चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 461–470

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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०४ ] निम् ४४३

हरिद्रोहकसंकाशं कटुकं यः प्रमेहति ।

पित्तस्य परिकोपात विद्याद्धारिद्रमेहिनम् ॥ ३१ ॥

इत्येते षट्प्रमेहाः पिचप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३२ ॥

( १ ) क्षारमेह-जो मनुष्य पिसप्रकोप के कारण क्षार के समान गन्ध, वर्ष रस और स्पर्शबाला मूत्र करता है वह क्षारमेह का रोगी होता है । ( २ ) कालमेह - जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण स्याही के समान काला एवं गरम सूत्र बार- बार करता हो उसको काढमेह का रोगी जानना चाहिये । ( ३ ) नीलमेह -- जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण चाष ( नीलकण्ठ ) पक्षी के पंख के समान नीले रंग का एवं अम्ल मूत्र त्याग करता है, उसे 'नी मेह' का रोगी समझना चाहिये । ( ४) रक्तमेह – जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण दुर्गन्धयुक्त, नमकीन, गरम एवं लाल रंग का मूत्र त्याग करता है, उसको रक्तमेह का रोगी समझना चाहिये । ( ५) मंजिष्ठामेह - जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण मंजीठ के समान या ताम्बे के रंगवाला, दुर्गन्धयुक्त, मात्रा में बहुत, बार- बार मूत्र त्याग करता है, उसको मंजिष्ठामेह का रोगी समझना चाहिये । ( ६ ) हारिद्रमेह - जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण हल्दी के पानी के समान पीला, एवं कडुवा मूत्र त्याग करता है, उसको हारिद्रमेह का रोगी समझना चाहिये । इस प्रकार से पित्तप्रकोप के कारण होनेवाले छः प्रमेहों का वर्णन- कर दिया ॥ २६-३२॥ रूक्ष -कटु -कषाय-तिक्तक- लघु - शीत व्यवाय व्यायाम -वमन विरेचना- स्थापनशिरोविरेचनावियोग-संधारणानशनाभिघातातपोद्वेग-शोक -शोणि-ताविक जागरण विषम -शरीरन्यासानुपसेव मानस्य तथात्मकशरीरस्यव वायुः प्रकोपमापद्यते । स प्रकुपितस्तथात्मके शरीरे बिसर्पन् या समादाय मूत्रवद्दानि स्रोतांसि प्रतिपद्यते, तदा वसामे हमभिनिर्वर्तयति या पुनर्मज्जनं मूत्र स्वावाकर्षति, तदा मज्जमे इमभिनिर्वर्तयति यदा afrat मूत्राशयेऽभिवहन्मूत्रमनुबन्धं च्योतयति लसीकातिबहुत्वाद्वि- क्षेपणाच्च बायोः खल्वस्यातिमूत्रप्रवृत्तिसङ्गं करोति, तदा स मत्त इव गजः क्षरत्यजनं मूत्रमवेगं तं इस्तिमेहिनमाचक्षते; ओजः पुनर्मधुर-स्वभावं तथदा रौक्ष्याद्वायोः कषायत्वेनाभिसंसृज्य मूत्राशयेऽभिवहति । मधुमेहं करोति ॥ ३३ ॥

वानिमचतुरः प्रमेहान् वातजानसाम्यानाचक्षते भिषजः महात्य- त्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच । तेषामपि च पूर्वषद् गुणविशेषेण नामवि-

पृष्ठ 462

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४४४ चरकसंहिता [अ० ४ शेषा भवन्ति । तद्यथा - वसामेहश्य, मज्जमेहम्य, हस्तिमेह, मधुमे हश्चेति ॥ ३४ ॥

