चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 61–70

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 61–70

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अ०३ ] सूत्रस्थानम् ४३ तेईसवां योग-- वाते सरके सघृतः प्रदेहो गोधूमचूर्णं छगलीपयश्च । गोधूम ( गेहूँ ) के चूर्ण को बकरी के दूध और घी के साथ मिलाकर लगाने से वातरक्त रोग मिटता है । यहां भी दूध में गेहूँ के चूर्ण के साथ घी

सिद्ध कर लेना चाहिये ।

चौबीसवां योग- नतोत्पलं चन्दनकुष्ठयुक्तं शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहः ॥ २३ ॥

'नत' ( तगर ), उत्पल ( नीला कमल ), चन्दन, कुष्ठ (कूठ) इनके चूर्ण को घी में मिलाकर शिर पर लगाने से शिर की पीड़ा मिटती है ॥ २३ ॥

पच्चीसवां योग- प्रपौण्डरीकं सुरदारुकुष्टं यचाहमेला कमलोत्पले च ।

शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहो, लोहरकापद्मकचोरकेश्च ॥ २४ ॥

प्रपोण्डरीक ( पुण्डरीक काष्ठ ), सुरदारु ( देवदारु ), कुष्ठ ( कूठ ) यष्टया ( मुलहठी ), एला ( इलायची ), कमल (श्वेत कमल, कमल गट्टा), उत्पल ( नीला कमल ), लोह ( अगर ), ऐरक (रोहित्र घास), पद्मक (पद्माख ) और चरक ( चोरपुष्पी, सुगन्धित द्रव्य है, पर्वतीय लोग दाल आदि में गेरते

हैं ), इनको घी में मिलाकर शिर दुखने पर माथे में लगाने से आराम मिलता है ।

यहां पर पीसने के लिये पानी मिला लेना चाहिये ॥ २४ ॥

छब्बीसवां योग-

रास्ना हरिद्रे नलदं शताह्वे द्वे देवदारूणि सितोपलां च ।

जीवन्तिमूलं सघृतं सतैलमालेपनं पाइर्वरुजासु कोष्णम् ॥ २५॥

रास्ना, दोनों हरिद्रा ( हल्दी और दारु हल्दी ), नलद ( जटामांसी ), दोनों शताह्ना ( सौंफ और सोया ), देवदारु, सितोपला ( मिश्री ), जीवन्ती का मूल, इनके चूर्ण को घृत और तैल ( तिल का तेल ) में (ये घी तैल दोनों परस्पर समान भाग हों ) मिलाकर गरम करके पार्श्व शूल में लेप करना चाहिये ॥ २५॥

सत्ताईसवां योग- शैवालपद्मोत्पलवेतुङ्गं प्रपौण्डरी काण्यमृणाललोधम् ।

प्रियङ्गुकालीयकचन्दनानि निर्वापणः स्यात्सघृतः प्रदेहः ॥२६॥

शैवाल ( सरवाल ), पद्म ( पद्माख ), उत्पल ( नील कमल ), वेत्र ( श्रेष्ठ वेत, लोटी बेत ), तुंग ( कमल का केशर ), प्रपौण्डरीक ( पुण्डरीक ), अमृणाल (खस ), लोध (पठानी) प्रियंगू (फूल प्रियंगु), काकीयक (चन्दन मेद,

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४४ चरकसंहिता [ अ० ३ हरि चन्दन), और चन्दन इनको ( पानी में पीस कर ) सब द्रव्यों के समान घो मिलाकर लेप करने से त्वचा का दाह, आग से जले की जलन शान्त होती है ॥ २६॥

अहाईसवां योग- सिताळतावेतसपद्मकानि ययाह्नमैन्द्री नलिनानि दूर्वा ।

यवासमूलं कुशकाशयोश्च निर्वापणः स्याज्जलमेरका च ॥ २७॥

सिता ( श्वेत ), ता ( प्रियंगू या सारिवा ), वेतस ( जल वेतस ), यष्टि ( मुलहटी ), पैन्द्री, ' नलिन' ( नीला कमल ), दूर्वा ( दूब ), यवासमूल ( धमासे की जड़ ), कुश ( दाम ), काश की जड़, जल ( बालक ), ऐरक ( होला ) इनकोजल के साथ पासकर लेप करने से त्वचा की जलन शान्त होती है । कोई सिता से मिश्री और लता से मीट का ग्रहण करते हैं ॥ २७॥

