चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 531–540
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 531–540
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विमानस्थानम ५१३अ०३ ] ३३ न चानभ्यस्ताकाल - मरण-भय-निवारकाणामकाळमरणभय मागच्छे-त्प्राणिनां व्यर्थाश्च ISSरम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे, नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रुं वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावात भेषजेनोप- पादयेतां न महर्षयो यथेष्टमायुस्तपसा प्राप्नुयुः, नच विदितवेदितव्या महर्षयः ससुरेशा रसायनादीनि सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा । अकाल मरण के भय का निवारण करने वाले अनम्यासी प्राणियों को अकाल मृत्यु के कारणों से भय भी न हो । महर्षियों के रसायनाधिकार में कहे हुए उपदेश, प्रयोग और ज्ञान ये सब व्यर्थ हो जायें । नियत आयुवाले शत्रु को इन्द्र भी बज्र से नहीं मार सके । अश्विनीकुमार भी रोगी पुरुष को औष- वियों से चिकित्सा न कर सकें । और महर्षिगण तप द्वारा वांछित वर्षों तक की आयु भी प्राप्त न कर सके । सर्वश महर्षिगण इन्द्र के साथ आयुवर्धक रसाय नादि को न देखें, न उपदेश करें और न स्वयं व्यवहार करें । क्योंकि आयु का काल और परिमाण तो निश्चित है । अपि च सर्वचक्षुषामेतत्परं यदैन्द्रं चक्षुः, इदं चास्माकं प्रत्यक्षं यथा पुरुषसहस्राणामुत्यायोत्थायाऽऽइवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुष्यं, तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराश्चाविषविषप्राशिनां चाप्य तुल्यायुष्टवं, न च तुल्यो योगः क्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोली- दतां, तस्माद्धितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययान्मृत्युः । सब आंखों से श्रेष्ठ प्रमाण यह इन्द्र ( आत्मा ) की आंख हे -- हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि हजारों मनुष्य प्रतिदिन उठ उठ कर शस्त्रों से लड़ाई करते हैं, नहीं भी करते हैं, उन सत्र की आयु तुल्य नहीं होती अर्थात् लड़ने वाले मरते और न लड़ने वाले नहीं मरते हैं । इसी प्रकार उत्पन्न हुए संन्यास रोहिणी आदि रोगों की जो तत्काल चिकित्सा कर लेते हैं वे बच जाते हैं ओर जा चिकित्सा नहीं करते वे मरते हैं । इसी प्रकार वित्र खाने वाले मरते हैं और विष नहीं खाने वाले नहीं मरते । पानी रखने या लाने के लिये जो पक्के बड़े बनाये जाते हैं उनका तथा चित्र घटों ( कच्चे घड़ों ) का योग- क्षेम समान नहीं हो सकता । वे समान काल तक स्थिर नहीं रह सकते । किन्तु रक्षण करने से कच्चे बढ़े भी देर तक रह सकते हैं और न पालने से पके घड़े भी शीघ्र टूट जाते हैं । इसलिये हितकारी वस्तुओं वा कार्यों का सेवन करना हो जीवन का निमित्त है । इस के विपरीत अहिताचरण करना मृत्यु का कारण है । अपि च देशकालात्मगुणविपरीतानां कर्मणामाहारविहाराणां
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५१४ चरकसंहिता [अ० ३ क्रियोपयोगं सम्यक सर्वातियोगसंधारणम संधारणमुदीर्णानां च गति- मतां साहसानां च वर्जनमारोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे उपदिशामः सम्यक् पश्यामश्चेति ॥ ४१ ॥
और भी, देश, काल, आत्मा इन के गुणों के सात्म्य, कर्म तथा आहार द्रव्यों को विधिपूर्वक उपयोग करना, काल, कर्म और इन्द्रियार्थों के अयोग, मिथ्यायोग और अतियोग का त्याग, अनुपस्थित वेगों को रोकना ( बलात्कार से बाहर न करना ) और उपस्थित वेगों को न रोकना और सब प्रकार के साहसिक कर्मों ( अनुचित बल के कार्यों ) का त्याग, ये सब बातें आरोग्य के संरक्षण में कारण होती है । इस स्वस्थवृत्त का हम भली प्रकार उपदेश करते हैं और इसे अच्छी प्रकार देखते भी हैं ॥४१॥
