चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 511–520
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 511–520
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अ० १ ] विमानस्थानम् ४६३ वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होने वाले ( कुष्ठ, वीसर्प आदि ) रोगों से मनुष्य बचा रहता है, इसलिये अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे ॥ ३५ ॥
इष्टे देशेऽश्रीयात् । इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनोवि घातकरैर्भावैर्मनविघातं प्राप्नोति, तथेष्टैः सर्वोपकरणैः, तस्मादिष्टे देशे तथेष्टसर्वोपकरणं चाश्रीयात् ॥ ३६ ॥
अभिमत प्रदेश में मनोनुकूल उपकरणों के साथ भोजन करे । मनो- बाच्छित स्थान में भोजन करने से, अनिष्ट देश में उत्पन्न होने वाले, मन को दुःखी करने वाले भावों से मनुष्य दुःखी नहीं होता है । यही बात मन के अनुकूल उपकारणों के साथ भी जाने । इसलिये इष्ट स्थान में और अभिमत उपकरणों के साथ भोजन करें ॥ ३६ ॥
नातिद्रुतमयात्, अतिद्रुतं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं, भोज-नस्याप्रतिष्ठानं, भोज्यदोषसाद्गुण्योपलब्धिश्च न नियता, तस्मान्नाति- द्रुतमश्नीयात्॥ ३७ ॥
बहुत जल्दी जल्दी भोजन नहीं करे । बहुत जल्दी भोजन खाने से भोजन उन्मार्ग अर्थात् विरुद्ध मार्ग में जाने लगता है । जल्दी खाया हुआ भोजन अवसन्नता पैदा करता है, तथा भोजन आमाशय में नहीं रहता, वमन हो जाता है । जल्दी खाने से भोजन के गुण दोष की पहिचान भी नहीं होती, इसलिये बहुत जल्दी भोजन नहीं करे ॥ ३७ ॥
नातिविलम्बितमभीयात् । अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिम-धिगच्छति, बहु भुङ्क्ते, शीतीभवति चाऽऽहारजातं विषमपार्क च भवति, तस्मान्नातिविलम्बितमश्रीयात् ॥ ३८ ॥
बहुतधीरे रुक रुक कर भी भोजन नहीं करे । बहुत धीरे धीरे खाने से पुरुष को कभी तूति नहीं होती, इसलिये बहुत खा जाता है । भोजन भी ठण्डा पड़ जाता है, भोजन विषम रूप में पचता है, इसलिये बहुत धीरे धीरे भोजन नहीं करे || ३८ ॥ अनल्पन्न संस्तन्मना भुञ्जीत -जल्पतो इसवोऽन्यमनसो वा भुञ्जा- नस्य स एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रवमभवः, तस्माद जल्पन्नह- संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ २६ ॥
बातें न करते हुए या न हंसते हुए मनोयोग के साथ भोजन करे । बातें हुए और हंसते हुए अथवा दूसरी तरफ अन्य कार्य में मन को लगाये
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४६४ चरकसंहिता [अ०२ हुए भोजन करने पर वे ही दोष उत्पन्न होते हैं जो जल्दी खाने में उत्पन्न होते हैं । इसलिये बिना बोले, बिना हंसे, पूर्ण मनोयोग के साथ भोजन करे ॥ ३६ ॥
आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक् । इदं ममोपशेते, इदं नोपशेत इति विदितं हास्य आत्मन आत्मसात्म्यं भवति, तस्मादात्मानमभि- समीक्ष्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ ४० ॥
अपनी रुचि वा हित -अहित को देखकर भोजन करे । मेरी आत्मा को यह अनुकूल है, यह प्रतिकूल है, यह मेरे सात्म्य है, यह मेरे असात्म्य है,
ऐसा विचार कर खावे । इस प्रकार खाने से आत्मसात्म्य का शान रहता है ।
इसलिये अपनी शक्ति और हित- अहित का विवेचन करके खाना चाहिये ॥ ४०॥
भवति चात्र - रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः ।
वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक्॥ ४१ ॥
जो पुरुष रस, द्रव्य, दोष, विकार, प्रभाव, देश, काल, शरीर ( प्रकृति, सव और सात्म्य ) इन को भली प्रकार जानता है वही हम में से वैध होने योग्य है ॥ ४१ ॥