उनतीसवां तथा तवां योग-

शैलेयमेला गुरु चाथ कुष्ठं चण्डा नतं त्वक्सुरदारु रास्ना ।

शीतं निहन्यादचिरात् प्रदेहा, विषं शिरोपम्नु ससिन्धुवारः ॥ २८ ॥

शैलेय ( छडाला ), एल ( इलायची ) अगर कुछ ( कूठ ), चण्डा ( चोर पुष्पी ), नत ( तगर), त्वकू ( दालचीनी ), सुरदा ( देवदार ), रायसन इनकी पानी में पीस कर लेप करने से शांत, ठण्डक नष्ट होती है । तीसवां योग - 'शिरीष' ( सिरस ) कीविधुवार ( सम्भालु के पत्ते ) के साथ पीसकर मलने से विप दोष न होता है ॥ २८ ॥

इकतीसवां योग- झिरीपलामज्जकहेमलोग्त्वग्दोपसंस्वेदहरः: प्रथर्षः । शिप ( सिरस ), लामज्जक ( उर, खस ), हेम ( नागकेसर ), लोध्र ( पठानी लोध ) इनको चूर्ण बनाकर शरीर पर रगड़ने से त्वचा के रोग एवं

पसीने का अधिक आना नष्ट होता है ।

बत्तीसवां योग- पत्राम्बुलोध्राभयचन्दनानि शरीरदौर्गन्ध्यहरः प्रदेहः ॥ २६॥

पत्र ( तेजपात ), अम्बु ( नेत्रवाला ), लोध्र ( पठानी लोध ), अभय ( उशीर, खस ), और श्वेत चन्दन इनको पानी में पीसकर लेप करने से शरीर की दुर्गन्ध मिटती है ॥ २६ ॥

तत्र श्लोकः ।

इहात्रिजः सिद्धतमानुवाच द्वात्रिंशतं सिद्धमहर्षिपूज्यः ।

चर्णप्रदेहान्विविधामयन्नानारग्वधीये जगतो हितार्थम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 63

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४५ सिद्ध एवं ऋषियों से पूजित कृष्णात्रेय पुनर्वसु ने रोगों को नष्ट करने वाले बत्तीस सिद्ध योग जगत् के लाभ के लिये कहे हैं ॥ ३० ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतं सूत्रस्थाने पजचतुष्के आरग्वधीयों नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः अथातः षड्विरेचनशताश्रितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १॥

इति ह स्माssह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे ‘पड्ड्वरेचन' से आरम्भ किये जाने वाले अध्याय का अवतरण करते हैं । भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥ शरीर के लिये अन्तः परिमार्जन और बहिःपरिमार्जन की औषधियों को पूर्व अध्यायों में कहकर अवशिष्ट परिमार्जन की औषधियों को कहते हैं- इह खलु षड्विरेचनशतानि भवन्ति, षड् विरेचनाश्रयाः, पश्च कपाययोनयः, पञ्चविधं कषायकल्पनं, पाशन्महाकषाया पञ्च कषायशतानि इति संग्रहः ॥२॥

इस तंत्र में छः सौ विरेचन यांग हैं, न अधिक और न कम । ' विरेचन' शब्द उभयार्थ वाचक है । अर्थात् शरोर के अवोभाग से मल निःसारण का नाम भी विरेचन है और शरीर के ऊध्व भाग से वमन के रूप में किये जाने वाले संशोधन रूप कर्म को भी 'विरेचन ' कहते हैं । विरेचन द्रव्यों के छः आश्रय हैं, यथा - दूध, मूल, त्वचा, पत्र, पुष्प और फल । कषायों के पांच जातियां हैं ( इनमें लवण रस को छोड़ कर ) कषायों की कल्पना पांच प्रकार की है । पचास महाकषाय हैं, पांच सौ कषाय हैं । यह संक्षेप में कह दिया है ॥ ३ ॥

