चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 571–580

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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विमानस्थानम ५५३ मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सततमवघट्टयन् । स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति-मृद्वनतिदारुणमनंगुलिप्राहि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम- वतीर्णशीतीभूतमहतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाय सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय तेन साधु विरिच्यते, सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु-वासनकाले । फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे - तिल्व और उद्दालक ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय क साथ खूब बारीक पीस ले । इनसे आधी मात्रा ( २ तोला ) श्यामा ( काली निशोथ ) और त्रिवृत् (सफेद निशोथ ), इन से आधी ( १ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे ( रे तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्घाटक (दो प्रस्थ) विडंग कपाय, में तथा एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाई में रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अनि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा बराबर दिलाता रहे । जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी रुक जाय, तथा स्नेह ( तेल ) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तेल में उचित गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध ( कल्क ) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, ( कल्क की बस्ती बन जावे ) । तब समझ ले कि तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तेल उतारने का अब इसको उतार कर ठण्डा होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर, ढक्कन से ढांप कर, सफ़ेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर गुप्त ( सुरक्षित ) स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये ( कृमि -रोगी को ) देवे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है । दोषों के भली प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये । अनुवासन योग्य समय में उस तक से अनुवासन देना चाहिये । एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करज- कोषातकी स्नेहानुपकल्प्य

पाययेत्सर्व विशेषान वेक्ष्यमाणः । तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥

पृष्ठ 572

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५४४ चरकसंहिता [अ०७ इसी पूर्वोक्त विधि से सरसों, अलसी, करज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि रोगी को तैल पिळावे । इस से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥

इत्येतत् द्वयाना लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान- संस्थान- स्थान- वर्ण- नाम- प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः || २८|| इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान, स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥

विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वोष-धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः शिरोविरेचन- वमनोपशमन- भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातां भवति ॥ २६ ॥

विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई बमन, विरेचन, आस्था-पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, औषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा-सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये । मलजन्य कुमियों में बस्ति, विरेचन अधिक बरतना चाहिये । कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २६ ॥

तमन्तिष्ठता यथास्वद्देतुवर्जने प्रयतितव्यम् ॥ ३० ॥

यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं भवतीति ॥ ३१ ॥

इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी बचाये । इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि- कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन -शमन रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥

भवन्ति चात्र- अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम् ।

ततो विघातः प्रकृतेनिदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥

अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निप्रहे ।

विष्टित्रिधा योऽयं कृमीनुद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥

संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम् । -कमियों कोएतावद्भिषजाप्रथम खींचकार्यकररोगेनिकालनारोगे यथाविधिहो औषध ॥ है३४। ॥ फिर प्रकृति का नाथ, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के किये है । इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है । इसलिये वैद्य को चाहिये कि

पृष्ठ 573

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अ० = ] विमानस्थानम ५५५ प्रत्येक रोग में सब विकारों में संशोधन, संशमन और निदान का त्याग यह तीन प्रकार की चिकित्सा करे ॥ ३२-३४ ॥

तत्र लोकौ -व्याधितौ पुरुषो ज्ञाज्ञो भिपजौ सप्रयोजनौ ।

विशतिः कुमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥ ३५ ॥

उक्तो व्याधितरूपीये विमानं परमर्षिणा ।

शिष्यसंबोधनार्थं च व्याधिप्रशमनाय च ॥ ३६ ॥

ब्याधि से पीडित दो प्रकार के पुरुष विज्ञ ( जानने वाले ) और अश ( मूढ़ ), इनका प्रयोजन ( जानने वाल से सिद्धि और मूढ़ से रोगवृद्धि या मृत्यु ), बीस प्रकार के कृमि, इन के हेतु, संस्थान वर्ण, प्रभाव, नाम और चिकित्सा ये सात बातें, भगवान् आत्रेय ने शिष्य को समझाने के लिये तथा रोग की शान्ति के लिये इस विमान स्थान में कह दी हैं ॥ ३५-३६ ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रं चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने व्यातिरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अष्टमोऽध्यायः ।

अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे 'रोगभिषग्जितीय' नामक अध्याय को व्याख्यान करेंगे ।

जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवे कर्मफलमनुबन्धं देशकालो च विदित्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवाऽऽदितः परीक्षेत । विवि-धानिहि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके । तत्र यन्मन्येत सुमहद्यश-स्विधीरपुरुषासेवितमर्थ बहुलमाप्त जनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमप गतपुनरुक्तदोषमाषं सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंपदक्रमं स्वाधारमनव पतित- शब्द मकष्टशब्द पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं संगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवञ्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रप- येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल दवाऽऽदित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति सर्वम् ॥ ३ ॥

शास्त्र परीक्षा - बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य के गौरव ( बहुत प्रयास से साभ्य ) एवं कापत्र ( अन प्रयास से साध्य ), कर्मों के फल, अनुबन्ध

पृष्ठ 574

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५५६ चरकसंहिता [ अ० ८ ( कर्मजन्य शुभ-अशुभ फळ ), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं । इनमें से जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हों, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे । शास्त्र के गुण - शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप- सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों से अनुमत ( निर्दोष ), उत्तम, मध्यम और अघम इन तीन प्रकार के शिष्यो की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रणीत ( अच्छी प्रकार प्रथित किया हो ), जिस में सूत्र ( संक्षेप में अर्थों का ग्रहण ) भाष्य ( विस्तार से वर्णन ), और प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, ( क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को बतलाने वाला ), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्व को बतलाने वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला, लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये । क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अशान को दूर करके सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥

ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत । तद्यथा-पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक-र्माणं दक्षं दक्षिणं शुचि जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ-तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृत विद्यमनहङ्कृत मनसूयकमकोपनं कशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापर्कं ज्ञापनसमर्थं चेति । एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा- वो मेघ इव सम्यगुणैः सुशिष्य माशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥

आचार्य का लक्षण -शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा करे । यथा - वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि ( पवित्र ), शस्त्र आदि क्रिया में बशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों वाका सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ वाळा, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के शान से प्रकट स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाळा, क्रोध-

पृष्ठ 575

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अ० ८] विमानस्थानम ५५७ रहित क्लेश सहन करने वाला, शिष्य से प्रेम-भाव रखने वाला, शास्त्र के तत्व को बतलाने में समर्थ आचार्य होना चाहिये । जिस प्रकार ठीक ऋतु अनुसार बरसा हुआ मेघ उत्तम क्षेत्र को धान्यों से सम्पन्न कर देता है उसी प्रकार उक्त गुणों वाला आचार्य शिष्य को निर्मल ज्ञान आदि वैद्य के गुणों से शीघ्र सम्पन्न कर देता है || ४ || तमुपसृत्यारिराधयिपुरुपचरेदद्भिवच्च देववञ्च राजवच्च पितृवच्च भर्तृवच्चाप्रमत्तः । ततस्तत्प्रमादात्कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य, शास्त्रस्य दृढ-वायामभिधानसौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचनशक्ती च भूयो भूयः प्रयतेत सम्यकू ॥ ५ ॥

उपरोक्त गुणों वाले आचार्यके पास जाकर सेवा करने की इच्छा से शिष्य अग्नि, देव, राजा, माता, पिता और स्वामी के समान प्रमादरहित होकर उस की सेवा करे । तब उस की प्रसन्नता ने सम्पूर्ण शास्त्रको जान कर शास्त्र का दृढ़ करने में, शास्त्र को उत्तम रीति से प्रवचन करने में, शास्त्र के अर्थ जानने में और वाक्चातुर्य ( बोलने की पड़ता प्राप्त करने ) में लगातार भी प्रकार से प्रयक्ष करे ॥ ५ ॥

तत्रोपाया व्याख्यास्यन्ते -- अध्ययनमध्यापनं तद्विद्यसंभाषा चेत्युपायाः ॥ ६ ॥

शास्त्र को दृढ़ करने आदि के उपायों का वर्णन करते हैं । वे उपाय ये I-( १ ) अध्ययन ( पढ़ना ), ( २ ) अध्यापन ( पढ़ाना ) और ( ३ ) उस विद्या के विद्वानों से बातालाप करना ॥ ६ ॥

