चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 561–570

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 561 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

०७ ] विमानस्थानम् ५४३ समुत्थान- स्थान-संस्थान वर्ण- नाम प्रभाव- चिकित्सित- विशेषान पप्रच्छो- पसंगृह्य पादौ ॥ ८ ॥

इस प्रकार से इस व्याधित रूपाधिकार में रोगी के रूप, संख्या, परिमाण, गुरु व्याधित, लघु व्याधित, संख्या गुरु-व्याधित और लघु व्याधित में कारण ( सत्त्वादि का उत्कर्ष और अपकर्ष ), रोग के बलाबल ज्ञान में प्रमाद ( मोह ), इस प्रमाद के कारण ( एक प्रत्यक्ष प्रमाण से ही ज्ञान करना ), सापवाद ( दोष सहित ) सम्प्रतिपत्ति ( सम्यक् ज्ञान तीनों प्रमाणों से परीक्षा करने का ज्ञान ), और अनपवाद ( निर्दोष ), इनको सम्पूर्ण रूप में सुनकर अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय के चरणों में नमस्कार कर, सब प्रकार के कृमियों के समु- स्थान ( निदान ), स्थान संस्थान ( उक्षण ), वर्ण, नाम, प्रभाव और चि कित्सा को पूछा ॥ ८ ॥

अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः - इह खल्वग्निवेश! विंशतिविधाः कृमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः, ते पुनः प्रकृतिभिर्भिद्यमानाश्चतुविधा भवन्ति । तद्यथा - पुरीषजाः श्लेष्मजाः शोणितजा मळजाश्चेति ॥ ६ ॥

अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा, हे अग्निवेश! पीछे अष्टोदरीय अध्याय में सहज ( सहजन्य ) कृमियों को छोड़ कर नाना प्रकार के विभाग से बीस प्रकार के ( मलजन्य दो प्रकार के, रक्तजन्य छः प्रकार के, कफजन्य सात प्रकार के और पुरीषजन्य पांच प्रकार के ) कृमि कहे हैं । ये बीस प्रकार के कृमि प्रकृति की भिन्नता के कारण चार प्रकार के हैं । यथा---9पुरीषजन्य, श्लेष्मजन्य, रक्तजन्य और मलजन्य ॥ ६ ॥

तत्र मलो बाह्यश्चाऽभ्यन्तरश्च । तत्र बाझे मले जावान्मलजान्सं- महे । तेषां समुत्थानं - मृजावर्जनम् । स्थान- केश श्मश्रु-लोम- पक्ष्म वासांसि | संस्थानं-अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाः । वर्णः कृष्णः शुक्लव | नामानि यूकाः पिपीलिकाश्च । प्रभावः कण्डूजननं कोठपेिड- काभिनिर्वर्तनं च । चिकित्सितं त्वेषामपकर्षणं मोपघातो मळकराणां च भावानामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥

इनमें मल दो प्रकार का है-( १ ) बाह्य और ( २ ) आभ्यन्तर । इनमें शरीर के बाह्यमल ( पसीना आदि से ) उत्पन्न होने वाले कुमियों को मलजन्य कृमि कहते हैं । इनकी उत्पत्ति का कारण शरीर शुद्धि का न करना है । इनका स्थान केश ( शिर के बाल ), दाढ़ी मूंछ, शरीर के लोभ, आंखों की पलकों के बाल और वस्त्र हैं ।

पृष्ठ 562

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 562 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४४ चरकसंहिता [अ० ७ इनका संस्थान अर्थात् ( रूप या आकृति ) ये अणु ( सूक्ष्म ), तिळ के : समान आकृति और बहुत पांत्र वाले होते हैं । इनका वर्ण ( रंग ) काला और श्वेत है । इनके नाम यूक ( जू ) और पिपीलिका (शिक्षा ), लोख है । इनका प्रभाव -खाज उत्पन्न करना और कोठ, पिडका आदि फुन्सियों को शरीर पर उत्पन्न करना है । इनकी चिकित्सा- इनको चिमटी से पकड़ कर खींचना, मल का नाथ करना और मलोत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना है ॥ १० ॥