तत्र लोकौ विमानार्थी रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः ।
द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥ ४२ ॥
आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च ।
विमाने रससंख्याते सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ४३ ॥
विमानस्थान का प्रयोजन, रस, द्रव्य, दोष और रोग इन चारों का प्रभाव, बहुत अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, तीन प्रकार का सात्म्य, आठ आहार विधि के आयतन, भोजन का साद्गुण्य, ये सब बातें इस 'रस ' संशक विमान में भगवान् आत्रेय ने प्रकाशित कर दी हैं ॥ ४२-४३ ॥ इत्यनिवेशकुते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातत्रिविमकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माssह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ I080- अब इसके आगे 'त्रिविध कुक्षीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करें
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
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era2 ] विमानस्थानम् ४६५ त्रिविधं कुमौ स्थापयेदवकाशशिमाहारस्याऽऽहारमुपयुञ्जानः; तद्यथा- कमवकाशशि मूर्तीनामाहारविकाराणामेकं द्रवाणामेकं पुनर्वातपित्त- मणाम् । एतावत ह्याहारमात्रामुपयुब्जानो नामाश्राहारजं किन- दशुभं प्राप्नोति ॥ ३ ॥
आहार करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह भोजन के निमित्त पेट में तीन विभागों की कल्पना करे । एक स्थान मूर्त्त ( स्थूल ) आहार के लिये, दूसरा द्रव ( पेय ) पदार्थों के लिये और तीसरा वात, पित्त और कफ के लिये । इस प्रकार तीन विभाग करके आहार मात्रा का उपयोग करनेवाले पुरुष को आहार की अमात्रा से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के अशुभ परिणाम नहींहोते ॥ ३ ॥
शक्यंन च प्रकृत्यादीनामष्टानामाहारविधिविशेषायतनानांकेवलं मात्रावत्त्वादेवाऽऽहारस्य त्स्नमाहारफलसौष्ठवमवाप्तुंप्रविभक्त-फलखात् ॥ ४ ॥
एतावानेवतन्त्र तावदाहारराशिमधिकृत्यह्याहारराशिविधिविकल्पोमात्रामात्राफलविनिययार्थःयावन्मात्रावश्वममात्रा-प्रकृतः । वत्वं च ॥ ५ ॥
केवल आहार की मात्रा से ही सम्पूर्ण आहार फल की उत्तमता प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृति आदि जो आठ आहार-विधि के विशेष अंग हैं, इन का भी भिन्न भिन्न फल होता है । यहां पर प्रकृति आदि आठ आहार -विधि विशेषों में आहार की राशि को लेकर मात्रा और अमात्रा के फल का निश्चय करने के लिये यह प्रकरण है । आहार की राशि विधि का मेद इतना ही है कि मात्रा का परिमाण इतना और अमात्रा का परिमाण इतना है ॥ ४-५॥ तत्र मात्रावस्त्वं पूर्वमुपदिष्टं कुक्ष्यंशविभागेन तद् भूयो विस्तरे-णानुव्याख्यास्यामः । तथथा— कुक्षेरप्रपीडनमाहारेण, हृदयस्थानव-रोधः पार्श्वयोरविपाटनं, अनतिगौरवमुदरस्य, प्रीणनमिन्द्रियाणां चुत्पिपासोपरमः स्थानासन-शयन-गमन-प्रश्वासोच्छ्वास-हास संकथासु च सुखानुवृत्तिः सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं, बलवर्णोपचयकरत्वं चेति मात्रावतो लक्षणमाहारस्य भवति ॥ ६ ॥
इनमें मात्रा ( मात्रा ) को कुक्षि के विभाग से प्रथम संक्षेप में कह है । अब मात्रा और अमात्रा दोनों को विस्तार से कहते हैं । जैसे— सेरे का पीड़ित ( दबना ) न होना, हृदय ( श्वासप्रश्वास ) का