षड्विरेचनशतानीति यदुक्तं तदिह संग्रहेणोदाहृत्य विस्तरेण कल्पोपनिषद्यनु व्याख्यास्यामः ॥ ४ ॥

'छः सौ विरेचन योग हैं ' यह जो कहा है उसे यहां पर संक्षेप में कहेंगे ।

विस्तार से कल्प- उपनिषद् अर्थात् 'कल्प-स्थान ' में व्याख्या करेंगे ॥ ४ ॥

त्रयस्त्रिंशद्योगशतं प्रणीतं फलेषु, एकोनचत्वारिंशज्जीमूतकेषु योगाः, पचचत्वारिंशदिक्ष्वाकुषु, धामार्गवः षष्टिधा भवति योगयुक्तः, कुटज-स्त्वष्टादशधा योगमेति कृतवेधनं षष्टिधा भवति योगयुक्तं, श्यामात्रि-

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४६ चरकसंहिता [ अ० ४ वृद्योमशतं प्रणीतं दशापरे चात्र भवन्ति योगाः, चतुरङ्गलो द्वादशधा योगमेति, लोधं विधौ षोडशयोगयुक्तं, महावृक्षो भवति विंशतियोग- युक्तः, एकोनचत्वारिंशत्सप्तलाशङ्खिन्योर्योगाः, अष्टचत्वारिंशद्दन्तीद्रव- न्त्योरिति षड्विरेचनशतानि ॥ ५ ॥

मदन फल के कल्प में १३३ विरेचन योग, ' जोमूतक' ( बन्दाल ) फल के कल्प में ३६, ईक्ष्वाकु ( कडवी तुम्बी ) कल्प में ४५, धामार्गव ( बड़ी तुरई पीले फूल की, राज कोषातकी ) कल्प में ६०, कुटज ( कूड़े ) के फल कल्प में १८ प्रकार के, कृतवेधन ( कडुवी तोरी ) के उपयोग में विरेचन योग ६९, इस प्रकार से ये वमन रूप विरेचन योग हैं । अब अधोगामी विरेचन योग कहते हैं- श्यामा ( अरुणमूल ) की निशोथ और त्रिवृत् ( सफेद निशोथ ) कल्प के ११० यंग, 'चतुरङ्गुल ( अमलतास ) कल्प के १२ प्रकार के योग, लोध विधि ( लोध्र कल्पों में विरेचन विधि ) के अन्दर १६ योग, महावृक्ष ( स्नुही, सुधा वृक्ष ) कल्प में २०, सप्तला और शंखिनी ( शिकाकाई ) के कल्प में ३६ और दन्ती ( जमालगोटा ), द्रत्रन्ती के ४८ प्रकार के योग हैं । इस प्रकार से ६०० विरेचन योग बन जाते हैं ॥ ५ ॥

षड्विरेचनाश्रया इति क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलानीति ॥६॥

विरेचन क्रिया ओषधियों के छः ( अंगों में ) आश्रय है । यथा- क्षीर ( दूध ), मूल, त्वक्-स्वचा, पत्र, पुष्प और फल ॥ ६ ॥

पच कषाययोनय इति मधुरकषायोऽम्लकषायः । कटुकषायस्तिक्त-कषायः कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा ॥ ७ ॥

'कषाय' की पांच योनि ( जातियां ) हैं । यथा- मधुरकषाय ( मधुर रस वाले पदार्थों से बना हुआ कषाय ), अम्लकपाय ( खट्टे रस वाले पदार्थों से बनाया हुआ कषाय ), कटुकषाय ( कडुवे रसवाले पदार्थों से तैय्यार किया कषाय ), तिक्तकषाय ( तीखे पदार्थों से तैय्यार किया हुआ कषाय ), कषायकपाय ( कसैले पदार्थों से तैय्यार किया हुआ कषाय ) इन पांचो को इस शास्त्र में ' कषाय' संज्ञा है, 'लवण ' कषाय नहीं है लवण रस से कषाय तैयार नहीं होता है ॥ ७ ॥