शोणितजानां तु खलु कुष्ठेः समानं समुत्थानम्, स्थानं रक्तवाहिन्यो धमन्यः । संस्थानं अणवो वृत्ताश्चापादाश्च सूक्ष्मत्वा चैके भवन्त्यहश्याः । वर्णस्ताम्रः । नामानि केशादा लोमादा लामद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति । प्रभावः केश श्मश्रु -नख-लोम-पक्ष्मापध्वंसो व्रणगतानां हर्ष कण्डू-तोद- संसर्पणान्यतिवृद्धानां च त्वक -शिरा स्नायु -मांस -तरु- णास्थि-भक्षणमिति, चिकित्सितमप्येषां कुष्ठैः समानं तदुत्तरकालमुपदे- क्ष्यामः ॥ ११ ॥

रक्तजन्य कृमियों का निदान कुष्ठ रोग के निदान के समान ही है । कृमियों का स्थान -रक्तवाहिनी धमनियां ( सिरायें भी ) हैं । इनका रूप सूक्ष्म होने से कुछ कृमि अदृश्य होते हैं । वे आंख से नहीं देखे जाते, इनका रंग ताम्र वर्ण है; इनके नाम केशाद ( केशों को खाने वाला ), लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदु म्बर और जन्तुमाता हैं । इनका प्रभाव केश श्मश्रु, लोम और पलक के बालों को नाश करना है, व्रण में प्रवेश करके ये हर्ष छ, खाज, तोद ( चुनचुना ) और संसर्पण की सी प्रतीति कराते हैं । बहुत बढ़के ये त्वचा सिरा, स्नायु, मांस और तरुण अस्थि को भी खाने लगते हैं । इनकी चिकित्सा भी कुष्ठ रोग के समान है, इसका वर्णन आगे कुष्ठ चिकित्सा में करेंगे ॥ ११ ॥

श्लेष्मजाः क्षीर -गुड-तिल- मत्स्यानूपर्मास- पिष्टान्न परमान्न-कुसुम्भ- स्नेहाजीर्ण-पूति- क्लिन्न संकीर्ण-विरुद्धासात्म्य भोजनसमुत्थानाः । तेषामा- माशयः स्थानं । ते प्रवर्धमानास्तूर्ध्वमधो वा विसर्पन्त्युभयतो वा । संस्थानवर्ण- विशेषास्त श्वेताः पृथुत्रध्नसंस्थानाः केचित् केचिदूवृत्तपरि हा गण्डूपदाकृतयश्च श्वेतास्ताम्रावभासाः केचिदणवो दीर्घास्तत्वा- कृतयः श्वेताः । " तेषां त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां कृमीणां नामानि— G हर्ष-जिस प्रकार दाद में खुजाने से आनन्द, हर्ष वा रोमाञ्च होता है । - इस को भी कृमि उत्पन्न करते हैं ।

पृष्ठ 563

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 563 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४५अ०७ ] ३५ विमानस्थानम् अन्त्रादाः उदरादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः, महागुदाश्चेति । प्रभावो हल्लासात्य संस्रवणमरोचकाविपाको व मूर्च्छा जम्मा क्षवथुरानाहोऽङ्गमर्दश्छर्दिः काश्यं पारुष्यमिति ॥ १२ ॥

कफजन्य कृमि- क्षीर- भोजन, गुड़, तिल मछली, जलचर प्राणियों के मांस पिष्टान और परमान्न ( खीर आदि ) का भोजन, कुसुम्भ का तेल, अजीर्ण में भोजन, पूति ( स ), क्लिन ( क्लेदकारक द्रव्यों के ) संकीर्ण ( हित और अहित बेमेल मिले भोजन ) और विरुद्ध एवं असात्म्य भोजनों से उत्पन्न होते हैं । इनका स्थान आमाशय है । ये आमाशय से बढ़ कर यहीं से ही ऊपर या नीचे अथवा दोनों तरफ फैल जाते हैं । इनका रूप और वर्ण श्वेत तथा कुछ बड़ी मासपेशी के से, बद के आकार के, कुछ गोल आकार वाले, ( वेष्टन ) वाले, गिंडोये की आकृति के, श्वेत और लाल रंग की आभा वाले होते हैं । कुछ अणु ( पतके ), लम्बे और सूत के समान आकृति वाले, श्वेत होते हैं । इन तीनों प्रकार के कफजन्य कृमियों के नाम ये हैं । जैसे --अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुरू, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद । इन का प्रभाव-हल्लास वमनकी कचि हाना, मुख से लार का बहना, अरुचि, अविपाक,ज्वर, मूर्च्छा,जम्भाई का आना, छींके आना, अकरा, शरीर के अंगों का टूटना, बमन, कृशता और शरीर में रूक्षता वा कठोरता होना है ॥ १२ ॥

पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैस्तेषां स्थानं पकाशयः । प्रवर्धमा-नास्त्वो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरम्; वद--न्तरं तस्योद्गारनिश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थान वर्णविशेषास्तु सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णाशुकसंकाशाः केचित् केचित्पुनः स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलरितपीताः । तेषां नामानि ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति । प्रभावः पुरीषभेदः काय पारुष्यं लोमहर्षाभिनिर्वर्तनं च त एवास्य गुदमुखं परितुदन्तः कण्डू चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जावद्दर्षा गुदनिष्क्रमण-मतिवेलं कुर्वन्ति - इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च कमीणां समुत्थाना-दिविशेषः ॥ १३ ॥

पुरीषजन्य ( मल से उत्पन्न ) कृमियों का निदान कफजन्य कमियों के समान है । इन कमियों का स्थान पकाशय है । ये कृमि बढ़कर नोचे को ओर फळते हैं । जिस पुरुष में ये कृमि आमाशय की ओर जाने लगते हैं, उस पुरुष के उद्गार ( डकार ) और श्वास में मल की गन्ध आती है । इनका रूप वर्ण- सूक्ष्म, गोल वेधन वाले तथा श्वेत और भेड के लम्बे बालों के समान

पृष्ठ 564

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 564 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४६ चरकसंहिता [ ० होते हैं । कुछ स्थूड, गोक वेष्टन वाले, काले, नीले, हरे या पीछे रंग के होते हैं । इन के नाम कवक, मकेरुफ, लेलिह, सशूलक, सौसुराद हैं । इनका प्रभाव--मठ का पतका आना, शरीर में कृशता, परुषता और रोमांच होना है । ये कृमि रोगी की गुदा के मुख पर रहते हैं । ये हर्ष उत्पन्न होने पर बार बार गुदा से बाहर ( मल के साथ ) निकलते हैं । यह कफजन्य और पुरीष- जन्य कृमियों में उत्पत्ति आदि का मेद है ॥ १३ ॥

चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदिश्य पश्चाद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवाऽऽदितः कार्य; ततः प्रकृतिविघातोऽनन्तरं निदानोकानां भावानामनुपसेवनमिति ॥ १४ ॥

कफ और मल से उत्पन्न कृमियों की चिकित्सा संक्षेप में कहकर फिर पीछे से विस्तार से कहेंगे । इन कृमियों का प्रथम अपकर्षण ( खींचना शोधन ) करना चाहिये, फिर प्रकृति विघात ( उपशम ) और पीछे से निदान-रूप पदार्थों का अनुपसेवन अर्थात् त्याग करना चाहिये ॥ १४ ॥

तत्रापकर्षण हस्तेनाभिगृा विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपक-रणेन वा, स्थानगतानां तु कृमीणां भेषजेनापकर्षण; न्यायतस्तु तच्चतु-विधम् । तद्यथा- शिरोविरेचनं वमनं विरेचनमास्थापनमित्यपक- विधिः ॥ १५ ॥

अपकर्षण विधि - उपकरण ( संदश, चिमटी आदि ) से अथवा बिना उपकरण के हाथ से पकड़ कर बाहर निकालने का नाम ' अपकर्षण ' है । यह कार्य बाह्य मलजन्य ( पुरीषजन्य ) और लेष्मजन्य कृमियों के स्थान से निकले होने पर ही हो सकता है और जो कृमि अपने स्थान में स्थित हों,

उनको औषध द्वारा निकालना उचित है और यह औषध चार प्रकार का है ।

यथा - शिरोविरेचन, वमन, विरेचन और आस्थापन । यह अपकर्षण-विधि है ॥ १५ ॥

'प्रकृतिविघातस्त्वेष -- कटु-तित- कषाय-क्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगो बच्चान्यदपि किंचिच्छ्लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत्स्यादिति प्रकृति-विघातः ॥ १६ ॥

