चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 581–590
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 581–590
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BTO = ] विमानस्थानम् ५६३ ठीक २ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रु के भी धन्य, यशकारी, आयुष्य, पौष्टिक और लौकिक वचन को सुनना चाहिये और तदनुसार करना चाहिये॥ १२ ॥
अतः परमिदं ब्रूयात्— देवताग्नि-द्विजाति-गुरु- वृद्ध-सिद्धाचार्येषु ते नित्यं सम्यग्वर्तितव्यम् । तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायर्माग्निः सर्वगन्धरस- बीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः । अतोऽन्यथा वर्तमानस्या शिवायेति । इसके आगे निम्न प्रकार से उपदेश देवे 'देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य इनकी प्रतिदिन भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये । इन देवताओं की भली प्रकार से सेवा करने पर यह तेरे सामने उपस्थित अग्नि सब प्रकार के गन्ध, रस, रत्न, वीज और पूर्वोक्त देवता आदि सब तेरे लिये मंगलकारी होंगे । ' एवं ब्रुवति चाऽऽचार्य शिष्यस्तथेति ब्रूयात् । तद्यथोपदेशं च कुर्वन्न- व्याप्यो ज्ञेयः, अतोऽन्यथा त्वनध्याप्यः । अध्याध्यमध्यापयन् ह्याचार्यो यथोक्तैश्चाध्यापनफलैर्योगमाप्नोत्यन्यैश्वानुक्तः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमा त्मानं च युनक्ति । इत्युक्तावध्ययनाध्यापनविधी यथावत् ॥ १३ ॥
इस प्रकार से आचार्य के कहने पर शिष्य भो 'तथास्तु' कह कर स्वीकार करे | आचार्य उपदेशानुसार करने वाले शिष्य को पढ़ावे और न करने वाले को नहीं पढ़ावे । पढ़ाने के योग्य शिष्य को पढ़ाने से ही आचार्य को अध्या-पन-कार्य का योग्य फल उचित लाभ मिलता है और यहाँ न कहे हुए दूसरे, अनेक श्रेयस्कर गुणों से शिष्य को और अपने को भी युक्त करता है । इस प्रकार अध्ययन और अध्यापन विधि कह दी ॥ १३ ॥
अध्ययनाध्यापनविधिवत्सं भाषाविधिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः-भिषक् भिषजा सह संभाषेत, तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी भवति, वैशारद्यमपि चाभिनिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाऽऽघत्ते, यशश्चा-भिदीपयति, पूर्वश्रुते च संदेहवतः पुनः श्रवणात् संशयमपकर्षति, श्रते चासंदेहवतो भूयोऽध्यवसोयमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कंचिदर्थं श्रोत्रविषयमापादयति, यद्वाचाऽर्थः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणो-पदिशति गुलाभिमतमर्थजातं तत्परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेन विजि-गीषुराह संहर्षात्, तस्मात्तद्विद्य संभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः ॥ १४ ॥
संभाषणविधि - अध्ययन अध्यापन विधि के समान ही अब संभाषणविधि का वर्णन करते हैं । वैद्य वैद्य के साथ संभाषण करे । क्योंकि उसी विद्या को