वश्यकतन्त्रायमध्ययनविधिः-परश्योदकं देवकल्यः-गां-कृतक्षणःब्राह्मण-गुरुप्रातरुत्थायोपव्युषं- वृद्ध-सिद्धाचायभ्योवा कृत्वानमःss- स्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसरीभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरि- क्रामन्पुनःपुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्वं स्वदोषपरिहार- परदोषप्रमाणार्थम् । एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रो च शश्वदपरिहापयन्न- ध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः ॥ ७ ॥

इस शास्त्र की अध्ययन विधि यह है— नीरोग, समय में, नियम-पूर्वक प्रातःकाल उषःकाल में उठ कर शौचादि आवश्यक कर्मों को करके, पानी का आचमन स्नान आदि जलकार्य करे, पीछे देव, परमेश्वर ऋषि, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध एवं आचार्य इनको नमस्कार करके समान ( न ऊंचे और न नीचे ) एवं पवित्र स्थान पर सुखपूर्वक बैठकर मनोयोग पूर्वक वाणी से बार- चार सूत्रों का उच्चारण करता हुआ खूब समझ कर, अर्थ-तत्व में बुद्धि द्वारा

पृष्ठ 576

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५५= चरकसंहिता [ अ०८ प्रवेश करके, ( भली प्रकार समझ कर ) अपने अध्ययन के दोष को त्यागने और दूसरे के अध्ययन के दोषों के ज्ञान लिये एकान्त में बैठ कर अध्ययन करे । इस प्रकार से मध्याह्न और रात्रि में निरन्तर अध्ययन ( किसी दिन को भी बिना त्याग किये, ) प्रतिषिद्ध दिनों को छोड़कर, अभ्यास करे ॥ ७ ॥

अथाध्यापनविधिः - अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमादितः परीक्षेत । तद्यथा- प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षद्र कर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासा- वंशं तनुरक्तविशदजिह्वम विकृतदन्तोष्ठममिण्मिणं धृतिमन्तमनकृतिं मेधायिनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृसं तवाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमव्यसनिनं शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य प्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थवि- ज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितैषिणमाचार्यं सर्वा-नुशिष्टिप्रति करमनुरक्तमेवं गुणसमुदितमध्याप्यमेवमाहुः । अब अध्यापन विधि कहते हैं--पढ़ाने की इच्छा करने वाले आचार्य को सबसे प्रथम शिष्य की परीक्षा करनी चाहिये । यथा - शिष्य सोम्य आकृति, शान्त, नीच स्वभाव से रहित, कमीने स्वभाव का न हो, नीच कर्म न करने वाटा, सरल मुख, आंख और नासिका वाला, पतली टाक वर्ण, स्पष्ट जिहा बा, दांत और ओष्ठों के विकार से रहित, नाक से अनुनासिक न बोलने वाला, संतोषी या धैर्यवान्, अहंकार रहित, मेघावी, वितर्क ( ऊहापोह ) स्मृति (याददास्त ) से युक्त, उदारचित्त वाला, वैधकुल में या वैद्य वृद्धि करने वाले माता पिता से उत्पन्न, वैद्य के समान आचार वाला, तत्स्व के ग्रहण में दत्तचित्त, अविकल अंगों वाला, सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, निभृत ( विनीत ), अनुद्धत, अर्थ-तत्र को विचारने वाला, अक्रोधी, व्यसनरहित, शील ( सच्चरित्रता ) शौच ( शुद्धि ) आचार, अनुराग ( पढ़ने से स्नेह ) रखने वाला, दक्षता, प्रादक्षिण्य सर्वत्र अनुकूलता इन गुणों से युक्त, कर्म दर्शन और अर्थ के जानने में अन्य कर्म रहित, दत्तचित्त लोभरहित, अप्रमादी, सब प्राणियों में मंगल कामना करने वाला, आचार्य के सब उपदेशों को यथावत् करने वाला और भक्तिमान् हो; इन गुणों से युक्त शिष्य को पढ़ाना चाहिये ( इन गुणों से रहित शिष्य को पढ़ाने में आचार्य को भी यह नहीं मिलता । ) एवंषिधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत— अथोद्यने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि विषय-हस्त श्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे; कल्याणे च करणे मैत्र मुहूर्त मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाष्य-

