चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 591–600

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 591–600

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३ का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत वा सूक्ष्म कीट प्राणियों को भी माना है । अधिकरणसिद्धान्तो नाम यस्मिन् यस्मिन्नधिकरणे संस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते; निस्पृहत्वादिति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमो पुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति । ( ३) अधिकरण सिद्धान्त-जिस जिस अधिकरण के उपस्थित करने पर अन्य न कहे हुए अधिकरण भी अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, उसका नाम अधिकरण सिद्धान्त है । यथा-मुक एक निःस्पृह होने में फलजनक कर्म नहीं कर सकता । इस अवस्था में कर्मफल, मोक्ष, पुरुष और प्रेष्यभाव से प्रक रण भी स्वयं सिद्ध होते हैं । क्योंकि यदि कर्मफल न हो तो मुमुत्तु भी कर्म करें। कर्मफल से उद्विग्न होकर ही वे कर्म नहीं करते । यदि मोक्ष हो तो मुक्त ऐसा नाम हो । यदि पुरुष न हो तो बन्ध और मोक्ष किसका । अभ्युपगमसिद्धान्तां नाम - यमर्थममिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहे- तुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः । तद्यथा-क्रयं न प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधाना इति कृत्वा वक्ष्यामः इत्येवमादिश्व-तुविधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥

(४) अभ्युपगम सिद्धान्त- जिसको बिना सिद्ध किये बिना परीक्षा किये और बिना हेतु आदि बतलाये ही विवादकाल में वद्य लोग स्वीकार कर लेते हैं, वह अभ्युपगम सिद्धान्त है । यथा द्रव्य का प्रधान न मानकर सिद्धान्त रूप से स्वीकार करके आगे विवाद करें । इसी प्रकार गुण को प्रधान मान कर, कर्म का प्रधान मानकर वाद आरम्भ करे । ये चारों प्रकार के सिद्धान्त कह दिये हैं । ३७ । अथ शब्द: -शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्चा दृष्टार्थश्च सत्यश्वानृतश्चेति । शब्द - वर्णों के समाम्नाय ( समूह) का नाम शब्द है । यह चार प्रकार का है । यथा ( १ ) दृष्टार्थ, (२) अदृष्टार्थ ( ३) सत्य और (४ ) अनृत । तत्र दृष्टार्थ: -त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति षडभिरुपक्रमैश्च प्रशा- म्यन्ति श्रत्रादिसद्भावे शब्दादिप्रहणमिति । ( १ ) दृष्टार्थ -तीन कारणों (असारम्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परि- नाम ) से बात आदि दाष कुपित होते हैं । वे छः उपक्रमों ( बृंहण, लंघन, स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन और स्तम्भन ) से शान्त होते हैं । भोत्र आदि इन्द्रियों

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५७४ चरकसंहिता [ अ०८ 15 के होने पर शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है । इन वाक्यों का अर्थ यहां प्रत्यक्ष होता है, देखा जाता है । स दृष्टार्थः पुन: -अस्ति प्रेत्यभावोऽस्ति मोक्ष इति । ( २ ) अदृष्टार्थ - जैसे प्रेत्यभाव अर्थात् ( पुनर्जन्म ) है और मोक्ष है, यह अदृष्ट अर्थहै । सत्यो नाम यथार्थभूतः -सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः सन्त्युपायाः साध्या- नां, सन्त्यारम्भफलानीति, सत्यविपर्ययाश्चानृतः ॥ ३८ ॥

सत्य - यथार्थ जैसा हो वैसा कहना सत्य है । यथा आयुर्वेद का उपदेश है, साध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय हैं । आरम्भ फल अर्थात् कर्मों के फल होते हैं । सत्य से विपरीत अनृत ( मिथ्या ) है ॥ ३८ ॥