पश्चविधं कषायकल्पनमिति, तद्यथा स्वरसः कल्कः मृतः शीतः फाण्टः कषाय इति ॥ ८ ॥

कषायकल्पन अर्थात् कषाय तैयार करने की विधि पांच प्रकार से है । यथा-स्वरस, कफ शृत, गीत और फाण्ट । कषाय शब्द सबके साथ संयुक्त है ॥ ८ ॥

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४७

कायों के लक्षण- ( यन्त्रप्रपीडनाद् द्रव्याद्रसः स्वरस उच्यते ।

यत्पिण्डं रसपिष्टानां तत्कल्कं परिकीर्तितम् ॥ ६ ॥

ast तु कथितं द्रव्यं शृतमाहुश्चिकित्सकाः ।

द्रव्यादापोथितात्तोये प्रतप्तं निशि संस्थितात् ॥ १० ॥

कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः । क्षिप्तोष्णतोये मृदितं तत्फाण्टं परिकीर्तितम् ॥ ११ ॥ )

तेषां यथापूर्व बलाधिक्यम्, अतः कषायकल्पना व्याध्यातुरबला- पेक्षिणी । नत्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति ॥ १२ ॥

स्वरख कपाय - द्रव्य को कूट कर यंत्र प्रपीडन अर्थात् यंत्र से वा हाथ आदि से दबा कर जो रस निकलता है उसे 'स्वर ' कहते हैं कल्क कषाय-– रस सहित द्रव्य को शिला आदि पर पीस कर जो गोला बना लिया जाता है उसे ' कल्क' कहते हैं । शृत कषाय अग्नि में उबाले हुए द्रव्य को वैद्य ' त' कहते हैं । बहुत गरम जल में रात भर रक्खे हुए कूटे हुए द्रव्य से जो कषाय निकलता है उसे 'शीत' कहा जाता है । फाण्ट कषाय - द्रव्य को कूटकर गरम पानी में रखकर कुछ काल पीछे मलकर जो किट्ट रहित सार-भाग निकलता है, उसे 'फाण्ट ' कहते हैं । इन में स्वरस में कल्क की अपेक्षा, कल्क में श्रुत की अपेक्षा से, शृत में शीत की अपेक्षा से, और शीत में फाण्ट की अपेक्षा से अधिक वल, सामर्थ्य और शक्ति है । इसलिये ' कषाय कल्पना' अर्थात् रोगी के लिये कषाय का विचार व्याधिबल, आतुरल अर्थात् रोगी के सामर्थ्य को देखकर करना चाहिये । ये सब कषाय सब अवस्थाओं में उपयोगी नहीं होते अर्थात् बलवान् व्याधि या बलवान् रोगी में अल्प बल वाले या मध्यम बल वाले कषाय कार्य करने में समर्थ नहीं होते । इसी प्रकार अल्प बल की अवस्था में अधिक बल वाले कषाय कार्य करने में असमर्थ होते हैं । ॥ ६-१२ ॥ पञ्चाशन्महाकषाया इति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा— पहिले जो यह कहा है कि पचास महाकषाय हैं, उनकी अब व्याख्या करते हैं । जैसे— जीवनीयो बृंहणीयो लेखनीयो भेदनीयः संधानीयो दीपनीय इति षट्कः कषायवर्गः । ( जीवनी ) जीवन के लिये हितकारी आयुवर्धक, ( बृंहणीय ) वारीर के

