चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 471–480
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 471–480
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अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५३ साध्यानामपि अपेक्ष्यमाणानामेषां स्व -मांस -शाणित-लसीका -को- थ- द - स्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति । ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषाच पुनदूषयन्त इमानुपद्रवान् पृथक्पृथगुत्पादयन्ति । साध्य कुष्ठों में भी उपेक्षा करने से त्वचा, मांस, रक्त, लसीका में सड़ना, स्राव और पसीने से कीड़े उत्पन्न होजाते हैं । ये कृमि त्वचा आदि को खाते हैं, और बात आदि दोष और अधिक दूषित होकर नीचे लिखे उपद्रवों को पृथक् पृथक् रूप में उत्पन्न करते हैं । तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपि च रौक्ष्य -शूळ-शोष -तोद -वेपथु-व्यथा- हर्ष- संकोचाऽऽयास स्तम्भ- सुप्ति- भेद-भङ्गान्, पित्तं पुनर्दाह -स्वेद- क्लेद- कोथ- कण्डू- स्नाव-पाक- रागान् " श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्य-शैत्य- स्थैर्य- कण्डू-गौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, कृमयस्वगादींश्चतुरः शिराः स्नायूनि मांसान्यस्थीन्यपि च तरुणानि खादन्ति ॥ १८ ॥
अस्यामवस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं सुशन्ति । तद्यथा -प्रस्रवण-मङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णा ज्वरातो सार- दाह -दौर्बल्यारोचका-विपाकाच, तद्विषमसाध्यं विद्यादिति ॥ १६ ॥
उपद्रव - वायु के कोप के कारण रंग लाल, काळा, कर्कशता, रूक्षता, शूल चुमने की सी वेदना, बींधने का सा अनुभव, रोमांच, हर्ष, कम्प, संकोच, श्रम, स्तम्भ, अंग का सो जाना, भेदन या भंग अर्थात् अंगों का टूटना -ये उपद्रव होते हैं । पित्तप्रकोप के कारण दाह, पसीना, क्लिन्नता, सड़ना, खाज, साब, पकना इत्यादि उपद्रव होते हैं । कफ के प्रकोप के कारण, श्वेत वर्ण, शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकास, उपलेप होना ये-उपद्रव होते हैं । इस प्रकार से उत्पन्न कीड़े त्वचा आदि चार धातुओं को तथा शिरा, स्नायु, मांस एवं कोमल अस्थियों ( जैसे नाक की कोमल अस्थि ) को खाने लगते हैं । इस अवस्था में कुष्ठरोगी को निम्न लिखित उपद्रव घेर लेते हैं । यथा-खान का बहना, अंगों का फटना या टूटना, अंगों का गिरना, तृष्णा, ज्वर, अतिसार, दाह, निर्बलता, अरुचि, अविपाक ये उपद्रव होते हैं । इस अवस्था में रोग असाध्य हो जाता है ॥ १८-१६ ॥
चान - साध्योऽयमिति यः पूर्व नरो रोगमुपेक्षते ।
स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥ २० ॥
यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु च ।
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४५५ ersसंहिता [ अ० ६ भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते ॥ २१ ॥
यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः ।
स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २२ ॥
एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते:सुखम् ।
विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ २३ ॥