अतः परमग्निवेश उवाच -एवं सत्यनियतकालप्रमाणायुषां भग-वन! कथं कालमृत्युरकालमृत्युर्वा भवतीति ॥४२॥
इस के अनन्तर अग्निवेश बोले! इस प्रकार से यदि आयु का समय अनिश्चित है, तब कालमृत्यु और अकालमृत्यु किस प्रकार होती है १ ॥ ४२॥
तमुवाच भगवानात्रेयः - श्रूयतामग्निवेश! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः ( स्यात्, सच ) सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथा-काळं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छेत्, तथाऽऽयुः शरीरोपगतं बल- वत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति, स मृत्युः काले । भगवान् आत्रेय ने कहा- हे अग्निवेश सुनो! जिस प्रकार गाड़ी में लगा अक्ष ( धुरा ), धुरे के समस्त गुणों से युक्त होने पर भी अधिक भार आदि के न पड़ने से, ठीक समय में अपने परिमाण के क्षय होने पर घिसता २ टूट जाता है, उसी प्रकार शरीर से सम्बद्ध आयु भी बलवान् प्रकृति, युक्ति तथा स्वस्थवृत्त- विधि से पाली हुई, अपने समय में ही क्षय को प्राप्त होती है, इस मृत्यु को 'कालमृत्यु' कहते हैं । यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्र- भङ्गाद्वाह्मवाहकदोषादणिमोक्षात् पर्यसनादनुपाङ्गाच्चान्तरा व्यसनम द्यते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादयथाग्न्यभ्यवहरणाद्विषमाभ्यवहर- णाद्विषमशरीरन्यासादतिमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्णवेगविनिग्रहाद्विधार्य बेगविधारणाद् भूतविषवाय्वग्न्युपता गदभिघातादाहारप्रतीका नाच यावदन्वरा व्यसनमापद्यते । तथा नियतायुष अन्तरा
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अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१५ राधान्निरुध्यन्ते । स मृत्युरकाले । तथा ज्वरादीनप्यातङ्कान्मिथ्योपच-रितानकालमृत्यून् पश्याम इति || ४३|| और यदि इसी अक्ष पर बहुत अधिक भार रक्खा जाय, अथवा विषम मार्ग से, कुमार्ग से, धुरे या पहिये के टूटने से, बैल या वाहक ( सारथि ) के दोष से, अणि, घुरी में लगी कील के निकल जाने से, स्नेह न पड़ने से, गिरने से नियत समय से पूर्व ही टूट जाता है उसी प्रकार आयु भी साहसिक कार्यो से, अग्नि के अनुसार भोजन न करने या विषम भोजन करने से, अतिमैथुन से, उपस्थित वेगों को रोकने से रोकने योग्य ( काम क्रोधादि ) वेगों को न रोकने से, शरीर को विषम स्थिति में रखने से ( उत्कट आसन बैठने से ), दुर्जनों का संसर्ग करने से, भूत, विष, वायु, अग्नि, ताप, चोट आदि से, आहार विधि के छोड़ने से, बीच में ही आयु समाप्त हो जाती है, इस का नाभ 'अकाल- मृत्यु' है । इसी प्रकार ज्वर आदि रोगों की ठीक प्रकार से चिकित्सा न होने से इन से भी अकाल मृत्युएं होती देखते हैं ॥ ४३ ॥
अथाग्निवेशः पप्रच्छ –किं नु खलु भगवन्! ज्वरितेभ्यः पानी- यमुष्णं भूयिष्ठं प्रयच्छन्ति भिषजो न तथा शीतम् । अस्ति च शीत-साध्यो धातुरकर इति ॥ ४४ ॥
इस के अनन्तर अग्निवेश ने पूछा- हे भगवन्! वैद्य लोग ज्वर के रोगी
को गरम पानी अधिकतः किस लिये देते हैं? शीतल पानी उतना नहीं देते ।
शीत उपचार से भी ज्वरकारक धातु पित्त शान्त होता है ॥४४॥