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४९६ चरकसंहिता [ अ०.२ www न ककना, भोजन के भार से पार्श्वो का न फटना ( फटते हुए प्रतीत न होना, अधिक न तनना ), पेट में बहुत भारीपन का प्रतीत न होना, आंख आदि इन्द्रियों का पूर्ण सन्तुष्ट होना, भूख और प्यास का शान्त होना, स्थान ( सीमा खड़ा होने में ) आसन ( बैठने में ), सोने में चलने में, श्वास लेने एवं छोड़ने में, हास्य और बातचीत में सुखपूर्वक प्रवृति, दिन में किये भोजन का सायंकाल और रात्रि में किये भोजन का प्रातःकाल तक सुखपूर्वक जीर्ण हो जाना, बल, वर्ण, उपचय ( पुष्टि ) का शरीर से होना ये सब मात्रा में किये भोजन के लक्षण हैं ॥ ६ ॥
अमात्रावस्वं पुनद्विविधमाचक्षते । हीनमधिषं चेति । तत्र हीन-मात्रमाहारराशि बलवर्णोपच यक्षयकरम तृप्तिकरमुदावर्तकरमवृष्यम-नायुष्यमनौ जस्यं शरीरमनोबुद्धीन्द्रियोपघातकरं सारविधमनमलक्ष्म्य - मशीतेश्च वातविकाराणामायतनमाचक्षते ॥ ७ ॥
अमात्रा - अहार की अमात्रा दो प्रकार की बताते हैं । ( १ ) हीन और ( २ ) अधिक । इन में आहार राशि की हीन मात्रा बढ और वर्ण को पुष्ट नहीं करती, न मनुष्य को तृप्त करती है, वह उदावत -रोग को उत्पन्न करती है, आयु, वोर्य एवं ओज के लिये हितकारी नहीं है, मन, बुद्धि, इन्द्रिय ( आंख आदि ) को नष्ट करने वाली है । सार ( स्वग्रक आदि ) को नष्ट करती है । अलक्ष्मी ( गरीबी ) को पैदा करती है । दीनमात्रा अस्सी प्रकार के वायु रोगों का कारण होती है ऐसा वैद्य लोग बताते हैं ॥ ७ ॥
अतिमात्रं पुनः सर्वदोषप्रकोपणमिच्छन्ति सर्वकुशलाः ॥ ८ ॥
यह मूर्तानामाहारविकाराणां सौहित्यं गत्वा पश्चाद्द्रवैस्तृप्त- मापद्यते भूयस्तस्याऽऽमाशयगता वातपित्तश्लेष्मागोऽभ्यवहारेणातिमात्रे- नातिप्रपाड्यमानाः सर्वे युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते ॥ ६ ॥
ते प्रकुपितास्तमे वाऽऽहार राशिमपरिणतमाविश्य कुछयैकदेशमाश्रिता विष्टम्भयन्तः सहसा वाऽप्युत्तराधराभ्यां मार्गाभ्यां प्रच्यावयन्तः पृथक् पृथगिमान् विकारानभिनिवेर्तयन्त्यतिमात्रभोक्तुः ॥ १२ ॥
आहार राशि की अतिमात्रा से सत्र दोष प्रकुपित होते हैं, ऐसा कुशल चिकित्सक मानते हैं । जो मनुष्य मूर्त्त ( स्थूल ) आहार पदार्थों से पेट भर लेता है और ऊपर से पेय पदार्थों को पूर्णरूप से पी लेता है । उसके आमाशयमें स्थित वात, पिरा और कफ दोष इस अति अधिक भार से पीड़ित होकर साथ कुपित हो जाते हैं । वे प्रकुपित हुए दोष इस कबी ( अररि
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विमाख्यानम्अ०.२ ] ३२ राशि के साथ मिलकर इस आहार यक्षि को उतर के एक भाग में रोक देते हैं । अथवा सहसा ऊपर या नीचे के ( ऊर्ध्व या अध ) मार्गों से बाहर निकालने खगते हैं । अधिक खानेवाले, पुरुष में भिन्न २ नाना रोग पृथक्२ रूप से उत्पन्न करते हैं ॥ ६-१० ॥ तत्र वातः शूलानाहाङ्ग मर्द मुखशोष मूड भ्रमाभिवैषम्य-सिरासं-कोचन संस्तम्भनानि करोति । पित्तं पुनर्व्वरातीसारमन्तदहं तृष्णा- मद्भ्रमप्रलपनानि । इलेष्मा तु छर्धरोचका विपाकशीतज्वरालस्य गात्रगौ- खाभिनिर्वृत्तिकरः संपद्यते ॥ ११ ॥
वायु, शूल, अफारा, अंगमर्द ( अंगों का टूटना ), मुख का शुष्क होना, मूर्च्छा, भ्रम, अभि की विषमता, पार्श्वमह, पृष्ठमह, कटिमइ, खिराओं का आकुञ्चन ( संकोच ) और स्तम्भन ( जड़ता ), इन विकारों को उत्पन्न करता है । पिचवर, अतिसार, अन्तर्दाह ( शरीर में जलन ), तृष्णा, मद, भ्रम और प्रलाप को उत्पन्न करता है और कफ छर्दि ( वमन ), अरुचि, अविपाक, शीतज्वर, आलस्य और शरीर में भारीपन पैदा करता है ॥ ११ ॥
