चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 501–510
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 501–510
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अ० १ ] विमानस्थानम् www. ४८३ भूविष्ठा वा शमयत्वभ्यश्यमानाः - इत्येतद् व्यवस्थाहेतोः पदत्वमुपदि- श्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां त्रित्वं च दोषाणाम् । संसर्गविकल्प- बिस्तरो शेषामपरिसंख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात् ॥ ८ ॥
रस और दोषों के सन्निपात होने पर जो जो रस दोषों के समान गुण वाले तथा समान स्वभाव के होते हैं वे उन दोषों को बढ़ाते हैं, विशेषतः जब ये रस नित्य प्रति निरन्तर सेवन किये जाते हैं । इसी प्रकार जो रस जिन दोषों के साथ विपरीत गुण और विपरीत स्वभाव वाले होते हैं वे सेवन करने पर उन दोषों को शमन करते हैं । इस सामान्य और विपर्य्यय के कारण जो वृद्धि और हास का नियम है उस की दृष्टि से परस्पर न मिले हुए रस छः तथा परस्पर न मिले हुए दोष तीन हैं । इन्हीं में यह उपरोक्त व्यवस्था संभव है । इन के पारस्परिक संसर्ग में यह संभव नहीं, क्योंकि इन रसों और दोषों का परस्पर संयोग होने से वे असंख्य हो जाते हैं । क्योंकि विकल्पों के भेद असंख्य हैं ॥ ८ ॥
तत्र खल्वनेकरसेषु द्रव्येष्वनेकदोषात्मकेषु च विकारेषु रस-दोषप्रभावमेकैकत्वेनाभिसमीक्ष्य ततो द्रव्यनिकारयोः प्रभावतस्त्वं व्यव-स्येत् । इनमें अनेक रसवाले द्रव्यों में और अनेक दोषों को प्रारम्भ करने वाले विकारों में रख प्रभाव और दोषों के प्रभाव को पृथक् पृथक् रूप से देखकर, रविकार द्रव्य-विकार के प्रभाव का निश्चय करे । अर्थात् जहां पर एक रस और एक ही दोष हो वहां पर रस और दोष के प्रभाव से द्रव्य- विकार के प्रभाव का ज्ञान हो ही जाता है । परन्तु जहां पर अनेक रस और अनेक दोष मिले हों यहां पर भी छः रसों और तीन दोषों के प्रभाव का निश्चय कर लेना चाहिये । नत्वेवं खल सर्वत्र । न हि ' विकृति-विषम समवेतानां नानात्मक १. रस का विकृति समवाय जैसे मधुर भात में मधुर रस स्वभाव से स्नेहकारी और दृष्य है, परन्तु द्रव्य के विकार रूप भात में वह मधुरता वह गुण नहीं करती । भात स्निग्ध और दृष्य नहीं है । रखों का विषम समवाय अर्थात् विषम मेल जैसे तिल में कषाय, कटु, तिक और मधुर चार रस मिले हैं । यदि वे बिना मात्रा के मिले न होते तो तिल भी ओर श्लेमा को हरने वाला वा त्रिदोषन्हारी होता, परन्तु तिल में रसों का र अर्थात् विषम रूप से मेल है । अतः वह बैसा नहीं है, प्रत्युत हू को उत्पन्न करता है । पदार्थों में कहीं तो ये रस अपना ठीकर
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४८४ चरकसंहिता [अ०१ द्रव्याणां परस्परेण चोपहतानामन्यैश्च विकल्पनैर्विकल्पितानामवयवप्र- भावानुमानेन समुदायप्रभावतस्त्वमभ्यवसातुं शक्यं । तथायुक्त हि समुदाये समुदायप्रभावतस्त्वमेवोपलभ्य ततो रस द्रव्य विकार-प्रभाव- तस्त्वं व्यवस्येत् ॥ ६ ॥
