां सन्निपातजमसाध्यं ज्ञात्वा नोपक्रमेत । एकदोषजे तु यथा-स्वमारम्भं प्रणयेत् । संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत् । यचान्य- दप्यविरुद्धं मन्येत तदवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवाणां समीक्ष्य, गुरूनुपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेज्जघन्यमितरान्, त्वरमाणस्तु विशेषमनु-पलभ्य गुल्मेष्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत्, स्नेहस्वेदौ वातहरौ, स्नेहोपसंहितं च मृदुविरेचनं, बस्तवाम्ललवणमधुर रसान् युक्तितोऽवचारयेत् । मारुते छुपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्यपि दोषो नियन्तुं गुल्मेष्विति ॥ १८ ॥
इनमें सन्निपातजन्य गुल्म को असाध्य समझ कर चिकित्सा में हाथ नहीं डालना चाहिये । एक दोष से उत्पन्न गुल्म की यथायोग्य रीति से चिकित्सा करनी चाहिये । दो दोषवाले गुल्मों की चिकित्सा साधारण प्रकार से करनी चाहिये । अथवा वैद्य रोगी के उपद्रवों की गुरुता लघुता को देखकर, दूसरे किसी से चिकित्सा विरुद्ध न पड़े, इस प्रकार से चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । जो उपद्रव गुरु हो, उनकी तत्काल चिकित्सा करनी चाहिये और जो उपद्रव कम हों उन की पीछे से चिकित्सा करनी चाहिये । जिस गुल्म में कुछ पता न चलता हो या काम ज़रूरी या जल्दी करना हो तो प्रथम वायु की चिकित्सा करनी चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त करने के लिये स्नेहन, मृदु विरेचन, कर्म, सट्टा, नमकीन और मधुर रस युक्तिपूर्वक देने चाहिये । वायु कं जाने पर थोड़े से परिश्रम से दूसरे दोष भी सुगमता से वश में किये सकते हैं ॥ १८ ॥
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चरकसंहिता [अ०४ ४३६
भवति चात्र- गुल्मिनाम निशान्तिरुपायैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या ।
मारुते जितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ १६ ॥
गुल्मरोग में वायु को शान्त करने के लिये सम्पूर्ण विधि काम में लानी चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त न करने पर दूसरा थोड़ा सा बढ़ा हुआ दोष भी सम्पूर्ण किये कराये पर पानी फेर देता है ॥ १६ ॥
तत्र श्लोका:- संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च ।
दृष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम् ॥ २० ॥
इस गुल्म निदान में गुल्मों की संख्या, कारण, पूर्वरूप और चिकित्सा कह दो हैं ॥ २० ॥
इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने गुल्मनिदानं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे प्रमेह-निदान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था || २|| त्रिदोषकोपनिमित्ता विंशतिः प्रमेहा भवन्ति, विकाराचापरेऽ- परिसंख्येयाः । तत्र यथा त्रिदोषप्रकोपः प्रमेहानभिनिर्वर्तयति तथाऽ- नुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
