चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 491–500
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 491–500
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निम् वाडे, शरीर की अन्य चेहाओं को विषम रूप से करने वाले अन्य क्षीण शरीर बाडे तथा रज और तमोगुण से व्यास चिन्तवाले ऐसे पुरुषों में अन्त रात्मा के प्रधान स्थान हृदय को बढ़े हुए दोष घेर लेते हैं । इसी प्रकार मित्र- मिन इन्द्रियों के स्थानों में भी जब ये कुपित दोष फैल जाते हैं और काम, क्रोध, भय, लोभ, मोह, हर्ष, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि द्वारा हृदय तथा इन्द्रिय स्थानों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य की स्मृति ( भान ) न हो जाती है और वह बेहोश हो जाता है ॥ ४ ॥
अपस्मारं पुनः स्मृति- बुद्धि-सत्व- संबाद्वीभत्सचेष्टमाबस्थिकं तम:- प्रवेशमाचक्षते ॥ ५ ॥
अपस्मार का लक्षण -स्मृति, बुद्धि और चित्त इन के विकृत होने से मुख में झाग, बमन, अंग-भंग आदि बीभत्स शरीर चेष्टाओं के होने से एक- दम तमोगुण के कारण बेसुध स्थिति में आ जाने को ' अपस्मार' कहते हैं ||५|| तस्मानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा-भ्रूव्युदासः सततमक्ष्णो-वैकृतमशब्दश्रवणं लालासिङ्घाणकप्रत्र वणमनन्नाभिलषण मरोचका-विपाकौ हृदयग्रहः कुझेराटोपो दौर्बल्यमङ्गमर्दों मोहस्तमसो दर्शनं मूर्च्छा भ्रमवाभीक्ष्णं च स्वप्ने मद-नर्तन- पीडन- वेपथु-व्यथन व्यधन-पतनादीन्यपस्मार पूर्व रूपाणि भवन्ति । ततोऽनन्तरमपस्माराभिनिर्वृ-तिरेव ॥ ६ ॥
अपस्मार के पूर्वरूप – अपस्मार के निम्नलिखित पूर्वरूप होते हैं । यथा- भ्रुवों का संकुचित ( a ) होना, आंखों का निरन्तर विकृत रहना, कान की श्रवण शक्ति का नष्ट होना ( जो बोला जाय उसे स्पष्ट न सुनना ), मुख से लार और नासिका से मल का बहना, भोजन में अनिच्छा, अरुचि, अविपाक, हृदय-ग्रह, पेट में अफारा, कृशता, अंगों में पीड़ा, मोह, अन्धकार का आंखों के सामने आना, मूच्छ, भ्रम ( चकर आना ), स्वप्न में मस्त हो कर नाचना, कांपना, पीड़न, बींधना, गिरना आदि पूर्व-लक्षण होते हैं । इन लक्षणों के पीछे अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥
तत्रेदमपस्मारविशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा - अभीक्ष्णमपस्मरन्तं क्षणे संज्ञां प्रतिलभमानमुत्पिण्डितामसान्ना विलपन्तमुद्वमन्तं नमती- वाऽऽमातमी माविद्धशिरस्कं विषमविनताङ्गलिकमनवस्थित सक्थि- [-पादमरुण- परुष-श्याव-नख - नयन-बदन -त्वच मनवस्थित-चपल-पदष- वातानुपशयं विपरीतोपशयं वस्तेनापस्मरन्तं
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४७४ चरकसंहिता [ अ०८ वातजन्य अपस्मार के लक्षण - अपस्मार रोग के विशेष लक्षण ये हैं यथा - रोगी बेसुध होकर शीघ्र ही थोड़े थोड़े समय में सचेत हो जाता है, आंखों का बहुत फैलना, व्यर्थ का बकवाद करना, मुख से झाग गिरना, ग्रीवा का भरा एवं जकड़ा रहना, शिर का टेड़ा रहना ( शिर में बींधने के समान पीडा होना ), अंगुलियों का विषम होना या मुड़ जाना, टांग, पांव और हाथ का चलाना ( इन में अस्थिरता ), नख, आंख, मुख और त्वचा का लाल, कठोर, खर्खर होना, चचल, अस्थिर, कठोर, रूक्ष आदि रूप गिरते समय रोगी को दीखते हैं । वातकारक पदार्थों से रोग में वृद्धि और विरुद्ध पदार्थों से इस की शान्ति होती है, ये वातजन्य अपस्मार के लक्षण हैं ॥ ७ ॥