परन्तु इस प्रकार सब स्थानों पर जाना नहीं जा सकता । क्योंकि द्रव्य सम्पूर्ण विकृति भाव से और असमान परिमाण में परस्पर मिलते । इस मिलने के समय एक द्रव्य के द्वारा दूसरा द्रव्य नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार नाना रूप में भी द्रव्य बदल जाता है । इन अवस्थाओं में अंशांश विकल्पना द्वारा प्रत्येक अंश का प्रभाव अनुमान द्वारा जानकर उससे सम्पूर्ण समुदाय रूप द्रम्प का प्रभाव जानना असम्भव है । इस अवस्था में सम्पूर्ण द्रव्य का सम्पूर्ण प्रभाव जानना चाहिये ॥ ६ ॥
तस्माद्रसप्रभावतश्च द्रव्यप्रभावतश्च दोष प्रभावजश्च विकारप्रभाव-तय तत्त्वमुपदेक्ष्यामः -तप रस-द्रव्य-दोष बिकार प्रभाव उपदिष्टो भवति ॥ १० ॥
इसलिये चिकित्सा में रस-प्रभाव, द्रव्य-प्रभाव, दोष प्रभाव और विकार- प्रभाव इन चारों की अपेक्षा है । इससे उन चारो प्रकार के प्रभावों का यथार्थ उपदेश करेंगे । रसों और द्रव्यों का वात, पित्त और कफ इन दोषों को कुपित और शान्त करने का प्रभाव रसनिरूपण अध्याय में कह दिया ॥ १० ॥
द्रव्यप्रभावं पुनरुपदेक्ष्यामः - तैलसर्पिर्मधूनि वात-पित्त श्लेष्म-प्रश- मनार्थानि द्रव्याणि भवन्ति । तत्र तळं स्नेहाष्ण्यगौरव पपन्नत्वाद्वातं जयति सततमभ्यस्यमानम् । वातो हि रौक्ष्य शैत्यलाघवोपपन्नो विरुद्ध- गुणो भवति, विरुद्धगुणसन्निपाते हि भूयसाऽल्पमवजीयते, तस्मा- फल उत्पन्न करते हैं और कहीं नहीं करते, इसी से उनके सम-समवाय या विषम समवाय का अनुमान किया जाता है । एक ही पदार्थ के नाना रूप बन जाने से भी उनके गुणों में मेद आता है । रखों और दोषों का दो प्रकार का समवाय अर्थात् मेल होता है । ( १ ) प्रकृतिके अनुकूल (२ ) प्रकृति के अननुकूल । जहां नाना रस मिलकर भी प्रकृति के गुणों का नाश नहीं करते बैसा मेल 'प्रकृति- सम- समवाय ' कहाता है । जहां वे विकृति होकर मूळ पदार्थ के गुणों का नाश कर देते हैं, वहां 'विकृति-विषम समवाय' कहता है, क्योंकि वहाँ विकृति हो जाने से विषम अर्थात् प्रकृति के रखों का विपरीत मेल होता है ।
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०१ ] विमानस्थानम् लंबा जयति सततमभ्यस्यमानम् । सर्पिः खल्वेवमेव पित्त जयति, माधुर्याच्छेत्यान्मन्दवीर्यत्वाच पित्त धमधुरमुष्णं तीक्ष्णं च मधु श्लेष्माणं जयति, रौक्ष्यात्तैक्ष्ण्यात् कषायत्वाच । इलेष्मा हिस्निग्धो मन्दो मधुरा ॥ ११ ॥
द्रव्य के प्रभाव का अत्र उपदेश करते हैं । तेल वायु को, घी पिस को और मधु कफ को शान्त करने वाले द्रव्य हैं । इन में तेल, स्नेह, उष्ण और गुरु होने के कारण निरन्तर सेवन करने से वायु को शान्त करता है । क्योंकि वायु, रूक्ष, शीत और लघु होने से तेल से विपरीत गुण वाला है । दो विरोधी गुणों के मिश्रण में जो गुण अधिक बलवान् होता है वह निर्बल को जीत लेता है । इसलिये तेल निरन्तर सेवन से वायु को जीत लेता है । इसी प्रकार भी भी पित्त को जीतता है, घी, मधुर, शीत एवं मन्दवीर्य है और पिस अमधुर ( कटु, अम्ल ), उष्ण और तीक्ष्ण है । वह भी विपरीत गुण होने से पिच को जीतता है । मधु कफ को जीतता (शमन) करता है । मधु रूक्ष, तीक्षण और कषाय है । कफ स्निग्ध, मन्द और मधुर है, इसलिये मधु कफ से विपरीत गुण वाला है ॥११॥
यच्चान्यदपि किंचिद् द्रव्यमेवं वातपित्तकफेभ्यो गुणतो विपरीत विरुद्धं तच्चैता अयत्यभ्यस्यमानम् ॥ १२ ॥