तमुवाच भगवानाशेयः ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकाला-नभिसमीक्ष्य पाचनाथं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । जरो ह्यामाशयसमुत्थः प्रायो भेषजानि चाऽऽमाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थ च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम् । तच्चैषां पीतं बातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं परिशोषयति, स्वल्पमपि पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते, तथायुक्त- मपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाहभ्रमप्रलापातिसारे वा प्रदेयम, उष्णेन हि दाइभ्रमप्रलापातिसारा भूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेनोपशाम्य-न्वीति ॥ ४५ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा- अवर- रोगी के शरीर, निदान 1 आमाशय से उत्पन्न विकारों में ) देश, काल को देखकर पाचन के लिये
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५१६ चरकसंहिता [ अ०३ वैद्य लोग गरम पानी देते हैं । ज्वर की उत्पत्ति आमाशय से होती है । आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिये पाचन, वमन, अपतर्पण संद्यमन आदि उपचार प्रायः होते हैं । इसलिये ज्वर के रोगी को पाचन कराने के लिये वैद्य लोग गरम पानी अधिकतर देते हैं । यह पीया हुआ गरम पानी वायु का अनुलोमन करता है, जाठराग्नि को बढ़ाता है, शीघ्र पच जाता है, जीर्ण हो जाता है, कफ को सुखाता है और थोड़ा भी पिया हुआ गरम पानी प्यास को शान्त करने के लिये पयांत होता है । यह गरम पानी इतना लाभप्रद होने पर भी जिस ज्वर में पित्त बहुत बढ़ा हो उस में और दाह, भ्रम, प्रलाप अथवा अतिसार की अवस्था में भी नहीं देना चाहिये । गरमी से दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं । ये रोग शीत उपचार से शान्त होते हैं ॥ ४५ ॥
भवति चात्र - शीतेनोष्णकृतान् रोगान् शमयन्ति भिषग्विदः ।
ये तु शीतकृता रोगास्तेषां चोष्णं भिषग्जितम् ॥ ४६ ॥
चिकित्सक ज्ञानी लोग गरमी ( उष्णता ) से उत्पन्न हुए रोगों को शीत चिकित्सा से शमन करते हैं और शोत कारण से उत्पन्न रोगों को उष्ण चिकि-त्सा से शान्त करते हैं अर्थात् निदान से विपरीत चिकित्सा करते हैं ॥ ४६ ॥
एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतमौषधं भवति कार्यम् । यथा - अपतर्पणनिमित्तानामपि व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्ति- स्तथा पुरणनिमित्तानां नान्तरेणापतर्पणमिति ॥ ४७ ॥
इस प्रकार से अन्य रोगों में भी कारण के विपरीत चिकित्सा करनी होती है । जिस प्रकार कि अपतर्पण क्रिया से उत्पन्न रोगों की शान्ति संतर्पण क्रिया के विना नहीं होती, उसी प्रकार सतपणजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण क्रिया के विना नहीं होती || ४७ || अपतर्पणमपि च त्रिविधं लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं चेति ॥ ४८ ॥
अपतर्पण भी तीन प्रकार का है । ( १ ) लंघन, ( २ ) कंधन-पाचन और ( १ ) दोषावसेचन ( दोषों का बाहर निकालना ) ॥ ४८ ॥
वत्र लङ्ङ्घनमल्पबलदोषाणां लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्धथा वाता तपपरीतमिवाल्पमुदकमल्पदोषः प्रशोषमापद्यते ॥ ४६ ॥
इन में जब दोषों का बक अल्प हो, तब लंघन करना चाहिये । लंघन
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अ० ३ ] विमानस्थानम ५१७ अग्नि और वायु की वृद्धि होती है । जिस प्रकार थोड़ा पानी वायु और धूप के बढ़ने से शुष्क हो जाता है । उसी प्रकार इन की वृद्धि से अल्पबलवाला दोष शुष्क हो जाता है ॥ ४६ ॥
लङ्घनपाचनाभ्यां हि मध्यचलो दोषः सूर्यसन्तापमारुताभ्यां पांशुभस्मावकिरणैरिव चानतिबहूदकं प्रशाषमापद्यते ॥ ५० ॥
दोषों का मध्यम बल होने पर लंघन और पाचन कर्म करना चाहिये जिस प्रकार सूर्य के संताप एवं वायु द्वारा धूर और भस्म के फेंकने से साधा-रण मात्रा का पानी ( बहुत अधिक राशि नहीं ) सूख जाता है, उसी प्रकार लंघन और पाचन से मध्यम बलवाले दोष शान्त हो जाते हैं । ( धूल और भस्म का फेंकना,पाचन क्रिया का उपलक्षक है और सूर्य का संताप और वायु
