चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 481–490
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 481–490
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to ] -नियानस्थानम ४६३ अन्दर क्षति उत्पन्न हो सकते हैं और बिना कारण हो अणि दीखने लगते हैं ॥ १५ ॥
तत्र लोक:-समुत्थानं कलिङ्ग च यः शोषत्वादयुष्यते ।
पूर्व रूपं च तत्त्वेन स राज्ञः कर्तुमईति ॥ १७ ॥
जो वैद्य घोष की उत्पति, लक्षण और पूर्वरूप भक्ती प्रकार से जानता है वह राजयक्ष्मा की चिकित्सा करने के योग्य है ॥ १७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते मिदानस्थाने शोषनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः । Z अथात उन्मादनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब उन्माद निदान का वर्णन करेंगे ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ २ ॥
इह खलु पचोन्मादा भवन्ति । तद्यथा- वात-पित्त-कफ-सन्निपा-ताऽऽगन्तु- निमित्ताः । उन्माद पांच प्रकार के हैं । जैसे -( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य, ( ४ ) सन्निपातजन्य और ( ५ ) आगन्तुज । इनमें से पहिले चार उन्माद दोषजन्य हैं । तत्र दोषनिमित्ताश्चत्वारः पुरुषाणामेवंविधानां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते तद्यथा,- भीरूणामुपक्लिष्टसत्त्वान्नामुत्सन्नदोषाणां च समलविकृतोप-हितान्यनुचितान्याहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्रप्रयोगं वा विषममाचरतामन्यां वा चेष्टां विषमां समाचरतामत्यु-पक्षीणदेहानां च व्याधि- वेग- समुद्भ्रमितानामुपहतमनसां वा काम- कोष -लोभ -हर्ष -भय -मोहायास -शोक-चिन्तोद्वेगादिभिः पुनरभिघाताभ्याहताना वा मनस्युपहते बुद्धौ च प्रचलित । यामभ्युदीर्णा दोषाः पिता हृदयमुपसृत्य मनोहानि स्रोत स्यावृत्य जनयन्त्युन्मादम्॥३ ॥
दोषजन्य उन्माद निम्न क्षणोवाके व्यक्तियों में शीघ्र उत्पन्न जो मनुष्य डरपोक हों, किन के शरीर में सच्च गुण न हो,
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४६४ चरकसंहिता [ अ० ७ ( अपितु रज और तम हो ), जिन में बात आदि दोष बढ़े हुए हों, जो अपवित्र बिगड़े हुए एवं विरोधी गुणवाले पदार्थों से मिले, अथवा कुष्ठ आदि के रोगी मनुष्यों द्वारा छाये हुए अन्न पान खाते हो, विषम रीति से भोजन करने वाले व्यक्तियों में, शास्त्रोक्त विधि के विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुषों में, अथवा कोई अन्य प्रकार की विषम चेष्टा करने वाले व्यक्तियों में, जिन का शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया हो, जिनका चिरा रोग के वेग के कारण उद्भ्रान्त हो चुका हो, जिन का मन, काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, आयास, ( थकान ), शोक, चिन्ता और उद्वेग आदि द्वारा दुःखित होता है, घाव या चोट के लगने से जिनका मन ठिकाने पर नहीं रहता तथा बुद्धि चलायमान हो गई हो, ऐसे मनुष्यों के वात आदि दोष प्रकुपित होकर, हृदय को दूषित करके ( हृदय में पहुंचकर ) मनोवह स्रोतसों को गति को बन्द करके उन्माद रोग उत्पन्न करते है ॥ ३ ॥