जो मनुष्य रोग के आरम्भ में 'साध्य' हे ऐसा समझ कर उपेक्षा कर देता है. वह थोड़े समय पीछे ही मुर्दा होकर ( असाध्यावस्था में आकर ) ही चेतता है, और रोग के असाध्य होने पर ही उसकी नींद टूटती है । जो मनुष्य-रोग के आक्रमण से पूर्व ही या रोग की नवीन अवस्था में ही औषध उपचार कर लेता है, वह देर तक सुख ( जीवन ) का उपभोग करता है । जिस प्रकर थोड़े से परिश्रम से ही छोटा वृक्ष काटा जा सकता है, वही वृक्ष बड़ा होने पर बहुत परिश्रम से कटता है, इसी प्रकार नवीन अवस्था में रोग भी सुगमता से अच्छा हो जाता है और यही रोग बढ़ने पर कठिनाई से अच्छा होता है, अथवा असाध्य रूप में बदल जाता है ॥२०- २३ ॥
तत्र श्लोकाः–संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वलक्षणम् ।
रूपाण्युपद्रबाश्वोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक्॥ २४ ॥
इस कुष्ठनामक अध्याय में कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, हेतु, दोष, पूर्वरूप, और उपद्रव ये सब विषय पृथक् पृथक् कह दिये हैं ॥ २४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब घोष के निदान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥ इह खलु चत्वारि शोषस्याऽऽयतनानि । तद्यथा - साहस, संघ क्षयो, विषमाशनमिति ॥ ३ ॥
घोष रोग के चार कारण होते हैं जैसे –( १ ) साहट, ( २ ) सम्
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अ०६ ] निदानस्थानम् ( मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना ), ( ३ ), ( ४ ) विषमाशन४५५ ( विषम गुणों वाले अन्नों का भोजन करना ), ॥ ३ ॥
तत्र यदुकं साहसं शोषस्याऽऽयतन मिति तदनुव्याख्यास्यामः -पदा पुरुषो दुर्बलो हि सम् बलवता सह विगृद्वाति, अतिमहता वा धनुषा व्यायच्छवि, जल्पति वाऽप्यतिमात्रं, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु बा सवते चातिदूरं, उत्सादनपदाघातने वाऽतिप्रगाढमासेबते, अति- प्रकृष्टं वाऽण्वानं द्रुतमभिपतति, अभिहन्यते वाऽन्यद्वा किंचिदेवंविधं विषममतिमात्रं वा, व्यायामजातमारभते; तस्यातिमात्रेण कर्मणा उरः क्षण्यते ॥ साहस शोषरोग का कारण है, यह जो कहा है, इसकी व्याख्या करेंगे- जब कोई दुर्बल पुरुष अपने से बलवान् व्यक्ति के साथ कुश्ती आदि करता है, बहुत बड़े धनुष को तानता है, अथवा बहुत अधिक बोलता है, बहुत अधिक बोझ को उठाता है, पानी में बहुत तैरता है, बहुत ऊंचा लम्बा कूदता है, जोर से भूमि पर पांव पटकता है, या बहुत लम्बे या कठिन रास्ते को बहुत तेज़ो से पार करता है, अथवा ऊंचे- नीचे या किसी भारी दुःसह कार्य द्वारा चोट खाता है या और कोई ऐसा ही विषम या बहुत अधिक व्यायाम करता है अथवा आरम्भ किये कार्य को बहुत अधिक करता है; इससे उस की -छाती फट पड़ती है । तस्योरःक्षतमुपलबते वायुः, स तत्रावस्थितः श्लेष्माणमुरःस्थमुपसं- सृज्य शोषयत् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च । योंऽशस्तस्य शरीरसंधीना- विशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्चोपजायते, यस्त्वामाशयमभ्युपैति तेनास्य वर्षो भिद्यते यस्तु हृदयमाविशति तेन रोगा भवन्त्युरस्याः, यो रसनां तेनास्यारोचकञ्च यः कण्ठं प्रपद्यते, कण्ठस्तेनोद्ध्वंस्यते स्वरश्चावसीदति यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्या--यवोपजायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते ॥३ ॥
इन धावों में वायु प्रवेश कर जाता है । वायु प्रवेश करके छाती में स्थित कफ के साथ मिलकर इसको सुखाकर ऊपर, नीचे या तिर्यक् दशा में स्वयं -गमन करने लगता है । इस वायु का जो अंश शरीर की सन्धियों में जाता है, जम्भाई, अंगों का टूटना और ज्वर उत्पन्न हो जाता है और जो अंथ ! मैं पहुँचता है उससे मढ पतका जाता है, जो भाग हृदय में पहुँचता }हृदय ( छाती ) मैं अन्य रोग होते हैं । जो जीभ में पहुँचता है उससे