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४८ चरकसंहिता [अ० ४ बृंहण के लिये हितकारी, ( लेखनीय ) देह के घर्षण के लिये, भेदनीय, संधानीय, दीपनीय अग्नि को बढ़ाने वाला यह छः कषायों का एक वर्ग हुआ । बल्यो वर्ण्यः कण्ठ्यो हृद्य इति चतुष्कः कषायवर्गः, । ‘बल्य' ( बल कारक ), वर्ण्य ( शरीर की कान्ति बढ़ाने वाला ) 'काव्य' ( कण्ठ या गले के स्वर के लिये हितकारी ) 'हृद्य' ( हृदय - मन के लिये हितकारी ), यह दूसरा चार से बना हुआ कषाय वर्ग है । तृप्तिन्नोऽर्शोघ्नः कुष्ठनः कण्डूघ्नः कृमिघ्नो विषघ्न इति षट्कः कषायवर्गः । ' तृप्तिघ्न' ( जब रोगी बिना खाये अपने को भरा पेट अनुभव करता है, उसके शिकायत को दूर करने वाला) ' अशोंम' ( अर्श रोग में हितकारी), 'कुष्टम ' (कुष्ठ रोगनाशक ), 'कण्डून' ( खाज़ नाशक ), 'कृमिम ' विपन्न (क्रिमि तथा विष विनाशक ) यह तीसरा छः से बना कषाय वर्ग हुआ । स्तन्यजननः स्तन्यशोधनः शुक्रजननः शुक्रशोधन इति चतुष्कः कषायवर्गः । स्तन्य जनन ( दूध बहाने वाला ), ( स्तन्यशोधन दूध का शोधन करने- वाला ), शुक्रजनन ( धातुवर्धक ), शुक्रशोधन ( धातु शोधक, यह चौथा चार से बना कपाय वर्ग हुआ । स्नेहोपगः स्वेदोपगो वमनोपगो विरेचनोपग आस्थापनांपगोऽनु-वासनोपगः शिरोविरेचनोपग इति सप्तकः कपायवर्गः । स्नेहोपग १ ( मार्दव कर ), स्वेदोरंग ( पर्माना लाने वाला ), वमनोपग ( वान्तिकारक ), विरेचनोपग ( मलनिः तारक ), आस्थापनांपग ( रूञ्च बस्ति के लिये उपयोगी ), अनुवासनोपग ( स्नेह-बस्ति के लिये उपयोगी ), शिरो-विरेचनोपग ( नस्य के लिये उपयोगी ), यह सात कषायों से बना वर्ग । छर्दिनिग्रहणस्तृष्णानिग्रहणो हिकानिग्रहण इति त्रिकः कषायवर्गः । छर्दि-निग्रहण ( वमननाशक ), तृष्णानिग्रहण (प्यास को नष्ट करने वाला ), हिकानिग्रहण ( हिचकी नाशक ), यह तीन से बना कपाय वर्ग हुआ । पुरीषसंग्रहणीयः पुरीषविरजनीयो मूत्रसंग्रहणीयो मूत्रविरजनीयो मूत्रविरेचनीय इति पञ्चकः कषायवर्गः । पुरीषसंग्रहणीय ( मल को बांधने के लिये हितकारी ), पुरीषविरजनीय ( दोष के कारण जब मल में उचित रंग नहीं आता इसके लिये हितकारी जैसे— १ उपग' का अर्थ सहायक जैसे वमनोपग बमन कार्य में मदद देने वाला ।