अथ प्रत्यक्षं- प्रत्यक्षं नाम तथदात्मना पश्चेन्द्रियैश्च स्वयमुपल- भ्यते । तत्राऽऽत्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः शब्दादयस्त्विन्द्रिय- प्रत्यक्षाः || ३६ | प्रत्यक्ष - आत्मा और इन्द्रियों द्वारा जो ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जाता है, उसका नाम प्रत्यक्ष ' है, इनसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं, शब्द आदि विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं॥ ३६ ॥

अथानुमानं - अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः । यथोक्तम् –अग्नि जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्ये-वमादि ॥। ४० ॥ अनुमान -- युक्ति की अपेक्षा करने वाला तर्क अनुमान है । कार्यकारण भाव के ज्ञान से अविज्ञात अर्थ को जानना तर्क है । यथा जीर्ण करने की शक्ति से अनि का, व्यायाम शक्ति से बढ का, शब्दादि के ग्रहण करने से श्रोत्रादि इन्द्रियों का अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥

अथैतिह्यं - ऐतिह्यं नामाऽऽप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥

ऐतिहा- ऐसा वृद्ध पुरुषों ने कहा था यह 'ऐतिह्य' है । आप्स वचन का

नाम ऐतिह्य है । यथा आस-वचन वेद आदि ॥ ४१ ॥

अथौपम्यं- औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रका- शनं, यथा- दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुष्टम्भस्य, इष्वासिना आ-रोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥

१ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पत्रं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्य- शम् । न्याय० १ | १| ४ |

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विमानस्थानम ५७५ STO =] SPELL औपम्य ( उपमा )-साहश्य को देखकर एक प्रसिद्ध वस्तु का प्रकाशन करना 'उपमा' है । जैसे दण्डे से दण्डक नाम ( वातव्याधि ) रोग बतलाया है । धनुष द्वारा धनुस्तम्भ ( जिसमें धनुष के समान शरीर मुड़ जाता है, ऐसा धनुर्वात रोग बतलाया है ) और धानुष्क ( तीर चलाने वाले ) का उदाहरण देकर आरोग्यता देने वाले वैद्य का प्रयोजन बतलाया है ( खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय १० में ) ॥ ४२ ॥

अथ संशयः - संशयो नाम संदेहलक्षणानुसंदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः । यथा दृष्टा ह्यायुष्यलक्षणोपेताश्चानुपेताश्च तथा सक्रियाश्वाकियाच पुरुषाः शीघ्रभङ्गाश्चिरजीविनश्च, एतदुभयत्वात्मंशय: - किन्नु खल्ब कालमृत्युरस्त्युत नास्तीति ॥ ४३ ॥

संघ - संदिग्ध अर्थों में निश्चय का न होना संशय' है । जैसे क्या अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है! आयुष्मान् पुरुषों के लक्षणों से युक्त एवं इन लक्षणों से रहित किंवा चिकित्सा क्रिया के दिना और चिला करने पर भी शीघ्र मरने वाले तथा देर तक जीने वाले दोनों प्रकार के पुरुष देखे जाते हैं । दोनों प्रकार की अवस्थाओं के देखने से संशय होता है कि क्या अकाल मृत्यु है अथवा नहीं है || ४३ || अथ प्रयोजनं - प्रयोजनं नाम यदर्थमारभ्यन्त आरम्भाः । यथा--यद्यकालमृत्युरस्ति ततोऽहमात्मानमायुष्यं रूप चरिष्याम्यनायुष्याणि च परिहरिष्यामि, कथं मामकालमृत्युः प्रसहतेति ॥ ४४॥

प्रयोजन- जिसके लिये कर्मों का आरम्भ किया जाता है वह 'प्रयोजन' है । जैसे यदि अकाल मृत्यु है, तो मैं आयु के लिये हितकारी पथ्यों द्वारा अपने शरीर की रक्षा करूंगा । आयु का नाश करने वाली अपथ्य वस्तु का परित्याग करूंगा । फिर किस प्रकार से मुझपर अकाल मृत्यु आक्रमण कर सकती है १ ॥ ४४ ॥