लंघन क्रिया का । ) ॥ ५० ॥
बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्य, न ह्यभिने केदारaat पल्वलप्रसेकोsस्ति, तद्वद्दोषावसेचनम् ॥ ५१ ॥
दोषों के प्रबल होने पर इन का अत्रमेचन ( निष्कासन ) ही करना चाहिये । जैसे खेत को मेद की तोड़े बिना खेत के पानी को सुखा देना अस- म्भव है । मेढ़ को तोड़कर पानी निकाल देने से खेत शीघ्र सूख जाता है । इसी प्रकार वमन, विरेचन आदि से अधिक बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर कर देने पर दोषों की शान्ति होती है ॥ ५१ ॥
दोषावसेचनं तु खल्वन्यद्वा भेषजं प्राप्तकाल मध्यातुरस्य नैवंविध- स्य कुर्यात्, तद्यथा- अनपवादप्रतीकारस्य | परिचारकस्य वैद्यमानिनश्च- usस्यासूयकस्य तीव्रधर्मारुचेरतिक्षीण- बल- मांस-शोणितस्यासाध्य रोगो- पहतस्य मुमूर्षुलिङ्गान्विस्य चेति । एवंविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापी- यसाऽयशसा योगमृच्छतीति ॥ ५२ ॥
चिकित्सा में त्याज्य रोगी वा निम्न प्रकार के रोगी की दोषावसेचन ( संशो- घन रूप ) अथवा संशमनरूप चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । यथा जिससे अपवाद का प्रतिकार न हो सके, जो रोगी उपकरणों का संग्रह नहीं कर सके, ऐसे निर्धन की, जिस के पास परिचारक न हो, अपने को वैद्य मानने वाले, क्रोधी, निन्दा करने वाले, जिस का बल, मांस रक्त, बहुत क्षीण हो गया हो, असाध्य रोग से आक्रान्त, जिस में मरणोन्मुख लक्षण स्पष्ट हों, इस प्रकार के लोगो की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । यदि इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा "य करता है तो पापमूलक-अपकीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥
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५१८ चरकसंहिता [ अ०३
• भवन्ति चात्र - अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः ।
ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च ॥ ५३ ॥
प्रचुरोदकवृनो यो निबातो दुर्लभातपः ।
अनूपो बहुदोषश्च समः साधारणो मतः ॥ ५४ ॥
जिस देश में पानी और वृक्ष कम हों, वायु और धूप बहुत प्रचण्ड हो वह जांगल देश जानना चाहिये । उसमें बहुत कम रोग होते हैं । जिस देश में जल और वृक्ष बहुत हों, वायु न चले और धूप भी न हो, वह अनूप देश कहाता है जिसमें वात और धूप दोनों समान हों वह देश समदेश कहता है ॥ ५३-५४ ॥
तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम् ।
कर्मणस्तन्न कर्त्तव्यमेतद् बुद्धिमतां मतम् ॥ ५५ ॥
तत्काल में अथवा उत्तर काल में जिस कर्म का फल अशुभ हो, वह कर्म नहीं करना चाहिये, यह बुद्धिमानों का मत है ॥ ५५ ॥
तत्र श्लोकाः- पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः स्वस्वलक्षणाः ।
देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च ॥ ५६ ॥
प्राग्विकार समुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः ।
मरणं प्रतिभूतानां कालाकालविनिश्चयः ॥ ५७ ॥
यथा चाकालमरणं यथा युक्तं च भेषजम् ।
सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना ॥ ५८ ॥
तात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान् ।
देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः ॥ ५६ ॥
जनपदोदूध्वंस के पूर्वरूप, सामान्य कारण, प्रत्येक के अपने अपने लक्षण, चिकित्सा ( पंच कर्म ), कारणों का मूल कारण अधर्म, रोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति, आयु और धर्म के ह्रास का क्रम, कालमृत्यु और अकालमृत्यु, निदान और दोष, बलापेक्षित औषध, जिनकी चिकित्सा नहीं करनी, ये सब बातें इस अध्याय में मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने शिष्य अग्निवेश के लिये सम्पूर्ण रूप से कह दीं || ५६-५६ ॥ इत्यग्निवेधकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने जनपदोदुवंसनीय विमानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१. ये दो श्लोक भी कहीं २ देखने में आते हैं ।
