चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 521–530
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 521–530
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अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३ www. एवं वादिनं भगवन्तमात्रेय मग्निवेश उवाच उद्धृतानि खलु भगवन्! षण्यानि विहितानि च सम्यक् सम्यग्विचारचारितानि च । अपि तु खळ जनपदोद्ध्वंसनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहार -देह-बल-सात्म्य- सत्स्व- वयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अभिवेश बोले! हे भगवन्! ओषधियां ठीक प्रकार से इकट्ठी की गई, ठीक प्रकार से बना ली जायेंगी और भली प्रकार से विचार कर ही ओषधियां दी जायेंगी । परन्तु भिन्न भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सुख और आयुवाले अनेक मनुष्यों का, देश भर को ध्वंस कर देने वाला एक ही प्रकार का रोग क्यों हो जाता है ॥५॥
तमुवाच भगवानात्रेयः - एवमसामान्यानामेभिरप्यग्निवेश! प्रकृ-त्यादिभिर्भावैर्मनुष्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात्समानका-लाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनिर्वर्त्तमाना जनपद मुद्द्ध्वंसयन्ति । ते तु खल्विमे भावाः सामान्यजनपदेषु भवन्ति । तद्यथा -वायुरुदकं देशः काल इति ॥ ६ ॥
भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अभिवेश! इन प्रकृति आदि की मिलता होने पर भी जो अन्य कारण सब मनुष्यों में समान रूप से रहते हैं, उन में विकार आने से एक ही समय में, एक ही लक्षणोंवाले रोग उत्पन्न होकर जन-पद का नाश कर देते हैं । जनपदों में निम्न कारण समान रूप से होते हैं । जैसे - वायु, जल, देश और काल ॥ ६ ॥
तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात् । तद्यथा- यथर्तुविषममति-स्विमितमतिचलमतिपरुषमतिशीतमत्युष्णमविरूक्ष मत्यभिष्यन्दिनमति-भैरवारावमतिप्रतिहत परस्परगतिमतिकुण्डलिन म सात्म्य - गन्ध - बाष्प-सिकता-पांशु धूमोपहतमिति ॥ ७ ॥
इनमें निम्न लक्षणोंवाले वायु को आरोग्यनाशक समझना चाहिये । जैसे— ऋतु के विपरीत, सर्वथा गतिरहित, बहुत वेग वाला, अति कर्कश, अति शीत, अति उष्ण, अतिरूक्ष, दोष, धातु, मल, स्रोतों में अति क्विन्नता उत्पन्न करनेवाला, बहुत भीषण शब्द करनेवाला, परस्पर वायु से वायु का वेग खण्डित होता हो, आवर्स ( भंवरों ) वाला हानिकारक दुर्गन्ध वाला, बाष्प, सिकता ( रेत ), पांशु ( धूलि ) और धुंए से व्याप्त हो, तब वायु को अनारो- कारक. ( रोगकारक ) समझना चाहिये ॥ ७ ॥
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[अ०३ कंतु सम्वत्यर्थ विकृत-मन्ध- वर्ण -रस-स्पर्शवत्शोदबहुलमपक्रान्त- जलचरविहङ्गमुपक्षीणजलाशयमप्रीतिकर मपगतगुणं विद्यात् ॥ ८ ॥
-जिस पानी का गन्ध, रस, वर्ण और स्पर्श बहुत अधिक विकृत हो गया हो, जिस में क्लेद ( सडांद ) बहुत उठे, जिस पानी को जहचारी पक्षी छोड़कर चले गये हों, जिस पानी में रहने वाली मछलियां नष्ट हो गई हों और जलाशय भी कमती हो गया हो, इस प्रकार के पानी को अप्रिय और गुणरहित जाने ॥८॥
देशं पुनर्विकृत- वर्ण-गन्ध-रस स्पर्श- लेद- बहुलमुपसृष्टं सरीसृप -व्याल- मशक- शलभ मक्षिका मूषकोळक- श्म शानिक- शकुनि-जम्बुकादिभिस्तृणो- पोपवनवन्तं ताताना दिबहुलमपूर्व वदवपतितं शुष्कनष्टशस्यं धूम्रप वनं प्रातपतत्रिगणमुत्कष्टश्वगणमुद्भ्रान्त-व्यथित-विविध -मृग-पक्षि- सङ्घमुत्सृष्ट- नष्ट- धर्म- सत्य- लज्जाचार-शील- गुण-जनपदं शश्वत्क्षुभितो- दीर्णसलिलाशयं प्रततात्कापातनिर्घात्भूमिकम्पमतिभयारावरूपं रूक्ष-ताम्रारुणसिताम्र-जाल- संवृतार्क- चन्द्र - तारकमभीक्ष्णं ससंभ्रमोद्वेगमिव सन्त्रासरुदितमिव सतमस्कमिव गुह्यकाचरितमिवाऽऽक्रन्दितशब्दबहु-लमिव चाहितं विद्यात् ॥ ६ ॥