वातज मेह के कारण - रूक्ष, कटु, कषाय, तिक्त, लघु, शीत पदार्थों के उप- योग से स्त्रीसंग, व्यायाम, वमन, विरेचन, बस्तिकर्म और शिरोविरेचन इनके अतियोग से, वेगों को रोकना, अनशन ( उपवास ), चोट लगने से, धूप, शोक, उद्देग, रक्त के अधिक निकलने से, जागने मे, शरीर को विषम अवस्था में रखने से, वातप्रकृतिवाले पुरुष में वायु तत्काल प्रकुपित हो जाता है । ( १ ) वसाप्रमेह की सम्प्राप्ति - इन कारणों से कुपित वायु, बात प्रकृति वाले मनुष्य के शरीर में फैलता हुआ जब बसा के साथ मिलकर मूत्रवह स्रोतों- में पहुंच जाता है, तब वसामेह को उत्पन्न करता है । ( २ ) मजमेह - और जब वायु मजा को मूत्रबस्ति में खींचकर ले जाताहै उस समय ' मेह' उत्पन्न होता है । ( ३ ) इस्तिमेह ---जिस समय वायु लसीका ' से मिल कर मूत्राशय में जाकर मूत्र रूप से बाहर निकलता है, उस समय लसीका की अधिकता एवं वायु की विक्षेपण शक्ति के कारण मूत्र बहुत अधिक मात्रा में आता है । तब पुरुष मस्त हाथी के समान निरन्तर वेग से रहित मूत्र बहाया करता है, इसको 'हस्तिमेह' कहते हैं । ( ४ ) मधुमेह - शरीर में स्थित ओज का स्वभाव मधुर है । इस के साथ वायु का रूक्ष एवं कषाय गुण ( वायु अपनी शक्ति से ओज को कषाय में बदल देता है ) मिलकर जब मूत्राशय में जाता है, तब ' मधुमेह' रोग उत्पन्न होता है । सब वातजमेद असाध्य - वैद्य लोग इन चार वातजन्य प्रमेहों को असाध्य मानते हैं । क्योंकि मजा आदि सार रूप धातुओं का क्षय हो जाता है और चिकित्सा विपरीत पड़ती है, क्योंकि वायु के लिये स्निग्ध आदि पदार्थ पथ्य हैं, यही मेद के लिये अपथ्य और जो रूक्ष आदि मेद के लिये पथ्य हैं वह वायु के

लिये अपथ्य हैं । इनके भी नाम पूर्व की भाँति गुणविशेष को लेकर हैं ।

यथा -- १. वसामेह, २. मध्यमेह, ३. हस्तिमेह और ४. मधुमेह ॥ ३३-३४ ॥

तत्र श्लोका बातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति - वातप्रमेहों को विशेष रूप से कहने के लिये ये निम्नलिखित श्लोक हैं- १ सीका का अर्थ मांस की त्वचा के अन्दर रहने वाले जकीय भाग जैसा कहेंगे-' यम्मांसत्वगन्तरे उदकं तलसीकाशम्यं कभते ।

पृष्ठ 463

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०४ ] निदानस्थानम् ४४५

बसामिश्रं वसाभं च मुहुर्मेहति यो नरः ।

वसामेहिनमाहुस्तमसायं वातकोपतः ॥ ३५ ॥

मज्जानं सह मूत्रेण मुहुर्मेहति यो नरः मज्जमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ३६ ॥

हस्ती मत्त इवाजत्र' मत्रं क्षरति यो भृशम् ।

हस्तिमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वात कोपतः ॥ ३७ ॥

कषायमधुरं पाण्डु रूक्षं मेहति यो नरः ।

कोपादाभ्यं तं प्रतीयान्मधुमेहिनम् ॥ ३८ ॥

इत्येते चत्वारः प्रमेहा वातप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३६ ॥