प्रमेहों की संख्या - वात आदि तीनों दोषों से उत्पन्न होने वाले प्रमेह बीस प्रकार के हैं, इनके सिवाय दूसरे रोग असंख्य हैं । त्रिदोष के कोप से प्रमेह किस प्रकार उत्पन्न होते हैं इसका आगे वर्णन करते हैं ॥ ३॥
इह खलु निदान- दोष- दूष्य- विशेषेभ्यो विकार- विघात भावाभाव- प्रतिविशेषा भवन्ति ॥४ ॥
निदान, दोष और दूष्य इनके विशेष मेदों को लेकर रोगों के विषात अर्थात् रोग का देर में होना, थोड़ा या अधिक विकार होना आदि भाव-विशेष उत्पन्न होते हैं । इस सूत्रात्मक सिद्धान्त को विस्तार कहते हैं |
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० ४ ] निदानस्थानम् ४३० यदा होते त्रयो निदानादिविशेषाः परस्परं नानुबध्नन्ति, अयथा वा कालप्रकर्षादबलीयांसो वाऽनुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृति, चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तते, तनवो वा भवन्त्यथवाऽप्यययोक्तसर्वलिङ्गाः । विपर्यये विपरीताः इति सर्वविकार- विघात भावाभाव-प्रतिविशेषाभि- निर्वृत्तिहेतुर्भवत्युक्तः ॥ ५ ॥
रोगों के उत्पन्न होने और न होने का कारण -निदान दोष और दूष्य भावों की भिन्नता से रोग उत्पन्न होते हैं और नहीं भी उत्पन्न होते हैं । जब निदानादि ये तीनों परस्पर नहीं मिलते, अथवा लम्बे समय पीछे मिलते हैं, या निर्बल अवस्था में मिलते हैं, तब रोग उत्पन्न नहीं होता, यदि उत्पन्न भी होता है तो देर में उत्पन्न होता है या निर्बल रूप में या अम्पूर्ण लक्षणों के साथ उत्पन्न होता है । परन्तु जब निदान, दोष और दूष्य परस्पर समानरूप में मिळते हैं, तब शीघ्र, बलवान् एवं सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त रोग उत्पन्न होता है । सब रोगों की उत्पत्ति में निदान दोष और द्रव्य का होना या न होना कारण होता है || ५|| तत्रे यो निदानादिविशेषाः श्लेष्मनिमित्तानां प्रमेहाणामाश्व- भिनिर्वृत्तिकरा भवन्ति । तद्यथा-दायनक- यवक चीनकोद्दालक- नैषधे- त्कट - मुकुन्दक-महाव्रीहि- प्रमोदक- सुगन्धकानां नवानामतिवेलमतिप्रमा- नोपयोगः, तथा सर्पिष्मतां नवहरेणुमाषसूप्यानां प्राम्यानूपौदकानां च मांसानां शाक- तिल-पलल-पिष्टान्न -पायस -कृशर-विलेपीक्षुविकाराणां क्षीर-मन्द - दधि -द्रव-मधुर- तरुणप्रायाणामुपयोगो, सृजा- व्यायाम वर्जनं, स्वप्नशयनासनप्रसङ्गो यश्च कश्चिद्विधिरन्योऽपि श्लेष्म मेदो-मूत्र -संजननः स सर्वो निदानविशेषः ॥ ६ ॥
कफजन्य प्रमेह में निदानादि को भिन्नता - निम्न कारणों से कफजन्य प्रमेह मुख्यतः उत्पन्न होता है । यथा हायनक ( धान्य विशेष ), यवक ( जौ ), चीनक, उद्दालक, नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाब्रीहि, प्रमोदक, सुगन्धिक इत्यादि जाति के चावलोंको अतिमात्रा में वा नूतन चावलों का उपयोग करने से, इसी प्रकार घी के साथ हरेणु ( मटर ), उड़द की दाल, ग्राम्य या आनूप अथवा जलचर प्राणियों का मांस अधिक खाने से, भाजी, तिक, मांस, पिडो से बने पदार्थ खीर, खिचड़ी, बिलेपी गाढ़ी कांजी), के रस से बनी वस्तुओं के अति उपयोग करने से, दूध, दक, दही, द्रव, मधुर पदार्थ या नवीन धान्यों के अति उपयोग करने से, शरीर का घोषन न करने से, अंगों को परिचालन न करने से, सोने, लेने या