उन्मादं पुनर्मनो बुद्धि - संज्ञा- ज्ञान-स्मृति-भक्ति-शील- चेष्टाचार-विभ्रमं विद्यात् ॥ ४ ॥
शील उन्माद का लक्षण -मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति,, आहार, चेष्टाइनका विभ्रम अर्थात् विचिप्त होना 'उन्माद' कहाता है, इन के विकार से उन्माद रोग होता है ॥ ४॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि । तद्यथा- शिरसः शून्यभावश्चक्षुषोराकुलता, स्वनः कर्णयोरुच्छ्वासस्याऽऽधिक्यमास्य संस्रवणमनन्नाभिलाषोऽरोचका-विपाकौ हृदयग्रहो ध्यानायाससंमाहोद्वेगाश्वास्थाने सततं लोमहर्षो ज्वरश्चाभीक्ष्णमुन्मत्तचित्तत्वमुद्दित्वमदिताकृतिकरणं च व्याधेः स्वप्ने च दर्शनमभीक्ष्णं भ्रान्तचलितावनवस्थितानां च रूपाणामप्रशस्तानां १. मन चिन्तन का काम करता है, उस के विभ्रम से चिन्तन करने योग्य बातों को नहीं सोचता और चिन्तन न करने योग्य बातों की चिन्ता करता है । बुद्धि के विभ्रम से नित्य को अनित्य और प्रिय को अप्रिय देखने लगता है । संज्ञा, ज्ञान इस के विभ्रम से अग्नि से जलने की प्रतीति नहीं होती । स्मृति के विभ्रम से कुछ स्मरण नहीं होता या उल्टा स्मरण होता है । भक्ति अर्थात् इच्छा, इसके विभ्रम से पहिले जहां इच्छा थी वहां अनिच्छा हो जाती है । शीक के विभ्रम से अति क्रोधी वा क्रोध के स्थान में भी जाता है । आधार के विभ्रम से अपवित्र आचरण करता है ।
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० ७ ] ३० विधानाच ४६५ तिमीडक चक्राधिरोहणं वातकुण्डलिकामियोन्मथनं निमज्जनं क पाणामम्मसामावर्तेषु चक्षुषोपसर्पणमिति दोषनिभितानामुन्मादानां पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥
उन्माद के पूर्वरूप - उन्माद के पूर्वरूप निम्नलिखित हैं । यथा -विर ( मस्तिष्क ) का खालीपन, आंखों में चंचलता, कानों में ध्वनि का होना, श्वास का ज़ोर से चलना, मुख से लार गिरना, भोजन में अनिच्छा, अरुचि अविपाक, हृदयग्रह, बेमौके ध्यान, आयास ( थकान ), संमोह और उद्योग होना, अर्थात्जहां पर न करने हों वहां इन का करना, निरन्तर रोमांच रहना, बार बार वर का आना, चित्त का उन्मत्त रहना, उदर्द, कोठ निकलना ( अंगों का सूजन या शरीर के उर्ध्व भाग में पीड़ा होना ), अर्दित ( मुख की आकृति का आधा टेड़ा बनना ), बुद्धि आदि का भ्रम होना, स्वप्न में भ्रान्त, चलित, चंचल या भयंकर स्वरूपों का बार-बार दीखना, अप्रशस्त कोल्हू ( जिस यन्त्र से तेल निकाला जाता है ) आदि उन पर बैठना, वातकुण्ड-लिका-रोग ( मूत्ररोध विकार ) का होना, गन्दे, खराब पानी के भवरों में खेलना, डुबकी मारना आदि, आंखों की अस्थिरता और चंचलता, दोषजन्य उन्मादों के ये पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥
वतोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः तत्रेदमुन्मादविशेषविज्ञानं भव-ति । तद्यथा परिसर्पणमक्षि ध्रुवामोष्ठांस- हनु -हस्त- पाद-विक्षेपणमकस्मात्, अनियतानां च सततं गिरामुत्सर्गः, फेनागमनमास्यात्, स्मित -इसित-नृत्य -गीत नुकरणम साम्ना -वादित्रादिप्रयोगाश्चास्थाने, यानमयानंरलङ्करणमनलङ्कारिकद्रव्ये, वीणा - वंश· शङ्ख-शम्यालोभोऽभ्यवहा-वाल शब्दा-asraoधेषु, लब्धेषु चावमानस्वात्रं मात्सर्य, काइय, पारुष्यमु पिण्डवाऽरुणाक्षता, वातोपशयविपर्यासादनुपशयता चेति वातान्माद-लिङ्गानि भवन्ति ॥ ६ ॥
इन पूर्वरूपों के प्रकट होने के पीछे उन्माद रोग उत्पन्न होता है । उस समय उन्माद रोग के विशेष लक्षण ये होते हैं: - ( १ ) वातोन्माद के लक्षण- आंख और भौहों का चलाते रहना (अस्थि- 1 जबाड़ा ( हनु ), कन्धा, हाथ और पांव का फेंकना, विना स्थान के ) हंसना मुसकुराना, नाचना, गाना, बजाना, बिना लोकवे जाना, मुख से खाग निकलना, बीमा, गांतुरी, पंख,
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४६६ चरकसंहिता [ अ०७ मुरकी, सनई, ताह ' आदि वाद्यों का बेसुरा अनुकरण करना, ऊंची और न चढ़ने योग्य सवारी पर चढ़ना, जिन वस्तुओं से शरीर का अलंकार नहीं करना चाहिये उन से अलंकार करना, न मिलने वाले खाद्य पदार्थों में इच्छा, कोम, तथा प्राप्त वस्तुओं में तिरस्कार, बहुत अधिक द्वेष, मत्सरता ( ईर्ष्या ), कृशता, कठोरता, आंखों में लाली तथा आंखों का बाहर निकलना, वातवर्धक पदार्थों से रोगअमर्षका बढ़ना-क्रोध ये-संरम्भाश्चास्थानेवातजन्य उन्माद, के लक्षणशस्त्र-लोष्ट्रहैं ॥ -६काष्ठ-॥ मुष्टिभिरभिहननं स्वेषां परेषां वा, अभिद्रवणं, प्रच्छायशीतोदकान्नाभिलाषः, संतापोऽ-तिवेलं, ताम्र-हरित- हारिद्र-संरब्धाक्षता, पित्तोपशयविपर्यासादनुपशयता चेति पितोन्मादलिङ्गानि भवन्ति ॥ ७ ॥
( २ ) पित्तजन्य उन्माद के लक्षण -अनुचित स्थान और अवसर में अस-हिष्णुता दिखाना, क्रोध करना या स्तम्भित रह जाना, शस्त्र, मिट्टी का ढेला, लकड़ी या मुट्ठी से अपने को या दूसरों को मारना, इधर-उधर दौड़ना, छाया, शीतलखान पान ( अन्न या पानी ) की इच्छा करना, बहुत समय तक ताप का होना, आंखों का ताम्बे के समान लाल, हरा पीला एवं खुले रहना और पित्तवर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये पित्तजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥ ७ ॥
स्थानमेकदेशे, तूष्णींभावो, अल्पशश्चङ्क्रमणं, लालासिङ्घाण- कप्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषो, रहस्कामता, बीभत्सत्वं शौचद्वेषः, स्वप्न- निद्रता, श्वयथुरानने, शुक्ल- स्तिमित मलोपदिग्धाक्षता, श्लेष्मोपशयवि-पर्यासादनुपायता चेति श्लेष्मोन्माद लिङ्गानि भवन्ति ॥ ८ ॥
( ३) कफजन्य उन्माद के लक्षण - एकान्त स्थान में चुपचाप बैठना, थोड़ा चलना फिरना, मुख से लार, नाक से मल का गिरना, भोजन में अनिच्छा, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा", भयानक विकृत रूप, स्वच्छता से द्वेष, नींद कम होना, मुख पर सूजन, आंख में सफ़ेदी भारीपन और मल का होना, कफ वर्धक पदार्थों से रोग का बढ़ना ये कफजन्य उन्माद के लक्षण हैं ॥॥॥ त्रिदोषङ्गिसन्निपाते तु सानिपातिकं विद्यात्, तमसाध्यमित्याच-क्षते कुशलाः ॥ ६ ॥