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५६४ चरकसंहिता [अ०८ जानने वाले के साथ संभाषण करने से ज्ञान और दर्प को प्राप्त करता है, ज्ञान की चतुरता उत्पन्न करता है, बोलने की शक्ति पैदा करता है, यश को बढ़ाता है, अध्ययन काल में पहिले सुने शब्द या अर्थ में ज़रा संदेह होता है, उसको मिटाता है । और संदेह रहित वस्तु में और भी अधिक दृढ़ निश्चय कर लेता है अध्ययन काल में गुरुमुख से न सुना हुआ भी कुछ विषय यहां पर सुनने में आता है और आचार्य की सेवा करने वाले शिष्य के लिये जो गोपनीय बस्तु ( अर्थ ) प्रसन्न होकर गुरु बताता है, उस गोपनीय बात की यह दूसरे के साथ शास्त्रार्थ करते हुए अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिये, जीतने की इच्छा से सार रूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रकट कर देता है । इसलिये बुद्धिमान् लोग उस विद्या में निपुण विद्वान् से संभाषण करने की प्रशंसा करते हैं ॥ १४ ॥
द्विविधा तु खलु तद्विद्य संभाषा भवति- संधाय संभाषा, विगृह्य सम्भाषा चेति ॥ १५ ॥
'तद्विद्य संभाषण ' अर्थात् उस विद्या के बेत्ता पुरुष से भाषण दो प्रकार का है । ( १ ) संधाय संभाषा- संधि अर्थात् परस्पर मेल करके प्रेमपूर्वक संभाषण करना, अनुलोम संभाषण है । ( २ ) विगृह्य संभाषा - विग्रह करके, दूसरे को पराजित करने के अभिप्राय से संभाषण करना प्रतिलोम संभा• षण है ॥ १५ ॥
तत्र ज्ञान-विज्ञान -वचन-प्रतिवचन -शक्ति- संपन्नेनाकापनेनोपस्कृतवि येनानसूय केनानुनेयं नानुनयको विदेन क्लेशक्षमेण प्रियसंभाषणेन च सह संघाय संभाषा विधीयते । तथाविधेन सह कथयन्विस्रब्धः कथयेत्, पृच्छेदपि च विस्रब्धः, पृच्छते चास्मै विस्रब्धाय विशदमर्थं ब्रूयात्, न च निप्रभयादुद्विजेत, निगृह्य चैनं न हृष्येन्न च परेषु विकत्थेत, नच मोहादेकान्तग्राही स्यात्, न चाविदितमर्थं तमनुवर्णयेत्;सम्यक्चानुन- येनानुनयेश, अनुनये तत्र चावहितः स्यादित्यनुलोम संभाषा- विधिः ॥ १६ ॥
अनुलोम संभाषण की विधि- ज्ञान ( शास्त्रज्ञान ), विज्ञान, वचन ( पूर्व- पक्ष ), प्रतिवचन ( उत्तरपक्ष ) कहने में समर्थ, क्रोध से रहित, अविकृत विद्या वाले, अनिन्दक, अनुनय के योग्य, अनुनय को जानने वाले, क्लेशसहिष्णु, प्रिय बोलने वाले पुरुष के साथ सन्धि करके संभाषण करते हुए विश्वासपूर्वक ( विना संकोच या भय के ) बातचीत करे और जो कुछ पूछना हो वह विश्वा- सपूर्वक पूछे । इस प्रकार के पुरुष के आगे पराजय के भय से न घबराए और
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STGE ] विमानस्थानम ५६५ www. स्वयं भी प्रतिवादी का पराजय करके प्रसन्न न हो । दूसरों के आगे अपनी डींग न करे, अपनी प्रशंसा नहीं करे । मोहवश केवल लेने वाला ही न बने । न जाने हुए विषय का वर्णन नहीं करे । प्रतिवादो से किये अनुनय के सामने विनीत होवे । दूसरे के अनुनय में सावधान रहे । यह ' अनुलोम- संभाषण विधि' है ॥ १६ ॥
अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्य संभाषायां जल्पेत् श्रेयसा योगमा त्मनः पश्यन् प्रागेव च जगजान्तरं परावरान्तरं परिषद्विशेषांश्च शंसति सम्यक्परीक्षेत, तस्मात्परीक्षामभिप्रशंसन्ति। सम्यक् परीक्षाहि कुशलाःवुद्धिमनां। कार्यवृत्तिनिवृत्तिकालपरीक्षा खलु परा- वरान्तरमिमाञ्जल्पकगुभान् श्रवस्करान् दोषवत परीक्षेत सम्यक् । तद्यथा- श्रुतं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिरित्येतान् गुणान् श्रेयस्करानाहुः । इमान्पुनर्दोपितः, तद्यथा -कोनत्तमवैशारयं भीरु- त्वमधारणत्वमवहितत्वमिति । एतान्यानपि गुणान् गुरुलाघवतः परश्य चैवाऽऽत्मनश्च तोलयेत् ॥ १७ ॥