( १ ) वसामेह -जो मनुष्य वात के प्रकोप के कारण वसामिश्रित या सा के समान रंगवाला मूत्र बार- बार करता है, उसको वसामेह का रोगी जानना चाहिये, यह रोग असाध्य है । ( २ ) मजमेह -जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मज्जा से युक्त मूत्र बारबार त्याग करता हो, उसको मज्जमेह का रोगी जानना चाहिये । यह भी रोग असाध्य है । ( ३ ) इस्तिमेह -जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मस्त हाथी की भांति एक -समान मूत्र, निरन्तर और बहुत अधिक करता है, उसको हस्तिमेह का रोगी कहते हैं, यह भी असाध्य है । ( ४ ) मधुमेह– जो मनुष्य वायु के प्रकोप से कषाय, मधुर, पाण्डुवर्ण और रूक्ष मूत्र त्याग करता है उसको मधुमेह का रोगी जानना चाहिये । यह भी असाध्य है । ये चार प्रमेह वायु के प्रकोप के कारण होते हैं ॥ ३५-३६ ॥ त एवं त्रिदोषप्रकोपनिमित्ता विंशतिः प्र हा व्याख्याता भवन्ति ४० इस प्रकार से तीनों दोषों से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण बीस प्रकार के प्रमेहों का वर्णन कर दिया है ॥ ४० ॥

त्रयस्तु दोषाः प्रकुपिताः प्रमेहानभिनिर्वर्तयिष्यन्त इमानि पूर्व-रूपाणि दर्शयन्ति । तद्यथा -जटिलीभावं केशेषु, माधुर्यमास्ये, करपा- दयोः सुप्तवादाहो, मुखतालुकण्ठशोषं, पिपासां, आलस्य, मलं च काये, कायच्छिद्र धूपदेहं परिवाई, सुप्ततां चाङ्गेषु षट्पद- पिपीलिकाभि शरीरमूत्राभिसरणं, मूत्रे च मूत्रदोषान्.3 विस्र शरीरगन्धं, तन्द्रां च कालमिति ॥ ४१ ॥

1 का पूर्वरूप तीनों दोष कुपित होकर प्रमेह रोग को उत्पन्न करते समय ये पूर्वरूप दिखाई देते हैं । यथा -वाकों का उस जाना,

पृष्ठ 464

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४४६ चरकसंहिता [ अ०४ सुख में मिठास, हाथ-पांव में शून्यता और जरून, मुख, बाहु और कण्ठ मैं शुष्कता, प्यास का लगना, आलस्य, कार्य करने में अनिच्छा, शरीर में मल का जमना, शरीर के रोम छिद्रों का बन्द हो जाना, अंगों में जलन एवं शून्यता, शरीर या मूत्र पर भौंरों या चिउंटी का चखना, मूत्र में मूत्र के दोष शरीर से दुर्गन्ध आना, तथा हर समय आंखों में नींद या तन्द्रा ( भारीपन ) रहता है ॥ ४१ ॥

उपद्रवास्तु खलु प्रमेहिणां - तृष्णावीसार- ज्वरदाह- दौर्बल्यारोच- विपाकः पूति-मांस- पिडकाळजी विद्रध्यादयश्च तत्प्रसंगाद्भवन्ति॥ ४२॥

तत्र साध्यान् प्रमेहान् संशोधनोपशमनैर्यथाईमुपपादयंश्चि-कित्सेदिति ॥ ४३ ॥

प्रमेह के उपद्रव - प्रमेह के रोगियों में ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं । यथा- तृष्णा, प्यास, अतिसार, ज्वर, दाह, दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, अपचन, मांस में दुर्गन्धयुक्त पिकायें, अलजी, विद्रधि आदि ये सब उपद्रव प्रमेह के कारण होते हैं । चिकित्सा इन सब प्रमेहों में जो प्रमेह साध्य हों, उनकी यथायोग्य रीति से संशोधन या सामनविधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४२-४३ ॥