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४५६ चरकसंहिता १०६ अरुचि, जो भाग कण्ठ में पहुँचता है, उससे कण्ठ नष्ट होता तथा स्वरभंग हो जाता है, जो भाग प्राणवह स्रोतों में पहुँचता है उससे श्वास और प्रतिश्याय उत्पन्न होते हैं और जो भाग शिर में पहुंचता है उससे शिरोरोग होता है ॥३॥
ततः क्षणनाच्चैबोरसो विषमगतित्वाच वायोः कण्ठस्य चोदनं-सनात्कासः सततमस्य संजायते स कास प्रसंगादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितागमाचास्य दौर्गन्ध्यमुपजायते, एवमेते साहसप्रभवाः साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य तदनुरूपाणि कर्माण्यारभेत कर्तुं, बलसमाधानं हि शरीरं, शरीर मूला पुरुष इति ॥ ४ ॥
इसके अनन्तर छाती में व्रण होने और वायु की विषम गति होने से तथा कण्ठ के खर्खर बनने से निरन्तर कास ( खांसी ), उत्पन्न हो जाता है । कास के होने से छाती में व्रण बनने से थूक में रक्त आ जाता है, रक्त के आने से दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार से साहस करने वाले पुरुष को साइ से उत्पन्न होने वाले उपद्रव घेर लेते हैं । इन शुष्क करने वाले उपद्रवों से आक्रान्त होकर पुरुष भी धीरे- धीरे सूख जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने बल को देखकर तदनुसार कार्य का आरम्भ करे । बल के कारण ही शरीर अच्छे प्रकार से धारण किया जाता है और शरीर ही पुरुष अर्थात् आत्मा का मुख्य आश्रय है ॥ ४ ॥
भवति चात्र - साहसं वर्जयेत्कर्म रक्षजीवितमात्मनः ।
जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्रुते ॥ ५ ॥
अपना जीवन चाहने वाले पुरुष को साहस के कार्य छोड़ देने चाहिये, क्योंकि जीता हुआ पुरुष ही अपने कर्म का इष्टफल भोग सकता है ॥ ५॥
अथ संधारण शोषस्याऽऽयतनमिति यदुकं तदनुव्याख्यास्यामः-यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तृसमीपे वा गुरोर्वा पादमूळे द्यूतसभमन्यं सत समाजं स्त्रीमध्यं वाऽनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियन् भयात् प्रसंगात् हीमश्वाद् घृणित्वाद्वा निरुणद्धयागतानि वातमूत्रपुरीषाणि, तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमाद्यते । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माण समुदीर्योर्ध्वमास्तिर्यक च विहरति । ततयशिविशेषेण पूर्व वयवविशेषं प्रविश्य शूलं जनयति, मिनन्ति पुरीषमुच्छोष पाइ चातिरुजति अंसौ चावसृद्नाति कण्ठमुरवावधमति
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अ०६ ] निदानस्थानम ४५७ ओपहन्ति, कासं श्वास स्वरं स्वरभेदं प्रविश्यायं चोपजनयति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतेरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत । शरीरं हास्य मूळ, शरीरमूलश्च पुरुषो भवतीति ॥ ६ ॥
भवति चात्र - सर्वमन्यत्परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ।
तदभावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥ इति ॥
( २ ) वेग सन्धारण मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना घोष का कारण है, यह जो कहा है उसकी व्याख्या करते हैं- जिस समय पुरुष राजा के समीप, स्वामी के समीप, गुरु की चरणसेवा में, जुआख़ाने में, अथवा इसी प्रकार दूसरे सज्जन मनुष्यों की सभा में, या स्त्रियों के बीच में घुसकर, या ऊंची- नीची सवारी पर यात्रा करते समय, भय से, प्रसंग से, खासे वा घृणा से वायु मूत्र या मल के उपस्थित वेगों को रोक लेता है, तब उनके रोकने से वायु प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित हुआ वायु, पित्त और कफ को कुपित करके ऊपर-नीचे या तिरछे रूप में बहता है और तब किसी भाग से शरीर के अवयव विशेष में प्रवेश कर के पूर्व की भांति शुल उत्पन्न करता हे, मल का मेदन अथवा घोषण करता है । रोगी के पावों में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को तोड़ सा डालता है, ( कन्धों का आकार बोतल की गर्दन के समान हो जाता है, समकोण नहीं रहता ), कण्ठ और छाती पीड़ित होते हैं, शिर में वेदना होती है । कास, श्वास, ज्वर, स्वरमेद, प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । रोगी भी इन शोषण करनेवाले उपद्रवों से धीरे- धीरे सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपना शरीर जिस प्रकार से सुखी, स्वस्थ रहे, उस प्रकार का विशेष रूप से प्रयत्न करे, क्योंकि जो भी कोई अमूल्य अलभ्य वस्तु है वह शरीर से ही होती है और पुरुष का शरीर ही आधार है । इसलिये और सब कुछ छोड़कर शरीर को रक्षा करनी चाहिये । शरीर के न रहने पर सब वस्तुओं का होना या न होना एक समान है । शरीर के होने पर ही और सब पदार्थ उपयोगी होते हैं ॥ ६-७ ॥ क्षयः शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः – यदा पुरु- | शोक-चिन्ता-परीत-हृदयो भवति, ईष्यत्कण्ठा-भय-क्रोधा- ते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बल- हारोऽल्पाहारो वाssस्ते, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः प्रयमु-
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४५८ चरकसंहिता [अ० ६ पैतिस तस्योपयात्संशोषं प्राप्नोति, अप्रतीकाराचानुवच्यते यक्ष्मणा पक्ष्यमाणरूपेण ॥ ८ ॥
( ३ ) 'क्षय' शोषरोग का कारण है, यह जो पहिले कहा है, उसकी व्याख्या करेंगे - जिस मनुष्य के हृदय में शोक वाचिन्ता, बहुत काम, ईर्ष्या, उत्कण्ठा, भय, क्रोध ( लोभ, मोह ) आदि भाव मन में बहुत प्रवेश कर जायें वा जो कृश होता हुआ फिर रूखे खान-पान का सेवन करे, शरीर से दुर्बल प्रकृति हो कर उपवास या आवश्यकता से न्यून भोजन ले, तब उस के हृदय में रहनेवाला रस ( ओज ) क्षय होने लगता है और इस रस ( ओज ) के क्षय होने से मनुष्य सूखने लगता है और इसका प्रतिकार न करने से पुरुष राजयक्ष्मा
रोग से पीड़ित होता है । जैसा कि आगे उपदेश करेंगे ॥ ८ ॥
यदा वा पुरुषोऽतिप्रहर्षात्प्रसक्तभावः स्त्रीष्वतिप्रसङ्गमारभते, तस्या-तिमात्रप्रसङ्गाद्वेतः क्षयमुपैति । क्षयमपि चोपगच्छति रेतसि यदि मनः स्त्रीभ्यो नैवास्य निवर्त्तते एव । तस्य चातिप्रणीतसंकल्पस्य मैथुनमा- पद्यमानस्य शुक्रं च न प्रवर्तते, अतिमात्रोपक्षीणत्वात्; अथास्य वायु- यच्छमानशरीरस्यैव धमनीरनुप्रविश्य शोणितवाहिनीस्ताभ्यः शोणितं प्रच्यावयति, तच्छक्रक्षयाच्छुक्रमार्गेण शोणितं प्रवर्तते वातानु- सृतलिङ्गम् । अथास्य शुक्रक्षयाच्छोणितप्रवर्तनाथ संघयः शिथिलीम- वन्ति, रौक्ष्यमुपजायते, भूयः शरीरं दौर्बल्य माविशति, वायुः प्रकोप- मापद्यते । स प्रकुपितोऽवशिकं शरीरमनुसर्पन् परिशोषयति मांस- शोणिते, प्रध्यावयति श्लेष्मपिरो, संरुजति पाइ, चावगृह्णात्यसौ, कण्ठमुष्वंसयति, शिरः श्लेष्माणमुपक्लेश्य प्रतिपूरयति श्लेष्मणा संघों प्रपीडयन् करोत्यङ्गमर्दमरोचकाविपाकौ च, पिचश्लेष्मोत्ले- शात्प्रतिलोमगत्वाच्च वायुज्वरं कालं स्वरभेदं प्रविश्यायं चोपजन- यतिः, ततः सोऽप्युपशोषणैरुपद्रवैरुपहतः शनैःशनैरुपशुष्यति । तस्मा- त्पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरमनुरक्षन् शुक्रमनुरक्षेत् । परा होषा फळ- निर्वृत्तिराहारस्येति ॥ ६ ॥
