चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 541–550

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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अ० ४ ] विमानस्थानम ५२३ अनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय ( शान्ति ) और अनुपशय ( निदान ) द्वारा गूढलिंग वाले रोग को, जिस रोगके लक्षण छिपे हों ( जैसे विद्रधि और गुल्म के भेद ), उपचार विशेष ( प्रकोपनके न्यूनाधिक होने से ) दोषों के प्रमाण विशेष ( न्यूनाधिक ) को अरिष्ट लक्षणोंसे, आयु के क्षय को हितोपसेवन से, निकटवर्त्ती आरोग्यता के लक्षणों को अविकार ( काम, क्रोधादि से रहित मानसिक विकारों ) से निर्मल चित्त को जाने । ग्रहणी ( अम का स्थान, जठर ) के मृदु दारुण भेद को रोगी के हित-अहित स्वप्न दर्शन से, भोजनादि में अभिप्राय ( इच्छा ) को, द्विष्ट, अप्रिय और इष्ट, प्रिय इनमें सुख और दुःख को रोगी के प्रश्नों से ही जान ले ॥ ११ ॥

भवन्ति चात्र - आप्ततश्चोपदेशेन प्रत्यक्ष करणेन च ।

अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ १२ ॥

सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् ।

अथाध्यवस्येत्तत्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ १३ ॥

कार्यतत्व विशेषज्ञः प्रतिपत्तो न मुह्यति ।

अमूढः फलमाप्नोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ १४ ॥

ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽऽविशति तत्त्ववित् ।

आतुरस्यान्तरात्मानं न स रांगांश्चिकित्सति ॥ १५ ॥

चतुर व्यक्ति आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा रोगों की परीक्षा करे । अर्थवित यथासम्भव सब रोगों की सब प्रकार से ( तीनों प्रकार से ) परीक्षा करके निश्चय करे, इसके पीछे चिकित्सा कार्य करे । कार्यतत्व को जाननेवाला भिषक् रोग के चिकित्सा कार्य में कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता । प्रमादरहित होकर ही मोह रहित होकर किये अनुष्ठान से उत्पन्न फल को प्राप्त करता है । जो योगवित् ( प्रयोगों को जानने वाला ) भिषक ( वैद्य ) ज्ञान, बुद्धि रूपी प्रदीप की सहायता से रोगी के अन्दर तक नहीं पहुंचता ( रोगी की सम्पूर्ण बातों को नहीं जानता), वह रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर सकता ॥ १२-१५॥

तत्र श्लोकौ -सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् ।

यथा चोपदिशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥ १६ ॥

ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तचाप्युदारधीः ।

भावात्रिरोगविज्ञाने विमानं मुनिरुक्तवान् ॥ १७ ॥

उपसंहार सब रोगों का तीन प्रमाणों में संक्षेप, आप्तोपदेश द्वारा जो जो बातें जानी जाती हैं, प्रत्यक्ष द्वारा जो ग्रहण किया जाता है और जो बातें अनु-

पृष्ठ 542

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५२४ चरकसंहिता [अ०५ मान द्वारा जानी जाती हैं इन सब बातों का उदार बुद्धि भगवान् आत्रेय ने इस 'त्रिरोग विज्ञानीय' अध्याय में व्याख्यान कर दिया ॥ १६-१७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने त्रिविधरोग- विशेषविज्ञानीय विमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातः स्रोतोविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

जीवन के आधारभूत प्राणवह आदि स्रोतों के ज्ञान के लिये ' खोतोविमान'नाम

अध्याय की व्याख्या करते हैं । ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥

यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः, सर्वभाषा हि पुरुषे नान्तरेण स्रोतस्यभिनिर्वर्तते क्षयं वाऽप्यधिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनाम- भिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥

इस पुरुष के शरीर में जितने प्रकार के मूर्तिरूप ( स्थूल ) भाव विशेष ( पदार्थ विशेष ) हैं, उतने ही इस शरीर में स्रोतों के प्रकार ( विशेष भेद ) हैं । पुरुष में सब भाव स्रोतों के बिना नहीं बढ़ते और न स्रोतों के बिना क्षय को प्राप्त होते हैं । ये स्रोत परिपाक हुए धातुओं को ( मल और प्रसाद रूप में ) ले जाने के लिये होते हैं ॥ ३ ॥

अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात्सर्व- सरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्, न त्वेतदेवम् । यस्य च हि स्रोतांसि यच वहन्ति यथावद्दन्ति यत्र चावस्थितानि, सर्व तदन्यत्तेभ्यः ॥ ४ ॥

कुछ आचार्य स्रोतों के समुदाय को ही ' पुरुष' नाम देते हैं । क्योंकि सोत सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं । दोषों के जो प्रकोपक ( अपथ्य ) हैं और जो शमन ( पथ्य ) हैं, वे सब स्रोतों द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं । परन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं है । क्योंकि जिसके स्रोत जिस वस्तु का वहन करते हैं, जिस प्रकार से अवहन करते हैं, शरीर के जिस प्रदेश में ये स्रोत स्थित हैं, यह सब इन स्रोतों से पृथक हैं, वे स्रोत नहीं हैं । इस लिये पुरुष स्रोतों का समुदाय रूप नहीं है ॥ ४ ॥

पृष्ठ 543

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अ०५ ] विमानस्थानम् ५२५ अतिबहुत्वात्तु खलु केचिदपरिसंख्येयान्याचक्षते स्रोतांसि परि-संख्येयानि पुनरन्ये ॥ ५ ॥

स्रोतों के बहुत अधिक होने से कुछ आचार्य इन स्रोतों को असंख्प मानते हैं । दूसरे आचार्य इन को गणना के योग्य मानते हैं ॥ ५ ॥

तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोप-विज्ञानतश्चानुव्याख्यास्यामः, भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां विज्ञानाय चाज्ञानवताम् । तद्यथा प्राणोदकान्न-रस-रुधिर-मांस-मेदास्थि-मज-शुक्र-मूत्रपुरीष- स्वेदवहानि, वातपित्तश्लेष्मणां पुनः सर्वशशरचराणां सर्वत्रस्ययनभूतानि तद्वदतीन्द्रियाणां पुनः सत्त्वादीनां केवलं चेत- नावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च । तदतत्स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न विकारैरुपसृज्यते शरीरम् ॥ ६ ॥

इन खातों में जो स्थूल ( गणना के योग्य ) हैं, उन के कुछ भेदों की मूल से प्रकोप-विज्ञान ( और उपशमन ) से भी व्याख्या करेंगे स्रोतों की इतनी व्याख्या बुद्धिमान् ज्ञानवान् वैद्यों के लिये अनुक, सूक्ष्म खोड़ों का ज्ञान कराने और अज्ञानी, अनुमान और युक्ति से हीन पुरुषों के लिये सामान्य रूप में खांतों का ज्ञान कराने के लिये पति होगी । यथा-प्राणवह, जलवह, अन्नवह, रसवह, रुधिरवद्द, मांसबद्द, मेदवद, अस्थिवह, मज्जावह, शुक्रवह, मूत्रत्रद, पूरीषवह और स्वेदवह ये तेरह प्रकार के स्रोत हैं । वात, पिस, कफ ये सम्पूर्ण शरीर मे फैले हुए हैं, इस लिये इन को ले जानेवाले सब स्रोत हैं । इसी प्रकार अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से अग्राह्य ) सत्र आदि ( मन आदि ) पदार्थों का चेतना युक्त यह सम्पूर्ण शरीर मार्ग तथा आश्रय है । सात शरीर के धातुओं को ले जानेवाले हैं, इसलिये स्रोतों के प्रकृति में स्थित रहने से यह शरीर विकारों अर्थात् रोगों से आक्रान्त नहीं होता खातों के त्रिकृत होने पर शरीर भी रोगी हो जाता हूं ॥६॥

तत्र प्राणवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं महास्रतिश्च प्रदुष्टानां खल्वे- षामिदं विशेषविज्ञानं भवति, अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पात्समभी- क्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ्वसन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य खातांसि प्रदुष्टा- नीति विद्यात्॥ ७ ॥