(४) सान्निपातिक उन्माद तीनों दोषों के एक साथ मिलने से सन्निपात-जन्य उन्माद रोग हो जाता है । इस को कुशल वैद्य असाध्य कहते हैं ॥ १ ॥
साध्यानां तु या साधनानि भवन्ति । तद्यथा- १. शम्या दक्षिण हाथ से और ताक वाम हाथ से बजाया
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निदानस्थानम् ४६७ ero ७] वमन विरेचनास्थापनानुवासनोपशमन-नस्तःकर्म- धूप- धूमपानाञ्जनाव- पीड-प्रथमनाभ्यङ्ग- प्रदेह - परिषेकानुलेपन-वध -बन्धनावरोधन-वित्रासन-विस्मापन - विस्मारणापतर्पण-सिराव्यधनानि भोजनविधानं च यथास्वं युक्त्या, यच्चान्यदपि किंचिन्निदानविपरीतमौषधं कार्य तत्स्या-दिति ॥ १० ॥
उन्माद की चिकित्सा- इन तीन सिद्ध होने वाले उन्मादों की चिकित्सा निम्न प्रकार से करनी चाहिये । यथा -स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, उपशमन, नस्यकर्म, धूप, धूम्रपान, अञ्जन, अब-पीड़न, प्रधमन, अभ्यंग, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वघ ( मारने का भय दिखाना ), बन्धन, अवरोधन ( कमरे में बन्द करना ), वित्रासन ( डराना ), विस्मारण ( नाना प्रकार की बातों में भुलाना ), विस्मापन ( आश्चर्य से चकित करना ), अपतर्पण ( उपवास ), सिराव्यधन ( शिरा वेध आदि से रक्त बाहर करना ) से चिकित्सा करनी चाहिये और युक्तिपूर्वक दोषों को देखकर अन्न-पान का स्वयं निश्चय करना चाहिये । इस के सिवाय और भी जो कोई औषध रोगजनक कारण के विपरीत, उसको शान्त करने वाली हो, वह भी अवश्य देनी चाहिये ॥ १० ॥
भवति चात्र - उन्मादान्दोषजान् साध्यान् साधयेद्भिषगुत्तमः ।
अनेन विधियुक्तेन कर्मणा यत्प्रकीर्तितम् ॥ ११ ॥ इति ॥
श्रेष्ठ वैद्य इस कही हुई विधि से दोषों से उत्पन्न साध्य उन्माद रोग --को दूर करे ॥ ११ ॥ यस्तु दोषनिमित्तेभ्य उन्मादेभ्यः समुत्थान -पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोप-शय- विशेष -समन्वितो भवत्युन्मादस्तमागन्तुमाचक्षते । केचित्पुनः
पूर्वकृतं कर्मा प्रशस्तमिच्छन्ति तस्य निमित्तं । प्रज्ञापराध एवेति भगवान्पुनर्वसुरात्रेय उवाच । प्रज्ञापराधाद्धचयं देवर्षि -पितृ-गन्धर्व-यक्ष -राक्षस-पिशाच- गुरु- वृद्ध -सिद्धाचार्य- पूज्यानवमत्याहितान्याचरति, अन्यद्वा किंचित्कर्माप्रशस्तमारभते, तमात्मना हतमुपन्नन्तो देवादयः कुर्वन्त्युन्मचम् ॥ १२ ॥
गन्तुज उन्माद --जो उन्माद दोषों से उत्पन्न होने वाले उन्माद से म, वेदना और उपशय में भिन्न होता है, उस को ' कहते हैं । कुछ आचार्य पूर्वजन्म के अशुभ पाप कम I की उत्पत्ति मानते हैं । उस का कारण प्रशाराम ही