भवन्ति चात्र– गृभुमभ्यवहार्येषु स्नानचङकमणद्विषम् ।

प्रमेहः क्षिप्रमभ्येति नीडद्रुममिवाण्डजः ॥ ४४ ॥

मन्दोत्साह मतिस्थूलमतिस्निग्धं महाशनम् ।

मृत्युः प्रमेहरूपेण क्षिप्रमादाय गच्छति ॥ ४५ ॥

यस्त्वाहारं शरीरस्य धातुसाम्यकरं नरः ।

सेवते विविधाश्चान्याश्चेष्टाः स सुखमश्नुते ॥ ४६ ॥

प्रमेह किसको होता है- घोंसले की ओर जिस प्रकार पक्षी जल्दी पहुंच जाता है, उसी प्रकार खाने-पीने के लालची, स्नान एवं चलने-फिरने से द्वेष करने वाले पुरुष को प्रमेह बहुत शीघ्र लग जाता है । मन्द उत्साहबाले निरुत्साही, अतिस्थूल, अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाले एवं बहुत खाने वाले पुरुष को मृत्यु प्रमेह रूप लेकर चली आती है । जो मनुष्य शरीर के धातुओं को समान करने वाले आहार तथा अन्य प्रकार की चेष्टाओं ( बिहार ) का सेवन करता है, वह सुख भोगता है ॥ ४४-४६ ॥

तत्र लोकाः- हेतुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम् ।

दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 465

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निदान

· दशश्लेष्मकता यस्मात्प्रमेहाः षट्च पिसजाः ।

यथा करोति वायु प्रमेहश्चतुरो बली ॥ ४८ ॥

साध्यासाध्यविशेषाञ्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः ।

प्रहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ ४६ ॥

इस प्रमेह- अध्याय में हेतु, व्याधि, प्रमेहों के कारण, दोष एवं दूष्य का वर्णन, इनके नाना रूप, दस प्रकार कफजन्य, छः प्रकार के पितजन्य और चार प्रकार के वातजन्य प्रमेह, उनके साध्य असाध्य मेद, प्रमेहों के पूर्वरूप, उपद्रव और क्रियासूत्र ये सब विषय कह दिये हैं । ४७-४१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने प्रमेह- निदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पञ्चमोऽध्यायः अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ।हस्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके आगे कुष्ठनिदान का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२ ॥

सप्त द्रव्याणि कुष्टानां प्रकृति- विकृतिमापन्नानि भवन्ति । तद्यथा- यो दोषा बातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपणविकृताः । दूष्याश्च शरीरधात-वस्त्वङ्-मांस- शोणित -लसांकाश्चतुर्धा दोषोपघातविकृताः इत्येतत्सप्तानां सप्तधातुकमेवंगतमाजननं कुष्ठानाम्, अतः प्रभवाण्यभिनिर्वर्तमानानि केवळं शरीरमुपतपन्ति ॥ ३ ॥

शरीर के अन्दर सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग के कारण बनते हैं । यथा - प्रकोपकारक पदार्थों के संयोग से बात, पित्त और कफ ये तीन दोष विकृत होकर, त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चार दृष्य ( धातु तथा उप-धातुओं ) को अपने संसर्ग से विकृत करते हैं । इस प्रकार से ये सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग को उत्पन्न करते हैं । ' इन सातों धातुओं से उत्पन्न १. वीसर्प और कुष्ठ रोग में दोष और दूष्य एक समान ही हैं । इस समानता पर भी वीसर्प फैलाने वाला तथा रक्त का प्रधान दोष इसमें रहता है । अकेकी और सब चिकित्साओं के समान है । रक्तजन्य कण्डू, पूय, स्व - शून्यता, पसीने का न आना होता है जो बीच में मेद है ।

पृष्ठ 466

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चरकसंहिता [अ०५ कुष्ठ सात धातुओं में अपना प्रभाव प्रकट करता हुआ सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है ॥ ३॥

न च किंचिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तं, अस्ति तु खलु समान- प्रकृतीनामपि सप्तानां कुष्ठानां दोषांशांश विकल्प- स्थान- विभागेन वेदना-वर्ण संस्थान-प्रभाव -नाम- चिकित्सित विशेषः ॥ ४ ॥