प्रकृति - विघात - प्रकृति ( कफ और पुरीष ) का उपघात अर्थात् नाश वा शमन करना । इस के लिये कटु, विक, कपाय, क्षार और उष्ण पदार्थों का उपयोग करना चाहिये । इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ श्लेष्मा और मठ के

विरुद्ध आहार-विहार हो उसका सेवन करना चाहिये । यह प्रकृति विघात- विधि है ॥ १६ ॥

पृष्ठ 565

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 565 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

०७] विमानस्थानम ५४७ अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति यदुक्त निदा- नविधौ तस्य विसर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणामिति लक्षणचि कित्सितमनुव्याख्यातमेतदेव पुनविस्तरेणोपदेक्ष्यते ॥ १७ ॥

इसके आगे निदान में कहे पदार्थों का सेवन का त्यागना आवश्यक है । ऐसा निदान विधि में जिन जिन द्रव्यों को निदान रूप से कहा है, उनका परित्याग करना चाहिये । इसी प्रकार न कहे हुए निदान के अनुरूप द्रव्यों का भी परित्याग करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप से चिकित्साक्रम कह दिया है, अब इसी को विस्तार से कहते हैं ॥ १७ ॥

अथैनं कृमिकोष्ठमातुरमग्रे षड्रात्रं सप्तरात्रं वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वोभूते एनं संशोधनं पाययितास्मीति क्षीर- दधि - गुड- तिल-मत्स्यानू-पमांस-पिष्टान्न -परमान्न-कुसुम्मस्नेह संयुक्तर्भोज्यैः सायं प्रातश्चोपपादये-त्समुदीरणार्थं चैव कृमीणां कोष्ठाभिसरणार्थं च भिषक् । अथ व्युष्टायां रात्रौ सुखोषितं सुप्रजीर्णभुक्तं च विज्ञायाऽऽस्थापन-वमन विरेचनैस्तदह- रेवोपपादयेदुपपादनीयश्चेत्स्यात्सर्वान् परीक्ष्यविशेषान् परीक्ष्य सम्यक् । इस कृमि -कोष्ठ वाले रोगी को संशोधन देने से पूर्व छः या सात रात तक स्नेहन और स्वेदन देना चाहिये । फिर सातवें वा आठवें दिन ( अगले दिन ) इस को संशोधन दूंगा ऐसा निश्चय करके सायं प्रातः दोनों समय क्षीर ( दूध ), गुड़, दही, तिल, मछली, जलचर प्राणियों का मांस, पिष्टान्न, कुसुम्भ तैल से बने भोजन खिलावे | इस प्रकार के भोजनों से कोष्ठ के क्रिमि भली प्रकार से उत्क्लेशित हो जाते हैं ( निकल आते हैं ) और अन्यत्र गये हुए कृमि भी कोष्ठ की ओर आने लगते हैं । इस के अनन्तर रात्रि के बीतने पर ( प्रातः काल होने पर ) भली प्रकार नींद आई तथा खाया हुआ भोजन भली प्रकार जीर्ण हो गया यह देखकर उस दिन ( नवम दिन ) आस्थापन, वमन, विरेचन ( इन में से कोई एक क्रिया ) देना चाहिये । क्रिया करने से पूर्व रोगी की सब प्रकार से ( प्रकृति सात्म्य, सत्व आदि से ) परीक्षा कर लेनी चाहिये । अथाऽऽहरेति ब्रूयात्- मूलक- सर्षप लशुन- करञ्ज -शि-मधुशि -कमठ - खर पुष्पा भूस्तृण- सुमुख- सुरस-कुठेरक -गण्डीर-कालमालक- पर्णास-क्षवक-फणिज्जकानि सर्वाण्यथवा यथालाभं, तान्याहूतान्यभिसमीक्ष्य खण्ड-शश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समवाय गोमूत्रेणार्वोदकेनाभ्यासिध्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्व्या । तस्मिन् शीतीभूते तूपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतर सेष्वोषधेषु स्थालीमवतार्य, सुप रिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनपिप्पलीफलं विडङ्गकल्कतैलोपहितं सजि-