अथ सव्यभिचारं — सव्यभिचारं नाम यद्व्यभिचरणं; यथा-भवेदिदमौषधं तस्मिन् व्याधौ यौगिकमथवा नेति || ४५|| सम्यभिचार - व्यभिचार एकत्र अव्यवस्था, अनिश्चितता, अनेकों ने प्रवृत्त होना ही सव्यभिचार है । यथा- इस रोग में इस औषध का यौगिक १ समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषा-पेक्षो विमर्शः संशयः ॥ न्याय० १ | १ | ४१ ॥

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५७६ चरकसंहिता [ अ० ८ shan अर्थात् योग के अनुकूल होना वा विपरीत भी होना सम्भव है, इस प्रकार एकान्त निश्चय न होना 'सम्यभिचारक है ॥ ४५ ॥

अथ जिज्ञासा -जिज्ञासा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोर-कालमुपदेक्ष्यते ॥ ४६ ॥

जिज्ञासा - प्रमाणों द्वारा अर्थ को परीक्षा करना 'जिज्ञासा' है । यथा भेषज परीक्षा जो आगे कहेंगे ॥ ४६ ॥

अथ व्यवसायः ——यवसायो नाम निश्चयः, यथा वातिक एवायं व्याधिः, इदमेवास्य भेषजमिति ॥ ४७ ॥

व्यवसाय—निश्चय का नाम 'व्यवसाय' है । यथा –यह रोग वातजन्य ही है, और इस रोग की यही ओषध है ॥ ४७ ॥

अथार्थप्राप्तिः -अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुकस्य सिद्धिः; यथा -नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः- अप-तर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थत्राप्तिः-निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥

अर्थप्रति - एक कहे हुए अर्थ से दूसरे न कहे हुए अर्थ का जिससे ज्ञान होजाय उसका नाम अर्थप्राप्ति है । यथा यह रोग से तर्पणसाध्य नहीं है, यह कहने पर पता लग जाता है कि यह रोग अतर्पण साध्य है । इसको दिन में भोजन नहीं देना चाहिये, ऐसा कहने पर ज्ञात हो जाता है कि रात्रि में भोजन देना चाहिये ॥ ४८ ॥

अथ संभव: - संभवो नाम यो यतः संभवति स तस्य संभवः; यथा-षद् धातवो गर्भस्य, व्याघेरहितं हितमाराग्यस्येति ॥ ४६ ॥

संभव - जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका संभत्र अर्थात्कारण है । जैसे छः धातु ( पृथिवो, अप, तेज, वायु, आकाश और चेतना ) गर्भ का उत्पत्ति में कारण हैं । इसी प्रकार अहित सेवन रोगों की उत्पत्ति में, हित- सेवन आरोग्यता की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ ४८ ॥

अथानुयोज्यं - अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयो ज्यमुच्यते,सामान्योदाहृतेष्वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदनुयोज्यं; * न्यायदर्शन में सम्यभिचार को लाभाव माना है । यह हेतु नहीं, परन्तु हेतु के समान दीखता है । यथा-'सम्यभिचार विरुद्ध प्रकरणसम साध्यस

मातीतकाला स्वाभासाः । न्याय० १ । २ । ४५ ॥

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विमानस्थानम् ५७७अ०८ ] ३७ यथा -संशोधनसाध्याऽयं व्याविरित्युक्ते किं वमनसाध्यः किं वा विरेचनसाध्यः? इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥

अनुयोज्य —जो वाक्य वाक्य के न्यून आदि दोषों से युक्त होता है, उसका नाम अनुयाज्य है | क्योंकि इस प्रकार का दापयुक्त वाक्य प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अथवा सामान्य रूप में कहे हुए वाक्वार्थ में विशेष ग्रहण के लिये जो कहा जाता है, वह भा अनुयोज्य होता है । यथा -यह रोग संशोधनसे साध्य है, ऐसा कहने पर वमनसाध्य है या विरेचनसाध्य है । यह ओर भी वक्तव्य शेष रह जाने से' अनुयाज्य' हूँ ॥ ५० ॥