देश - जिस स्थान का वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श विकृत हो गया हो, वेद बहुल हो, जिस स्थान में सरीसृप ( सरकने वाले सांप आदि जन्तु ), ब्याल ( सिंह, चीते आदि ), मशक ( मच्छर ) शलभ ( पतंगे ), मक्खिय मूषक ( चूहे ), उलूक ( उल्लू ), श्मशान में रहने वाले पक्षी गीध, चील, गीदड़ आदि का उपद्रव हो, जहां पर ये बहुत हों, जहां पर तृण, घास, खता आदि बहुत हों, जो पहिले से एकदम नया ही दीखे, जहां पर अनाज के खेत सूख या नष्ट हो गये हों, जहां की वायु धुंवाली हों, जहां पर पक्षीगण घोर शब्द करते हों, जहां पर कुत्ते मुंह उठा कर रोते हों, जहां पर घबराये और पीड़ित नाना प्रकार के मृग-पशु -पक्षीसमूह हो, जिन नगरों में से धर्म, सत्य, छज्जा, आचार, शील, दया, दाक्षिण्य आदि गुण नष्ट हो गये हों, जहाँ के तालाबों का पानी बिना वायु के भी निरन्तर क्षुभित और तरंगों वाला रहे, जहाँ पर उल्कापात, बिजली आदि का गिरना, भूकम्प आदि लगातार हो और भयंकर शब्द उत्पन्न होता हो, जहां पर सूर्य, चन्द्र और तारे रूखे, तांबे के से, छाछ, काळे, बादलों से ढंपे दिखाई देवे, जहां पर बार बार भ्रम, उद्वेग, के साथ, भय के साथ रोने का सा शब्द सुने, अन्धकार सा हो, जो गुझक ( यक्ष आदि देवयोनियों से आक्रान्त सा हो, तथा रोने के से शब्दों से व्याप्त हो देश को अनारोग्यकारक समझना चाहिये ॥ ९ ॥
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STOR ] विमानस्थालम् का तु खलु यथर्तुङ्गाद्विपरीतमिति होना चाहि व्यवस्येत् ॥ १० ॥
काल- शीत, उष्ण और वर्षा इन ऋतुओं के अपने लक्षणों से विपरीत होना या उन लक्षणों का अधिक होना या कम होना ( मिथ्यायोग, अतियोग और अयोग ) अनारोग्यकारक होता है ॥ १० ॥
इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावान् जनपदोदूध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः । अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ११ ॥
विगुणेष्वपि तु खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसनकरेषु भेषजेनोपपाद्यमा-नानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ १२ ॥
निपुण वैद्य इस प्रकार के दोषों वाले वायु, जल, देश और काल इन चारों को जनपद-नाथ का कारण मानते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों वाले इन चारों को आरोग्यकारक गिनते हैं । इन चारों के विगुण होने व जनपद के नाशक कारणों के उपस्थित होने पर भी, दोष और दूष्य की अपेक्षा करके औषध द्वारा चिकित्सा करने पर पुरुषों को रोग नहीं होते, वे पुरुष रोगों से बच्चे रहते हैं ॥ ११-१२ ॥
भवन्ति चात्र- वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् ।
गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत्संप्रवक्ष्यते ॥ १३ ॥
वाताज्जलं जलाद्देशं, देशात्कालं, स्वभावतः ।
विद्याद् दुष्परिहार्यत्वाद् गरीयस्तरमर्थवित् ॥ १४ ॥
बाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् ।
प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ १५ ॥
विकृत हुए देश, काल, वायु, और जल इनमें कारण के विचार अनुसार-किसका उत्कर्ष है इसका वर्णन करते हैं । यथार्थ तस्व को जानने वाला बैध स्वभाव से वायु से जल को, जल से देश को, देश से काल को बढ़ कर समझे । क्योंकि इनका स्याग नहीं किया जा सकता । यदि वायु खराब हो तो दूसरे स्थान पर सुगमता से जाया जा सकता है । जल तो जीवन के लिये सेवन करना आवश्यक है । यदि प्रया से जल को भी छोड़ दें, देश से बचना कठिन है । देश से भी यदि देशान्तर में जायें तो काल से बचना अशस्य है । इसलिये सबसे अधिक प्रबल काल है । वायु, जल, देश और काल इन चारों के दोषों को दूर करने के उपाय जाने और दोषों के प्रतिकार के सुगम होने इनके शांति के क्षण मी जाने ॥ १३-१५ ॥