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विमानस्थानम् ५१६ चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातस्त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयं विमानं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माsss भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'त्रिविधरोग- विशेष -विज्ञानीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
त्रिविधं खलु रोगविशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा -आप्तोपदेशः प्रत्यक्षमनुमानं चेति ॥ ३ ॥
रोग विशेष विज्ञान तीन प्रकार का है । जैसे -( १ ) आस उपदेश, ( २ ) प्रत्यक्ष और ( ३ ) अनुमान ॥ ३ ॥
तत्राऽमोपदेशो नाम - आवचनम्। आता ह्यवितर्क-स्मृति-विभा-गविदो निष्प्रीत्युपतापदर्शिनश्च तेषामेवंगुणयोगाद्यद्वचने तत्प्रमाणं, अप्रमाणं पुनर्मत्तोन्मत्त मूर्ख वक्तृ-दृष्टादृष्ट वचनमिति ॥ ४ ॥
( १ ) आसोपदेश - आतजनों के बचनों का नाम आम उपदेश है । आस ही वितर्क से भिन्न अर्थात् सन्देह से रहित और स्मृति ज्ञान से युक्त साक्षात् अनुभव और विभाग अर्थात् एक देव से भिन्न सम्पूर्ण तत्व के जानने वाले | शास्त्र ज्ञान में संशय रहित एवं प्राणियों में प्रीति ( राग ) उपताप ( द्वेष ) के भावों से शून्य, रागद्वेषरहित होते हैं । इस प्रकार के गुण होने से इन आत पुरुषों का वचन प्रमाण हो सकता है । मत्त, उन्मत्त ( पागल ), मूर्ख आदि पुरुषों के दृष्ट' ( ऐहिक ) और अदृष्ट ( आमुष्मिक ) दोनों तरह के वचन अप्रमाण होते हैं ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं तु खलु तत्- यत्स्वयमिन्द्रियैर्मनसा चोपलभ्यते ॥ ५ ॥
प्रत्यक्ष--जो अपनी इन्द्रियों और मन से ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष है ॥ ५॥
अनुमानं खलु – तक युक्त्यपेक्षः ॥ ६ ॥
अनुमान --अनुमान तर्क है जो युक्ति की अपेक्षा करता है । ( कार्य कारण सम्बन्ध या अव्यभिचरित व्याप्ति का नाम युक्ति है ) ॥ ६॥
त्रिविधेन खल्वनेन ज्ञानसमुदयेन पूर्व परीक्ष्य रोगं सर्वथा सर्व- मथोत्तरकाळमध्यवसानमदोषं भवति । नहि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञये ज्ञानमुत्पद्यते ॥ ७ ॥
१. ' मूर्खरकदुष्टादुष्टवचनं' इति वा पाठः । मूर्ख पुरुष के दोषयुक्त और निर्दोष बचन भी प्रमाण नहीं, अथवा मूर्ख, और ( रक्त ) दोषयुक्त, ।
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५२० चरकसंहिता [ 370 × तीन प्रकार के ज्ञान-समुदाय से प्रथम रोग की परीक्षा करके सब प्रकार से और सारा देखकर पीछे से पूर्ण निश्चय करके चिकित्सा करना निर्दोष होता है । ज्ञान के एक अवयव को जान लेने से ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिये वैद्य को चाहिये कि तीनों प्रमाणों से रोग का एक अंश में ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण रूप में जाने ॥७॥
त्रिविधे त्वस्मिन् ज्ञानसमुदाये पूर्वमाप्तोपदेशाज्ज्ञानम् । ततः प्रत्य-क्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपद्यते । किं ह्यनुपदिष्टे पूर्वं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परीक्षमाणो विद्यात्? तस्मात् द्विविधा परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनु- मानं चेति त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८ ॥