भवति पात्र- आहारस्य परं धाम शुक्रं तद्रक्ष्यमात्मनः ।
धयो हास्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति ॥ १० ॥
शुभ-स - जिस समय पुरुष अति कामवेग के मैं आसक होकर अति सम्भोग आरम्भ कर देता है, उस का
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६ ] निदानस्थानम् ४५६ करने से वीर्य का क्षय हो जाता है । वीर्य के क्षय होने पर भी जब मन श्रीसंग से नहीं हटता और संग करता ही जाता है तब अति प्रचण्ड कामवासना के कारण मैथुन करने पर भी वीर्य उत्पन्न नहीं होता । क्योंकि वीर्यं बहुत अधिक क्षीण हो चुका होता है । इस समय सम्भोग रूप परिश्रम करते हुए वायु रक्तवाहिनी धम- नियों में प्रवेश करके इनसे रक्त बहाने लगता है । तब शुक्र ( वीर्य ) के क्षय से शुक्रमार्ग द्वारा वायु के साथ मिला रक्त बाहर आने लगता है । इस अवस्था में वीर्य के हाथ से तथा रक्त के निकलने से शरीर की सन्धियां शिथिल हो जाती हैं, शरीर में रूक्षता आ जाती है, शरीर और अधिक कमजोर हो जाता है और वायु का प्रकोप हो जाता है । इस प्रकार से प्रकुपित वायु शून्य ( अशक्त ) शरीर में संचार करता हुआ मांस और रक्त को शुष्क कर देता है, कफ और पित्त को बाहर निकालता है, पार्श्वो में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को दबा देता है, गले की बिगाड़ देता है, कफ को कुपित करके शिर को कफ से भर देता है, सन्धियों को पीड़ित करके अंगों में वेदना उत्पन्न करता है, पित्त और कफ को कुपित करके अरुचि एवं अपचन उत्पन्न करता है । वायु की प्रतिलोम गति होने से उबर, कास, श्वास, स्वरमेद और प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं । इस अवस्था में पुरुष घोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होकर धीरे धीरे शुष्क हो जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने शरीर की रक्षा करता हुआ शुक्र अर्थात् वीर्य की रक्षा करे । यही शुक्र ( वीर्य ) आहार का सर्वोत्तम फल होता है ।
आहार का सर्वोत्कृष्ट सार वीर्य है, इसका रक्षण करना परम आवश्यक है ।
इसका क्षय बहुत से रोगों वा मृत्यु का भी कारण होता है ॥६-१० ॥
पुरुषःविषमाशनंपानाशनशोषस्याऽयतनमितिभक्ष्यलेह्योपयोगानयदुक्त, प्रकृतितदनुव्याख्यास्यामः-करण- संयोग -राशि-यदा- देश-कालोपयोग- रसंस्थोपशय- विषमानासेवते तदा तस्य वातपित्त--श्लेष्माणो वैषम्यमापद्यन्ते, ते विषमाः शरीरमनुसृत्य यदा स्रोतसाम- यनमुखानि प्रतिवार्यावतिष्ठन्ते तदा जन्तुर्यद्यदाहारजातमाहरति वच- दस्य मूत्रपुरीषमेवोपजायते भूयिष्ठं नान्यस्तथा शरीरधातुः, स पुरी- षोपष्टम्भाद्वर्त्तयति, तस्माच्छुष्यतो विशेषेण पुरीषमनुरक्ष्यं, तथा दुर्बला, तस्यानाप्याय्यमानस्य विषमाशनोपचिता पृथगुपद्रवैर्युञ्जन्तो भूमः शरीरमुपशोषयन्ति । तत्र बातः - कण्ठोदूध्वंसनं पार्श्वसंरुजनमसाब मर्दनं स्वरभेदं प्रतिश्यायं
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४६० चरकसंहिता [अ० ६ चोपजनयति, पि पुनर्व्वरमतीसारमन्तर्दाहं च श्लेष्मा तु प्रति- श्यायं शिरसो गुरुत्वं कासमरोचकं च । स कासप्रसंगादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते । एवमेते विषमाशनोपचिता दोषा राजयक्ष्माणमभिनिर्वर्तयन्ति । तैरुपशो- रुपद्रवैरुपद्रतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् प्र- कृति-करण- संयोग-राशि-देश -कालोपयोग संस्थोपशयादविषममाहारमा - हरेदिति ॥ ११ ॥