न खलु केवलमतिमात्रमे वाऽऽहार राशिमाम प्रदोषकरमिच्छन्ति, अपि तु खलु गुरु-रूक्ष -शीत-शुष्क-द्विष्ट विष्टम्भि विदाह्यशुचि विरुद्धानामकाले चान्नपानानामुपसेवनं,काम -क्रोध-लोभ मोहेर्ष्या-ही-शोक-मानोद्वेग भयो-पतसेन मनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते तदध्याममेव प्रदूषयति || १२|| कुशल वैद्य केवल आहार राशि की अतिमात्रा को ही आमदोष का कारण नहीं मानते । किन्तु प्रकृति से भारी, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्वेषयुक्त ( मन के प्रति-कूल ), विष्टम्भी ( बायु, दर्द के होने पर भी मल का न आना ), दाह ( जलन) करने वाले, अपवित्र, प्रकृति, संस्कार, राशि में विरोधी खान-पान का सेवन अथवा हितकारी अन्न को भी अनुचित काल में वा वमन, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, खखा, शोक, मन के उद्वेग, भय आदि अवस्था में किया हुआ अन्न-पान भी आम को ही दूषित करता है ॥ १२ ॥
भवति चात्र - मात्र याऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्न' न जीर्यति ।
चिन्ता-शोक- भय-क्रोध-दुःख- शय्या-प्रजागरैः ॥ १३ ॥
द्विविधामप्रदोषमाचक्षते भिषजो विसूचिकामलसके ।
विसूचिका चाघच प्रयुतामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥१४॥
रु हितकारी. में, पथ्य-सोने,अनरात्रिमात्रामें सेजाननेखानेसे परजीर्णभी चिन्तानहीं होता, शोकहै, । इसमभय, क्रोष
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४८ चरकसंहिता [अ०२ प्रदोष ( भोजन के इस प्रकार न पचने ) को वैद्य दो प्रकार का मानते हैं । ( १ ) विसूचिका और ( २ ) अळसक । इन में विसूचिका के अन्दर आम दोष ( भोजन का न पचा अंश ) ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से बाहर निकलता है | १३-१४ ॥ अलसकमुपदेक्ष्यामः –दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणो बात- मूत्र-पुरीष-dr-विधारिणः स्थिर -गुरु-बहु रूक्ष -शीत -शुष्कान्नसे विनस्तदन्नपानमनि- लप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी भवति ततश्छर्धतीसारवर्ज्यान्यामप्रदोषलिङ्गानि यथोक्तान्यभिदर्शय-त्यतिमात्राणि । अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तियैग्गच्छ- न्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकम- साध्यं ब्रुवते ॥ १५ ॥
अलक का उपदेश करते हैं-- दुर्बल, अल्पाभि, बहुत कफयुक्त, वात आदि के वे के स्वभाव के, स्थिर, गुरु, बहुत, रूक्ष, शीत, शुष्क इस प्रकार के अन्न को सेवन करने वाले पुरुष में वायु खान-पान को पीड़ित करता है और कफ से मार्ग रुके होने से वह बाहर नहीं निकलता । वही आमाशय में बहुत अधिक मात्रा में व्याप्त हो जाता है । और आलस्य ( मन्दता ) के कारण बाहर भी नहीं आता । इसलिये इस को 'अलसक' कहते हैं । बाहर न होने से वमन ओर अतिसार को छोड़कर शेष अन्य आमदोष के क्षण बहुत अधिक मात्रा में स्पष्ट होते हैं । असाध्य अलसक - बहुत अधिकमात्रा में दूषित हुए वात आदि दोष दुष्ट आम द्वारा मार्गों के रुक जाने पर तिरछे गति करते हुए कभी अकस्मात् इस बहुत खाने वाले पुरुष के सम्पूर्ण शरीर को दण्डे की भांति स्तब्ध कर
( जकड़ ) देते हैं । इसलिये इस अलसक को असाध्य कहते हैं ॥ १५ ॥
विरुद्धाध्यशनाजीर्णाशनशीलिन; पुनरामदोषमामविषमित्याचक्षते भिषजो विषसदृशलिङ्गत्वात् । तत्परमसाध्यमाशुकारित्वाद्विरुद्धोप क्रमत्वाचेति ॥ १६ ॥
विरुद्ध भोजी, अध्यशन ( खाने के ऊपर खाना खाने ) और अजीर्णाव-स्था में भोजन करने वाले पुरुष के दोष को वैद्य ' आमविष' कहते हैं, क्योंकि इसके लक्षण विष के समान होते हैं । ( आम दोष में भी विष के खाने के समान मुख से छालालाब होता है ) । यह भी बहुत असाध्य है । विषरूप होने से शीघ्र मारने वाला है और इसमें जो उपचार!