इसी प्रकार अन्य जो कोई द्रव्य गुणों में वात, पित्त, कफ से विपरीत गुण- वाला होता है, वह निरन्तर सेवन करने से वात, पित्त और कफ को शान्त करता है ॥ १२ ॥
अथ खलु त्रीणि द्रव्याणि नात्युपयुञ्जीताधिकमन्येभ्यो द्रव्येभ्यः ।
तद्यथा पिप्पली, क्षारं लबणमिति ॥ १३ ॥
इन निम्न लिखित तीन द्रव्यों को अन्य द्रव्यों की अपेक्षा अधिक सेवन नहीं करे । १. पिप्पली, २. क्षार और ३. लवण ॥ १३ ॥
पिप्पल्यो हि कटुकाः सत्यो मधुरविपाका गुन्यों नात्यर्थंस्निग्धो- ष्णाः प्रक्लेदिन्यो भेषजाभिमताश्च । ताः सद्यः शुभाशुभकारिण्यो भवन्ति, आपातभद्राः प्रयोगसमसाद्गुण्यात्, दोषसंचयानुबन्धाः । सततमुपयुज्यमाना हि गुरुप्रक्लेदित्वा च्छ्लेष्माणमुत्क्लेशयन्ति, औष्ण्या- पित्तं नच वातप्रशमनायोपकल्पन्ते, अल्पस्नेहोष्णभावात्, योगवादि- म्यस्तु खलु भवन्ति । तस्मात्पिप्पलीर्नात्युपयुञ्जीत ॥ १४ ॥
( शुष्क पिप्पली ) कटु रस की होकर भी विपाक में मधुर, गुरु, न न अधिक उष्ण, शरीर के धातुओं को क्लिन करने ( गळाने )
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४८६ चरकसंहिता [ अ० ९ बाकी है, ओषधि रूप से ठीक भी है, तो भी शीघ्र ही शुभ- अशुभ फल को दिखाने वाली हैं । सम्यक् प्रयोग करने में पूर्णरूप में गुणकारी और ठीक तरह प्रयोग न करने पर दोष का संचय करने वाली होती है । क्योंकि पिप्पली का निरन्तर उपयोग करने से यह भारी तथा क्लेद उत्पन्न करने वाली होने के कारण कफ को कुपित करती है । उष्ण होने से पित्त को कुपित करती है । यह विपरीत गुण होने पर भी वायु का शमन नहीं करती । क्योंकि इन में स्नेह और उष्णगुण न्यून रहता है । पिप्पली योगवाही है अर्थात् जिस द्रव्य के साथ मिलाकर देते हैं उसी द्रव्य के समान कर्म करने वाली होती है । इसीलिये ज्वर, गुल्म, कुष्ठ आदि में इस का उपयोग है । इसलिये पिपली का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये । ( पिप्पली का भोजनादि में अति प्रयोग हानि-कारक है, रसायन में नहीं ) || १४ || क्षारः पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पश्चादुपशो यति । स पचन- दहन-भेदनार्थमुपयुज्यते । सोऽतिप्रयुज्यमानः केशा-ह्रिदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते । ये होनं प्राम -नगर-निगम जनपदाः सततमुपयुञ्जते तेऽप्यान्ध्य षाण्ट्यखालित्य पालित्य-भाजो हृदयापकर्ति-नश्च भवन्ति, तद्यथा प्राच्याश्चीनाश्च । तस्मात्क्षारं नात्युपयुञ्जीत || १५|| क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण और लवण रस से युक्त होते हैं । ये क्षार पहिले तो शरीर को क्लिन्न करते हैं और पीछे से शुष्क करते हैं । शोफ आदि संघात या विण्डित हुए दोषों को जलाता है, पकाता है और फोड़ता है । इसलिये पकाने, जलाने और फोड़ने के लिये इस का उपयोग किया जाताहै । यही क्षार यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाये तो केश (बाल ), आंख, हृदय और पुरुषत्व को नाश करता है । इसलिए जिस ग्राम, नगर, वस्ती प्रान्त वा देश के लोग इस का अधिक उपयोग करते हैं वे अन्बे, नपुंसक, बालों का गिरने ( गंज ) या पकने ( पलित ) और हृदय के रोग से विशेष रूप से पीड़ित होते हैं । जैसे- -प्राच्य ( कामरूप ) देश के और चीनी । इसलिये क्षार का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये ॥ १५॥