पृष्ठ 577

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विमानस्थानम् ५५६अ० ] मुपलेपनमुदकुम्भश्चिगन्धहस्तो माल्य- दाम-प्रदीप- हिरण्य- हेम -रजत- मणि- मुक्ता-विक्रम क्षौम -परिधि -कुश लाज- सर्षपाक्षतांश्च शुक्लाश्च सुमनसोप्रथि-ताप्रथिताच मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्टानादायोपतिष्ठस्वेति । अथ सोऽपि तथा कुर्यात् ॥ ८॥

इन उपरोक्त गुणों से युक्त अध्ययनार्थ शिष्य के सेवा में उपस्थित होने पर आचार्य उसे कहे -– कि "तू उत्तरायण ( माघ आदिके शुक्ल पक्ष में, प्रशस्त दिव्य उत्तम तिथि, बार से युक्त दिन में तिष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी एक नक्षत्र के साथ कल्याणकारी करण और सुखप्रद मुहूर्त के अनुकूल होने पर, मुण्डन करा, उपवास और स्नान करके, कपाय वस्त्र धारण करके, हाथो में सुगन्ध ( धूप ), समिधा, अमि, घी, उपलेपन ( चन्दन आदि ), जल के घड़े, माळा, हार, स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल ( मूंगा ), खीम ( रेशम ), हवनकुण्ड के चारों पावों में रखने योग्य हस्तप्रमाण के पराशादि समिधा, कुशा लाजा, सरसों, अश्चत, श्वेत, गुंथे और ग्रन्थन रहित ( लुटे, अनविधे ) पुष्प माला, पवित्र खाद्य पदार्थ ( तिल से बने लड्डू आदि ), घिसे हुई चन्दन, आदि सुगन्धों को लेकर उपस्थित हो । ” वह शिष्य उसी प्रकार से करे ॥ ८ ॥

तमुपस्थितमाज्ञाय शुभे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतु- ष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयादकेन पलिप्त' कुशास्तीर्ण सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्त-चन्दनोदक-कुम्भ -क्षौम हेम- हिरण्य - रजत -मणि- मुक्ता-विदुमालङ्कृतं मेध्य भक्ष्य-गन्ध-शुक्र- पुष्प-लाज- सर्षपाक्षतोपशो- भितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गदीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा धाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनविधिमनुविधाय मधुसर्पिभ्यां त्रित्रिर्जुहु. यादभिमाशीः संप्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनावि- न्द्रमृषच सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाद्देवि ॥ ६ ॥

दीक्षा-जिस समय अध्ययनार्थी शिष्य समिधा आदि वस्तुओं को लेकर आचार्य के पास उपस्थित हो उस समय एक समान एवं पवित्र स्थान में पूर्व या उत्तर दिशा में चार हाथ प्रमाण चौकोर जगह को गोबर और पानी से लेप कर इस पर कुशा बिछा दे । इसके चारों ओर से भली प्रकार वेष्टित कर दे । इसके चारों ओर चन्दन, पानी के घड़े, रेशम, स्वर्ण, चांदी, मणि, मुक्ता, मूंगा आदि पवित्र भक्ष्य, गन्ध, श्वेतपुष्प, खाजा, सरसों, अक्षत आदि वस्तुएं सजा देवे । इसमें पलाश ( ढाक ), इंगुदी ( हिंगोट ), गूलर,

पृष्ठ 578

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५६० चरकसंहिता [ अ०८ महुए आदि किसी एक वृक्ष की समिधाओं से अभि प्रज्वलित करके पवित्र एवं पूर्वमुख बैठ कर अध्ययन विधि ( वेदारम्भ विधि ) के अनुकूल आशीर्वाद में प्रयुक्त मन्त्रों द्वारा ब्राह्मण, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति, दो अश्वी, इन्द्र, और सूत्रकार ऋषियों ( भरद्वाज आदि ) को पहिले मन्त्रों से आह्नान करके स्वाहा शब्द के साथ मधु ( शहद ) और घी प्रत्येक से तीन तीन बार आहुति दे ॥ ६ ॥

शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ।

ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् ॥ १०॥

आचार्य के होम कर चुकने पर पीछे शिष्य भी होम करे । हक्म करके अग्नि की तीन परिक्रमा करे । पीछे ब्राह्मणों की परिक्रमा करके स्वस्तिवाचन करे और वैद्यों की पूजा करे ॥ १० ॥

अथैनमसिकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्-ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्म त्सरेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं न च ते मद्वचनात्किचिदकार्य स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थ संप्रयुक्ताद्वाऽप्यर्थात् मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद् भवितव्यं, पुत्रवद्दासवदर्शिवच्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहिते-नानन्यमनसा विनीतेना वेश्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्व गुर्वर्थपान्वाहरणे यथा-शक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धि यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमि- च्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्माऽऽशासितव्यम-हरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चाऽऽतुराणामारोग्यं प्रयति- तव्यं, जीवितहेतोरपि चाऽऽतुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च पर-खियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं निभृतवेशपरिच्छदेन भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च लक्ष्ण शुक्ल- धर्म्य -धन्य सत्य- शर्म्य-हित- मित- वचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमता ज्ञानोत्थानोपक-रणसंपत्सु नित्यं यत्नवता, नच कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वे- वामत्यर्थ -विकृत -दुष्ट- दुःख -शीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां मुमूषर्णा च तथैवासंन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा, नच कदा- चित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुर कुलं चानुप्रविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धे पुरुषेण

पृष्ठ 579

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 579 का मूल पृष्ठ
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अ० ३६ विमानस्थानम ५६१ सुबीनावाक्शिरसा स्मृतिमत्ता स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्व-माचरता बुद्धया सम्यगनुप्रवेष्टव्यं अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रि याणि न कचित्प्रणिधातव्यान्यन्यत्राऽऽतुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्व- न्येषु वा भावेषु न चाssतुरकुलप्रवृत्तयां वहिर्निश्वारयितव्याः, हसि चाऽऽयुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमा नमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, विज्ञानत्रताऽपि च नात्यर्थ-मात्मानो ज्ञाने विकत्थितत्र्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानाइत्यर्थमुद्वि-जन्त्यनेके ॥ ११ ॥

आचार्य का शिष्य को उपदेश- इसके अनन्तर आचार्य उस शिष्य को अनि, ब्राह्मण और वैद्यों के समक्ष ( इनके साक्षि रूप में ) निम्न उपदेश देवे ॥ तुझको ब्रह्मचारी, श्मश्रुधारी, सत्यवादी, पवित्रभोजी, मात्सर्यरहित, निरामित्र- भोजी, निःशस्त्र होकर रहना चाहिये । तुझको मेरी आज्ञा से ही सब कुछ करना चाहिये, परन्तु राजविरुद्ध, प्राणनाशक, बहुत बड़ा अधर्म या अनर्थ का काम हो तो वह काम मेरी आज्ञा से भो नहीं करना चाहिये । तुझको मुझको अपंग करके, मेरी प्रधानता से, मेरे अधीन रह कर, मेरे प्रिय और मेर हितकारो रह कर सदा बरतना चाहिये । पुत्र पिता की, भृत्य स्वामी को, अर्थी धनो की जिस प्रकार से सेवा करते हैं, वैसे तुझे मेरी सेवा करनी चाहिये । उत्सुकता-रहित, दत्तचित्त, सावधान, एकाग्र मन से, नम्र होकर, चार २ देख कर कार्य करना चाहिये । तुझे निन्दा से रहित और मेरी आज्ञा से विचरना-घूमना चाहिये । मेरी आज्ञा से या बिना मेरी आज्ञा के घूमने पर भी तुझे प्रथम मुझ गुरु के लिये अर्थ ( धन ) लाने का प्रयत्न करना चाहिये । चिकित्सा कर्म में सफलता, धनप्राप्ति, यश-लाभ और परलीक में स्वर्ग की कामना से तुझे गां- ब्राह्मण का प्रथम संस्कार कर अन्य सब प्राणियों की मंगल कामना करनी चाहिये । प्रति दिन उठते -बैठते, जागते सब अवस्थाओं में, सब समय में, सम्पूर्णरूप से रोगियों के कल्याण के लिये यत्नवान् रहना चाहिये ( रोगी का दुःखित करके जाविका नहीं कमानी चाहिये ) । मन से भी पर स्त्रो की चाह न करनी चाहिये । इसी प्रकार दूसरे के धन को मन से भी नहीं चाहना चाहिये । विनीत ( नम्र वेश ) वस्त्रों वाला होना चाहिये ( उद्धत वेश नहीं पहनना चाहिये ) । प्रमाद रहित, स्वयं पापरहित, तथा पापकर्म में साथी नहीं होना चाहिये । कोमल, निर्दोष, धर्मानुकूल, सुखकारक, सत्य, हितकारी, परिमित वाणी बोलने वाला तथा देशकाल को विचार कर काम करने वाला,

