चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 551–560

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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ero ६ ] विमानस्थानम् ५३३ AA V रोगों की गणना की है । असंख्य जैसे महारोगाध्याय में रुकू, वर्ण समुत्थान आदि के कारण असंख्य हो जाते हैं ॥ ३ ॥

नच संख्येयात्रेषु भेदप्रकृत्यन्तरीयेषु विगीतिरित्यतो दोषवती स्या- दत्र काचित्प्रतिज्ञा, न चाविगीतिरित्यतः स्याददोषवती । भेत्ता हि भेद्यमन्यथा भिनत्ति, अन्यथा पुरुषस्तावद्भिन्नं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्द-न भेदसंख्याविशेषमापादयत्यनेकधा, नच पूर्व भेदाप्रमुपहन्ति । स मानायामपि खल भेदप्रकतौ प्रकतानुप्रयोगान्तरमपेक्ष्यम् । सन्ति अर्थान्तराणि समानशब्दाभिहितानि सन्ति चानर्थान्तराणि पर्याय-शब्दाभिहितानि । समानो हि रोगशब्दो दोपेषु च व्याधिषु च दोषा ह्यपिलभन्तेरोगशब्द। व्याधयश्चमातङ्कशब्दंरोगशव्दमातङ्कशब्दयमदं दोपप्रकृतिशब्दंहम दोपप्रतिशब्दविकारशब्दं च विकारशब्दं च लभन्ते । तत्र दोषेषु चैव व्याधिपु च रोगशब्दः समानः, शेषेषु तु विशेषवान् ॥ ४ ॥

तत्र व्याधयोऽपरिसंख्येया भवन्ति, अतित्रहुत्वात् । दोषास्तु खलु परिसंख्येयाः, अनतिबहुत्वात् । तस्माद्यथाचित्रं विकारा उदाहरणार्थ-मनवशेषेण च दोषा व्याख्यास्यन्ते । एक ही रोग में संख्येयत्व और असंख्येयत्व ये दोनों विरुद्ध बातें किस प्रकार हो सकती हैं? प्रकृति भेद के कारण ( ज्वर, अतिसार आदि भेद से ) गिने जाने योग्य रोगों में एक और अनेक मेद का कथन परस्पर विरुद्ध दोष-युक्त नहीं है । यदि ऐसा विपरीत भाव न हो तो इतने से कोई कथन दोषरहित भी नहीं होता । मेद दर्शाने वाला पुरुष मेद्य रोग के अन्य रूप से भेद करता है । पहिले अन्य प्रकार ( एक दूसरे ही रूप से ) से भेद किये होते हैं । पहिले एक ही मेद-प्रकृति से एक रूप से विभक्त किये हुए रोग को पीछे प्रकृति -मेद से विभाग करके अनेक ( असंख्य ) भेद कर लेता है । इस प्रकार असंख्य भेद करने पर भी वह प्रथम किये हुए मेों का लोप नहीं करता, वह तो बने ही रहते हैं । प्रकृति में समान होने पर भी प्रकृत अर्थात् समान शब्द से कहने के बाद अन्य रूप से वर्णन करना भी अपेक्षित है । क्योंकि समान शब्द से कहने के जाने वाले भी अनेक पदार्थ हैं और नाना पर्याय शब्दों से कहे जाने वाले एक एक पदार्थ भी अनेक हैं । अर्थात् एक शब्द अनेकार्थवाचक है, और भिन्न भिन्न शब्द एक ही अर्थ को कहते हैं । जैसे —-रोग शब्द व्याधि और दोष के किये प्रयुक्त होता है । दोषों को रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष, प्रकृति, विकार आदि

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५३४ चरकसंहिता [ अ० ६ शब्दों से कहा जाता है । व्याधियां भी रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष प्रकृति और विकार शब्दों से कही जाती हैं । इस प्रकार से दोषों और व्याधियों में रोग- शब्द सामान्य रूप से प्रयुक्त होता है । शेष ज्वरादि में विशेष अर्थ को कहता है । इनमें व्याधियां असंख्य हैं । क्योंकि ये बहुत अधिक हैं । दोष परिसंख्येय ( गण-ना के योग्य परिमित ) हैं । क्योंकि ये बहुत अधिक नहीं हैं । इसलिये रोग के असंख्य होने से, उदाहरण के लिये कुछ थोड़े से विकारों को सम्पूर्ण रूप में और गिनने के योग्य होने से दोपों को सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥ ४ ॥