वर्ण पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्योपपन्नमनतिगुर्व नविस्निग्धमुपदि विस्रंस- नसमर्थमन्नद्रव्यरुचिकरं आपातभद्रं प्रयोगसमसाद्गुण्यात्, दोषसंच- यानुबन्धं, सद्रोचनपाचनोपक्लेदनविसनार्थमुपयुभ्यते । तदत्यर्थमुफ् युज्यमानं ग्लानि- शैथिल्य दौर्बल्याभिनिर्वृत्तिकरं शरीरस्थ झेन प्राम- नगर- निगम- जनपदाः सततमुपयुञ्जते, ते भूयिष्ठं
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अ० [१ ] विमानस्थानम् AAAAN शिविल मांस-शोणिता अपरिक्रेशसहाश्च भवन्ति । तद्यथा काही सौरा ष्ट्रिक सैन्धव -सौवीरकाः, ते हि पयसाऽपि सदा लवणमश्नन्ति येऽपीह भूमेरत्यूपरा देशास्तेष्वोषधिबीरुद्वनस्पतिवानस्पत्या न जायन्तेऽल्पते जसो या भवन्ति लवणोपतत्वात् । तस्माल्लवणं नात्युपयुञ्जीत । ये झतिल-वणसात्म्याः पुरुषास्तेषामपि खालित्येन्द्रलुप्त पालित्यानि तथा वलयश्चा-काले भवन्ति ॥ १६ ॥
लवण, उष्ण एवं तीक्ष्ण दोनों गुणों से युक्त है, न तो बहुत गुरु और न बहुतस्निग्ध होता है । क्लिन्न करने वाला, विसंसन ( बहाने की ) शक्ति वाला, भोजन में रुचि पैदा करने वाला, भली प्रकार उपयोग करने पर सम्पूर्णरूप में कल्याणकारी है, ठीक प्रकार से न बरतने से दोषों को कुपित करने वाला होता है । इस का उपयोग रुचि पैदा करने में, पाचन के लिये, क्लिन्न करने के लिये और विस्रंसन के लिये प्रयुक्त होता है । इस का उपयोग बहुत अधिक मात्रा में करने से शरीर में ग्लानि, शिथिलता और दुर्बलता उत्पन्न होती है । जिस ग्राम, नगर, प्रान्त वा देश के व्यक्ति इस का निरन्तर उपयोग करते हैं, उन को ग्लानि बहुत रहती है और उन के रुधिर, स्नायु और मां शिथिल हो जाते हैं । वे निर्बल होने से क्लेश सहने में असमर्थ रहते हैं । जैसे-बाह्लीक ( बल्ब ), सौराष्ट्रिक ( गुजराती, काठियावादी ), सैन्वत्र ( सिन्धु देशी ) और सौवीर देश के लोग । ये लोग दूध के साथ भी लवण खाते हैं । उषर भूमियों में ओधि ( फलवालो ), लता, वनस्पति, फल-पुष्पवाले वृक्ष उत्पन्न नहीं होते । यदि होते हैं तो वे अल्पबल होते हैं । नमक ही इन की शक्ति को मार देता है, इसलिये नमक का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये । इसके अतिरिक्त जिन को लवण बहुत अनुकूल पढ़ता है उन के बाल शीघ्र गिर जाते हैं, जल्दी सफेद हो जाते हैं, इन्द्रलुप्त का रोग हो जाता है और युवावस्था में ही चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं ॥ १६ ॥
तस्मात्तेषां तत्साम्यतः क्रमेगापगमनं श्रेयः साम्यमपि हि क्रमे-गोपनिवर्त्यमानमदोष मत्पदोषं वा भवति ॥ ११ ॥
इसलिये इन पुरुषों को 'न वेगान्धारणीय' ( सूत्र० ७ ) अध्याय में बताये हुए क्रम से नमक के इस प्रकार साम्य ( अनुकूलता ) से पृथक होना ही कल्या णकारी है, क्योंकि ऐसे सात्म्य से क्रमपूर्वक हटना दोषरहित अथवा यो दोष-: 11 20-11
नाम तद् यदात्मन्युपशेते । खाभ्यार्थी पाचार्थः ॥