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४६८ चरकसंहिता [ अ०७ है - ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है । प्रचाराच अर्थात् बुद्धि के दोष से ही मनुष्य देवता ऋषि, पित्तर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिसाच, गुरु, वृद्ध, सिद्ध, आचार्य एवं पूज्य पुरुषों का अपमान करता है । अथवा अन्य किसी प्रकार का निन्दनीय कर्म करता है । अपनी आत्मा द्वारा किये हुए अशुभ कर्म के द्वारा उसी पुरुष को मारने के लिये देव आदि उस को उन्मत्त कर देते हैं ॥ १२ ॥
तत्र देवादिप्रकोपनिमिच नाऽऽगन्तुकोन्मादेन पुरस्कृतस्येमान पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा— देवगो-ब्राह्मणतपस्विनां हिंसाचित्वं कोपनत्वं नृशंसाभिप्रायता भरतिरोजोवर्ण-च्छाया -बळ-वपुषामुपतप्तिः, स्वप्ने च देवादिभिरभिभर्त्सनं प्रवर्तनं चेत्यागन्तु निमित्तस्योन्मादस्य
पूर्वरूपाणि भवन्ति । ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः ॥ १३ ॥
आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप देवता आदि के प्रकोप के कारण आगन्तुज उन्माद के पूर्वरूप निम्न प्रकार के होते हैं । जैसे — देव, गौ, ब्राह्मण, तपस्वी पुरुषों की हिसा करने में रुचि, क्रोधीपन, दूसरे का अपकार करने की इच्छा, उदासीनता, ओज, बल, वर्ण, छाया और शरीर में ताप होना, बिगड़ना, स्वप्न में देवता आदि का तिरस्कार करना, अथवा इन पर क्रोध करना आदि आगन्तुक उन्माद के पूर्वरूप हैं । इस के पीछे उन्माद उत्पन्न हो जाता है ॥ १३ ॥
तत्रायमुन्मादकराणां भूतानामुन्मादयिष्यतामारम्भविशेषः । त- यथा - अवलोकयन्तो देवा जनयन्त्युन्मादं, गुरु वृद्ध- सिद्धर्षयोऽभि-शपन्तः, पितरो धर्षयन्तः स्पृशन्तो गन्धर्वाः समाविशन्तो यहाः, राक्षसात्वाम गन्धमाघ्रापयन्तः, पिशाचाः पुनरधिरुह्य बाहयन्तः ॥ १४ ॥
उन्माद का प्रारम्भ– उन्माद को उत्पन्न करने वाले भूतों की उन्माद को प्रारम्भ करने में निम्नलिखित प्रकार से भिन्नता होती है । यथा देव आँखों से देख कर ही उन्माद उत्पन्न करते हैं, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और ऋषिजन शाप देकर, पितर लोग धमकाकर, गन्धर्वगण स्पर्श करके, यक्ष शरीर में घुसकर, राक्षस आम ( सड़े मांस आदि की ) गन्ध को सुंघाकर और पिशाच चढ़कर उन्माद रोग की उत्पन्न करते हैं ॥ १४ ॥
तस्येमानि रूपाणि भवन्ति । तद्यथा - अमर्त्य -बल-वीर्य पक्कम -ग्रहण- धारण -स्मरण-ज्ञान- वचन -विज्ञानानि, अनि कालः ॥ १५ ॥
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ज०७ ] निवस्थानम् ४६० (५) आगन्तुन के लक्षण -आगन्तुज उन्माद के ये लक्षण होते हैं । जैसे - उन्मत्त रोगी में अमानुष बल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, ग्रहण, चारण, स्मरण, ज्ञान, वाणी और विज्ञान प्राप्त हो जाता है । उन्माद रोग का काल भी अनिश्चित रहता हैहै ॥ १५ ॥