विगृह्य -संभाषा - इसके अनन्तर 'विगृह्य भाषा' का वर्णन करते हैं । पुरुष अपना श्रेय ( विद्योत्कर्ष आदि ) योग देखता हुआ प्रतिवादी के साथ 'विगृह्य संभाषण' करे । इनमें वाद-विवाद ) से पूर्व ही जल्प के लक्षण,जल के गुण दोष, प्रतिवादी और अपने गुण दोष और परिषद् के गुण दोषों को भली प्रकार से देख लेवे । क्योंकि भली प्रकार को हुई परीक्षा बुद्धिमानों को कार्य में प्रवृत्त होने और निवृत्त होने का काल बता देती है । इसलिये कुशल लोग परीक्षा की प्रशंसा करते हैं । अपने और प्रतिवादी के गुण-दोषों की परीक्षा करने में, दन श्रेयस्कर और अश्रेयस्कर जल्पगुणों की परीक्षा करनी चाहिये । जैसे-गुरुमुख से शास्त्र का श्रवण, विज्ञान, ( अत्रवोध ), धारण ( मन से धारण करना ), प्रतिमान ( प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमति ) और बोलने की शक्ति का होना --- इन गुणों को श्रेय- स्कर कहते हैं और इन निम्नलिखित गुणों को अभेयस्कर अर्थात् दोषयुक्त कहते हैं । जैसे— क्रोध करना, अपाण्डित्य, भीरता, अन- भ्यास दत्तचित न होना, ये दोष हैं । इन दोनों प्रकार के गुणों को अपने में तथा प्रतिवादी में तुलना करके न्यून अधिक रूप से देखना चाहिये ॥ १७॥
सत्र त्रिविधः परः संपद्यते,-प्रवरः प्रत्यवरः समो वा गुणविनिक्षे- पतः, नत्वेव काम्येंन ॥ १८ ॥
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५६६ चरकसंहिता [ अ०८ इनमें प्रतिवादी तीन प्रकार का होता है-( १ ) प्रवर ( उत्तम ), ( २ ) प्रत्यवर (हीन) और ( ३ ) सम (समान) । ये मेद श्रुत, विज्ञान आदि गुणों के परिमाण से होते हैं, कुल, शील आदि भेद से नहीं ॥ १८ ॥
परिषत् खलु द्विविधा, ज्ञानवती, मूढपरिषथ; सेव द्विविधा सती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन-सुहृत्परिषद्, उदासीनपरिषत् प्रति- निविष्टपरिषच्चेति ॥ १६ ॥
परिषद् अर्थात् सभा दो प्रकार की होती है, ज्ञानवती और मूढ़ । यही दो प्रकार की परिषद् शत्रु मित्र और उदासीन कारण से तीन प्रकार की हो जाती है । ( १ ) सुहृत्परिषद्, (२) उदासीन परिषद्, (३) प्रतिकूल- निविष्ट परिषत् ( विरोधियों की परिषद् ) ॥ १६ ॥
तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञान -विज्ञान-वचन प्रतिवचन शक्तिसंप- न्नायामपि मूढायां वा न कथंचित्केनचित्सह जल्पो विधीयते मूढायां तु सुहृत्परिषदि उदासीनायां वा ज्ञान-विज्ञान-बचन प्रतिवचन -शक्तिमन्त- रेणाप्यदीप्तयशसा महाजनद्विष्टेन सह जल्पो विधीयते, तद्विधेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यं, अतिहृष्टं मुहु-मुहुरुपहसता परं, निरूपयता च परिषद्माकारैः श्रुवता चास्य वाक्याचका- शो न देयः । कष्टशब्दं च ब्रवता वक्तयो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना प्रतिज्ञा'इति,पुनश्चाऽऽहूयमानः प्रतिवक्तव्यः -'परिसंवत्सरो भव, शिक्ष- स्वतावत् पर्याप्तमेतावते, सदपि हि परिक्षेपिकं निहतं निहतमाहु- रिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचित्: अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्य- मित्याहुरेके; न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ २० ॥