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अ० ४ ] ४ सूत्रस्थानम् ४६ कामला रोग में मल श्वेत रंग का आता है, पीलापन नहीं आता ), ' मूत्र -संग्रह- णीय' ( मूत्र को कम करने वाला ), 'मूत्रविरजनीय' ( मूत्र के रंग को टीक करने वाळा ), मूत्रविरेचनीय ( मूत्रवर्धक ), यह पांच से बना कषाय वर्ग है । कासहरः श्वासहरः शोथहरो ज्वरहरः श्रमहर इति पञ्चकः कषायवर्गः । कासहर ( खांसी के लिये हितकारी ), श्वासहर ( दमे के लिये हितकारी ), शोथहर ( सूजन के लिये हितकारी ), ज्वरहर ( ज्वरनाशक ), श्रमहर ( थका- वट को मिटाने वाला ), यह पांच से बना कपाय वर्ग है | दाहप्रशमनः शीतप्रशमन उदप्रशमनोऽङ्गमर्दप्रशमनः शूलप्रशमन इति पञ्चकः कषायवर्गः । 'दाहप्रशमन ' ( जलन को शान्त करने वाला ), 'शीतप्रशमन' ( ठंडक को दूर करनेवाला ), 'उदर्द प्रशमन' ( कोठ, छपाकी, त्वचा पर उठने वाले मोटे २ चकत्तों को शान्त करने वाला ), 'अंगमर्द प्रशमन' ( अंगों को ऐंठन को दूर करने वाला ), यह पाँच से बना कषाय वर्ग है । शोणितस्थापनो वेदनास्थापनः संज्ञास्थापनः प्रजास्थापनो वयः- स्थापन इति पञ्चकः कषायवर्गः । 'शोणित-स्थापन' (रक्त रोधक ), 'वेदनास्थापन * ( पीड़ा नाशक ), 'संज्ञास्थापन' ( चेतन करने वाला ), 'प्रजास्थापन' ( संततिजनक ), वयः- स्थापन' ( आयु को टिकाने वाला ), यह पांच से बना कषायवर्ग है | इति पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थ व्याख्याता भवन्ति । तेषामेक कस्मिन्महाकषाये दशदशावयविकान्कषा- याननुव्याख्यास्यामः । तान्येव पश्च कषायशतानि भवन्ति ॥ १३ ॥

इस प्रकार से पचास महाकषाय बनते हैं । महाकषाय के लक्षण और उदाहरण संक्षेप में कह दिये गये हैं । इन एक एक महाकषायों में दस-दस अव यवों वाले कषायों की व्याख्या आगे कहेंगे । इस प्रकार से पांच सौ कषाय बनते हूँ । अर्थात्' जीवनी ' आदि संज्ञा वाले पचास महाकषायों में से प्रत्येक 'जीव- नीय' आदि संज्ञा वाले कषाय में दस-दस अवयव हैं ॥ १३ ॥

तद्यथा -जीवकर्षभको मेदा महामेदा काकोली क्षीरकाकोली मुद्गमाषपण्य जीवन्ती मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्ति ( 2 ) *वेदना स्थापन -शरीर की वेदना को मिटाकर शरीर को स्वस्थ रूप में करने वाला ।

पृष्ठ 68

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५० चरकसंहिता [अ० ४ जैसे --- जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी ( मूंगपर्णी ) मात्रपर्णी, जीवन्ती, और मधुक ( मुलहठी ) ये दस जीवनीय ( जीवनबर्धक ) हैं । श्रीरिणी राजक्षवकं बला काकोली क्षीरकाकोली वाट्यायनी भद्रौदनी भारद्वाजी पयस्यर्ण्यगन्धा इति दशेमानि बृंहणीयानि भवन्ति ॥ ( २ ) । क्षीरिणी ( क्षीरविदारी ), राजक्षवक ( दूधी ), बला ( खरेंटी ), काकोली, क्षीरकाकोली, वाट्यायनी ( कंधी ), भद्रौदनी ( खिरैटी ), भारद्वाजी ( उलट-कम्बल ), पयस्या ( विदारी कन्द ), ऋष्यगन्धा ( वृद्धदारक विधारा ), ये दस बृंहणीय अर्थात् शरीर में ( वीर्य ) वृद्धि करने वाले हैं । -कुष्ठ हरिद्रा-दारुहरिद्रा व चातिविषा- कटुरोहिणी-चित्रकचिर--बिल्व-हैमवत्य इति दशेमानि लेखनीयानि भवन्ति । ( ३ ) ॥ मुस्त ( नागर मोथा ), कुष्ट ( कूट ), हरिद्रा ( हल्दी ), वच ( घोड़ा-वच ), अतिविषा ( अतीस ), कटुरोहिणी ( कुटकी ). चित्रक ( चीता मूल ), चिरबिल्व ( करंज ), इंमत्री ( श्वेत वच ), ये दस लेखनीय हैं । सुहावृकाग्निमुखी चित्रा-चित्रक-चिरबिल्व -शङ्खनी-शकुलाद- -स्वर्णक्षीरण्यसुबहा (निशीथइति), अर्कदर्शमानि(आक दोभेदनीयानिप्रकार का भवन्तिहै और|| (४)अरुण|| ), उरुबूक ( एरण्ड ), अग्निमुखी ( कटिदारि ), चित्रा ( जमाल मोटे की जड़ ), चित्रक ( चीता मूल ), चिरविल्व ( करज ), शंखिनी, शकुलादिनी ( कटुकी ), और स्वर्णक्षीरी ( सत्यानासी ), ये दस भेदनीय हैं ॥ मधुक-मधुपर्णी-पृश्निपर्ण्यम्बटकीसमङ्गा -मोचरस धातकी- लोध्र- प्रियङ्ग-कट्फलानीति दशेमानि संधानीयानि भवन्ति ॥ ( ५ ) ॥ मधुक ( मुली ), मधुपर्णी ( गिलोय ), पृश्निपण ( पिटवन ), अम्बष्ठकी ( पाठा ), समंगा ( मजीठ ), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), धातकी ( धाय के फूल ), लोध्र ( पटानी लोध ), प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), ओर कट्फल ( काय-कल ), ये दस 'संघानीय' हैं | पिप्पलीपिप्पलीमूल -चव्य-चित्रक- शृङ्गवेराम्लवेतस मरिचाजमो- दा-भल्लातका स्थि-हिङ्गनिर्यासा इति दशेमानि दीपनीयानि भवन्ति ( ६) इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ १ ] ॥ पिप्पली, पिप्पलीमूल, चन्य ( चविका ), चीतामूल, शृंगवेर ( सोंठ या