अभीक्ष्णमपस्मरन्तं क्षणे क्षणे संज्ञां प्रतिलभमानमवकूजन्त मास्फा-लयन्तं च भूमिं हरित दारिद्र ताम्र-नख-नयन- वदन-त्वचं रुधिरोक्षितोप्र-भैरव प्रदीप्त रूषित रूप दर्शिनं पित्तलानुपशयं विपरीतोपशयं पित्तेना- पस्मरन्तं विद्यात् ॥ ८ ॥
पित्तजन्य अपस्मार - जो रोगी बार- बार बेसुध होता हो और थोड़ी देर में फिर सचेत हो जाता हो ( वातजन्य अपस्मार को अपेक्षा से कुछ देरी में ), गले से कूजने का सा शब्द होता हो, भूमि पर हाथ पांव पटकता हो, नख, नयन, मुख और त्वचा हरे, हल्दी के समान वा ताम्बे के समान लाल; रक्त से भरे तीव्र, भयंकर, प्रदीप्त, क्रोधी रूप को देखता हो, पित्तकारक पदार्थों से रोग बढ़े और विपरीत क्रियाओं से शान्त हो, ये पित्त से उत्पन्न अपस्मार के लक्षण हैं ॥ ८ ॥
चिरादपस्मरन्तं चिराच्च संज्ञां प्रतिलभमानं पतन्तमनतिविकृतचेष्टं लालामुद्रमन्तं शुक्ल-नख- नयन- वदन-त्वचं शुक्ल-गुरु-स्निग्ध -रूप दर्शिनं श्लेष्मलानुपशयं विपरीतोपशयं श्लेष्मणाऽपस्मरन्तं विद्यात् ॥ ६ ॥
कफजन्य अपस्मार - जो रोगी देर में बेहोश होता हो और देर में ही जागृत होता हो, गिरते समय जिस की चेष्टायें बहुत विकृत नहीं होती, मुख से छार गिरती हो, नख, आंख और त्वचा सफेद हो गई हो, जिसको सफेद, गुरु, स्निग्ध रूप दिखाई देता हो तथा कफवर्धक वस्तुओं से जिसका रोग बढ़े और विपरोत वस्तुओं से कम हो; उस को कफजन्य अपस्मार का रोगी समझना चाहिये ॥ १ ॥
समवेत सर्वलिङ्गमपस्मारं सान्निपातिकं विद्यात्, तमसाध्य इति चत्वारोऽपस्मारा व्याख्याताः ॥ १० ॥
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अ० ८ ]. निदानस्थानम् ४७५ www सान्निपातिक अपस्मार -जिस अपस्मार में दोनों दोषों के लक्षण मिले रहते हैं; उस को सान्निपातिक अपस्मार समझना चाहिये । यह अवाध्य है, हस प्रकार से चार प्रकार के अरमार कह दिये ॥ १० ॥
तेषामागन्तुरनुबन्धो भवत्येव कदाचित् स उत्तरकालमुपदे- क्ष्यते । तस्य विशेषविज्ञानं यथोक्तेर्लिङ्गलिङ्गाधिक्य मदोषलिङ्गानु-रूपं किंचित् ॥ ११ ॥
का सम्बन्धइन चारहोताप्रकारहै के। इसअपस्मारका विस्ताररोगों मेंआगेभाग्यचिकित्सासे कभी स्थानआगन्तुज- में अपस्मारकरेंगे । जिस अपस्मार में उपरोक्त लक्षणों से भिन्न लक्षण अथवा लक्षणों की अधिकता या दोषों के लक्षणों से भिन्न लक्षण दिखाई दें; उसे आगन्तुज अपस्मार समझना चाहिये || ११ ॥ सर्वमेवं हितम् । हितान्यपस्मारिभ्यस्तीक्ष्णानि चैव संशोधनान्यु-पशमनानि च यथास्वं " मन्त्रादीनि चाऽऽगन्तुसंयोगे ॥ १२ ॥
चिकित्सा सूत्र - अपस्मार रोगी के लिये तीव्र संशोधन या तीव्र संशमन सब औषधियां हितकारी हैं । आगन्तुज अपस्मार में मंत्र आदि का प्रयोग करना होता है ॥ १२ ॥
तस्मिन् हि दक्षाध्वरोदुध्वंसे देहिनां नाना दिक्षु विद्रवतामतिसरण-सवन- धावन लङ्घनाद्यैर्देहविक्षोभणैः पुरा गुल्मोत्पत्तिरभूत्, हविष्प्रा-शान्मेहकुष्ठानां, भयोत्त्रासशोकैरुन्मादानां विविधभूताशुचि संस्पर्शाद-पस्माराणां ज्वरस्तु खलु महेश्वरललाटप्रभवः, तत्संतापाद्रक्तपित्तं, अतिव्यवायात्पुनर्नक्षत्रराजस्य राजयक्ष्मेति ॥ १३ ॥