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५०६ चरकसंहिता [अ०३
चतुर्ष्वपि तु दुष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः ।
भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा ॥ १६ ॥
वायु आदि इन चारों के विकृत होने पर भी जब पुरुष औषध सेवन करते हैं तब रोगी नहीं होते ॥ १६ ॥
येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम् ।
कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते ॥ १७ ॥
रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते ।
शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः ॥ १ ॥
जिन पुरुषों में मरण की समानता नहीं और न कर्मों की समानता है, उनके लिये तो वमन, विरेचन आदि पञ्च कर्म सबसे श्रेयस्कर उपाय हैं । इसके साथ में विधिपूर्वक रसायन ( वृष्य प्रयोगों ) का सेवन करना चाहिये । तथा व्यापति से पूर्व एकत्र की हुई औषधियों ( अन्न आदि ) से शरीर का पालन करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥
सत्यं भूते दया दानं बलयो देवतार्चनम् ।
सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ॥ १६ ॥
हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ।
सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥ २० ॥
संकथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् ।
धार्मिकैः सात्त्विकैनिंत्यं सहास्या वृद्धसंमतेः ॥ २१ ॥
इत्येतद्वेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् ।
येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ॥ २२ ॥
सत्य, प्राणियों में दया, दान, बलि, देवता की अर्चना, सद् वृत्त का पालन, इन्द्रियों को विषयों से रोकना, अपनी रक्षा, अविकृत ( अच्छे, जहाँ बीमारी न हो ) जनपदों ( देशों ) का सेवन करना, ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मचारियों का सेवन करना, उनके पास रहना, धर्मशास्त्रों की कथा तथाजितात्मा महर्षियों से बात- चीत करना, धार्मिक सत्रप्रकृति के वृद्धों के पास उठना-बैठना, ( तथा दैव- व्यपाश्रय कर्म का सेवन ), आयु की रक्षा के किये औषध है । जिन लोगों की मृत्यु इस दारुण काल में निश्चित ( अवश्यम्भावी ) नहीं है, उन के लिये उप- रोक्त कर्म औषध हैं ॥१६-२२॥ इति श्रुत्वा जनपदोद्भवंसने कारणान्यात्रेयस्य भगवतः पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - अथ खलु भगवन्! कुतो मूलमेषां बाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते, येनोपपन्ना जनपदमुदुष्वंसयन्तीति ॥२॥
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०३ ] विमानस्थानम् ५०७ जनपद -नाथ के इन कारणों को सुन कर भी अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से पूछा -हे भगवन्! वायु आदि में किस कारण से विगुणता उत्पन्न होती है, जिस से विकृत होकर ये जनपदों को नाश करते हैं ॥२३॥