इनमें से शत्रु- परिषद् अथवा मूढ़-परिषत् में ज्ञान-विज्ञान, वचन प्रतिवचन की शक्ति होने पर भी किसी उत्तम, हीन वा समान व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार से जप ( विवाद ) नहीं करना चाहिये । मूढपरिषद् में, वा मित्रपरि षद् में, या उदासीन परिषद् में ज्ञान-विज्ञान और वचन प्रतिवचन शक्ति के विना भी, प्रज्वलित कीर्ति से रहित और अनेक जनों के द्वेषपात्र (जिसका पक्ष कोई नहीं करे ) ऐसे पुरुष के साथ जल्प किया जा सकता है । इस प्रकार के पुरुष के साथ संभाषण करते हुए, टेढ़े मेढ़े लम्बे सूत्रों से युक्त लम्बे २ वाक्यों से भाषण करना चाहिये । खूब प्रसन्न होते हुए, प्रतिवादी की बार- बार हंसी करते हुए, आकार- चेष्टा आदि से परिषद् का ध्यान खींचते हुए और बोलनेको उद्यत हुए प्रतिवादी को बोलने का अवसर नहीं देना चाहिये । दुर्बोध अर्थ या
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अ०८] विमानस्थानम् ५६७ वाक्य को कहते हुए उससे बोलने के लिये कहना चाहिये कि 'नहीं कहते अथवा तेरी प्रतिज्ञा होन है । और यदि वह फिर वाद -विवाद के लिये बुलावे तो उसको कहना चाहिये कि- "एक साल और अधिक गुरु के पास पढ़, तेरे लिये इतना ही पर्याप्त है । " एक बार पराजित हुए प्रतिवादों को पराजित हो कहते हैं । अतः फिर इसके पक्ष का ग्रहण नहीं करना चाहिये । एक बार प्रति-पक्षी को पराजित करके पुनः उसे अवसर नहीं देना चाहिये । कुछ आचार्यो का मत है कि इस प्रकार अपने से श्रे से भी प्रतिनाम जल कर लेना चाहिये परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य अपने से श्रेठ के साथ प्रतिलोम ( विटा) संभाषण की इच्छा नहीं करते ॥ २० ॥
प्रत्यवरेण तु सह समानाभिमतेन वा विगृह्य जल्लता सुहृरिषदि कथयितव्यं, अथवाऽप्युदासीनपपदे अवधान -श्रवण ज्ञान-विज्ञानापधा-रण-वचन -शक्ति- संपन्नायां कथयता चात्रहितेन परस्य साद्गुण्यदोषवलम- वेक्षितव्यं; समवेश्य च यत्रेनं श्रेष्ठं मन्येत नात्य तत्र जल्पं योजयेदना-विष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र त्वेनमबरं मन्येत तत्रत्रेनमाशु निगृद्धीयात् । अपने से हीन या अपने समान प्रतिवादों के साथ सुहृरिषद्, उदासीन परिषद् या मूढ़ परिषद् में विगृह्य संभाषण करना चाहिये । अपना उदासीन परिषद् में अत्रवान, श्रवण, ज्ञान, विज्ञान, उपधारण, वचन, प्रतिवचन शक्ति, आदि गुणों तथा कोष आदि दावों को अपने में और दूसरे में तुलना करके सावधानी से संभाषण करना चाहिये और परोक्षा करके जिस बात में प्रतिवाद को अपने से श्रेष्ठ समझे, उस विषय में अपनी अयोग्यता को प्रकटन करते हुए जलर का प्रयोग नहीं करना चाहिये ओर जिस विषय में प्रतिवादो को अपने से हीन समझे, उसमें इस को शीघ्रता से पकड़ लेना चाहिये । तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निप्रहे भवन्त्युराया; तद्यथा श्रुत- हीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत् विज्ञानहीनं पुनः शब्देन वाक्येन, वाक्यधारणादीनमाविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डके, प्रतिभाहीनं पुन- चनेकविधेनानेकार्थवाचिना, बचनशक्तिहीनम र्वोक्तस्य वाक्यस्याss- क्षेपेण, अविशारद मपहेपणेन, कोपनमायासनेन भीरुं वित्रासनेन, अन- वहितं नियमनेन । इत्येवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेत् ॥ २१ ॥