कोई भी कुष्ठ एक दोष के प्रकोप से उत्पन्न नहीं होता । सातों प्रकर के कुष्ठों में प्रकृति के समान होने पर दोष, अंश, बल, विकल्प तथा स्थान मेद से, वेदना, १ रंग, स्थिति, प्रभाव एवंनाम से चिकित्सा में मेद आजाता है ॥ ४ ॥

स सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसंख्येयविधो वा भवति । दोषा हि विकल्पनैर्विकल्प्यमाना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभा-वात्; तेषां विकल्प - विकार-संख्यानेऽतिप्रसंगमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव कुष्ट विशेषमुपदेक्ष्यामः ॥ ५ ॥

इस प्रकार से कुष्ठ सात प्रकार का, अठारह प्रकार का अथवा असंख्य प्रकार का हो जाता है । कुष्ठ के सात भेद -दोष अनेक प्रकार की विकल्पनाओं के कारण भिन्न व्याधि, होतेकरणहुएऔरनानादोषप्रकारइनकेसेभेदनानासे कार्यरूपरोग उत्पन्नव्याधि कर भीदेते बहुतहैं । सेअर्थात्द होजाते हैं । इसलिये दोषभेद से उत्पन्न भेदों को असाध्य भेद में नहीं गिना जाता । अतः इन कुष्ठों के भेदों की गणना को बहुत विस्तृत जान कर यहां पर केवल सात प्रकार के कुष्ठों का उपदेश करेंगे ॥ ५॥

धिकतरेइह वातादिषुकापालकुष्ठमभिनिर्वर्ततेत्रिषु प्रकुपितेषु, पित्तेत्वगादींश्चतुरःत्वौदुम्बरं, प्रदूषयत्सुमणिमण्डल-वाते- कुष्ठं, वातपित्तयो यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, श्लेष्ममारुतयोः सिम, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; इत्येवमेष सप्तविधः कुष्ठविशेषो भवति ॥ ६ ॥

स चैष भूयस्तरमतः प्रकृतौ विकल्प्यमानायां भूयसीं विकारवि- कल्पसंख्यामापद्यते ॥ ७ ॥

१. वेदनाविशेष—-कापालं सोदबहुलम् । वर्णविशेष- काकणन्तिकाव कापाठःसंस्थान -, ष्यविहासंस्थानम्उदाहरण हैं ॥ प्रभाव - साध्यताऽसाध्यतादि । नामविशे

पृष्ठ 467

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निदानस्थानम् ४४९अ०५] २६ वातादि दोष के अनुसार कुष्ठ -यात आदि तीनों दोष प्रकुपित होकर जब स्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चारों को दूषित करते हैं, तब कुष्ठ- रोग उत्पन्न होता है । इनमें बात की अधिकता से कापालकुष्ठ, पिच की अधिकता से औदुम्बर-कुष्ठ, कफ की अधिकता से मण्डल- कुष्ठ, वात -पित्त की अधिकता से यह कुष्ठ, पित्त-कफ की अधिकता से पुण्डरीक कुष्ठ, कफ- वायु की अधिकता से सिध्म- कुष्ठ होता है और सब दोषों की वृद्धि होने से काकणक-कुष्ठ उत्पन्न होता है । इस प्रकार से सात कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । यो सात प्रकार के कुष्ठ प्रकृति के तर- तम अर्थात् न्यूनाधिक मेद के कारण नाना प्रकार के कुष्ठों के असंख्य मेद उत्पन्न कर देते हैं ॥ ७॥