इन से प्राणवहस्रोतों का मूल ( प्रभाव स्थान ) हृदय और महा त्रांत (कोष्ठ भी) है । इन प्राणवह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं । जैसे -प्राण का अतिसर्पण ( प्रश्वास का दीर्घ होना ), अतिवद्ध ( रुक रुक कर श्वास का

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५२६ चरकसंहिता [ अ०५ चलना), प्रकुपित (बहुत तेजी से चलना ), थोड़ा थोड़ा चलना, अभीषण (बार- बार रुक रुक कर आना ), शब्दशूल अर्थात् वेदनायुक्त शब्द के साथ, श्वास लेते हुए रोगी को देखकर प्राणवहस्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥ ७॥

वहान स्रोतस तालुमूलं क्लोम च । प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा -जिह्वा ताल्बोष्ठ- कण्ठ-क्लोम शोषं पिपासां चातिवृद्धां दृष्ट्वा भिषगुदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥८ ॥

उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम ( पित्ताशय ) है । इन उदक- वह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं । यथा-जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ क्लोम का सूख जाना, प्यास का बहुत अधिक लगना ये लक्षण देखकर उदक-वह स्रोत विकृत हुए हैं यह समझना चाहिये || || अन्नवहान स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वम । प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा- अनन्नाभिलषणमरोचका-विपाकौ छर्दि च दृष्ट्राऽन्नवहानि स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ६ ॥

अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है । इन के दुष्ट होने पर

ये लक्षण होते हैं । यथा -अन्न की रुचि का न होना, अरुचि, अधिपाक, वमन ।

इन लक्षणों को देखकर अन्नवह स्रोत विकृत हुए यह समझना चाहिये ॥ ६ ॥

रसवद्दानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः । शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं सीहा च मांसवहानां च स्रोतसां स्नायु मूलं त्वक्च मेदोवानां स्रोतसां वृौ मूलं वपावहनं च । अस्थिवां स्रोतसां मेदो मूलं जघनं च । मज्जावानां स्रोतसामस्थीनि मूलं संघयश्च । शुक्रबहानां स्रोतसां वृषणो मूलं शेफश्च । प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसा- दिस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशीतपीतीयेऽध्याये । यान्येव हि धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं धातुस्रोतसाम् ॥ २० ॥

रसवहस्रोतों का मूल हृदय और हृदय से सम्बद्ध दस धमनियां हैं । शोणित ( रक्त ) वह स्रोतों का मूळ यकृत और प्लीहा है । मांसबह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है । मेदोवह स्रोतों का मूल दो वृक्क ( दो मांसपिण्ड एक दक्षिण पार्श्व में स्थित और दूसरा वाम पार्श्व में १. क्लोम को सुश्रुत में 'पिपासा स्थान' माना है । क्लोम का स्थान गले में जरा नीचे की ओर दक्षिण पार्श्व में मना है । जिसको आज कल 'तिलक' या ( कण्ठकूप ) कहते हैं । वैद्य श्री हरिप्रपन्न ने 'क्लोम याथातथ्यम्' नाम एक पुस्तक लिखी है उस में पित्ताशय को यह नाम दिया है ।

पृष्ठ 545

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विमानस्थानम ५२७ ०५१ जघन हैं । मजा-वृक्ष ) और बपावह है । अस्थिवह स्रोतों का मूल शुक्रवहमेद औरस्रोतों का मूल दोनो वह स्रोतों का मूल अस्थियां और सन्धियां हैं । अध्याय में रसादि धातुओं अण्डकोश औरलिन इन्द्रिय हैं । विविधाशितपीतीय है । ये ही इन रसबद्द के दुष्ट होने से उत्पन्न होने वाले रोगों को कह दिया धातुओं के लक्षण हैं व