अथाननुगोज्यं - अननुयाज्यं नामातां विपर्ययेग; यथा - अयम- साध्यः ॥ ५५ ॥

अननुयज्य - अनुयोज्य के विपरीत वाक्यशेष से रहित वचन को 'अननु- योग्य' कहते हैं । यथा - यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥

अथानुयाग: -अनुयांगा नाम यत्तद्विद्यानां तद्विद्येरेव सार्धं तन्त्रे तन्त्रैकदेशं वा प्रश्नः प्रश्नंकदेशी वा ज्ञान विज्ञान- वचन प्रतिवचन -परी- क्षार्थमादिश्यते । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञाते, यत्सरः को हेतुरि- त्याह सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥

अनुयोग — विशेष विद्या वाले पुरुष का उसो ( एक समान ) विद्या वाले पुरुष के साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रतिवचन शक्ति की परीक्षा के लिये सम्पूर्ण उसी शास्त्र में अथवा उस शास्त्र के किसी एक भाग में प्रश्न करना 'अनुयोग ' कहाता है । जैसे एक ने प्रतिज्ञा को पुरुष नित्य है । दूसरे ने पूज-इसमें हेतु क्या है? यह कहना अनुभाग हे ॥ ५२ ॥

अथ प्रत्यनुयोगः -प्रत्यनुयांगो नामानुयोगस्यानुयोगः यथा- अस्यानुयोगस्य पुनः का हेतुरिति ॥ ५३ ॥

प्रत्यनुयोग- अनुयोग का अनुयोग करना प्रत्यनुयोग है । जैसे-एक ने प्रतिज्ञा की पुरुष नित्य है, दूमरे ने प्रश्न किया इसमें क्या हेतु है! इस हेतु में क्या हेतु है? ऐसा प्रश्न पर प्रश्न पूछना ' प्रत्यनुयोग है ॥ ५३ ॥

अथ वाक्यदोः – वाक्यदोषो नाम यथा -खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम- धिकमनर्थकम्पार्थकं विरुद्धं चेति । तत्र प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनि- गमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवतीति, बह्वपदिष्टहेतुकमेकेन साध्य हेतुना तच न्यूनम् एतानि झन्तरेण प्रकृतोऽप्यथः प्रणश्येत् । वाक्यदाषवाक्य में विषय को दृष्टि से निम्न दोष होते हैं जैसे न्यून, अधिक, अनर्थक, अपार्थक और विरुद्धार्थ ।