भिन्न भिन्न रोगों की उत्पत्ति -प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यह का विध्वंस होने के समय सब प्राणी इधर -उधर दिशाओं में भागे । इन के भागने, कूदने-कांदने आदि शरीर को विक्षोभित करने वाली चेष्टाओं से 'गुल्म' रोग की उत्पत्ति हुई । हविष्य के अधिक खाने से 'प्रमेह' और 'कुष्ठ' रोग की भय डर और शोक से 'उन्माद' रोग की; नाना प्रकार के अपवित्र पदार्थों के स्पर्श से ' अपस्मार' रोग की उत्पत्ति हुई । उवर महादेव के माये से उत्पन्न हुआ है, अवर के सन्ताप से 'रक्तपित्त ' रोग और नक्षत्र राज चन्द्रमा अति स्त्रीसंग से ' राजयक्ष्मा' रोग उत्पन्न हुआ ॥ १३ ॥
अपस्मरति वातेन पितेन च कफेन च ।
सन्निपातेन प्रत्याख्येयस्तथाविधः ॥ १४ ॥
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४७६ चरकसंहिता [ ०८
साध्यस्तुि भिषजः प्राज्ञाः साधयन्ति समाहिताः ।
तीक्ष्णैः संशोधनैश्चैव यथास्वं शमनेरपि ॥ १५ ॥
यदा दोषनिमित्तस्य भवत्यागन्तुरन्वयः ।
तदा साधारणं कर्म प्रवदन्ति भिषग्वराः ॥ १६ ॥
साम्य और असाध्य - अपस्मार चार प्रकार का है । वातजन्य, पिश्चजन्य, कफजन्य और सन्निरातजन्य इन में सन्निपातजन्य असाध्य है । साध्य अपस्मारों को बुद्धिमान् वैद्य तीक्ष्ण संशोधन एवं संशमन क्रिया से अच्छा करते हैं और जिस समय दोषज और आगन्तुज दोनों अपस्मार मिले रहते हैं उस समय उत्तम वैद्य दोनों प्रकार की मिश्रित चिकित्सा करते हैं ॥१४- १६ ॥
सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वौषधविशेषवित् ।
भिषक् सर्वामयान् हन्ति न च मोहं निगच्छति ॥ १७ ॥
इत्येतदखिलेनोक्तं निदानस्थानमुत्तमम् । रोगज्ञान का फल - सब रोगों को और सब ओषधियों को भली प्रकार से जानने वाला वैद्य सब प्रकार के रोगों को शान्त कर सकता है और कभी भी घबराता नहीं । इस प्रकार से उत्तम निदानस्थान को सम्पूर्ण रूप में कह दिया है ॥ १७ ॥
निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलभ्यते ॥ १८ ॥
तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ।
पितरस्ताभ्यां शेोषश्चाप्युपजायते ॥ १९ ॥
महाभिवृद्धया जठरं जठराच्छोथ एव च ।
अशयो जठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ॥ २० ॥
प्रविश्यायादथो कालः कासात्संजायते क्षयः ।
क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ॥ २१ ॥
एक रोग के कारण दूसरा रोग एक रोग दूसरे रोग का निदान अर्थात् उत्पादक कारण भी होता है । जैसे —अवर सन्ताप से रक्तपित्त रोग उत्पन्न होता है । रक्तपित्त और अवर से घोष रोग उत्पन्न होता है । प्लीहा के बढ़ने से उदर रोग, उदर रोग से घोष रोग उत्पन्न होता है । अर्थ रोग से दुःखदायी उदर रोग तथा गुल्म रोग भी उत्पन्न हो जाता है । प्रतिश्वाय से कार और कास रोग से क्षय तथा क्षय रोग से दूसरे अन्य रोम या घोष ही उत्पन्न हो जाता है ॥ १८-२१ ॥
से पूर्व केवला रोगाः पञ्चात्वर्थकारिणः ।
उभयार्थकरा दृष्टास्तथे कार्यकारिणः ॥ २२ ॥
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C निदानस्थानम् YOU
बिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ।