रजस्तमश्च मानसी दोषी । तयोर्विकाराः काम -क्रोध-लोभ- मोहर्ष्या-मान- मद -शोक- चित्तोद्वेग-भय-हर्षादयः । वातपित्तश्लेष्माणस्तु खल्शेारी-रा दोषाः तेषामपि च विकारा ज्वरातीसार शोथ-शोपश्वास- मेहकुष्ठा-दय इति । दोषाच केवला व्याख्याताः, विकारैकदेशश्च ॥ ५ ॥

रज और तम ये दो मानस दोष हैं । इन रज और तम के विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय इर्ष अतिसार शोथ, शोष, मेह, कुष्ठ आदि हैं । इस प्रकार से सम्पूर्ण रूप में और विकार एकांश में कह दिये हैं ॥ ५ ॥

तत्र तु खल्वेषां द्वयानामपि दोषाणां त्रिविधं प्रकोपणम् तद्यथा- असारम्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्चेति । प्रकुपितास्तु खलु प्रकोपणविशेषाद्दृश्यविशेषाच्च विकारविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यपरिसंख्ये-यान् । ते विकाराः परस्परमनुवर्तमानाः कदाचिदनुबध्नन्ति कामादयो ज्वरादयश्च । नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परम् । न हारजस्कं तमः प्रवर्तते ॥ ६ ॥

इन दोनों प्रकार के ( मानसिक और शारीरिक ) दोषों के कुपित होने के कारण तीन प्रकार के हैं । ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थ- संयोग ( २ ) प्रज्ञापराध और ( ३ ) परिणाम । ये कुपित हुए दोष प्रकोपन मेद से, और दूष्य ( शरीर के धातुओं ) के भेद से असंख्य रोगों को उत्पन्न करते हैं । ये उत्पन्न होकर कभी परस्पर एक दूसरे विकारों से मिल जाते हैं ( शारीरिक रोग मानसिक रोगों से और मानसिक विकार शारीरिक विकारों से ) । जैसे काम आदि मानसिक विकार, ज्वर आदि शारीरिक विकारों से मिल जाते हैं । रज और तम का परस्पर सम्बन्ध नियत (सदा स्थिर ) बना रहता है । क्योंकि तम रज के बिना नहीं रह सकता, किन्तु सदा रज के साथ मिला रहता है ॥ ६ ॥

प्रायः शारीरदोषाणामेकाधिष्ठानीयानां संनिपातः संसर्गे वा

समानगुणत्वात् । दोषा हि दूषणैः समानाः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 553

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अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३५ प्रायः वात आदि शारीरिक दोषों के एक स्थान में रहने से परस्पर मेल हो जाता है । तीनों दोषों के मिलने से सन्निपात और दो दोषों के मिलने से संसर्ग होता है । कारण की भिन्नता होने पर भी इन में जो परस्पर संसर्ग होता है वह इसलिये होता है कि दोष दूषित करने वाले कारणों के समान गुण वाले हैं । अर्थात् दोषों में दूषित करने वाले कारणों के समान गुण हैं ॥ ७ ॥

प्रशमोतत्रानुबन्ध्यानुबन्धभवत्यनुचन्ध्यः विशेषः, तद्विपरीतलमणस्त्वनुबन्धः-स्वतन्त्रो व्यक्तलिङ्गो । यथोक्तसमुत्थान-' अनुवन्ध्य- ( अनुबन्ध ) लक्षणसमन्वितास्तत्र यदि दोपा भवन्ति तत् त्रिकं संनि पातमाचक्षते, द्वयं वा संसर्गम् । अनुवन्ध र विशेषकृतस्तु बहुविधां दोषभेदः । एवमेष संज्ञाप्रकृतो भिषजां दोपेषु चैव व्याधिषु च नाना- प्रकृतिविशेषव्यूहः ॥ ८ ॥