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५१ अदरख ), अम्लवेतस मरिच ( काली मिरच ), अजमोदा ( अजवायन ), भातकास्थि ( भिलावे के बीज ), हिंगु- निर्यास ( हींग ), ये दस 'दीपनीय' अर्थात् भूख लगाने वाले अग्नि संदीपक हैं | यह छः का बना हुआ कषायवर्ग है । ऐन्द्रयृषभ्यतिरस प्रोक्ता-पयस्याश्वगन्धा-स्थिरा -रोहिणी- बलाति-बला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ॥ ( ७.) | ऐन्द्री', ऋषभी ( क ), अतिरसा ( शतावरी ), ऋप्यप्रोक्ता ( मापपर्णी ), पयस्या ( विदारी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), स्थिरा ( शालपर्णी ), रोहिणी (कटुकी, चला ( खरैंटो ), अनिला ( पीतबला ), ये दस 'बल्य' अर्थात् बल कारक है ॥ चन्दन- तुङ्ग-पद्मकोशीर-मधुक-मजिटा सारिवा पयस्या-सिता-लता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ॥ ( ८ ) ॥ चन्दन ( लाल चन्दन ), तुंग ( लाल नाग केदार ), पद्मक ( पद्मा ), उशीर ( खस ), मधुक ( मुलंही ), मंजिष्ठा ( मजीठ ), सारिवा ( अनन्तमूल), पयस्या ( विदारीकन्द), सिता ( सफेद दूध), और लता ' ( ल दूब या प्रियंगु), ये दस 'व ' अर्थात् वर्णकार वर्ष बढ़ाने वाले हैं । सारिवेक्षुमूल मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपदी-वृहती- कण्टकारिका इति दशमानि कण्ट्यानि भवन्ति ॥ ( ९ ) ॥ सारिवा ( अनन्तमूल ), इक्षुमूल ( ईल की जड़ ), मधुक ( मुलहठी ), पिप्पली, दाक्षा ( fariमश ), विदारा कन्द, कैड ( नीम ), हंसपदी ( मण्डू- कपण या ब्राह्मी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ) कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), ये दस ओषधियां 'कण्ट' स्वर के लिये हितकारी हैं । आम्राम्रातक-निकुच करमर्द- वृक्षाम्लाम्लवेतस कुबल-बदर-दाडिम- मातुलुङ्गानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ॥ ( १० ) ॥ इति चतुष्कः कपायवर्गः ॥ [ २ ] ॥ आम्र ( आम ), आम्रातक ( अम्बाड़ा ), निकुच ( डहु बदल ), करमर्द ( करज ), वृक्षाग्ल ( इमली ); अम्लवेतस, कुबल ( बड़ा बेर ), बदर ( शाड़ी का बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), ये दस 'हृद्य' अर्थात् हृदय के लिये हितकारी हैं ॥ यह चार से बना हुआ कपायवर्ग है । १. जल्पकल्पतरु में 'लता' का अर्थ मंजीठ किया है, परन्तु मंजीठ का कथन भी इसमें है, अतः दूब अर्थ ही उचित है ।