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[ ० ४ बैठे रहने से, अथवा कफ, मेद व सूत्र को बढ़ाने बाका जो भी कारण होता है वे सब प्रमेड़ों के विशेष कारण हैं ॥६॥
बहुद्रवः श्लेष्मा दोषविशेषः ॥ ७ ॥
बह्नबद्धं मेदोमांसं शरीरजक्लेदः शुक्रं शोणितं च वसा मज्जा लसीका रसचौजःसंख्यात इति दूष्यविशेषाः ॥ ८ ॥
कफप्रमेह के दूष्य - बहुत तरल ( द्रव ) कफ इसमें दोष होता है, बहुत अबद्ध ( अहत अर्थात् ढीला शिथिल ) मेद मांस, शरीरजन्य क्लेद, शुक्र, शोणित, वसा, मजा, लसीका, रस और ओज ये दूष्य विशेष हैं अर्थात् इनमें ही दोष अपना बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है ॥ ८॥
त्रयाणामेषां निदानादिविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रको- पमापद्यते प्रागतिभूयस्त्वात् स प्रकुपितः क्षिप्रमेव शरीरे विसृप्तिं लभते, शरीरशैथिल्यात्स विसर्पव्छरीरे मेदसैवादितो मिश्रीभावं गच्छति, मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वान्मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूयि- छत्वात्स मेदसा मिश्रीभावं गच्छन् दूषयत्येनद्विकृतत्वात् स विकृतो दुष्टेन मेदसोपहितः शरीरक्केदमांसाभ्यां संसगं गच्छति, क्लेदमांसयोर- तिप्रमाणाभिवृद्धत्वात् स मांसे मांसप्रदोषात्पूतिमांसपिडकाः शरा-: विकाकच्छपिकाद्याः संजनयति, अप्रकृतिभूतत्वात् शरीरले पुन- दूषयन्मत्रत्वेन परिणमयति । मूत्रवहानां च स्रोतसां वक्षणवस्ति- प्रभवाणां मेदःक्लेदोपहितानि गुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यते; ततस्तेषां स्थैर्यमसाध्यतां वा जनयति, प्रकृतिविकृतिभूतत्वात् ॥ ६ ॥
कफप्रमेह की सम्प्राप्ति - निदान, दोष और दूष्य इन तीनों के मिलने से कफ शीघ्र कुपित हो जाता है । क्योंकि रोग उत्पत्तिकाल में कफ अधिक बढ़ा होता है । इस प्रकार से कुपित कफ जल्दी ही शरीर में फैल जाता है । शरीर के शिथिल होने से फैलता हुआ यह कफ सबसे प्रथम शरीर में मेद के साथ १. प्रमेह में सब से प्रथम कफ का ही बिगाड़ होता है । इसलिये यह तो दोष है, और सप्तधातु, रस, रक्त, मांस आदि ये इससे दूषित होते हैं, इसलिये ये दूष्य हैं । इस अवस्था में जिस अपर ओज का परिमाण आधा अञ्जलि कहा है, वह ओज भाग विकृत होता है । क्लेद रक्त का तरक भाग है जिसके दूषित होने से मधुमेह रोगी के व्रण शीघ्र अच्छे नहीं होते । शरीर में त्वचा के नीचे रहने वाला पतका श्वेत, चिकना पदार्थ है जो की रक्षा करता है । ये सब दूष्य हैं ।