प्रतिवादी को शीघ्र निग्रह करने के लिये निम्न उपाय हैं । जैसे-जिसने शास्त्र न पढ़ा हो उसको बड़े लम्बे २ सूत्र सुना कर पराजित करे । विशेत्र ज्ञान से हीन अतिदुर्योध अर्थ वाले, क्लिष्ट शब्दों से बने वाक्यों का प्रयोग करे ।
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५६८ चरकसंहिता I [ अनभ्यस्त शास्त्र वाले या अल्पबुद्धि के लिये वक्र, लम्बे २ सूत्रों से बने वाक्यों का प्रयोग करे । प्रतिभा से हीन के लिये अनेकार्थवाची, अनेक प्रकार के वचनों को प्रयोग करे । वचन-शक्ति से हीन को आधे ही वाक्य पर टोक दे । अपण्डित या अचतुर को ( जिसने कभी पहिले सभा नहीं देखी हो ) लज्जाजनक वाक्यों से पराजित करना चाहिये, क्रोधी व्यक्ति को तंग करके, डरपोक को भय दिखला कर, जो सावधान न हो उसको मन के नियमन करने वाले वचनों से पराजित करे । इन नाना उपायों द्वारा प्रतिवादी का शीघ्र पराजय करे ॥ २१॥
तत्र श्लोक-विगृह्य कथयेयुक्त्या युक्तं च न निवारयेत् ।
विगृह्यभाषा ती हि केषांचिद् द्रोहमावहेत् ॥ २२ ॥
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य 'नावाच्यमपि विद्यते ।
कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं सहिताः सताए ॥ २३ ॥
एवं प्रवृत्ते वादे कुर्यात् ॥ २४ ॥
प्रतिलोम संभाषण करने का प्रकार---दूसरे के साथ विगृह्य- संभाषण करते हुए युक्तिपूर्वक भाषण करे । युक्ति प्रमाणानुकूल दूसरे के वचन का निषेध नहीं करे | जल्प कई पुरुषों में तीव्र क्रोध उत्पन्न कर देता है । क्रुद्ध व्यक्ति के लिये कुछ भी अकार्य नहीं होता, वह कुछ भी कर सकता है । उसके लिये कुछ भी अवाच्य नहीं, वह सब कुछ बुरा-भला भी कह सकता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष सजनों की सभा में कलह को अच्छा नहीं समझते । वाद चलने पर इस प्रकार करे ॥ २२–२४ ॥ प्रागेव तावदिदं कर्तुं यतेत - संधाय परिषदाऽयनभूतमात्मनः प्रक-रणमादेशयितव्यं यद्वा परस्य भृशदुर्गं स्यात्, पक्षमथवा परस्य भृशं विमुखमानयेत् परिषद, परिषदि चोपसंहिताया मशक्यमस्माभिर्वक्तुम, एषैव ते परिषद्यथेष्टं यथायोगं यथाभिप्रायं वादं वादमर्यादां च स्थाप- यिष्यतीत्युक्त्वा तूष्णीमासीत ॥ २५ ॥
बाद प्रारम्भ होने से पूर्व निम्न बातें करने का यत्न करे । यथा -परिषद् ( सभ्यों ) से मिलकर अपने अभ्यास किये हुए प्रकरण या विषय का निर्देश करे । अथवा जो प्रकरण वा विषय दूसरे को बहुत दुर्बोध हो उसे कहे अथवा दूसरे का पक्ष जो बहुत अधिक झगड़ा उत्पन्न करने वाला हो, वहां पर सभ्यों के बीच कहे । यदि परिषद् अपने विरोध में जान पड़े तो कहे कि-'इस परि षद् को तो तुमने पहिले ही मिलकर अपने पक्ष में कर लिया है, इसलिये हमारा बोलना असम्भव है । यह तो तुम्हारी घर की ही सभा है । जैसा चाहोगे, जैसा
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अ० ८ ] विमानस्थानम् ४६६ बने, जैसा अभिप्राय हो, वह वैसा वाद, और वैसी वाद -मर्यादा को स्थापित करेगी, ऐसा कह कर चुप हो जाये ॥ २५ ॥
तत्रे वादमर्यादालक्षणं भवति- वं भवति वाच्यमिदमवाच्य मेवं सति पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥
बाद की मर्यादा - यह कहना, यह नहीं कहना, इस प्रकार से पराजय होता है. यह तीन वाद मर्यादा के लक्षण कहाते हैं ॥ २६ ॥