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que चरकसंहिता [ अ०८ न्यून - प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक से भी न्यून हो तो वह न्यून दोष गिना जाता है । अथवा जो वस्तु बहुत से हेतु देकर सिद्ध करनी चाहिये, उस वस्तु को केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाये तो वह भी 'म्यून' दोष समझना चाहिये । अथाधिकं ---- अधिकं नाम यदायुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशन- समन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते । यद्वा पुनः प्रतिसंबद्धार्थमपि द्विरभिधीयते तत्पुनरुक्तत्वादधिकम् । तञ्च पुनरुक्तं, द्विविधम् । अर्थ- पुनरुक्तं शब्दपुनरुक्तं च । तत्रार्थपुनरुक्तं नाम यथा - भेषजमौषधं साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं नाम पुनः भेषजं भेषज मिति । अधिक- न्यून से विपरीत हेतु आदि उदाहरण अधिक हों उसको अधिक कहते हैं । अथवा आयुर्वेद के विषय में बाइस्पत्य, औशनस आदि अन्य अप्रासंगिक बातों का कहना, अथवा प्राकृत ( सम्बन्धित ) वस्तु को दो बार कहना यह भी पुनरुक्त होने से 'अधिक' ही होता है । यह पुनरुक्त दो प्रकार का है । जैसे- अर्थपुनरुक्त और शब्दपुनरुक्त । इनमें ' अर्थपुनरुक्त ' दो प्रकार का है । जैसे – भेषज, औषध और साधन । 'शब्दपुनरुक्त' जैसे ' भेषज ' है । •अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरप्राममात्रमेव स्यात्पञ्चवर्गवन्न चार्थतो गृह्यते । अनर्थक— जिनका कहना पंचवर्ग ( ङ ञ ण न म ) के समान केवल अक्षर समूह ( वर्णमाला ) के रूप में होता है, जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता उसका नाम 'अनर्थक है । अथापार्थकं -— अपार्थकं नाम यदर्थवश्च परस्परेण चायुज्यमानार्थ- कम् । यथा - चक्र-नक्र- वंश- वस्त्र -निशाकरा इति । अपार्थक—-जब बहुतोंमें से प्रत्येक शब्द अर्थ वाला होकर भी वे सब पर- स्पर मिलकर किसी भी अर्थ को न बता सकें तब ' अपार्थक' दोष होता है । जैसे चक्र, नक्र, वंश, वज्र, निशाकर आदि । इनमें से प्रत्येक का पृथकू २ अर्थ है, परन्तु मिलने पर कोई संगत अर्थ नहीं निकलता । विरुद्धं नाम यदूद्दष्टान्तसिद्धान्तसमयैविरुद्धं तत्र दृष्टान्तसिद्धान्ता- कौ,समयः पुनस्त्रिधा भवति, यथा - आयुर्वेदिकसमयो याज्ञिकसमयो मोसमय इति । तत्रायुर्वेदिकसमयश्चतुष्पादं भेषज मिति,याज्ञि- कसमयः, आलभ्याः पशव इति, सर्वभूतेष्वहिंसेति मोक्षशास्त्रकसमयः । तंत्र स्वसमयविपरीत मुध्यमानं विरुद्ध भवतीति वाक्यदोषः ॥ ५४ ॥

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विमानस्थानम् ५७६ विरुद्ध —जो वाक्य दृष्टान्त, सिद्धान्त और समय के विपरीत हो । यह विरुद्ध तीन प्रकार का है, दृष्टान्त-विरुद्ध, सिद्धान्त-विरुद्ध और समय विरुद्ध । इनमें दृष्टान्त और सिद्धान्त दोनों को पीछे कह चुके हैं । समयविरुद्ध -— समय तीन प्रकार का है । यथा -( १ ) याज्ञिक समय, ( २ ) आयुर्वेदिक समय और (३) मोक्षशास्त्रक समय । इनमें आयुर्वेदिक -समय जैसे - भेषज चतुष्पाद ( भित्र, द्रव्य, उपस्थाता और रोगी ) है । याज्ञिक- समय जैसे -- यजमान को चाहिये कि पशुओं का आलम्भन करे । मक्षिशास्त्रिक समय जैसे -सब प्राणियों के प्रांत अहिंसा वृत्ति रखें । इनमें अपने २ समय

अर्थात् सिद्धान्त के विपरीत कहना 'विरुद्ध' है । ये वाक्यदोष हैं ॥ ५४ ॥

अथ वाक्यप्रशंसा नान यथा खल्वस्मिन्नर्थे त्वन्यूनमनधिकम- र्थवदनपार्थकमविरुद्धमधिगतपदार्थं चेति यत्तद्वाक्यमननुयोज्यमिति प्रशस्यते ॥ ५५ ॥

