चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 601–610
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 601–610
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अ०८ ] विमानस्थानम् ५८३ वादस्तु खलु भिषजां वर्तमानो वर्तेतायुर्वेद एव नान्यत्र ॥ ६७ ॥
वैद्यजनों के बाद का विषय केवल आयुर्वेद ही है, अन्यत्र नहीं ॥ ६७ ॥
ra हि वाक्यप्रतिवाक्यविस्तराः केवलाश्वोपपत्तयश्च सर्वाधिकर- णेषु । ताः सर्वाः सम्यगवेक्ष्यावेक्ष्य सर्व वाक्यं ब्रूयात् नाप्रकृतकम- शास्त्रमपरीक्षितमसाधकमाकु मापकं वा, सर्व च हेतुमद् ब्रूयात्, हेतुमन्नो कलुषाः सर्व एव वादविग्रहाः चिकित्सिते कारणभूताः; प्रशस्तबुद्धिवर्धकत्वात्, सर्वारम्भसिद्धि यावत्यनुपहता बुद्धिः ॥ ६८ ॥
इस आयुर्वेद में वाक्य " प्रतिवाक्य, इसका विस्तार, सम्पूर्ण उपपत्तियां ये सब बातें प्रकरणों में हैं । उन सबका भी प्रकार देखकर सम्पूर्ण वाक्य कहना चाहिये । अप्रकृतक ( असम्बद्ध ), शारद्दित, अपरीक्षित, साधकरहित, बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिये: जो कुछकहना हो वह सब कारण वा हेतु, युक्तिपूर्वक कहना चाहिये, क्योंकि हनुपूर्वक करे हुए सम्पूर्णवाद-विग्रह स्वच्छ होते हैं, तथा चिकित्सा में कारणभूत है, क्योंकि वे निर्मलबुद्धि सब प्रकार की सफलता को उत्पन्न करती है ॥ ६८ ॥
इमानि खलु तावदिह कानिचित्करणानि ब्रूमो भिषजां ज्ञानार्थम् ।
ज्ञानपूर्वकं कर्मणां समारम्भं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ६ ९ ॥
कारण-करण कार्ययोनि कार्य कार्यफलानुबन्ध -देश -कालप्रवृ युपायान्सम्यगभिनिर्वर्तमानः कार्याभिनिवृत्ताविष्टफलानुबन्धं कार्य-मभिनिर्वर्तयत्यनतिमहता प्रयत्नेन कर्ता ॥ ७० ॥
निम्न कुछ प्रकरणों की वैद्यों के ज्ञान के लिये कहते हैं क्योंकि विद्वान् लोग ज्ञानपूर्वक कर्मों का आरम्भ करने को प्रशंसा करते हैं । कारण, करण, कार्ययोनि, कार्य, कार्यफल, अनुबन्ध, देश, काल, प्रवृत्ति और उपराय, इनकी भली प्रकार जान कर ही कर्म करता हुआ कर्त्ता स्वल्प प्रयत्न से ही कार्यसमाप्ति पर फल देने वाले कार्य का सम्पादन करता है ॥ ७० ॥
तत्र कारणं नाम तत्, यत्करोति स एव हेतुः, स कर्ता ॥ ७१ ॥
कारण-जो करता है वही 'कारण' है, इसी को हेतु या 'कर्त्ता' कहते हैं ॥ ७१ ॥
करणं पुनस्तद्, यदुपकरणायोपकल्पते कर्तुः कार्याभिनिर्वृत्तौ प्रय तमानस्य ॥ ७२ ॥
करण— प्रयत्न करने वाले कर्त्ता के कार्य को पूर्ण करने के लिये जिस साधन की अपेक्षा होती है, उस साधन को ' करण ' कहते हैं ॥७२ ॥
कार्ययोनिस्तु सा या विक्रियमाणा कार्यत्वमेवापद्यते ॥ ७३ ॥
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५८४ चरकसंहिता [ अ० = कार्ययोनि —जो विकृत होकर कार्य रूप से प्रकट होती है ॥ ७३ ॥
कार्य तु तद्, यस्याभिनिर्वृत्तिमभिसंधाय प्रवर्तते कर्ता ॥ ७४ ॥
कार्य- जिसकी सफलता को सामने रखकर कर्त्ता प्रवृत होता है ॥७४॥
कार्यफलं पुनस्तद्, यत्प्रयोजना कार्याभिनिर्वृत्तिरिष्यते ॥ ७५ ॥
कार्यफल - जिस मतलब से कार्य किया जाता है ॥ ७५॥
अनुबन्धस्तु खलु स यः कर्तारमवश्यमनुबध्नाति कार्यादुत्तरकालं कार्यनिमित्तः शुभो वाऽप्यशुभो वा भावः ॥ ७६ ॥