अधिष्ठान ( आश्रय ) और निदान को समानता होने पर भी अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के कारण इन में भेद होता है । अनुवन्ध्य का लक्षण - जो स्वतन्त्र ( स्वतः प्रधान ), स्पष्ट लक्षणोंवाला, अपने हो कारण से उत्पन्न होने वाला तथा अपनी हो चिकित्सा से शान्त होने वाला हो, उसको अनुवन्ध्य कहते हैं । इस के विपरीत लक्षणोंवाला ( परतंत्र, अस्पष्ट चिह्न, पृथक् निदान एवं चिकित्सा वाला ) अनुबन्ध होता है । यदि अनुबन्ध्य के रूप से तीनों दोष मिले हों तो इसे सन्निपात और दो दोष मिले हों तो इसको ' संसर्ग' कहते है । अनुबन्ध के रूप में मिले हुए दोषों के बहुत भेद हो जाते हैं । इस प्रकार से दोषों में ( अनुबन्ध्ध और अनुबन्ध के भेद से ) और रोगों से ( प्रकोपन आदि के भेद से ) वैद्योंने ( सन्निपात, संसर्गादि से ज्वर अतिसार आदि ) नाना प्रकार की संज्ञाएं की हैं ॥ ८ ॥

अग्निषु तु शारीरेषु चतुविधो बलभेदेन भवति । तद्यथा -तीक्ष्णो मन्दः समा विषम इति । तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वापचारसहः तद्विपरी- तलक्षणो मन्दः । समस्तु खल्वपचारतो विक्रितिमापद्यतेऽनपचारतस्तु ' प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षणविपरीत लक्षणस्तु विषमः । इत्येते चतुर्विधा भवन्त्ययश्चतुर्विधानामेत्र पुरुषाणाम् ॥ ६ ॥

बल के भेद के कारण शरीरस्थ अनि चार प्रकार का है । जैसे -तीक्ष्ण मन्द, सम और विषम । इन में तीक्ष्ण अग्नि सब प्रकार के अरचारों को सहन करता है । वह विषम आहार को भी शोध जोर्ण कर देता है । तीक्ष्ण अभि से विपरीत लक्षणों वाले अभि को मन्द अनि कहते हैं । सम अनि यथासमय १ 'अनुबन्ध्य लक्षण सम ०, २. ' अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष ० ' इति च पाठ मेदौ ।

पृष्ठ 554

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५३६ चरकसंहिता [अ० ६ भुक्त अन्न को भी प्रकार पचाता है । यह अभि अपचार से विकृति को प्राप्त होता है । अनपचार से प्रकृति में ही रहता है । सम अनि के विपरीत क्षणों वाले अग्नि को 'विषम' अग्नि कहते हैं ॥ ६ ॥

तत्र समवातपित्तश्लेष्मणां प्रकृतिस्थानां समा भवन्त्यग्नयः, बात- atri तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः, पित्तलानां तु पित्ताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः श्लेष्मलानां तु श्लेष्मा- भिभूते हाग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः || १० || ये चार प्रकार के अनि चार प्रकार के पुरुषों में होते हैं । जैसे- सम· बात पित्त- कफ- प्रकृति- वाले पुरुषों में दोषों के समानावस्था में स्थित होने से अग्नि भी सम रहता है । वातप्रकृति वाले पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान ( ग्रहणी ) केवायु से आक्रान्त होने के कारण अनि भी विषम रहता है । पितप्रकृति के पुरुषों में अभि के अधिष्ठान ( ग्रहणी ) के पित्त से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी तीक्ष्ण रहता है । कफप्रकृति के पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान ( ग्रहणी ) के कफ से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी मन्द रहता है ॥ १० ॥

तत्र केचिदाहुः— न समवातपित्तश्लेष्माणो जन्तवः सन्ति, विप- माहारोपयोगित्वान्मनुष्याणाम्प्रकृतयः केचिःपुनः प्रकृतयो। तस्माश्चभवन्तीतिवातप्रकृतयः। केचित् केचित्पि इस पर कुछ आचार्यों का कथन है कि समवात-पित्त-कफ प्रकृति वाले पुरुष नहीं होते । क्योंकि मनुष्यों का आहार विषम होता है । गर्भ में ही प्रकृति बनती है । इसलिये ( माता के आहार की विषमता से भी) कोई वात-प्रकृति, कोई पिसप्रकृति और कोई कफप्रकृति होते हैं । तञ्चानुपपन्नम् । कस्मात्कारणात्? समवातपित्तश्लेष्माणं रोगमि-च्छन्ति भिषजः । यतः प्रकृतिश्चाऽऽरोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात्सन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । न तु खलु सन्ति वातप्रकृतयः पित्तप्रकृतयः श्लेष्म प्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोष-स्याधिकभावात्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम् । न च विकृतेषु.

दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति ।

खलु वातलाः पित्तलाः श्लेष्मलाश्च । अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः ॥ ११ ॥

"उनका ऐसा कथन ठीक नहीं हैं, क्योंकि वैद्य लोग वात, पित्त, कफ इन तीनों की समान अवस्था वाले को ही नीरोग ( रोग-रहित ) कहते हैं और उसी को प्रकृति मानते हैं । रोगों से रहित रहने के लिये ही औषध की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति है और यह सब को इष्ट है । यह अभिवाच्छित अर्थ ही प्रवृत्ति में

पृष्ठ 555

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अ० ६ ] विमानस्थानम १३७ हेतु है । इसलिये समान वात- पित्त-कफ प्रकृति के भी मनुष्य होते हैं । परन्तु वातप्रकृति, पित्तप्रकृति, और कफप्रकृति के मनुष्य नहीं होते हैं । उस उस दोष की अधिकता से मनुष्यों की २ वह दोष- प्रकृति कही जाती है । विकृत ( विषम ) हुए दोषों को 'प्रकृति' नहीं कहा जा सकता, ( क्योंकि दोषों की समान अवस्था का नाम 'प्रकृति ' है ) । इसलिये वातप्रकृति आदि प्रकृतियां नहीं हैं । हां, वात, पित्तल, और श्लेष्मल ( वात- बहुल, पित्त- बहुल, श्लेष्म-बहुल ) मनुष्य हैं । इन को ' अप्रकृतिस्थ' ( प्रकृति में न रहने वाले ) समझना चाहिये, ये 'विकृतिस्थ' हैं ॥ ११ । तेषां तुII खलु चतुर्विधानां पुरुषाणां चत्वार्यनुप्रणिधानानि श्रेयस्क राणि । तत्र समसर्वधातूनां सर्वाकारसमं अधिकदोषाणां तु प्रयाणां यथास्वं दोषाधिक्यमभिसमीक्ष्य दोषप्रतिकूलयोगीनि त्रीण्यनुप्रणिधा-नानि श्रेयस्कराणि भवन्ति यावदमेः समीभावात्, समेतु सममेव कार्यम्, एवं चेष्टा भेषजप्रयोगाश्चापरे, तान् विस्तरेणानुव्याख्या- म्यामः ॥ १२ । इन चार प्रकार के ( सम प्रकृति, वात, पित्त, कफ एवं तीक्ष्ण, मन्द, विषम और समाग्नि ) प्रकृति वाले पुरुषों को आगे कहे जाने वाले चार प्रकार के अन्न-पान का सेवन करना हितकारी होता है । इन में सम सर्वधातु ( दोषों ) वाले पुरुषों को सब प्रकार का सेवन समान रूप में करना श्रेयस्कर है । शेष अधिक दोषों वाले वातल, पित्तल, इलेष्मल तीनों को उन २ के दोषोंकी अधि-कता को देखकर दोष के प्रतिकूल वस्तुओं का तब तक सेवन करना चाहिये जब तक अग्नि समान अवस्था में न आये । समान अवस्था में आने पर बन्द कर सब का समान रूप में सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार धातुओं को समान

करने वाले अन्यान्य भेषज प्रयोग भी अभीष्ट हैं । उन का विस्तार से वर्णन करेंगे ॥

त्रयस्तु पुरुषा भवन्त्यातुराः, ते त्वनातुरास्तत्रान्तरीयाणां भिपजाम् । तद्यथा - वातलः पित्तलः श्लेष्मलश्चेति । तेषां विशेषविज्ञानं -बात-लस्य बातनिमित्ताः, पित्तलस्य पित्तनिमित्ताः श्लेष्मलस्य श्रेष्मनिमित्ता व्याधयः प्रायेण बलवन्तश्च भवन्ति ॥ १३ ॥