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चरकसंहिता [अ०१ ge सात्म्य – उस को कहते हैं कि जो अपनी देह के लिये सुखकारक या अनुकूल होता है । क्योंकि ' सात्म्य' का अर्थ 'उपाय' है । तत् त्रिविधं - प्रबरावरमध्यविभागेन । सप्तविधं च रसेकेकत्वेन, सर्वर सोपयोगाश्च ॥ १८ ॥
तत्र सर्वरसं प्रवरं, अवरमेकरसं, मध्यमं तु प्रवरावरमध्यस्थम् । तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेण प्रवरमुपपादयेत्सात्म्यम् । सर्वरस- मपि च द्रव्यं सात्म्यमुपपन्नं प्रकृत्याद्युपयोक्तष्टमानि सर्वाण्याहारविधि- विशेषाय तनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुध्येत ॥ १६ ॥
सात्म्य के भेद - यह सात्म्य तीन प्रकार का है । ( १ ) प्रवर ( २ ) मध्यम और ( ३ ) अवर अथवा सात प्रकार का है । जैसे एक एक रस से छः प्रकार का और सब रसों के उपयोग से सात प्रकार का है । इन खातों में सब रसों का साम्य 'प्रवर' है । ' एक रस का साम्य 'अवर' निकृष्ट है । प्रवर और अवर के मध्य में स्थित सात्म्य को ' मध्यम' कहते हैं । इन में अवर और मध्यम सात्म्य को क्रमशः प्रवर सात्म्य में परिवर्तित करने का प्रयत्न करना चाहिये । सब रसों का सात्म्य होने पर भी अर्थात् आहार- विधि के विशेष उपयोक्ता और प्रकृति आदि सब प्रकार के आठों अंगों को देखकर हितकारक पदार्थों का सेवन करना चाहिये ॥ १८-१६ ॥ तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । तद्यथा प्रकृति- करण- संयोग -राशि - देश- कालोपयोग संस्थोपयोक्त्रष्टमानि भवन्ति || २०|| आहार -विधि - ये निम्नलिखित आठ बातें आहार विधि में विशेष कारण या उसके अंग होती हैं । ( १ ) प्रकृति, ( २ ) करण, ( ३ ) संयोग, ( ४ ) राशि, ( ५) देश, ( ६ ) काल, (७ ) उपयोग संस्था और ( ८) उपयोक्ता ॥ २० ॥
तत्र प्रकृतिरुध्यते । स्वभाषो यः स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभा
fast गुर्वादिगुणयोगः । तद्यथा - माषमुद्गयोः, शूकरैणयोश्च ॥२१॥
उन में से प्रकृति का वर्णन करते हैं - ( १ ) प्रकृति स्वभाव को कहते हैं । आहार- द्रव्य और औषध द्रव्यों में जो गुरु, लघु आदि गुण स्वभाव से रहते हैं। उन का नाम प्रकृति है । जैसे माघ ( उड़द ) और शुकर के मांस स्वभाव से ही गुरु हैं और मूंग तथा हरिण के मांस स्वभाव से ही लघु होते हैं ॥ २१ ॥
करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः, संस्कारो हि १. करीब सब रस के पदार्थ खाती है, इसलिये इस का मांस निर्दोष माना है ।
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अ० [१ ] विमानस्थानम् गुणान्तराधानमुच्यते । ते गुणाच तोयाग्निसंनिकर्षशौचमन्थनदेश काल- वशेन भावनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिवाऽऽधीयन्ते ॥ २२॥
( २ ) करण - स्वाभाविक द्रव्यों के संस्कार का नाम ' करण' है । स्वा भाविक गुण से भिन्न दूसरे गुण को उत्पन्न कर देने का नाम 'संस्कार' है । ये गुण जल, अग्नि के संयोग से, शौच ( धोने आदि से ), मन्थन ( त्रिकोने से ), देश, काल और स्वरस आदि की भावना से, समय को अधिकता से, ( पात्र आदि की मित्रता से ), उत्पन्न कर दिये जाते हैं । बिलोने पर दही के गुण भिन्न हो जाते हैं । दूध को मिट्टी के बर्तन और लोहे के बर्तन में पकाने पर उसके स्वाद में अन्तर आ जाता है ॥ २२ ॥