अनुबन्ध- कार्य करने के पीछे जो शुभ या अशुभ ( कार्यजन्य ) कर्म के कारण कर्ता को कर्म से बांधता है, उसका नाम 'अनुबन्ध ' हे ॥ ७६॥
देशरत्वधिष्ठानम् ॥ ७७ ॥
देश- अधिष्ठान, आश्रयस्थान है ॥ ७७॥
कालः पुनः परिणामः ॥ ७८ ॥
काल का अर्थ परिणाम है ॥७८ । प्रवृत्तिस्तु खलु चेष्टा कार्यार्था, सेव क्रिया कर्म यत्नः कार्य-समारम्भश्च ॥ ७६ ॥
प्रवृत्ति - प्रवृत्ति का अर्थ कार्य के लिये चेष्टा, इसीका नाम क्रिया, कर्म, यत्न और कार्य समारम्भ ( प्रारम्भ ) है ॥ ७६ ॥
उपायः पुनस्त्रयाणां कारणादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् कार्यकार्यफलानुबन्धोपायवर्ज्यानी कार्याणामभिनिर्वर्तक इत्यतस्तूपायः, कृ.ते नोपयार्थोऽस्ति न च विद्यते तदात्वे, कृताश्चोत्तरकालं फलं फला-धानुबन्ध इति ॥ ८० || उपाय- कार्य, कार्यफल और अनुबन्ध को छोड़कर कारण, करण, कार्य-योनि इन तीन का उत्तम होना, भली प्रकार करना, यह 'उपाय' है । कार्यों को पूर्ण करने वाला 'उपाय' कहाता है । कार्य हो चुकने पर उपाय का कोई प्रयोजन नहीं है । कार्य के समय भी उपाय नहीं रहता । उपाय करने के पीछे फल, और फल से अनुबन्ध ( शुभ, अशुभ ) होता है ॥ ८० ॥
एतद्दशविधम परीक्ष्यं, ततोऽनन्तरं कार्यार्थ प्रवृत्तिरिष्टा; तस्मा- द्विष कार्य चिकीर्षुः प्राकार्यसमारम्भात्परीक्षया केवलं परीक्ष्यं परी- या कर्म समारभेत कर्तुम् ॥ ८१ ॥
परीक्षा- इन दस प्रकार से प्रथम परीक्षा कर लेनी चाहिये । इसके पीछे कार्य के लिये प्रवृत्ति या चेष्टा करनी चाहिये । इसलिये कार्य करने की इच्छा
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C विमानस्थानम् ५८५ वाले वैद्य को चाहिये कि कार्य करने से पूर्व सम्पूर्ण परीक्षा से परीक्षणीय वस्तु की परीक्षा करके काम करना आरम्भ करे ॥ १॥
तन्त्र चेद्भिषग् अभिषग्वा भिषजं कश्चिदेवं पृच्छेत् वमन विरेचना- स्थापनानुवासन शिरोविरेचनानि प्रयोक्तुकामेन भिषजा कतिविधया परीक्षया कति विधमेव परीक्ष्यं, कश्चात्र परीक्ष्यविशेषः, कथं च परी-क्षितव्यः किंप्रयोजना च परीक्षा क च वमनादीनां प्रवृत्तिः क च निवृत्तिः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे च किं नैष्ठिकं, कानि च वमना- दीनां भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्तीति ॥ ८२ ॥
यदि कभी मित्रग् अथवा साधारण मनुष्य, जो वैद्य नहीं, वैद्य से पूछे कि वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन देने की इच्छा वाले वैद्य की कितनी प्रकार की परीक्षायें, कितने प्रकार का परीक्ष्य और परीक्षा में विशे पता क्या है, उसकी किस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये, परीक्षा का क्या प्रयोजन है १ वमन आदि का कहाँ प्रयोग करना और कहाँ नहीं करना चाहिये! प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लक्षण मिले तो क्या करना? वमन आदि कार्यों में कौन से औषध द्रव्य काम में आते हैं, इत्यादि प्रश्न करे तब निम्न प्रकार से उधर देना चाहिये ॥ ८२ ॥