तत्रेदं सर्व कुष्ठ निदानं समासेनोपदेश्यामः । शीतोष्णव्यत्यासमननु- पूर्योपसेवमानस्तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं च, मधु-का-णित मत्स्य -मूल- काकमाचीश्च सततमतिमात्र मध्य जीर्णेऽन्ने समभवचि लिचि च पयसा,हायनक यवक चीनकोद्दालक -कोरदूषप्रायाणि चान्नानि क्षीर- दधि-तक्र -कोल- कुलत्थ माषातसी- कुसुम्भ -परुष -स्नेहवन्ति, एतैरेवा- तिमात्रं सुहितभक्षितस्य च व्यवाय व्यायाम संतापानत्युपसेवमानस्य, अतिभय श्रम संतापोपहतस्य च सहसा शोतोदकमवतरतो, विदग्धं चाss हारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दि च प्रतिघ्नतः, स्नेहांश्चातिचरतो युगपत् त्रयो दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, त्वगादयश्चत्वारः शथिल्यमापद्यन्ते तेषु शिथिलेषु त्रयो दोषाः प्रकुपिताः स्थानमभिगम्य संतिष्ठमानास्तानेव स्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ८ ॥

कुष्ठ रोग के कारण अब संक्षेप से सब कुष्ठों का निदान कहते हैं । शीत और उष्ण के परिवर्तन से, शीत और उष्ण के परित्याग से ( अर्थात् उष्ण सेवन करके सहसा शीत सेवन या इसके विपरीत तथा अनुचित काल में शीतोष्ण सेवन से ), संतर्पण एवं अपतर्पण दोनों के उलट फेर से, मधु, फाणित ( राय ), मछली, मूली, काकमाची ( मकोय ), इनके निरन्तर या अधिक मात्रा में खाने से, अजीर्ण में भोजन करने से, दूध के साथ चिलचिम-मछली के उपयोग से, हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, कोद्रव आदि कुधाम्यों के बहुत खाने से, दूध, दही, छाछ, बेर, कुलथी, उड़द, अलसी, धनिया, इनके तेल मैं तैयार किये पदार्थों के अतिसेवन से, मैथुन, व्यायाम और सन्ताप के करने से, भय, भ्रम और सन्ताप से युक्त होने पर एकदम ठण्डे पानी से ( ठण्डी बायु के स्पर्श से भी ), विदाहकारक पदार्थों का बर्मन

पृष्ठ 468

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४५० चरकसंहिता [अ०५ न करके पुनः विदाहकारक पदार्थों के खाने से; यमन के वेग को रोकने से, स्निग्ध पदार्थों के अति भोजन से, तीनों दोष एक साथ में कुपित होजाते हैं, तथा त्वचा, रक, मांस और कसीका चारों धातु शिथिक होजाते हैं । इन शिथिल हुए धातुओं में कुपित हुए दोष किसी एक भाग में स्थान पाकर घर कर लेते हैं । वहां पर रहकर त्वचा आदि को दूषित मनाकर कुष्ठरोग उत्पन्नः करते हैं || तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि । तद्यथा—अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमविश्लक्ष्णता वैवण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्णायनं गौरवं श्वयथुर्विसर्पागमनमभीक्ष्णं कायचिद्ध- द्वेषूपदेहः पक-दग्ध -दष्ट-क्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ६ ॥

- कुष्ठरोग के पूर्वरूप ये हैं— जैसे पसीने का सर्वथा न आना या बहुत पसीना आना, त्वचा में कर्कशता या कठोरता, अथवा बहुत चिकनापन, रंग परिवर्तन, खाज, सूई चुभने की सी वेदना, स्पर्शज्ञान की शून्यता, जलन, रोमांच, हर्ष, रूक्षता, उष्णता, भारीपन, सूजन, वीसर्प रोग का होना, शरीर के छिद्रों में बार बार लेप सा होना, अवरोध, पकने या जलने या कटने या चोट लगने या गिरने पर बहुत दर्द होना, थोड़े से व्रण का भी संक्रान्त होना या शीघ्र न भरना, ये कुष्ठ के पूर्वरूप हैं ॥६ ॥