तमुवाच भगवानात्रेयः - सर्वेषामप्यग्निवेश! वाय्वादीनां यद्वैगु- ण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतम् । तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एव । तद्यथा- यदा देश- नगर निगम जनपद-प्रधाना धर्म- मुत्क्रम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजनपदा व्यवहा- रोपजीविनच तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसभं धर्ममन्त- ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते, तेषां तथाऽन्तर्हित-धर्माणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवतानामृतत्री व्यापद्यन्ते तेन नापो यथाकालं देवो वर्षति न वा वर्षति, विकृता वा वर्षति, वाता न सम्यगभिवान्ति, क्षितिव्यपद्यते, सलिलान्युपशुध्यन्ति, ओषधयः स्वभावं परिहायाऽऽपद्यन्ते विकृतिम्, तत उद्ध्वं सन्ते जनपदाः स्पर्शाभ्य-वदार्यदोषात्॥ २४ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा । इन वायु आदि सब में जो विगु-णता उत्पन्न होती है, उसका मूल कारण अधर्म है । इस अधर्म का मूल कारण पूर्व किये और असत् कर्म ( अहित कर्म ) हैं । इन दोनों अधर्म और असत् कर्मों की उत्पत्ति का कारण प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि का दोष है । जिस समय देश, नगर, प्रान्त और जनपद के अध्यक्ष ( प्रधान शासक जन ) धर्मका अति- क्रमण करके अधर्म से प्रजाजनों के साथ व्यवहार करने लगते हैं, तब इन प्रधान जनों के आश्रित एवं पीछे चलने वाले नगर और जनपद वासी लोग तथा वाणिज्य व्यवहार वा अदालत द्वारा जीविका प्राप्त करने वाले मनुष्य इस अधर्म को और भी बढ़ाते हैं । इस प्रकार से बढ़ा हुआ अधर्म बलात् धर्म का छोप कर देता है । इस धर्म के लोप हो जाने से देवता लोग नागरिकों के लोगों का साथ छोड़ देते हैं. इस प्रकार से अधर्म की प्रधानता होने और देवता आदि का सहयोग छूट जाने पर ऋतुएं ( शीत, उष्ण और वर्षा ) विकृत हो जातो हैं । इस से देव ( मेघ ) ठीक समय पर वर्षा नहीं करता, सर्वथा नहीं करता अथवा विकृत रूप में जल बरसता है, वायुएँ भी भली प्रकार नहीं चलतीं, भूमि बिगड़ जाती है, पानी सूख जाते हैं । ओषधियां अपनी प्रकृति को छोड़ कर विकृति को प्राप्त हो जाती हैं । तब स्पर्श और आहार के दोष से जनपद नष्ट होने लगते हैं ॥ २४ ।
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Kok चरकसंहिता [अ०३ art प्रभवस्वापि जनपदोदध्वंसस्थाधर्म एव हेतुर्भवति । ते ऽतिप्रवृद्ध- लोभ- रोष मोह -मानास्ते दुर्बलानवमत्याऽऽत्मस्वजनपरोप- घाताय शखेण परस्परमभिक्रामन्ति परान्वाऽतिक्रामन्ति, परैर्वाऽभि- क्राम्यन्ते ॥ २५ ॥
रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तर- मुपलभ्याभिहन्यन्ते ॥ २६ ॥
शस्त्र से होने वाले युद्ध आदि में भी जो जनपद का नाश होता है उस का भी कारण अधर्म हो है । जिन पुरुषों में लोभ, क्रोध, मान बहुत बढा होता है, वे दुर्बल पुरुषों का तिरस्कार करके अपने और दूसरों के नाश के लिये परस्पर शस्त्रों से आक्रमण करते हैं । इस अवस्था में राक्षस आदि नाना प्रकार के भूत ( प्राणि ) समूह इस अधर्म या इसी प्रकार के अन्य अपचारों से इन पर आघात करते हैं ॥ २५-२६ ॥ तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति । ये लुप्तधर्माणो धर्मा- दपेतास्ते गुरु- वृद्ध- सिद्धर्षि - पूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति, तवस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुष कुलविनाशाय नियतप्रत्ययोपलम्भान्नियता अनियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे॥ २७॥
इसी प्रकार अभिशाप से देश के नाश होने का भी मुख्य कारण अधर्मं ही है । जिन देशों में धर्म लुप्त हो जाता है और जो धर्म से च्युत हो जाते हैं; वे गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि, पूज्य पुरुषों का तिरस्कार करके अहित कार्यों का सेवन करने लगते हैं । तब वे प्रजाएं गुरुजनों से शत होकर शीघ्र ही भस्म हो जाती हैं । अनेक पुरुषों के कुल विनाश के लिए जहां विशेष पुरुषों के अपराध होते हैं वहां वे ही नष्ट होते हैं और जहां निश्चित कारण नहीं होता वहां अनियमित रूप से अनेक अन्य भी नष्ट हो जाते हैं ॥ २७ ॥