स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत् 9 ब्रूयादेनं- बहुविधा हि परी- क्षा तथा परीक्ष्यविधिभेदः कतमेन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षया केन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदानं भवान्पृच्छत्याख्यायमानं, नेदानीं भवतोऽन्येन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्या-भिलषितमर्थं श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदप्रकृत्यन्तरेणान्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यं भिन्वाऽन्यथाऽऽचक्षाण इच्छां प्रपूर-येयमिति ॥ ८३ ॥
यदि वैद्य पूछने वाले को परेशान करना चाहे तो परीक्षा और परीक्षा-विधि इनके अनेक मेद होते हैं । आप कौन सी विधि- मेद प्रकृति से भिन्न परीक्षा से अथवा कौन से विधि-मेद प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य के भेद को पूछना चाहते हैं । वही कहा जाय? आप से बिना यह जाने कि आप कौन से विधि-मेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा वा कौन से विधि- मेद प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य को जानना चाहते हैं, मैं और भेदों को कहकर आपकी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता ॥८३॥
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५८६ चरकसंहिता [ अ० = स यदुत्तरं ब्रूयात्तत्परीक्ष्योत्तरं वाक्यं स्याद्यथोक्तं प्रतिवचनविधि- मवेक्ष्य; सम्यग्यदि तु ब्रूयात्, न चैनं मोहयितुमिच्छेद्, प्राप्तं तु बच-Marati मन्येत काममै ब्रूयादाप्तमेव निखिलेन ॥ ८४ ॥
इस पर जो उत्तर वह दे, उसकी परीक्षा करके, प्रतिवचन विधि के अनु- सार उचित उत्तर दे । यदि वह भली प्रकार से कहे और इसको चक्कर में डाळकर चाहे तो इसके लिये सब कुछ विश्वस्त रूप से कह दे ॥ ८४ ॥
द्विविधा खलु परीक्षा ज्ञानवत प्रत्यक्षमनुमानं च एतद्धि द्वय- मुपदेशश्च परीक्षा स्यात् । एवमेषा द्विविधा परीक्षा, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८५ ॥
बुद्धिमानों के लिये परीचा दो प्रकार की है । प्रत्यक्ष और अनुमान ( ये दोनों पहले कहे गये हैं ) और तीसरी उपदेश भी परीक्षा है, इस प्रकार से यह दो प्रकार की परीक्षा उपदेश ( आप्तोपदेश ) के साथ तीन प्रकार की दो जाती है ॥ ८५ ॥
दशविधं तु परीक्ष्यं कारणानि यदुक्तमग्रे । तदिह भिषगादिषु संसार्य संदर्शयिष्यामः - इह कार्यप्राप्तेः कारणं भिषक, करणं पुनर्भे- जम्, कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं कार्य धातुसाम्यं, कार्यफलं सुखावाप्तिः, अनुबन्धस्तु खल्वायुः, देशो भूमिरातुरख । कालः पुनः संवत्सरश्चाssg- रावस्था च । प्रवृत्तिः प्रतिकर्मसमारम्भः । उपायस्तु भिषगादीनां सौष्ठ- वमभिविधानं च सम्यक । इहाप्यस्योपायस्य विषयः पूर्वेण बोपायविशे- षेण व्याख्यात इति कारणादीनि दश दशसु भिषगादिपु संसार्य संद- शिवानि तथैवानुपूर्व्या एतद्दशविधं परीक्ष्यमुक्तम् ॥ ८६ ॥
पहिले यह कहा है कि परीक्ष्य ( कारण आदि ) वस्तु दस प्रकार की हैं । इसी को भिषग आदि में घटाकर दिखाते हैं यहां कार्यप्राप्ति में कारण भिषक् है, औषध करण है । धातुओं की विषमता कार्ययोनि है । धातुओं को समान करना कार्य है । सुख का मिलना कार्यफल है । आयु अनुबन्ध है । भूमि और रोगी देश हैं । संवत्सर और रोगी की अवस्था काल है । प्रत्येक कर्म का आरम्भ करना प्रवृत्ति है । भिषग् औषध, परिचारक और रोगी इनका भली प्रकार से मेल उपाय है । यहाँ पर भी इस उपाय के सम्बन्ध में सब बातें पूर्वोक्त उपायविशेष के साथ कह दी हैं । धातुसाम्य रूपी कार्य के करने पर आरोग्यता निश्चित है । इस प्रकार से कारण आदि दसों को मित्र आदि में घटाकर दिखा दिया है, इसी प्रकार क्रम से यह दश प्रकार का 'परीक्षण' कह दिया है ॥ ८३ ॥