तेभ्योऽनन्तरं कुष्ठानि जायन्ते । तेषामिदं वेदना- वर्ण -संस्थान- प्रभाव -नाम-विशेष -विज्ञानं भवति । तद्यथा-रूक्षारुणपरुषाणि विष- विसृतानि खरपर्यन्तानि तन्न्युद्वृत्तबहिस्तनूनि सुप्त सुप्तानि हृषितलो- माचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डू दाह- पूय-लसीकान्याशुगतिसमु- त्यानान्याश भेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कापालकुष्ठा- नीति विद्यात् ॥ १० ॥

उनके पीछे कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । इसके आगे इनके वेदना, वर्ण, संस्थान, प्रभाव, नाम विशेष वर्णन करते हैं । कापाल कुष्ठरूक्ष, अरुण वर्ण, कर्कश, विषम, फैला, तथा किनारों पर खरखर, बाह्य पार्श्व से पतला तथा थोड़ा उभरा हुआ, पतला, फैला, खोये हुये के समान सोया, बहरा ( स्पर्थशान शून्य ), रोमांच सहित अतिशय चुमने की वेदनावाडे, थोड़ी, खाज, दाह, पूय, खसीका युक्त; शोभता उत्पन्न होनेवाले, शीघ्र फटनेवाले, कीनेवाले, काले लाल, कपाल वर्ण

को ' कापाड कुष्ठ' कहते हैं । कपाल-मिट्टी का ठोकरा, उसके समान ॥ १

पृष्ठ 469

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निदानस्थानम ४५१ व्याणि ताम्र -सर-रोम- राजीमिश्वनद्वानि बहसानि बहुबद्दल- रक्त-पू-लसीकानि कण्डू-क्लेव- कोथ-दाह-पाकयन्त्याशमतिसमुत्थानभे- दीनि ससंतापक्रमीणि पकोदुम्बरफलवर्णाम्युदुम्बरकुटानीति वि- चात्॥ ११ ॥

उदुम्बर -कुष्ठ--जो कुष्ठ ताम्बे के समान या ताम्बे के समान रंगवा तथा कर्कश रोमवाले; बहुत रक्त- पूय और लसी का से युक्त, जिन मैं खाज, क्लेद ( साब ), कोथ ( गलना ), दाह एवं पाक हो, शीघ्रता से उत्पन्न होनेवाले एवं पकनेवाले, जिनमें ताप एवं कृमि हों, जिनका रंग पके हुए गूलर के समान हो उनको ' उदुम्बर कुष्ठ ' जानना चाहिये ॥ ११ ॥

स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्ररा- वभासानि शुक्ररामराजीसन्तानानि बहुल- बद्दल-शुक्र -पिच्छिल स्त्रावाणि बहु- द -कण्डू- कृमीणि सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डल- कुष्ठानीति विद्यात् ॥ १२ ॥

मण्डल कुष्ठ –जो कुष्ठ स्निग्ध, भारी, ऊंचाईवाले, चिकने, स्थिर, किनारों से मोटे, सफेद या लाल रंग के, सफेद बालों ( रोम ) से व्यास, जिनमें बहुत, गाढ़ा एवं सफेद तथा चिकना स्राव होता हो, जो बहुत स्राव, खाज तथा कृमि से युक्त हों, जिनकी गति और उत्पत्ति धीरे २ होती हो, जिनका आकार चक्र के समान गोलाकार हो, उनको ' मण्डलकुष्ठ' कहते हैं ॥ १२ ॥

परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तःश्यावानि नील -पीत -ताम्रावभासान्या- शुगतिसमुत्थानान्यल्प कण्डू- द-कमीणि दाह- भेद-निस्तोद -पाक-बहुला-नि शूकोपहतोपमानवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपर्यन्तानि कर्कशपिडका-चितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्नानीति विद्यात् ॥ १३ ॥