आदि स्रोतों के दुष्ट होने के लक्षण हैं । जो हैंदूषित॥१०हुए॥

ही दुष्टमूत्रवहानहुए धातुवहस्रोतसांस्रोतों केवस्तिर्मूलंभी लक्षण वङ्मणौहोते कुपितमल्पाल्पमभीक्ष्णंच । खल्वेपामिदं विशेष-वा विज्ञानं भवति । तद्यथा अतिसृष्टमतिबद्धं स्रोतांसि प्रदुधनीति बहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा मूत्रवहान्यस्य विद्यात् ॥ ११ ॥ ( वृक्क ) हैं । इन

मूत्रवह स्रोतों का मूल बस्ति ( मुत्राशय )मूत्रऔरका संक्षणअधिक आना, रुक २ कर के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं । जैसे - मात्रा में अधिक ( गाढ़ा ), दर्द आना बार बार आना थोड़ा थोड़ा आनासोत, दुष्ट हुए समझने चाहियें ११|| आना । देखकर - के साथ, पुरीषवदानां ये लक्षण,स्रोतसां पक्वाशयोमूत्रवह मूलं कृच्छ्रस्थूलगुदश्च पाल्पाल्पं । प्रदुष्टानांसशूल-|| स्वत्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा दृष्ट्वा पुरीषवहाण्यस्य मतिद्रवं कुथितमतिप्रथितमतिष दोर्पाविशन्तं स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १२ ॥

पुरीषवह स्रोतों का मूल पक्वाशय, स्थूलात्रसे औरथोड़ा गुदाथोड़ा,हैशब्द। इनऔरके वेदनाटूवि होने पर ये लक्षण होते हैं । तथा - कठिनाई कठिन मात्रा में मल का बहुत के साथ, बहुत पतला ( पानी जैसा ), पुरीपवहबहुत स्रोत दुष्ट हुए हैं वह समझना अधिक आना, इन लक्षणों को देखकर चाहिये ॥ १२ ॥

स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं रोमकूपाश्च । प्रदुष्टानांपारुष्यमति-खल्वेपा- मिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथाच- अस्वेदनमतिस्वेदनंदृष्ट्वास्वेदवदान्यस्य स्रोतांस लक्ष्णतामङ्गस्य परिहाहं लोमहर्षं प्रदुष्टानीतिस्वेदवहविद्यात्स्रोतों का॥ मूल१३ ॥मेद और लोमकूपया हैंबहुत। आनाइन के, स्वचादूषित मेंहोनेकठोरतापर ये लक्षण होते हैं । जैसे - पसीने का न आना में रोमांच होना । इन लक्षणों की या बहुत चिकास, अह्नों में दाइ और समझनाशरीर चाहिये ॥ १३ ॥

देखकर स्वेदवह स्रोत दुष्ट हुए हैं यह

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५३८ चरकसंहिता [अ०५ aaife सिराधमन्धो रसायन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पन्थानो मार्गः शरीरच्छिद्राणि संवृतासंवृतानि स्थानान्याशयाः क्षया निकेता- चेति शरारधात्ववकाशानां लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥ १४ ॥

स्रोतों के पय - स्रात, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाही, पन्था मार्ग, शरीरच्छिद्र, संत असंमृत, स्थान, आशय, क्षय और निकेत ये शरीर के धातुओं को ले जाने के लिये जा आंख से दीखने या न दीखने योग्य छेद हैं उन स्रोतों के नाम हैं । १४ ॥ तेषां प्रकोपात्स्थानस्थाचैव मार्गगाचैव शरीरधातवः प्रकोपमाप- द्यन्ते । इतरेषां च प्रकीपादितराणि । स्रोतांसि स्रोतांस्येव धातवश्च धातूनेव प्रदूषयन्ति प्रदुष्टाः; तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दूषयि तारो भवन्ति, दोष भावादिति ॥ १५ ॥