बातल, पितल और मल ये तीन प्रकार के रोगी होते हैं । अन्य तन्त्र- कर्ताओं के मत से ये रोगी नहीं हैं । यथा --वातल, पित्तल और श्लेष्मल | इनके मत में ये भी प्रकृतियां हैं । इस प्रकार से सात प्रकृतियां हैं । इन में यह बात विशेषकर जानने योग्य है कि वातप्रकृति को वायुजन्य, पित्तल को पित्त-जन्य और श्लेष्मल को कफजन्य रोग प्रायः और बलवान् रूप में होते हैं || १३||

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५३८ चरकसंहिता [ अ०६ AAAA as arrots ोपणोकान्यासेवमानस्य क्षिप्रं वातः प्रकोप- मापद्यते, न तथेतरौ दोषौ । स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तैर्विकारः शरीरमुपतपति बर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं -स्नेहस्वेदी विधियुक्तो, मृदूनि च संशोधनानि स्नेहोष्ण मधुराम्ल लवण-युक्तानि, तदभ्यवहार्याण्युपनाहनपोवेष्टनोन्मर्दन - परिषेकावगाहन -संवाहनावपी- डन-वित्रासन- विश्मापन -विस्मारणानि, सुरासवविधानं, स्नेहाश्वानेकयो- नयो दीपनीय-पाचनीय वातहर विरेचनीयोपहिताः तथा शतपाकाः सदस्रपाकाः सर्वशश्च प्रयोगार्था बस्तयः, बस्तिनियमः, सुखशीलता चेति ॥ १४ ॥

इन में वातप्रकृति का मनुष्य जब वायु को प्रकुपित करने वाले कारणों का सेवन करता है तब वायु शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष दोनों दोष विथ और कफ इतना शीघ्र कुपित नहीं होते । वायु प्रकुपित होकर पूर्वोक अस्सी प्रकार के वात रोगों ( विकारों ) में बल, वर्ण, सुख और आयुष्प को नष्ट करने के लिये शरीर को पीड़ित करता है । इस वायु को शान्त करने के लिये स्नेह विधि और स्वेद- विधि हैं । एवं मृदु ( तीक्ष्ण नहीं ) स्नेह, उष्ण, मधुर, अम्ल, लवण युक्त संशोधन, मृदु, स्नेहन, उष्ण, मधुर, अम्ल लवण से युक्त शोधन द्रव्य और आहार द्रव्य, उपनाह ( वातहर द्रव्यों का बन्धन ), उद्वेष्टन ( वेष्टन लपेटना ), उन्मर्दन ( हाथों से मालिश ), परिपेक ( वातहर काथों से परिसेचन ), अवगाहन ( बात हर काथों में डुबकी ), संवाहन ( कोमलता से हाथ फेरना ), अपीड़न ( ताडन ), वित्रासन ( डराना), विस्मापन ( विस्मय उत्पन्न करना ), विस्मारण ( भुलाना ), सुरा और आसव ( वारुणी यंत्र से तैयार किया पदार्थ सुरा न तैयार किया हुआ आसव ) का देना, स्थावर और जंगम योनि के स्नेहों को दीपनीय, पाचनीय और विरेचनीय औषधियों से मिलाकर सौ बार या हज़ार बार ( अर्थात् बार- बार ) पकाये हुए स्नेह, सब प्रकार की बस्ति विधि, ( बहुन बार पकाये तैलों की बस्ति भो उपयुक्त है ),और निरन्तर सुखी जीवन व्यतीत करना उत्तम है ॥ १४ ॥

पित्तलस्यापि पित्तप्रकोपणोक्तान्यासेव मानस्य क्षिप्रं पित्तं प्रको-पमापद्यते, तथा नेतरौ दोषौ । तदस्य प्रकोपमापन्नं यथोक्तैर्विकारैः शरीरमुपतपति बल- वर्ण- सुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं -सर्पि पानं, सर्पिषा व स्नेहनमधश्च दाषहरणं, मधुर-तित-कषाय-शीतानां चौषधाभ्यवहार्याणामुपयोगो मृदु-मधुर- सुरभि शीत-हृद्यानां गन्धानां चोपसेवा, मुक्तामणिहारावलीनां च परम-शिशिर- वारि- संस्थितानां घार-