ऋष्वजिह कुष्ठ - जो कुष्ठ बाहर के पार्श्व में खर्खर तथा लाल रंग के, अन्दर से काले रंग के, जिनमें नीले, पीले, ताम्बे के रंग की सांई दीखती हो, जो कि शीघ्रता से बढ़ते या उत्पत्ति वाले हों, जिनमें कण्डू, कृमि और क्लेद कम हो, जिनमें दाह, फटना, वेदना तथा पाक बहुत हो, जिनमें शूक ( जल शूक, कृमि ) के लगने के समान पीड़ायें हों, बीच से उठे हुए न हों, किनारों से पतले, स्पर्शवाली फुन्सियों द्वारा चारों ओर से घिरे हों, बड़े २ चकेवाले जीम के समान आकृतियाले कुष्ठों को ऋष्यजिह्वकुष्य जानना ॥ १३ ॥

पृष्ठ 470

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४५२ चरकसंहिता [अ०५ शुक्ररक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रतराजीसंतवान्युत्सेभवन्ति बहु -बल -रक्त- पू-लसीकानि कण्डू कृमि- दाह-पाकवन्स्याशुगतिसमुत्था- नभेदीनि पुण्डरीकपलाशसंकाशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात् ॥ १४ ॥

पुण्डरीककुष्ठ - सफेद या लाल रंग की चमक वाले, किनारों पर लाळ, लाल रोम ( बालों ) से व्यास, त्वचा से ऊपर उठे हुए न हों, गाढ़ी पूय (पीप), रक्त एवं लसीका बहुत हो, खाज, कृमि, दाह और पाकयुक्त, जल्दी बढ़ने एवं उत्पन्न होने वाले, शीघ्रमेदी, कमल के पत्तों के समान आकारवाले कुष्ठों को 'पुण्डरीक कुष्ठ ' कहते हैं ॥ १४ ॥

परुषारुणविशीर्णबहिस्त नून्यन्तःस्निग्धानि बहून्यल्पवेदनान्यल्प-क- -दाह- पू-लसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबु-पुष्प -संका-शानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात् ॥ १५ ॥

सिध्मकुष्ठ --जो कुष्ठ बाहर से कठिन, लाल वर्ण, किनारों से कटे -फटे, अन्दर से स्निग्ध, जिनमें सफेद या लाल रंग की चमक हो, जो कि बहुत अधिक हो जिनमें पीड़ा कण्डू, दाह, पूय, लसीका कम हो, जिनकी उत्पत्ति धीरे- धीरे हो, जो अल्पभेदी हों, जिनमें कृमि थोड़े हों और जिनका रंग दूधिया, घीया कद्दू के फूल के समान हो उनको ' सिध्म कुष्ठ' कहते हैं ॥ १५॥

काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्सर्व कुष्ठ-लिङ्ग समन्वितानि पापीयसा सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसा- ध्यानि साध्यानि पुनरितराणि ॥ १६ ॥

काकणक·कुष्ठ-जिन कुष्टों का रंग प्रथम लाल रती के समान हो और पीछे से उनमें सम्पूर्ण कुष्ठों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, उनको ' काकणक कुछ कहते हैं । ( इनमें अनेक रंग उत्पन्न हो जाते हैं, ) ये कुष्ठ पापी मनुष्यों को होते है । इनमें सब कुष्ठों के लक्षण होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १६ ॥

तत्र यदसाध्यं तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किंचित्साध्य-तामतिवर्तते कदाचिदपचारात् । साध्यानीह षद् काकणकवन्य- चिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दाषैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति १७ साम्य असाध्य भेद - इन कुष्ठों में से कुछ कुष्ठ साध्य हैं, और कुछ कुष्ठ असाध्य हैं, वे कभी अच्छे नहीं होते । परन्तु जो साध्य हैं, वे अपचार और मिथ्या आहार- विहार के कारण असाध्य होजाते हैं । काकणक· कुष्ठ को छोड़कर शेष छः कुष्ठ भी चिकित्सा के न करने से अथवा दोषों के बढ़ असाध्य होजाते हैं ॥१७॥