इन स्रोतों ( छिद्रों) के प्रकुपित होने से आशय में स्थित, मार्ग में स्रोतों से जाने वाले शरीर के धातु भी प्रकुपित हो जाते हैं । दूसरों के प्रकोप से और भ ( स्रोतस्, वातादि दोष ) कुपित होकर दुष्ट हुए स्रोत अन्य स्रोतों को दूषित कर देते हैं । दुष्ट हुए धातु सब धातुओं को दूषित कर देते हैं । सब स्रोतों तथा धातुओं को दूषित करने वाले वात, पित्त, कफ ही होते हैं । क्योंकि दोष स्वभाव होने से अर्थात् दूषित करना ही इनका स्वभाव है ॥ १५ ॥

-भवन्ति चात्र प्रयात्संधारणाद्रौक्ष्याद् व्यायामात्नुधितस्य च ।

प्राणवाहीनि दुष्यन्ति स्रोतस्यन्यैश्च दारुणः ॥ १६ ॥

औष्ण्यादामाद्भयात्पानादतिशुष्कान्नसेवनात् ।

अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात् ॥ १७ ॥

अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात् ।

अन्नवादीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात्पावकस्य च ॥ १८ ॥

गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम् ।

रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात् ॥ १६ ॥

विदाहीन्यन्नपानानिस्निग्धोष्णानि द्रवाणि च ।

रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चाssतपानलो ॥ २० ॥

अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च ।

सिवान दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपता दिवा ॥ २१ ॥

अव्यायामाद्दिवास्वप्नान्मेध्यानां चातिभक्षणात् ।

मेदोवादीनि दुष्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात् ॥ २२ ॥

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अ० ५ ] ३४ विमानस्थानम् ५२६

व्यायामादतिसंक्षोभादस्थनामतिविघट्टनात् ।

अस्थिवाहीनि दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात् ॥ २३ ॥

उत्पेषादत्यभिष्यन्दादभिघातात्प्रपीडनात् ।

मज्जवादीनि दुष्यन्ति विरुद्धानां च सेवनात् ॥ २४ ॥

सकालयोनिगमनान्निप्रहादतिमैथुनात् ।

शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ २५ ॥

मूत्रितोदक भक्ष्य -स्त्री सेवनान्मूत्रनिग्रहात् ।

मूत्रवाहीनि दुष्यन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च ॥ २६ ॥

विधारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा ।

ववाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च ॥ २७ ॥

व्यायामादति संतापाच्छीतोष्णाक्रम सेवनात् ।

स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकभयैस्तथा ॥ २८ ॥

प्रकुपित होने के कारण धातु-श्चय से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रूक्षता से, भूख लगी होने पर व्यायाम करने से और अन्य कठिन कार्यों से प्राणवादी स्रोत कुपित होते हैं । गरमी से, आम-दोष से भय से, बहुत पानी पीने से, शुष्क अन्न ( चने आदि ) के अधिक सेवन से और प्यास को ज़बर्दस्ती रोकने से उदकवादी स्रोत कुपित होते हैं । मात्रा का अतिक्रमण करके भोजन करने से, अप्राप्त या अतीत काल में भोजन करने से, अपथ्य भोजन के सेवन से और जाठराग्नि के मन्द होने से अन्नवह स्रोत कुपित होते हैं । गुरु, शीत, अतिस्निग्ध पदार्थों के बहुत अकिध सेवन करने से, चिन्ता करने योग्य वस्तुओं की बहुत अधिक चिन्ता करने से रास्रोत दूषित होते हैं । जलन पैदा करने वाले, स्निग्ध, गरम और तरल खान-पान के सेवन और धूप और वायु का सेवन करनेवाले पुरुषों के रक्तवादी स्रोत दूषित होते हैं । दोष, धातु, मल और स्रोतों में कफ बढ़ाने वाले, स्थूल और गुरु ( भारी ) पदार्थ खाकर दिन में सोनेवालों के मांसवाही स्रोत दूषित होते हैं । व्यायाम के न करने से, दिन में सोने से, चर्बी वाले पशुओं के मांस ( सुअर का मांस ) के अधिन सेवन से, मय के अधिक पीने से मेदोवादी स्रोत दूषित होते हैं । अधिक व्यायाम से, अति संक्षोभ से, चोट आदि से, अस्थियों के अधिक