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 580 का मूल पृष्ठ
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५६२ चरकसंहिता [ अ०८ स्मृतिमान् होना चाहिये । शान और अभ्युदय के उपकरणों को प्राप्त करने में सदा यनवान् रहना चाहिये । राजा जिनसे द्वेष करता है, अथवा जो राजा से द्वेष करते हैं, महाजन ( बड़े आदमी ), जिनसे द्वेष करते हैं, अथवा जो महाजनों से द्वेष करते हैं, उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । इसी प्रकार जिनके शील ( स्वभाव ) और आचार अत्यन्त निकृष्ट और दुष्ट हो, अल्पवाद, प्रतिकार, धनरहित ( जनपदोदूध्वंस में कहे हुए ) लोगों की तथा मरणोन्मुख रोगियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति अथवा संरक्षक पास में न हों, उन की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । स्त्रियों से दिये धन को पति या संरक्षक के पूछे बिना कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये, ( उनकी आशा से ही ग्रहण करना चाहिये ) । रोगी के घर जाते समय चेतावनी देकर, आशा मिलने पर दूसरे पुरुष के साथ उत्तम विनम्र वेश को पहिने हुए शिर को नीचे किये जाना चाहिये । जाते समय स्मृतिमान्, स्थिर मन से भली प्रकार-सोच विचार कर जो कुछ करना हो, भली प्रकार से घर में पहुंच कर करना चाहिये । घर में जा कर रोगी के उपकार के सिवाय रोगी से सम्बन्धित अथवा चिकित्सा से अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाणी, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को नहीं लगाना चाहिये । रोगी के घर के रहस्यों को बाहर नहीं करना चाहिये! जहाँ पर कहने से किसी अन्य प्राणी के मरने की सम्भावना हो, वहाँ पर मरणोन्मुख लक्षणों से रोगी की आयु का क्षय जानने पर भी नहीं कहना चाहिये । ज्ञानवान् होने पर भी अपने ज्ञान की प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि सत्यभाषी, आप्त, विद्वान् होकर भी अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने वाले से अनेक लोग बहुत उद्धि हो जाते हैं ॥ ११ ॥

न चैव हास्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियो गमस्मिन् गच्छेत् । एतच कार्य एवं भूयञ्च वृत्तसौष्ठवमननुसूयता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्थः । शत्रुश्चा- बुद्धिमताम् 3 अतश्वाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमा- युष्यं पौष्टिकं लोकमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति ॥ १२ ॥

आयुर्वेद ज्ञान की कहीं पर समाप्ति नहीं है । इसलिये इस आयुर्वेद के ज्ञान उपलब्ध करने में सदा प्रमादरहित होकर निरन्तर मनोयोग देवे । यहाँ कहे हुए कार्य सम्पूर्ण रूप से करने चाहिये । इस प्रकार करते हुए निन्दारहित होकर दूसरे लोगों से भी ( शास्त्र के सिवाय ) अन्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । क्योंकि बुद्धिमानों का सम्पूर्ण संसार आचार्यवत् है और मूर्खो का वह शत्रु है । अतः