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विमानस्थानम् ५८७अ० ८ ] तस्य यो यो विशेषो यथा यथा च परीक्षितव्य; स तथा तथा व्याख्यास्यते ॥ ८७ ॥
इस दश प्रकार की परीक्षा में जो जो विशेषता है और जिस जिस८७ प्रकार॥ से परीक्षा करनी चाहिये उसकी उसी २ प्रकार से व्याख्या करते हैं । कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा -भिषङ्ग नाम स यो भेषतियथाव-, यः सूत्रार्थप्रयोगकुशलः, यस्य वायुः सर्वथा विदितम् गुप्णतः त्सर्वधातुसाम्यंकार्याभिनिर्वृतिं चिकीर्षन्नात्मानमेवाऽऽदितःपश्यन् - कचिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्तनपरीक्षेत गुणिषुसमर्थोसमर्थोन वेति । तमे भिषग्गुणा येरुपपन्न विवादास्याभिनिवर्तनेजितस्तता भवति । तद्यथा पर्यवदाता रिकर्मा दास्यं शौचंचेति ॥ ८८ ॥
उपकरणवत्ता सर्वन्द्रियोपपन्नता प्रकृतिज्ञता प्रतिपतिज्ञता पहिले कहा है कि भिपककारण है । इस भिपक की परीक्षाजोयहआयुर्वेदीयहै । जो पीड़ासूत्राथों ( रोगमें, प्रयोग) को मेंदूरऔरकरताकर्म, शमनमें कुशलकरताहैहै,,जिसेवह भिषकरांगो कीहैविदितआयु। हैहित, शास्त्रश- अहित, सुख- अमुख, प्रमाण अप्रमाण और स्वरूप से भी प्रकार इच्छा से सबसे कर्म को जानने वाला वैद्य सब धातुओं की समानता करने की को देखता प्रथम अपनी परीक्षा करे । जैसे गुण के योग से कार्य में सफलतामें अपनी परीक्षा हुआकरे, क्यावैद्य गुणियोंमैं इस कार्यअर्थात्को भियग्करने मेंद्रब्यसमर्थ, रोगीहूँ वाऔरनहींपरिचारकों। भिषक् के निम्नलिखितमें समर्थ, गुणहोताहैंहैजिन। यथा-गुणोंविमलसे युक्तशास्त्रहोने ज्ञानपर वैद्य, सब धातुसाम्यप्रकार के रूपीकर्म काकार्यसाक्षात्करने अनुभव दक्षता, शस्त्रोपचार आदि में हस्तलाघव, उपकरणों का होना, सब इन्द्रियों कीसे युक्त होना, रोगी की प्रकृति का ज्ञान और प्रतिपत्ति अर्थात् जिस रोगी जैसी चिकित्सा करनी चाहिये उसका ज्ञान ॥ ८८ ॥
करणं पुनर्भेषजं; भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धा- तुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तरेभ्यः । तद्विविधं व्यपाश्रयभेदात्; -देवव्यपाश्रयं युक्तियपाश्रयं चेति । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधिमणि- मङ्गलबल्युपहार होम नियम प्रायश्वितोपवास -स्वस्त्ययन- प्रणिपात गमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं-संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्टफलाः । एतचैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं द्रव्यभूतमद्रव्यभूतं च । तत्र यद् द्रव्यभूतं तदुपायाभिप्लुतम् । उपायो नाम भयदर्शनविस्मापन -विस्मारण- क्षोभण-हर्षण-भर्त्सन-वघ · बन्ध-स्वप्न. संवाहनादिरमूर्ती भावविशेषो