पृष्ठ 566

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 566 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४८ चरकसंहिता [अ०७ कालवणितमम्यासिच्य बस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं, तथाऽर्कालर्क- कुट- जाटकी- कुष्ठ- कैडर्य कषायेण वा, तथा शिघ्र पीलु -कुस्तुम्बुरु-कटुकासर्षप- कषायेण, तथाऽऽमलक- शृङ्गवेर- दारुहरिद्रा- पिचुमर्द- कषायेण मदनफल- संयोगसंयोजितेन त्रिरात्रं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत् ॥ १८ ॥

आस्थापन आदि क्रिया करने की विधि -अनन्तर कहे कि निम्न सब वस्तुओं को अथवा इन में से जितनी प्राप्त हो सकें उन वस्तुओं को लावे-मूलक ( मूली ), सरसों, लशुन, नाटा करञ्ज, शित्रु ( घोभांजन ), मधुशि ( मीठा सहजन ), कमठ ( कोई लाल फूल का कचनार मानते हैं ), खर-पुष्पा ( अजवायन ), भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डोर, कालमाल, पर्णास, चबक और फणिज्जक ( ये सब तुलसों के भेद हैं ) इन सब को अथवा इनमें से जा मिलें उनको लाकर, टुकड़े टुकड़े करके, पानी से भली प्रकार धोकर, अच्छी प्रकार धुली हांडी में रखकर आधे, पानी मिले गोमूत्र में भिगो कर ( डालकर ) निरन्तर कछो ( खींचे ) से चलाते हुए अभि पर पकाना चाहिये । जब औषधियों का सम्पूर्ण रस जल में आ जाय तब हांडी को उतार कर वस्त्र में से भली प्रकार छान ले । इस कुछ गरम क्वाथ में मैनफल, पिप्पली, वायविडंग इनका कल्क और तेल मिश्रित सर्जक्षार ( सजी खार ) एवं नमक मिलाकर विधिपूर्वक इस रोगी को आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । इसी प्रकार आक, अलर्क ( मदार ), कुटज, आढकी, ( अरहर ), कुष्ठ ( कूठ ) और कैटर्स ( पर्वतनिम्त्र ) कषाय से बस्ति देनी चाहिये, ( तेल मिश्रत नमक एवं मैनफल आदि पूर्व को भाँति डाले ) । इसी प्रकार शित्रु, पीलु, कुस्तुम्बर, कुटकी और सरसों के कषाय से, इसी प्रकार आंवला, अदरख ( सोंठ ), दाहल्दी, पिचुमर्द ( नीम ) के कषाय से, मैनफल आदि डालकर लवण युक्त तेल मिलाकर तीन बार अथवा सात बार आस्थापन -कर्म करना चाहिये ॥ १८ ॥

प्रत्यागते च पश्चिमे बस्तौ प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतोभागहरणं संशोधनं पाययेद्युक्त्या । तस्य विधिरुपदेक्ष्यते । मदनफलपिप्पलीकषा- यस्यार्घाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कल्काक्षमात्रमालोड्य पातुमस्मै प्रयच्छेत् तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधु, एवमेव कल्पोक्तानि वमनविरे- चनानि संसृज्य पाययेद्देनं बुद्धधा सर्वविशेषानवेक्षमाणो भिषक् ॥१६॥

शेष बस्ति के गुदा द्वारा बाहर निकल आने पर रोगी को आश्वासन देकर उसी दिन ( जिस दिन बस्ति दी है ) दोनों ऊर्ध्व एवं अधोभागों से

पृष्ठ 567

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 567 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

०७ ] विमानस्थानम् ५४६ दोष निकालने के लिये वमन, विरेचन रूपी संशोधन, देश, काल, मात्रादि की अपेक्षा से देना चाहिये । -मदनफल, पिप्पली कषाय की आधी अंजलि को विधि -1 त्रिवृत् ( निशोथ) के कल्क की एक अक्ष मात्रा में मिलाकर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के दोष दोनों मार्गों से भली प्रकार निकलते हैं । इस प्रकार से कल्प-स्थान में कहे जाने वाले वमन, विरेचन योगों को परस्पर मिला कर रोगी की सब बातों को देख कर बुद्धि से भली प्रकार विचार कर रोगी को पीने के लिये देवे ॥ १६ ॥