वाक्य प्रशंसा -जिस वाक्य में न्यून और अधिक दोष न हों, जो अर्थवान् होकर भी आर्थक और विरुदूध न हो और पदार्थ को कहनेवाला तथा दूसरे से अनुयोज्य न हो ऐसा वाक्य प्रशंसायोग्य होता है, इसे कहते हैं । अथ च्छलं-छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वास्तुमात्रमेव तद्विविधं वाक्छलं, सामान्यच्छलं च । छठ के प्रति वचना के लिये अर्थ की भाँति दीखने वाले अनर्थक, ( वाणी मात्र को दूसरे के वचन है । यह छल दो प्रकार का है को( १ नष्ट) वाक्छलकरने केऔरलिये()२)प्रयुक्तसामान्यकरनाछल 'छल। ' तत्र वाक्छलं नाम यथा-कश्चिद् ब्रूयान्नवतन्त्रोऽयंभिषगिति । भिषग् याद -नाहं भवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति । परो ब्रूयात्--नाहं नवतन्त्राणि तवेति, अपितु नवाभ्यस्तं हि ते तन्त्रमिति । भिषग्नूयात्-न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रमनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमिति । एतद्वाक्छलम् । इनमें वाक् कहे कि मैं न छल(- जैसे) कोईतंत्रों वालाकहे किनहींयहहूं । वैद्यदूसरातो व्यक्तिनवतन्त्रोंकहे वालाकि मैं हैयह। नहीं कहता कि तुम नौ तंत्रों वाले हो, अपितु तुमने तंत्रों का नया ही अभ्यास किया है । वैद्य कहे कि मैंने तन्त्रों का नया अभ्यास नहीं किया अपितु अनेक वार किया है: यह वाक्-छछ है । * न्यायदर्शन में 'तत् त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च । न्याय ० १ । २ । ५२ । 'धर्मविकल्पनिर्देशे ऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्' ॥ न्याय ० १ । २ । ५५ ।

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चरकसंहिता सामान्यच्छलंkis नाम यथा -व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्त[अपरो०८ ब्रूयात्-सत् सत्प्रशमनायेति । ( किंनु ) भवानाह, सन् हि रोगः, सदौ- धं, यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सन हि कासः, सत्क्षयः,

सत्सामान्यात्कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति । एतत्सामान्य- च्छलम् ॥ ५६ ॥

सामान्यच्छल — जैसे — ब्याधि को शान्त करने के लिये ओषध है, ऐसा कहने पर दूसरा कहे कि सत् वस्तु से सत् का प्रशमन होता है । यह आप कहते है । रोग भी सत् है । और औषध भी सत् है । यदि सत् वस्तु से सत् वस्तु का प्रशमन होता तो तेरे मत में सत् काल से सत् क्षय का नाश होना चाहिये, क्योंकि सत् धर्म दोनों में समान है । कास भी सत् है क्षय भी सत् है । यह सामान्य छल है ॥ ५६ ॥

अथाहेतुः -- अहेतुर्नाम प्रकरणसमः संशयसमो वर्ण्यसम इति । अहेतु - वास्तव में जो हेतु न हो । यह तीन प्रकार का है । जैसे-( १ ) प्रकरणसम, ( २ ) संशयसम और ( ३ ) वर्ण्यसम । तत्र प्रकरणसमो नामाहेतुर्यथा - अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति पक्षे ब्रूयात्-यस्मादन्यः शरीरादात्मा तस्मान्नित्यः शरोरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चाऽऽत्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः, न हि य एव पक्षः स एव हेतुः । प्रकरणसम अहेतु —जैसे कोई कहे कि आत्मा शरीर से भिन्न है । इस पर दूसराकहे कि आत्मा शरीर से अलग है, इसलिये नित्य है; शरीर अनित्य है । इसलिये आत्मा को विधर्मी होना ही चाहिये, यह अहेतु है । क्योंकि जो पक्ष ( प्रतिशा वा साध्य ) है वहीं हेतु नहीं हो सकता । संशयसमो नामातुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः । यथा- अयमायुर्वेदक देशमाह, किन्वयं चिकित्सकः स्यान्नवेति संशये परो ब्रूयात् यस्मादयमायुर्वेदकदेशमाद तस्माचिकित्सकोऽयमिति, न संशयहेतुं विशेषयत्येष चाहेतुः, न हि य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति । संशयसम अहेतु जो हेतु संशय का कारण हो, वही हेतु संशय के नाश का भी कारण हो जाय । जैसे किसीने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा, इसमें हुआ कि यह चिकित्सक है या नहीं? इस पर दूसरा व्यक्ति कहता है कि चूंकि इसने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा है, इसलिये वह चिकित्सक है ।