इस तीन प्रकार के ज्ञान समुदाय में सब से प्रथम 'आप्तोपदेश' से ज्ञान होता है । इसके पीछे प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा परीक्षा होती है । यदि पूर्व आप्तोपदेश न हो तो परीक्षा करता हुआ वैद्य प्रत्यक्ष और अनुमान से क्या जानेगा १ कुछ भी नहीं । इसलिये आप्तोपदेश से प्राप्त ज्ञान वालों के लिये परीक्षा दो प्रकार की है प्रत्यक्ष और अनुमान । अथवा आप्तोपदेश को मिला कर तीन प्रकार की है- प्रत्यक्ष,, अनुमान और आतोपदेश ॥ ॥ तत्रेदमुपदिशन्ति बुद्धिमन्तः — रोगमेकैकमेव प्रकोपणमेवयोनिमेव-मात्मानमेवमधिष्ठानमेवं वेदनमेवं संस्थानमेवंवृद्धिस्थानक्षयसमन्वितमे- वमुदर्कमेवं नामानमेवं योगं विद्यात् । तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था प्रवृत्तिरथवा निवृत्तिरित्युपदेशाज्जायते ॥ ६ ॥
आसोपदेश से एक एक रोग में ऐसे प्रकोप, ऐसी योनि ( प्रकृति वातादि की विषमता ), ऐसी उत्पत्ति, ऐसा स्वरूप, ऐसा अधिष्ठान ( मन और शरीर ), ऐसी वेदना ( पीड़ा ), ऐसा संस्थान ( लक्षण ), ऐसे २ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ऐसा उपद्रव ( रोग के पीछे दूसरा होने वाला रोग ), ऐसी दोषों की वृद्धि, स्थान और क्षय, उदर्क ( उत्तर फल-साध्य- असाध्य ), इस प्रकार का नाम, ऐसा योग ये सब बातें बुद्धिमान् लोग उपदेश करते हैं, उनके उपदेश से जानना चाहिये । इस प्रकार की व्याधि में इस प्रकार का प्रतिकार वा चिकित्सा है, अथवा इस रोग में असाध्य होने से निवृत्ति ( चिकित्सा न करना ), ये दोनों प्रकार की प्रवृत्ति और निवृत्ति भी उपदेश से ही जानी जाती हैं ॥६॥
प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वानिन्द्रियार्था- नातुर- शरीर-गतान्परीक्षेतान्यत्र रसज्ञानात; तद्यथा, -अन्नकूजनं संघि स्फोटनमकुढीपर्वणां च स्वरविशेषा ये चान्येऽपि केचिच्छरीरोपगताः
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अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१ शब्दाः स्युस्तान श्रोत्रेण परीक्षेत । वर्ण-संस्थान प्रमाण-च्छायाः शरीरप्र- कृतिविकारौ चक्षुवैषयिकाणि यानि चान्यानि तानि चक्षुषा परीक्षेत । प्रत्यक्ष द्वारा रोग जानने की इच्छा से वैद्य रोगी मनुष्य की इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य सब बातों की वह अपनी इन्द्रियों से परीक्षा करे केवल रस ज्ञान को छोड़कर । जैसे- आंतों के शब्द, अंगुली के पर्यो की सन्धियों का चट-कन, रोगी शरीर के भिन्न भिन्न स्वरों को इनके अतिरिक्त रोगी के जन्य जो ( हिचकी, श्वास आदि ) शब्द हों, उनकी श्रोत्र द्वारा परीक्षा करे । वर्ण, अंगों को बनावट, शरीर और अवयवों का माप ( छोटाई बढ़ाई, स्थूलता, कृशता ), छाया( कान्ति ), शरीर के प्राकृतिक एवं वैकृतिक भावों ( परिवर्तनों ) को एवं चक्षु इन्द्रिय के ग्राह्य और जो यहां पर न कही बातें हो ( मल, मूत्र आदि ), उनकी भी आंख से परीक्षा करनी चाहिये । रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेत न ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवाऽऽतुरमुखरसं विद्यात्, कापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरम्यं मलिनोपसर्पणेन शरीर- माधुर्य, लोहित पित्तसंदेद्दे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति इवकाक- भक्षणाद्धारिलोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यं, एवमन्यान्ध्या-तुरशरीरगतान रसाननुमिमीत । गन्धन्ति खल सर्वशरीर गतानातुरस्य प्रकृतिवैकारिकान् घ्राणेन परीक्षेत । स्पर्श च पाणिना प्रकृतिविकृति- युक्तम्- इति प्रत्यक्षतोऽनुमानैकदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥१०॥