इमानि तु खल पदानि वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति । प्रतिज्ञा ,,स्थापनातद्यथा-, वादःप्रतिष्ठापना, द्रव्यं, गुणाःहेतु:,, कर्म, सामान्यंतः निगमनं, विशेषः, समवायःउत्तरं, सिद्धान्तः,उपनयः शब्दः, प्रत्यक्षं अनुमानमेतद्यमापन्यं संशयः, प्रयोजनं, सव्यभिचारअननुयोज्यं,, जिज्ञासाअनुयोगः,, व्यवसायःप्रत्यनुयोगः, अर्थप्राप्तिःवाक्यदोपः, संभवःवाक्यप्रशंसा, अनुयोज्यं,,छलमहेतुरतीतकालमुपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञा,हेत्वन्तरमर्थान्तरं निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥
वाद के मार्ग को समझने के लिये वैद्यों को निम्न चवालीस बातें समझ लेनी चाहियें । यथा - बाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रतिशा, स्थापना, प्रतिष्ठापना हेतु दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त, शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन, सव्यभिचार, जिज्ञासा, व्यवसाय, अर्थप्राप्ति2 संभव, अनुयोज्य, अननुयोज्य, अनुयोग, प्रत्य-नुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, हेतु, अतीतकाल, उपालम्भ, परिहार, प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर अर्थान्तर और निग्रहस्थान ॥ २७ ॥
तत्र वादो नाम - यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति । सवादो द्विविधः संग्रहेण-जल्पो बितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, विपर्ययो वितण्डा । यथा- एकस्य पक्षः --पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तीत्यपरस्य । तौ च हेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्ष मुद्भावयतः, एष जल्पः । जल्पविपर्ययो वितण्डा, वितण्डा नाम -परपक्षे दोप-वचनमात्रमेव ॥ २८ ॥
वाद का लक्षण - शास्त्र के अनुसार जो परस्पर विगृह्य भाषण है वह बाद कहाता है । यह संक्षेप से दो प्रकार का है । जल्प और वितण्डा । इनमें * बाद का लक्षण –'प्रमाणतर्कसाघनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चा- वयवोपपन्नः पचप्रतिपचपरिग्रहो वादः । न्यायदर्शन १ । २ । ४२ ।
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५७० चरकसंहिता [ अ० ८ पक्ष और प्रतिपक्ष का आश्रय करके जो वाद किया जाता है, उसका नाम 'जल्प' है । इससे विपरीत 'वितण्डा' है । जैसे एक व्यक्ति का पक्ष है कि पुनर्जन्म होता है, और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता है । ये दोनों नाना हेतुओं से अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं और प्रतिबाधक प्रमाणों से दूसरे के पक्ष का निराकरण करते हैं । इसका नाम ' जल्प ' है । जल्प से विपरीत वितण्डा है, परपक्ष में केवल दोष दिखाना 'वितण्डा ' होता है ॥ २८॥
द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने पूर्वमुक्ताः ॥ २६ ॥
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इनमें से प्रत्येक का लक्षण सूत्रस्थान में कह आये हैं ॥ २६ ॥
अथ प्रतिज्ञा । प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम् । यथा नित्यः पुरुष इति ॥ ३० ॥
प्रतिज्ञा -साध्य वचन का नाम ' प्रतिज्ञा' है । जैसे पुरुष नित्य है ॥ ३० ॥