न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥ २३ ॥
ये रोग प्रथम स्वयं रोग रूप होते हैं, परन्तु पीछे से दूसरे रोगों के कारण बन जाते हैं । परन्तु कई रोग दोनों कार्य करते हैं अर्थात् अपने आप रोग रूप से रहते हुए भी कारण रूप बनकर दूसरे रोगों को उत्पन्न करते हैं । कोई रोग दूसरे रोग को उत्पन्न करके स्वयं शान्त हो जाता है । परन्तु कई रोग स्वयं शान्त न होकर दूसरे रोगों के कारण बनते हैं ॥ २२-२३ ॥
प्रयोगः शमयेद्वद्याधिं योऽन्यमन्यमुदीरयेत् ।
नासौ विशुद्धः, शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ २४ ॥
एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसंकराः ।
प्रयोगापरिशुद्धत्वाचथा चान्योन्यसंभवात् ॥ २५ ॥
शुद्ध प्रयोग का लक्षण -– इस प्रकार से मनुष्यों में होने वाले अनेक प्रकार के कष्टसाध्य रोग दिखाई पड़ते हैं । एक औषध का प्रयोग अविशुद्ध होने से तथा एक से दूसरा रोग उत्पन्न होने से व्याधियों का संकर अर्थात् मिश्रण दिखाई देता है । जो प्रयोग एक रोग को शान्त करे परन्तु साथ में दूसरे रोग को उत्पन्न कर दे वह प्रयोग विशुद्ध नहीं । शुद्ध प्रयोग तो वही है जो उपस्थित रोगको शान्त करदे तथा नया रोग उत्पन्न न करे ॥ २४-२५॥ एको हेतुरनेकस्य तथैकस्यैक एव हि ॥ २४-२५ ॥ व्यारेकस्य चानेको बहूनां बहवोऽपि च ॥ २६ ॥
व्वरभ्रमप्रलापाचा दृश्यन्ते रूक्षहेतुजाः ।
रूक्षेणकेन चाप्येको वर एवोपजायते ॥ २७ ॥
हेतुभिर्बहुभिको ज्वरो रूक्षादिभिर्भवेत् ।
रूक्षादिभिब्बेराद्याश्च व्याधयः संभवन्ति हि ॥ २८ ॥
कारण मेद - अनेक रोगों का एक कारण एक रोग का एक ही कारण, एक रोग के अनेक कारण, बहुत से रोगों के बहुत से कारण भी होते हैं । जैसे--एक रूक्ष कारण से ज्वर, भ्रम, प्रलाप आदि बहुत रोग होते हैं । एक रूक्ष कारण से ज्वर रूप एक ही रोग उत्पन्न होता है । रूक्ष आदि बहुत से कारणों विस प्रकार अतिसार रोग में अफीम आदि देकर स्तम्भन करने से या धूक हो जाता है । एक समान रूप होने से प्रतिमा से का है ।
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GE चरकसंहिता [ अ० ८ को लेकर उथर एक ही रोग उत्पन्न होता है और रूक्ष आदि बहुत से कारणों से ज्वर आदि अनेक रोग भी उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२८ ॥
लिङ्ग चैकमनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
बहून्येकस्य च व्याधेर्बहूनां स्युर्बहूनि च ॥ २६ ॥
विषमारम्भमूलानां लिङ्गमेकं ज्वरो मतः ।
स्वरस्यैकस्य चाप्येकः संतापी लिङ्गमुच्यते ॥ ३० ॥
विषमारम्भलै ज्वर एको निरुच्यते ।
लिङ्गैरेतैरश्वासहिकायाः सन्ति चाऽऽमयाः ॥ ३१ ॥
लक्षण मेद - अनेक रोगों का एक लक्षण, एक रोग का एक ही लक्षण, एक रोग के बहुत से लक्षण और अनेक रोगों के बहुत से लक्षण होते हैं । जैसे — उष्मा की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोगों का ज्वर रूप एक लक्षण होता है । ज्वर रोग का एक ही लक्षण सन्ताप है । विषमारम्भ मूलक अनेक लक्षणों से युक्त अकेला ज्वर होता है । इसी प्रकार विषमारम्भ मूलक लक्षणों से ज्वर, श्वास, हिचकी आदि अनेक रोग होते हैं ॥ २६-३१ ॥
एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