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०२ ] विमानस्थानम् ४६९ यह विरोधी गढ़ है । अर्थात् विष में शीतक्रिया और आम एवं अजीर्ण में उष्णक्रिया करनी अपेक्षित है, ये दोनों परस्पर विरोधी होती हैं ॥ १६ ॥
तत्र साध्यमामं प्रदुष्टमलसीभूतमुल्लेखयेदादौ पाययित्वा लवणमुष्णं वारि । ततः स्वेदनवर्तिप्रणिधानाभ्यामुपाचरेदुपवासयेश्चैनम् ॥ १७ ॥
साध्य अहसक की चिकित्सा- दुष्ट हुए एवं अलस ( क्रियाहीन ) बने आम-दोप में लवण मिश्रित गरम पानी पिलाकर वमन कारक दोष को बाहर निकालना चाहिये । पीछे से स्वेदन ( फलवर्ति ) का उपयोग करे और रोगी को उपवास करावे ॥ १७ ॥
विसूचिकायां तु लङ्घनमेवाग्रे विरिक्तवच्चाऽऽनुपूर्वी ॥ १८ ॥
विसूचिका की अवस्था में सबसे प्रथम लंघन ही करवाना चाहिये । इसके पीछे विरेचन दिये पुरुष की भांति पेयादि की व्यवस्था ( उपकल्पनीय अध्याय [ सूत्र ० अ० १५ ] में कहे अनुसार ) करनी चाहिये ॥ १८ ॥
आमप्रदोषेषु त्वन्नकाले जीर्णाहारं पुनर्दोषावलिप्तामाशयं स्विमित-गुरुकोष्ठमनन्नाभिलाषिणमभिसमीक्ष्य पायये दोषशेषपाच नार्थ मौषधमनि संघुक्षणार्थं च, न श्वेवाजीर्णाशनम् । आमप्रदोषदुर्बलो ह्यग्निर्युगपद्दोष- मौषधमाहारजातं चाशतः पक्तुम् अपि चाऽऽमप्रदोषाहारौषधवि मोऽतिबलवत्वादुपरतकायामिं सहसैवाऽऽतुरमबलमतिपातयेत् ॥ १६॥
आम प्रदोष में औषध प्रयोग —जब भोजन जीर्ण हो गया हो, जिस का कोष्ठ जड़ और भारी हो, जो अन्न की इच्छा न करता हो, ऐसे पुरुष के शेष अपक्क दोषों के पाचन के लिये और उसके अग्नि को बढ़ाने के लिये भोजन के समय में औषध देनी चाहिये, किन्तु अजीर्ण अवस्था में भोजन के जीर्ण हुए बिना औषध नहीं देनी चाहिये । क्योंकि आम प्रदोष के कारण दुर्बल हुई अग्नि आम दोष, औषध और भोजन इन सबको एक साथ पचाने में समर्थ नहीं होती । इसके अतिरिक्त आमदोष, आहार और औषध में परस्पर विषमता अधिक बलवान् होने से शरीर की अग्नि को नष्ट करके ये निर्बल रोगी को सहसा शीघ्र ही मार सकते हैं ॥ १६ ॥
आमप्रदोषजानां पुनर्विकाराणामपतर्पणेनैवोपरमो भवति, सति स्वनुबन्धे कृतापतर्पणानां व्याधीनां निग्रहे निमित्तविपरीतमपास्योष- तविपरीतमेवावचारयेद्यथास्वम् । सर्वविकाराणामपि च निग्रहे परीतमौषधमिच्छन्ति कुशलाः; तदर्थकारि वा ||२०|| -
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५०० चरकसंहिता [अ०२ • सम्पूर्ण आमदोषजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण ( उपवास ) से होती है ' । संतर्पण से उत्पन्न रोगों में अपतर्पण किया कारण के विपरीत है । परन्तु अप तर्पण करने पर भी जहाँ अनुबन्ध हो वहां पर निदान के विपरीत औषध को छोड़कर रोग के विपरीत ( जो जिस रोग के विपरीत हो ) वही औषध देनी चाहिये । यह बात केवल आमदोषजन्य रोगों के लिये ही नहीं है; अपितु सब रोगों के शमन के लिये निदान और रोग दोनों के विपरीत औषध देनी चाहिये ऐसा कुछ चिकित्सकों का मत है ॥ २० ॥