भवति चात्र - हिताशी- स्यान्मिताशी स्यात्काळभोजी जितेन्द्रियः । पश्यन् रोगान् बहून्कष्टान्बुद्धिमान्विषमाशनात् ॥ १२ ॥ इति ।
( ४ ) विषमाशन -विषमाशन घोष रोग का कारण है, यह जो कहा है अब उस की व्याख्या करेंगे- जब मनुष्य प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था तथा उपशय के विरुद्ध, पान- अशन, भक्ष्य और लेहा रूप में अन्न-पान का उपयोग करता है, तब उस के वात, पित्त और कफ विषम हो जाते हैं । "ये विकृत दोष जिस समय शरीर में फैलकर स्रोतसों वा नाड़ियों के मुखों को घेर लेते हैं तब मनुष्य जो भी भोजन खाता है उस का अधिक भाग मूत्र और मल में बदलकर इन को ही अधिक बढ़ाता है, इस प्रकार शरीर के अन्य धातु नहीं बढ़ते । पुरुष मल के रुकने से ही जीवन धारण किया करता है । इसलिये शुष्क होते हुए पुरुष के मल की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये । इस प्रकार कृश होते हुए मनुष्य के विषम भोजन से बढ़े हुए दोष नाना उपद्रवों से युक्त होकर और भी शरीर को सुखा देते हैं; तब कुपित हुआ वातशूल, अंगों का टूटना, कण्ठमेद, पार्श्वो में पीड़ा, कन्धों का टूटना, स्वरभेद और प्रतिश्याय उत्पन्न करता है । पित्तज्वर, अतिसार और अन्तर्दाह को उत्पन्न करता है । श्लेष्मा- प्रतिश्याय, शिर का भारीपन, कास और अरुचि उत्पन्न करता है । कास के कारण छाती में व्रण होने से थूक में रक्त आता है । रक्त के निकलने से कमज़ोरी आ जाती है । इस प्रकार से विषम भोजन द्वारा एकत्रित हुए दोष राजयक्ष्मा रोग को उत्पन्न करते हैं । शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होने पर धीरे धीरे मनुष्य सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संख्या और उपाय के अनुकूल खान पान करे " । १. इस का विस्तार 'रस- विमान ' नामक अध्याय में कहेंगे
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अ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१ बुद्धिमान मनुष्य विषमाधन के कारण नाना प्रकार के कष्टदायक रोगों की उत्पत्ति को देखकर, हितकारक, परिमित और समय पर भोजन करने वाला और जितेन्द्रिय बने ॥ ११-१२ एवमेतैश्चतुर्भिः शोषस्याऽऽयतनैरभ्युपसेवितैर्वात ॥ -पित्तश्लेष्माणः प्रकोपमापयन्ते, ते प्रकुपिता नानाविधैरुपद्रवैः शरीरमुपशोषयन्ति । तं सर्वरोगाणां कष्टतमत्वाद्राजयक्ष्माणमाचक्षते भिषजः । यस्माद्वा पूर्व- मासीद्भगवतः सोमस्योडुराजस्य तस्माद्राजयक्ष्मेति ॥ १३ ॥
राजयक्ष्मा शब्द की निरुक्ति- घोष रोग के कहे हुए इन चार कारणों के सेवन करने से, वात, पित्त, कफ ये तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं । ये दोष कुपित होकर नाना प्रकार के उपद्रवों से शरीर का शोषण करते हैं । यह रोग सब रोगों में अधिक कष्टसाध्य है, इसलिये वैद्य लोग इस को 'राजयक्ष्मा' कहते है । अथवा यह क्षय पहले नक्षत्रराज चन्द्रमा को रहा, इसलिये इस का नाम 'राजयक्ष्मा' है ॥ १३ ॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा -प्रतिश्यायः क्षवथुरभीक्ष्णं श्लेष्मको मुखमाधुर्यमनन्नाभिलाषोऽन्नकाले चाऽऽयासो दोषदर्शन- मदोषेष्वल्पदोषेषु वा पात्रोदकान्न सूपोपदंश-परिवेशकेषु भुक्तवतो हल्ला--सस्तथोल्लेखनमाहारस्यान्तरान्तरा मुखस्य पादयोश्च शोषः पाण्योश्चा-वेक्षणमत्यर्थमक्ष्णोः श्वेतावभासता चातिमात्रं बाह्वोश्च प्रमाणजिज्ञासा श्रीकामताऽतिघृणित्वं बीभत्सदर्शनता चास्य कार्य स्वप्ने चाभीक्ष्णं दर्शनमनुदुकानामुदकस्थानानां शून्यानां च प्राम-नगर- निगमन-जनपदानां शुष्कदुग्धावभग्नानां च वनानां कृकलास-मयूर वानर-शुक -सर्प-काको-लूकादिभिः संस्पर्शनमधिरोहणं वा यानं च श्वोष्ट्र-खर -वराहैः केशास्थि- भस्म -तुषाङ्गार- राशीनां चाधिरोहणमिति शोषपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १४॥