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अ० ] विमानस्थानम् ५८१N संशय के नाश करने वाले हेतु का स्पष्टीकरण नहीं करता, इसलिये यह अहेतु है । क्योंकि जो हेतु स्वयं संशय का कारण है, वही संशय के नाश का कारण नहीं हो सकता । वर्ण्यसमो नाम हेतुवर्ण्यविशिष्टः । यथा परो ब्रूयात्-अस्पर्शत्वाद् बुद्धिरनित्या शब्दवदिति, अत्र वर्ण्यः शब्दो वुद्धिरपि वर्ष्या, तदुभय- वर्ष्याविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यद्देतुः ॥ ५७ ॥

वर्ण्यसम अहेतु –जो हेतु साध्य के समान असिद्ध होने से साध्य की भांति साधने योग्य होता है । जैसे किसी ने कहा कि बुद्धि अनित्य है, स्पर्श,

न होने के कारण, शब्द की भांति इसमें बुद्धि साध्य है, शब्द भी साध्य है ।

इसलिये दोनों के असिद्ध होने से यह वण्यमम अहेतु है ॥ ५७ ॥

अथातीतकालं- अतीतकालं नाम यत्पूर्वं वाच्यं तत्पश्चादुच्यते, तत्कालातीतत्वादप्राह्यं भवतीति । पूर्व वा निग्रहप्राननिगृह्य पक्षान्त- रितं पश्चान्निगृहीते तत्तस्यातीतकालत्वान्नित्रवचनमसमर्थ भवतीति ५८ अतीतकाल -जो बात पहिले कहनी चाहिये, उसको पीछे कहना ' अतीत-काल' है । समय के व्यतीत होने के कारण वह बात अग्रणीय होजाती है । अथवा दूसरे प्रतिवादी के निग्रह स्थान में आने पर उस समय उसको न पकड़ कर दूसरे पक्ष में पहुंचने पर पीछे से निग्रह करना, यह भी अतीत काल होने से निग्रह में असमर्थ होता है ॥ ५८ ॥

अथोपालम्भ: - उपालम्भो नाम हेतोर्दोषवचनं; यथापूर्वमतत्रो हेत्वाभासा व्याख्याताः ॥ ५६ ॥

उपालम्भ -हेतु में प्रकरणसम आदि दोष दिखाना 'उगलम्भ' है । जैसे पहिले कहे अहेतु जो कि हेतु न होने पर भी हेतु की भांति दीखते हैं ॥ ५६ ॥

अथ परिहारः -परिहारो नाम तस्येव दोपवचनस्य परिहरणम् । यथा-नित्यमात्मनि शरीरस्थे जीवलिङ्गान्युपलभ्यन्ते, तस्य चापगमा-नोपलभ्यन्ते, तस्मादन्यः शरीरादात्मा नित्यश्चेति ॥ ६० ॥

परिहार- हेतु में कहे दोष का दूर करना 'परिहार' है । जैसे- शरीरस्थ आत्मा में प्राण अरान आदि जीव के लक्षण नित्य उपलब्ध होते हैं और आत्मा के शरीर से निकल जाने पर ये लक्षण उपलब्ध नहीं होते, इस लिये आत्मा शरीर से भिन्न दूसरी वस्तु है और वह नित्य है ॥ ६० ॥