संयोगस्तु द्वयोर्बहूनां द्रव्याणां संहतीभावः, स विशेषमारभते यन्नैकैकशो द्रव्याण्यारभन्ते । तद्यथा मधुसर्पिषोः, मधुमत्स्यपयसा च संयोगः ॥ २३ ॥
( ३ ) संयोग -दो या दो से अधिक पदार्थों का मिलना 'संयोग' कहाता है । संयोग विशेष कार्य उत्पन्न करता है जब कि अकेला २ द्रव्य वह कार्य उत्पन्न नहीं करता । जैसे, मधु और घो का समान मात्रा में संयोग मारक है, पृथक् पृथक नहीं । इसी प्रकार मछली और दूध का संयोग कुष्ठ रोग को उत्पन्न करता है, पृथक् पृथक् नहीं ॥ २३॥
राशिस्तु सर्वप्रहपरिग्रह मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः । तन्त्र सर्वस्या ss हारस्य प्रमाणग्रहणमेकपिण्डेन सर्वग्रहः । परिग्रहश्च पुनः
प्रमाणग्रहणमेकैकत्वेनाऽऽहारद्रव्याणाम् । सर्वस्य हि ग्रहः सर्वग्रहः ।
सर्वच प्रहः परिग्रह उच्यते ॥ २४ ॥
( ४ ) राशि-दो प्रकार की होती है । ( १ ) सर्वग्रह और ( २ ) परिग्रह | राशि का प्रयोजन मात्रा और अमात्रा अर्थात् कम या अधिक मात्रा में भोजन या औषध के लेने से उत्पन्न अच्छे या बुरे परिणाम का निश्चय करना है । सम्पूर्ण आहार को एक पिण्ड की मात्रा में ग्रहण करने का नाम ' सर्वग्रह' है । आहार द्रव्यों को एक एक करके नियत प्रमाण में १. पानी से बार बार धोने पर पदार्थ के गुण बदल जाते हैं । यथा-'सुधौत', प्रसुतः, स्विन्नः, संतसम्बोदनो लघुः । मथने से -दधि घोष करती है, [ मथने पर स्नेह होने पर भी शोथप्न है । पात्र में चांदी के पात्र में दही, [के पात्र में पानी रखना उत्तम है । काल के कारण पन्द्रह दिन के पीछे या पिये । देशमै राख के ढेर में रक्खे ।
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चरकसंहिता [अ०१४९० ग्रहण करने का नाम 'परिग्रह' है । सब भोज्य पदार्थों के समुदाय रूप में एक साथ मिलाकर उसमें से ग्रहण करना 'सर्वग्रह' है और सब में से प्रत्येक से पृथक् पृथक् ग्रहण करना ‘परिग्रह' है । ( आहार मात्रा – अमि और आहार- द्रव्य की अपेक्षा करती है । इसलिये अभि बल की अपेक्षा से सर्वग्रह ' और द्रव्य की अपेक्षा से परिग्रह समझना चाहिये ) ॥ २४ ॥
देशः पुनः स्थानं द्रव्याणामुत्पत्तिप्रचारौ देशसात्म्यं चाऽऽचष्टे ॥ २५॥
( ५ ) देश का अर्थ है स्थान | यह स्थान ( स्थावर और जंगम ) द्रव्यों की उत्पत्ति, प्रचार के साथ साथ देश सात्म्य को भी बताता है । उत्पत्ति से जैसे - हिमालय में उत्पन्न अन्नादि गुरु और मह में लघु होता है । प्रचार से जैसे – लघु पदार्थ खाने वाले, मरु भूमि में विचरने वाले, बहुत फिरने वाले प्राणियों का मांस लघु होता है, अन्यों का गुरु । देशनात्म्य जैसे अनूर देश में उष्ण, रूक्ष और मरुभूमि में शीत स्निग्ध पदार्थ हितकारी हैं ॥ २५ ॥
कालो हि नित्यवस्थिकश्च । तत्राऽऽवस्थिको विकारमपेक्षते, नित्यगस्तु खल्वृतुखात्म्यापेक्षः ॥ २६ ॥
( ६ ) काल दो प्रकार का है । नित्यग और आवस्थिक । रोगी की अवस्थानुरूप इन में आवस्थिक काल विकार को अपेक्षा करता है । नित्यग काल ऋतु, सात्म्य, शीत, उष्ण, वर्षा आदि की अपेक्षा करता है ॥ २६ ॥