अथैनं सम्यग्विरिक्तं विज्ञायापराह्णे शंखरिककषायेण सुखोष्णेन परिषेचयेत् तेनैव च कपायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वादकार्थान् कार- येच्छश्वत् । तदभावे वा कटुतिक्तकषायाणामपिधानां काथैर्मृक्षाव परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैनं निर्वातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पलीपिप्पली-मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर- सिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपक्रामयेत् । विलेप्याः क्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्विख ॥। २० ॥ इसके पश्चात्( दोनों भागों से संशोधन होने पर ) भली प्रकार संशोधन हुआ जान कर शैखरिक कषाय ( अशमार्ग के थोड़े गरम कपाय ) से परिषेचन करे । इसी कषाय को पानी के स्थान पर पीने के लिये और बाह्य ( स्नान आदि में ) निरन्तर बरतना चाहिये । इस अपामार्ग के कषाय के अभाव में कटु, तिक्त, कषाय रखवाली औषधियों के कार्यों से, मूत्रमिश्रित यवचार ( जवाखार ) आदि से परिपेचन करना चाहिये । परिषिक्त इस रोगो को बायु-रहित घर में प्रविष्ठ करके पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ इस पंचकोल द्वारा सिद्ध यवागू को उपकल्पनीय अध्याय में कहे पेयादि क्रम से देना चाहिये । विलेपी तक पहुंच जाने पर रोगी को विडंग-तैल द्वारा एक दिन के अन्तर से दो बार तीन बार अनुवासन देना चाहिये । ( अनुवासन में पेया का निषेध है, क्योंकि पेया अभिष्यन्दी है ) ॥ २० ॥

यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाशीर्षादान्कृमीन्मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः काँश्चित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डु- लादिना शिरोविरेचनेन ॥ २१ ॥

शिरोविरेचन - इस रोगी के शिर को खाने वाले कृमियों को बहुत बढ़ा हुआ जाने और देखे कि कृमि शिर में फिरते हों, ऐसा वैद्य को अनुभव हो तो रोगी के शिर को स्नेहन और स्वेदन देकर अपामार्ग के तण्डुलों ( चावलों ) आदि शिरोविरेचन योग्य द्रव्यों से शिरोविरेचन देवे ॥ २१ ॥

पृष्ठ 568

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 568 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५० चरकसंहिता [अ०७ यस्त्वम्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः कृमोणां, सोऽनुव्या- ख्यास्यते - मूषिकपर्णी समूलामप्रतानामाहृत्य खण्डशरदायित्वा उखले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृहीयात् तेन रसेन लोहितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकाः कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषु विपाच्य विडङ्गतैलवगोपहिताः कृमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्; अनन्तरं चामलकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसृष्टं सलवण-मनुपाययेत् ॥ २२ ॥