अथ स्थापना । स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तो-पनयनिगमनः स्थापना | पूर्वं हि प्रतिज्ञा पश्चात्स्थापना, किं प्रतिज्ञातं स्थापयिष्यति । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः - अकृतकत्वा- दिति । दृष्टान्तः-अकृतकमाकाशं तच नित्यम् । उपनयो यथा-चाकृत- कमाकाशं तथा पुरुषः । निगमनं तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥
स्थापना-इसी प्रतिज्ञा के हेतु दृष्टान्त, उपनय, और निगमन द्वारा सिद्ध करने का नाम 'स्थापना' है । प्रथम प्रतिज्ञा होती है, फिर उसकी स्थापना की जाती है । विना प्रतिज्ञा के किस वस्तु को स्थापना करेगा । जैसे पुरुष नित्य है यह प्रतिज्ञा है । इसमें हेतु —उत्पत्ति न होने से दृष्टान्त आकाश, जिसे किसीने उत्पन्न नहीं किया और वह नित्य है । उपनय -जिस प्रकार अनुत्पन्न
आकाश है इसी प्रकार पुरुष है । निगमन -इसलिये पुरुष भी नित्य है ॥ ३१॥
अथ प्रतिष्ठापना- प्रतिष्ठापना नाम या परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थ- स्थापना, यथा -अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतु: -ऐन्द्रियकत्वात्,
दृष्टान्तः -घट ऐन्द्रियकः, स चानित्यः, उपनयो -यथा घटस्तथा पुरुषः ।
निगमनं -तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥
+ 'यथोक्तोपपत्र जातिनिग्रहस्थान साधनोपालम्भो जल्पः । स प्रतिपक्ष- स्थापनाहीनो वितण्डा | न्याय द ० १ । २ । ४३ | ४४ | * साध्यस्य वचनं प्रतिज्ञा । न्याय ५० १ । १ । १२ ।
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BTO = } विमानस्थानम् ५७१ पतिष्ठापना-- दूसरे बादी की प्रतिशा के विपरीत अर्थ की स्थापना करना प्रतिष्ठापना कहलाता है । पुरुष अनित्य है, यह विपरीतार्थ प्रतिज्ञा है । इसमें हेतु - इन्द्रियमाह्म होने से । दृष्टान्त -घढ़ा इन्द्रियग्राह्य है, वह अनित्य है । उपनय -जिस प्रकार घड़ा है उसी प्रकार पुरुष भी अनित्य है । निगमन -इस लिये पुरुष अनित्य है ॥ ३२ ॥
अथ हेतु: - हेतुर्नामोपलब्धिकारणं, तत्प्रत्यक्षमनुमानमैविद्यमोपम्य-मिति । एभिर्हेतुभिर्यदुपलभ्यते, तत्तत्त्रम्॥ ३३ ॥
हेतु साध्य के उपलब्धि अर्थात् ज्ञान का कारण हेतु है । प्रत्यक्ष, अनु-मान, ऐतिह्य और उपमान ये भी उपलब्धि ( ज्ञान ) के साधन हैं । इन हेतुओं ( प्रमाणों ) से जो ज्ञान उपलब्ध होता है, वह तत्व अर्थात् ज्ञान है ॥ ३३ ॥
उपनयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम् ॥ ३४ ॥
उपनय और निगमन को स्थापना और प्रतिष्ठापना की व्याख्या में कह दिया है ॥ ३४ ॥
अथोत्तरं - उत्तरं नाम साधम्योपदिष्टे वा नौ वैधर्म्य वचनं,वैधयों- पदिष्टेवा साधर्म्यवचनं । यथा- हेतुसधर्माणां विकाराः, शीतकस्य हि व्याधे-हेतुसाधर्म्यवचनं -हिमशिशिरवात संसशी इति मुक्तः परो ब्रूयात्-हेतु- विधर्माणो विकाराः, यथा शरीरावयवानां दाहोष्ण्यकोथ प्रपचने हेतु-वैधर्म्य हिमशिशिरवातसंस्त; एवल्लविनर्ययमुत्तरम् ॥ ३५ ॥
उत्तर-हेतु में साधर्म्य दिखाने पर वैधर्म्यं दिखाना अथवा हेतु में धर्म्य दिखाने पर साधर्म्य दिखाना 'उत्तर' है । कोई कहे विकार ( रोग ) हेतु ( कारण ) के समान धर्म ( तुल्य धर्म ) वाले होते हैं । यथा शीतजन्य रोगों में कारण के तुल्य धर्म हेमन्त शिशिर की वायु का शीत संस्पर्श हो इस पर प्रतिपक्षी कहे कि रोग हेतु के विरुद्धधर्म ( अतुल्य धर्म ) वाले होते हैं । जैसे- घरीरावयवों के जलने में गरम होने में, सड़ने में, पकने में हेतु ( कारण ) से असमान धर्म वाले हेमन्त शिशिर को वायु का सर्श है । यह विपरीत उत्तर है ॥ ३५ ॥