प्रागपि चाधर्माते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत्, आदिकाले प्रदिति-सुतसमौजसोऽतिबलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्ष-देवर्षि - धर्म-यज्ञ विधि -विधा माः शैलेन्द्र- सार-संहत- स्थिर-शरीराः प्रसन्नव णन्द्रियाः पवन- सम -बल-जव अवानृशंस्य पराक्रमाश्चारुस्फिचोऽभिरूपप्रमाणाकृतिप्रसादोपचयवन्तः- दान -दम - नियम- तपउपवास-ब्रह्मचर्य व्रतपरा व्यपगत-सत्या- मय- राग -द्वेष - मोह -लोभ-क्रोध -शोक- मान -रोग-निद्रा- तन्द्रा · श्रम क्लमा- -परमहा पुरुषा बभूवुरमितायुषः । तेषामुदारस स्वगुणकर्मणाम- चित्य रस- वीर्य विपाक-प्रभाव-गुण- समुदितानि प्रादुर्बभूवुः सस्यानि सर्वगुणसमुदितत्वात्पृथिव्यादीनां कृतयुगस्वाऽऽदौ ।
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०३ ] विमानस्थानम् ५०६ रोग आदि की उत्पत्ति का मूल कारण - पहले भी अधर्म के बिना किसी अन्य कारण से रोग आदि अशुभों की उत्पत्ति नहीं हुई । कृतयुग में देवों के समान तेज-पराक्रम वाले, अति बलवान्, विशाल प्रभाव वाले, देव, देवर्षि, धर्म, यश विधि आदि सत्कर्मों को प्रत्यश्च देखने वाले पर्वत के समान दृढ़, संगठित, स्थिर शरीर वाले, निर्मल वर्ण ( कान्ति ), और इन्द्रियों से युक्त, वायु के समान बल, वेग और पराक्रमवाले, सुन्दर नितम्बबोले, वायु के अनुकूल अवयव परिमाण, आकृति और प्रसादवाले और गुणों और पुष्टि से युक्त, सत्य, आर्जव ( ऋजुता, नम्रता ), अनृशंसता ( दया ), दम, दान, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और व्रतों में तत्पर, भय, राग, द्वेष, मोह, छोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य, परिग्रह इन से रहित और अमित ( युगों के अनुसार दीर्घ ) आयु वाले पुरुष थे । सब युग के प्रारम्भ में इन पुरुषों के उदारचिच और गुणों, धार्मिक कर्मों के अचिन्त्य प्रभाव से पृथिवी आदि महाभूतों के सर्वगुणसम्पन्न होने से शस्य ( धान्य ) भी रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों वाले उत्पन्न होते थे । भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात्स पन्निकानां शरीरगौरव-मासीत् । शरीरगौरवात् श्रमः श्रमादालस्यं, आलस्यात् संचयः, संच-यात् परिग्रहः परिग्रहाल्लोभः प्रादुर्भूतः कृते || २८|| कृतयुग के उतरते हुए अन्तिम भाग से कुछ सम्पन्न धनो लोगों भोजन से शरीर में भारीपन आ गया । शरीर में भारीपन आने से श्रम के अति-, श्रम से आलस्य, आदस्य सं संचय ( इकट्ठा करने की बुद्धि ), संचय से परिग्रह ( ममता ) और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ ॥ २८ ॥
ततत्रेतायां लोभादभिद्रोह:, अभिद्रो द्दादनृतवचनं, अनृतवचनात्काम- क्रोध- मान-द्वेष- पारुष्याभिघात- भय- दाप-शोक-चिन्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः । ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत् तस्यान्तर्धानात् ( युगवर्षप्रमा-णस्य पादासः ) पृथिव्यादानां गुणपादप्रणाशोऽभूत् 3 तत्प्रणाशकृतश्च सस्यानां स्नेह - बँमल्य-रस -वीर्य-विपाक प्रभाव गुण- -पाद- भ्रंशः । II स्वानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुणपादैश्वाऽऽहारविहारैरर्यथापूर्वमुपष्ट- ध्यमानान्यग्निमारुतपरीतानि प्राध्याधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि, अतः प्राणिनो ह्रासमवायुरायुषः क्रमश इति ॥ २६ ॥
फिर त्रेता में बोभ से अभिद्रोह, अभिद्रोह से अवस्य भाषण, असष्य भाषण काम, क्रोध, मान, द्वेष, कठोर वचन, अम्पिात ( परस्पर हिंसा ), भय,