उन्मादयिष्यतामपि खल देवर्षि -पितृ- गन्धर्व -यक्ष -राक्षस -पिशाचानां गुरुवृद्धानां वा essaरेष्वभिगमनीयाः पुरुषा भवन्ति । तद्यथा-पापस्य कर्मणः समारम्भे. पूर्वकृतस्य वा कर्मणः परिणामकाले, एकस्य वा शून्यगृहवासे, चतुष्पथाधिष्ठाने वा, सन्ध्यावेलायां अप्रयतभावे वा, पर्वधिषु वा मिथुनभावे, रजस्वलाभिगमने वा, विगुणे वाऽध्ययन-बलि -मङ्गल-होम -प्रयोगे, नियम त्रत- ब्रह्मचर्य भङ्गे वा,देश-कुल- पुर- विनाशे वा, महाग्रहोपगमने वा, खिया वा प्रजननकाले, विविधभूताशुभाशुचि- स्पर्शने वा, वमन विरेचन-रुधिर-स्रावाश्चेः, अप्रयतस्य वा चैत्यदेवा-यतनाभिगमने वा, मांस -मधु-तिल-गुड - मयोच्छिष्टे वा, दिग्वाससि वा, निशि नगर-निगम - चतुष्पथोपवन- श्मशानाघातनाभिगमने बा, द्विज- गुरु- सुरपूज्याभिषर्षणे वा धर्माख्यानत्र्यतिक्रमे वा अन्यस्य कर्मणोऽप्रशस्त- triss रम्भे त्याघातकाला व्याख्याता भवन्ति ॥ १६ ॥
आघात काल-– देव, ऋषि, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि निम्नलिखित स्थान या समयों पर मनुष्यों में उन्माद उत्पन्न करते हैं । यथा-पाप कर्म के प्रारम्भ करने के समय; पूर्वजन्मकृत पापकर्म के परिणाम समय पर; निर्जन, एकान्त घर में अकेला होने पर; चौराहे पर खड़े रहने या बैठने पर; सन्ध्या- समय में असावधान या अपवित्र रहने से; पूर्णिमा, अमावस्या में स्त्रोसंग करने से; रजस्वलास्त्रो के साथ संग करने से; अव्यवस्थित कार्य करने से; अध्ययन, बलि, मंगल, होम इनको नियम से न करने पर; नियम, व्रत या ब्रह्मचर्य के भंग करने पर बड़े युद्ध के समय, देश, कुल या नगर के विनाश के समय; बड़े भारी ग्रह के आ जाने पर प्रसव के समय स्त्री पर नाना प्रकार के अशुभ पदार्थों के स्पर्श से; वमन, विरेचन, रक्तसाव आदि अरवित्र काम करके अशुद्ध शरीर से चैस्य ( गांव का तह- खेड़ा ), या देवमन्दिर आदि पवित्र स्थान में जाने से मांस, मधु, तिल, गुड, मद्य या जूठन ( उच्छिष्ट ), खाकर या नग्ना- में, अथवा रात के समय ग्राम, नगर वा चौराहे या उपवन, श्मशान ज्ञाने के समीप जाने से; ब्राह्मण, गुरु, सन्यासी, पूज्यपुरुषों को धमकाने उलंघन करने से, इसी प्रकार के अन्य अपवित्र, पाप कर्म के
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४७० चरकसंहिता [ अ० ७ आरम्भ करने से उन्माद रोग का आक्रमण होता है । इस प्रकार से आघात काल का वर्णन कर दिया है ॥ १६ ॥
त्रिविधं तु खन्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति । तद्यथा -हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति । तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचा- रविशेषलक्षणैर्विद्यात् । तत्र हिंसार्थमुन्माद्यमानोऽग्निं प्रविशत्यप्सु वा निमज्जति, स्थलाच्छ्वभ्रे वा निपतति, शस्त्र कशा-काष्ठ-लोष्ट -मुष्टिभिर्ह. न्त्यात्मानमन्यच्च प्राणवचार्थमारभते किंचित् " तमसाध्यं विद्यात्, साध्य पुनर्द्वातिरौ ॥ १७ ॥
उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन-उन्माद रोग को उत्पन्न करने वाले भूतों के मनुष्यों को उन्मत्त बनाने में तीन प्रकार के प्रयोजन हैं । यथा —हिंसा, रति और पूजा । इन कार्यों ( प्रयोजनों ) को उन्मत्त पुरुष के लक्षणों से पहिचानना चाहिये । हिंसा के लिये उन्माद होने पर मनुष्य आग में घुसता है, पानी में डूबता है, ऊंचे स्थान से गड्ढे में गिरता है, हथियार, काष्ठ, कशा, ( चाबुक ), ढेला ( पत्थर ), मुक्कों आदि से अपने को मारता है, अथवा अन्य इसी प्रकार के प्राणनाश करने वाले कार्यों को करता है । इसको असाध्य जानना चाहिये । ' बाकी के दोनों प्रकार के उन्माद साध्य हैं ॥ १७ ॥
तयोः साधनानि -मन्त्रौषधि- मणि- मङ्गल- बल्युपहार- होम -नियम- व्रत -प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात गमनादीनीति । एवमेते पचो-न्मादा व्याख्याता भवन्ति ॥ १८ ॥
ये उन्माद मन्त्र, औषधि, मार्ग, मंगल-पाठ, बलिदान, उपहार, हवन, नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात आदि मंगल कृत्यों से शान्त होते हैं । इस प्रकार से पांचों उन्मादों की व्याख्या करदी ॥ १८ ॥
ते तु खलु निजागन्तुविशेषेण साध्यासाध्यविशेषेण च प्रविभज्य-मानाः पश्च सन्तो द्वावेव भवतः । तौ परस्परमनुबध्नीतः । कदाचिद्य- थोकहेतुसंसर्गादुभयोः संसृष्टमेव पूर्वरूपं भवति, संसृष्टश्चैव लिङ्गमभि- ज्ञेयम् । तत्रासाध्यसंयोगं साध्यासाध्यसंयोगं वाऽसाभ्यं विद्यात् । १. रति प्रयोजन से आक्रान्त होने पर मनुष्य खेलता है, पूजा के लिये पूजा करता है । देव आदि मनुष्य को आक्रान्त नहीं करते । जैसा कि सुश्रुतमें कहाहै- "न ते मनुष्यैः सह संविधन्ति न वा मनुष्यान् कचिदाविशन्ति ये त्वाविशन्ति वदन्ति मोहाचे भूतविद्याविषयादपोयाः ॥ ”
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STO 19 ] निदानस्थानम् ४७१ सायं तु साध्यसंयोग, तस्य साधनं साधनसंयोगमेव विद्यादिति ॥ १६॥
उन्माद के मेद —ऊपर कहे हुए पांच उन्माद निज और आगन्तुज मेदसे या साध्य और असाध्य मेद से, पांच प्रकार के होने पर भी दो प्रकार के होते है । कई बार निज दोषजन्य उन्माद के साथ आगन्तुज उन्माद भी पर सर अनुबन्ध रूप से मिला होता है और कभी साम्य और असाध्य दोनों प्रकारके उन्मादों के कारणों का संयोग होता है, इस अवस्था में पूर्वरूर ओर लक्षन दोनों मिश्रित होते हैं । दोनों प्रकार के लक्षणों के मिलने से रोग असाध्य हो जाता है । इस में भी असाध्य संयोग अथवा साध्य और असाध्य दोनों का संयोग हो तो इसको असाध्य जाने । साध्य लक्षणों का संयोग हो तो साध्य जाने । ( अर्थात् मिश्रित लक्षणों वाले उन्माद में संयुक्त औषधियों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ) ॥ १६ ॥
भवन्ति चात्र - नैव देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ।
न चान्ये स्वयमक्लिष्टमुपक्लिश्यन्ति मानवम् ॥ २० ॥
ये त्वेनमनुवर्तन्ते क्लिश्यमानं स्वकर्मणा ।
न तनिमित्तः क्लेशाऽसौ न ह्यस्ति कृतकृत्यता ॥ २१ ॥
प्रज्ञापराधात्संप्राप्ते व्याधौ कर्मज आत्मनः ।
नाभिशंसेद् बुधो देवान पितन्नापि राक्षसान् ॥ २२ ॥
आत्मानमेव मन्येत कर्तारं सुखदुःखयोः ।
तस्माच्छे यस्करं मार्गं प्रतिपद्येत नो त्रसेत् ॥ २३ ॥
देवादीनामपचितिर्हितानां चोपसेवनम् ।