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yee चरकसंहिता [ अ० = यथोक्ताः सिद्धचपायाश्चोपायाभिप्लता इति । यत्तु द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु योगमुपैति तस्यापीयं परीक्षा,-इदमेवं प्रकृत्या एवंगुणमेवंप्रभावमस्मि- न्देशे जातमस्मिन्नृतावेवं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया मात्रया युक्तमस्मिन् रोगे एवंविधस्य पुरुषस्यैतावन्तं दोषमपकर्षयत्युपशमयति वा यदन्यदपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति ॥ ८६ ॥
मेष ( औषध ) करण है । धातुसाम्यरूप कार्य के करने में प्रयत्न करते हुए वैद्य को जो वस्तु साधन होती हैं उसका नाम 'भेषज' है । यह मेष ( औषध ) आश्रय भेद से दो प्रकार की है । ( १ ) देव व्यपाभय और ( २ ) युक्तिव्यपाश्रय । इनमें देवव्यपाश्रय मंत्र, औषधि, मणि, मंगळ, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, दान, स्वस्त्ययन, प्रणिपात ( विनय ), गमन आदि कार्य देव का आश्रय करके धातुओं को समान करते हैं । युक्ति- व्यपाश्रय - संशोधन, उपशमन और दृष्टफल वाली चेष्टाएं ( घावन, स्वप्न, जागरण आदि ) । यही मेषज अंग भेद से दो प्रकार का है । ( १ ) अद्रव्य और ( २ ) द्रव्य । इनमें जो अद्रव्य औषध है वह उपाय से व्याप्त है । भय दिखाना, विस्मय उत्पन्न करना, झिड़कना, बांधना, नींद लाना, अंगमर्दन आदि ( दौड़ना, तैरना आदि ) अमूर्त पदार्थों और चिकित्सा में सफलता देने वाले भिषग आदि गुणों का होना ये उपाय हैं और जो औषध द्रव्य रूप हैं वह यमन आदि शोधन शमन कार्यों में काम आते हैं । द्रव्य रूप ( मूर्त ) ओषधि की ऐसी परीक्षा करनी उचित है कि इस औषधि की यह प्रकृति है, यह गुण है, ऐसा प्रभाव है, इस देश में उत्पन्न हुई है, इस ऋतु में संग्रह की गई है, इस प्रकार से रक्खी गई है, इस प्रकार के पुरुष को देने से इतने दोष को बाहर करती है अथवा शमन करती है । अन्य भी जो औषध इन या अन्य गुणों से युक्त थी, उसने भी दोषों का निष्कासन अथवा शमन किया था, इस- किये यह भी करेगी, इस प्रकार अन्यत्र प्रत्यक्ष करके यहां पर अनुमान से निश्चय करना चाहिये ॥ ८६ ॥
कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं तस्य लक्षणं विकारागमः परीक्षा त्वस्य विकारप्रकृतेश्चैवनातिरिक्तलिङ्गविशेषावेक्षणं विकारस्य च साध्यासा- ध्य-मृदु -दारुण- लिङ्ग विशेषावेक्षणमिति ॥ ६० ॥
कार्ययोनि - धातुओं की विषमता 'कार्ययोनि' है । विकार का होना यह उसका लक्षण है । इस विकार की प्रकृति के वातादि दोषों के कम अधिक, विशेष क्षणों को देखना । इसी प्रकार से विकार का साध्य, असाध्य, मृदु, दारुण आदि विशेष क्षणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ९ ० ॥
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STO = ] विमानस्थानम ५८६ कार्य धातुसाम्यं तस्य लक्षणं विकारोपशमः, परीक्षा स्वस्थ रुगप-शमनं स्वरवर्णयोगः शरीरोपचयः बलवृद्धिरभ्यवहार्याभिलाषा रुचिरा-हारकालेऽभ्यवहृतस्य चाऽऽहारस्य काले सम्यग्जरणं निद्रालाभो यथा-कालं वैकारिकाणां च स्वप्नानामदर्शनं सुखेन च प्रतिबाधनं वातमूत्र पुरीषरेस मुक्त सर्वाकारं मन बुद्धीन्द्रियाणां चान्यापत्तिरिति ॥६५॥
कार्य - धातुओं का समान करना कार्य है । विकार का शान्त होना यह इसका लक्षण है । इसकी परीक्षा दर्द का शान्त होना है । स्वर और वर्ण का प्राकृत रूप में आजाना शरीर की वृद्धि, बलवृद्धि, भोजन में इच्छा, आहार के समय कचि होना, खाये हुए भोजन का आहारकाल में भी प्रकार जीर्ण होना, टीक समय पर नींद आना, विकार ( रंग ) जन्य स्वप्नों का न दोखना, सुखपूर्वक जागना, प्रातः उठना, वायु, मूत्र, मंत्र और शुक्र का ठीक समय पर त्याग होना, सब प्रकार से मन, बुद्धि और इन्द्रियों में सुख होना ॥ ६१ ॥