व्याघेरेकस्य चानेका बहूनां बह्वध एव च ॥ ३२ ॥
शान्तिरामाशयोत्थानां व्याधीनां लङ्घनक्रिया ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येका शान्तिर्लङ्घनमुच्यते ॥ ३३ ॥
तथा लघ्वशनाद्याश्च ज्वरस्यैकस्य शान्तयः ।
एताचैव ज्वरश्वासहिकादीनां प्रशान्तयः ॥ ३४ ॥
चिकित्सा विधान - अनेक रोग एक ही चिकित्सा से शान्त होजाते हैं, एक रोग की शान्ति एक ही प्रकार से, एक रोग की शान्ति अनेक प्रकार से और अनेक रोगों की शान्ति अनेक प्रकार से भी होती है । जैसे आमाशय से उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों की शान्ति उपवास क्रिया से, ज्वर अकेले की शान्ति उपवास से हो जाती है । इसी प्रकार अकेले ज्वर को शान्त करने के किये लघु भोजन आदि अनेक उपाय हैं । लघु भोजन आदि अनेक उपाय ज्वर, श्वास, हिचकी आदि अनेक रोगों को शान्त करते हैं ॥ ३२-३४ ॥
सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ।
साध्यते कृच्छ्रसाध्यस्तु यत्नेन महता चिरात् ॥ ३५ ॥
सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य—सुखसाध्य रोग, सुखपूर्वक चिकित्सा
पर थोड़े समय में अच्छा हो जाता है । कष्टसाध्य रोग बहुत प्रयक ।
देर में अच्छा होता है ॥ ३५ ॥
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STO = ] निदानस्थानम् ४७६
याति नाशेषतां व्याधिरसाध्यो याप्यसंज्ञितः ।
परोऽसाध्यः क्रियाः सर्वाः प्रत्याख्येयोऽतिवर्तते ॥ ३६ ॥
नासाध्यः साध्यतां याति साध्यो याति त्वसाध्यताम् ।
पादावचारावाद्वा यान्ति भावान्तरं गदाः ॥ ३७ ॥
वृद्धिस्थानक्षयावस्थां रोगाणामुपलक्षयेत् ।
सुसूक्ष्मामपि च प्राज्ञो देहानिबलचेतसाम् ॥ ३८ ॥
व्याध्यवस्थाविशेषान् हि ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षणः ।
तस्य तस्यामवस्थायां तत्तच्छूयः प्रपद्यते ॥ ३६ ॥
याप्य और असाध्य -याप्य संज्ञक असाध्य रोग कभी भी जड़मूल से नष्ट नहीं होते ( वे पथ्य और औषध द्वारा कुछ काल तक दबे रहते हैं ) और असाध्य रोग सब प्रकार की चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं होते । असाध्य रोग साध्य नहीं हो सकते, परन्तु साध्य रोग असाध्य बन जाते हैं । सब रोगों की चिकित्सा के जो चार पाद हैं, इन के अपचार से अथवा दैवबल के कारण रोग दूसरी स्थिति ( असाध्य अवस्था ) में पहुंच जाते हैं । बुद्धिमान् वैद्य को उचित है कि दोष की वृद्धि, स्थान और क्षय की परीक्षा भली प्रकार करे । रोगी के शरीर, जाठराग्नि बल और चित्तवृत्ति का सूक्ष्मता से ज्ञान प्राप्त करे । रोग की विशेष अवस्थाओं को भली प्रकार पूर्ण रूप से समझ कर उस प्रकार से शान्तिकारक चिकित्सा करने पर सुख ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थ ) प्राप्त होते हैं ॥ ३६-३९ ॥
प्रायस्तिर्यग्गता दोषाः क्लेशयन्त्यातुराँश्चिरम् ।
तेषु न त्वरया कुर्याद्देाग्नि-बल-विक्रियाम् ॥ ४० ॥
प्रयोगः क्षपयेद्वा तान् सुखं वा कोष्ठमानयेत् ।
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नस्तान् यथास्वं तं हरेद् बुधः ॥ ४१ ॥
ज्ञानार्थ यानि चोक्तानि व्याधिलिङ्गानि संग्रहे ।
व्याधयस्ते तदात्वे तु लिङ्गानीष्टानि नाऽऽमयाः ॥ ४२ ॥