ते च तेभ्यो विरोध सर्वमायत्तमात्मनि ॥ २४ ॥
जो मनुष्य स्वयं अपने दोषों से पीड़ित नहीं होता उसको न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस और न अन्य योनियां क्लेशित करती हैं । अपने कर्मों के कारण देवता आदि द्वारा जो पीड़ा मिळतो है; उसका कारण देवता नहीं होते । क्योंकि अशुभ कर्मों के फल स्वरूप जम्माद होता है । इन कर्मों के कर्त्ता देवता आदि नहीं हैं । बुद्धि के अपराध से अपने कर्मों के दोष से रोग उत्पन्न होते है, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि देवता, पितर या राक्षस आदि को दोष न दे, उनको उपालम्भ न दे । अपने को ही सुख और दुःख का कारण माने । इसलिये मनुष्य देव आदि से भय न कर के श्रेयस्कर का अनुसरण करे । देव आदि की पूजा, हितकारक पदार्थों का सेवन अण से विरोध करना, ये सब बातें अपने हाथ में हैं ॥२०-२४॥ काः-संख्या निमित्तं द्विविधं लक्षणं साध्यतां न च ।
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चरकसंहिता [ noc उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रिषासूत्रं च भाषितम् ॥ २५ ॥ इति ।
'उन्मादनिदान' नामक अध्याय में उन्माद रोग की संख्या, निमिश, दो प्रकार के लक्षण, साध्य और असाध्य मेद और चिकित्सासूत्र ये सब बातें कह दी हैं ॥ २५ ॥
इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने उन्मादनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
अथातोऽपस्मारनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माsse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब ' अपस्मार- निदान ' की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-नि-मिताः ॥ ३ ॥
अपस्मार रोग चार प्रकार का होता है । यथा -( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य और ( ४ ) सन्निपातजन्य ॥ ३ ॥
त एवंविधानां प्राणभृतां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते तद्यथा -रजस्तमो- भ्यामुपहतचेतसामु द्भ्रान्तविषमबहुदोषाणां समलविकृतोपहितान्यशु- चीन्यभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्र-प्रयोगमपि च विषममाचरतामन्याश्च शरीर चेष्टा विषमाः समाचरता- मत्युपक्षीणदेहानां वा दोषाः प्रकुपिता रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामन्त- रात्मनः श्रेष्ठतममायतनं हृदयमुपसृत्य पर्यवतिष्ठन्ते तथेन्द्रियायतनानि । ar भय-चावस्थिताःलोभ -मोह- हर्षसन्तो- शोकयदा-चिन्तोद्वेगादिभिर्भूयःहृदयमिन्द्रियायतनानि सहसाऽभिपूरयन्तिचेरिताः काम -क्रोध-; तदा जन्तुरपस्मरति ॥ ४ ॥
निदान और सम्मासि - अपस्मार रोग निम्न प्रकार के पुरुषों में बहुत जल्दी होता है । यथा--जिन का मन रज और तम से युक्त होता है, जिन में दोष उद्भ्रान्त, विषम या बहुत बढ़े होते हैं, जिन का मन विक्षिप्त रह अपवित्र, मलिन, विरोधी वस्तुओं से मिश्रित, अमंगळ विधि से वाले, अनुचित विधि से उपयोग करने वाले, शास्त्र के विरूद्ध ।