कार्यफलं सुखावाप्तिः । तस्य लक्षणं मनोबुद्धीन्द्रियशरीर तुष्टिः ॥ ६२॥
कार्यफल —सुख का प्राप्त होना । इसका लक्षण-मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर का प्रसन्न होना है ॥ ६२ ॥
अनुत्रन्धस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं प्राणैः सहः संयोगः ॥ ६३ ॥
अनुबन्ध -आयु है, इसका लक्षण प्राणों के साथ शरीर का सम्बन्ध बना रहना है ॥ ६३ ॥
देशस्तु भूमिरातुरश्च । तत्र भूमिपरीक्षा- आतुरपरि ज्ञानहेतोर्वा स्यादौषधपरिज्ञानद्देता । तत्र तादियमातुरपरिज्ञानहेतोः । तद्यथा कस्मिन्नयं भूमिदेशी जातः संवृद्धो व्याधितो वेति । तस्मिंश्च भूमिदेशे मनुष्याणामिदमाहार जातमिदं विहारजातमेवमेवंविधं सत्वमेवं विधं सात्म्यमेवंविधा दोषो भक्तिरियमिमे व्याचया दिनांमदमद्दि-तमिदमिति ( प्रायोम्हणेन ) । औषधपरिज्ञानद्देवास्तु कल्पेषु भूमि- परीक्षा वक्ष्यत ॥ ६४ ॥
देश -देश भूमि और रोगी हैं । इनमें भूमि-परीक्षा के ज्ञान का प्रयोजन रोगी के देश के कारण सात्म्य को समझने के लिये और औषधि के ज्ञान के लिये है । इनमें रोगी को समझने के लिये -जैसे किस भूमि खण्ड पर यह रोगी उत्पन्न हुआ है? बढ़ा है? रोगी हुआ है? उस भूमि पर मनुष्यों का इस प्रकार का अहार है, इस प्रकार का बिहार है, इस प्रकार का आचार है, इस प्रकार का बल, इस प्रकार का सच, इस प्रकार का सात्म्य, इस प्रकार के दोष, इस प्रकार की रुचि, इस प्रकार के रोग, यह हितकर, यह अहितकर है, यह
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५६० चरकसंहिता [अ० ८ भूमि परीक्षा कह दी । औषधि परिज्ञान के लिये भूमिपरीक्षा कल्पस्थान ( मदन- फल -कल्प ) में कहेंगे || १४|| आतुरस्तु खलु कार्यदेशः, तस्य परीक्षा आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोर्वा स्याद्वलदोषप्रमाणज्ञानहेतोर्वा; तत्र तावदियं बलदोषप्रमाणज्ञानहेतो:- दोषप्रमाणानुरूपो हि भेषजप्रमाणविकल्पो बलप्रमाणविशेषा पेजो भवति । सहसा ह्यतिबलमौषधमपरीक्षक प्रयुक्तमल्पबलमातुरमभिधात- येत, नातिबलान्याग्नेय- सौम्य वायवीयान्यौषधान्यग्निक्षारशस्त्रकर्माणि बा शक्यन्तेऽल्पबलैः सोढुम् । अविषह्यातितीक्ष्णवेगत्वाद्धि सद्यः प्राण- हराणि स्युः । एतचैव कारणमपेक्षमाणा हीनबलमातुरमविषादकरे- मृदुसुकुमारप्रायैरुत्तरोत्तरगुरुभिरविभ्रमै रनात्ययि कैश्चोपचरन्त्यौषधैः, विशेषतश्च नारीः । ता ह्यनवस्थितमृदुविवृत्तविक्लवहृदयाः प्रायः सुकुमार्योऽबलाः परसंस्तभ्थाश्च । तथा बलवति बलवद्व्याधिपरिगते स्वल्पबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमसाधकं भवति ॥ ६५ ॥