प्रायः वात आदि दोष कुमार्ग में जाकर रोगियों को बहुत समय तक पीड़ित करते हैं । ऐसे स्थानों में शीघ्रता से काम नहीं लेना चाहिये । अपितु रोगी के शरीर और अग्नि-वल को जानकर औषध प्रयोग द्वारा दोषों को धीरे धीरे कम करना चाहिये । अथवा दोषों को कोष्ठ-स्थान में खाना चाहिये । और जब दोष : जाय तब योग्य रीति से बाहर निकाल देने चाहिये । रोगों के के लिये जो लक्षण संक्षेप में कहे हैं, उन को एक स्वतन्त्र रोग
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४८० चरकसंहिता [ अ०८
समझना चाहिये । परन्तु जिस स्थान पर दूसरे रोगों का ज्ञान कराया गया है ।
वहां पर इन लक्षणों को लक्षण ही समझना चाहिये ॥ ४०-४२ ॥
विकाराः प्रकृतिश्चैव द्वयं सर्व समासतः ।
तद्धेतुवशगं हेतोरभावान्न प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
विकार और प्रकृति इन दो अवस्थाओं का जो वर्णन किया है ये दोनों ही कारण के अधीन है । कारण के अभाव से इन दोनों में से एक भी नहीं रह सकता ॥ ४३ ॥
- तत्र श्लोकाः -– हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा ।
संप्राप्तिः पूर्वमुत्पत्तिः सूत्रमात्रं चिकित्सितम् ॥ ४४ ॥
रादीनां विकाराणामष्टानां साध्यता न च ।
पृथगेकैकशयोक्ता हेतुलिङ्गोपशान्तयः ॥ ४५ ॥
हेतुपर्यायनामानि व्याधीनां लक्षणस्य च । निदानस्थानमेतावत्संप्रहेणोपदिश्यते ॥ ४६ ॥ इति ।
इस निदान स्थान में ज्वर आदि आठ रोगों के हेतु, पूर्वरूप, रूप, उपाय, सम्प्राप्ति, पूर्वोत्पत्ति, चिकित्सा सूत्र, साध्यता और असाध्यता, इन का वर्णन किया है । हेतु, लिंग, उपशय, व्याधि, लक्षण और हेतु के पय्यायवाची शब्द ये - सब विषय संक्षेप में कह दिये हैं ॥ ४४-४६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थानेऽ पस्मारनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः । इति निदानस्थानं संपूर्णम् । *निदानस्थान में प्रधानभूत अवर आदि का ज्ञान कराने के लिये अवि- पाक, अरुचि आदि जो रोग कहे गये हैं, उनको स्वतंत्र अवस्था में उत्पन्न होने पर रोग ही जानने चाहिये और जब ज्वरादि के कारण ये उत्पन्न होते हैं ही हैं । क्योंकि आयुर्वेद में स्वतन्त्र अपनी चिकित्सा से धान्द ही रोग कहा जाता है ।
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३१ विमानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः ।
अथातो रसविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माssह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इस के बाद 'रस -विमान' का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥१-२॥ विकल्पइह-खलव्याचीनांबल-काल-विशेषाननुप्रविश्यानन्तरंनिमित्त पूर्व रूप- रूपोपशय-रस-संख्या-द्रव्यप्राधान्यविधि--दोष-विकार- भेषज- देश -काल-चल- शरीराहार-सार-सात्म्य- सत्व-प्रकृति- समान- वहितमनसा यथावज्ञेयं भवति भिषजा, रसादिमानज्ञानायत्तत्वात्
क्रियायाः । न ह्यमानो र सदोषादीनां भिषक्व्याधिनिग्रहसमर्थो भवति ।
तस्मात्रसादिमानज्ञानार्थं विमानस्थानमुपदेयामोऽग्निवेश! ॥ ३ ॥