पृष्ठ 557

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अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३६ णमुरसा क्षणे क्षणे चामथ - चन्दन- प्रियङ्गु -कालीय-मृणाल शीतवात -वारि-भिरुत्पल कुमुद -कोकनद -सोगन्धिक-पद्मानुगतैश्च वारिभिरभिप्रोक्षणं, श्रुति- सुख-मृदुमधुर- मनोनुगानां च गीतवादित्राणां श्रवणं, श्रवणं चाभ्यु-दयानां सुहृद्भिश्च संयोगः, संयोगश्चाभिः खीभिः शीतोपहितांशुक-स्रग्दामदारधारिणीभिर्निशा करांगु-शीतल प्रजात-हवासः, शेलान्तर सेवापुलिन, - शिशिरसदनसुख -शिशिर सुरभिवसनयजनमानतो-पानीकामानामुपसेसेवा स्याणांसेवनंचोपवनानांच नलिनोत्पल-पद्म-कुमुद सोगन्धिक-पुण्डरीक पत्रहस्तानां सोम्यानां च सर्वभावानामिति ॥ १८ ॥

पित्त प्रकृति का मनुष्य जब वस्तुओं का सेवन करता है उससमय पित्त शीघ्र कुपित होजात है, शेष अन्यदो इतनी जल्दी कुपित नहीं होते । तब इस पुरुष के पूर्वोक चीज रोगों से शरीर आकान्त हो जाता है, जिससे उसके बल, वर्ण, सुख और आयु का नाश होता है । इस पित्त को शान्त करने के लिये घी का सेवन करना श्रेयस्कर है । शोधन के लिये घी से स्नेहन ( तेलादि से नहीं ), अपहरण अर्थात् विरेचन का देना, मधुर, तिक्त, कषाय, और शांत औषधियों से युक्त खान-पान का उपयोग, मृदु-मधुर सुगन्धित, शीतल और हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धो ( सुगन्धों ) काधारणसेवनकरना, अति, थोड़ीठण्डेदेर मेंपानी में रक्खेचन्दनमोतीनियंगु, मणियों, कालीयककी मालाओं, (चन्दनकी काछातीभेदपर)मृणाल, शीतल वायु, शीतल पानी, उत्पल कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक और पद्म ( ये सब कमल के भेद हैं ) इनसे हाथ-पांव धोना या छोटे डालना, कान के लिये प्रिय, मृदु, मधुर एवं मन के अनुकूल गाना-बजाना सुनना, उत्सव ( नाच-रंग ) आदि देखना, मित्रों से मिलना शीतल द्रश्यों से लिस वस्त्र, माला, और द्वारों को धारण को हुई अभिलवित स्त्रियों से मिलना-जुलना, चन्द्रमा की शीतल किरणों से झांतल खुली वायु में, महल की छतों पर ठंडे, पहाड़ों के बीच में, नदियों के तटों पर ठंडे घरों ( धारागृहों ) में, ठण्डे पंखों की शीतल वायु का सेवन, सुम्बस्पर्श, शिशिर, सुगन्धित वायु से युक्त रम्य उपवनों का सेवन करना, पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सोगन्धिक, पुण्ड-रीक, शतपत्र इन नाना प्रकार के कमलों से भरे तालाबों का सेवन और अन्य सब सौम्य शीतल वस्तुओं का सेवन करना पित्त को शान्त करता है ॥ १५ ॥

श्लेष्मलस्यापि श्लेष्म प्रकोपणोक्तान्यासेव मानस्य क्षिप्रं श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ । स तस्य प्रकोपमापन्ना यथोक्त-

पृष्ठ 558

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५४० चरकसंहिता [अ०६ बिकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं— विधियुक्तानि तीक्ष्णोष्णानि संशोधनानि, रूक्षप्रायाणि चाभ्यवहा र्याणि कटु-तिक्त- कषायोपहितानि तथैव घावन-लंघन-सवन- परिसरण-जागरणानि युद्ध-व्यवाय-व्यायामोन्मर्दन स्नानोत्सादनानि विशेषत-स्तीक्ष्णानां दीर्घकालस्थितानां मद्यानामुपयोगः, सधूमपानः सर्वशश्यो-पवासः, तथोष्णवासः सुखप्रतिषेधश्च सुखार्थमेवेति ॥ १६ ॥