रोगी के शरीर के रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान द्वारा ही जानना चाहिये । क्योंकि रोगी के शरीर के रस का प्रत्यक्ष द्वारा ग्रहण नहीं हो सकता । बीमारी में मुख का स्वाद बदल जाता है, इसलिये रोगी से पूछकर ही उसके मुख का रस जानना चाहिये । यथा-शरीर पर जूं आदि के चलने से शरीर में विरसता, शरीर पर मक्खी आदि के पास भिनकने से शरीर में मधुरता समझनी चाहिये । रक्तपित्त के सन्देह में यह रक्त शुद्ध ( शरीर को धारण करने वाला ) है या रक्तपित्त ( पित्त से दुषित रक्त ) का है तो यदि इस रक्त को कुत्ते, कौवे खा लें तो शुद्ध रक्त समझना चाहिये और यदि न खायें तो रक्तपित्त रोग से दूषित रक्त समझना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के शरीर के अन्य रसों को भी अनुमान से जानना चाहिये! रोगी के सम्पूर्ण शरीर की प्राकृतिक एवं वैकृतिक गन्धों की परीक्षा घ्राणेन्द्रिय ( नासिका ) द्वारा करनी चाहिये । स्पर्श, शीत, उष्ण, खर, चिकने आदि प्राकृतिक एवं वैकृतिक स्पर्शो
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५२२ चरकसंहिता [ अ० ४ को हाथ के स्पर्शसे जानना चाहिये । यहाँ पर प्रत्यक्ष तथा अनुमान से एक भाग से परीक्षा कह दी ॥१० ॥
इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः । तद्यथा, अग्नि जरणशक्त्या परीक्षेत बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रा-दोन शब्दादिग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः मङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोण, शोकं दैन्येन, हर्षमामोदेन, प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन, धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थान-मविभ्रमेण श्रद्धामभिप्रायेण, मेघां ग्रहणेन, संज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं स्मरणेन, हियमपत्रपणेन, शीलमनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनु-बन्धेन, धृतिमलौल्येन, वश्यतां विधेयतया, वयो- भक्ति-सात्म्य-व्याधि-स- मुत्थानानि काल- देशापशय वेदना-विशेषेण, गूढ लिङ्ग व्याधिमुपायानु-पशयाभ्यां दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषण, आयुषः क्षयमरिष्ठैः, उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्याणाभिनिवेशेन, अमलं सत्त्वमविकारेणेति । ग्रह- व्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं द्विष्टेषुसुखदुःखानि चाऽऽतुरप-रिप्रश्न नैव विद्याद्- इति ॥ ११ ॥
इसके अतिरिक्त ये निम्नलिखित बातें भी अनुमान द्वारा ही जानी जाती है । जैसे रोगी की परिपाक शक्ति को देखकर अभि ( जाठरामि ) को जाने । व्यायाम शक्ति से रोगी का बल, शब्द आदि विषयों के ग्रहण से कान आदि इन्द्रियों को, मन को अवधारण शक्ति से, विज्ञान को उद्योग से, संग ( आसक्ति ) से रज को, अज्ञान से मोह को, हिंसा प्रवृत्ति से क्रोध को, रोदन आदि से शोक को, गोत, वादित्र आदि से आनन्दको मुख की प्रसन्नता आदि लक्षणों से मन की प्रीति को, मुख की मलिनता आदि से भय को, अविवाद से धैर्य ( विपत्ति में भी मन की स्थिरता ) को, उत्साह से वीर्य ( कार्य करने की शक्ति ) को, अभ्रान्ति से स्थिरता को, अभिप्राय ( प्रार्थना ) से श्रद्धा को श्लोक आदि को कण्ठ करने से मेधा को नाम लेकर चेतना को, स्मरण शक्ति से स्मृति को, छज्जा दिलाकर लजा को, निरन्तर शीन से स्वभाव को वस्तु के प्रतिषेध से उस वस्तु में द्वेष को आगे के परिणामसे छळ व्यवहार को, मन की अचपलता से संतोष को, वद्य की आशा मानने से रोगी की वश्यता को, काळ विशेष से आयु, देश से भक्ति ( इच्छा ) को, ( जैसे -यह पंजाब का रहने वाला है इसलिये इसे गेहूं में इच्छा दोगी, यह बंगाल का है इसकी चावलों में रुचि होगी इत्यादि ), उपशय अर्थात्