उपयोगसंस्था तु उपयोगनियमः, स जीर्णलक्षणापेक्षः ॥ २७ ॥
( ७ ) उपयोग संस्था --उपयोग- व्यवस्था या उपयोग नियम को उपयोग- संस्था कहते हैं । यह भोजन के पचने की अपेक्षा करता है । 'जीर्णेऽश्नीयात्' यह आगे कहेंगे || २७ ॥ उपयोक्ता पुनः यस्तमाहारमुपयुङ्क्ते यदायत्तमोकसात्म्यम् ॥ २८ ॥
( ८ ) उपयोक्ता–जो उस आहार का उपयोग करता है, उस भोका को
'उपयोक्ता' कहते हैं । जिस के अधीन अभ्यास- सात्म्य है ॥ २८ ॥
इत्यष्टाबाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । एषां विशेषाः शुभाशुभफलप्रदाः परस्परोपकारका भवन्ति, तान् बुभुत्सेत । बुद्धबा चहितेप्सुरेव स्यात् न च मोहात्प्रमादाद्वा प्रिय महितमसुखोदकेमु- पसेव्यं किचिदाहारजातमन्यद्वा ॥ २६ ॥
१ सर्वग्रह -एक मनुष्य का भोजन आठ छटांक होना चाहिये । परिग्रह- चाव, दो टांक, आटा-५ छटांक, दाङ एक छटांक, शाक- एक । प्रकार से आठ छटांक ।
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अ० [१ ] विमानस्थानम् ४९१ इस प्रकार से आहार विधि के विशेष आठ आयतन कह दिये हैं । ये प्रकृति आदि आठों आयतन शुभ और अशुभ फल ( स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य ) को उत्पन्न करने में परस्पर एक दूसरे के सहायक होते हैं । इस लिये वैद्य इन को भी जाने । इन में जो समधातुओं को प्रकृति में रक्खें और विषम धातुओं को समान करें उन को जानकर हितकारक का सेवन करे । मोह, अज्ञान अथवा लापरवाही से आपातप्रिय ( सेवन के समय अतिप्रिय ), परन्तु उत्तरकाल में परिणाम में दुःख विकार वा रोगकारक अहित आहार पदार्थों या अन्य इस प्रकार के बिहार का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ तत्रेदमाहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां च केषांचित्काले प्रकृ- त्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जीर्णे वीर्या- विरुद्धमिष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नातिविलम्बितम जल्पन्नह- संस्तन्मना भुञ्जीताऽऽत्मानमभिसमीक्ष्य सम्यक् ॥ ३० ॥
यहां आगे कही जाने वाली आधार विधि स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिये उचित समय में स्वभाव से हितकारक होती है । आहार विधि - उष्ण ( गरम ) भोजन खावे, स्निग्ध भोजन करे, मात्रानु-खार खाये, पूर्व भोजन के जीर्ण होने पर खाये, अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खाये मनोवाच्छित स्थान पर, मन के अनुकूल उपकरणों के साथ, न बहुत जल्दी, न बहुत धीरे, बिना बोले, बिना हँसे, पूर्ण मन देकर, आत्मा के साम्य या अपनी शक्ति को देखकर भली भांति विचार कर खाये ॥ ३० ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः-उष्णमश्रीयात् । उष्णं हि भुज्यमानं स्वदते, भुक्तं चाग्निमौदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं च जरां गच्छति, वातं चानुलोमयति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, तस्मादुष्णमश्रीयात् ॥ ३१॥
इस प्रकार भोजन करने के सद्गुणों का उपदेश करते हैं — गरम, जितना-गरम मुख में सहन हो सके, उतना गरम भोजन करे । गरम भोजन रुचि उत्पन्न करता है, खाने में अच्छा लगता है । खाने पर जाकर अग्नि को बढ़ाता है,