कफप्रकृति के मनुष्य का कफ प्रकोपक वस्तुओं को सेवन करने से शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष अन्य दोनों धातु इतनी जल्दी कुपित नहीं होते । कुपित कफ पूर्वोक्त बीस प्रकार के कफ रोगों से शरीर को पीड़ित करती है, जिससे उसके बल, वर्ण सुख और आयु का ह्रास होता है । इस कफ को शमन करने के लिये शास्त्रोक्त विधि से तीक्षण उष्ण संशोधन और संशमन, रूक्ष गुण-वाले कटु, तिक्क, कषाय रस युक्त आहार द्रव्य प्रयोग करने चाहियें । इसी प्रकार भागना, उपवास ( लंघन ), अवन ( कूदना या पानी में तैरना ), परिसरण ( परिक्रमण, चारों ओर घूमना ), रात्रि में जागना युद्ध व्यायाम ( शरीर को परिश्रम देने वाला कर्म, कुश्ती आदि ), उन्मर्दन (रूक्ष मालिश), स्नान, उत्सादन ( उबटन लगाना ), खासकर तीक्ष्ण और पुराने मद्य का उपयोग, और धूमपान करना, सब प्रकार से उपवास, गरम वस्त्रों का उप-योग, और सुख ( आराम ) का परित्याग, दुःख सहना, सुख प्राप्ति के लिये सेवन करना चाहिये ॥ १६ ॥

भवति चात्र -सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वकार्यविशेषवित् ।

सर्वभेषजतत्वज्ञो राज्ञः प्राणपतिर्भवेत् ॥ १७ ॥

सब रोगों में ( दोष, अग्नि, वात आदि को ) जानने वाला, सब कार्यों के अनुष्ठान को भली प्रकार जानने वाला, सब औषधियों के तत्व ( सार ) का समझने वाला वैद्य राजा का प्राणपति ( प्राणों का पालक ) होगा ॥ १७ ॥

तत्र श्लोकाः – प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम् ।

परस्पराविरोधश्च सामान्यं रोगदोषयोः ॥ १८ ॥

दोषसंख्याविकाराणामेकदोषप्रकोपणम् ।

जरणं प्रतिचिन्ता च कायामेधुंक्षणानि च ॥ १६ ॥

नराणां वातादीनां प्रकृतिस्थापनानि च ।

रोगानी विमानेऽस्मिन् व्याहतानि महर्षिणा ॥ २० ॥

प्रकृति ( प्रभाव आदि ) भेद से, रोगों के भेद, नानाविध संख्या होने पर भी परस्पर अविरोध, रोग और दोष में समानता, दोषों की संख्या, रोगों का

पृष्ठ 559

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अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१ एक देश, दोषों के प्रकोप का कारण, अग्नि का विशेष कथन, शरीरस्थ अनि के चार रूप, वातल आदि तीन पुरुषों को प्रकृति में लाने वाली मेषज, ये सब बातें इस ‘ रोगानीक' अध्याय में महर्षि आत्रेय ने कह दी हैं ॥ १६-२० ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रोगानीक- विमानं नाम षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥

सप्तमोऽध्यायः अथातो व्याधितरूपीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब 'व्याधितरूपीय' विमान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ इहखलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः । तद्यथा -गुरुयाधित एकः सत्त्वबलशरीरसंपदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधि- तोऽपरः सस्वादीनामघमत्वाद् गुरुयाधित इव दृश्यते, तयोरकुशलाः केवळं चक्षुपेव रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रति- पद्यन्ते ॥ ३ ॥

दो प्रकार के पुरुष रोगी की भाँति दीखते हैं ( १ ) गुरु व्याधि से पीड़ित एक मनुष्य और सत्व, बल, और शरीर इनके उत्कर्ष से गुरु व्याधि वाला होने पर भी लघुव्याधि से पीड़ित सा दिखाई देता है । दूसरा सत्व, बल, शरीर इनके न्यून होने से लघु व्याधि होने पर भी गुरु व्याधि से पीड़ित दिखाई देता है । इनमें अकुशल वैद्य केवल आंख से ही देखकर गुरु व्याधि और लघु व्याधि के ज्ञान में मोह या धोखे में पड़ जाते हैं । वे गुरु व्याधि को लघु व्याधि और लघु व्याधि को गुरु- व्याधि समझ लेते हैं ॥ ३ ॥