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५१० चरकसंहिता [अ० ३ ताप, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि उत्पन्न हुए । इन के पीछे त्रेता में धर्म का एक चरण छोप हो गया । इस धर्म के एक पांव के लोप होने से आहार-विहार के गुणों का भी एक चतुर्थांश नष्ट हो गया । साथ में पृथिवी आदि के गुणों में भी एक चौथाई कमी आ गई । इस कमी के कारण धान्यों के स्नेह, निर्मलता, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव मेंभी चतुर्थांश घटती हो गई । इस से पुरुषों के शरीर के गुणों में चतुर्थांश की कमी होने से, आहार विहार के गुणों में भी घटती होने से, पूर्व युग के समान वे अग्नि, वायु वाले नहीं रहे । अनि, वायु के गुणों में भी कमी आ गई । इसलिये ज्वर आदि रोगों से प्रथम प्रथम आक्रान्त हुए । अतः कृतयुग से प्राणियों की आयु में एक एक चतुर्थांश की कमी हुई ॥ २६ ॥
भवतश्चात्र- युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते ।
गुणापादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ॥ ३० ॥
संवत्सरशते पूर्ण याति संवत्सरः क्षयम् ।
देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ॥ ३१ ॥
इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुको भवति । इस क्रम से प्रत्येक युग में धर्म का एक एक पाद ( चतुर्थांश ) क्षीण होता जाता है । इसी क्रम से पृथिवी आदि भूतों के गुणों में भी एक एक पाद की कमी होती जाती है । अर्थात् सत्य युग में चार पाद, त्रेता में तीन पाद, द्वापर में दो और कलियुग में एक पाद शेष रह जाता है । इस प्रकार से लोक प्रलय को प्राप्त होते हैं । जिस युग में मनुष्यों की आयु और युग का जो जो परिमाण है, उस युगमान के सौ वर्ष पूर्ण होने पर आयु का एक एक वर्ष कम हो जाता है । जैसे कलियुग में सौ वर्ष की आयु है । युगमान १००
वर्ष पूर्ण होने पर एक वर्ष कम होकर निन्यानवें ( ६६ ) वर्ष परमायु होती है ।
यह रोगों के प्रथम उत्पत्ति का कारण कह दिया ॥ ३१ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - किं नु खलु भगवन्! नियतका प्रमाणमायुः सर्व न वेति ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा - भगवन्! क्या आयु का समय और परिमाण सब निश्चत है या अनिश्चित १ ॥ ३२ ॥
भगवानुवाच - इहाग्निवेश! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते ॥ ३३ ॥
देवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम् ।
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०३ ] विमानस्थानम् ५११ भगवान् आत्रेय ने कहा – हे अग्निवेश! प्राणियों की आयु, देव और पुरुषकार इन दोनों का योग चाहती है । इसलिये आयु का बल और अगल देव और पुरुषार्थ पर स्थित है ॥ ३३ ॥
देवमात्मकृतं विद्यात्कर्म यत्पौर्वदेहिकम् ॥ ३४ ॥
स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् ।
बाब विशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः ॥ ३५ ॥
अपने शरीर से जाकर्म पूर्व जन्म में किये हों उन को 'देव' जाने । और इस जन्म में जो कर्म किया जाता है उसे पुरुषकार कहा है । इन दोनों प्रकार के कर्मों का विशेष बल और अबल होता है ॥ ३४-३५ ॥ दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम् ।
यह कर्म भी तीन प्रकार का है । हीन, मध्यम और उत्तम ।
तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च ॥ ३६ ॥
नियतस्याऽऽयुषो हेतुविपरीतस्य चेतरा । तीन प्रकार की आयु— देव और पुरुषकार दोनों प्रकार के कर्म उत्तम होने से आयु का परिमाण अर्थात् नियत काल दीर्घ होता है । सुखकारक एवं हितकारक आयु मिलती है और यदि इन दोनों प्रकार के कर्मों में विपरीत युक्ति हो तो आयु अनियत, छोटी, दुःखी एवं अहितकारक रहती है ॥ ३६ ॥