अनेन कल्पेन मार्कवार्क -सहचर -नीप-निर्गुण्डी-सुमुख-सुरस कुठेरक- -गण्डीरस्वरसा काळमालक नामन्यतमस्मिन्कारयेत्पूपलिकाः -पर्णास- क्षवक फणिजक-, तथाबकुल-किणिही-कुटजकिरात- सुवर्णक्षरी-तितक-सुवद्दामलक हरीतकी-बिभीतक -स्वरसेषु कारयेत्पूपलिकाः । स्वरसा-तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशोवा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं प्रयच्छेत् ॥ २३ कृमियों के प्रकृति ॥ -विघात के लिये जो आहार- विधि कही है, उस को व्याख्या करते हैं । जल और कोमल पत्तों के साथ मूषापर्णी को लाकर इसको टुकड़े २ करके, ऊखल में कूटकर, हाथों से दबाकर रस निकाल ले । इस रस में लाल धानों के चावलों की पिट्टी को मिलाकर इससे पूरी ( पूए ) बनाये । इन पूरियों को धूम रहित अंगारों पर पकाये । फिर विढंग तेल और लवण के साथ मिलाकर के लिये दे । पूरी खाने के ( कांजी कृमि( धान्य य-कोष्ठवाले-काशिकव )रोगीमें कोया खानेउदश्वित् पीछे आधे विकोये मठे, या खड़ी)छाछ में पिप्पली आदि पंचकोल को कवण के साथ मिला कर पीने के लिये दे । इसी विधि से मार्केव ( भृंगराज ), अर्क ( आंक ), सहचर ( झण्टि ), नीप ( कदम्ब ), निर्गुण्डी ( सिन्धुवार सम्हालु ), सुमुख, सुरत, कुठेरक, गण्डीर, ( सेडुण्ड ), काळमाळ ( कुठेरक के मेद ), पर्णास, क्षवक, फणिञ्जक ( तुलसी के मेद ), बकुळ ( मौलसरी ) कुटज, स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ) इन में से किसी एक के रस के साथ पूरी तैयार करनी चाहिये । इसी प्रकार किणिही ( अपामार्ग ), किराततिक्त (चिरायता ), आम की, हरक, विभीतक ( बहेड़ा ), सुबहा ( शेफालिका ) इनके रसों में पूरियां बनानी चाहियें । इन ( मण्डूक- पर्णी आदि ) में से एक एक को या दो दो को अथवा सब को मिलाकर स्वरस निकाल कर इस स्वरस में मधु मिला कर प्रातःकाल खाली पेट पीने के खिये दे ॥ २२-२३ ॥ अथाश्वशदाहृत्य महति किलिखके प्रस्तीर्या ssवपे शोषले

पृष्ठ 569

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 569 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ० ७ ] विमानस्थानम् III दयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो बाssवपे सुपरिभाविवानि भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा- वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चर्णानां पाणितलं वर्णं यावद्वा साधु मन्येत वत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥

इसके पीछे घोड़े की शकृत् ( लीद ) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर धूप में सुखा ले । फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला कषाय से आठ बार अथवा दस बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले । फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये बढ़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांग कर गुप्त स्थान पर रख दे । इसमें से कर्ष परिमाण ( चार मासा ) अथवा रोग के अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥

तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रनध्ने शरीरमुपवेष्टय मृदावलिप्ते समवाप्यो उपेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखावस्य स्नेहभावतस्यैवान्यस्य दृढस्य कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दादयेत् स यदा जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गळितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति, ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याSSतपे सर्वमहः स्थाप- यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिष्यते, विरिक्तस्य चानुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥

दूसरा प्रयोग -घड़े में जितने मिळावे के फल आ सकें, उतने फलों को कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे इस घड़े के निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर दे । इस घड़े में मिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे । फिर स्नेह से भावित एक दूसरे पढ़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे । इस गढ़े हुए बड़े के ऊपर मिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जळावे । जब उपले भली प्रकार जल जायें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे । जब इस -दूसरे घड़े में से तेल ( स्नेह ) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल -चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे । पीछे इस स्नेह को

पृष्ठ 570

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५२ चरकसंहिता [अ० ७

कृमि -कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है ।

विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥ २५॥

एवमेव भद्रदारु- सरकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत् । अनुवा सचैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥

इसी भल्लातके स्नेह-विधि से देवदार, सरल ( शल-सर्ज ), वृक्षों से स्नेह बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥

अथ ' आह ' इति ब्रूयात् शारदान्नवांस्तिलान्संपदुपेतान् । तानाहृत्य सुनिध्य सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदादोष-गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुच्य पुनरेव सुनितान् सुनष्य शुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा-वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोदूखले संक्षुद्य दृपदि पुनःऋणपिष्टा- कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरबसिञ्चन् पाणि-मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां पर्यादाय शचौ हढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् । अन्ययोग-वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ' । अच्छी प्रकार पके, रस- वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर, भी प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम बिडंग- कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा लेवे । फिर छाज से साफ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी ( थाली, कड़ाही ) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ाडालते हुए हाथों से खूब मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए तप्त तेल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे । इस को खाने के लिये कहे । err 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोद्दालकयोग बिल्वमात्रौ पिण् पिष्टौ विडङ्गकषायेण ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतयोरतोऽर्धमात्रौ दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्घमात्रौ चव्यचित्र कयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा- यस्या ssढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैछप्रस्थ मावाप्य सर्वमालोच्य महवि पर्योगे समासिच्या ग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-