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५२ चरकसंहिता [ अ० ४ नागर- चित्रक -चव्य -विडङ्ग - मूगुडूची-वचा- मुस्त -पिप्पली -पटोला- नीति दशेमानि तृप्तिघ्नानि भवन्ति ॥ ( ११ ) || नागर ( सोंठ ), चित्रक ( चीतामूल ), चव्य ( चविका ), विडंग ( बायविडंग ), मूर्बा ( मोरबेल ), गुडूची ( गिलोय ), वचा ( वच ), मुस्त ( नागर मोथा ), पिप्पली, स्टोल ( परबल ) ये दस 'तृप्तिघ्न' अर्थात् श्लेष्मा जनित तृप्ति को नाश करने वाली हैं ॥ कुटज- बिल्व- चित्रक-नागर।तिविषाभया-धन्वयासक दारुहरिद्रा- वचा- चव्यानीति दशेमान्यर्शोघ्नानि भवन्ति ॥ ( १२ ) ॥ कुटज ( कुड़ा ), बिल्व ( बेलगिरी ), चित्रक (चीतामूल), नागर (सोंठ ), अतिविषा ( अतीस ), अभया ( बड़ी हरड़ ), धन्यवाक ( धमासा ), दाद- हरिद्रा ( दाहल्दी ), वच और चव्य ( चविका ) ये दस आपक्षियां 'अशोघ्न' अर्थात् बवासीर रोग के नाशक हैं । खदिराभ्यामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णीरग्वध करवीर- विडङ्ग-जा- तिप्रवाला इति दर्शमानि कुष्ठध्नानि भवन्ति ॥ ( १३ ) ॥ खदिर ( खैर ), अभया ( जंगी हरड़ ), आमलक ( आवला ), हरिद्रा- ( हल्दी ), अरुष्कर ( निलावा ), सप्तपर्ण ( सातवन ), आरग्बध (अमलतास, करवीर ( कनेर ), विडग ( वार्यावडंग ), और जानवाल ( चमेली के नवीन कोमल पत्ते ) ये दस कुष्ठघ्न अथात् कोढ़ रोग के नाशक हैं । चन्दन- नलद कृतमाल- नक्तमाल-निम्ब -कुटज-सर्पप-मधुक-दारुहरि द्रा-मुस्तानीति दशमानि कण्डूघ्नानि भवन्ति ॥ ( २४ ) । चन्दन ( लाल चन्दन ), नलद (जटामांसी), कृतमाल ( अमलतास ) नक्त- माल ( करंज ), निम्ब ( नीम के पत ), कुटज (कूडे कीछाल), सर्पप ( सरसों), मधुक ( मुलैठी ), दारु हरिद्रा ( दारु हल्दी ), और मुस्त ( नागर मोथा ), ये दस औषधियां 'कण्डूघ्न' अर्थात् खाज नाशक हैं । अक्षीव-मरिच -गण्डीर केचुक विडङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही श्वदंष्ट्रा-वृष- पर्णिकाखुपर्णिका इति दशेमानि क्रिमिघ्नानि भवन्ति ॥ ( १५ ) ॥ अक्षीव ( सहजन ), काली मरिच, गण्डीर ( जिमीकन्द ), केबुक, विडंग (वायविडंग), निर्गुण्डी ( सम्भालु ), किणिही ( अपामार्ग), श्वदंष्ट्रा ( गोखरु ), वृषपर्णी, आखुपर्णिका ( मूसाकानी ), ये दस कृमिघ्न अर्थात् कृमिनाशक हैं ॥