शीघ्र पाचन हो जाता है । वायु का अनुलोमन करता है, कफ को सुखाता है ।
इस किये गरम भोजन खावे ॥ ३१ ॥
स्निग्धमभीयात् । स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, युक्त मौदर्यमग्नि- ति, क्षिप्रं जगच्छति, वातमनुलोमयति, दृढीकरोति शरीरो- बलाभिवृद्धि चाभिजमयति, वर्णप्रसादमपि चाभिनिवर्तयति यात् ॥ ३२ ॥
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४६२ चरकसंहिता [अ० १ स्निग्ध भोजन करे ।स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है । खाने पर निर्बल जाठराग्नि को बढ़ाता है । शीघ्र परिपाक होता है । वायु का अनुलोमन करता है, शरीर को बढ़ाता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, शरीर में बड़की वृद्धि करता है, रंग में कान्ति, चिकनाई उत्पन्न करता है, इसलिये स्निग्ध भोजन करे || ३२ ॥ मात्रावदश्रीयात् । मात्रावद्धि भुक्तं वात- पित्त-कफानप्रपीडयदायुरेव विवर्धयति केवलं सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यर्थं च परिपाकमेति, तस्मान्मात्रावदश्रीयात् ॥ ३३ ॥
मात्रा में खावे । मात्रा में खाया हुआ अन्न वात, पित्त और कफ को कुपित नहीं करता, केवल आयु को ही बढ़ाता है । परिपाक होकर सुखपूर्वक गुदा मार्ग से बाहर निकल आता है । शरीर की अन्तराग्नि को नहीं बिगाड़ता, बिना कष्ट के परिपाक हो जाता है, इसलिये मात्रा में भोजन करे ॥ ३३ ॥
जीर्णेऽश्रीयात् । अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजात पूर्वस्याऽऽहारस्य रसमपरिणतमुत्तरेणाऽऽहाररसेनोपसृजत् सर्वान्दो-पान् प्रकोपयत्याश, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थानस्थेषु दोषेष्वग्नौ चोदीर्णे, जावायां च बुभुक्षायां विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु, चोद्गारे विशुद्धे, विशुद्धे च हृदये, वातानुलोम्ये, विसृष्टेषु च बात- मूत्रपुरीष-वेगेष्वभ्य-बहतमाहारजातं सर्वशरीरधातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलम्, तस्माज्जीर्णेऽश्रीयात् ॥ ३४ ॥
पूर्व -भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर खावे । अजीर्ण अवस्था में भोजन करने से पूर्व में खाये हुए भोजन के अपरिपक्व रस से नवीन आहार का रस मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर देता है । इसलिये पूर्व भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर, दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अभि के उद्दीप्त होने पर, भूख लगने पर, अन्नवह स्रोतों के मुखों के खुल जाने पर, डकार के विशुद्ध होने पर, हृदय ( आमाशय ) के साफ होने पर, वायु के अनुकूल होने पर वायु, मूत्र, मल के बेगों के साफ होने पर किया हुआ भोजन शरीर के सब धातुओं को समान अवस्था में रखता हुआ, केवल आयु को ही बढ़ता है, इस लिये जीर्ण अवस्था में भोजन करे ॥ ३४ ॥
र्याविरुद्ध श्रीयात् | अविरुद्धवीर्यमभन् हि न विरुद्ध जैर्विकारैरयमुपसृज्यते, तस्माद्वीर्याविरुद्धमभीयात् ॥ ३५ ॥
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खाये । अविरुद्ध