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५३० चरकसंहिता [ अ०५ चलाने ( मोड़ने माड़ने से ) से, वायु वर्धक खान-पान के सेवन से अस्थिवाही स्रोत दूषित होते हैं । उत्पेषण ( पीसने ) से, अभिष्यन्दी पदार्थों के अतिसेवन से, चोट से, दण्डे की चोट से तथा विरोधी अन्न-पान के सेवन से मज्जावादी स्रोत दूषित होते हैं । अकाल ( निषिद्ध तिथियों में ऋतुमती आदि से ) सम्भोग करने से, अयोनि ( निषिद्ध योनि ) में सम्भोग करने से, उपस्थित शुक्र के वेग को रोकने से, अतिमैथुन से, शस्त्र, क्षार और अभि से शुक्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं । उपस्थित मूत्र वेग के समय पानी, भोजन या स्त्री का सेवन करने से, क्षीण और अतिकृश व्यक्ति के मूत्रवेग को रोकने से मूत्रबाही स्रोत दूषित हो जाते हैं । मल के उपस्थित वेग को रोकने से, मन्दाग्नि और निर्बल पुरुष के अति-भोजन करने से, अजीर्ण में भोजन करने से, अध्यशन से मलवाही स्रोत दूषित होते हैं । व्यायाम से, अति संक्षोभ से, शीत और उष्ण को बिना क्रम के सेवन करने से, क्रोध, शोक एवं भय से स्वेदवाही स्रोत दूषित होते हैंहैं ॥। १६-२८ ॥

आहार विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः ।

धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसांस प्रदूषकः ॥ २६ ॥

जो आहार बिहार और कर्म वातादि दोषों के पृथक् अथवा समष्टि रूप में गुणों के समान होता है, वह समान गुण के कारण इन को बढ़ाता है और जो धातुओं से विपरीत गुणवाला हो वह आहार- विहार स्रोतों को दूषित करता है || २६ ॥

अविप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा ।

विमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥। ३० ॥

स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण - स्रोतों से रस आदि की अधिक प्रवृत्ति अर्थात् अधिक निकलना अथवा एकदम से रुक जाना, सिराओं में गांठ पड़ जाना, विमार्ग अर्थात् विपरीत, उल्टे मार्ग से जाने लगना, ये सब सांतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण हैं ॥ ३० ॥

स्वधातसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यर्णानि च ।

स्रोतस दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ३१ ॥

स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप - अपने धातु के समान रंग वाले ( रक्तवाही स्रोत रक्त के समान और मांसबाही स्रोत मांस के समान ), वृध ( गोड ),

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०५ ] विमानस्थानम् ५३१ स्थूल और अणु ( सूक्ष्म ), दीर्घ और लता के समान फैले ( कोई गोल, कोई खम्बे, कोई स्थूल और कोई सूक्ष्म ) होते हैं ॥ ३१ ॥

प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया ।

कार्या तृष्णपशमनी तथैवाऽऽमप्रदोषिकी ॥ ३२ ॥

विविधाशितपीतीये रसादीनां यदोषधम् ।

रसादिस्रोतसां कुर्यात्तद्यथास्वमुपक्रमम् ॥ ३३ ॥

मूत्र-वि -स्वेद वाहानां चिकित्सा भौत्रकृच्छिकी । तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी ॥ ३४ ॥ इति ।

प्राण, उदक और अन्नवादी स्रोतों के दुष्ट होने पर क्रम से श्वासिकी ( अर्थात् टिका कास रोग में ही ), श्वास को सुधारने वाढी, तृष्णा-रोग नाशक और आम दोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । प्राणवादी सांतों में चिकित्सावासिकी उदकवाहीकरनी चाहियेमें तृष्णाशमन। 'विविधाशितपीतीयऔर अन्नवादी' अध्यायमें आममें प्रदोषरस से नाशकलेकर शुक्र तक दूषित धातुओं की जो चिकित्सा कही है, वही रसबद्द आदि दुष्ट स्रोतों की भी समझनी चाहिये । उनकी उसी प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये । मूत्रवादी, मलवाही और स्वेदवाही स्रोतों के दूषित होने पर क्रमशः मूत्रकृच्छ्र रोग की, अतिसार रोग की तथा ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३२-३४ ॥