मध्यमा मध्यमस्येष्टा,कारणं शृणु चापरम् ॥ ३७ ॥
दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्यपहन्यते ।
दैवेन चेतरत्कर्म विशिष्टेनोपहन्यते ॥ ३८ ॥
इन कर्मों में मध्यम बल हो तो आयु भी मध्यम प्रकार की रहती है । और भी कारण सुनो । जहां पर एक कर्म बलवान् हो, दूसरा निर्बल हो, वहां पर बलवान् दुर्बल कारण को दबा लेता है । इसलिये यदि पुरुषकार-कर्म बखवान् होगा तो निर्बल देव को दबा लेगा और यदि देव बलवान् होगा तो वह
दूसरे कर्म (पुरुषकार ) को नष्ट कर देगा । निर्बल को बलवान् दबा लेता है ॥ ३८॥
दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः ।
कर्म किंचित् क्वचित्काले विपाके नियतं महत् ।
किंचित्कालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ ३६ ॥
इस बात को देख कर कुछ विद्वान् आयु का परिमाण निश्चित मानते हैं । किसी मवान् कर्म का तो किसी विशेष निश्चित समय में ही परिपाक होता है और किसी का विपाक काल अनिश्चित है, कभी भी उसका पाक हो सकता है ।
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५१० चरकसंहिता [ अ० ३ www. कौन कर्म कब पकेगा इस बात का निर्णय कारणों से किया जाता है । कभी सहकारी अन्य कारण को पाकर कर्म का पाक होता है । किया कर्म अवश्य भोगना पड़ता है । इस प्रकार कर्म के परिपाक काल के नियम और अनियत होने से आयु भी नियत तथा अनियत है ॥ ३६ ॥
तस्मादुभयदृष्टत्वादेकान्तग्रहणमसाधु । निदर्शनमपि चात्रोदाहरि-ष्यामः । यदि हि नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्, तदायुष्कामानां न मन्त्रौषधि- मणि- मङ्गल- बल्युपहार -होम- नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्य - न-प्रणिपातगमनाद्याः क्रिया इष्टयश्च प्रयुज्येरन्, नोद्भ्रान्त चण्ड- चपल-गो-गोष्ट खर-तुरग महिषादयः पवनादयश्च दुष्टाः परिहार्याः स्युर्न प्रपात-गिरि- विषम -दुर्गाम्बुवेगास्तथा नप्रमत्तोन्मत्तोद्भ्रान्त चण्ड- चपल-मोह-लोभाकुलमतयो नाग्यो न प्रवृद्धोऽग्निनं च विविधविषाश्रयाः सरीसृपोर-गादयः, न साहसं नादेशकालचया, न नरेन्द्रप्रकोप इत्येवमादयो हि भावा नाभावकराः स्युः, आयुषः सर्वस्य नियतकालप्रमाणत्वात् ॥४०॥
इसलिये नियत और अनियत दोनों प्रकार की आयु के दोखने से कोई एक पक्ष अर्थात् आयु का नियत वा अनियत काल मानना यह ठीक नहीं है । इस के लिये उदाहरण भा देते हैं: - यदि आयु का परिमाण नियत मान लिया जाय तो दाघां चाहने वाले मनुष्य आयु को बढ़ाने वाले मंत्र, ओषधि, क्रिया, दृष्टि, याग, मणि, मंगल, बलि, उपहार, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमनादि क्रियाओं को न किया करें । इसी प्रकार इधर उधर दौड़ते हुए भयानक, चपल, गां, हाथी, ऊंट, गधे, घोड़े, भैंसे आदि तथा दुष्ट वायु आदि से कोई भी अपन का न बचावे, न कोई उन को दूर करने का यत्न करें । प्रपात ( जल प्रपात ), पहाड़, कठिन दुर्ग, पाना के वेग से कोई अपने को न बचावें । मस्त, उन्मत्त, भ्रान्त, चण्ड, चपल, मोह, लोभ से व्यास बुद्धि वालों से अपने को न बचावें, शत्रु को भी निवारण न करें । तेज़ जलती अभिसे कोई न डरे विविध प्रकार के विषैले पदार्थों और सर्प आदि जन्तु-ओं से कोई भय न मानें । अनुचित बल के आरम्भ से न बचे । देश काल के विपरीत आचरण से अपने को न बचावें । राजा का प्रकोप भी मृत्यु का कारण न बन सकें । इन समस्त कारणों से भी आयु का नाथ न हो । क्योंकि सब को आयु का काल और परिमाण नियत है । आयु के नियत काल होने से यह कारण भी मारफ नहीं बनने चाहियें । मृत्यु के भय से ही लोग इस कारणों -बचते हैं ॥ ४० ॥