न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुपपद्यते; विप्रतिपन्नास्तु खलु रोगज्ञाने, उपक्रमयुक्तिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते । ते यदा गुरुव्याधितं लघुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तमल्पदोषं मत्वा संशोधनकाले स्मै मृदुसंशोधनं प्रयच्छन्तो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति । यदा तु लघु- व्याधितंhrase गुरुव्याधितरूपमासादयन्तिat संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्यवतं महादोषं मत्वा शरारमस्यसंशोधन- क्षिण्वन्ति; एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमिति मन्यमानाः

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
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५४० चरकसंहिता [ अ० ७ परिस्वलन्ति www, विदितवेदितिव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासंभवं परीक्ष्यं परीक्ष्याध्यवस्यन्तो न कचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभि- निर्वर्तयन्ति चेति ॥ ४ ॥

क्योंकि ज्ञान के एक देश ( भाग ) से सम्पूर्ण ज्ञेयबस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता । इस प्रकार से रोग-शान में धोखा खाने पर चिकित्सा युक्ति ज्ञान में भी घोखा खाजाते हैं । जिस समय ये अकुशल वैद्य गुरुव्याधि से पीड़ित मनुष्य को लघु व्याधि से पीड़ित अर्थात् अल्प-दोषयुक्त समझ कर इस रोगी को संशोधन के लिये मृदु संशोधन देते हैं, उस समय इसके दोषों को वे और भी अधिक बढ़ा देते हैं और जब लघु -व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को महादोषयुक्त, गुरु- व्याधि वाला समझकर संशोधन के लिये तीक्ष्ण संशोधन देते हैं, तब दोषों को बहुत अधिक मात्रा में बाहर निकाल कर इस रोगी के शरीर को निर्बल करते हैं । इस प्रकार से ज्ञान के एक ही भाग से सम्पूर्ण ज्ञेय वस्तु का शान करके काम करने पर ये सब स्थानों पर धोखा खाते हैं । इसके विपरीत तीनों प्रमाणों द्वारा परीक्षा करने वाले, सर्व प्रमाण-कुशल वैद्य सत्व आदि सब बातों की परीक्षा करके कार्य करते हैं, इसलिये चिकित्सा कार्य में वे कहीं भी धोखा नहीं खाते । इससे इनको मनोवाञ्छित प्रयोजन ( आरोग्य) मिल जाता है । ४ ।

भवन्ति चात्र-सरवादीनां विकल्पेन व्याधीनां रूपमातुरे ।

eg विप्रतिपद्यन्ते बाटा व्याधिबलावले ॥ ५ ॥

भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः ।

व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ ६ ॥

प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीक्ष्यमिह सर्वथा ।

न खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन ॥ ७ ॥

मूर्ख बैद्य गुरु- व्याधित पुरुष में सत्त्व आदि के उत्कर्ष और अपकर्षको न समझ कर रोग के बल और अबल ( गुरु-लाघव शान ) में धोखा खा जाते हैं । इस प्रकार अज्ञान के कारण रोग- शान में धोखा खाये हुए रोगियों के नाश या बड़े भारी कष्ट के लिये, अयुक्ति से ( दोष दूष्य की अपेक्षा न करके ) चिकित्सा कर्म करते हैं । बुद्धिमान् वैद्य सब ( सत्व आदि ) की परीक्षा तीनों प्रमाणों द्वारा करके औषध का प्रयोग करते हैं, इसलिये वे चिकित्सा कर्म में कभी भूल नहीं करते ॥ ५७ ॥

इति व्याधितरूपाधिकारे श्रुत्वा व्याधितरूपसंख्याप्रसंभवं व्या- तिरूपतं विप्रतिपन्तौ च कारणं सापवादं संप्रतिपत्तिकारणं चान- पवाद, भगवन्तमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वकृमीणा पुरुषसंश्रयाणां