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०४ ] निदानस्थानम् ४३९ मिकता है । क्योंकि मेद बहुत अवद्ध अर्थात् शिविक रूप में होता है तथा मेद के गुणों के समान गुण ही कफ के हैं और शरीर में मेद का परिमाण भी बहुत है । मेद के साथ मिलकर कफ अपने आप दूषित होने से इस को भी दूषित बना देता है । यह विकृत कफ दुष्ट मेद के साथ मिलकर शरीर के वेद भाग और मां के साथ मिल जाते हैं । शरीर में क्लेद और मांस बहुत मात्रा मे बढ़े होते हैं । यह मांस को दूषित करके मांस में उत्पन्न होने वाली पिढकार्ये, शराविका, कच्छपिका आदि को उत्पन्न करता है । क्योंकि कफ अपनी प्रकृति में नहीं रहता, इसलिये अपनी शक्ति से इनको उत्पन्न करता है । शरीर के क्लेद को दूषित करके मूत्र रूप में बदल देता है । वंक्षण सन्धि तथा बस्ति से उत्पन्न होने वाले मूत्र वह सोतों के मुख मेद और क़द के भारी होने से बन्द हो जाते हैं । इसलिये इनमें प्रमेह टिक जाता है या बहुत बढ़कर असाध्य बन जाता है । क्योंकि कफ, मेद और वसा में समान है, परन्तु रक्तादि में असमान होता है; इसलिये प्रकृति विकृति होने से प्रमेह स्थिर बन जाते हैं या असाध्य हो जाते हैं ॥ ९॥
शरीरक्त दस्तु श्लेष्म-मेदो- मिश्रः प्रविशन्मूत्राशयं मूत्रत्वमापद्यमानः श्लैष्मिकैरेभिदर्शभिर्गुणैरुपसृज्यते वैषम्ययुक्तः । तद्यथा श्वेत -शीत- मूर्त-पिच्छाच्छ-स्निग्ध-गुरु प्रसाद-मधुर-सान्द्र-मन्देः; अत्र गुणेनानेन वा भूयस्तरमुपसृज्यते तत्समाख्यं गौणं नामविशेषं प्राप्नोति ॥ १० ॥
शरीर की आर्द्रता कफ और मेद से मिलकर मूत्राशय में प्रवेश करती है । वहां पर मूत्ररूप होकर विषमतावाले कफ के दस गुणों के साथ मिल जाती है । कफ के दस गुण -श्वेत, शीतल, मूर्त, पिच्छिल, स्निग्ध, गुरु, प्रसाद, मधुर, सान्द्र और मन्द, इनमें से एक गुण की या अनेक गुण की प्रधानता होने से उसी के अनुसार सामान्य या विशेष नाम मिलता है ॥१० ॥
ते तु खल्विमे दश प्रमेदा नामविशेषेण भवन्ति । तद्यथा - उदक-मेवालिकारसमेच, सान्द्रमेहश्च सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेहश्य, शुक्रमेहश्व, शीतमेह, सिकतामेद्दश्च शनैर्मेद्दश्चाऽऽलालमेहश्वेति ॥११॥
ते दश प्रमेहाः साध्याः समानगुणमेदःस्थानत्वात्कफस्य प्राधान्या- क्रियत्वाच्च ॥ १२ ॥
कफजन्य दस प्रमेह इस प्रकार से कफजन्य प्रमेह दस प्रकार के हैं । नाम ( १) उदकमेह, (२) हनुवाधिकारसमेह, ( ३) सान्द्रमेह, (४) सान्द्र-
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४४० चरकसंहिता [अ०४ प्रसादमेह, (५) शुक्रमेह, ( ६ ), शुक्रमेह, (७) शीतमेह (८) सिकतामेह (E) शनैर्मेह और ( १०) आकालमेह । ये कफजन्य दस प्रमेह साध्य हैं । क्योंकि कफ और मेद के गुण एवं स्थान समान हैं, तथा कफ की प्रधानता होने से और कफ और मेद की चिकित्सा के समान होने से कफप्रमेह साध्य है # ॥ १२॥
as श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविज्ञानार्था भवन्ति । कफप्रमेहों को बताने के लिये श्लोक कहते हैं- अच्छं बहुसितं शान्तं निर्गन्धमुदकोपमम् । श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही प्रमेहति ॥ १३ ॥
अत्यर्थमधुरं शीतमीषत्पिच्छिलमाविलम् ।
काण्डेरससंकाशं श्लेष्मकोपात्प्रमेहति ॥ १४ ॥
यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् ॥ १५ ॥
यस्य संहन्यते मूत्र किंचित् किंचित्प्रसीदति ।