तत्र श्लोकाः त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ।

सामान्य नाम पर्यायाः कोपनानि परस्परम् ॥ ३५ ॥

दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च ।

स्रोतविमाने निर्दिष्टस्तथा चाssदौ विनिश्चयः ॥ ३६ ॥

केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः ।

शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥ ३७ ॥

तेरह प्रकार के स्रोतों के मूल, प्रत्येक के दूपित लक्षण, सब स्रोतों के सामान्य दूषित लक्षण, नाम, पय्योय, परस्पर कोपन, दोष का कारण, पृथक् २ औषध और उपक्रम ये सब बातें इस स्त्रोतो विमान अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं । जो भिषक् सम्पूर्ण शरीर के स्रोतों आदि को भली प्रकार जानता है और जिस को शारीरिक और मानसिक सब प्रकार के रोग ज्ञात हैं, वह चिकित्सा में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ ३५-३७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने सोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

पृष्ठ 550

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५३२ चरकसंहिता [ अ०६

षष्ठोऽध्यायः ।

अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्मा६ भगवानात्रेनायः ॥ २ ॥

अब इसके आगे 'रोगानीक' नामक विमान का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २॥

द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च द्वे रोगानीके बलभेदेन मृदु च दारुणं च द्वे रोगानीकेऽधिष्ठानभेदेन मनोऽधिष्ठानं शरीराधिष्ठानं च द्वे रोगानी के निमित्तभेदेन स्वधातुवैषम्यनिमित्त' चाssगन्तुनिमित्तं च द्वे रोगानीके आशयभेदेन– आमाशयसमुत्थं च पक्काशयसमुत्थं च । एवमेतत्प्रभाव- बलाधिष्ठान-निमित्ताशय- भेदाद्द्वेध सद्भेदप्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवा संधीयमानं स्यादेकत्वं वा बहुत्वं वा । एकत्वं तावदेकमेव रोगानीकं दुःखसामान्यात्, बहुत्वं तु दश रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति । बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसं- ख्येयं वा स्यात् । तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये । अपरिसंख्येयं पुन-येथा महारोगाध्याये, रुग्वर्णसमुस्थानादीनामसंख्येयत्वात् ॥ २ ॥

प्रभाव के भेद से रोगों के समूह दो प्रकार के हैं, ( १ ) साध्य और ( २ ) असाध्य । बल के भेद से रोग समूह दो प्रकार के हैं ( १ ) मृदु (अल्वड) और (२) दारुण (महाबल ) । अधिष्ठान अर्थात् आश्रय के भेद से राग दो प्रकार के हैं ( १) मानस, मन जिनका अधिष्ठान है और शारीरिक जिनका शरीर अधिष्ठान है । कारण के भेद से रोग दो प्रकार के हैं, ( १ ) धातुओं (वात, पित्त, कफ ) को विष-मता से होने वाले और (२) आगन्तुक कारण से होने वाले । आमाशय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं । ( १ ) आमाशय से उत्पन्न होने वाले और ( २) पक्का-शय से उत्पन्न होने वाले । (आमाशय पित्त और कफ का स्थान है और पक्काशय वायु का स्थान है । ) इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आशय के भेद से रोग दो प्रकार के होने पर भी प्रकृति आदि भेदों के कारण अनेक प्रकार के हो जाते हैं । रोग का रूप एक प्रकार का ही है । रुजा, दुःख, पीड़ा यह सब प्रकार के रोगों में सामान्य धर्म है । रोग बहुत हैं, क्योंकि प्रभाव, प्रकारबल आदिका केहै मेद। सेसंख्येयरोग बहुतअर्थात्प्रकारगिननेके हो जातेके हैंयोग्य। यह बहुतएवं होनाअसंख्येयभी दो अर्थात् गणना के अयोग्य । गिनने के योग्य जैसे अष्टोदरीय रोगाध्याय में