कार्यदेश - धातुसाम्य कार्य का देश अर्थात् आधार रोगी है । इसको परीक्षा आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये है । अथवा रोगी के बल और दोष को जानने के लिये रोगी रूपी देश की परीक्षा होती है । रोगी की बल प्रमाण और दोष प्रमाण की परीक्षा का प्रयोजन - औषधि का प्रमाण दोष और बल रोग और रोगी दोनों को देख कर निश्चित किया जाता है । क्योंकि यदि बहुत बलवती औषध थोड़े बल वाले रोगी को विना परीक्षा किये दे दी जाय तो यह औषध रोगी को मार देगी । क्योंकि अल्प बल वाले व्यक्ति, अति बल वाली, आग्नेय, वायवीय गुण से युक्त ओषधियों को और अग्नि, वार और शस्त्र के कर्मों को सहन नहीं कर सकते ॥ इनका वेग असह्य और अतितीक्ष्ण होने से ये वस्तुएं शीघ्र प्राणनाशक हो जाती हैं । इन कारणों को देख कर ही हीनबल वाले रोगी की, खास कर स्त्री की चिकित्सा शरीर और मन में ग्लानि उत्पन्न न करने वाली, मृदु- कोमल ओषधियों से तथा धीरे धीरे, उत्तरोत्तर वीर्य और परिमाण में गुरु होते हुए भी व्यापत्ति ( विकार ) न करने वाली, सम्यक् प्रकार से दी हुई ओषधियों से करते हैं । ये स्त्रियां अस्थिर, छोटे दिल की तथा भीरु हृदय वाली, प्रायः सुकुमार, अबला होती हैं और थोड़ो सो भी बेदना को सहन नहीं कर सकतीं और स्वयं अपने को कष्ट में नहीं संभाल सकतीं, उनको दूसरे ही को संभालना पड़ता है । देखिये सुत, सूत्रस्थान में चार और अग्निकर्म ।
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विमानस्थानम् ५६१ अ०८इसी]प्रकार बलवान् रोगों में अथवा बढवान् रोग से आक्रान्त होने पर स्वल्प बल बाकी औषधि बिना परीक्षा के दी हुई, रोग को शमन करने में समर्थ नहींहोती ॥६५॥
तस्मादातुरं परीक्षेत प्रकृतितश्च विकृतितश्च सारतश्च संहननतश्च प्रमाणतश्च सात्म्यतश्च सरस्वतश्चाऽऽहारशक्तितश्च व्यायामशक्तितश्च वयस्तश्चेति बलप्रमाणविशेषग्रहणहेतोः ॥ ६६ ॥
इसलिये रोगी की परीक्षा ( निम्न साधनों से ) करनी चाहिये । यथा- प्रकृति से, विकृति से, सार से, संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से, प्रमाण से, सात्म्य से, सरव से, आहार शक्ति से, व्यायाम-शक्ति से, और वय से रोगी के बल, प्रमाण विशेष को जानने के लिये इन गुणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ६६ ॥
तत्रामी प्रकृत्यादयो भावाः । तद्यथा- शुक्र-शोणित-प्रकृतिं काल- ग-र्भाशय -प्रकृतिमातुराहारविहार-प्रकृतिं महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भश- रमपेक्षते । एता हि येन येन दोपेणाधिकतमेनैकेनानेकेन वा समतु-बध्यन्ते तेन तेन दोषेण गर्भाऽनुबध्यते । ततः सा सा दोषप्रकृतिरु- च्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता । तस्माद्वातलाः प्रकृत्या केचित् पित्तलाः केचित् लेष्मला; केचित् संसृष्टाः केचित्, समधातवः प्रकृत्या केचिद्भवन्ति ॥ ६७ ॥
इनमें प्रथम प्रकृति आदि का वर्णन करते हैं । गर्भ का, शरीर जैसे शुक्रएवं शोणित की प्रकृति की, काल ( समय ) की, गर्भाशय की प्रकृति की, माता के आहार-विहार की, शुक्र, शोणित में मिले पंच महाभूत, शरीरात्मक भूतों की अपेक्षा करता है । ये शुक शोणित आदि प्रकृतियां जिस जिस वातादि दोष से एक अथवा एक से अधिक दो या तीन से सम्बन्द होती हैं, उसी एक या अधिक दोष से गर्भ भी सम्बन्धित हो जाता है । इससे मनुष्यों की गर्भ में बनी प्रकृति को उसी दोष की प्रकृति कहते हैं । उस उस दोष के बलवान् होने से वह वह प्रकृति होजाती है । इसीलिये कई श्लेष्मप्रकृति, कई पित्तप्रकृति और कई वात प्रकृति और कई मिश्रित प्रकृति, कई: समधातुप्रकृति के होते हैं । इनके लक्षण कहते हैं । तेषां हि क्षणानि व्याख्यास्यामः- श्लेष्मा हिस्निग्ध-लक्ष्ण-मृदु-मधुर- सार-सान्द्र- मन्द- स्तिमित-गुरु-शीत-पिच्छिलाच्छः, तस्य स्नेहात् श्लेष्मलाःस्निग्धाङ्गाः, लक्ष्णत्वाच्छ्लक्ष्णाङ्गाः, मृदुत्वाद् दृष्टिसुख - सुकुमा-रावदातगात्रा, माधुर्यात्प्रभूतशुक्रव्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहत-