शाष के पूर्वरूप-शष रोग के ये पूर्व रूप हैं । यथा-प्रतिश्याय ( जुकाम ), छींक आना, बार बार कफ का गिरना, मुख मे मिठास, भाजन को अनिच्छा, भोजन करते समय थकान की प्रतीति, पात्र, पानी, अन्न, दाल, चटना, धाक आदि निर्दोष या अल्प दोषवाली वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन करते समय जी मचलना, मुंह में पानी बहुत आना, खाये हुए अन्न का वमन होना, सुख और पांव का सूखना, हाथों को बहुत अधिक देखते रहना, आंखों का जाना ( रक्त की न्यूनता ), भुजाओं में मोटाई, जांचने की प्रवृद्धि, 1 अपने शरीर से घृणा या अपने शरीर में भयंकर रूप देखना
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४६२ [ ० ६ और स्वप्न में पानी से रहित स्थानों में पानी को देखना, शून्य स्थानों में ग्राम, नगर, जनपदों की प्रतीति होना जंगखों का जमना, शुष्क होना या टूटना देखना, गिरगट, मोर, बन्दर, तोता, सांप, कौवा, उल्लू आदि के साथ स्प की प्रतीति, कुशा, ऊंट, गधा, सुखर आदि पर चढ़कर सवारी करना, केश, अस्थि, भस्म, भूसा, अंगारे के ढेरों पर चढ़ना आदि देखना, ये शोष रोग के पूर्वरूप हैं ॥ १४ ॥
अत ऊर्ध्वमेकादश रूपाणि तस्य भवन्ति, तद्यथा - शिरसः प्रति- पूरणं कासः श्वासः स्वरभेदः लेष्मणश्छर्दनं शोणित- ष्ठीवनं पार्श्वसं जनमंसबमर्दो ज्वरोऽतीसारस्तथाऽरोचक इति ॥ १५ ॥.
ग्यारह रूप - इस के बाद राजयक्ष्मा के ग्यारह लक्षण हो जाते हैं । यथा-( १ ) शिर का कफ से भरना, ( २ ) कास, ( ३ ) श्वास, ( ४ ) स्वरभेद, ( ५ ) कफ का गिरना, ( ६ ) थूक में रक्त आना, ( ७ ) पाश्वों में दर्द, ( ८) कन्धों का नीचे दबना, ( ६ ) ज्वर, ( १० ) अतिसार और ( ११ ) अरोचक ( अरुचि ) ॥ १५ ॥
तत्रापरिक्षीण - मांसशोणितो बळवानजातारिष्टः सर्वैरपि शोषलिङ्ग-रुपद्रतः साध्यो ज्ञेयः, बलवर्णोपचयोपचितो हि सहिष्णुत्वाद् व्या- ध्यष बलस्य कामं सुबहुलिङ्गोऽप्यल्पलिङ्ग एव मन्तव्यः । दुर्बलं त्व- विक्षीण मांस-शोणितमल्पलिङ्गमप्यजातारिष्टमपि बहुलिङ्गमेव जाता- रिष्टमेव विद्यात्, तदसहत्वाद् व्याध्यौषधबलस्य, तं परिवर्जयेत्, क्षणेन हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तश्चारिष्टप्रादुर्भाव इति ॥ १६ ॥
साध्य और असाध्य रूप -जिस रोगी के मांस और रक्त कम नहीं हुए, और शक्ति बनी हुई है और अरिष्ट लक्षण उत्पन्न नहीं हुए, ऐसे रोगी को यदि सब उपद्रव भी घेर लें तो भी रोगी साध्य है, क्योंकि जिस रोगी के बल और वर्ण सुरक्षित हैं, यह व्याधि और औषध के बल को सुगमता से सह सकता है । इसलिये इस प्रकार का रोगी बहुत लक्षणों से युक्त होने पर भी थोड़े लक्षणों बाळा ही गिनना चाहिये । जो रोगी मांस और रक्त के क्षीण होने से बहुत दुर्बल हो गया हो, इस में लक्षण चाहे थोड़े ही हों और कोई अरिष्ठ-लक्षण न भो उत्पन्न हुआ हो तो भी ऐसे रोगी को बहुत लक्षणों वाला और अरिष्टों से युक्त ही गिनना चाहिये, क्योंकि यह रोगी औषधि और रोग के हम नहीं कर सकता, इसलिये छोड़ देना चाहिये । इस रोगी में