विमान स्थान का प्रयोजन -चिकित्सा में सफलता चाहने वाले वैद्य को चाहिये कि सब से प्रथम रोगों का निदान, पूर्वरूप, रूर, उपाय, संख्या, प्राधान्य, विधि, विकल्प ( भेद ), बल, काल, विशेष ( संख्या अदि पांच, संप्राप्ति के मेद ) को भली प्रकार जानकर, अनन्तर सावधान मन होकर मधुर आदि रस, द्रव्य (मेज द्रव्य), वात आदि दोष, विकार, देश (भूमि और रोगी), काल (नित्य और आवस्थिक ), बल, शरीर, सार ( लग्, रक्त, ओज आदि ), आहार ( भोजन ), साम्य ( कसात्म्य), सरख (मन ), प्रकृति (बात आदि), वय ( काल के प्रमाण की अपेक्षा से बाल्यावस्था आदि ) आदि की रोग में भली प्रकार परीक्षा करे, क्योंकि चिकित्सा क्रिया का आधार रसादि ज्ञान ही है । इस लिये रसादि का शान भली प्रकार करना चाहिये । रसादि को न जानने वाला वैद्य रोगों को रोकने और उन की चिकित्सा में सफल नहीं हो सकता । इसलिये हे अग्निवेध! रखादि ज्ञान के अधान चिकित्सा के होने से, रसादि ज्ञान के लिये विमान- उपदेश करेंगे || ३ || 'आदेश' इति च पाठः ।
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en चरकसंहिता [अ०१ arissदौ रस-द्रव्य- दोष-विकार- प्रभावाम् वक्ष्यामः ॥ ४ ॥
इनमें सब से प्रथम मधुर आदि रस, मेषण द्रव्य, वात आदि दोष और विकार और इन के प्रभावों को कहेंगे ॥ ४ ॥
रसास्तावत् षट मधुराम्ल लवण-कटु- तित-कषायाः । ते सम्यगुपयुज्य- मानाः शरीरं यापयन्ति, मिथ्योपयुज्यमानास्तु खलु दोषप्रकोपनायो- पकल्पयन्ति ॥ ५ ॥
रस छः हैं, मधुर, अम्ब, लवण, कटु, तिक्त और कषाय । इन का यदि भली प्रकार उपयोग किया जाय तो ये शरीर को स्वस्थ अवस्था में रखते हैं और यदि अन्यथा अर्थात् अन्यथा रूप में सेवन किये जावे तो वातादि दोषों को प्रकुपित करके रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५ ॥
दोषाः पुनस्त्रयो वात-पित्त श्लेष्माणः । ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति, विकृतिमापन्नास्तु खलु नानाविधैर्विकारः शरीरमुपता-पयन्ति ॥ ६ ॥
दोष तीन हैं । वात, पित्त और कफ । ये तीनों दोष अपनी प्रकृति अर्थात् समान अवस्था में रहकर शरीर के उपकारक होते हैं और ये ही दोष विषम रूप में विकृत होकर शरीर को नानाप्रकार के रोगों से पीड़ित करते हैं ॥ ६ ॥
तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति । तद्यथा कटुतिक्तकषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेनं शम- यन्ति । कटुकाम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्तकषायानं शमयन्ति । मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषाया- स्त्वेनं शमयन्ति ॥ ७ ॥
रसों के प्रभाव - दोषों का शमन करना और दोषों को कुपित करना यह रसों का ही प्रभाव है । इन में तीन तीन रस एक एक दोष को उत्पन्न करते हैं और तीन तीन रस एक एक दोष को शान्त करते हैं । जैसे — कटु, तिक और कषाय ये तीन रस वायु को उत्पन्न करते हैं । मधुर, अम्ल और कवण ये तीन रस वायु का शमन करते हैं । कह, अम्ल और लवण ये तीन रस पित्त को उत्पन्न करते हैं । मधुर, तिक्त और कषाय ये तीन रस पित्त का शमन करते हैं । मधुर, अम्ल और कवण ये तीन रस कफ को उत्पन्न करते हैं और कटु, तिक्त और कषाय ये तीन रस कफ को शमन करते हैं ॥ ७ ॥
रदोषसन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समानगुणाः सभा विष्ठा वा भवन्ति ते तानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणास्तु