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५६२ चरकसंहिता [ अ० ८ स्थिरशरीराः सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्ण सर्वगात्राः मन्दत्वान्मन्द- चेष्टाहारविहाराः स्तैमित्यादशीघ्रारम्भात्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वा- साराधिष्ठितावस्थितगतयः, शैत्यादल्पक्षु तृष्णासंतापस्वेददोषाः, पिच्छि छत्वात् सुलिप्रसारसन्धिबन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्न दर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च । त एवंगुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो वि- द्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति ॥ ६८ ॥
श्लेष्मा- कफस्निग्ध, लक्षण, मृदु, मधुर, सार, सान्द्र, मन्द, स्तिमित ( घट्ट ), गुरु, शीत, पिच्छिल और निर्मल होता है । कफ के स्नेह गुण के कारण श्लेष्मप्रकृति के मनुष्य स्निग्ध अंगों वाले श्लक्ष्ण होने से चिकने अंग बाले, कोमल होने से आंखों को आनन्ददायक, सुकुमार, गौरवर्ण होते हैं । मधुरता होने से अधिक शुक्र, मैथुनशक्ति और संतान वाले होते हैं । सार के कारण इनका शरीर संहत, दृढ़, स्थिर होता है । सान्द्रता के कारण से पुष्ट, सम्पूर्ण अंगों वाले मन्द होने से चेष्टा, आहार और बिहार में धीमे स्तैमित्य ( आलस्य ) होने से देर में बाणी, मन शरीर के कार्य करने वाले एवं क्षोभ तथा मानस विकार वाले, गुरु होने के कारण हाथी के समान मन्द मस्त चाल वाले, शीतता के कारण थोड़ी, भूख, प्यास, संताप तथा पसीने के दोष वाले; पिच्छिल होने से इनके मांसादि तथा सन्धिबन्धन अच्छी प्रकार से संयुक्त होते हैं । निर्मल होने से प्रसन्नमुख, प्रसन्न और स्निग्ध वर्ण तथा स्वर वाले होते हैं । इन गुणों के कारण कफप्रकृति के मनुष्य बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त और दीर्घायु होते हे ॥ ६८ ॥
ि asi तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णासहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः प्रभूत- पिप्लुञ्यङ्गतिलकपिडकाः, चुत्पिपासावन्तः क्षिपवलीपलितखालि त्यदोषाः, प्रायो मृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः क्ष्ष्ण्यात्तोरा-द्रवत्वाच्छिथिलक्रमाः, तीक्ष्णाग्नयःमृदुसन्धिबन्धमांसा, प्रभूताशनपानाः,, क्लेशासहिष्णवोप्रभूतसृष्टस्वेद मूत्रपुरीषाश्च, दन्दशूकाः;; वित्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्य शिरः शरीरगन्धाः; कट्वम्लत्वादल्पशुक्र- व्यवायापत्याः त एवंगुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञान- विज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति ॥ ६६ ॥
पित्त -उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, विस्र ( सदी गन्ध वाला ), अम्ल-कटु रस * देखिये सुश्रुत शारीरस्थान ४ र्थ अध्याय में इनके लक्षण