अथ दृष्टान्तः-दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो व 'उदाहरण साधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः । तथा वैधम्र्म्यात् । न्याय० ११ । १ । ३४-३५ |
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५७२ चरकसंहिता [ अ०८ वर्णयति, यथा-अनिरुष्णो द्रवमुदकं स्थिरा पृथिवो आदित्यः प्रकाशक इति,यथा वाऽऽदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यवचनं प्रकाशकमिति ॥३६॥
दृष्टान्तदृष्टान्तहै -। जिसमेंजिस विद्वान्वस्तु काअविद्वान्वर्णन दोनोंकरना कीहोताबुद्धिहै, समानउसकाहोउसी, उसकाप्रकारनामकी वस्तु से वर्णन करते हैं । यथा- अग्नि उष्ण है, जल द्रव है, पृथिवी स्थिर हैं, सूर्य प्रकाशक है, इन बातों को मूर्ख भी उसी प्रकार समझता है, जिस प्रकार एक विद्वान् समझता है । जिस प्रकार सूर्य प्रकाशक है, उसी प्रकार सांख्य ज्ञान भी प्रकाशक है । यहां पर सांख्य ज्ञान साध्य 'वर्ण्य' है । इसको आदित्य के दृष्टान्त से सिद्ध करते हैं ॥३६॥
अथ सिद्धान्तः -सिद्धान्तो नाम यः परीक्षकैर्बहुविध परीक्ष्य है-तुभिः साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः स सिद्धान्तः, स चोक्तश्चतुर्विधः,- सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरणसिद्धान्तोऽभ्युपगम-सिद्धान्त इति । सिद्धान्त - जिस को परीक्षकों ने बहुत प्रकार से परीक्षा कर हेतुओं द्वारा सिद्ध कर निर्णय रूप से स्थापित कर दिया है वह निर्णय 'सिद्धान्त' है । यह सिद्धान्त चार प्रकार का है । ( १ ) सर्वतन्त्र सिद्धान्त, ( २ ) प्रतितंत्र सिद्धान्त, ( ३ ) अधिकरण सिद्धान्त और (४) अभ्युपगम सिद्धान्त । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम–सर्वतन्त्रेषु यत्प्रसिद्धम् । सन्ति व्याधयः सन्ति सिद्धधुपायाः साध्यानामिति । ( १ ) सर्वतन्त्र सिद्धान्त -सब तंत्रों ( शास्त्रों ) में ( उस सम्बन्ध के ) जो सिद्धान्त प्रसिद्ध हो, उनका नाम सर्वतंत्र सिद्धान्त है । यथा -निदान हैं, साध्य रोग हैं, रोगों को दूर करने के भी उपाय हैं, ये बातें सब तत्रों में प्रसिद्ध हैं । प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिंस्तन्त्रे तत्तत्प्रसिद्ध, यथा-- अन्यत्राष्टौ रसाः षडत्र, पञ्चेन्द्रियाणि यथाऽन्यत्रान्यत्र षडिन्द्रियाणि । वातादिकृताः सर्वविकारा यथाऽन्यत्र वातादिकृता भूतकृताञ्च प्रसिद्धाः । ( २) प्रतितंत्र सिद्धान्त -उसी विशेष तंत्र में जो तस्व प्रसिद्ध हों और तंत्रों में अप्रसिद्ध हों, उसका नाम प्रतितंत्र सिद्धान्त है । यथा- एक तंत्र में रस आठ प्रकार के हैं, और इस तंत्र में रस छः प्रकार के हैं । एक तंत्र में पांच इन्द्रियां हैं, अन्य तंत्र में छः इन्द्रियां मानी हैं ( मन को भी इन्द्रिय गिनते हैं ) अन्य तंत्रों में सब रोग बात आदि दोषजन्य ही माने गये हैं । एक तंत्र में रोगों लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं सदृष्टान्तः ॥ न्याय० १।१।२५॥