सान्द्रप्रसाद मेहीति तमाहुः श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥
शुकं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्ल मेहिनम् ॥ १७ ॥
शुक्राभं शक्रमिश्रं वा मुहुर्मेइति यो नरः ।
शुक्रमेहिनमाहस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥
अत्यर्थशीतमधुरं मूत्रं मेहति यो भृशम् ।
शीतमेहिनमाहस्तं पुरुषं श्लेष्म कोपतः ॥ १६ ॥
मूर्तान्मूत्रगतान्दोषानणन्मेहति यो नरः ।
सिकतामेहिनं विद्यान्नरं तं श्लेष्मकोपतः ॥ २० ॥
मन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छं,यो मूत्रयेच्छनैः ।
शनैर्मे हिनमा दुस्तं पुरुषं श्लेष्म कोपतः ॥ २१ ॥
तन्तुबद्धमिवाऽऽलालं पिच्छिलं यः प्रमेहति ।
लालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥ २२ ॥
(२ ) उदकमेह- उदकमेह का रोगी कफ के प्रकोप के कारण बहुत स्वच्छ, बहुत सफेद, शीतल, बिना गन्ध का पानी के समान मूत्र करता है यह उदक- मेह के लक्षण हैं । • मूत्रमार्ग से शुक्र का मूत्र से पृथक रूप में जाना यह शुक्रदोष इसका प्रमेह में अन्तर्भाव नहीं होता ।
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०४] निदानस्थानम् II (२) रसुवालिकारसमेह - कफ के प्रकोप से अतिशय मधुर, शीतक, थोड़ा चिकास वाला, मैला, अस्वच्छ, गने के रस के समान मूत्र करता है । वह ' मेह' का रोगी है । (३) सान्द्रमेह - पहिले दिन का बरतन में रखा हुआ जिसका मूत्र, कफके कारण दूसरे दिन गाढ़ा हो जाता है, उसको सान्द्रमेह का रोगी समझना चाहिये । ( ४ ) सान्द्र प्रसादमेह – कफप्रकोप के कारण मूत्र ऊपर जम जाये और नोचे थोड़ा- थोड़ा पतला रहे तो 'सान्द्रप्रसाद मेह' का रोगी समझना चाहिये । ( ५ ) शुक्लमेह -कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य श्वेत, पिट्ठी के समान मूत्रबार बार करता है उसको 'शुक्लमेह' का रोगी समझना चाहिये । ( ६ ) शुक्रमेह - कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य शुक्र के समान, या शुक्र से मिला, मूत्र बार- बार करता है उसको 'शुक्रमेह' का रोगी समझना चाहिये । ( ७ ) शीतमेह -जो मनुष्य कफप्रकोप से अत्यन्त शीतल, मीठा- मूत्र अधिकतर करता है, उसको 'शीतमेह ' का रोगी जानना चाहिये । ( ८ ) सिकतामेह -कफप्रकोप से जब मनुष्य के मूत्र में सूक्ष्म, बालू के समान छोटे छोटे कठिन कण जाने लगते हैं, तब उसे ' सिकता-मेह' का रोगी समझना चाहिये । ( १ ) शनैर्मेह-ह -जब मनुष्य कफ के प्रकोप से धीरे- धीरे, विना वेग के, कठिनाई से, मूत्र करता हो तब इसको शनैर्मेह का रोगी समझना चाहिये । ( १० ) आलालमेह-जो मनुष्य कफ के प्रकोप से तारवाला या कार समान चिकना मूत्र करता है तो इसको ' आलासमेह' का रोगी समझना चाहिये ॥ १३-२२ ॥ इत्येते दश प्रमेहाः श्लेष्मप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ इस प्रकार से कफ के प्रकोप से उत्पन्न होने वाले दस प्रकार के प्रमेहों का वर्णन कर दिया है । उष्णाम्ल-लवण- क्षार - कटुकाजीर्ण भोजनोपसेविनस्तथाऽवितीक्ष्णा-तपाग्नि -संताप -श्रम-क्रोध- विषमाद्दारोपसेविनश्च तथाऽऽत्मकशरीरस्यैव क्षिप्रं पितं प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥
तत्प्रकुपितं तयैषाऽऽनुपूर्व्या प्रमेहानिमान् षद् क्षिप्रमभिनिर्वर्त-यति ॥ २४ ॥
तेषामपि च पित्तगुणविशेषेण नामविशेषा पूर्ववद् युक्ता भवन्ति । यथा- कारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह, मञ्जिष्ठा- मेह, दारिद्रमेहति । ते षद्भिरेतैः क्षाराग्ल-लवण-कटुक- विखोष्णैः
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४४२ [ ०४ पिचगुणैः पूर्ववत्समन्विता भवन्ति । सर्व एव च ते याप्याः संसृष्ट- दोष-मेदः -स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥ २५ ॥
पित्तप्रमेह के कारण और सम्प्राति -उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, वा कटु पदार्थों के अति सेवन करने से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, तीव्र धूप, अत्रि, सन्ताप, भ्रम, क्रोध वा विषम भोजन के सेवन से, पिस प्रकृतिवाले पुरुष में पित्त शीघ्रता से प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित पित्त, पूर्व वर्णित प्रकार से ही छः प्रकार के प्रमेह उत्पन्न करता है । पित्तजन्य प्रमेह–छः प्रकार के प्रमेद भी, कफप्रमेह के समान ही पिच के गुण के अनुसार भिन्न २ नाम वाले होते हैं । जैसे - ( १ ) क्षारमेह, ( २ ) कालमेह, ( ३ ) नीलमेह, ( ४ ) लोहितमेह, ( ५ ) मंजिष्ठामेह और ( ६ ) हाद्रिमेह । ये छः प्रकार के प्रमेह पूर्ववत् क्षार, लवण, कटु, अम्ल, वि ( दुर्गन्ध ) और उष्ण इन पित्त के गुणों से युक्त होते हैं । ये पित्तजन्य प्रमेह सब के सब य़ाप्य हैं । क्योंकि पित्त और मेद इनका स्थान समीप, एवं धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, एवं चिकित्सा भी परस्पर विरोधी हैं २३-२५॥ तत्र श्लोकाः पित्तप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति- पित्त प्रमेह को बताने के लिये ये निम्न लिखित श्लोक कहे हैं- गन्धवर्णरसस्पर्शैर्यथा क्षारस्तथात्मकम् । पित्तकोपान्नरो मूत्रं क्षारमेही प्रमेहति ॥ २६ ॥
मसीवर्णमजस्रं यो मूत्रमुष्णं प्रमेहति पित्तस्य परिकोपेण तं विद्यात्कालमेहिनम् ॥ २७ ॥
चावपक्षनिभं मूत्रं मन्दं मेहति यो नरः ।
पित्तस्य परिकोपेण तं विद्यान्नीलमेहिनम् ॥ २८ ॥
वित्रं लवणमुष्णं च रक्तं मेहति यो नरः ।
पित्तस्य परिकोपेण तं विद्याद्रक्तमेहिनम् ॥ २६ ॥
मञ्जिष्ठरूप योजनं भृशं विस्र प्रमेहति ।
पित्तस्य परिकोपात्तं विद्यान्मासिष्ठमेहिनम् ॥ ३० ॥
G पित्त का स्थान आमाशय, और मेद का बसाबहुत स्थान आमाशय का एक प्रदेश है । इसलिये दोष एवं दूष्य के नित्यप्रति पास में रहने से वाप्य है । पिच को शान्त करने वाले जो मधुर, शीत आदि पदार्थ हैं, वे मेष: किये अपथ्य हैं और जो मेद के किये कटु रस आदि वस्तु पथ्य हैं, वे पिथ' किये अपथ्य हैं । इसकिये चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ जाती हैं ।