अथ प्रतिज्ञाहानिः - प्रतिज्ञाहानिर्नाम सा पूर्वप्रतिगृहीतां पर्यनुयुक्तः परित्यजति । यथा-प्राक् प्रतिज्ञां कृत्वा ' नित्यः पुरुष' इति । पर्यनुयुक्त-स्वाद -अनित्य इति ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 600

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५८२ चरकसंहिता [ अ०८ प्रतिशाहानि --पहिले की हुई प्रतिज्ञा को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा को स्वी- कार करना 'प्रतिज्ञाहानि' है । जैसे- प्रथम प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है, अकृतक होने से, आकाशवत् । दूसरे प्रतिपक्षी ने कहा- पुरुष अनित्य है, इन्द्रिय -प्राय होने से, घड़े के तुल्य । इसमें अपनी प्रतिज्ञा ( निध्य पुरुष ) को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा ( अनित्य पुरुष है ) को स्वीकार करना प्रतिज्ञा- हानि है ॥ ६१ ॥

अथाभ्यनुज्ञा - अभ्यनुज्ञा नाम य इष्टानिष्टाभ्युपगमः ॥ ६२ ॥

अभ्यनुज्ञा - इष्ट (परपक्ष में दोष ) और अनिष्ट (स्वप में दोष) दोनों को स्वीकार करना ' अभ्यनुज्ञा' है । दूसरे से कहे हुए दोष को अपने पक्ष में मान लेना और दूसरे के पक्ष में दोष दिखाना 'अभ्यनुज्ञा' वा 'मतानुज्ञा' हे ॥६२ ॥

अथ हेत्वन्नरं हेत्वन्तरं नाम प्रकृतिहेतो वाच्ये यद्विकृतिहेतु-माह ॥ ६३ ॥

हेत्वन्तर - प्रासंगिक हेतु के स्थान पर विकृत हेतु अर्थात् अप्रसांगिक हेतु कहना ' हेत्वन्तर' है ॥ ६३ ॥

अथार्थान्तरं - अर्थान्तरं नाम एकस्मिन् वक्तव्ये परं यदाह; यथा-ज्वरलक्षणे वाक्ये प्रमेहलक्षणमाइ ॥ ६४ ॥

अर्थान्तर-एक वस्तु के प्रसंग में दूसरी वस्तु का कहना ' अर्थान्तर' है ।

यथा --ज्वर के लक्षणों में प्रमेह के लक्षण कहने लगना ॥ ६४ ॥

_ अथ निग्रहस्थानं -निग्रहस्थानं नाम पराजयप्राप्तिः तच्च त्रिर-भिहितस्य वाक्यस्याविज्ञानं परिपदि विज्ञानवत्य; यद्वा अननुयोज्य-स्यानुयोगोऽनुयोज्यस्य चाननुयोगः । प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञाकालातीतव-चनमहेतवो न्यूनमतिरिक्तं व्यर्थमपार्थकं पुनरुक्तं विरुद्धं हेत्वन्तर-मर्थान्तरं निग्रहस्थानम् ॥ ६५ ॥

निग्रहस्थान का दूसरा नाम पराजय प्राप्ति है । यह विज्ञानवती परिषद् में तीन बार कहे हुए वाक्य को न जानना, या अननुयोज्य का अनुयोग, अथवा अनुयोज्य का अननुयोग है अर्थात् जहां प्रश्न न करना चाहिये वहां प्रश्न करना और जहाँ करना चाहिये वहाँ न पूछना भी निग्रहस्थान दी है । इसके अतिरिक्त प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, अतीतकालवचन, अहेतु, न्यून, अतिरिक्त, व्यर्थ, अनर्थक पुनरुक्त, विरुद्ध, हेत्वन्तर, अर्थान्तर ये सब बातें पराजय का कारण होती हैं ॥ ६५ ॥

इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति ॥ ६६ ॥

इस प्रकार से बाद के मार्गों को पूर्व कथनानुसार कह दिया है ॥ ६६ ॥