विरुतामप्रदोषस्य पुनः परिपकदोषस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्था- एनानुवासन विधिवत्नेहपानं च युक्त्या प्रयोज्यं प्रसमीक्ष्य दोष- भेषज देश- काल- बल- शरीराहार- साम्य सत्त्व- प्रकृति- वयसामवस्थान्त- राणि विकाराश्च सम्यगिति || २१|| जब आम प्रदोष शान्त हो जायें, दोषों का परिपाक हो जाय, अग्नि प्रदीस हो जाय तब दोष, देश, औषध, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्य, प्रकृति और आयु आदि अवस्थाओ को तथा विकारों को भली प्रकार देखकर अभ्यंग, आस्थापन, अनुवासन आदि कर्म और विधिपूर्वक स्नेह-पान युक्ति से कराना चाहिये ॥२१ ॥
भवन्ति चात्र -अशितं खादितं पीतं लीढं च क विपच्यते ।
एतत्त्वां धीर! पृच्छामस्तन्न आचछत्र बुद्धिमन्! ॥ २२॥
इत्यग्निवेशप्रमुखः शिष्यैः पृष्टः पुनर्वसुः ।
आचचले ततस्तेभ्यां यत्राऽऽद्वारो विपच्यते ॥ २३ ॥
नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ।
अशितं खादितं पीतं लीढं चात्र विपच्यते ॥ २४ ॥
आमाशयगतः पाकमाहारः प्राप्य केवलम् ।
पक्कः सर्वाश्रयं पञ्चाद्धमनीभिः प्रपद्यते ॥ २५ ॥
१. अपतर्पण दोष बल की अपेक्षा से तीन प्रकार का है । ( १ ) लंघन, ( २ ) संघन पाचन और ( ३ ) दोषावसेचन । अल्पदोष में लंघन, मध्य दोष में कंचन- पाचन और बहुदोष मे दोषावसेचन करना चाहिये । २. गुरु और स्निग्ध पदार्थों से उत्पन्न रोग में लघु रूक्ष चिकित्सा | स्नेह स्वेदजन्य रोग में इंधन-मंदण । वमन में और अधिक चमन कराना चि
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०३ ] विमानस्वनम् १०१ खाये जाये, पीये या चाटे सब अम्म -पान कहाँ पर पछते हैं, है धीर गुरो! यह हम आप से पूछते हैं, हे बुद्धिमन्! यह आप हम को बताइये । इस प्रकार अग्निवेश आदि शिष्यों के पूछने पर पुनर्वसु ने उन को उपदेश किया । मनुष्य के नाभि और स्तनों के मध्यवर्ती प्रदेश को 'आमाशय' कहते हैं । स्तनों से नीचे और नाभि से ऊपर 'आमाशय' और नाभि से नीचे गुदा से ऊपर 'पक्वाशय' है । आमाशय में अमित खादित, पीत और कीट यह चारों प्रकार का अन्न पचता है । आमाशय में पहुंचा सब प्रकार का अन्न यहाँ पर परिपक्क होकर घमनी- स्रोतों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है ॥ २२-२५॥
तत्र श्लोकौ—तस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम् ।
मात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्त' विभागशः ॥ २६ ॥
आहारविध्यायतनानि चाष्टौ सम्यक्परीक्ष्याऽऽत्महितं विदध्यात् ।
अन्यश्च यः कश्चिदिहास्ति मार्गों हितोपयोगेषु भजेत तं च ॥२७॥
मात्रावाले आहार के लक्षण और फल पूर्ण रूप में कह दिये हैं । इसी प्रकार अमात्रा अर्थात् होन और अधिक रूप में सेवन किये आहार के लक्षण और फल पृथक् २ करके कह दिये हैं । आहार विधि के आठ आयतन ( कारणों, अंगों ) की ठीक २ परीक्षा करके अपना हित करें और भी जो कोई उत्तम मार्ग जिसका उपदेश नहीं किया हो उस को भी हित पदार्थों के उपयोग के अवसरों में प्रयोग करे ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविधकुक्षीयविमानं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथातो जनपदोद्धवंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽहं भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ‘ जनपद - उद्ध्वंसनीय ' नाम विमान का व्याख्यान करेंगे ।
मेसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
जनपदमण्डले पञ्चाक्षेत्रे द्विजातिवराभ्युषितायां काम्पिल्यराज- कियां भगवान्पुनर्वसुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे धर्ममासे चारमनुविचरन् शिष्यमग्निवेशमत्रवीत्॥ ३ ॥
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५०२ चरकसंहिता [ ० ३ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन द्विज वर्षों से बसे पंचाल क्षेत्र ( पंजाब ) के जनपद -मण्डल ( प्रान्त ) में, काम्पिल्य नाम राजधानी में शिष्यगण सहित भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ग्रीष्म काल के द्वितीय अर्थात् ज्येष्ठ मांस में गंगा के किनारे वन में बिहार करते हुए शिष्य अग्निवेश को बोले ॥ ३ ॥
दृश्यन्ते हि खलु सौम्य! नक्षत्र-मह- चन्द्र- सूर्यानिलानलानां दिशां चाप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका ' भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथा-वद्रस- वीर्य विपाक -प्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति, तद्वियोगाचाSSत-प्रायता नियता । तस्मात्प्रागुद्भवंसात्प्राक्च भूमेर्विरसीभावादुद्धरवं सौम्य! भैषज्यानि यावन्नोपहत -रस- वीर्य विपाक प्रभावाणि भवन्ति । वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे, ये चास्माननुकान्ति यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः, नहि सम्यगुद्धृतेषु भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यग्विचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किंचित्प्रतीकारगौ- रवं भवति ॥ ४ ॥
हे सौम्य! नक्षत्र ( अश्विनी आदि ), ग्रह ( बृहस्पति आदि ), चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक दशा में न होने पर ऋतु- विकार से उत्पन्न होनेवाले नाना परिणाम देखे जाते हैं । इधर पृथ्वी भी ओषधियों में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को शीघ्र उत्पन्न नहीं कर सकती, इसलिये प्रायः भयंकर रोगों का होना सम्भव होता है । अतः हे सौम्य! जन- पदोदूध्वंस अर्थात् देश भर को नाश कर देने वाले रोग होने से पूर्व तथा पृथ्वी के विरस ( रसहीन या विपरीत रसवाली ) होने से र्व ही औषधियों का संग्रह कर लो; जिससे कि इन ओपनियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव सुरक्षित बने रहें, नष्ट न हों । हम इन ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभावका उपयोग करते हैं, जिन को हम चाहते हैं और जो हम को चाहते हैं, उनके लिये इन औषधियों का उपयोग करेंगे । ठीक समय पर ओषधियों के उखाड़ छेने पर, ठीक प्रकार से बना लेने पर और ठीक प्रकार से दोष आदि की अपेक्षा से प्रयोग करने पर जनपद- नाशक रोगों के प्रतीकार करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥
१. सुश्रुत में इस विकार को ' मरक' कहा है । यथा- रोगप्रादुर्भावोशीतोष्णवर्षाणिमरकोखलु विपरीतान्योषधीर्व्यापादयन्तिवा भवेत् ॥, तासामुपयोगाद्सु० सूत्र.विविध